Ayodhya KandaPrakarana 2821 Verses

Prakarana 28

राजधर्म से वनधर्म की ओर संक्रमण—यह सोपान ‘वैराग्य-प्रवेश’ का द्वार है। अयोध्या का लोक-शोक, मिथिला का शोक, और भरत की निर्मल निष्ठा मिलकर साधक को यह सिखाते हैं कि ईश्वर-इच्छा के सामने सांसारिक व्यवस्था (राज्य, कुल, प्रतिष्ठा) भी अस्थिर है। इस चरण में मुक्ति की सीढ़ी ‘त्याग’ नहीं, बल्कि ‘अनासक्ति सहित कर्तव्य’ है—राम की मौन-लीला, भरत की सत्य-भावना, और वसिष्ठ का धीरज-उपदेश मन को शरणागति की ओर चढ़ाते हैं।

El rasa principal de este pasaje es karuṇā, pero aquí la compasión no es sólo pena: es medio de maduración devocional. Al oír las palabras de Bharata, el júbilo de los dioses y la lluvia de flores abren dos niveles a la vez: en el mundo hay perplejidad, pero en la mirada divina se afirma el dharma. La llegada del mensajero de Janaka une a Mithilā con el océano de duelo de Ayodhyā; así, la karuṇā se vuelve “colectiva”: dos sociedades, dos reinos, un mismo viraha de Rāma. La metáfora del mar/barca/barquero de Tulsī (ni la barca de jñāna-vairāgya puede cruzar el río del amor) afila el principio del Manas: el conocimiento lógico no basta; sólo el prema a Rāma es la otra orilla. El upadeśa de Vasiṣṭha se vuelve columna de firmeza en medio del duelo, y al final la disposición de alimento de frutos y raíces transforma el “dharma del bosque” en “dharma del āśrama”. Este tramo es el peldaño medio que conduce al sādhaka de la karuṇā a la śaraṇāgati.

Verses

Verse 551 (चौपाई)

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।। असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी।। चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची।। जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए।। करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे।। दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता।। सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा।। बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।

Verse 552 (दोहा/सोरठा)

नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ। मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ।।270।।

Verse 553 (चौपाई)

कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।। जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू।। रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि।। भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू।। नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू।। समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ।। नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी।। बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ।।

Verse 554 (दोहा/सोरठा)

गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति। चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति।।271।।

Verse 555 (चौपाई)

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।। सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति।। धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई।। घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे।। दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महीपाला।। भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा।। खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा।। साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे।।

Verse 556 (दोहा/सोरठा)

सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु। रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु।।272।।

Verse 557 (चौपाई)

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।। अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी।। एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ।। करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी।। रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।। राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी।। सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।। एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू।।

Verse 558 (दोहा/सोरठा)

गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ। अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।273।।

Verse 559 (चौपाई)

सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।। एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।। ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी।। सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं।। लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी।। सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।। कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे।। हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे।।

Verse 560 (दोहा/सोरठा)

प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु। सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।274।।

Verse 561 (चौपाई)

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।। गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।। राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।। मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।। आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती।। आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे।। लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।। भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि।।

Verse 562 (दोहा/सोरठा)

आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।

Verse 563 (चौपाई)

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।। केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।। सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।। भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।

Verse 564 (छंद)

अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा। दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा।। सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की। तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की।।

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Verse 565 (दोहा/सोरठा)

किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह। धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन।।276।।

Verse 566 (चौपाई)

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।। तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई।। बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।। राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू।। सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू।। मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए।। सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी।। पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।

Verse 567 (दोहा/सोरठा)

दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात। बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।।

Verse 568 (चौपाई)

जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।। हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा।। लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका।। कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं।। तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।। मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।। रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।। कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना।।

Verse 569 (दोहा/सोरठा)

तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार। लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार।।278।।

Verse 570 (चौपाई)

कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।। सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा।। बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला।। तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।। जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई।। तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई।। देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।। दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना।।

Verse 571 (दोहा/सोरठा)

सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार। पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।।

Inside Prakarana 28

The dialogue

  • तुलसीदास (कथावाचक-स्वर; आन्तरिक रूप से ‘मानस’ का काव्य-नियंता)

Frequently Asked Questions

परम्परा में यह अंश ‘भरत-चरित्र’ और ‘वसिष्ठ-धीरज’ के कारण शोक-निवारण, मन की स्थिरता, तथा परिवार/समाज में धर्म-बुद्धि जागरण का फलदायी माना जाता है—विशेषकर वियोग, संकट, और निर्णय-काल में पाठ से धैर्य व शरणागति बढ़ती है।

सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘राम राम’ जप-संपुट; और भरत-प्रसंग में कई परम्पराएँ ‘भरत चरित्र बिनु बिनु’ नहीं, बल्कि ‘राम-नाम’ को ही सार्वभौम संपुट मानती हैं (स्थान-परम्परा अनुसार भेद)।

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