
Rishi: Atharvanic tradition
Devata: Vicṛtā and Tārakā (personified deliverers/unbinders); secondarily the expulsion of kṣetriya-disease
Chandas: Mixed/irregular as noted in the tradition: Virāṭ / Nicṛt-pathyā-pañkti (per the supplied metrical note)
अथर्ववेद 2.8 एक संक्षिप्त उपचार–निष्कासन-मंत्र है, जिसका लक्ष्य ‘क्षेत्रिय’ नामक व्याधि को ढीला करके बाहर खदेड़ना है—जिसे ऊपर और नीचे से कसी हुई बंधन-रज्जु (फाँस) के रूप में कल्पित किया गया है। इसमें युग्म-उद्धारक देवियाँ/शक्तियाँ विचृता और तारका का आह्वान किया जाता है कि वे ‘बंधन खोलें’, और विरुत् लता को क्षेत्रिय-विनाशक औषधि के रूप में सक्रिय किया जाता है। अनुष्ठान की शक्ति हल और जुताई के उपकरणों तक भी विस्तारित की जाती है, जो प्रतीकात्मक रूप से रोग को ‘काटकर’ उखाड़ते और दूर करते हैं।
Mantra 1
क्षेत्रियरोगनाशनम्। ४ विराट्, ५ निचृत्पथ्यापङ्क्तिः। उद॑गातां॒ भग॑वती वि॒चृतौ॒ नाम॒ तार॑के । वि क्षे॑त्रि॒यस्य॑ मुञ्चतामध॒मं पाश॑मुत्त॒मम्
ऊपर की ओर वे दोनों भगवती प्रस्थान करें—‘विचृतौ’ नाम की वे दोनों तारके (उद्धारक)। वे क्षेत्रिय-रोग से (हमें) छुड़ाएँ; नीचे का पाश और ऊपर का पाश—दोनों को अलग कर के खोल दें।
Mantra 2
अपे॒यं रात्र्यु॑च्छ॒त्वपो॑च्छन्त्वभि॒कृत्व॑रीः । वी॒रुत् क्षे॑त्रिय॒नाश॒न्यप॑ क्षेत्रि॒यमु॑च्छतु
दूर हो! यह रात्रि उठकर हट जाए; दूर हों वे आक्रमणकारी शक्तियाँ—उठकर उतर जाएँ। क्षे॒त्रिय-नाशिनी वीरुत्—वह क्षे॒त्रिय (व्याधि) को उठा कर दूर कर दे।
Mantra 3
ब॒भ्रोरर्जु॑नकाण्डस्य॒ यव॑स्य ते पला॒ल्या तिल॑स्य तिलपि॒ञ्ज्या। वीरुत् क्षे॑त्रिय॒नाश॒न्यप॑ क्षेत्रि॒यमु॑च्छतु
बभ्रु, अर्जुन-काण्ड, यव, पला॒ल्या (भूसी), तिल और तिल-पिष्ट (तिलपिञ्ज्या) के साथ—वीरुत्, जो क्षे॒त्रिय-नाशिनी है, वह क्षे॒त्रिय (रोग/दोष) को दूर धकेल दे।
Mantra 4
नम॑स्ते॒ लाङ्ग॑लेभ्यो॒ नम॑ ईषायु॒गेभ्यः॑ । वी॒रुत् क्षे॑त्रिय॒नाश॒न्यप॑ क्षेत्रि॒यमु॑च्छतु
हे लाङ्गल (हल) तुम्हें नमस्कार; ईषा, युग (दांडा और जुए) को नमस्कार। क्षेत्रिय (kṣetriya) का नाश करने वाली वीरुत् (Virút) वनस्पति उस क्षेत्रिय रोग को दूर धकेल दे।
Mantra 5
नमः॑ सनिस्रसा॒क्षेभ्यो॒ नमः॑ संदे॒श्येऽभ्यः । नमः॒ क्षेत्र॑स्य॒ पत॑ये वी॒रुत् क्षे॑त्रिय॒नाश॒न्यप॑ क्षेत्रि॒यमु॑छतु
धुंधली और रिसती आँखों वालों को नमस्कार; पड़ोस में भटकने/मंडराने वाली शक्तियों को नमस्कार। क्षेत्र के स्वामी को नमस्कार। क्षेत्र-रोग (क्षेत्रिय) का नाश करने वाली वीरुत्-वनस्पति (Virút) उस क्षेत्रिय पीड़ा को दूर हटा दे।
In this sukta, kṣetriya is treated as a named affliction (and almost a personified force) that binds the patient like a noose; the mantra’s goal is to loosen and expel it rather than merely describe symptoms.
They are paired, ‘blessed’ deliverers invoked as unbinders—powers that cut or loosen bonds—so the patient is released from the disease’s grasp (both ‘upper’ and ‘lower’).
The ploughing set symbolizes cutting, turning, and uprooting; by saluting these implements, the rite borrows that ‘uprooting’ power to dislodge the kṣetriya malady and thrust it away.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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