
Nirmaryāda-saṃgrāma-varṇana — The Unbounded Clash and Bhīṣma’s Rallying Presence
Upa-parva: Bhīṣmābhiṣeka (Bhīṣma’s Command and Early War Reports)
Saṃjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that the engagement becomes ‘nirmaryāda’—without customary limits—because recognition fails amid rapid, dispersed encounters. Combatants strike without identifying kin: father and son, brothers, maternal uncles and nephews, and friends collide as if possessed by the momentum of battle. The chapter offers a technical panorama of combined arms: chariot units interlock and jam; elephants collide, gore, and trumpet; cavalry charges and exchanges missiles; spears, arrows, and swords cut through bodies and armor; foot-guards around elephants fight with axes, clubs, and blades. The sensory register is emphasized—tumult, cries likened to the dead, blood-soaked ground, thirst and exhaustion, and the persistence of hardened fighters who do not withdraw. The sequence culminates in a command-focused pivot: as fear and disorder spread, the Pāṇḍava host trembles upon encountering Bhīṣma, who is described with a prominent standard (five-star emblem and a tall palm-banner), shining like the moon beside Meru—an image of symbolic centrality and operational intimidation.
Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के रण-कोलाहल के बीच श्रीकृष्ण अर्जुन के भीतर उठती नैतिक उलझन को एक तीखे दर्पण में बदल देते हैं—‘भोक्ता’ कौन है, और कर्म का वास्तविक आधार क्या है? → भगवान् दैवी-सम्पदा के गुणों को क्रमशः उजागर करते हैं—अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, दया, मार्दव, अचापल—और संकेत देते हैं कि युद्धभूमि में भी मन-वाणी-शरीर की शुद्धि ही भीतर की विजय है। इसके समानान्तर वे नास्तिक/आसुरी प्रवृत्ति के स्वभाव पर प्रश्न उठाते हैं: ऐसे मतों को मानने वालों का आचरण कैसा होता है? → आसुरी वृत्ति का निर्णायक चित्रण सामने आता है—‘अनेकचित्तविभ्रान्ता… कामभोगेषु प्रसक्ता… नरकेऽशुचौ पतन्ति’ तथा ‘अहंकार-बल-दर्प-काम-क्रोध’ में आश्रित होकर दूसरों से द्वेष करने वाले। फिर तीन ‘तमोद्वार’ (नरक के द्वार) का निष्कर्षात्मक उद्घोष—इनसे मुक्त होकर ही मनुष्य श्रेय और परमगति की ओर बढ़ता है। → अध्याय का उपसंहार शास्त्र-प्रमाण पर टिकता है—कार्य-अकार्य की व्यवस्था में शास्त्र ही मानक है; शास्त्रविधान जानकर ही कर्म करना चाहिए। इस प्रकार अर्जुन के लिए आचरण का स्पष्ट मानदण्ड स्थापित होता है: दैवी गुणों का आश्रय, आसुरी द्वारों का त्याग, और शास्त्रानुसार कर्म। → शास्त्र-विधि को मानक मान लेने के बाद अगला प्रश्न स्वाभाविक बनता है—यदि कोई शास्त्र को छोड़कर अपनी इच्छा/मान्यता से कर्म करे तो उसकी गति क्या होगी? (अगले अध्याय की ओर संकेत)
Verse 1
४) अर्थात् “मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे युक्त आत्माको ही ज्ञानीजन भोक्ता--ऐसा कहते हैं।' ८. ज्ञानीजन शरीर छोड़कर जाते समय, शरीरमें रहते समय और विषयोंका उपभोग करते समय हरेक अवस्थामें ही वह आत्मा वास्तवमें प्रकृतिसे सर्वधा अतीत, शुद्ध, बोधस्वरूप और असंग ही है--ऐसा समझते हैं। १. जिनका अन्तःकरण शुद्ध है और अपने वशमें है तथा जो आत्मस्वरूपको जाननेके लिये निरन्तर श्रवण, मनन और निदिध्यासनादि प्रयत्न करते रहते हैं, ऐसे उच्चकोटिके साधक ही “यत्न करनेवाले योगीजन' हैं तथा जिस जीवात्माका प्रकरण चल रहा है और जो शरीरके सम्बन्धसे हृदयमें स्थित कहा जाता है, उसके नित्य-शुद्ध-विज्ञानानन्दमय वास्तविक स्वरूपको यथार्थ जान लेना ही उनका “इस आत्माको तत्त्वसे जानना है। २. जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है अर्थात् न तो निष्काम कर्म आदिके द्वारा जिनके अन्तःकरणका मल सर्वथा धुल गया है एवं न जिन्होंने भक्ति आदिके द्वारा चित्तको स्थिर करनेका ही कभी समुचित अभ्यास किया है, ऐसे मलिन और विक्षिप्त अन्तःकरणवाले पुरुषोंको “अकृतात्मा” कहते हैं। ऐसे मनुष्य अपने अन्तःकरणको शुद्ध बनानेकी चेष्टा न करके यदि केवल उस आत्माको जाननेके लिये शास्त्रालोचनरूप प्रयत्न करते रहें तो भी उसके तत्त्वको नहीं समझ सकते। 3. सूर्य, चन्द्रमा और अग्निमें स्थित समस्त तेजको अपना तेज बतलाकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि उन तीनोंमें और वे जिनके देवता हैं--ऐसे नेत्र, मन और वाणीमें वस्तुको प्रकाशित करनेकी जो कुछ भी शक्ति है--वह मेरे ही तेजका एक अंश है। इसीलिये छठे श्लोकमें भगवानने कहा है कि सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि--ये सब मेरे स्वरूपको प्रकाशित करनेमें समर्थ नहीं हैं। ४. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि इस पृथ्वीमें जो भूतोंको धारण करनेकी शक्ति प्रतीत होती है तथा इसी प्रकार और किसीमें जो धारण करनेकी शक्ति है, वह वास्तवमें उसकी नहीं, मेरी ही शक्तिका एक अंश है। अतएव मैं स्वयं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपने बलसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ। ५. “ओषधि:' शब्द पत्र, पुष्प और फल आदि समस्त अंग-प्रत्यंगोंके सहित वृक्ष, लता और तृण आदि जिनके भेद हैं--ऐसी समस्त वनस्पतियोंका वाचक है तथा “मैं ही चन्द्रमा बनकर समस्त ओषधियोंका पोषण करता हूँ इससे भगवानने यह दिखलाया है कि जिस प्रकार चन्द्रमामें प्रकाशनशक्ति मेरे ही प्रकाशका अंश है, उसी प्रकार जो उसमें पोषण करनेकी शक्ति है, वह भी मेरी ही शक्तिका एक अंश है; अतएव मैं ही चन्द्रमाके रूपमें प्रकट होकर सबका पोषण करता हूँ। ६. यहाँ भगवान् यह बतला रहे हैं कि जिस प्रकार अग्निकी प्रकाशनशक्ति मेरे ही तेजका अंश है, उसी प्रकार उसका जो उष्णत्व है अर्थात् उसकी जो पाचन, दीपन करनेकी शक्ति है, वह भी मेरी ही शक्तिका अंश है। अतएव मैं ही प्राण और अपानसे संयुक्त प्राणियोंके शरीरमें निवास करनेवाले वैश्वानर अग्निके रूपमें भक्ष्य, भोज्य, लेह् और चोष्य पदार्थोंको अर्थात् दाँतोंसे चबाकर खाये जानेवाले रोटी, भात आदि; निगलकर खाये जानेवाले रबड़ी, दूध, पानी आदि; चाटकर खाये जानेवाले शहद, चटनी आदि और चूसकर खाये जानेवाले ऊख आदि--ऐसे चार प्रकारके भोजनको पचाता हूँ। $. पहले देखी-सुनी या किसी प्रकार भी अनुभव की हुई वस्तु या घटनादिके स्मरणका नाम “स्मृति” है। किसी भी वस्तुको यथार्थ जान लेनेकी शक्तिका नाम "ज्ञान है तथा संशय, विपर्यय आदि वितर्क-चालका वाचक “ऊहन' है और उसके दूर होनेका नाम “अपोहन' है। ये तीनों मुझसे ही होते हैं, यह कहकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि सबके हृदयमें स्थित मैं अन्तर्यामी परमेश्वर ही सब प्राणियोंके कर्मानुसार उपर्युक्त स्मृति, ज्ञान और अपोहन आदि भावोंको उनके अन्तःकरणमें उत्पन्न करता हूँ। २. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि वेदोंमें कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्डात्मक जितने भी वर्णन हैं, उन सबका अन्तिम लक्ष्य संसारमें वैराग्य उत्पन्न करके सब प्रकारके अधिकारियोंको मेरा ही ज्ञान करा देना है। अतएव उनके द्वारा जो मनुष्य मेरे स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करते हैं, वे ही वेदोंके अर्थको ठीक समझते हैं। इसके विपरीत जो लोग सांसारिक भोगोंमें फँसे रहते हैं, वे उनके अर्थकों ठीक नहीं समझते। 3. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि वेदोंमें प्रतीत होनेवाले विरोधोंका वास्तविक समन्वय करके मनुष्यको शान्ति प्रदान करनेवाला मैं ही हूँ। ४. जिन दोनों तत्त्वोंका वर्णन गीताके सातवें अध्यायमें 'अपरा” और “परा' प्रकृतिके नामसे (७।४, ५), आठवें अध्यायमें 'अधिभूत” और “अध्यात्म” के नामसे (८।४, ३), तेरहवें अध्यायमें 'क्षेत्र” और '“क्षेत्रज्" के नामसे (१३।१) और इस अध्यायमें पहले “अश्वत्थ” और “जीव” के नामसे किया गया है, उनमेंसे एकको क्ष” और दूसरेको “अक्षर कहकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि दोनों परस्पर अत्यन्त विलक्षण हैं; क्योंकि 'भूतानि” पद यहाँ समस्त जीवोंके स्थूल, सूक्ष्म और कारण--तीनों प्रकारके शरीरोंका वाचक है और “कूटस्थ' शब्द यहाँ समस्त शरीरोंमें रहनेवाले आत्माका वाचक है। यह सदा एक-सा रहता है, इसमें परिवर्तन नहीं होता; इसलिये इसे “कूटस्थ” कहते हैं और इसका कभी किसी अवस्थामें क्षय, नाश या अभाव नहीं होता; इसलिये यह अक्षर है। ५. “उत्तम पुरुष' नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सर्वशक्तिमान्, परमदयालु, सर्वगुणसम्पन्न पुरुषोत्तम भगवान्का वाचक है, वह पूर्वोक्त क्षर और अक्षर दोनों पुरुषोंसे विलक्षण और अत्यन्त श्रेष्ठ है। ६. जो तीनों लोकोंमें प्रविष्ट रहकर उनके नाश होनेपर भी कभी नष्ट नहीं होता, सदा ही निर्विकार, एकरस रहता है तथा जो क्षर और अक्षर--इन दोनोंका नियामक और स्वामी तथा सर्वशक्तिमान् ईश्वर है एवं जो गुणातीत, शुद्ध और सबका आत्मा है--वही परमात्मा पुरुषोत्तम” है। क्षर, अक्षर और ईश्वर--इन तीनों तत्त्वोंका वर्णन श्वैताश्वतरोपनिषद्में इस प्रकार आया है-- क्षरं प्रधानममृताक्षरं हर: क्षरात्मानावीशते देव एक: । (१।१०) “प्रधान यानी प्रकृतिका नाम क्षर है और उसके भोक्ता अविनाशी आत्माका नाम अक्षर है। प्रकृति और आत्मा--इन दोनोंका शासन एक देव (पुरुषोत्तम) करता है।' ३. अपनेको “क्षर' पुरुषसे अतीत बतलाकर भगवानने यह दिखलाया है कि मैं क्षर पुरुषसे सर्वथा सबन्धरहित और अतीत हूँ। अक्षरसे अपनेको उत्तम बतलाकर यह भाव दिखलाया है कि क्षर पुरुषकी भाँति अक्षरसे मैं अतीत तो नहीं हूँ; क्योंकि वह मेरा ही अंश होनेके कारण अविनाशी और चेतन है; किंतु उससे मैं उत्तम अवश्य हूँ; क्योंकि वह अलपज्ञ है, मैं सर्वज्ञ हूँ; वह नियम्य है, मैं नियामक हूँ; वह मेरा उपासक है, मैं उसका स्वामी उपास्यदेव हूँ और वह अल्पशक्तिसम्पन्न है, मैं सर्वशक्तिमान् हूँ; अतएव उसकी अपेक्षा मैं सब प्रकारसे उत्तम हूँ। २. जिसका ज्ञान संशय, विपर्यय आदि दोषोंसे शून्य हो, जिसमें मोहका जरा भी अंश न हो, उसे “असम्मूढ” कहते हैं। 3. इस अध्यायमें क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम--इस प्रकार तीन भागोंमें विभक्त करके समस्त पदार्थोंका वर्णन किया गया है। अतएव जो क्षर और अक्षर दोनोंके यथार्थ स्वरूपको समझकर उनसे भी अत्यन्त उत्तम पुरुषोत्तमके तत्त्वको जानता है, वही “सर्वविद्" है। ४. इस कथनसे भगवानने यह बतलाया है कि मुझ सर्वशक्तिमान्ू, सर्वाधार, समस्त जगत्का सृजन, पालन और संहार आदि करनेवाले, सबके परम सुहृद् सबके एकमात्र नियन्ता, सर्वगुणसम्पन्न, परम दयालु, परम प्रेमी, सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापी परमेश्वरको उपर्युक्त दो श्लोकोंमें वर्णित प्रकारसे क्षर और अक्षर दोनों पुरुषोंसे उत्तम निर्गुण-सगुण--गुणातीत और सर्वगुणसम्पन्न साकार-निराकार, व्यक्ताव्यक्तस्वरूप परम पुरुष मान लेना ही मुझको “पुरुषोत्तम” जानना है। ५. भगवान्को पुरुषोत्तम समझनेवाले पुरुषका जो समस्त जगत्से प्रेम हटाकर केवलमात्र परम प्रेमास्पद एक परमेश्वरमें ही पूर्ण प्रेम करना; एवं बुद्धिसे भगवानके गुण, प्रभाव, तत्त्व, रहस्य, लीला, स्वरूप और महिमापर पूर्ण विश्वास करना; उनके नाम, गुण, प्रभाव, चरित्र और स्वरूप आदिका श्रद्धा और प्रेमपूर्वक मनसे चिन्तन करना, कानोंसे श्रवण करना, वाणीसे कीर्तन करना, नेत्रोंसे दर्शन करना एवं उनकी आज्ञाके अनुसार सब कुछ उनका समझकर तथा सबमें उनको व्याप्त समझकर कर्तव्यकर्मोद्वारा सबको सुख पहुँचाते हुए उनकी सेवा आदि करना है--यही भगवान्को सब प्रकारसे भजना है। ६. इसे गुह्मतम बतलाकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि इस अध्यायमें मुझ सगुण परमेश्वरके गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यकी बात प्रधानतासे कही गयी है; इसलिये यह अतिशय गुप्त रखनेयोग्य है। मैं हर किसीके सामने इस प्रकारसे अपने गुण, प्रभाव, तत्त्व और ऐश्वर्यकी प्रकट नहीं करता; अतएव तुम्हें भी अपात्रके सामने इस रहस्यको नहीं कहना चाहिये। ७. भगवानने अर्जुनको यहाँ “अनघ' नामसे सम्बोधित करके यह भाव दिखलाया है कि तुम्हारे अंदर पाप नहीं है, तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध और निर्मल है, अतः तुम मेरे इस गुह्मतम उपदेशको सुनने और धारण करनेके पात्र हो। ३. इस अध्यायमें वर्णित भगवानके गुण, प्रभाव, तत्व और स्वरूप आदिको भलीभाँति समझकर भगवानको पूर्वोक्त प्रकारसे साक्षात् पुरुषोत्तम समझ लेना ही इस शास्त्रको तत्त्वसे जानना है तथा उसे जाननेवालेका जो उस पुरुषोत्तम भगवानको अपरोक्षभावसे प्राप्त कर लेना है, यही उसका बुद्धिमान् अर्थात् ज्ञानवान् हो जाना है और समस्त कर्तव्योंको पूर्ण कर चुकना--सबके फलको प्राप्त हो जाना ही कृतकृत्य हो जाना है। चत्वारिंशो< ध्याय: (श्रीमद्भधगवद्गीतायां षोडशो<ध्याय:) फलसहित दैवी और आसुरी सम्पदाका वर्णन तथा शास्त्रविपरीत आचरणोंको त्यागने और शास्त्रके अनुकूल आचरण करनेके लिये प्रेरणा सम्बन्ध-- गीताके सातवें अध्यायके पंद्रहवें *लोकमें तथा नवें अध्यायके ग्यारहवें और बारहवें श्लोकोंमें भगवान्ने कहा था कि 'आयुरी और राक्षसी प्रकृतिको धारण करनेवाले मृढ मेरा भजन नहीं करते, वर॑ं मेरा तिरस्कार करते हैं" तथा नवें अध्यायके तेरहवें और चौदहवें श्लोकोंमें कहा कि दैवी प्रकृतिये युक्त महात्माजन मुझे सब भ्रूतोंका आदि और अविनाशी समझकर अनन्यप्रेमके साथ सब प्रकारसे निरन्तर मेरा भजन करते हैं।” परंतु दूसरा प्रसंग चलता रहनेके कारण वहाँ दैवी प्रकृति और आयुरी प्रकृतिके लक्षणोंका वर्णन नहीं किया जा सका। फिर पंद्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि जो ज्ञानी महात्मा मुझे पुरुषोत्तम” जानते हैं. वे सब प्रकारसे मेरा भजन करते हैं।” इसपर स्वाभाविक ही भगवान्को पुरुषोत्तम जानकर सर्वभावसें उनका भजन करनेवाले दैवी प्रकृतियुक्त महात्मा पुरुषोंके और उनका भजन न करनेवाले आयुरी प्रकृतियुक्त अज्ञानी मनुष्योंके क्या-क्या लक्षण हैं--यह जाननेकी इच्छा होती है। अतएव अब भगवान् दोनोंके लक्षण और स्वभावका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये सोलहवाँ अध्याय आरम्भ करते हैं। इसमें पहले तीन श*लोकोॉरद्वारा दैवी-सम्पद्से युक्त सात्विक पुरुषोंके स्वाभाविक लक्षणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है-- श्रीभगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिरज्ञानयोगव्यवस्थिति: । दान॑ दमश्न यज्ञश्न स्वाध्यायस्तपः आर्जवम्,श्रीभगवान् बोले--भयका सर्वथा अभाव, अन्तःकरणकी पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञानके लिये ध्यानयोगमें निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियोंका दमन, भगवान्, देवता और गुरुजनोंकी पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मोंका आचरण एवं वेद-शास्त्रोंका पठन-पाठन तथा भगवानके नाम और गुणोंका कीर्तन, स्वधर्मपालनके लिये कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियोंके सहित अन्तःकरणकी सरलता
Arjuna said: (The verse heading indicates that Arjuna is the speaker at this point.)
Verse 2
अहिंसा: सत्यमक्रोधस्त्याग:: शान्तिरपैशुनम्र । दयाएँ भूतेष्वलोलुप्त्व॑ मार्दव॑* हवीरचापलम्:,मन, वाणी और शरीरसे किसी प्रकार भी किसीको कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना अपकार करनेवालेपर भी क्रोधका न होना, कर्मोमें कर्तापनके अभिमानका त्याग, अन्तःकरणकी उपरति अर्थात् चित्तकी चंचलताका अभाव, किसीकी भी निन्दादि न करना, सब भूतप्राणियोंमें हेतुरहित दया, इन्द्रियोंका विषयोंके साथ संयोग होनेपर भी उनमें आसक्तिका न होना, कोमलता, लोक और शास्त्रसे विरुद्ध आचरणमें लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओंका अभाव
Arjuna said: Non-violence; truthfulness; freedom from anger; renunciation; inner peace; abstaining from slander; compassion toward all living beings; non-greed (not being drawn into sense-objects even when contact occurs); gentleness; a sense of moral shame at what is contrary to right conduct and scripture; and steadiness without fickle, purposeless activity—these are the marks of ethical discipline that restrain harm and cultivate a dharmic character.
Verse 3
#स्न्मल () अऔमससा ३१. 'मूल” शब्द कारणका वाचक है। इस संसारवृक्षकी उत्पत्ति और इसका विस्तार आदिपुरुष नारायणसे ही हुआ है, यह बात अगले चौथे श्लोकमें और अन्यत्र भी स्थान-स्थानपर कही गयी है। वे आदिपुरुष परमेश्वर नित्य, अनन्त और सबके आधार हैं एवं सगुणरूपसे सबसे ऊपर नित्य-धाममें निवास करते हैं, इसलिये “ऊर्ध्व' नामसे कहे जाते हैं। यह संसारवृक्ष उन्हीं मायापति सर्वशक्तिमान् परमेश्वरसे उत्पन्न हुआ है, इसलिये इसको “ऊर्ध्वमूल” अर्थात् ऊपरकी ओर मूलवाला कहते हैं। अभिप्राय यह है कि अन्य साधारण वृक्षोंका मूल तो नीचे पृथ्वीके अंदर रहा करता है, पर इस संसारवृक्षका मूल ऊपर है--यह बड़ी अलौकिक बात है। २. संसारवृक्षकी उत्पत्तिके समय सबसे पहले ब्रह्माका उद्धव होता है, इस कारण ब्रह्मा ही इसकी प्रधान शाखा हैं। ब्रह्माका लोक आदिपुरुष नारायणके नित्यधामकी अपेक्षा नीचे है एवं ब्रह्माजीका अधिकार भी भगवान्की अपेक्षा नीचा है--ब्रह्मा उन आदिपुरुष नारायणसे ही उत्पन्न होते हैं और उन्हींके शासनमें रहते हैं--इसलिये इस संसारवृक्षको “नीचेकी ओर शाखावाला' कहा है। 3. यद्यपि यह संसारवृक्ष परिवर्तनशील होनेके कारण नाशवान, अनित्य और क्षणभंगुर है, तो भी इसका प्रवाह अनादिकालसे चला आता है, इसके प्रवाहका अन्त भी देखनेमें नहीं आता; इसलिये इसको अव्यय अर्थात् अविनाशी कहते हैं; क्योंकि इसका मूल सर्वशक्तिमान् परमेश्वर नित्य अविनाशी हैं, किंतु वास्तवमें यह संसारवृक्ष अविनाशी नहीं है। यदि यह अव्यय होता तो न तो अगले तीसरे श्लोकमें यह कहा जाता कि इसका जैसा स्वरूप बतलाया गया है, वैसा उपलब्ध नहीं होता और न इसको वैराग्यरूप दृढ़ शस्त्रके द्वारा छेदन करनेके लिये ही कहना बनता। ४. पत्ते वृक्षकी शाखासे उत्पन्न एवं वृक्षकी रक्षा और वृद्धि करनेवाले होते हैं। वेद भी इस संसाररूप वृक्षकी मुख्य शाखारूप ब्रह्मासे प्रकट हुए हैं और वेदविहित कर्मोंसे ही संसारकी वृद्धि और रक्षा होती है, इसलिये वेदोंको पत्तोंका स्थान दिया गया है। ५. इससे यह भाव दिखलाया गया है कि जो मनुष्य मूलसहित इस संसारवृक्षको इस प्रकार तत्त्वसे जानता है कि सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी मायासे उत्पन्न यह संसार वृक्षकी भाँति उत्पत्ति-विनाशशील और क्षणिक है, अतएव इसकी चमक-दमकमें न फँसकर इसको उत्पन्न करनेवाले मायापति परमेश्वरकी शरणमें जाना चाहिये और ऐसा समझकर संसारसे विरक्त और उपरत होकर जो भगवान्की शरण ग्रहण कर लेता है, वही वास्तवमें वेदोंको जाननेवाला है; क्योंकि पंद्रहवें श्लोकमें सब वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य भगवान्को ही बतलाया है। ६. मनुष्यशरीरमें कर्म करनेका अधिकार है एवं मनुष्यशरीरके द्वारा अहंता, ममता और वासनापूर्वक किये हुए कर्म बन्धनके हेतु माने गये हैं; इसीलिये ये मूल मनुष्यलोकमें कर्मानुसार बाँधनेवाले हैं। दूसरी सभी योनियाँ भोग-योनियाँ हैं, उनमें कर्मोंका अधिकार नहीं है; अतः वहाँ अहंता, ममता और वासनारूप मूल होनेपर भी वे कर्मानुसार बाँधनेवाले नहीं बनते। ७. अच्छी और बुरी योनियोंकी प्राप्ति गुणोंके संगसे होती है (गीता १३।२१) एवं समस्त लोक और प्राणियोंके शरीर तीनों गुणोंके ही परिणाम हैं, यह भाव समझानेके लिये उन शाखाओं को गुणोंके द्वारा बढ़ी हुई कहा गया है और उन शाखा-स्थानीय देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनियोंके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--इन पाँचों विषयोंके रसोपभोगको ही यहाँ कोंपल बतलाया गया है। ३. ब्रह्मलोकसे लेकर पातालपर्यन्त जितने भी लोक और उनमें निवास करनेवाली योनियाँ हैं, वे ही सब इस संसारवृक्षकी बहुत-सी शाखाएँ हैं। २. इस बातका पता नहीं है कि इसकी यह प्रकट होने और लय होनेकी परम्परा कबसे आरम्भ हुई और कबतक चलती रहेगी। स्थितिकालमें भी यह निरन्तर परिवर्तित होता रहता है; जो रूप पहले क्षणमें है, वह दूसरे क्षणमें नहीं रहता। इस प्रकार इस संसारवृक्षका आदि, अन्त और स्थिति--तीनों ही उपलब्ध नहीं होते। 3. इस संसारवृक्षके जो अविद्यामूलक अहंता, ममता और वासनारूप मूल हैं, वे अनादिकालसे पुष्ट होते रहनेके कारण अत्यन्त दृढ़ हो गये हैं; अतएव उस वृक्षको अति दृढ़ मूलोंसे युक्त बतलाया गया है। विवेकद्वारा समस्त संसारको नाशवान् और क्षणिक समझकर इस लोक और परलोकके स्त्री-पुत्र, धन, मकान तथा मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्ग आदि समस्त भोगोंमें सुख, प्रीति और रमणीयताका न भासना --उनमें आसक्तिका सर्वथा अभाव हो जाना ही दृढ़ वैराग्य है, उसीका नाम यहाँ “असंग-शस्त्र” है। इस असंग-शस्त्रद्वारा जो चराचर समस्त संसारके चिन्तनका त्याग कर देना--उससे उपरत हो जाना है एवं अहंता, ममता और वासनारूप मूलोंका उच्छेद कर देना है--यही उस संसारवृक्षका दृढ़ वैराग्यरूप शस्त्रके द्वारा समूल उच्छेद करना है। ७, इस अध्यायके पहले श्लोकमें जिसे “ऊर्ध्वः कहा गया है, गीताके चौदहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें जो 'माम” पदसे और सत्ताईसवें श्लोकमें “अहम” पदसे कहा गया है एवं अन्यान्य स्थलोंमें जिसको कहीं परम पद, कहीं अव्यय पद और कहीं परम गति तथा कहीं परम धामके नामसे भी कहा है, उसीको यहाँ परम पदके नामसे कहते हैं। उस सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वरको प्राप्त करनेकी इच्छासे जो बार-बार उनके गुण और प्रभावके सहित स्वरूपका मनन और निदिध्यासनद्वारा अनुसंधान करते रहना है, यही उस परम पदको खोजना है। अतः उपर्युक्त प्रकारसे उसका अनुसंधान करनेके लिये अपने अंदर जरा भी अभिमान न आने देकर और सब प्रकारसे उस परमेश्वरकी शरण लेकर--उसका अनन्य आश्रय लेकर उसीपर पूर्ण विश्वासपूर्वक निर्भर हो जाना चाहिये। ३. जो जाति, गुण, ऐश्वर्य और विद्या आदिके सम्बन्धसे अपने अंदर तनिक भी बड़प्पनकी भावना नहीं करते एवं जिनका मान, बड़ाई या प्रतिष्ठासे तथा अविवेक और भ्रम आदि तमोगुणके भावोंसे लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं रह गया है--ऐसे पुरुषोंको “निर्मानमोहा:” कहते हैं। २. जिनकी इस लोक और परलोकके भोगोंमें जरा भी आसक्ति नहीं रह गयी है, विषयोंके साथ सम्बन्ध होनेपर भी जिनके अन्तःकरणमें किसी प्रकारका विकार नहीं हो सकता--ऐसे पुरुषोंको 'जितसड्गदोषा:' कहते हैं। ३. अध्यात्म” शब्द यहाँ परमात्माके स्वरूपका वाचक है। अतएव परमात्माके स्वरूपमें जिनकी नित्य स्थिति हो गयी है, जिनका क्षणमात्रके लिये भी परमात्मासे वियोग नहीं होता और जिनकी स्थिति सदा अटल बनी रहती है--ऐसे पुरुषोंको “अध्यात्मनित्या:” कहते हैं। ४. जिनकी सब प्रकारकी कामनाएँ सर्वथा नष्ट हो गयी हैं, जिनमें इच्छा, कामना, तृष्णा या वासना आदि लेशमात्र भी नहीं रह गयी हैं--ऐसे पुरुषोंको “विनिवृत्तकामा:” कहते हैं। ५. शीत-उष्ण, प्रिय-अप्रिय, मान-अपमान, स्तुति-निन्दा--इत्यादि द्वद्धोंको सुख और दु:खरमें हेतु होनेसे सुख-दुःखसंज्ञक कहा गया है। इन सबसे किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध न रखना अर्थात् किसी भी द्वत्डके संयोग-वियोगमें जरा भी राग-द्वेष, हर्ष-शोकादि विकारका न होना ही उन द्वद्धोंसे सर्वथा मुक्त होना है। ६. समस्त संसारको प्रकाशित करनेवाले सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि एवं ये जिनके देवता हैं--वे चक्षु, मन और वाणी कोई भी उस परम पदको प्रकाशित नहीं कर सकते। इनके अतिरिक्त और भी जितने प्रकाशक तत्त्व माने गये हैं, उनमेंसे भी कोई या सब मिलकर भी उस परम पदको प्रकाशित करनेमें समर्थ नहीं हैं; क्योंकि ये सब उसीके प्रकाशसे--उसीकी सत्ता-स्फूर्तिके किसी अंशसे स्वयं प्रकाशित होते हैं (गीता १५। १२)। ७. जहाँ पहुँचनेके बाद इस संसारसे कभी किसी भी कालमें और किसी भी अवस्थामें पुनः सम्बन्ध नहीं हो सकता, वही मेरा परम धाम अर्थात् मायातीत धाम है और वही मेरा भाव और स्वरूप है। इसीको अव्यक्त, अक्षर और परम गति भी कहते हैं (गीता ८।२१)। इसीका वर्णन करती हुई श्रुति कहती है-- “यत्र न सूर्यस्तपति यत्र न वायुर्वाति यत्र न चन्द्रमा भाति यत्र न नक्षत्राणि भान्ति यत्र नाग्निर्दहति यत्र न मृत्यु: प्रविशति यत्र न दुःखानि प्रविशन्ति सदानन्दं परमानन्दं शान्तं शाश्वतं सदाशिवं ब्रह्मादिवन्दितं योगिध्येयं परं पदं यत्र गत्वा न निवर्तन्ते योगिन: ।” (बृहज्जाबाल उप० ८।६) “जहाँ सूर्य नहीं तपता, जहाँ वायु नहीं बहता, जहाँ चन्द्रमा नहीं प्रकाशित होता, जहाँ तारे नहीं चमकते, जहाँ अग्नि नहीं चलाता, जहाँ मृत्यु नहीं प्रवेश करती, जहाँ दुःख नहीं प्रवेश करते और जहाँ जाकर योगी लौटते नहीं--वह सदानन्द, परमानन्द, शान्त, सनातन, सदा कल्याणस्वरूप, ब्रह्मादि देवताओंके द्वारा वन्दित, योगियोंका ध्येय परम पद है।' ३. 'जीवलोके” पद यहाँ जीवात्माके निवासस्थान “शरीर” का वाचक है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण--इन तीनों प्रकारके शरीरोंका इसमें अन्तर्भाव है। इनमें स्थित जीवात्माको सनातन और अपना अंश बतलाया है। २. जैसे सर्वत्र समभावसे स्थित विभागरहित महाकाश घड़े और मकान आदिके सम्बन्धसे विभक्त-सा प्रतीत होने लगता है और उन घड़े आदिमें स्थित आकाश महाकाशका अंश माना जाता है, उसी प्रकार यद्यपि मैं विभागरहित समभावसे सर्वत्र व्याप्त हूँ, तो भी भिन्न-भिन्न शरीरोंके सम्बन्धसे पृथक्-पृथक् विभक्त-सा प्रतीत होता हूँ (गीता १३।१६) और उन शरीरोंमें स्थित जीव मेरा अंश माना जाता है तथा इस प्रकारका यह विभाग अनादि है, नवीन नहीं बना है। यही भाव दिखलानेके लिये जीवात्माको भगवान्ने अपना सनातन अंश बतलाया है। 3. पाँच ज्ञानेन्द्रिय और एक मन--इन छहोंकी ही सब विषयोंका अनुभव करनेमें प्रधानता है, कर्मेन्द्रियोंका कार्य भी बिना ज्ञानेन्द्रियोंके नहीं चलता; इसलिये यहाँ मनके सहित इन्द्रियोंकी संख्या छः बतलायी गयी है। अतएव पाँच कर्मेन्द्रियोंका इनमें अन्तर्भाव समझ लेना चाहिये। ४. जीवात्माको ईश्वर कहकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि यह इन मन-बुद्धिके सहित समस्त इन्द्रियोंका शासक और स्वामी है, इसीलिये इनको आकर्षित करनेमें समर्थ है। ५. मन अन्त:करणका उपलक्षण होनेसे बुद्धिका उसमें अन्तर्भाव है और पाँच कर्मन्द्रियों और पाँच प्राणोंका अन्तर्भाव ज्ञानेन्द्रियोंमें है, अत: यहाँ एतानि” पद इन सत्रह तत्त्वोंके समुदायरूप सूक्ष्मशरीरका बोधक है। ६. यहाँ आधारके स्थानमें स्थूलशरीर है, गन्धके स्थानमें सूक्ष्मशरीर है और वायुके स्थानमें जीवात्मा है। जैसे वायु गन्धको एक स्थानसे उड़ाकर दूसरे स्थानमें ले जाता है, उसी प्रकार जीवात्मा भी इन्द्रिय, मन, बुद्धि और प्राणोंके समुदायरूप सूक्ष्मशरीरको एक स्थूलशरीरसे निकालकर दूसरे स्थूलशरीरमें ले जाता है। यद्यपि जीवात्मा परमात्माका ही अंश होनेके कारण वस्तुत: नित्य और अचल है, उसका कहीं आना- जाना नहीं बन सकता, तथापि सूक्ष्मशरीरके साथ इसका सम्बन्ध होनेके कारण सूक्ष्मशरीरके द्वारा एक स्थूलशरीरसे दूसरे स्थूलशरीरमें जीवात्माका जाना-सा प्रतीत होता है; इसलिये यहाँ “संयाति' क्रियाका प्रयोग करके जीवात्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाना बतलाया गया है। गीताके दूसरे अध्यायके २२वें श्लोकमें भी यही बात कही गयी है। ७. वास्तवमें आत्मा न तो कर्मोंका कर्ता है और न उनके फलस्वरूप विषय एवं सुख-दुःखादिका भोक्ता ही; किंतु प्रकृति और उसके कार्योंके साथ जो उसका अज्ञानसे अनादि सम्बन्ध माना हुआ है, उसके कारण वह कर्ता-भोक्ता बना हुआ है (गीता १३।२१)। श्रुतिमें भी कहा गया है--“आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तित्याहुमनीषिण: ।” (कठोपनिषद् १,तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता । भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत तेज, क्षमा, धैर्य,“ बाहरकी शुद्धि एवं किसीमें भी शत्रुभावका न होना और अपनेमें पूज्यताके अभिमानका अभाव--ये सब तो हे अर्जुन! दैवी-सम्पदाको लेकर उत्पन्न हुए पुरुषके लक्षण हैं?
Arjuna said.
Verse 4
दम्भोः? दर्पोडभिमानश्षु क्रोध: पारुष्यमेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्,हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड5 और अभिमानः तथा क्रोध, 5 कठोरतारँ और अज्ञानः भी--ये सब आसुरी-सम्पदाको लेकर उत्पन्न हुए पुरुषके लक्षण हैं*
Arjuna said: “O Pārtha, hypocrisy, arrogance, self-conceit, anger, harshness, and ignorance—these are the marks of one born into the demonic endowment. Such traits distort judgment and conduct, turning a person away from ethical restraint and toward destructive, self-driven action.”
Verse 5
दैवी सम्पद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता । मा शुच: सम्पर्द दैवीमभिजातो5सि पाण्डव,दैवी-सम्पदा मुक्तिके लिये” और आसुरी-सम्पदा बाँधनेके लिये मानी गयी है। इसलिये हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी-सम्पदाको लेकर उत्पन्न हुआ है
The divine endowment is held to lead to liberation, while the demonic endowment is considered a cause of bondage. Therefore, do not grieve, O Arjuna (son of Pāṇḍu); you are born with the divine endowment.
Verse 6
दौ भूतसर्गौ“ लोकेडस्मिन् दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शूणु
Arjuna said: “In this world there are two kinds of created dispositions among beings—the divine and the demonic. The divine has been explained in detail; now, O Pārtha, listen from me about the demonic.”
Verse 7
हे अर्जुन! इस लोकमें भूतोंकी सृष्टि यानी मनुष्यसमुदाय दो ही प्रकारका है,” एक तो दैवी प्रकृतिवाला और दूसरा आसुरी प्रकृतिवाला। उनमेंसे दैवी प्रकृतिवाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्यसमुदायको भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन ।। प्रवृत्ति च निवृत्ति च जना न विदुरासुरा: । न शौचं नापि चाचारो न सत्य तेषु विद्यते,आसुरस्वभाववाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति--इन दोनोंको ही नहीं जानते52। इसलिये उनमें न तो बाहर-भीतरकी शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्यभाषण ही है
O Arjuna! In this world the human race is of only two kinds: those of divine nature and those of demonic nature. The divine has been described at length; now hear from me, in full, of those of demonic disposition. People of demonic nature do not understand what should be pursued and what should be renounced; therefore among them there is neither outer nor inner purity, nor right conduct, nor truthfulness.
Verse 8
असत्यमप्रतिष्ठ॑ ते जगदाहुरनी श्वरम् । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम्,वे आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत् आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वरके,+ अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है?
Those of demonic nature declare: “This world is unreal, without any stable foundation, and without a Lord. It arises of itself, merely from the union of woman and man; therefore desire alone is its cause. What else could there be?”
Verse 9
सम्बन्ध-- ऐसे नास्तिक सिद्धान्तके माननेवालोंके स्वभाव और आचरण कैसे होते हैं? इस जिज्ञासापर अब भगवान् अगले चार श्लोकोंमें उनके लक्षणोंका वर्णन करते हैं-- एतां दृष्टिमवष्ट भ्य नष्टात्मानो5ल्पबुद्धय: । प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतो5हिता:,इस मिथ्या ज्ञानको अवलम्बन करके--जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सबका अपकार करनेवाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत्के नाशके लिये ही समर्थ होते हैं:
Clinging to this false outlook, those whose inner nature is ruined and whose understanding is shallow become capable only of harsh and violent deeds. Hostile to the welfare of all, they act in ways that lead toward the destruction of the world.
Verse 10
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भभानमदान्विता: । मोहाद गृहीत्वासदग्राहान् प्रवर्तन्तेडशुचिव्रता:,वे दम्भ, मान और मदसे युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर, अज्ञानसे मिथ्या सिद्धान्तोंको ग्रहण करके और भ्रष्ट आचरणोंको धारण करकेः संसारमें विचरते हैं
Filled with hypocrisy, pride, and the intoxication of ego, they take refuge in desires that can never be satisfied. Deluded, they seize upon false doctrines and, having embraced impure and corrupt disciplines, they roam through the world in that way.
Verse 11
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता: । कामोपभोगपरमा एतावदिति निनश्चिता:
They are seized by immeasurable anxiety that clings to them until death; taking sensual enjoyment as the highest goal, they conclude, “This much alone is all that matters.”
Verse 12
तथा वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली असंख्य चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, विषयभोगोंके भोगनेमें तत्पर रहनेवाले और “इतना ही सुख है” इस प्रकार माननेवाले होते हैं ।। आशापाशशशरतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा: । ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञज्चयान्
Thus they become people who take refuge in countless anxieties that last until death, intent on consuming sense-pleasures, and who conclude, “This alone is happiness.” Bound by hundreds of nooses of hope, devoted to desire and anger, they strive to accumulate wealth for enjoyment—by unjust means.
Verse 13
१२ ।। इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् | इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्,वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथको प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जायगा
“This I have gained today; this desire too I shall fulfill. This much wealth is mine, and more wealth will again become mine.” Thus do the deluded speak, driven by possessiveness and the hunger for accumulation, mistaking temporary gain for lasting security and righteousness.
Verse 14
असौ मया हतः शत्रुर्निष्ये चापरानपि । ईश्वरोडहमहं भोगी सिद्धो5हं बलवान्सुखी,वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओंको भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्वर्यको भोगनेवाला हूँ। मैं सब सिद्धियोंसे युक्त हूँ और बलवान् तथा सुखी हूँ
“This enemy has been slain by me, and I will also strike down the others. I am the lord; I am the enjoyer of power and prosperity. I am accomplished in every success, strong, and happy.” In ethical context, the verse voices the intoxication of ego and doership in war—an inner fall from dharma, where victory is claimed as ‘mine’ and the self is inflated into sovereignty, obscuring humility, restraint, and accountability.
Verse 15
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापवकिे अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशासत्ररूप श्रीमद्भगगवद्गीतोपनिषद्, श्रीकृष्णारजुनसंवादमें पुरुषोत्तमयोग नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ,आद्यो5भिजनवानस्मि को<न्यो5स्ति सदृशो मया | यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता:
Deluded by ignorance, they think: “I am high-born; I am wealthy. Who else is equal to me? I will perform sacrifices, I will give gifts, I will enjoy.” Thus, intoxicated by self-conceit, they pursue outward acts and pleasures without true discernment of the Self or the moral law that should govern action.
Verse 16
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता: । प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरके5शुचौ,इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्धभगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्धिभागयोगो नाम षोडशो<ध्याय:
Their minds bewildered in many ways, covered by the net of delusion, attached to the enjoyments of desire, they fall swiftly into the impure hell.
Verse 17
१५-१६ ।। आत्मसम्भाविता: स्तब्धारें धनमानमदान्विता: । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्,वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ माननेवाले घमण्डी पुरुष धन और मानके मदसे युक्त होकर केवल नाममात्रके यज्ञोंद्वारा पाखण्डसे शास्त्रविधिरहित यजन करते हैं
Those who are self-conceited and rigid with pride—intoxicated by wealth and social honor—perform sacrifices only in name. Driven by hypocrisy, they worship and offer rites without following the true scriptural method, using religion as a display rather than as a disciplined path of dharma.
Verse 18
अहंकार बल दर्प काम॑ क्रोध॑ च संश्रिता: । मामात्मपरदेहेषु प्रद्धिषन्तो5भ्यसूयका:+,वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोधादिके परायण और दूसरोंकी निन्दा करनेवाले पुरुष अपने और दूसरोंके शरीरमें स्थित मुझ अन्तर्यामीसे द्वेष करनेवाले होते हैं?
Those who take refuge in egoism, brute strength, arrogance, desire, and anger—who are fault-finding and envious—come to hate Me, the indwelling Lord present within their own bodies and within the bodies of others. Ethically, the verse condemns self-centered pride and hostile envy as forms of spiritual blindness that turn a person against the divine presence in all beings.
Verse 19
सम्बन्ध-- इस प्रकार सातवेंसे अठारहवें शलोकोंतक आयुरीस्वभाववालोके दुर्गुण और दुराचार आदिका वर्णन करके अब उन दुर्गुण-दुराचारोंगें त्याज्य-बुद्धि करानेके लिये अगले दो श्लोकोंमें भगवान् वैसे लोगोंकी घोर निन्दा करते हुए उनकी दुर्गीतिका वर्णन करते हैं-- तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् | क्षिपाम्यजस्रमशु भानासुरीष्वेव योनिषु,उन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमोंको मैं संसारमें बार-बार आसुरी योनियोंमें? ही डालता हूँ
The Blessed Lord declares that those who are hateful, cruel, and morally degraded—people who persist in harmful conduct—are repeatedly cast down within the cycle of worldly existence into demonic wombs. The ethical force of the statement is a warning: sustained malice and cruelty shape one’s destiny, leading not to upliftment but to further degeneration and suffering.
Verse 20
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्,हे अर्जुन! वे मूढ़ मुझको न प्राप्त होकर जन्म-जन्ममें आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गतिको ही प्राप्त होते हैं अर्थात् घोर नरकोंमें पड़ते हैं
Those deluded beings, having fallen into demonic wombs birth after birth, fail to reach Me; and then, O son of Kuntī, they descend to an even lower state of existence—into grievous hellish destinies. The ethical point is that persistent ignorance and willful rejection of the divine good harden into a downward moral trajectory, shaping one’s rebirth and suffering.
Verse 21
सम्बन्ध-- आयुरस्वभाववाले मनुष्योंकोी लगातार आयुरी योनियोंके और घोर नरकोंके प्राप्त होनेकी बात युनकर यह जिज्ञासा हो सकती है कि उनके लिये इस दुर्गीतिसे बचकर परम गतिको प्राप्त करनेका क्या उपाय है; इसपर कहते हैं-- त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: । काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्,काम, क्रोध तथा लोभ--ये तीन प्रकारके नरकके द्वार आत्माका नाश करनेवाले अर्थात् उसको अधोगतिमें ले जानेवाले हैं।। अतएव इन तीनोंको त्याग देना चाहिये
There are three gates to hell, destructive of the self: desire, anger, and greed. Therefore one should abandon this triad.
Verse 22
एतैरविंमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर: | आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम्,हे अर्जुन! इन तीनों नरकके द्वारोंसे मुक्त पुरुष अपने कल्याणका आचरण करता है,* इससे वह परमगतिको जाता है अर्थात् मुझको प्राप्त हो जाता है
O son of Kuntī, a person freed from these three gates of darkness practices what truly leads to one’s own welfare; from that, one attains the highest goal—reaching the supreme state.
Verse 23
सम्बन्ध-- जो उपर्युक्त दैवीसम्पदाका आचरण न करके अपनी मान्यताके अनुसार कर्म करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है या नहीं? इसपर कहते हैं-- यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: । न स सिद्धिमवाप्रोति न सुखं न परां गतिम्,जो पुरुष शास्त्रविधिको त्यागकर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धिको प्राप्त होता है, न परमगतिको और न सुखको ही
Whoever casts aside the discipline laid down by the śāstras and acts according to mere personal desire does not attain true accomplishment; he gains neither happiness nor the highest goal.
Verse 24
तस्माच्छास्त्र प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्त कर्म कर्तुमिहाहसि,इससे तेरे लिये इस कर्तव्य और अकर्तठव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्रविधिसे नियत कर्म ही करनेयोग्य हैः
Therefore, for you the authoritative standard in determining what ought to be done and what ought not to be done is the śāstra. Knowing the action enjoined by scriptural ordinance, you should perform that prescribed duty here—so that choice is guided by dharma rather than impulse or personal preference.
Verse 39
भीष्मपर्वणि तु एकोनचत्वारिंशो5ध्याय:,भीष्मपर्वमें उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
In the Bhīṣma Parva, the thirty-ninth chapter concludes here.
The chapter presents an ethical rupture: when recognition fails, kinship-based restraints no longer regulate action, producing harm even within familial and allied bonds; it problematizes whether duty-driven engagement can remain morally bounded under mass confusion.
It illustrates how extreme environments can override social cognition and relational ethics, making disciplined awareness and accountable command structures crucial; the text implicitly warns that collective decisions can generate conditions where individual virtue is difficult to enact.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is historiographic—Saṃjaya’s report documents the phenomenology and costs of large-scale conflict and positions Bhīṣma’s presence as a narrative hinge for subsequent developments.