(सुदेष्णोवाच शरणागतेयं सुश्रोणी मया दत्ताभया च सा । शुभाचारा च १द्रं ते नैनां वक्तुमिहोत्सहे ।। सुदेष्णा बोली--भाई! यह सुन्दरी सैरन्ध्री मेरी शरणमें आयी है। इसे मैंने अभय दे रखा है। तुम्हारा कल्याण हो। यह बड़ी सदाचारिणी है। मैं इससे तुम्हारी मनोगत बात नहीं कह सकती। नैषा शक््या हि चान्येन स्प्रष्टं पापेन चेतसा । गन्धर्वा: किल पज्चैनां रक्षन्ति रमयन्ति च ।। इसे कोई भी दूसरा पुरुष मनमें दूषित भाव लेकर नहीं छू सकता। सुनती हूँ, पाँच गन्धर्व इसकी रक्षा करते हैं और इसे सुख पहुँचाते हैं। एवमेषा ममाचष्टे तथा प्रथमसंगमे । तथैव गजनासोरु: सत्यमाह ममान्तिके ।। ते हि कुद्धा महात्मानो नाशयेयुरह्हि जीवितम् । इसने यह बात मुझसे उसी समय जब कि मेरी इससे पहले-पहल भेंट हुई थी, बता दी थी। इसी प्रकार हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली इस सुन्दरीने मेरे निकट यह सत्य ही कहा है कि यदि किसीने मेरा अपमान किया, तो मेरे महात्मा पति कुपित होकर उसके जीवनको ही नष्ट कर देंगे। राजा चैव समीक्ष्यैनां सम्मोहं गतवानिह ।। मया च सत्यवचनैरनुनीतो महीपति: । राजा भी इसे यहाँ देखकर मोहित हो गये थे, तब मैंने इसकी कही हुई सच्ची बातें बताकर उन्हें किसी प्रकार समझा-बुझाकर शान्त किया। सो<प्येनामनिशं दृष्टवा मनसैवाभ्यनन्दत ।। भयाद् गन्धर्वमुख्यानां जीवितस्योपघातिनाम् | मनसापि ततत्त्वेनां न चिन्तयति पार्थिव: ।। तबसे वे भी सदा इसे देखकर मन-ही-मन इसका अभिनन्दन करते हैं। जीवनका विनाश करनेवाले जन श्रेष्ठ गन्धर्वोके भयसे महाराज कभी मनसे भी इसका चिन्तन नहीं करते हैं। ते हि क्रुद्धा महात्मानो गरुडानिलतेजस: । दहेयुरपि लोकांस्त्रीन् युगान्तेष्विव भास्करा: ।। वे महात्मा गन्धर्व गरुड़ और वायुके समान तेजस्वी हैं। वे कुपित होनेपर प्रलयकालके सूर्चोकी भाँति तीनों लोकोंको दग्ध कर सकते हैं। सैरन्ध्रया होतदाख्यातं मम तेषां महद् बलम् | तव चाहमिदं गुहूं स्नेहादाख्यामि बन्धुवत् ।। सैरन्ध्रीने स्वयं ही मुझसे उनके महान् बलका परिचय दिया है। भ्रातृस्नेहके कारण मैंने तुमसे यह गोपनीय बात भी बता दी है। मा गमिष्यसि वै कृच्छां गतिं परमदुर्गमाम् । बलिनस्ते रुजं कुर्यु: कुलस्थ च धनस्य च ।। इसे ध्यानमें रखनेसे तुम अत्यन्त दुःखदायिनी संकटपूर्ण परिस्थितिमें नहीं पड़ोगे। गन्धर्वलोग बलवान हैं। वे तुम्हारे कुल और सम्पत्तिका भी नाश कर सकते हैं। तस्मान्नास्यां मन: कर्तु यदि प्राणा: प्रियास्तव । मा चिन्तयेथा मा गास्त्व॑ मत्प्रियं च यदीच्छसि ।। इसलिये यदि तुम्हें अपने प्राण प्रिय हैं और यदि तुम मेरा भी प्रिय करना चाहते हो तो इस सैरन्ध्रीमें मम न लगाओ। उसका चिन्तन छोड़ दो और उसके पास कभी न जाओ। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु दुष्टात्मा भगिनीं कीचकोडब्रवीत् । वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! सुदेष्णाके ऐसा कहनेपर दुष्टात्मा कीचक अपनी बहिनसे बोला। कीचक उवाच गन्धर्वाणां शतं वापि सहस्रमयुतानि वा ।। अहमेको हनिष्यामि गन्धर्वान् पज्च कि पुनः । कीचकने कहा--बहिन! मैं सैकड़ों, सहस्रों तथा अयुत गन्धर्वोकोी भी अकेला ही मार गिराऊँगा, फिर पाँचकी तो बात ही क्या है?। वैशग्पायन उवाच एवमुक्ता सुदेष्णा तु शोकेनाभिप्रपीडिता ।। अहो दुःखमहो कृच्छुमहो पापमिति सम ह । प्रारुदद् भृशदुःखार्ता विपाकं तस्य वीक्ष्य सा ।। पातालेषु पतत्येष विलपन् वडवामुखे । वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! कीचकके ऐसा कहनेपर सुदेष्णा शोकसे अत्यन्त व्यथित हो उठी और मन-ही-मन कहने लगी--“अहो! यह महान् दुःख, महान् संकट और महान् पापकी बात हो रही है।' इस कर्मके भावी परिणामपर दृष्टिपात करके वह अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रोने लगी और मन-ही-मन बोली--'मेरा यह भाई तो ऊटपटाँग बातें बोलकर स्वयं ही पाताल अथवा बडवानलके मुखमें गिर रहा है'। (तत्पश्चात् वह कीचकको सुनाकर कहने लगी--) त्वत्कृते विनशिष्यन्ति भ्रातर: सुहृदश्न मे ।। कि नु शक््यं मया कर्तु यत् त्वमेवमभिप्लुत: । न च श्रेयोडभिजानीषे काममेवानुवर्तसे ।। “मैं देखती हूँ; तेरे कारण मेरे सभी भाई और सुहृद् नष्ट हो जायँगे। तू ऐसी अनुचित इच्छाको अपने मनमें स्थान दे रहा है; मैं इसके लिये क्या कर सकती हूँ? अपनी भलाई किस बातमें है, यह तू नहीं समझता है और केवल कामका ही गुलाम हो रहा है। ध्रुवं गतायुस्त्वं पाप यदेवं काममोहित: । अकर्तव्ये हि मां पापे नियुनड्क्षि नराधम ।। 'पापी! निश्चय ही तेरी आयु समाप्त हो गयी है; तभी तू इस प्रकार कामसे मोहित हो रहा है। नराधम! तू मुझे ऐसे पापपूर्ण कार्यमें लगा रहा है, जो कदापि करने योग्य नहीं है। अपि चैतत् पुरा प्रोक्तं निपुणैर्मनुजोत्तमै: । एकस्तु कुरुते पापं स्वजातिस्तेन हन्यते ।। 'प्राचीनकालके श्रेष्ठ एवं कुशल मनुष्योंने यह ठीक ही कहा है कि कुलमें एक मनुष्य पाप करता है और उसके कारण सभी जाति-भाई मारे जाते हैं। गतस्त्वं धर्मराजस्य विषयं नात्र संशय: । अदूषकमिमं सर्व स्वजनं घातयिष्यसि ।। 'तू यमराजके लोकमें गया हुआ ही है, इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं रह गया है। तू अपने साथ इन समस्त निरपराध स्वजनोंको भी मरवा डालेगा। एतत् तु मे दुःखतरं येनाहं भ्रातृसौहदात् | विदितार्था करिष्यामि तुष्टो भव कुलक्षयात् ।।) “मेरे लिये सबसे महान् दुःखकी बात यह है कि मैं सारे परिणामोंको समझ-बूझकर भी भ्रातृ-स्नेहके कारण तेरी आज्ञाका पालन करूँगी। तू अपने कुलका संहार करके संतुष्ट हो ले'। स्वमन्त्रमभिसंधाय तस्यार्थमनुचिन्त्य च । उद्योगं चैव कृष्णाया: सुदेष्णा सूतमब्रवीत्,तदनन्तर सुदेष्णाने अपने कार्यका विचार करके कीचकके मनोभावपर ध्यान दिया और फिर उसे द्रौपदीकी प्राप्ति करानेके लिये उचित उपायका निश्चय करके उसने सूतसे कहा--
vaiśampāyana uvāca |
evam uktas tu duṣṭātmā bhaginīṁ kīcako 'bravīt ||
Vaiśampāyana said: Thus addressed, the wicked-souled Kīcaka spoke to his sister. The narrative turns from Sudeshnā’s protective, dharma-minded warning to Kīcaka’s obstinate response, marking the ethical contrast between safeguarding a dependent woman under refuge and the predatory insistence of unchecked desire.
वैशग्पायन उवाच
The verse signals an ethical polarity: a guardian’s duty to protect one who has sought refuge versus the moral corruption of one driven by desire and power. By labeling Kīcaka as duṣṭātmā, the text frames his forthcoming speech and actions as adharma, warning that refusal to heed righteous counsel leads to ruin.
After Sudeshnā warns Kīcaka not to pursue the Sairandhrī (Draupadī in disguise) and emphasizes the danger and impropriety, the narrator states that Kīcaka—described as wicked-minded—responds to his sister. This line introduces Kīcaka’s defiant reply and escalates the conflict.