अध्याय १५ — कीचकस्य अत्याचारः, द्रौपद्याः सभाशरणगमनम्
Kīcaka’s coercion and Draupadī’s appeal in the assembly
वैशम्पायन उवाच तस्य सा बहुश: श्रुत्वा वाचं विलपतस्तदा । विराटमहिषी देवी कृपां चक्रे मनस्विनी,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार बारंबार विलाप करते हुए कीचककी बात सुनकर उस समय राजा विराटकी मनस्विनी महारानी सुदेष्णाके मनमें उसके प्रति दयाभाव प्रकट हो गया
वैशम्पायन उवाच