Ayodhya KandaPrakarana 2920 Verses

Prakarana 29

त्याग-दीक्षा का सोपान: राज्य-सुख और गृह-रमणीयता के बीच ‘राम-आज्ञा’ को सर्वोच्च मानकर वैराग्य, करुणा, और धर्म-निष्ठा की परीक्षा। यह चरण साधक को सिखाता है कि प्रेम (स्नेह) को आसक्ति न बनने देकर उसे ‘आज्ञा-पालन’ और ‘राम-चरणानुराग’ में रूपान्तरित किया जाए।

Ce segment de l’Ayodhyā Kāṇḍa transforme la karuṇā née de la séparation (viyoga) en intelligence du dharma (dharma-buddhi). Après quatre jours, l’insistance de la cité—« sans Sīyā, le retour de Rāma n’est pas bon »—établit dans le cœur du peuple l’indissociabilité du couple Rāma–Sītā ; et, en disant que la vie forestière est « aussi agréable que des millions de cités des immortels », il proclame le renoncement comme bonheur suprême. Ensuite, dans les échanges entre les reines et la famille de Janaka, la karuṇā s’épaissit, mais Tulsīdās ne la laisse pas devenir désespoir : la parole de Sumitrā et Kauśalyā interdit l’accusation devant la « volonté d’Īśa » (Īs rajāī). Sur ce fond vient la grandeur du récit de Bharata : idéal de bhakti, fondu dans « l’ordre de Rāma » (Rāma-ājñā), au-delà de l’intérêt personnel comme du mérite. Ainsi, ce passage enseigne au sādhaka de purifier l’affection (sneha) pour en faire un amour mûr (anurāga) : telle est la progression des degrés (sopāna-gati).

Verses

Verse 572 (चौपाई)

एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।। दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।। सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।। परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही।। दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही।। मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला।। अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।। सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।।

Verse 573 (दोहा/सोरठा)

एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।। सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।

Verse 574 (चौपाई)

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।। सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं।। सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू।। कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी।। सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।। पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन।। सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति।। सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।।

Verse 575 (दोहा/सोरठा)

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।।

Verse 576 (चौपाई)

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।। जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी।। कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू।। कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।। ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।। देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।। भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।। सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी।।

Verse 577 (दोहा/सोरठा)

लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु। गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।।

Verse 578 (चौपाई)

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।। राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।। भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।। कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।। जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा।। कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ। अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।। सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।

Verse 579 (दोहा/सोरठा)

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि। को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।

Verse 580 (चौपाई)

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।। रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन।। तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी।। गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।। लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।। नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।। सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।। देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।

Verse 581 (दोहा/सोरठा)

बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय। हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय।।284।।

Verse 582 (चौपाई)

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।। देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी।। प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।। सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी।। रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै।। रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू।। अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल।। यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा।।

Verse 583 (दोहा/सोरठा)

अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।। सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।285।।

Verse 584 (चौपाई)

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।। तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।। जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।। लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की।। उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू।। सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा।। चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु।। मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की।।

Verse 585 (दोहा/सोरठा)

सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि। धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।

Verse 586 (चौपाई)

तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।। पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।। जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।। गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे।। पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।। पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।। कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं।। लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ।।

Verse 587 (दोहा/सोरठा)

बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि।।287।।

Verse 588 (चौपाई)

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।। मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन।। सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि।। धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू।। सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही।। बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।। भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।। समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।

Verse 589 (दोहा/सोरठा)

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि। कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।

Verse 590 (चौपाई)

अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।। भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी।। बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ।। बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं।। देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।। भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।। परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे।। साधन सिद्ध राम पग नेहू।।मोहि लखि परत भरत मत एहू।।

Verse 591 (दोहा/सोरठा)

भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ। करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।289।।

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