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This Sopāna is the awakening of bhakti through auspicious beginnings (mangal), right-seeing (darśana), and the first decisive recognition of Rāma’s divinity in human sweetness. In the Janaka-sabhā and Sītā-svayaṃvara atmosphere, the seeker’s mind learns to move from social spectacle (rāj-samāj, rāṅg-bhūmi) to inner adoration (anurāga), where each beholder sees the Lord according to their bhāvanā—thus training perception itself as a spiritual instrument.
বালকাণ্ডের এই অংশে (দোহা ২৪০–২৪৯) তুলসীদাস অদ্ভুত ও শৃঙ্গারের এমন এক রস-সংগঠন করেন, যা তৎক্ষণাৎ ভক্তি-রসে রূপান্তরিত হয়। বাহ্যত ক্ষেত্র রাজকীয় প্রদর্শনী, অন্তরে তা ভাবনার পরীক্ষাগার; ‘জিন্হ কেঁ রহী ভাবনা জৈসী, প্রভু মূরতি তিন্হ দেখী তাইসী’—এই বাক্যই তাত্ত্বিক কড়ি। রাজারা দেখেন ভয় বা প্রতিযোগিতা; যোগিনীরা দেখেন তত্ত্ব; ভক্তরা দেখেন ইষ্টদেব; নারীরা দেখেন অতুল সৌন্দর্য; জনক দেখেন ধর্ম-পরিপূর্তি। এই বহুত্ব আপেক্ষিকতাবাদ নয়, সাধনার শিক্ষাবিধি—প্রত্যেক জীব গুণ-আশ্রিত প্রতিক্রিয়া থেকে প্রেম-আশ্রিত স্বীকৃতিতে দৃষ্টি শোধন করে ঊর্ধ্বে ওঠে। নির্গুণ–সগুণ সমন্বয় অন্তর্নিহিত: একই রাম যোগীদের কাছে ‘পরম তত্ত্বময়’, নাগরিকের কাছে ‘নরভূষণ’। ছন্দের চৌপাই-দোহা স্পন্দন আবেগের উত্থানকে ধ্যান-স্থিতিতে স্থির করে, পাঠকে লিতুর্জিকভাবে জপ্য ও আধ্যাত্মিকভাবে ক্রমোন্নত করে—দর্শন থেকে শরণে সত্য সোপান-গতি।
Verse 501 (चौपाई)
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई।। लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई।। हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी।। पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला।। रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।। चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।। देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी।। तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू।।
আমরা সীতার স্বয়ংবর দেখতে যাব। ঈশ্বর কেন এমন মহত্ত্ব দেন? লক্ষ্মণ বললেন, যিনি সেই যশের যোগ্য তিনিই। প্রভু, তোমার কৃপা আমার ওপর আছে। তার উত্তম বাণী শুনে সকল মুনি আনন্দিত হলেন এবং আশীর্বাদ দিলেন; সকলে আনন্দে পূর্ণ হলেন। তখন করুণাময় মুনিদের সাথে ধনুষ প্রদর্শনের সভায় দেখতে গেলেন। দুই ভাই রঙ্গভূমিতে এলেন, এবং সকল নগরবাসী তাদের আগমনের কথা জানল। সকলে গৃহকর্ম ভুলে বেরিয়ে এল; শিশু, যুবক, বৃদ্ধ, নর ও নারী সকলে। জনক তাদের দেখে অত্যন্ত চিন্তিত হলেন; তিনি তার সেবকদের আদেশ দিলেন সবাইকে উপযুক্ত আসন দিতে।
Verse 502 (दोहा/सोरठा)
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि। उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि।।240।।
মৃদু ও বিনয়ী বাণী বলে তিনি নর ও নারীদের বসালেন, প্রত্যেককে তার যথাযথ স্থান অনুযায়ী, উচ্চ, মধ্যম, নীচ বা লঘু হোক।
Verse 503 (चौपाई)
राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।। गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा।। राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे।। जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।। देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।। डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।। रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।। पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई।।
সেই মুহূর্তে রাজকুমাররা উপস্থিত হলেন; যেন সৌন্দর্য নিজেই শরীর ধারণ করেছে। তাঁরা ছিলেন গুণের সমুদ্র, সুসংস্কৃত, শ্রেষ্ঠ বীর, সুন্দর, শ্যাম ও গৌর শরীরবিশিষ্ট। রাজসভায় তাঁরা শোভা পেলেন, আকাশে যেন দুই পূর্ণিমার চাঁদ। যার যেমন ভাব ছিল, প্রভুর মূর্তি তাঁকে তেমনই দেখাল। মহাবীররা তাঁদের সৌন্দর্য দেখলেন; যেন বীরত্বের সার শরীর ধারণ করেছে। কপট রাজারা প্রভুকে দেখে ভয়ে কাঁপল, যেন ভয়ংকর ও মহান মূর্তি দেখল। অসুররা ছলনার বেশে রইল; তাঁদের কাছে প্রভু যমের মতো প্রকট হলেন। নগরবাসীরা দুই ভ্রাতাকে দেখলেন, যাঁরা নয়নের অলংকার ও আনন্দদাতা।
Verse 504 (दोहा/सोरठा)
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप। जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप।।241।।
নারীরা হৃদয়ে আনন্দে তাঁদের দেখলেন, প্রত্যেকে নিজ নিজ ইচ্ছানুসারে, যেন পরম সৌন্দর্যের মূর্তি সাজসজ্জা ধরে তাঁদের সম্মুখে উপস্থিত।
Verse 505 (चौपाई)
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा।। जनक जाति अवलोकहिं कैसैं। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें।। सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी।। जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा।। हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता।। रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया।। उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ।। एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ।।
জ্ঞানীদের কাছে প্রভু সর্বব্যাপীরূপে প্রকট হলেন, অনেক মুখ, হাত, পা, চোখ ও মস্তকবিশিষ্ট। জনক ও তাঁর গোষ্ঠী তাঁকে দেখলেন; তিনি তাঁদের কাছে প্রিয় বন্ধু বা প্রিয় আত্মীয়ের মতো মনে হলেন। বিদেহের রাজা ও রানি তাঁকে দেখলেন; তাঁদের ভালোবাসা ছিল সন্তানের প্রতি ভালোবাসার মতো, বর্ণনাতীত। যোগীদের কাছে তিনি পরম সত্যরূপে উদ্ভাসিত হলেন, শান্ত, পবিত্র, সম ও স্বয়ংপ্রকাশী। হরিভক্তরা দুই ভ্রাতাকে তাঁদের ইষ্টদেবতা, সকল সুখদাতা হিসেবে দেখলেন। যিনি ভালোবাসায় রামকে দেখলেন, সীতা, তিনি এমন স্নেহ ও আনন্দ অনুভব করলেন যা শব্দের অতীত। তিনি হৃদয়ে যা অনুভব করলেন তা বলতে পারলেন না; কোন কবি কীভাবে বর্ণনা করবে? এইভাবে তিনি সেই ভাবাবস্থায় রইলেন; তারপর কোসলরাজ তাঁকে দেখলেন।
Verse 506 (दोहा/सोरठा)
राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर। सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर।।242।।
কোসলের যুবরাজ রাজসভায় শোভা পেলেন; তাঁর শরীর ছিল গৌর ও শ্যাম, সুন্দর, বিশ্বের নয়নচোর।
Verse 507 (चौपाई)
सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ।। सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के।। चितवत चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहीं बरनी।। कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला।। कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा।। भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं।। पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं।। रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ।।
উভয় মূর্তি স্বাভাবিকভাবে মনোহর ছিল; কোটি কামদেবও তুলনায় নগণ্য। তাঁদের মুখ শরৎচন্দ্রকে লজ্জিত করল; তাঁদের পদ্মনয়ন হৃদয়কে প্রীত করল। তাঁদের দৃষ্টি মনোহর ও হৃদয়চুরি; তা যে ভাব জাগাল তা বর্ণনাতীত। তাঁদের গণ্ড কলাত্মক, কর্ণে দোলনীয় কুণ্ডল; থুতনি ও অধর সুন্দর, বাক্য মৃদু। কুমুদবন্ধু চন্দ্র তাঁদের হাসিতে লজ্জিত; ভ্রু বক্র, নাসা মনোহর। ললাট বিশাল, তিলক তাতে উজ্জ্বল; কেশ দেখে ভ্রমরও লজ্জিত হল। পীত বস্ত্র তাঁদের শিরে শোভিত, পুষ্প ও কুসুমের মধ্যে রচিত। তাঁদের রেখা রুচির, কণ্ঠ শঙ্খের মতো, যেন ত্রিভুবনের সৌন্দর্যের সীম।
Verse 508 (दोहा/सोरठा)
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल। बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल।।243।।
হাতির মণিত কণ্ঠহার ও তুলসীমালা তাঁদের কণ্ঠে শোভিত; তাঁদের বিশাল বাহু বৃষভের কাঁধ বা সিংহের পার্শ্বের মতো, বলের নিধি।
Verse 509 (चौपाई)
कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे।। पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए।। देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे।। हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई।। करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई।। जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ।। निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा।। भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ।।
পীত বস্ত্র কটিতে বদ্ধ, নিসাই সেখানে ঝুলছিল; বাম হাতে সুন্দর ধনুক, উত্তম কাঁধে ধারণ। পীত যজ্ঞোপবীত তাঁদের শোভিত; নখ থেকে শিখ পর্যন্ত মহাছবি ছড়িয়েছিল। তাঁদের দেখে সকল জন আনন্দে পূর্ণ হল; চোখ স্থির, দৃষ্টি চঞ্চল হল না। জনক দুই ভ্রাতাকে দেখে আনন্দিত হলেন; তাঁরা গিয়ে মুনির চরণকমল ধরলেন। প্রণাম করে নিজের কথা বললেন; মুনিকে সমগ্র রাজ্য দেখালেন। যেখানেই দুই রাজকুমার গেলেন, সেখানেই সকলে বিস্ময়ে চাহল। প্রত্যেকে রামকে নিজ নিজ দৃষ্টিতে দেখল; কেউ বিশেষ রহস্য জানল না। মুনি রাজাকে সুন্দর সৃষ্টির কথা বললেন; রাজা মহাসুখ লাভ করলেন।
Verse 510 (दोहा/सोरठा)
सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल। मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल।।244।।
সকল মঞ্চের মধ্যে এক মঞ্চ ছিল অতি সুন্দর, উজ্জ্বল ও বিশাল। সেখানে রাজা মুনিসহ দুই ভ্রাতাকে আসন দিলেন।
Verse 511 (चौपाई)
प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे।। असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं।। बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।। अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई।। बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी।। तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा।। एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ।। यह सुनि अवर महिप मुसकाने। धरमसील हरिभगत सयाने।।
প্রভুকে দেখে সকল রাজা হৃদয়ে নিরাশ হলেন, যেন চন্দ্রোদয়ে তারা ম্লান হয়। সকলের মনে এই বিশ্বাস জন্মাল: রাম ধনুক জ্যা করতে পারবেন না। শিবের মহাধনুক না ভেঙে রাম জ্যা করবেন ও সীতাকে বিবাহ করবেন। এই ভেবে তাঁরা গৃহে গেল, যশ, প্রতাপ, বল ও তেজ হারাল। অন্য রাজারা এই কথা শুনে হাসল, যাঁরা বিবেকহীন, অন্ধ অভিমানী। তাঁরা বলল: সে ধনুক জ্যা করবে ও বিবাহ করবে; জ্যা না করে কে রাজকুমারীকে বিবাহ করবে? একবার মৃত্যু হোক, সীতার জন্য আমরা সেই যুদ্ধ জিতব। এই শুনে অন্য ধর্মশীল হরিভক্ত জ্ঞানী রাজারা মুস্কুরালেন।
Verse 512 (दोहा/सोरठा)
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के। जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे।।245।।
রাম সীতাকে বিবাহ করবেন, রাজাদের গর্ব দূর করে। যুদ্ধে কে জয়ী হতে পারে দশরথের যোদ্ধাদের, যাঁরা রণকুশল?
Verse 513 (चौपाई)
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।। सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता।। जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी।। सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी।। सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई।। करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा।। अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे।। देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना।।
বৃথা মরো না শিঙা বাজিয়ে, মিষ্টি খেয়ে পেট ভরলে কি হবে যদি মন অভুক্ত থাকে? আমার পরম পবিত্র উপদেশ শোনো, হৃদয়ে সীতাকে জগদম্বা বলে জানো। জগতের পিতা রঘুপতিকে বিবেচনা করো, তাঁর সৌন্দর্য দেখে চোখ ভরে নাও। সুন্দর, সুখদায়ক, সকল গুণের আধার এই দুই ভ্রাতা শিবের হৃদয়ে বাস করেন। অমৃত সমুদ্রের কাছে এসে মরীচিকা দেখে কেন মৃত্যুর পথে ছোটো? যেখানে ইচ্ছা সেখানে যাও, আজ আমি জন্মের ফল পেয়েছি। এই বলে ভালো রাজারা অনুরাগে আকৃষ্ট হয়ে তাঁর অতুলনীয় সৌন্দর্য দেখতে লাগলেন। দেবতারা আকাশে রথে চড়ে দেখলেন, ফুল বর্ষণ করলেন ও আনন্দগান গাইলেন।
Verse 514 (दोहा/सोरठा)
जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई। चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं।।246।।
শুভ মুহূর্ত এসেছে জেনে সীতা তখন খবর পাঠালেন আর জনক ডাকলেন। চতুর সখীরা, সকলেই সুন্দরী, শ্রদ্ধার সাথে গেলেন আর তাঁকে নিয়ে এলেন।
Verse 515 (चौपाई)
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी।। उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं।। सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई।। जौ पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया।। गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी।। बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही।। जौ छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छप सोई।। सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू।।
সীতার সৌন্দর্য বর্ণনা করা যায় না, তিনি জগদম্বিকা, রূপ ও গুণের খনি। সকল উপমা আমার কাছে তুচ্ছ মনে হয়, কারণ সেগুলো সাধারণ নারীদের অঙ্গের সাথে যুক্ত। যদি কেউ সীতার বর্ণনা দিয়ে উপমা দেয়, সে কুকবি বলে খ্যাত হয় ও নিন্দা বয়ে আনে। যদি কেউ সীতার মতো রূপ গড়ে, জগতে এমন মনোহর কুমারী কোথায়? তাঁর বাক্য সরস্বতীর মতো, দেহ ভবানীর অর্ধেক, আর রতি অত্যন্ত দুঃখিত নিজের দেহ হীন জেনে। �যাঁর ভ্রাতা সমুদ্র, বন্ধু বিষজাত শিব, সেই বৈদেহী লক্ষ্মীর সমান কীভাবে বর্ণনা করি? যদি তাঁর সৌন্দর্য অমৃত হতো, সমুদ্র তাতে পরিপূর্ণ হতো, সেই কচ্ছপ পরম সৌন্দর্যে গঠিত হতো। তাঁর লাবণ্য মন্দার ফুল, তাঁর অলংকার মন্দার, নিজের পদ্মহাতে সমুদ্র মন্থন করেন।
Verse 516 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल। तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल।।247।।
এইভাবে লক্ষ্মীর সৌন্দর্য উদ্ভাসিত হয়, যা সুখের মূল, তবু কবি বিনয়ের সাথে বলেন সীতার তুলনা নেই।
Verse 517 (चौपाई)
चलिं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।। सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी।। भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए।। रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी।। हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई।। पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला।। सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा।। मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई।।
বুদ্ধিমতী সখীদের সাথে নিয়ে তিনি চললেন, মনোহর বাণীতে গান গাইতে গাইতে। সুন্দর শাড়িতে তাঁর নবল দেহ শোভিত হলো, তিনি জগতজননী, অতুলনীয় ও ভারী ছবির অধিকারিণী। সকল অলংকার সুস্থাপিত ও শোভনীয়, সখীরা প্রতিটি অঙ্গে সাজিয়েছেন। যখন সীতা রঙ্গমঞ্চে পা রাখলেন, নর-নারী তাঁর রূপ দেখে মোহিত হলো। দেবতারা হর্ষে দুন্দুভি বাজালেন, অপ্সরারা গান গাইলেন ও ফুল বর্ষণ করলেন। হাতে পদ্ম নিয়ে জয়মালা নিয়ে শোভিত হলেন, সকল ভুবন অবিকল চেয়ে রইল। সীতার চিত্ত বিস্ময়ে রামের প্রতি আকৃষ্ট হলো, সকল নরনাথ মোহবশ হলেন। দুই ভ্রাতা মুনির কাছে দেখলেন, চোখে নিধি পেয়ে লালসা জাগলো।
Verse 518 (दोहा/सोरठा)
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि। लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि।।248।।
সভা দেখে ও গুরুজনের সামনে লজ্জা অনুভব করে সীতা সংকোচ বোধ করলেন, তবু রঘুবীরকে দেখলেন ও হৃদয়ে ধারণ করলেন।
Verse 519 (चौपाई)
राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।। सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं।। हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई।। बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू।। जग भल कहहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू।। एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू।। तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए।। कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा।।
নর-নারীরা রামের রূপ ও সীতার ছবি দেখলেন, নিমেষও চোখ বন্ধ করলেন না। সকলে চিন্তা করলেন ও সংকোচে কথা বললেন, মনে মনে ব্রহ্মার কাছে প্রার্থনা করলেন। ব্রহ্মা, শীঘ্র জনককে অনুপ্রাণিত করো যাঁর মন এইভাবে প্রবণ, সম্মতি দিতে। আর ভেবেচিন্তে রাজা তাঁর প্রতিজ্ঞা ত্যাগ করুন ও সীতা-রামের বিবাহ সম্পন্ন করুন। জগত ভালো বলবে, সকলে সমর্থন করবে, কিন্তু তাঁর হঠ হৃদয়ে জ্বালা দিয়েছে। সকল লোক এই লালসায় মগ্ন: সাঁবলা জনকীর যোগ্য হোক! তখন জনক যে বার্তাবাহকদের ডেকেছিলেন তারা স্তুতিগান করতে করতে এগিয়ে এলো। রাজা বললেন, যাও আমার প্রতিজ্ঞা ঘোষণা করো। বার্তাবাহকরা চলে গেলেন, হৃদয়ে অল্প আনন্দ নয়।
Verse 520 (दोहा/सोरठा)
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल। पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल।।249।।
বার্তাবাহক এই উত্তম বাক্য বললেন: শোনো সকল মহিপালগণ, আমরা বিদেহের প্রতিজ্ঞা পূরণ করব আমাদের বিশাল বাহু উত্তোলন করে।
In this Bālakāṇḍa segment (Doha 240–249), Tulasīdāsa orchestrates a rāsa of adbhuta and śṛṅgāra that is immediately transfigured into bhakti-rasa. The arena is outwardly a royal spectacle, yet inwardly it is a laboratory of bhāvanā: ‘जिन्ह कें रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी’ becomes the theological hinge. Kings see threat or contest; yoginīs see tattva; bhaktas see iṣṭa-deva; women see incomparable beauty; Janaka sees fulfillment of dharma. This plurality is not relativism but a pedagogy—each jīva ascends by refining perception from guṇa-based reaction to prema-based recognition. Nirguṇa–saguṇa synthesis is embedded: the same Rāma is ‘परम तत्वमय’ to yogins and ‘नरभूषन’ to citizens. The meter’s chaupai-doha pulse stabilizes emotional surges into contemplation, making the passage liturgically recitable and spiritually incremental—true Sopāna movement from seeing to surrender.
Traditional satsang teaching: recitation of the Sītā-svayaṃvara darśana portion grants ‘दृष्टि-शुद्धि’—the refinement of perception so the mind turns from rivalry and anxiety to prema and surrender. It is also said to bestow saumangalya (auspiciousness) and steadiness of heart, because the doha-landings repeatedly settle the listener into dharma-bhāva.
Commonly used in many Manas-parāyaṇa traditions for marriage/auspicious contexts: “सीता राम, सीता राम, सीता राम” as a nāma-samput; and in some recitation lineages, the refrain “जय जय सीता राम” between doha units to preserve laya while keeping the mind anchored to nāma.
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