Ayodhya KandaPrakarana 2020 Verses

Prakarana 20

यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ और ‘भक्ति की परख’ का द्वार है: राजसुख का विसर्जन, भ्रातृ-प्रेम की अग्निपरीक्षा, और समाज-धर्म के भीतर रहकर राम-नाम के आश्रय में वैराग्य। इस काण्ड में साधक सीखता है कि मुक्ति-मार्ग केवल वनगमन नहीं, बल्कि अहं-त्याग, शरणागति, और निष्काम सेवाभाव है—भरत का ‘राज्य’ के प्रति वैराग्य तथा गुह (निषाद) की निष्कपट सख्यता इसी सीढ़ी की रीलिंग है।

Le rasa principal de l’Ayodhyā Kāṇḍ est la compassion ; mais cette compassion, au lieu de demeurer centrée sur le deuil, mûrit en accomplissement de bhakti. Le départ de Rāma pour la forêt est la maryādā du dharma social (dharma royal / parole du père), et l’arrivée de Bharata est la purification intérieure de cette maryādā—abandon de l’ego et service désintéressé. Dans ce passage (dohā 190–199), la fureur guerrière de Guhā, l’apaisement par la réflexion sur les présages, puis l’étreinte de Bharata et Guhā et le bain dans le Gaṅgā—tout cela est un voyage de transformation de la « haine » en « amour ». Tulsī y tisse aussi un pont nirguṇa–saguna : la grandeur du Nom (pureté du Rāma-nāma, exemple de Vālmīki) indique le principe sans forme, tandis que Rāmaghāṭ, les traces des pieds, la litière de feuilles, et la prosternation de Bharata sont une sādhanā concrète de la līlā saguna. Sur cette marche, le pratiquant apprend que la preuve de la bhakti ne dépend pas de la caste extérieure ni des conventions du monde, mais des signes de l’amour.

Verses

Verse 388 (चौपाई)

होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।। सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ।। समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।। भरत भाइ नृपु मै जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू।। स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी।। तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें।। साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा।। जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू।।

Verse 389 (दोहा/सोरठा)

बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु। सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।।

Verse 390 (चौपाई)

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।। भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा।। चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।। सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं।। अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं।। एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े।। निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई।। देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।।

Verse 391 (दोहा/सोरठा)

भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।191।।

Verse 392 (चौपाई)

राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।। जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं।। दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।। एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।। बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।। रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।। सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा।। भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।

Verse 393 (दोहा/सोरठा)

गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ। बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ।।192।।

Verse 394 (चौपाई)

लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।। अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।। मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।। मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।। देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू।। जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा।। राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।। गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई।।

Verse 395 (दोहा/सोरठा)

करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ।।193।।

Verse 396 (चौपाई)

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।। धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।। लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।। तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता।। राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।। यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा।। करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई।। उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना।।

Verse 397 (दोहा/सोरठा)

स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात। रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात।।194।।

Verse 398 (चौपाई)

नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।। राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं।। रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा।। देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।। सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा।। धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी।। कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी।। अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें।।

Verse 399 (दोहा/सोरठा)

समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ। जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ।।195।।

Verse 400 (चौपाई)

कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।। राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें।। देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई।। कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं।। जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।। निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी।। कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।। सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।।

Verse 401 (दोहा/सोरठा)

सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ। घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ।।196।।

Verse 402 (चौपाई)

सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।। सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू।। एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा।। रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू।। करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी।। करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी।। भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू।। जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू।।

Verse 403 (दोहा/सोरठा)

एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ। मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ।।197।।

Verse 404 (चौपाई)

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा।। सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई।। चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी।। भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई।। चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीर सनेह न थोरें।। पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ।। जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए।। भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू।।

Verse 405 (दोहा/सोरठा)

जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु। अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।198।।

Verse 406 (चौपाई)

कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।। चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई।। कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे।। सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी।। श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना।। पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही।। ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू।। प्राननाथु रघुनाथ गोसाई। जो बड़ होत सो राम बड़ाई।।

Verse 407 (दोहा/सोरठा)

पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि। बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि।।199।।

Inside Prakarana 20

The dialogue

  • काकभुशुण्डि (परंपरागत मानस-ढाँचे में)

Frequently Asked Questions

परंपरा में इस खंड का फल ‘भ्रातृ-प्रेम, वैर-शमन, और नाम-विश्वास की दृढ़ता’ कहा जाता है। विशेषतः ‘राम नाम महिमा’ (दोहा 194 के भाव) के पाठ से पाप-संस्कार क्षीण होते हैं और साधक में निष्कपट भक्ति (अहं-रहित स्नेह) जाग्रत होती है।

लोक-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-संकीर्तन-सम्पुट) या ‘राम राम’ का जप-सम्पुट इस प्रसंग में जोड़ा जाता है, क्योंकि यहाँ नाम-महिमा और गंगा-तट-स्मरण प्रधान है। (क्षेत्र/सम्प्रदाय के अनुसार सम्पुट-रूप बदल सकता है।)

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