
अध्याय १५ — कीचकस्य अत्याचारः, द्रौपद्याः सभाशरणगमनम् (Kīcaka’s coercion and Draupadī’s appeal in the assembly)
Upa-parva: Kīcaka–Draupadī Saṃvāda / Kīcaka-vyatikrama-prasaṅga (Matsya-sabhā episode)
Kīcaka welcomes Draupadī (addressed as Sukeśāntā) with gifts and invitations, ordering ornaments, garments, and drink to be brought, and implying an illicit private meeting. Draupadī states she has been sent by the queen to fetch liquor, prompting Kīcaka to dismiss the need for her presence. The narrator describes Kīcaka’s physical grasp and pursuit: Draupadī resists, throws him down, and runs toward the assembly where Yudhiṣṭhira sits; Kīcaka drags her by the hair, knocks her down, and strikes her with his foot in full view. A rākṣasa-like force is mentioned as carrying Kīcaka away momentarily, underscoring the atmosphere of violent disorder. Bhīma and Yudhiṣṭhira witness the insult; Bhīma’s anger rises, but Yudhiṣṭhira restrains him out of fear of awakening suspicion and breaking concealment. Draupadī laments and argues publicly that men famed for valor and generosity tolerate her humiliation; she rebukes Virāṭa and the assembly for permitting adharma. Virāṭa claims ignorance of the dispute’s details; the courtiers praise Draupadī’s beauty and censure Kīcaka, yet the situation remains unresolved. Yudhiṣṭhira instructs Draupadī to return to Sudeṣṇā’s quarters, framing endurance and service as the present necessity. Draupadī reports the assault to Queen Sudeṣṇā; the queen offers to have Kīcaka killed, while Draupadī indicates that others will punish him and that his end is imminent—foreshadowing subsequent action while maintaining strategic concealment.
Chapter Arc: अज्ञातवास के आवरण में छिपी द्रौपदी (सैरन्ध्री) पर कीचक की वासना-भरी दृष्टि पड़ चुकी है; अब राजमहिषी सुदेष्णा के आदेश से संकट सीधे कीचक के गृह-द्वार तक पहुँचने वाला है। → कीचक अपनी बहन सुदेष्णा के सामने सैरन्ध्री को पाने के लिए उपाय बताता है—जैसे कैकेयी ने दासी को बुलवाया था, वैसे ही सुदेष्णा उसे मदिरा/पान लाने के बहाने कीचक के निवेशन भेज दे। सुदेष्णा मनस्विनी होकर भी दया और दबाव के बीच डोलती है; अंततः वह कीचक के कहे में आकर राजार्ह सुरा, भक्ष्य, अन्न-पान की व्यवस्था कराती है और सैरन्ध्री को बुलाकर आदेश देती है कि कीचक के घर जाकर पानमानय लाए। द्रौपदी विनयपूर्वक मना करती है—अन्य दासियाँ हैं, मेरे जाने पर कीचक अपमान करेगा—पर रानी का आदेश टलता नहीं। → असहाय-सी, भयभीत मृगी की भाँति द्रौपदी कीचक के निकट पहुँचती है; कीचक उसे देखकर हर्ष से उठ खड़ा होता है—मानो नाव पाकर पार उतरने वाला—और उसका भय वास्तविक रूप ले लेता है। → द्रौपदी सूर्य-मुहूर्त तक भीतर ही भीतर धैर्य साधती है; अदृश्य रक्षार्थ (भीम/दैवी संरक्षण का संकेत) उसे छोड़ता नहीं—वह अपमान के द्वार पर भी अकेली नहीं है। अध्याय का अंत कीचक के उन्मत्त उत्साह और द्रौपदी के संत्रास के साथ होता है, जिससे अगले प्रतिकार की भूमिका बनती है। → कीचक अब द्रौपदी को पकड़ने/अपमानित करने को तत्पर है—क्या सैरन्ध्री की रक्षा का उपाय तुरंत प्रकट होगा, या अपमान की सीमा टूटेगी?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं।) हि >> मो न (0) है पज्चदशो< ध्याय: रानी सुदेष्णाका द्रौपदीको कीचकके घर भेजना वैशम्पायन उवाच प्रत्याख्यातो राजपुत्र्या सुदेष्णां कीचको<ब्रवीत् । अमयदिन कामेन घोरेणाभिपरिप्लुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजकुमारी द्रौपदीके द्वारा इस प्रकार ठुकरा दिये जानेपर कीचक असीम एवं भयंकर कामसे विवश होकर अपनी बहिन सुदेष्णासे बोला--
Vaiśampāyana said: When he had been rejected by the princess (Draupadī), Kīcaka—overwhelmed and driven by fierce desire—spoke to his sister Sudeṣṇā. The episode frames uncontrolled lust as a moral failing that leads to coercion and abuse of power, setting the stage for the ensuing conflict and retribution.
Verse 2
यथा कैकेयि सैरन्ध्री समेयात् तद् विधीयताम् | येनोपायेन सैरन्ध्री भजेन्मां गजगामिनी । त॑ं सुदेष्णे परीप्सस्व प्राणान् मोहात् प्रहासिषम्,“केकयराजनन्दिनि! जिस उपायसे भी वह गजगामिनी सैरन्ध्री मेरे पास आवे और मुझे अंगीकार कर ले, वह करो। सुदेष्णे! तुम स्वयं ही ऊहापोह करके युक्तिसे वह उचित उपाय ढूँढ़ निकालो, जिससे मुझे (मोहके वश हो) प्राणोंका त्याग न करना पड़े”
Vaiśampāyana said: “O Kaikeyī! Let it be arranged so that the maid Sairandhrī may come to me. By whatever means that elephant-gaited woman might accept me, do that. O Sudeṣṇā, you yourself must deliberate and find a fitting stratagem, so that I—bewildered by desire—do not end up throwing away my life.”
Verse 3
वैशम्पायन उवाच तस्य सा बहुश: श्रुत्वा वाचं विलपतस्तदा । विराटमहिषी देवी कृपां चक्रे मनस्विनी,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार बारंबार विलाप करते हुए कीचककी बात सुनकर उस समय राजा विराटकी मनस्विनी महारानी सुदेष्णाके मनमें उसके प्रति दयाभाव प्रकट हो गया
Verse 4
(सुदेष्णोवाच शरणागतेयं सुश्रोणी मया दत्ताभया च सा । शुभाचारा च १द्रं ते नैनां वक्तुमिहोत्सहे ।। सुदेष्णा बोली--भाई! यह सुन्दरी सैरन्ध्री मेरी शरणमें आयी है। इसे मैंने अभय दे रखा है। तुम्हारा कल्याण हो। यह बड़ी सदाचारिणी है। मैं इससे तुम्हारी मनोगत बात नहीं कह सकती। नैषा शक््या हि चान्येन स्प्रष्टं पापेन चेतसा । गन्धर्वा: किल पज्चैनां रक्षन्ति रमयन्ति च ।। इसे कोई भी दूसरा पुरुष मनमें दूषित भाव लेकर नहीं छू सकता। सुनती हूँ, पाँच गन्धर्व इसकी रक्षा करते हैं और इसे सुख पहुँचाते हैं। एवमेषा ममाचष्टे तथा प्रथमसंगमे । तथैव गजनासोरु: सत्यमाह ममान्तिके ।। ते हि कुद्धा महात्मानो नाशयेयुरह्हि जीवितम् । इसने यह बात मुझसे उसी समय जब कि मेरी इससे पहले-पहल भेंट हुई थी, बता दी थी। इसी प्रकार हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली इस सुन्दरीने मेरे निकट यह सत्य ही कहा है कि यदि किसीने मेरा अपमान किया, तो मेरे महात्मा पति कुपित होकर उसके जीवनको ही नष्ट कर देंगे। राजा चैव समीक्ष्यैनां सम्मोहं गतवानिह ।। मया च सत्यवचनैरनुनीतो महीपति: । राजा भी इसे यहाँ देखकर मोहित हो गये थे, तब मैंने इसकी कही हुई सच्ची बातें बताकर उन्हें किसी प्रकार समझा-बुझाकर शान्त किया। सो<प्येनामनिशं दृष्टवा मनसैवाभ्यनन्दत ।। भयाद् गन्धर्वमुख्यानां जीवितस्योपघातिनाम् | मनसापि ततत्त्वेनां न चिन्तयति पार्थिव: ।। तबसे वे भी सदा इसे देखकर मन-ही-मन इसका अभिनन्दन करते हैं। जीवनका विनाश करनेवाले जन श्रेष्ठ गन्धर्वोके भयसे महाराज कभी मनसे भी इसका चिन्तन नहीं करते हैं। ते हि क्रुद्धा महात्मानो गरुडानिलतेजस: । दहेयुरपि लोकांस्त्रीन् युगान्तेष्विव भास्करा: ।। वे महात्मा गन्धर्व गरुड़ और वायुके समान तेजस्वी हैं। वे कुपित होनेपर प्रलयकालके सूर्चोकी भाँति तीनों लोकोंको दग्ध कर सकते हैं। सैरन्ध्रया होतदाख्यातं मम तेषां महद् बलम् | तव चाहमिदं गुहूं स्नेहादाख्यामि बन्धुवत् ।। सैरन्ध्रीने स्वयं ही मुझसे उनके महान् बलका परिचय दिया है। भ्रातृस्नेहके कारण मैंने तुमसे यह गोपनीय बात भी बता दी है। मा गमिष्यसि वै कृच्छां गतिं परमदुर्गमाम् । बलिनस्ते रुजं कुर्यु: कुलस्थ च धनस्य च ।। इसे ध्यानमें रखनेसे तुम अत्यन्त दुःखदायिनी संकटपूर्ण परिस्थितिमें नहीं पड़ोगे। गन्धर्वलोग बलवान हैं। वे तुम्हारे कुल और सम्पत्तिका भी नाश कर सकते हैं। तस्मान्नास्यां मन: कर्तु यदि प्राणा: प्रियास्तव । मा चिन्तयेथा मा गास्त्व॑ मत्प्रियं च यदीच्छसि ।। इसलिये यदि तुम्हें अपने प्राण प्रिय हैं और यदि तुम मेरा भी प्रिय करना चाहते हो तो इस सैरन्ध्रीमें मम न लगाओ। उसका चिन्तन छोड़ दो और उसके पास कभी न जाओ। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु दुष्टात्मा भगिनीं कीचकोडब्रवीत् । वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! सुदेष्णाके ऐसा कहनेपर दुष्टात्मा कीचक अपनी बहिनसे बोला। कीचक उवाच गन्धर्वाणां शतं वापि सहस्रमयुतानि वा ।। अहमेको हनिष्यामि गन्धर्वान् पज्च कि पुनः । कीचकने कहा--बहिन! मैं सैकड़ों, सहस्रों तथा अयुत गन्धर्वोकोी भी अकेला ही मार गिराऊँगा, फिर पाँचकी तो बात ही क्या है?। वैशग्पायन उवाच एवमुक्ता सुदेष्णा तु शोकेनाभिप्रपीडिता ।। अहो दुःखमहो कृच्छुमहो पापमिति सम ह । प्रारुदद् भृशदुःखार्ता विपाकं तस्य वीक्ष्य सा ।। पातालेषु पतत्येष विलपन् वडवामुखे । वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! कीचकके ऐसा कहनेपर सुदेष्णा शोकसे अत्यन्त व्यथित हो उठी और मन-ही-मन कहने लगी--“अहो! यह महान् दुःख, महान् संकट और महान् पापकी बात हो रही है।' इस कर्मके भावी परिणामपर दृष्टिपात करके वह अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रोने लगी और मन-ही-मन बोली--'मेरा यह भाई तो ऊटपटाँग बातें बोलकर स्वयं ही पाताल अथवा बडवानलके मुखमें गिर रहा है'। (तत्पश्चात् वह कीचकको सुनाकर कहने लगी--) त्वत्कृते विनशिष्यन्ति भ्रातर: सुहृदश्न मे ।। कि नु शक््यं मया कर्तु यत् त्वमेवमभिप्लुत: । न च श्रेयोडभिजानीषे काममेवानुवर्तसे ।। “मैं देखती हूँ; तेरे कारण मेरे सभी भाई और सुहृद् नष्ट हो जायँगे। तू ऐसी अनुचित इच्छाको अपने मनमें स्थान दे रहा है; मैं इसके लिये क्या कर सकती हूँ? अपनी भलाई किस बातमें है, यह तू नहीं समझता है और केवल कामका ही गुलाम हो रहा है। ध्रुवं गतायुस्त्वं पाप यदेवं काममोहित: । अकर्तव्ये हि मां पापे नियुनड्क्षि नराधम ।। 'पापी! निश्चय ही तेरी आयु समाप्त हो गयी है; तभी तू इस प्रकार कामसे मोहित हो रहा है। नराधम! तू मुझे ऐसे पापपूर्ण कार्यमें लगा रहा है, जो कदापि करने योग्य नहीं है। अपि चैतत् पुरा प्रोक्तं निपुणैर्मनुजोत्तमै: । एकस्तु कुरुते पापं स्वजातिस्तेन हन्यते ।। 'प्राचीनकालके श्रेष्ठ एवं कुशल मनुष्योंने यह ठीक ही कहा है कि कुलमें एक मनुष्य पाप करता है और उसके कारण सभी जाति-भाई मारे जाते हैं। गतस्त्वं धर्मराजस्य विषयं नात्र संशय: । अदूषकमिमं सर्व स्वजनं घातयिष्यसि ।। 'तू यमराजके लोकमें गया हुआ ही है, इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं रह गया है। तू अपने साथ इन समस्त निरपराध स्वजनोंको भी मरवा डालेगा। एतत् तु मे दुःखतरं येनाहं भ्रातृसौहदात् | विदितार्था करिष्यामि तुष्टो भव कुलक्षयात् ।।) “मेरे लिये सबसे महान् दुःखकी बात यह है कि मैं सारे परिणामोंको समझ-बूझकर भी भ्रातृ-स्नेहके कारण तेरी आज्ञाका पालन करूँगी। तू अपने कुलका संहार करके संतुष्ट हो ले'। स्वमन्त्रमभिसंधाय तस्यार्थमनुचिन्त्य च । उद्योगं चैव कृष्णाया: सुदेष्णा सूतमब्रवीत्,तदनन्तर सुदेष्णाने अपने कार्यका विचार करके कीचकके मनोभावपर ध्यान दिया और फिर उसे द्रौपदीकी प्राप्ति करानेके लिये उचित उपायका निश्चय करके उसने सूतसे कहा--
Vaiśampāyana said: Thus addressed, the wicked-souled Kīcaka spoke to his sister. The narrative turns from Sudeshnā’s protective, dharma-minded warning to Kīcaka’s obstinate response, marking the ethical contrast between safeguarding a dependent woman under refuge and the predatory insistence of unchecked desire.
Verse 5
पर्वणि त्वं समुद्दिश्य सुरामन्नं च कारय । तत्रैनां प्रेषयिष्यामि सुराहारीं तवान्तिकम्,“कीचक! तुम किसी पर्व या त्यौहारके दिन अपने घरमें मदिरा तथा अन्न-भोजनकी सामग्री तैयार कराओ। फिर मैं इस सैरन्ध्रीको वहाँसे सुरा ले आनेके बहाने तुम्हारे पास भेजूँगी
Verse 6
तत्र सम्प्रेषितामेनां विजने निरवग्रहे | सान्त्वयेथा यथाकामं सान्त्व्यमाना रमेद् यदि,“वहाँ भेजी हुई इस सेविकाको एकान्तमें, जहाँ कोई विघ्न-बाधा न हो, अपनी इच्छाके अनुसार समझाना-बुझाना। सम्भव है, तुम्हारी सान्त्वना मिलनेपर यह रमणके लिये उद्यत हो जाय”
“There, in a secluded place free from any obstruction, you should speak gently to this maidservant who has been sent to you, consoling and persuading her as you wish. It may be that, once comforted by your words, she will consent to take pleasure (with you).”
Verse 7
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त: स विनिष्क्रम्य भगिन्या वचनात् तदा । सुरामाहारयामास राजार्हा सुपरिष्कृताम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! बहिनके वचनसे इस प्रकार आश्वासन मिलनेपर कीचक उस समय वहाँसे चला गया और घर जाकर उसने यथासमय चतुर रसोइयोंके द्वारा राजाओंके उपयोगमें आने योग्य उत्तम एवं परिष्कृत मदिरा मँगवायी और भाँति-भाँतिके अनेक विशिष्ट और साधारण भरक्ष्य पदार्थ एवं परम उत्तम अन्न-पानकी तैयारी करायी
Vaiśampāyana said: Thus addressed, he went out at that time in accordance with his sister’s words. Returning home, he had brought in, at the proper time, finely prepared liquor fit for a king’s use—arranging, through skilled cooks, an abundance of choice and ordinary delicacies and the best of food and drink.
Verse 8
भक्ष्यांश्व विविधाकारान् बहुंश्वोच्चावचांस्तदा । कारयामास कुशलैरन्नं पानं सुशो भनम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! बहिनके वचनसे इस प्रकार आश्वासन मिलनेपर कीचक उस समय वहाँसे चला गया और घर जाकर उसने यथासमय चतुर रसोइयोंके द्वारा राजाओंके उपयोगमें आने योग्य उत्तम एवं परिष्कृत मदिरा मँगवायी और भाँति-भाँतिके अनेक विशिष्ट और साधारण भरक्ष्य पदार्थ एवं परम उत्तम अन्न-पानकी तैयारी करायी
Vaiśampāyana said: Then Kīcaka had skilled cooks prepare an impressive spread—many kinds of foods in diverse forms, both refined and ordinary—along with excellent provisions of food and drink.
Verse 9
तस्मिन् कृते तदा देवी कीचकेनोपमन्त्रिता । उसकी व्यवस्था हो जानेपर कीचकने सुदेष्णाको भोजनके लिये आमन्त्रित किया ।। ८ हे || हे (त्वरावान् कालपाशेन कण्ठे बद्ध: पशुर्यथा । नावबुध्यत मूढात्मा मरणं समुपस्थितम् ।। मूढात्मा कीचक कण्ठमें कालपाशसे बँधे हुए पशुकी भाँति अपने निकट आयी हुई मृत्युको नहीं जान पाता था। वह द्रौपदीको पानेके लिये उतावला हो रहा था। कीचक उवाच मधु मद्य॑ बहुविध॑ भक्ष्याश्व विविधा: कृता: । सुदेष्णे ब्रूहि सैरन्ध्री यथा सा मे गृहं व्रजेत् ।। कीचक बोला--सुदेष्णे! मैंने नाना प्रकारकी मीठी मदिरा मँगा ली है और विविध प्रकारकी रसोई भी तैयार कर ली है। अब तुम सैरन्ध्रीसे कह दो, जिससे वह मेरे घरमें पधारे। केनचित् त्वद्य कार्येण त्वर शीघ्रं मम प्रियम् ।। अहं हि शरण देवं प्रपद्ये वृषभध्वजम् । समागमं मे सैरन्ध्रया मरणं वा दिशेति वै ।। किसी कामके बहाने उसे जल्दी मेरे यहाँ भेजो। मेरा प्रिय कार्य सिद्ध करनेमें शीघ्रता करो। मैं भगवान् शंकरकी शरण लेकर यह प्रार्थना करता हूँ कि प्रभो! मुझे सैरन्ध्रीसे मिला दो अथवा मृत्यु प्रदान करो। वैशम्पायन उवाच सा तमाह विनि:श्वस्य प्रतिगच्छ स्वकं गृहम् । एषाहमपि सैरन्ध्रीं सुरार्थे तूर्णमादिशे ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब सुदेष्णा लंबी साँस खींचकर उससे बोली --'तुम अपने घर लौट जाओ । मैं सैरन्ध्रीको शीघ्र ही वहाँसे मदिरा ले आनेके लिये आज्ञा देती हूँ! । एवमुक्तस्तु पापात्मा कीचकस्त्वरित: पुनः । स्वगृहं प्राविशत् तूर्ण सैरन्ध्रीगतमानस: ।।) उसके ऐसा कहनेपर सैरन्ध्रीका चिन्तन करता हुआ पापात्मा कीचक फिर तुरंत ही अपने घरको लौट गया। सुदेष्णा प्रेषयामास सैरन्ध्रीं कीचकालयम्,तब सुदेष्णाने सैरन्ध्रीको कीचकके घर जानेके लिये कहा
Vaiśampāyana said: When these arrangements had been made, Queen Sudeṣṇā—having been importuned by Kīcaka—sent the maid Sairandhrī to Kīcaka’s residence.
Verse 10
सुदेष्णोवाच उत्तिष्ठ गच्छ सैरन्ध्रि कीचकस्य निवेशनम् । पानमानय कल्याणि पिपासा मां प्रबाधते,सुदेष्णा बोली--सैरन्ध्री! उठो और कीचकके घर जाओ। कल्याणी! मुझे प्यास विशेष कष्ट दे रही है; अतः वहाँसे मेरे पीने योग्य रस ले आओ
Sudeṣṇā said: “Rise, Sairandhrī, and go to Kīcaka’s residence. Auspicious one, thirst is troubling me greatly; therefore bring me a drink fit for my use from there.”
Verse 11
सैरन्ध्रीने कहा--राजकुमारी! मैं उसके घर नहीं जा सकती। महारानी! आप तो जानती ही हैं कि वह कैसा निर्लज्ज है
Sairandhrī said, “Princess, I cannot go to his house. O great queen, you already know what kind of shameless man he is.”
Verse 12
न चाहमनवलद्याड्ि तव वेश्मनि भामिनि । कामवृत्ता भविष्यामि पतीनां व्यभिचारिणी,निर्दोष अंगोंवाली देवि! मैं आपके महलमें अपने पतियोंकी दृष्टिमें व्यभिचारिणी और स्वेच्छाचारिणी होकर नहीं रहूँगी
Vaiśampāyana said: “O passionate lady, I will not remain in your palace in a way that would make me appear blameworthy. I will not become a woman of self-willed desire, nor one who is seen as unfaithful to her husbands.”
Verse 13
सैरन्ध्युवाच न गच्छेयमहं तस्य राजपुत्रि निवेशनम् । त्वमेव राज्ञि जानासि यथा स निरपत्रप:,त्वं चैव देवि जानासि यथा स समय: कृत: । प्रविशन्त्या मया पूर्व तव वेश्मनि भामिनि भामिनि! देवि! पहले आपके इस राजभवनमें प्रवेश करते समय मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे भी आप जानती ही हैं
Sairandhrī said: “O princess, I should not go to that prince’s dwelling. You yourself, O queen, know how shameless he is; and you too, O lady, know the agreement and the appointed time. When I first entered your palace, O passionate one, you also knew the vow I then made.”
Verse 14
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें कीचक-द्रीपदी- संवादविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ,कीचकस्तु सुकेशान्ते मूढो मदनदर्पित: । सो<वमंस्यति मां दृष्टवा न यास्ये तत्र शोभने कमनीय केशोंवाली सुन्दरी! मूर्ख कीचक तो काम-मदसे उन्मत्त हो रहा है। वह मुझे देखते ही अपमानित कर बैठेगा। इसलिये मैं वहाँ नहीं जाऊँगी
“But Kīcaka—bewildered and swollen with the pride of desire—will insult me the moment he sees me. Therefore, O beautiful one with lovely hair, I will not go there.”
Verse 15
सन्ति बह्नयस्तव प्रेष्या राजपुत्रि वशानुगा: । अन्यां प्रेषय भद्रें ते स हि मामवमंस्यते,इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीसुराहरणे पठचदशो<ध्याय:
Vaiśampāyana said: “O princess, you have many maidservants who obey your will. Send someone else; for if you send me, he will surely insult and demean me.”
Verse 16
राजपुत्री! आपके अधीन तो और भी बहुत-सी दासियाँ हैं; उन्हींमेंसे किसी दूसरीको भेज दीजिये। आपका कल्याण हो। मेरे जानेसे कीचक मेरा अपमान करेगा ।। सुदेष्णोवाच नैव त्वां जातु हिंस्पात् स इत: सम्प्रेषितां मया । इत्युक्त्वा प्रददौ पात्र॑ं सपिधानं हिरण्मयम्,सुदेष्णा बोली--शुभे! मैंने तुम्हें यहाँसे भेजा है, अतः वह कभी तुम्हें कष्ट नहीं देगा। यह कहकर सुदेष्णाने द्रौपदीके हाथमें ठक्कनसहित एक सुवर्णमय पात्र दे दिया
“Princess, you have many other maidservants under your authority; send some other woman from among them. May good befall you. If I go, Kīcaka will insult and dishonor me.” Sudeṣṇā replied, “Since I am the one sending you from here, he will never harm you.” Having said this, Sudeṣṇā placed in Draupadī’s hand a golden vessel with a lid.
Verse 17
सा शड्कमाना रुदती दैवं शरणमीयुषी । प्रातिष्ठत सुराहारी कीचकस्य निवेशनम्,द्रौपदी मदिरा लानेके लिये उस पात्रको लेकर शंकित हो रोती हुई कीचकके घरकी ओर चली और अपने सतीत्वकी रक्षाके लिये मन-ही-मन भगवान् सूर्यकी शरणमें गयी
Weeping in fear and doubt, Draupadī—bearing the vessel for liquor—set out toward Kīcaka’s residence. Seeking to safeguard her chastity and honor, she inwardly took refuge in the divine, fixing her mind on Sūrya as her protector.
Verse 18
सैरन्ध्युवाच यथाहमन्यं भर्तृभ्यो नाभिजानामि कंचन । तेन सत्येन मां प्राप्तां मा कुर्यात् कीचको वशे,सैरन्ध्रीने कहा--भगवन्! यदि मैं अपने पतियोंके सिवा दूसरे किसी पुरुषको मनमें नहीं लाती, तो इस सत्यके प्रभावसे कीचक अपने घरमें आयी हुई मुझ अबलाको अपने वशमें न कर सके
Sairandhrī said: “Just as I acknowledge no man other than my husbands, by the power of that truth may Kīcaka not bring me—who have come here—under his control.”
Verse 19
वैशम्पायन उवाच उपातिष्ठत सा सूर्य मुहूर्तमबला ततः । स तस्यास्तनुमध्याया: सर्व सूर्योडवबुद्धवान्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! सब प्रकारके बलसे रहित द्रौपदी दो घड़ीतक भगवान् सूर्यकी उपासना करती रही। तदनन्तर श्रीसूर्यदेवने पतले कटिभागवाली द्रपदकुमारीकी सारी परिस्थिति समझ ली और उसकी रक्षाके लिये अदृश्यरूपसे एक राक्षसको नियुक्त कर दिया। वह राक्षस किसी भी अवस्थामें सती-साध्वी द्रौपदीको वहाँ असहाय नहीं छोड़ता था
Vaiśampāyana said: Then the helpless Draupadī worshipped the Sun for a while. Thereafter the Sun-god fully understood the entire situation of the slender-waisted princess of Drupada and, for her protection, appointed an unseen rākṣasa as her guardian—one who would never leave the chaste and virtuous Draupadī there without support in any circumstance.
Verse 20
अन्तर्हितं ततस्तस्या रक्षो रक्षार्थमादिशत् । तच्चैनां नाजहात् तत्र सर्वावस्थास्वनिन्दिताम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! सब प्रकारके बलसे रहित द्रौपदी दो घड़ीतक भगवान् सूर्यकी उपासना करती रही। तदनन्तर श्रीसूर्यदेवने पतले कटिभागवाली द्रपदकुमारीकी सारी परिस्थिति समझ ली और उसकी रक्षाके लिये अदृश्यरूपसे एक राक्षसको नियुक्त कर दिया। वह राक्षस किसी भी अवस्थामें सती-साध्वी द्रौपदीको वहाँ असहाय नहीं छोड़ता था
Vaiśaṃpāyana said: Then, remaining unseen, he appointed a rākṣasa to protect her. And there, in every circumstance, that guardian did not abandon her—the blameless Draupadī.
Verse 21
तां मृगीमिव संत्रस्तां दृष्टवा कृष्णां समीपगाम् | उदतिष्ठन्मुदा सूतो नावं लब्ध्वेव पारग:,डरी हुई हरिणीकी भाँति भयभीत द्रौपदीको समीप आयी देख सूत कीचक आनन्दमें भरकर खड़ा हो गया; मानो नदीके पार जानेवाला पथिक नौका पाकर प्रसन्न हो गया हो
Vaiśampāyana said: Seeing Kṛṣṇā (Draupadī) approach, frightened like a startled doe, the sūta Kīcaka rose up in delight—like a traveler eager to cross who rejoices on finding a boat.
The dilemma is whether immediate punitive action against Kīcaka is justified when it could expose the Pandavas’ identities and violate the concealment vow, potentially endangering collective survival and future justice.
The chapter illustrates that dharma can require calibrated response: public protest and documentation of injustice may coexist with temporary restraint, when timing and larger obligations determine the ethically effective course.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s significance is contextual—its narrative function is to intensify moral pressure, expose institutional failure, and prepare the conditions for subsequent corrective action within the Virāṭa-parva arc.