सोपान-प्रवेश: ‘मंगल-आरम्भ’ से ‘भक्ति-बीज’ तक। बालकाण्ड में राम-लीला का प्रथम दर्शन जीव के भीतर श्रद्धा (श्रवण-रुचि) जगाता है। यहाँ विवाह-उत्सव, अतिथि-सत्कार, गुरु-कृपा, दान और कुल-रीति—ये सब ‘धर्म-आचरण’ को भक्ति का आधार बनाते हैं। इस खण्ड का द्वार-भाव यह है कि मोक्ष-मार्ग का पहला पायदान सामाजिक-धर्म और प्रेम-सम्बन्धों की शुद्धि से खुलता है; लोक-मर्यादा के भीतर रहकर भी ईश्वर-प्रेम (सगुण-भक्ति) निरन्तर नूतन होता जाता है।
En este pasaje (en torno a los dohas 330–339) fluye un rasa “posterior a la boda”: síntesis de entusiasmo, karuṇ-viraha, vātsalya y el dharma del dar (dāna-dharma). La repetición de “nitya nūtana maṅgala” convierte la narración en experiencia de gracia siempre nueva: la hospitalidad de Janaka, el culto de Daśaratha al guru y sus dones a los vipras, y el amor conmovido del gineceo y de la familia de Janaka en la despedida; todo ello fortalece el fundamento social de la bhakti (maryādā). Tulasī no describe el esplendor real solo por el sabor del aiśvarya-rasa; coloca el “dāna” y el “sevā” como una purificación de tipo yajñico, de modo que el dharma del jefe de hogar (gṛhastha-dharma) también se vuelve sādhana. La cima emotiva está en la despedida: el partir de Sītā en palanquín, las bendiciones maternas, el amor entre suegra y nuera, y la impronta interior del “karuṇā-biraha”; ese viraha, más adelante, espesará la bhakti. Así, esta sección del Bālakāṇḍa purifica al jīva “por el afecto” y lo prepara para el siguiente peldaño.
Verse 695 (चौपाई)
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।। बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे।। देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता।। प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं।। करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी।। तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा।। अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई।। सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई।।
Verse 696 (दोहा/सोरठा)
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि। आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि।।330।।
Verse 697 (चौपाई)
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे।। चारि लच्छ बर धेनु मगाई। कामसुरभि सम सील सुहाई।। सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं।। करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउँ आजु जग जीवन लाहू।। पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा।। कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन।। चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा।। एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू।।
Verse 698 (दोहा/सोरठा)
बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ। यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ।।331।।
Verse 699 (चौपाई)
जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती।। दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा।। नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई।। नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू।। बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती।। कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई।। अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू।। भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए।।
Verse 700 (दोहा/सोरठा)
अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ। भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ।।332।।
Verse 701 (चौपाई)
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।। सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने।। जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती।। बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना।। भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठई जनक अनेक सुसारा।। तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा।। मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे।। कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना।।
Verse 702 (दोहा/सोरठा)
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि। जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि।।333।।
Verse 703 (चौपाई)
सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई।। चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं।। पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं।। होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी।। सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू।। अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी।। सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई।। बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं।।
Verse 704 (दोहा/सोरठा)
तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु। चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु।।334।।
Verse 705 (चौपाई)
चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए।। कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू।। लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी।। को जानै केहि सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी।। मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा।। पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसे।। निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू।। एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता।।
Verse 706 (दोहा/सोरठा)
रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु। करहि निछावरि आरती महा मुदित मन सासु।।335।।
Verse 707 (चौपाई)
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं।। रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई।। भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए।। बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी।। राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए।। मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू।। सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू।। हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही।।
Verse 708 (छंद)
करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै। बलि जाँउ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै।। परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी। तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी।।
Verse 709 (दोहा/सोरठा)
तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय। जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन।।336।।
Verse 710 (चौपाई)
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।। सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी।। राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी।। पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई।। मंजु मधुर मूरति उर आनी। भई सनेह सिथिल सब रानी।। पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी। बार बार भेटहिं महतारीं।। पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी।। पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई।।
Verse 711 (दोहा/सोरठा)
प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु। मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु।।337।।
Verse 712 (चौपाई)
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।। ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही।। भए बिकल खग मृग एहि भाँति। मनुज दसा कैसें कहि जाती।। बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए।। सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी।। लीन्हि राँय उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की।। समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने।। बारहिं बार सुता उर लाई। सजि सुंदर पालकीं मगाई।।
Verse 713 (दोहा/सोरठा)
प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस। कुँअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस।।338।।
Verse 714 (चौपाई)
बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई।। दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे।। सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी।। भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा।। समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे।। दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे।। चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा।। सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना।।
Verse 715 (दोहा/सोरठा)
सुर प्रसून बरषहि हरषि करहिं अपछरा गान। चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान।।339।।
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