
Rishi: Atharvanic seer (often anonymous/Angirasa in anukramaṇī for such charms; varies).
Devata: Oṣadhi/Vanaspati (plant-power) as operative deity
Chandas: Anuṣṭubh (typical for compact domestic charms)
अथर्ववेद 3.18 एक संक्षिप्त अथर्वणीय अभिचार-मंत्र है, जो ओषधि/वनस्पति-शक्ति और बाध्यकारी मंत्र-बल को साधकर सौत (प्रतिद्वन्द्वी सह-पत्नी) को दूर भगाने तथा पति का एकनिष्ठ दाम्पत्य-आसक्ति अपने ही प्रति स्थिर करने का प्रयोजन रखता है। इसमें एक व्यावहारिक विधि (प्रभावशाली औषधि को खोदकर निकालना और उसका प्रयोग) के साथ सामाजिक-स्थानिक वर्चस्व के सूत्र (“मैं ऊँची; वह नीचे”) और मन-प्रवर्तन की उपमा जुड़ी है, जिससे पति का स्नेह जल के प्रवाह की भाँति अपने मार्ग से चलकर साधिका की ओर ही बहने लगे।
Mantra 1
वनस्पतिः। इ॒मां ख॑ना॒म्योष॑धिं वी॒रुधां॒ बल॑वत्तमाम्। यया॑ स॒पत्नीं॒ बाध॑ते॒ यया॑ संवि॒न्दते॒ पति॑म्
हे वनस्पति! मैं इस ओषधि को खोदकर निकालता/निकालती हूँ—वीरुधाओं में सबसे अधिक बलवती। इसी के द्वारा सौत (सपत्नी) को दूर किया जाता है, इसी के द्वारा पति को पाया और प्राप्त किया जाता है।
Mantra 2
उत्ता॑नपर्णे॒ सुभ॑गे॒ देव॑जूते॒ सह॑स्वति । स॒पत्नीं॑ मे॒ परा॑ णुद॒ पतिं॑ मे॒ केव॑लं कृधि
हे उत्तानपर्णे, सुभगे, देवजूत, सहस्वति! मेरी सपत्नी को दूर हटा दे; मेरे पति को केवल मेरा ही कर दे।
Mantra 3
न॒हि ते॒ नाम॑ ज॒ग्राह॒ नो अ॒स्मिन् र॑मसे॒ पतौ॑ । परा॑मे॒व प॑रा॒वतं॑ स॒पत्नीं॑ गमयामसि
क्योंकि सचमुच इस हमारे रमणीय पति पर तेरा नाम नहीं चढ़ा, न तू इसमें रमती है। इसलिए हम सपत्नी को बहुत दूर—दूर देश-प्रदेश की ओर—भेज देते हैं।
Mantra 4
उत्त॑रा॒हमु॑त्तर॒ उत्त॒रेदुत्त॑राभ्यः । अ॒धः स॒पत्नी॒ या ममाध॑रा॒ साध॑राभ्यः
मैं ऊँची हूँ, ऊँची; मैं ऊँचों से भी ऊपर उठूँ। नीचे रहे वह सौतन—जो मुझसे नीची है—नीचे, नीचों के बीच।
Mantra 5
अ॒हम॑स्मि॒ सह॑मा॒नाथो॒ त्वम॑सि सास॒हिः । उ॒भे सह॑स्वती भू॒त्वा स॒पत्नीं॑ मे सहावहै
मैं स्वामी के लिए विजय-सहायता हूँ; तू प्रबल आक्रमण-शक्ति है। हम दोनों सहन-शक्ति से सम्पन्न होकर, मेरी सौत (सपत्नी) के विरुद्ध, उसे जीतकर ले चलें।
Mantra 6
अ॒भि ते॑ऽधां॒ सह॑माना॒मुप॑ तेऽधां॒ सही॑यसीम्। मामनु॒ प्र ते॒ मनो॑ व॒त्सं गौरि॑व धावतु प॒था वारि॑व धावतु
तेरे विरुद्ध मैं एक दबाने वाली शक्ति स्थापित करता हूँ; तेरे ऊपर उससे भी अधिक प्रबल शक्ति रखता हूँ। तेरा मन मेरे पीछे ऐसे दौड़े जैसे गाय अपने बछड़े के पीछे; जैसे जल अपने मार्ग से बहता है, वैसे ही वह अपने पथ पर दौड़े।
It is used to subdue or expel a rival co-wife and to secure the husband’s exclusive attachment to the client, using a dug-up charm-herb plus spoken compulsion formulas.
In Atharvanic practice, plants are treated as living power. The herb functions as the physical carrier of the mantra’s intent—especially effective for domestic rivalry where a tangible charm is desired.
They are ritualized social directions: ‘higher’ signals precedence and authority for the operator, while ‘below’ symbolically pushes the rival into inferiority and exclusion within household space and status.
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