Ayodhya KandaPrakarana 3121 Verses

Prakarana 31

यह सोपान ‘वैराग्य-जन्य धर्म-निष्ठा’ का द्वार है: राज्य, परिवार, लोकमर्यादा और निजी प्रेम—इन सबके बीच राम का त्याग ‘धर्म की सर्वोच्चता’ को साधक के अंतःकरण में प्रतिष्ठित करता है। अयोध्या-काण्ड में भक्ति भावुकता नहीं, ‘मर्यादा-आधारित समर्पण’ बनती है; यहाँ साधक सीखता है कि ईश्वर-प्रसाद (आज्ञा/अनुशासन) ही मुक्ति-पथ का वास्तविक आलंबन है।

In diesem gegliederten Abschnitt (Dohā 300–309) zeigt sich im Ayodhyā-Kāṇḍa innerhalb der Karuṇā das Aufgehen stiller Bhakti (Śānta-bhakti). Bharatas Vinaya, Schuldgefühl und die Sprache von Herr-Diener-Dharma läutern das Dāsya; Rāmas Antwort hingegen begründet Maryādā als Dharma-Prinzip durch Nīti, gesellschaftliche Schamgrenze (lok-lāj), Guru- und Ältestenordnung, Schutz der Untertanen und situationsgemäßen Dharma (avasar-dharma). Tulsī lässt rührende Karuṇā nicht bloß Weinen bleiben—er wandelt sie in vernunftgestützte Hingabe. Indem er durch Deva-Māyā Indras (Maghavā) listige Regung zeigt, lehrt er zudem: Hinter äußerer Wohlgesinnung kann eigennütziger Trug verborgen sein; daher steht wahre Bhakti, „svārath-chhal-phala chāri bihāī“, im Gehorsam gegenüber dem göttlichen Gebot fest. So führt das Ayodhyā-Kāṇḍa im Stufenweg den Übenden von der „Ethik des Verzichts“ zur „Reife der Bhakti“.

Verses

Verse 612 (दोहा/सोरठा)

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप।।309।।

Verse 613 (चौपाई)

भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।। सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू।। पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।। तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।। तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।। बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू।। भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।। प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी।।

Verse 614 (दोहा/सोरठा)

कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ। अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।।

Verse 615 (चौपाई)

कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।। नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।। सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें।। कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।। कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं।। महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।। सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।। मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।।

Verse 616 (दोहा/सोरठा)

सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात। राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।

Verse 617 (चौपाई)

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।। पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा।। चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी।। सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।। कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।। कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।। देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा।। फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।

Verse 618 (दोहा/सोरठा)

देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।।

Verse 619 (चौपाई)

भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।। भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।। गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।। सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।। भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।। करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।। मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।। अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।

Verse 620 (दोहा/सोरठा)

जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल। सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।।

Verse 621 (चौपाई)

पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।। राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।। स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की।। प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू।। अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो।। आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।। यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी।। भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।।

Verse 622 (दोहा/सोरठा)

दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन। देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।

Verse 623 (चौपाई)

तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।। माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू।। मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु।। पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।। गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।। अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई।। देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू।। तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।

Verse 624 (दोहा/सोरठा)

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।

Verse 625 (चौपाई)

बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।। कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।। प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं।। भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी।। प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।। तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना।। बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की।। प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।।

Verse 626 (दोहा/सोरठा)

सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।321।।

Verse 627 (चौपाई)

मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।। प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं।। जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ।। उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू।। सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए। जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी।। सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।। नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।

Verse 628 (दोहा/सोरठा)

राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास। तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस।।322।।

Verse 629 (चौपाई)

सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।। पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई।। भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे।। ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू।। परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए।। सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।। आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा।। समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई।।

Verse 630 (दोहा/सोरठा)

सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि। सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।323।।

Verse 631 (चौपाई)

राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।। नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा।। जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी।। असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।। भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी।। अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।। तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।। रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।।

Verse 632 (दोहा/सोरठा)

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।

Inside Prakarana 31

The dialogue

  • तुलसीदास (कथावाचक-स्वर; प्रसंग में राम–भरत संवाद का काव्य-निबंधन)

Frequently Asked Questions

परंपरानुसार इस प्रसंग का पाठ ‘सेवक-धर्म’ (आज्ञापालन), ‘प्रजा/परिवार में शान्ति’ और ‘मन के उचाट-द्विविधा’ के शमन का फल देता है; विशेषतः भरत-विनय का श्रवण/कीर्तन दास्य-भक्ति को निर्मल कर ‘अहं-त्याग’ की सिद्धि में सहायक माना जाता है।

सामान्य वैष्णव-परंपरा में दास्य-विनय प्रसंगों पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-संपुट) या ‘राम रामेति रामेति’ (नाम-स्मरण) जोड़ा जाता है; कुछ रामानंदी पाठ-परंपराओं में ‘सीता-राम’ नाम-संपुट भी प्रचलित है।

Ask anything about Prakarana 31 of the Ramcharitmanas

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.

Read Ramcharitmanas in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App