Adhyaya 76
Anushasana ParvaAdhyaya 7655 Verses

Adhyaya 76

गोप्रदानगुणाः तथा कपिलागोविधानम् (Merits of Cow-Gift and the Origin-Account of Kapilā Cows)

Upa-parva: Dāna-dharma (Gopradāna Anuśāsana) — Discourse on Cow-Gift Merits

Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira again questions Bhīṣma for a fuller exposition of go-dāna’s merits, expressing that the discourse is ‘nectar-like’ and never satiating to hear. Bhīṣma delineates normative criteria: gifting a gentle, virtuous, young cow, covered/adorned and suitable for use, to a brāhmaṇa is said to release the donor from sins. Conversely, gifting cows that are non-productive (milk lost), debilitated, diseased, angry, or otherwise burdensome is framed as leading to adverse outcomes and as imposing hardship upon the recipient. The chapter then addresses why kapilā (tawny) cows are especially praised: Bhīṣma narrates a cosmogonic etiological account tied to Prajāpati, Surabhi, Soma, and Rudra, explaining the emergence and sanctified status of rohīṇīs/kapilās and their association with sacrificial prosperity. A concluding phalaśruti presents the recitation/understanding of this origin-account as auspicious and merit-bearing. The chapter closes with Yudhiṣṭhira acting on the instruction by donating well-equipped cows (with golden/copper milking vessels) and large numbers as yajña-related dakṣiṇā, oriented toward merit and fame.

Chapter Arc: इन्द्र (शक्र) के प्रश्न के उत्तर में पितामह भीष्म/ब्रह्माजी गो-दान के विषय को उठाते हैं—‘गोप्रदान’ का ऐसा कौन-सा रहस्य है जो लोकों तक का द्वार खोल देता है? → पितामह इन्द्र को बताते हैं कि अनेक प्रकार के लोक हैं जिन्हें इन्द्र भी नहीं देख पाते; पर शुभ कर्म, उत्तम व्रत, और निर्मल मन वाले ऋषि-ब्राह्मण उन्हें प्रत्यक्ष देखते हैं—कभी समाधि में, कभी देह-त्याग के बाद। फिर वे गो-दान के नियम, पात्रता, और भिन्न वर्णों (ब्राह्मण/क्षत्रिय) के लिए फल-भेद का क्रमशः विस्तार करते हैं, जिससे दान का ‘विधि’ पक्ष निर्णायक बन जाता है। → गो-दान की महिमा का शिखर तब आता है जब पितामह स्पष्ट करते हैं कि विधिपूर्वक ‘दोग्ध्री धेनु’ (दूध देने वाली गाय) का दान करने से द्विज को ‘महत् फल’ और ‘शाश्वत’ फल प्राप्त होता है; और यदि क्षत्रिय भी निर्दिष्ट गुणों/व्रतों से युक्त हो तो उसे भी ब्राह्मण-तुल्य फल मिलता है—गो-दान को वर्ण-सीमा से ऊपर उठाकर ‘गुण-धर्म’ के अधीन कर दिया जाता है। → अध्याय का निष्कर्ष यह है कि गो-दान केवल वस्तु-दान नहीं, बल्कि संयम (एक समय भोजन), श्रद्धा, नम्रता (गौ-नमस्कार), और विधि-पालन से संयुक्त साधना है; ऐसा करने वाला दाता गौ-दान के अनुपात में स्थायी पुण्य और उच्च लोक-प्राप्ति का अधिकारी होता है।

Shlokas

Verse 1

पर बछ। है २ >> त्रिसप्ततितमो<ध्याय: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना पितामह उवाच यो<यं प्रश्नस्त्वया पृष्टो गोप्रदानादिकारित: । नास्ति प्रष्टास्ति लोके5स्मिंस्त्वत्तो5न्यो हि शतक्रतो,ब्रह्माजीने कहा--देवेन्द्र! गोदानके सम्बन्धमें तुमने जो यह प्रश्न उपस्थित किया है, तुम्हारे सिवा इस जगतमें दूसरा कोई ऐसा प्रश्न करनेवाला नहीं है

પિતામહે કહ્યું—હે દેવેન્દ્ર (શતક્રતુ)! ગોપ્રદાન વગેરે દાનકર્મ વિષે તું જે પ્રશ્ન કર્યો છે, આ લોકમાં તારા સિવાય એવો પ્રશ્ન કરનાર બીજો કોઈ નથી।

Verse 2

सन्ति नानाविधा लोका यांस्त्वं शक्र न पश्यसि । पश्यामि यानहं लोकानेकपत्न्यक्ष या: स्त्रिय:,शक्र! ऐसे अनेक प्रकारके लोक हैं, जिन्हें तुम नहीं देख पाते हो। मैं उन लोकोंको देखता हूँ और पतित्रता स्त्रियाँ भी उन्हें देख सकती हैं

ભીષ્મે કહ્યું—હે શક્ર! અનેક પ્રકારના લોક છે, જેને તું જોઈ શકતો નથી. હું તે લોકોને જોઈ શકું છું; અને એકપતિ-વ્રતને અડગપણે પાળનારી સ્ત્રીઓ પણ તેમને જોઈ શકે છે, હે શક્ર।

Verse 3

कर्मभिश्चापि सुशुभै: सुव्रता ऋषयस्तथा । सशरीरा हि तान्‌ यान्ति ब्राह्मणा: शुभबुद्धय:,उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि तथा शुभ बुद्धिवाले ब्राह्मण अपने शुभकर्मोंके प्रभावसे वहाँ सशरीर चले जाते हैं

પોતાના અતિ શુભ કર્મોના પ્રભાવથી અને ઉત્તમ વ્રતોના સુપાલનના બળથી, સુવ્રત ઋષિઓ તથા શુભ બુદ્ધિવાળા બ્રાહ્મણો તે લોકોને દેહસહિત જ પ્રાપ્ત કરે છે।

Verse 4

शरीरन्यासमोक्षेण मनसा निर्मलेन च । स्वप्नभूतांश्व ताललोकान्‌ पश्यन्तीहापि सुव्रता:,श्रेष्ठ च्रतके आचरणमें लगे हुए योगी पुरुष समाधि-अवस्थामें अथवा मृत्युके समय जब शरीरसे सम्बन्ध त्याग देते हैं, तब अपने शुद्ध चित्तके द्वारा स्वप्रकी भाँति दीखनेवाले उन लोकोंका यहाँसे भी दर्शन करते हैं

શરીરનો ત્યાગ કરીને મળતા મોક્ષથી અને નિર્મળ મન દ્વારા, સુવ્રતધારી સાધકો સ્વપ્નસમાન દેખાતા તે લોકોને અહીં રહેતાં પણ જોઈ લે છે।

Verse 5

ते तु लोका: सहस्राक्ष शृणु यादृग्गुणान्विता: । न तत्र क्रमते कालो न जरा न च पावकः,सहस्राक्ष! वे लोक जैसे गुणोंसे सम्पन्न हैं, उनका वर्णन सुनो। वहाँ काल और बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता। अग्निका भी जोर नहीं चलता

હે સહસ્રાક્ષ! સાંભળો, તે લોક કયા ગુણોથી યુક્ત છે. ત્યાં કાળનો પ્રહાર ચાલતો નથી; ન જરા છે, ન ક્ષય, અને અગ્નિનો પણ પ્રભાવ નથી।

Verse 6

तथा नास्त्यशुभ॑ किंचिन्न व्याधिस्तत्र न कलम: । यद्‌ यच्च गावो मनसा तस्मिन्‌ वाउछन्ति वासव,वहाँ किसीका किंचिन्मात्र भी अमंगल नहीं होता। उस लोकमें न रोग है न शोक। इन्द्र! वहाँकी गौएँ अपने मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करती हैं, वे सब उन्हें प्राप्त हो जाती हैं, यह मेरी प्रत्यक्ष देखी हुई बात है। वे जहाँ जाना चाहती हैं जाती हैं; जैसे चलना चाहती हैं चलती हैं और संकल्पमात्रसे सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्तकर उनका उपभोग करती हैं

તેમ જ ત્યાં કિંચિત પણ અશુભ નથી; તે લોકમાં ન વ્યાધિ છે, ન કલ્મષ. હે વાસવ! ત્યાંની ગાયો મનમાં જે-જે વસ્તુ ઇચ્છે છે, તે જ તેમને પ્રાપ્ત થાય છે।

Verse 7

तत्‌ सर्व प्राप्तुवन्ति सम मम प्रत्यक्षदर्शनात्‌ । कामगा: कामचारिण्य: कामात्‌ कामांश्व भुज्जते,वहाँ किसीका किंचिन्मात्र भी अमंगल नहीं होता। उस लोकमें न रोग है न शोक। इन्द्र! वहाँकी गौएँ अपने मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करती हैं, वे सब उन्हें प्राप्त हो जाती हैं, यह मेरी प्रत्यक्ष देखी हुई बात है। वे जहाँ जाना चाहती हैं जाती हैं; जैसे चलना चाहती हैं चलती हैं और संकल्पमात्रसे सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्तकर उनका उपभोग करती हैं

તે બધું સમાન રીતે પ્રાપ્ત કરે છે—આ હું મારા પ્રત્યક્ષ દર્શનથી કહું છું. તે કામગામી અને સ્વેચ્છાચારિણી છે; ઇચ્છાથી જ ઇચ્છિત ભોગોને મેળવી તેમનો ઉપભોગ કરે છે।

Verse 8

वाप्य: सरांसि सरितो विविधानि वनानि च | गृहाणि पर्वताश्नैव यावद्द्वव्यं च किंचन,बावड़ी, तालाब, नदियाँ, नाना प्रकारके वन, गृह और पर्वत आदि सभी वस्तुएँ वहाँ उपलब्ध हैं

ભીષ્મે કહ્યું—ત્યાં વાવડીઓ, સરોવરો, નદીઓ અને નાનાં પ્રકારનાં વનો છે; ઘરો અને પર્વતો પણ છે—અર્થાત્ જે કંઈ દ્રવ્ય-સંપત્તિ ક્યાંય હોય તે બધું ત્યાં પ્રચુર પ્રમાણમાં મળે છે।

Verse 9

मनोज्ञं सर्वभूतेभ्य: सर्वतन्त्रं प्रदृश्यत । ईदृशाद्‌ विपुलाल्लोकान्नास्ति लोकस्तथाविध:,गोलोक समस्त प्राणियोंके लिये मनोहर है। वहाँकी प्रत्येक वस्तुपर सबका समान अधिकार देखा जाता है। इतना विशाल दूसरा कोई लोक नहीं है

ભીષ્મે કહ્યું—ગોલોક સર્વ પ્રાણીઓને મનોહર લાગે છે. ત્યાં દરેક વસ્તુ પર સૌનો સમાન અધિકાર ધરાવતી સર્વજનિક વ્યવસ્થા દેખાય છે. એટલો વિશાળ અને ઉત્તમ એવો બીજો કોઈ લોક નથી।

Verse 10

तत्र सर्वसहा: क्षान्ता वत्सला गुरुवर्तिन: । अहंकारैरविरहिता यान्ति शक्र नरोत्तमा:,इन्द्र! जो सब कुछ सहनेवाले, क्षमाशील, दयालु, गुरुजनोंकी आज्ञामें रहनेवाले और अहंकाररहित हैं, वे श्रेष्ठ मनुष्य ही उस लोकमें जाते हैं

ભીષ્મે કહ્યું—હે શક્ર (ઇન્દ્ર)! જે સર્વ કષ્ટ સહન કરનારા, ક્ષમાશીલ, કરુણાસભર, ગુરુજનોની આજ્ઞામાં રહેનારા અને અહંકારરહિત છે—એવા શ્રેષ્ઠ મનુષ્યો જ તે લોકને પ્રાપ્ત કરે છે।

Verse 11

यः सर्वमांसानि न भक्षयीत पुमान्‌ सदा भावितो धर्मयुक्त: । मातापित्रोररचिता सत्ययुक्तः शुश्रूषिता ब्राह्मणानामनिन्द्य:,जो सब प्रकारके मांसोंका भोजन त्याग देता है, सदा भगवच्चिन्तनमें लगा रहता है, धर्मपरायण होता है, माता-पिताकी पूजा करता, सत्य बोलता, ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता, जिसकी कभी निन्दा नहीं होती, जो गौओं और ब्राह्मणोंपर कभी क्रोध नहीं करता, धर्ममें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवा करता है, जीवनभरके लिये सत्यका व्रत ले लेता है, दानमें प्रवृत्त रहकर किसीके अपराध करनेपर भी उसे क्षमा कर देता है, जिसका स्वभाव मृदुल है, जो जितेन्द्रिय, देवाराधक, सबका आतिथ्य-सत्कार करनेवाला और दयालु है, ऐसे ही गुणोंवाला मनुष्य उस सनातन एवं अविनाशी गोलोकमें जाता है

ભીષ્મ (પિતામહ)એ કહ્યું—જે પુરુષ સર્વ પ્રકારના માંસનું ભક્ષણ ત્યજી દે છે, સદા પવિત્ર ચિંતનમાં લીન રહી ધર્મનિષ્ઠ રહે છે; જે માતા-પિતાની પૂજા કરે છે, સત્યમાં સ્થિર રહે છે અને બ્રાહ્મણોની સેવા કરે છે—એવો અનિંદ્ય પુરુષ આ ગુણોથી યુક્ત થઈ સનાતન, અવિનાશી ગોલોકને પ્રાપ્ત કરે છે।

Verse 12

अक्रोधनो गोषु तथा द्विजेषु धर्मे रतो गुरुशुश्रूषकश्न । यावज्जीवं सत्यवृत्ते रतश्न दाने रतो य: क्षमी चापराधे,जो सब प्रकारके मांसोंका भोजन त्याग देता है, सदा भगवच्चिन्तनमें लगा रहता है, धर्मपरायण होता है, माता-पिताकी पूजा करता, सत्य बोलता, ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता, जिसकी कभी निन्दा नहीं होती, जो गौओं और ब्राह्मणोंपर कभी क्रोध नहीं करता, धर्ममें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवा करता है, जीवनभरके लिये सत्यका व्रत ले लेता है, दानमें प्रवृत्त रहकर किसीके अपराध करनेपर भी उसे क्षमा कर देता है, जिसका स्वभाव मृदुल है, जो जितेन्द्रिय, देवाराधक, सबका आतिथ्य-सत्कार करनेवाला और दयालु है, ऐसे ही गुणोंवाला मनुष्य उस सनातन एवं अविनाशी गोलोकमें जाता है

ભીષ્મે કહ્યું—જે ગાયો તથા દ્વિજોના (બ્રાહ્મણોના) પ્રત્યે ક્રોધરહિત છે, ધર્મમાં રત રહી ગુરુજનોની સેવા કરે છે; જે જીવનભર સત્યવૃત્તિમાં આનંદ પામે છે, દાનમાં પ્રવૃત્ત રહે છે અને અપરાધ થવા છતાં ક્ષમા કરે છે—એવો પુરુષ આ ગુણોથી યુક્ત થઈ સનાતન, અવિનાશી ગોલોકને પ્રાપ્ત કરે છે।

Verse 13

मृदुर्दान्तो देवपरायण श्नव सर्वातिथिश्वापि तथा दयावान्‌ | ईदृग्गुणो मानवस्तं प्रयाति लोकं गवां शाश्वृतं चाव्ययं च,जो सब प्रकारके मांसोंका भोजन त्याग देता है, सदा भगवच्चिन्तनमें लगा रहता है, धर्मपरायण होता है, माता-पिताकी पूजा करता, सत्य बोलता, ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता, जिसकी कभी निन्दा नहीं होती, जो गौओं और ब्राह्मणोंपर कभी क्रोध नहीं करता, धर्ममें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवा करता है, जीवनभरके लिये सत्यका व्रत ले लेता है, दानमें प्रवृत्त रहकर किसीके अपराध करनेपर भी उसे क्षमा कर देता है, जिसका स्वभाव मृदुल है, जो जितेन्द्रिय, देवाराधक, सबका आतिथ्य-सत्कार करनेवाला और दयालु है, ऐसे ही गुणोंवाला मनुष्य उस सनातन एवं अविनाशी गोलोकमें जाता है

ભીષ્મે કહ્યું—હે દેવપરાયણ, સાંભળ. જે સ્વભાવથી મૃદુ, ઇન્દ્રિયસંયમી, દેવપૂજામાં પરાયણ, સર્વ અતિથિઓનું સત્કાર કરનાર અને દયાળુ છે—એવા ગુણોથી યુક્ત મનુષ્ય ગાયોનું શાશ્વત અને અવિનાશી લોક, એટલે ગોલોક, પ્રાપ્ત કરે છે.

Verse 14

न पारदारी पश्यति लोकमेतं न वै गुरुध्नो न मृषा सम्प्रलापी । सदा प्रवादी ब्राह्मणेष्वात्तवैरो दोषैरेतैर्यश्व युक्तो दुरात्मा,परस्त्रीगामी, गुरुहत्यारा, असत्यवादी, सदा बकवाद करनेवाला, ब्राह्मणोंसे वैर बाँध रखनेवाला, मित्रद्रोही, ठग, कृतघ्न, शठ, कुटिल, धर्मद्रेषी और ब्रह्महत्यारा--इन सब दोषोंसे युक्त दुरात्मा मनुष्य कभी मनसे भी गोलोकका दर्शन नहीं पा सकता; क्योंकि वहाँ पुण्यात्माओंका निवास है

પિતામહે કહ્યું—પરસ્ત્રીગામી તે લોકને નથી જોતો; ન ગુરુહંતક, ન અસત્ય અને કપટ બોલનાર. જે સદા નિંદામાં રત રહે, બ્રાહ્મણો પ્રત્યે વૈર ધારણ કરે અને આવા દોષોથી યુક્ત દુરાત્મા હોય—તે પુણ્યાત્માઓના નિવાસ એવા ધામને પ્રાપ્ત કરતો નથી.

Verse 15

न मित्रधुडनैकृतिक: कृतघ्नः शठो<नृजुर्धर्मविद्वेषकश्न । न ब्रह्महा मनसापि प्रपश्येद्‌ गवां लोकं पुण्यकृतां निवासम्‌,परस्त्रीगामी, गुरुहत्यारा, असत्यवादी, सदा बकवाद करनेवाला, ब्राह्मणोंसे वैर बाँध रखनेवाला, मित्रद्रोही, ठग, कृतघ्न, शठ, कुटिल, धर्मद्रेषी और ब्रह्महत्यारा--इन सब दोषोंसे युक्त दुरात्मा मनुष्य कभी मनसे भी गोलोकका दर्शन नहीं पा सकता; क्योंकि वहाँ पुण्यात्माओंका निवास है

ભીષ્મે કહ્યું—મિત્રદ્રોહી, નીતિહીન, કૃતઘ્ન, શઠ, કૂટિલ અને ધર્મદ્વેષી—અને બ્રાહ્મણહંતક પણ—એવો માણસ પુણ્યકૃત્યોના નિવાસ એવા ગાયોનું લોક (ગોલોક) મનથી પણ જોઈ શકતો નથી.

Verse 16

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं निपुणेन सुरेश्वर । गोप्रदानरतानां तु फलं शृणु शतक्रतो,सुरेश्वर! शतक्रतो! यह सब मैंने तुम्हें विशेषरूपसे गोलोकका माहात्म्य बताया है। अब गोदान करनेवालोंको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो

હે સુરેશ્વર! હે શતક્રતુ! આ બધું મેં તને નિપુણતાથી કહી દીધું. હવે ગોદાનમાં રત રહેનારાઓને જે ફળ મળે છે, તે સાંભળ.

Verse 17

दायाद्यलब्धैरर्थ्यों गा: क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । धर्मार्जितान्‌ धनै: क्रीतान्‌ स लोकानाप्लुते5क्षयान्‌,जो पुरुष अपनी पैतृक सम्पत्तिसे प्राप्त हुए धनके द्वारा गौएँ खरीदकर उनका दान करता है, वह उस धनसे धर्मपूर्वक उपार्जित हुए अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है

જે પુરુષ પિતૃસંપત્તિથી પ્રાપ્ત થયેલા ધનથી ગાયો ખરીદી દાન કરે છે, તે ધર્મપૂર્વક ઉપાર્જિત તે ધનના પ્રભાવથી અક્ષય લોકોને પ્રાપ્ત કરે છે.

Verse 18

यो वै द्यूते धनं जित्वा गा: क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । स दिव्यमयुतं शक्र वर्षाणां फलमश्लुते,शक्र! जो जूएमें धन जीतकर उसके द्वारा गायोंको खरीदता है और उनका दान करता है, वह दस हजार दिव्य वर्षोतक उसके पुण्यफलका उपभोग करता है

હે શક્ર (ઇન્દ્ર)! જે જુગારમાં ધન જીતીને તેનાથી ગાયો ખરીદી દાન કરે છે, તે દસ હજાર દિવ્ય વર્ષો સુધી તે પુણ્યફળ ભોગવે છે.

Verse 19

दायाद्याद्‌ या: सम वै गावो न्यायपूर्वैरुपार्जिता: । प्रदद्यात्‌ ता: प्रदातृणां सम्भवन्त्यपि च श्रुवा:,जो पैतृक-सम्पत्तिसे न्यायपूर्वक प्राप्त की हुई गौओंका दान करता है, ऐसे दाताओंके लिये वे गौएँ अक्षय फल देनेवाली हो जाती हैं

પિતૃસંપત્તિમાં ન્યાયપૂર્વક મળેલા ભાગ વગેરે દ્વારા યોગ્ય રીતે પ્રાપ્ત થયેલી ગાયોનું દાન કરનાર માટે, શ્રુતિ-પરંપરા મુજબ, એ જ ગાયો અક્ષય પુણ્યફળ આપનારી બને છે.

Verse 20

प्रतिगृहा तु यो दद्याद्‌ गा: संशुद्धेन चेतसा । तस्यापीहाक्षयाल्लोंकान्‌ ध्रुवान्‌ विद्धि शचीपते,शचीपते! जो पुरुष दानमें गौएँ लेकर फिर शुद्ध हृदयसे उनका दान कर देता है, उसे भी यहाँ अक्षय एवं अटल लोकोंकी प्राप्ति होती है--यह निश्चितरूपसे समझ लो

હે શચીપતે! જે પુરુષ દાનમાં ગાયો મેળવીને પછી શુદ્ધ ચિત્તથી એ જ ગાયોનું ફરી દાન કરે છે, તેને પણ પરલોકમાં અક્ષય અને અચલ લોક પ્રાપ્ત થાય છે—આ નિશ્ચય જાણો.

Verse 21

जन्मप्रभृति सत्यं च यो ब्रूयान्नियतेन्द्रिय: । गुरुद्धविजसह: क्षान्तस्तस्य गोभि: समा गति:,जो जन्मसे ही सदा सत्य बोलता, इन्द्रियोंको काबूमें रखता, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंकी कठोर बातोंको भी सह लेता और क्षमाशील होता है, उसकी गौओंके समान गति होती है। अर्थात्‌ वह गोलोकमें जाता है

જે જન્મથી સત્ય બોલે છે, ઇન્દ્રિયોનું સંયમ રાખે છે, ગુરુજનો તથા બ્રાહ્મણોની કઠોર વાણી પણ સહે છે અને ક્ષમાશીલ રહે છે—તેની ગતિ ગાયોની સમાન થાય છે; એટલે કે તે ગોલોકને પામે છે.

Verse 22

न जातु ब्राह्मणो वाच्यो यदवाच्यं शचीपते । मनसा गोधु न द्रुह्ेद्‌ गोवृत्तिगोंडनुकल्पक:,शचीपते शक्र! ब्राह्मणके प्रति कभी कुवाच्य नहीं बोलना चाहिये और गौओंके प्रति कभी मनसे भी द्रोहका भाव नहीं रखना चाहिये। जो ब्राह्मण गौओंके समान वृत्तिसे रहता है और गौओंके लिये घास आदिकी व्यवस्था करता है, साथ ही सत्य और धर्ममें तत्पर रहता है, उसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनो। वह यदि एक गौका भी दान करे तो उसे एक हजार गोदानके समान फल मिलता है

હે શચીપતે, શક્ર! બ્રાહ્મણને કદી પણ અવાચ્ય વાણી બોલવી નહીં; અને ગાયો પ્રત્યે મનમાં પણ દ્રોહભાવ રાખવો નહીં. જે બ્રાહ્મણ ગાય જેવી સરળ, અહિંસક જીવનવૃત્તિથી રહે છે, ગાયો માટે ઘાસ-ચારાં વગેરેની વ્યવસ્થા કરે છે અને સત્ય તથા ધર્મમાં તત્પર રહે છે—તેને મળતા ફળનું વર્ણન સાંભળો: તે એક ગાયનું પણ દાન કરે તો તેને હજાર ગોદાન જેટલું પુણ્ય મળે છે.

Verse 23

सत्ये धर्मे च निरतस्तस्य शक्र फलं शृणु । गोसहस्रेण समिता तस्य थेनुर्भवत्युत,शचीपते शक्र! ब्राह्मणके प्रति कभी कुवाच्य नहीं बोलना चाहिये और गौओंके प्रति कभी मनसे भी द्रोहका भाव नहीं रखना चाहिये। जो ब्राह्मण गौओंके समान वृत्तिसे रहता है और गौओंके लिये घास आदिकी व्यवस्था करता है, साथ ही सत्य और धर्ममें तत्पर रहता है, उसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनो। वह यदि एक गौका भी दान करे तो उसे एक हजार गोदानके समान फल मिलता है

પિતામહ બોલ્યા—હે શક્ર! જે સત્ય અને ધર્મમાં નિરત રહે છે, તેને મળતું ફળ સાંભળ. એવા પુરુષે દાનમાં આપેલી એક પણ ગાય પુણ્યમાં હજાર ગાયોના દાન સમાન બની જાય છે. હે શચીપતે શક્ર! બ્રાહ્મણ પ્રત્યે કદી કઠોર વચન ન બોલવું જોઈએ અને ગાયો પ્રત્યે મનમાં પણ દ્રોહભાવ ન રાખવો જોઈએ. જે ગાય જેવી કોમળ, અહિંસક અને પરોપકારી વૃત્તિથી જીવે છે, ગાયો માટે ઘાસ-ચારો વગેરેની વ્યવસ્થા કરે છે અને સત્ય-ધર્મમાં અડગ રહે છે—તેનું એક ગોદાન પણ ગોસહસ્રદાન સમાન ફળ આપે છે.

Verse 24

क्षत्रियस्य गुणैरेतैरपि तुल्यफलं शृणु । तस्यापि द्विजतुल्या गौर्भवतीति विनिश्चय:,यदि क्षत्रिय भी इन गुणोंसे युक्त होता है तो उसे भी ब्राह्मणके समान ही (गोदानका) फल मिलता है। इस बातको अच्छी तरह सुन लो। उसकी (दान दी हुई) गौ भी ब्राह्मणकी गौके तुल्य ही फल देनेवाली होती है। यह धर्मात्माओंका निश्चय है

ભીષ્મ બોલ્યા—આ જ ગુણોથી યુક્ત ક્ષત્રિયને પણ સમાન ફળ મળે છે, તે સાંભળો. ધર્માત્માઓનો દૃઢ નિશ્ચય છે કે તેના દ્વારા દાનમાં અપાયેલી ગાય પણ બ્રાહ્મણની ગાય જેટલું જ પુણ્યફળ આપે છે.

Verse 25

वैश्यस्यैते यदि गुणास्तस्य पठचशतं भवेत्‌ । शूद्रस्यापि विनीतस्य चतुर्भागफलं स्मृतम्‌,यदि वैश्यमें भी उपर्युक्त गुण हों तो उसे भी एक गोदान करनेपर ब्राह्मणकी अपेक्षा (आधे भाग) पाँच सौ गौओंके दानका फल मिलता है और विनयशील शूद्रको ब्राह्मणके चौथाई भाग अर्थात्‌ ढाई सौ गौओंके दानका फल प्राप्त होता है

ભીષ્મ બોલ્યા—જો વૈશ્યમાં પણ આ ગુણો હોય તો તેના માટે ફળ પાંચસો (ગોદાન) જેટલું ગણાય છે—ભલે દાન એક જ ગાયનું હોય. અને વિનયી, સંયમી શૂદ્ર માટે સ્મૃતિમાં ચોથા ભાગનું ફળ કહેવાયું છે—અર્થાત્ બે સો પચાસ ગોદાન સમાન.

Verse 26

एतच्चैनं यो<नुतिछेत युक्तः सत्ये रतो गुरुशुश्रूषया च । दक्ष: क्षान्तो देवतार्थी प्रशान्तः शुचिर्बुद्धो धर्मशीलोडनहंवाक्‌ू

ભીષ્મ બોલ્યા—જે સંયમયુક્ત થઈ આ આચરણનું અનુષ્ઠાન કરે છે, સત્યમાં રમે છે અને ગુરુશુશ્રૂષામાં લાગેલો રહે છે; જે દક્ષ, ક્ષમાશીલ, દેવપૂજાપરાયણ, અંતઃકરણથી શાંત, શુચિ, બુદ્ધિમાન, ધર્મશીલ અને અહંકારભરી વાણીથી રહિત છે—એ જ અહીં ઉપદેશિત આચરણને સાચે ધારણ કરે છે.

Verse 27

नित्यं दद्यादेकभक्त: सदा च सत्ये स्थितो गुरुशुश्रूषिता च,इन्द्र! जो सदा एक समय भोजन करके नित्य गोदान करता है, सत्यमें स्थित होता है, गुरुकी सेवा और वेदोंका स्वाध्याय करता है, जिसके मनमें गौओंके प्रति भक्ति है, जो गौओंका दान देकर प्रसन्न होता है तथा जन्मसे ही गौओंको प्रणाम करता है, उसको मिलनेवाले इस फलका वर्णन सुनो

ભીષ્મ બોલ્યા—હે ઇન્દ્ર! જે સદા એક વખત જ ભોજન કરે છે, નિત્ય ગોદાન કરે છે, સત્યમાં સ્થિર રહે છે અને ગુરુશુશ્રૂષામાં લાગેલો રહે છે—તેને મળતા ફળનું વર્ણન સાંભળો. જે વેદોનો સ્વાધ્યાય કરે છે, જેના હૃદયમાં ગાયો પ્રત્યે ભક્તિ છે, જે ગોદાન કરીને પ્રસન્ન થાય છે અને જન્મથી જ ગાયોને પ્રણામ કરતો આવ્યો છે—તે માટે આ મહાન ફળ નિશ્ચિત છે.

Verse 28

वेदाध्यायी गोषु यो भक्तिमांश्व नित्यं दत्त्वा योडभिनन्देत गाश्न । आजातितो यश्षु गवां नमेत इदं फलं शक्र निबोध तस्य,इन्द्र! जो सदा एक समय भोजन करके नित्य गोदान करता है, सत्यमें स्थित होता है, गुरुकी सेवा और वेदोंका स्वाध्याय करता है, जिसके मनमें गौओंके प्रति भक्ति है, जो गौओंका दान देकर प्रसन्न होता है तथा जन्मसे ही गौओंको प्रणाम करता है, उसको मिलनेवाले इस फलका वर्णन सुनो

ભીષ્મે કહ્યું—હે શક્ર, હે ઇન્દ્ર! જે વેદોનું અધ્યયન કરે છે, ગાયો પ્રત્યે ભક્તિ ધરાવે છે, નિયમિત ગાયો દાન કરીને તે દાનમાં આનંદ પામે છે, અને જન્મથી જ ગાયોને નમસ્કાર કરે છે—તેને મળતા ફળને સમજો. નિયમબદ્ધ દાન, શ્રદ્ધા અને વેદાધ્યયનયુક્ત જીવનનું જે પ્રતિફળ છે, તે સાંભળો।

Verse 29

यत्‌ स्यादिष्ट्वा राजसूये फल तु यत्‌ स्यादिष्ट्वा बहुना काउचनेन । एतत्‌ तुल्यं फलमप्याहुरग्रयं सर्वे सन्तस्त्वृषयो ये च सिद्धा:,राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है तथा बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा देकर यज्ञ करनेसे जो फल मिलता है, उपर्युक्त मनुष्य भी उसके समान ही उत्तम फलका भागी होता है। यह सभी सिद्ध-संत-महात्मा एवं ऋषियोंका कथन है

પિતામહે કહ્યું—રાજસૂય યજ્ઞ કરવાથી જે ફળ મળે છે, અને બહુ પ્રમાણમાં સુવર્ણ દક્ષિણાસહ યજ્ઞ કરવાથી જે ફળ પ્રાપ્ત થાય છે—તેના સમાન, ખરેખર શ્રેષ્ઠ ફળનો ભાગી આ પુરુષ પણ બને છે. એવું સત્ય જાણનારા સર્વ સંતો, ઋષિઓ અને સિદ્ધો કહે છે।

Verse 30

योअग्रं भक्त किंचिदप्राश्य दद्याद्‌ गोभ्यो नित्यं गोव्रती सत्यवादी । शान्तो5लुब्धो गोसहस्रस्य पुण्यं संवत्सरेणाप्लुयात्‌ सत्यशील:,जो गोसेवाका व्रत लेकर प्रतिदिन भोजनसे पहले गौओंको गोग्रास अर्पण करता है तथा शान्त एवं निर्लोभ होकर सदा सत्यका पालन करता रहता है, वह सत्य-शील पुरुष प्रतिवर्ष एक सहस्र गोदान करनेके पुण्यका भागी होता है

ભીષ્મે કહ્યું—જે ગોવ્રતી, સત્યવાદી, શાંત અને નિર્લોભ પુરુષ પોતાના ભોજન પહેલાં દરરોજ થોડો અંશ ગાયોને અર્પણ કરે છે—એ સત્યશીલ મનુષ્ય એક વર્ષમાં સહસ્ર ગોદાનનું પુણ્ય પ્રાપ્ત કરે છે।

Verse 31

यदेकभक्तमश्रीयाद्‌ दद्यादेकं गवां च यत्‌ । दशवर्षाण्यनन्तानि गोव्रती गो&$नुकम्पक:,जो गोसेवाका व्रत लेनेवाला पुरुष गौओंपर दया करता और प्रतिदिन एक समय भोजन करके एक समयका अपना भोजन गौओंको दे देता है, इस प्रकार दस वर्षोतक गोसेवामें तत्पर रहनेवाले पुरुषको अनन्त सुख प्राप्त होते हैं

ભીષ્મે કહ્યું—જો કોઈ પુરુષ એક સમય ભોજન કરવાનો નિયમ સ્વીકારે અને એ એક જ ભોજનમાંથી એક ભાગ ગાયોને આપે; ગોવ્રતી બની ગાયો પ્રત્યે કરુણાશીલ રહી દસ વર્ષ સુધી આવી સેવા કરે—તો તેને અનંત સુખ પ્રાપ્ત થાય છે।

Verse 32

एकेनैव च भक्तेन य: क्रीत्वा गां प्रयच्छति । यावन्ति तस्या रोमाणि सम्भवन्ति शतक्रतो

ભીષ્મે કહ્યું—હે શતક્રતુ! જે પુરુષ એક જ સાચી ભક્તિ સાથે ગાય ખરીદી ને દાન કરે છે, તે ગાયના શરીર પર જેટલા રોમ હોય, એટલા જ શુભ ફળો તેને પ્રાપ્ત થાય છે।

Verse 33

ब्राह्मणस्य फल हीदं क्षत्रियस्य तु वै शूणु,यह ब्राह्मणके लिये फल बताया गया। अब क्षत्रियको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो। यदि क्षत्रिय इसी प्रकार पाँच वर्षोतक गौकी आराधना करे तो उसे वही फल प्राप्त होता है। उससे आधे समयमें वैश्यको और उससे भी आधे समयमें शूद्रकों उसी फलकी प्राप्ति बतायी गयी है

ભીષ્મે કહ્યું—આ ફળ બ્રાહ્મણ માટે નિર્ધારિત છે; હવે ક્ષત્રિયનું ફળ સાંભળો. જો ક્ષત્રિય એ જ રીતે પાંચ વર્ષ ગાયની આરાધના અને સેવા કરે, તો તેને એ જ ફળ પ્રાપ્ત થાય છે. વૈશ્યને અડધા સમયમાં અને શૂદ્રને વૈશ્યના પણ અડધા સમયમાં એ જ ફળ મળે છે—એવું કહેવામાં આવ્યું છે.

Verse 34

पज्चवार्षिकमेवं तु क्षत्रियस्य फल स्मृतम्‌ । ततोडर्धेन तु वैश्यस्य शूद्रो वैश्यार्धत: स्मृत:,यह ब्राह्मणके लिये फल बताया गया। अब क्षत्रियको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो। यदि क्षत्रिय इसी प्रकार पाँच वर्षोतक गौकी आराधना करे तो उसे वही फल प्राप्त होता है। उससे आधे समयमें वैश्यको और उससे भी आधे समयमें शूद्रकों उसी फलकी प्राप्ति बतायी गयी है

ભીષ્મે કહ્યું—આ રીતે આ વ્રતનું ફળ ક્ષત્રિય માટે પાંચ વર્ષનું સ્મૃત છે. તેના અડધા સમયમાં વૈશ્ય, અને વૈશ્યના અડધા સમયમાં શૂદ્ર—એ જ ફળ પ્રાપ્ત કરે છે, એમ કહેવાયું છે.

Verse 35

यश्चात्मविक्रयं कृत्वा गा: क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । यावत्‌ संदर्शयेद्‌ गां वै स तावत्‌ फलमश्लुते,जो अपने आपको बेचकर भी गायको खरीदकर उसका दान करता है, वह ब्रह्माण्डमें जबतक गोजातिकी सत्ता देखता है, तबतक उस दानका अक्षय फल भोगता रहता है

ભીષ્મે કહ્યું—જે માણસ પોતાને વેચીને પણ ગાયો ખરીદી દાન કરે છે, તે બ્રહ્માંડમાં ગોજાતિનું અસ્તિત્વ જેટલો સમય જુએ છે, તેટલો સમય તે દાનનું અક્ષય ફળ ભોગવે છે.

Verse 36

रोग्णि रोग्णि महाभाग लोकाश्षास्या5क्षया:स्मृता: । संग्रामेष्वर्जयित्वा तु यो वै गा: सम्प्रयच्छति । आत्मविक्रयतुल्यास्ता: शाश्वता विद्धि कौशिक,महाभाग इन्द्र! गौओंके रोम-रोममें अक्षय लोकोंकी स्थिति मानी गयी है। जो संग्राममें गौओंको जीतकर उनका दान कर देता है, उनके लिये वे गौएँ स्वयं अपनेको बेचकर लेकर दी हुई गौओंके समान अक्षय फल देनेवाली होती हैं--इस बातको तुम जान लो

ભીષ્મે કહ્યું—હે મહાભાગ! ગાયના રોમ-રોમમાં શાશ્વત અને અક્ષય લોકો વસે છે—એવું સ્મૃતિમાં માન્યું છે. જે યુદ્ધમાં ગાયો જીતીને પછી તેમનું દાન કરે છે, તે ગાયો તેના માટે આત્મવિક્રય કરીને મેળવેલી ગાયો સમાન બની શાશ્વત, અક્ષય ફળ આપે છે—હે કૌશિક, આ જાણો.

Verse 37

अभावे यो गवां दद्यात्‌ तिलधेनुं यतव्रत: । दुर्गात्‌ स तारितो थेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोदते,जो संयम और नियमका पालन करनेवाला पुरुष गौओंके अभावमें तिलधेनुका दान करता है, वह उस धेनुकी सहायता पाकर दुर्गम संकटसे पार हो जाता है तथा दूधकी धारा बहानेवाली नदीके तटपर रहकर आनन्द भोगता है

ભીષ્મે કહ્યું—જે સંયમી અને વ્રતનિષ્ઠ પુરુષ, ગાયો ન હોય ત્યારે તિલધેનુનું દાન કરે છે, તે તે ધેનુના પુણ્યપ્રભાવથી દુર્ગમ સંકટમાંથી પાર ઉતરે છે અને દૂધની ધારા વહેતી નદીના કાંઠે આનંદ કરે છે.

Verse 38

न त्वेवासां दानमात्र प्रशस्तं पात्र कालो गोविशेषो विधिकश्ष । कालज्ञानं विप्र गवान्तरं हि दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम्‌,केवल गौओंका दानमात्र कर देना प्रशंसाकी बात नहीं है; उसके लिये उत्तम पात्र, उत्तम समय, विशिष्ट गौ, विधि और कालका ज्ञान आवश्यक है। विप्रवर! गौओंमें जो परस्पर तारतम्य है, उसको तथा अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको जानना बहुत ही कठिन है

પિતામહ બોલ્યા—માત્ર ગાયનું દાન કરવું જ પ્રશંસનીય નથી. એવા દાનમાં યોગ્ય પાત્ર, યોગ્ય સમય, વિશેષ ઉત્તમ ગાય, વિધિ અને કાળનું સાચું વિવેક આવશ્યક છે. હે બ્રાહ્મણ! ગાયો વચ્ચેનું પરસ્પર તારતમ્ય અને અગ્નિ તથા સૂર્ય સમાન તેજસ્વી પાત્રને ઓળખવું ખરેખર અતિ કઠિન છે.

Verse 39

स्वाध्यायाब्यं शुद्धयोनिं प्रशान्तं वैतानस्थं पापभीरुं बहुज्ञम्‌ | गोषु क्षान्तं नातितीक्ष्णं शरण्यं वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहु:,जो वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, शुद्ध कुलमें उत्पन्न, शान्तस्वभाव, यज्ञपरायण, पापभीरु और बहुज्ञ है, जो गौओंके प्रति क्षमाभाव रखता है, जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा नहीं है, जो गौओंकी रक्षा करनेमें समर्थ और जीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम पात्र बताया गया है

ભીષ્મ બોલ્યા—જે બ્રાહ્મણ વેદોના સ્વાધ્યાયથી સમૃદ્ધ, શુદ્ધ વંશમાં જન્મેલો, શાંત સ્વભાવનો, વૈદિક યજ્ઞપરંપરામાં સ્થિત, પાપભીરુ અને બહુજ્ઞ હોય; ગાયો પ્રત્યે ક્ષમાશીલ અને સૌમ્ય હોય, સ્વભાવથી અતિ કઠોર ન હોય, તેમને આશ્રય અને રક્ષા આપી શકે, અને જીવિકાના બંધનથી ક્લાંત/વિરક્ત હોય—એવો બ્રાહ્મણ ગોદાન માટે યોગ્ય પાત્ર કહેવાય છે.

Verse 40

वृत्तिग्लाने सीदति चातिमात्रं कृष्यर्थ वा होम्यहेतो: प्रसूते: । गुर्वर्थ वा बालसंवृद्धये वा धेनुं दद्याद्‌ देशकालेडविशिष्टे,जिसकी जीविका क्षीण हो गयी हो तथा जो अत्यन्त कष्ट पा रहा हो, ऐसे ब्राह्मणको सामान्य देश-कालमें भी दूध देनेवाली गायका दान करना चाहिये। इसके सिवा खेतीके लिये, होम-सामग्रीके लिये, प्रसूता स्त्रीके पोषणके लिये, गुरुदक्षिणाके लिये अथवा शिशु- पालनके लिये सामान्य देश-कालमें भी दुधारू गायका दान करना उचित है

ભીષ્મ બોલ્યા—જેની જીવિકા ક્ષીણ થઈ ગઈ હોય અને જે અત્યંત કષ્ટમાં હોય, એવા બ્રાહ્મણને સામાન્ય દેશ-કાળમાં પણ દૂધ આપતી ગાય દાન કરવી જોઈએ. તેમજ ખેતી માટે, હોમ-સામગ્રી માટે, પ્રસૂતા સ્ત્રીના પોષણ માટે, ગુરુદક્ષિણ માટે અથવા બાળકના પાલન માટે પણ—સામાન્ય દેશ-કાળમાં દૂધાળ ગાયનું દાન યોગ્ય છે.

Verse 41

अन्तर्ज्ाता: सक्रयज्ञानलब्धा: प्राणै: क्रीतास्तेजसा यौतकाश्न । कृच्छोत्सृष्टा: पोषणाभ्यागताश्न द्वारैरेतैगोविशेषा: प्रशस्ता:,गर्भिणी, खरीदकर लायी हुई, ज्ञान या विद्याके बलसे प्राप्त की हुई, दूसरे प्राणियोंके बदलेमें लायी हुई अथवा युद्धमें पराक्रम प्रकट करके प्राप्त की हुई, दहेजमें मिली हुई, पालनमें कष्ट समझकर स्वामीके द्वारा परित्यक्त हुई तथा पालन-पोषणके लिये अपने पास आयी हुई विशिष्ट गौएँ इन उपर्युक्त कारणोंसे ही दानके लिये प्रशंसनीय मानी गयी हैं

ભીષ્મ બોલ્યા—જે ગાયો પોતાના ઘરમાં જન્મેલી હોય, ખરીદી લાવવામાં આવેલી હોય, યજ્ઞ અથવા વિદ્યાના ફળરૂપે પ્રાપ્ત થયેલી હોય, પ્રાણોના બદલે મેળવેલી હોય, યુદ્ધમાં પરાક્રમથી જીતેલી હોય, દહેજમાં મળેલી હોય, પાલનનો ભાર માની માલિકે છોડેલી હોય, અથવા પોષણ-રક્ષા માટે પોતે જ આશ્રયે આવી હોય—આવી વિશેષ ગાયો આ કારણોથી જ દાન માટે પ્રશંસનીય ગણાય છે.

Verse 42

बलान्विता: शीलवयोपपन्ना: सर्वा: प्रशंसन्ते सुगन्धवत्य: । यथा हि गंगा सरितां वरिष्ठा तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा

ભીષ્મ બોલ્યા—બળથી યુક્ત, શીલ અને યૌવનથી સંપન્ન એવી આ બધી ગાયો સુગંધવાળી અને ઉત્તમ કહીને પ્રશંસિત થાય છે. જેમ નદીઓમાં ગંગા શ્રેષ્ઠ છે, તેમ અર્જુની ગાયોમાં કપિલા શ્રેષ્ઠ છે.

Verse 43

हृष्ट-पुष्ट, सीधी-सादी, जवान और उत्तम गन्धवाली सभी गौएँ प्रशंसनीय मानी गयी हैं। जैसे गंगा सब नदियोंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कपिला गौ सब गौआओंमें उत्तम है ।। तिस्नरो रात्रीस्त्वद्धिरुपोष्य भूमौ तृप्ता गावस्तर्पिति भ्य: प्रदेया: । वत्सैः पुष्टे: क्षीरपैः सुप्रचारा- स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम्‌,(गोदानकी विधि इस प्रकार है--) दाता तीन राततक उपवास करके केवल पानीके आधारपर रहे, पृथ्वीपर शयन करे और गौओंको घास-भूसा खिलाकर पूर्ण तृप्त करे। तत्पश्चात्‌ ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे संतुष्ट करके उन्हें वे गौएँ दे। उन गौओंके साथ दूध पीनेवाले हृष्ट-पुष्ट बछड़े भी होने चाहिये तथा वैसी ही स्फूर्तियुक्त गौएँ भी हों। गोदान करनेके पश्चात्‌ तीन दिनोंतक केवल गोरस पीकर रहना चाहिये

ભીષ્મે કહ્યું— દાતાએ ત્રણ રાત ઉપવાસ કરવો, માત્ર પાણીના આધાર પર રહેવું અને ધરતી પર શયન કરવું. ઘાસ-ભૂસાથી ગાયોને સંપૂર્ણ તૃપ્ત કરીને તથા બ્રાહ્મણોને ભોજન અને યથોચિત સન્માનથી સંતોષીને, પછી તે ગાયો દાનમાં આપવી. ગાયો સુશીલ અને સ્ફૂર્તિવાળી હોવી જોઈએ, સાથે દૂધ પીતા તંદુરસ્ત વાછરડાં પણ હોવા જોઈએ. ગોદાન કર્યા પછી દાતાએ ત્રણ દિવસ માત્ર ગોરસ (દૂધજન્ય પદાર્થો) લઈને રહેવું જોઈએ.

Verse 44

दत्त्वा धेनुं सुव्रतां साधुदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावन्ति वर्षाणि भवन्त्यमुत्र,जो गौ सीधी-सूधी हो, सुगमतासे अच्छी तरह दूध दुहा लेती हो, जिसका बछड़ा भी सुन्दर हो तथा जो बन्धन तुड़ाकर भागनेवाली न हो, ऐसी गौका दान करनेसे उसके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक दाता परलोकमें सुख भोगता है

ભીષ્મે કહ્યું— જે સુવ્રતા, સીધી-સાદી, સહેલાઈથી સારી રીતે દૂધ દોહાય એવી, સુંદર વાછરડાવાળી અને બંધન તોડી ભાગી ન જતી ધેનુનું દાન કરે છે, તે ગાયના શરીરમાં જેટલા રોમ હોય તેટલા વર્ષો સુધી પરલોકમાં સુખ ભોગવે છે.

Verse 45

तथानड्वाहं ब्राह्मणाय प्रदाय धुर्य युवानं बलिनं विनीतम्‌ । हलस्य वोढारमनन्तवीर्य॑ प्राप्रोति लोकान्‌ दशधेनुदस्य,जो मनुष्य ब्राह्मणको बोझ उठानेमें समर्थ, जवान, बलिष्ठ, विनीत--सीधा-सादा, हल खींचनेवाला और अधिक शक्तिशाली बैल दान करता है, वह दस धेनु दान करनेवालेके लोकोंमें जाता है

ભીષ્મે કહ્યું— જે મનુષ્ય બ્રાહ્મણને ધુરા વહન કરવા યોગ્ય, યુવાન, બળવાન, વિનયી અને તાલીમપ્રાપ્ત, હલ ખેંચનાર અત્યંત શક્તિશાળી બળદ દાન કરે છે, તે દસ ધેનુ દાન કરનારને મળતા લોકોને પ્રાપ્ત કરે છે.

Verse 46

कान्तारे ब्राह्मणान्‌ गाश्न यः परित्राति कौशिक । क्षणेन विप्रमुच्येत तस्य पुण्यफलं शृणु,इन्द्र! जो दुर्गम वनमें फँसे हुए ब्राह्मण और गौओंका उद्धार करता है, वह एक ही क्षणमें समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा उसे जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होती है, वह भी सुन लो

ભીષ્મે કહ્યું— હે સહસ્રાક્ષ (ઇન્દ્ર)! જે દુર્ગમ વનમાં ફસાયેલા બ્રાહ્મણો અને ગાયોને બચાવે છે, તે એક ક્ષણમાં સર્વ પાપોથી મુક્ત થઈ જાય છે; તેના પુણ્યફળને પણ સાંભળો.

Verse 47

अश्वमेधक्रतोस्तुल्यं फलं भवति शाश्वतम्‌ । मृत्युकाले सहस्राक्ष यां वृत्तिमनुकाड्क्षते,सहस्राक्ष! उसे अश्वमेध यज्ञके समान अक्षय फल सुलभ होता है। वह मृत्युकालमें जिस स्थितिकी आकांक्षा करता है, उसे भी पा लेता है

હે સહસ્રાક્ષ! તેને અશ્વમેધ યજ્ઞ સમાન અક્ષય ફળ પ્રાપ્ત થાય છે. અને મૃત્યુકાળે તે જે સ્થિતિની ઇચ્છા કરે છે, તે સ્થિતિ પણ તેને પ્રાપ્ત થાય છે.

Verse 48

लोकान्‌ बहुविधान्‌ दिव्यान्‌ यच्चास्य हृदि वर्तते । तत्‌ सर्व समवाप्रोति कर्मणैतेन मानव:,नाना प्रकारके दिव्य लोक तथा उसके हृदयमें जो-जो कामना होती है, वह सब कुछ मनुष्य उपर्युक्त सत्कर्मके प्रभावसे प्राप्त कर लेता है

આ સદ્કર્મના પ્રભાવથી મનુષ્ય અનેક પ્રકારના દિવ્ય લોકોને પ્રાપ્ત કરે છે; અને તેના હૃદયમાં જે-જે ઇચ્છા વસે છે, તે બધું પણ તેને પ્રાપ્ત થાય છે.

Verse 49

गोभिश्व समनुज्ञात: सर्वत्र च महीयते । यस्त्वेतेनैव कल्पेन गां वनेष्वनुगच्छति,इतना ही नहीं, वह गौओंसे अनुगृहीत होकर सर्वत्र पूजित होता है। शतक्रतो! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे वनमें रहकर गौओंका अनुसरण करता है तथा निःस्पृह, संयमी और पवित्र होकर घास-पत्ते एवं गोबर खाता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह मनमें कोई कामना न होनेपर मेरे लोकमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता है। अथवा उसकी जहाँ इच्छा होती है, उन्हीं लोकोंमें चला जाता है

ગાયોની અનુમતિ અને અનુગ્રહ પામીને તે સર્વત્ર પૂજિત થાય છે. પરંતુ જે મનુષ્ય આ જ વિધાન પ્રમાણે વનમાં રહી ગાયોનું અનુસરણ કરે છે, નિઃસ્પૃહ, સંયમી અને શુચિ રહી તૃણ-પર્ણ તથા ગોમય પર જીવન ધારે છે—તેના મનમાં જ્યારે કોઈ કામના રહેતી નથી, ત્યારે તે દેવતાઓ સાથે મારા લોકમાં આનંદપૂર્વક વસે છે; અથવા જ્યાં તેની ઇચ્છા હોય ત્યાંના લોકોમાં જાય છે.

Verse 50

तृणगोमयपर्णाशी निःस्पूृहो नियत: शुचि: । अकामं तेन वस्तव्यं मुदितेन शतक्रतो,इतना ही नहीं, वह गौओंसे अनुगृहीत होकर सर्वत्र पूजित होता है। शतक्रतो! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे वनमें रहकर गौओंका अनुसरण करता है तथा निःस्पृह, संयमी और पवित्र होकर घास-पत्ते एवं गोबर खाता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह मनमें कोई कामना न होनेपर मेरे लोकमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता है। अथवा उसकी जहाँ इच्छा होती है, उन्हीं लोकोंमें चला जाता है

હે શતક્રતો! તૃણ, ગોમય અને પર્ણ આહાર કરનાર, નિઃસ્પૃહ, નિયત અને શુચિ એવો તે પુરુષ પ્રસન્નચિત્તે નિષ્કામ ભાવથી નિવાસ કરે.

Verse 51

मम लोके सुरै: सार्थ लोके यत्रापि चेच्छति,इतना ही नहीं, वह गौओंसे अनुगृहीत होकर सर्वत्र पूजित होता है। शतक्रतो! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे वनमें रहकर गौओंका अनुसरण करता है तथा निःस्पृह, संयमी और पवित्र होकर घास-पत्ते एवं गोबर खाता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह मनमें कोई कामना न होनेपर मेरे लोकमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता है। अथवा उसकी जहाँ इच्छा होती है, उन्हीं लोकोंमें चला जाता है

તે દેવતાઓ સાથે મારા લોકમાં વસે છે; અથવા જ્યાં જ્યાં તેની ઇચ્છા હોય ત્યાંના લોકોમાં જાય છે.

Verse 72

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानसम्बन्धी बहतत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

આ રીતે પવિત્ર મહાભારતના અનુશાસનપર્વના અંતર્ગત દાનધર્મપર્વમાં ગોદાન-સંબંધિત બહોતેરમો અધ્યાય પૂર્ણ થયો.

Verse 73

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पितामहेन्द्रसंवादे त्रिसप्ततितमो<5ध्याय:

આ રીતે શ્રીમહાભારતના અનુશાસનપર્વના દાનધર્મપર્વમાં પિતામહ (ભીષ્મ) અને ઇન્દ્રનો સંવાદ—ત્રિસપ્તતિતમ (૭૩મો) અધ્યાય—સમાપ્ત થયો.

Verse 263

महत्‌ फल प्राप्यते स द्विजाय दत्त्वा दोग्ध्रीं विधिनानेन धेनुम्‌ । जो पुरुष सदा सावधान रहकर इस उपर्युक्त धर्मका पालन करता है तथा जो सत्यवादी, गुरुसेवापरायण, दक्ष, क्षमाशील, देवभक्त, शान्तचित्त, पवित्र, ज्ञानवान्‌, धर्मात्मा और अहंकारशून्य होता है, वह यदि पूर्वोक्त विधिसे ब्राह्मणको दूध देनेवाली गायका दान करे तो उसे महान्‌ फलकी प्राप्ति होती है

ભીષ્મ બોલ્યા—આ વિધિ અનુસાર દૂધ આપતી ધેનુ કોઈ દ્વિજ (બ્રાહ્મણ)ને દાન કરવાથી મહાન ફળ પ્રાપ્ત થાય છે. જે પુરુષ સદા સાવધાન રહી આ ધર્મનું પાલન કરે છે—સત્યવાદી, ગુરુસેવામાં પરાયણ, કુશળ, ક્ષમાશીલ, દેવભક્ત, શાંતચિત્ત, શુચિ, જ્ઞાનવાન, ધર્માત્મા અને નિરહંકાર—તે જો પૂર્વોક્ત વિધિથી બ્રાહ્મણને દૂધ આપતી ગાયનું દાન કરે, તો તેને મહાન પુણ્યફળ પ્રાપ્ત થાય છે.

Verse 323

तावत्‌ प्रदानात्‌ स गवां फलमाप्रोति शाश्वतम्‌ । शतक्रतो! जो एक समय भोजन करके दूसरे समयके बचाये हुए भोजनसे गाय खरीदकर उसका दान करता है, वह उस गौके जितने रोएँ होते हैं, उतने गौओंके दानका अक्षय फल पाता है

ભીષ્મ બોલ્યા—હે શતક્રતુ (ઇન્દ્ર)! ગાયોનું દાન કરવાથી મનુષ્યને શાશ્વત ફળ પ્રાપ્ત થાય છે. જે વ્યક્તિ એક વખત ભોજન કરીને બીજા વખત માટે બચાવેલા અન્નથી ગાય ખરીદી તેનું દાન કરે છે, તેને તે ગાયના શરીરમાં જેટલા વાળ હોય તેટલી ગાયો દાન કર્યાનું અક્ષય પુણ્યફળ મળે છે.

Frequently Asked Questions

Whether a gift remains meritorious if it transfers hardship to the recipient; the chapter treats burdensome donations (diseased, non-productive, or coercively obtained cows) as ethically defective despite being labeled ‘charity.’

Give what is fit, useful, and respectfully prepared; merit is linked to the recipient’s benefit and the donor’s responsible intention, not to the donor’s convenience in disposing of unwanted property.

Yes. The chapter states that reciting/knowing the auspicious account of cows’ origin and status is purifying and conducive to well-being and prosperity, functioning as a textual warrant for the discourse’s ritual-ethical authority.