
Book 2 operationalizes the Vijigīṣu’s power by converting sovereignty into repeatable administrative procedure. Chapter 2.14 places the Sauvarṇika at the choke-point where private craftsmanship meets public finance: assay, deposits, workmanship schedules, and fraud control. Kautilya treats precious metal not as a luxury domain but as monetary infrastructure—any corruption here propagates into coinage confidence, tax receipts, and the Kośa’s solvency. Hence the chapter specifies (i) standardized acceptance/return of deposits by color and weight, (ii) time-bound and task-bound labor discipline with wage and penalty rules, (iii) technical norms for alloying and recognized “loss” (kṣaya) in heating/washing, and (iv) graded daṇḍa for debasement, short-weighting, and tool-based deception. The placement within Adhyakṣapracāra signals that conquest-capacity is built first by internal economic reliability: trust in measures and metals is a precondition for provisioning the army, paying officials, and sustaining alliances.
Sutra 1
सौवर्णिकः पौरजानपदानां रूप्यसुवर्णमावेशनिभिः कारयेत् ॥ कZ_०२.१४.०१ ॥
सौवर्णिक (राजकीय स्वर्णकार/परखिया) नगरवासियों और जनपदवासियों से उनके चाँदी और सोने का लेन-देन नियमानुसार आधिकारिक आवेशन (जमा/जाँच-स्वीकृति) के माध्यम से कराए।
Sutra 2
निर्दिष्टकालकार्यं च कर्म कुर्युः अनिर्दिष्टकालं कार्यापदेशम् ॥ कZ_०२.१४.०२ ॥
वे निश्चित समय और उद्देश्य वाले कार्य को करें; और जिस कार्य का समय निश्चित न हो, उसे केवल औपचारिक कार्यादेश (कार्यापदेश) पर ही करें।
Sutra 3
कार्यस्यान्यथाकरणे वेतननाशः तद्द्विगुणश्च दण्डः ॥ कZ_०२.१४.०३ ॥
निर्दिष्ट कार्य को विधि के विरुद्ध करने पर वेतन नष्ट होता है और उसी का दुगुना दण्ड लगाया जाता है।
Sutra 4
कालातिपातने पादहीनं वेतनं तद्द्विगुणश्च दण्डः ॥ कZ_०२.१४.०४ ॥
निर्धारित समय से विलम्ब होने पर मजदूरी एक चौथाई घटाई जाए, और घटाई गई राशि के दुगुने का दण्ड लगाया जाए।
Sutra 5
यथावर्णप्रमाणं निक्षेपं गृह्णीयुस्तथाविधमेवार्पयेयुः ॥ कZ_०२.१४.०५ ॥
वे जमा (निक्षेप) को उसके बताए गए रंग/श्रेणी और माप-परिमाण के अनुसार स्वीकार करें, और ठीक उसी प्रकार (श्रेणी व माप सहित) वापस करें।
Sutra 6
कालान्तरादपि च तथाविधमेव प्रतिगृह्णीयुः अन्यत्र क्षीणपरिशीर्णाभ्याम् ॥ कZ_०२.१४.०६ ॥
समय बीत जाने पर भी वे उसी प्रकार की वस्तु ही वापस लें/स्वीकार करें; केवल क्षय (कमी) या घिसावट होने की स्थिति में अपवाद है।
Sutra 7
आवेशनिभिः सुवर्णपुद्गललक्षणप्रयोगेषु तत्तज्जानीयात् ॥ कZ_०२.१४.०७ ॥
पहचान-चिह्नों तथा सोने और बुलियन के लक्षणों की जाँच-प्रयोगों द्वारा प्रत्येक वस्तु की विशिष्ट पहचान/गुणवत्ता का निर्धारण करना चाहिए।
Sutra 8
तप्तकलधौतकयोः काकणिकः सुवर्णे क्षयो देयः ॥ कZ_०२.१४.०८ ॥
तप्त और धौतक (गरम करके धोया/साफ किया हुआ) सोने के लिए एक काकणिका की क्षय-छूट (हानि-भत्ता) दी जाए।
Sutra 9
तीक्ष्णकाकणी रूप्यद्विगुणः रागप्रक्षेपः तस्य षड्भागः क्षयः ॥ कZ_०२.१४.०९ ॥
‘तीक्ष्ण-काकणी’ के मिश्रण तथा रंग/मिश्रधातु हेतु दुगुनी मात्रा में चाँदी मिलाने पर, उस मिश्रण का छठा भाग प्रक्रिया-क्षय (हानि) के रूप में अनुमेय है।
Sutra 10
वर्णहीने माषावरे पूर्वः साहसदण्डः प्रमाणहीने मध्यमः तुलाप्रतिमानोपधाव् उत्तमः कृतभाण्डोपधौ च ॥ कZ_०२.१४.१० ॥
गुण/रंग में कमी या एक माषा की कमी होने पर धोखाधड़ी का न्यूनतम साहस-दण्ड; मानक माप में कमी पर मध्यम; और तराजू/मानक बाटों में धोखा या निर्मित पात्रों में छेड़छाड़ पर उत्तम (उच्चतम) दण्ड।
Sutra 11
सौवर्णिकेनादृष्टमन्यत्र वा प्रयोगं कारयतो द्वादशपणो दण्डः ॥ कZ_०२.१४.११ ॥
यदि सुनार से अधीक्षक द्वारा न देखी/स्वीकृत प्रक्रिया कराई जाए या उसे कहीं और (बाहर) कराया जाए, तो कराने वाले पर बारह पण का दण्ड लगाया जाता है।
Sutra 12
कर्तुर्द्विगुणः सापसारश्चेत् ॥ कZ_०२.१४.१२ ॥
वास्तविक कर्ता के लिए दण्ड दुगुना है; और यदि फरार होना हो, तो (मामला) अधिक गंभीर माना जाता है।
Sutra 13
अनपसारः कण्टकशोधनाय नीयेत ॥ कZ_०२.१४.१३ ॥
जो व्यक्ति प्रतिपूर्ति/वापसी नहीं करता, उसे कण्टकशोधन (बाज़ार-अपराधियों के दमन हेतु औपचारिक कार्रवाई) के लिए ले जाया जाए।
Sutra 14
कर्तुश्च द्विशतो दण्डः पणच्छेदनं वा ॥ कZ_०२.१४.१४ ॥
अपराधी पर दो सौ पण का दण्ड लगे, अथवा पणच्छेदन (धन-राशि की कटौती/जब्ती) किया जाए।
Sutra 15
तुलाप्रतिमानभाण्डं पौतवहस्तात्क्रीणीयुः ॥ कZ_०२.१४.१५ ॥
तराजू, मानक बाट/माप और मापने के बर्तन पौतव (राज्य के बाट-माप अधीक्षक) के हाथ/कार्यालय से ही खरीदे जाएँ।
Sutra 16
अन्यथा द्वादशपणो दण्डः ॥ कZ_०२.१४.१६ ॥
अन्यथा (इसके विपरीत करने पर) बारह पण का दण्ड है।
Sutra 17
घनं सुषिरं सम्यूह्यमवलेप्यं संघात्यं वासितकं च कारुकर्म ॥ कZ_०२.१४.१७ ॥
कारीगरी (छलपूर्ण निर्माण में) ये हैं—वस्तु को ठोस बनाना, खोखला बनाना, ठूँसकर/दबाकर भरना, लेप/पलस्तर चढ़ाना, जोड़कर/परत चढ़ाकर बनाना, और सुगंधित/उपचारित करना (छिपाने हेतु)।
Sutra 18
तुलाविषममपसारणं विस्रावणं पेटकः पिङ्कश्चेति हरणोपायाः ॥ कZ_०२.१४.१८ ॥
चोरी/हड़पने के उपाय हैं—तराजू का असंतुलन/छेड़छाड़, माल का हटाना/अलग कर लेना, रिसाव/बहा देना, ‘पेटक’ (डिब्बा-चाल), और ‘पिङ्क’ (पिङ्क-चाल)—ये हरण के उपाय हैं।
Sutra 19
सम्नामिन्युत्कीर्णिका भिन्नमस्तकोपकण्ठी कुशिक्या सकटुकक्ष्या परिवेल्यायस् कान्ता च दुष्टतुलाः ॥ कZ_०२.१४.१९ ॥
सम्नामिनी, उत्कीर्णिका, भिन्नमस्तकोपकण्ठी, कुशिक्या, सकटुकक्ष्या, परिवेल्या, अयस्कान्ता—ये सब छेड़छाड़ की हुई (कपट) तराजू हैं।
Sutra 20
रूप्यस्य द्वौ भागावेकः शुल्बस्य त्रिपुटकम् ॥ कZ_०२.१४.२० ॥
चाँदी के दो भाग और ताँबे का एक भाग—इसे ‘त्रिपुटक’ कहते हैं।
Sutra 21
तेनाकरोद्गतमपसार्यते तत्त्रिपुटकापसारितम् ॥ कZ_०२.१४.२१ ॥
उस (त्रिपुटक मिश्रण) से जो खदान से निकला धातु घटाया/निकाला जाता है, उसे ‘त्रिपुटक-अपसारित’ (त्रिपुटक से मिलाकर घटाया हुआ) कहते हैं।
Sutra 22
शुल्बेन शुल्बापसारितम् वेल्लकेन वेल्लकापसारितं शुल्बार्धसारेण हेम्ना हेमापसारितम् ॥ कZ_०२.१४.२२ ॥
यदि ताँबे से घटाया जाए तो ‘शुल्ब-अपसारित’; यदि वेल्लक से तो ‘वेल्लक-अपसारित’; और यदि आधे ताँबे-युक्त सोने (शुल्बार्धसार) से घटाया जाए तो ‘हेम-अपसारित’ कहलाता है।
Sutra 23
मूकमूषा पूतिकिट्टः करटुकमुखं नाली संदंशो जोङ्गनी सुवर्चिकालवणं तदेव सुवर्णमित्यपसारणमार्गाः ॥ कZ_०२.१४.२३ ॥
‘मूक मूषा’ (बिना मुख/छिद्र की क्रूसिबल), दुर्गंधयुक्त किट्ट/मैला स्लैग, ‘करटुकमुख’ (छिपे निकास वाला ‘सूंड-मुख’ उपकरण), नली, संदंश (चिमटा), जोङ्गनी (साइफ़न-जैसा उपकरण), और ‘सुवर्चिका’ लवण—ये वे उपाय/मार्ग हैं जिनसे ‘यही तो सोना है’ कहकर (दिखाते हुए) सोना अवैध रूप से निकाल लिया जाता है।
Sutra 24
पूर्वप्रणिहिता वा पिण्डवालुका मूषाभेदादग्निष्ठादुद्ध्रियन्ते ॥ कZ_०२.१४.२४ ॥
पहले से रखी हुई रेत की गोलियाँ (या रेत के ढेले) क्रूसिबल को तोड़कर या भट्ठी/अग्निकुंड से निकालकर प्राप्त की जाती हैं।
Sutra 25
पश्चाद्बन्धने आचितकपत्त्रपरीक्षायां वा रूप्यरूपेण परिवर्तनं विस्रावणम् पिण्डवालुकानां लोहपिण्डवालुकाभिर्वा ॥ कZ_०२.१४.२५ ॥
बाद में—सील/बाँधने के चरण में या परतदार धातु-पत्र की जाँच में—चाँदी जैसा रूप देकर अदला-बदली की जाती है; और रेत की गोलियों के स्थान पर लोहे की गोलियाँ (या लोहे-रेत के ढेले) रखकर रिसाव/निकासी कर दी जाती है।
Sutra 26
गाढश्चाभ्युद्धार्यश्च पेटकः सम्यूह्यावलेप्यसंघात्येषु क्रियते ॥ कZ_०२.१४.२६ ॥
ढेर लगाने, लेप करने और संपीडन (धातु को जमाने) की क्रियाओं में एक मजबूत (कसकर बंद) पेटी तथा एक ‘निकालने योग्य’ (भीतरी भाग हटाने वाली) पेटी का प्रयोग किया जाता है।
Sutra 27
सीसरूपं सुवर्णपत्त्रेणावलिप्तमभ्यन्तरमष्टकेन बद्धं गाढपेटकः ॥ कZ_०२.१४.२७ ॥
‘कसकर बंद पेटी’ वह है जिसमें सीसे जैसा आकार सोने के पत्ते से लेपा गया हो और भीतर का भाग अष्टकोणीय (या आठ-भाग) बंधन से कसा हुआ हो।
Sutra 28
स एव पटलसम्पुटेष्वभ्युद्धार्यः ॥ कZ_०२.१४.२८ ॥
वही व्यवस्था परतदार आवरणों/खोलों के भीतर ‘निकालने योग्य’ (लिफ्ट-आउट) रूप में भी बनाई जाती है।
Sutra 29
पत्त्रमाश्लिष्टं यमकपत्त्रं वावलेप्येषु क्रियते ॥ कZ_०२.१४.२९ ॥
लेपित/आवलेप्य वस्तुओं में पत्त्र (धातु-पत्र) या तो चिपकाकर एकल पत्त्र के रूप में लगाया जाता है, या फिर यमकपत्त्र (दोहरा/युग्म पत्त्र) के रूप में।
Sutra 30
शुल्बं तारं वा गर्भः पत्त्राणां संघात्येषु क्रियते ॥ कZ_०२.१४.३० ॥
पत्त्र-परतों से बने संघात (संपीडित ढेर) के भीतर ‘गर्भ/कोर’ के रूप में ताँबा या तार रखा/बनाया जाता है।
Sutra 31
शुल्बरूपं सुवर्णपत्त्रसंहतं प्रमृष्टं सुपार्श्वम् तदेव यमकपत्त्रसंहतं प्रमृष्टं ताम्रताररुपं चोत्तरवर्णकः ॥ कZ_०२.१४.३१ ॥
ताँबे के रूप का टुकड़ा, जिस पर सुवर्ण-पत्त्र की परत चढ़ी हो, जो पॉलिश किया गया हो और जिसके पार्श्व अच्छे बने हों; इसी प्रकार दोहरे पत्त्र से परतित और पॉलिश किया हुआ; तथा ताँबे-तार के रूप वाला—ये सब ‘उत्तरवर्णक’ (उच्च-वर्ण/उत्तम रंग वाले) कहलाते हैं।
Sutra 32
तदुभयं तापनिकषाभ्यां निह्शब्दोल्लेखनाभ्यां वा विद्यात् ॥ कZ_०२.१४.३२ ॥
उन दोनों प्रकारों की पहचान गरम करने और निकष (टचस्टोन) से, या फिर बिना आवाज़ के खुरचने और उत्कीर्णन (रेखांकन) की परीक्षा से करनी चाहिए।
Sutra 33
अभ्युद्धार्यं बदराम्ले लवणोदके वा सादयन्ति । इति पेटकः ॥ कZ_०२.१४.३३ ॥
‘अभ्युद्धार्य’ (अलग होकर बैठ जाने वाला/मिलावट का अंश) को बदराम्ल (बेर के खट्टे घोल) या लवण-जल में बैठा देते हैं—इसे ‘पेटक’ कहते हैं।
Sutra 34
घने सुषिरे वा रूपे सुवर्णमृन्मालुकाहिङ्गुलुककल्पो वा तप्तोऽवतिष्ठते ॥ कZ_०२.१४.३४ ॥
घने (ठोस) या खोखले रूप में, ‘स्वर्ण-मृत्तिका’ या बालू या हिंगुलक-जैसा मिश्रण गरम करने पर प्रकट/स्पष्ट रह जाता है।
Sutra 35
दृढवास्तुके वा रूपे वालुकामिश्रं जतु गान्धारपङ्को वा तप्तोऽवतिष्ठते ॥ कZ_०२.१४.३५ ॥
दृढ़ संरचना/ढलाई वाले रूप में, बालू-मिश्रित राल, या ‘गान्धार पंक/लेप’, गरम करने पर स्पष्ट रह जाता है।
Sutra 36
तयोस्तापनमवध्वंसनं वा शुद्धिः ॥ कZ_०२.१४.३६ ॥
उन दोनों (मिलावटों) के लिए शुद्धि—तापन (अलग करने हेतु) या पूर्ण नाश/हटाना है।
Sutra 37
सपरिभाण्डे वा रूपे लवणमुल्कया कटुशर्करया तप्तमवतिष्ठते ॥ कZ_०२.१४.३७ ॥
साज-सामान/जुड़ाव वाले रूप में, नमक—(या) अल्का/उल्का और कटु शर्करा—गरम करने पर स्पष्ट रह जाते हैं।
Sutra 38
तस्य क्वाथनं शुद्धिः ॥ कZ_०२.१४.३८ ॥
उसके लिए शुद्धि—उबालना है।
Sutra 39
अभ्रपटलमष्टकेन द्विगुणवास्तुके वा रूपे बध्यते ॥ कZ_०२.१४.३९ ॥
अभ्र (माइका) की चादर को ‘अष्टक’ इकाई के रूप में या द्विगुण संरचना वाले रूप में बाँधा/पैक किया जाता है।
Sutra 40
तस्यापिहितकाचकस्योदके निमज्जत एकदेशः सीदति पटलान्तरेषु वा सूच्या भिद्यते ॥ ॥
काँच से ढँके/सील किए गए उस पैकेट को पानी में डुबोने पर उसका एक भाग डूब जाता है; या परतों के बीच सुई से छेदकर (जाँच) की जाती है।
Sutra 41
मणयो रूप्यं सुवर्णं वा घनसुषिराणां पिङ्कः ॥ कZ_०२.१४.४१ ॥
मणि, चाँदी या सोना—चाहे ठोस हों या खोखले—‘पिङ्क’ नामक वर्ग में आते हैं।
Sutra 42
तस्य तापनमवध्वंसनं वा शुद्धिः । इति पिङ्कः ॥ कZ_०२.१४.४२ ॥
उस ‘पिङ्क’ वर्ग की वस्तु की शुद्धि गरम करने से या पूर्णतः नष्ट/हटा देने से होती है—इसे ही ‘पिङ्क’ (की विधि) कहा गया है।
Sutra 43
तस्माद्वज्रमणिमुक्ताप्रवालरूपाणां जातिरूपवर्णप्रमाणपुद्गललक्षणान्युपलभेत ॥ कZ_०२.१४.४३ ॥
अतः वज्र, मणि, मुक्ता, प्रवाल आदि के जाति, रूप, वर्ण, प्रमाण, द्रव्य-स्वभाव, और विशिष्ट लक्षणों को प्रत्यक्ष परीक्षण से जानना चाहिए।
Sutra 44
कृतभाण्डपरीक्षायां पुराणभाण्डप्रतिसंस्कारे वा चत्वारो हरणोपायाः परिकुट्टनमवच्छेदनमुल्लेखनं परिमर्दनं वा ॥ कZ_०२.१४.४४ ॥
तैयार माल की जाँच में या पुराने माल की मरम्मत/पुनर्संस्कार में चोरी के चार उपाय हैं—कुतरना (परिकुट्टन), काटकर निकालना (अवच्छेदन), खुरचना (उल्लेखन) और रगड़कर/पॉलिश करके घटा देना (परिमर्दन)।
Sutra 45
पेटकापदेशेन पृषतं गुणं पिटकां वा यत्परिशातयन्ति तत्परिकुट्टनम् ॥ कZ_०२.१४.४५ ॥
‘पेटिका/डिब्बे’ का बहाना करके यदि वे थोड़ा-सा हिस्सा—चाहे धागा/रेशा, टुकड़ा या इकाई—कुतरकर घटा दें, तो उसे परिकुट्टन (चिपिंग) कहते हैं।
Sutra 46
यद्द्विगुणवास्तुकानां वा रूपे सीसरूपं प्रक्षिप्याभ्यन्तरमवच्छिन्दन्ति तदवच्छेदनम् ॥ कZ_०२.१४.४६ ॥
जब वे (संयुक्त/परतदार) वस्तुओं के बाहरी रूप में सीसे जैसा पदार्थ मिला कर भीतर का माल काटकर निकाल लेते हैं, तो उसे अवच्छेदन (काटकर निकालना) कहते हैं।
Sutra 47
यद्घनानां तीक्ष्णेनोल्लिखन्ति तदुल्लेखनम् ॥ कZ_०२.१४.४७ ॥
जब वे ठोस वस्तुओं को किसी तीक्ष्ण औज़ार से खुरचकर पदार्थ निकालते हैं, उसे उल्लेखन (खुरचना) कहते हैं।
Sutra 48
हरितालमनःशिलाहिङ्गुलुकचूर्णानामन्यतमेन कुरुविन्दचूर्णेन वा वस्त्रं सम्यूह्य यत्परिमृद्नन्ति तत्परिमर्दनम् ॥ कZ_०२.१४.४८ ॥
हरताल, मनःशिला, हिंगुल आदि के चूर्णों में से किसी एक से या कुरुविन्द-चूर्ण से वस्त्र को रँग/लपेटकर, उससे किसी वस्तु को रगड़कर यदि पदार्थ घिसकर कम कर दें, तो उसे परिमर्दन (रगड़कर घटाना) कहते हैं।
Sutra 49
तेन सौवर्णराजतानि भाण्डानि क्षीयन्ते न चैषां किंचिदवरुग्णं भवति ॥ कZ_०२.१४.४९ ॥
उस घिसाव/रगड़ से सोने-चाँदी के बर्तन पदार्थ में घटते जाते हैं, पर उन पर कोई प्रत्यक्ष टूट-फूट या क्षति दिखाई नहीं देती।
Sutra 50
भग्नखण्डघृष्टानां सम्यूह्यानां सदृशेनानुमानं कुर्यात् ॥ कZ_०२.१४.५० ॥
टूटे, चिपके/खंडित, घिसे हुए तथा एकत्र/मिलाए गए पदार्थों का अनुमान समान प्रकार के मानक नमूने से तुलना करके करना चाहिए।
Sutra 51
अवलेप्यानां यावदुत्पाटितं तावदुत्पाट्यानुमानं कुर्यात् ॥ कZ_०२.१४.५१ ॥
लेपित/मढ़े हुए पदार्थों में जितना लेप उखड़ा/हटा है, उतनी ही हानि का अनुमान लेप-उखड़ने के अनुसार करना चाहिए।
Sutra 52
विरूपाणां वा तापनमुदकपेषणं च बहुशः कुर्यात् ॥ कZ_०२.१४.५२ ॥
संदिग्ध/विकृत रूप वाले पदार्थों की जाँच के लिए उन्हें बार-बार गरम करना और पानी में पीसना आदि परीक्षण बारंबार करने चाहिए।
Sutra 53
अवक्षेपः प्रतिमानमग्निर्गण्डिका भण्डिकाधिकरणी पिञ्छः सूत्रं चेल्लं बोल्लनं शिर उत्सङ्गो मक्षिका स्वकायेक्षा दृतिरुदकशरावमग्निष्ठमिति काचं विद्यात् ॥ कZ_०२.१४.५३ ॥
काँच (काच) के दोष के लक्षण/परीक्षण ये जानने चाहिए: अवक्षेप (तलछट/जमाव), प्रतिमान में कमी (मानक माप/वजन पर न उतरना), अग्नि-परीक्षा की प्रतिक्रिया, गण्डिका (गाँठ/गुच्छा), भण्डिका (भंगुरता/टुकड़े-टुकड़े होना), अधिकरणी (आधार/किनारे की टूट-फूट), पिञ्छ (पंख-जैसी धारियाँ), सूत्र (धागे-जैसी रेखाएँ), चेल्ल (कपड़े-जैसी परत), बोल्लन (बुलबुले-जैसी सूजन), शिर (सिर-जैसा उभार), उत्सङ्ग (झुकाव/लटकाव), मक्षिका (मक्खी-जैसे धब्बे), स्वकायेक्षा (स्व-देह निरीक्षण/दृश्य जाँच), दृति (छाले/त्वचा-जैसी परत उतरना), उदकशराव (पानी के कटोरे की परीक्षा), और अग्निष्ठ (आग के बाद बचा अवशेष/स्लैग)—इनसे काँच की पहचान करनी चाहिए।
Sutra 54
राजतानां विस्रं मलग्राहि परुषं प्रस्तीनं विवर्णं वा दुष्टमिति विद्यात् ॥ कZ_०२.१४.५४ ॥
चाँदी को दोषपूर्ण समझे—यदि वह दुर्गंधयुक्त हो, मैल पकड़ती/रोकती हो, खुरदरी लगे, अत्यधिक कठोर/भंगुर हो, या उसका रंग बिगड़ गया हो।
Sutra 55
परीक्षेतात्ययं चैषां यथोद्दिष्टं प्रकल्पयेत् ॥ कZ_०२.१४.५५च्द् ॥
इन वस्तुओं में होने वाली क्षति/घटाव की जाँच करे और नियत नियमों के अनुसार उसका आकलन करे।
Stable trust in precious-metal workmanship and deposits, reduced fraud in weights/alloys, predictable delivery of commissioned work, and stronger monetary-fiscal reliability—thereby protecting household wealth and reinforcing the Kośa that funds security and public administration.
For wrong performance: wage forfeiture plus a fine double the wage; for delay: one-quarter wage reduction plus double fine; for debasement/short-weighting and fraud in weights/measures or finished goods: graded sāhasa-daṇḍas up to the highest for tool-based deception; for unauthorized/hidden manufacture: 12 paṇa fine (double for the doer if absconding), routing non-absconders to kaṇṭakaśodhana; severe cases include 200 fine or coin-clipping (paṇacchedana).