Ayodhya KandaPrakarana 2220 Verses

Prakarana 22

यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ और ‘प्रेम-परख’ का द्वार है: राजसुख, नीति, और लोक-लाज के बीच भक्त-हृदय का निर्णय। अयोध्या काण्ड में राम-राज्य की आकांक्षा टूटकर ‘राम-आज्ञा’ के आगे झुकती है; साधक के भीतर ‘अहं-राज’ का विसर्जन होकर ‘शरणागति’ का राज्य आरम्भ होता है। इस खंड का आध्यात्मिक प्रयोजन है—विरह को वैराग्य में, और वैराग्य को सेवा-भक्ति में रूपान्तरित करना, जैसा कि भरत के चरित्र में प्रत्यक्ष है।

এই অংশ অযোধ্যা কাণ্ডের সেই শিখর-ভাবকে ধরে, যেখানে ‘বিরহ’ কেবল শোক থাকে না—সাধনা হয়ে ওঠে। রস-প্রাধান্য করুণ ও শান্তের সংযোগ: ভরত রাম-বিরহে দগ্ধ, কিন্তু এ দাহ লোক-নিন্দা/পরলোক-ভয় থেকে নয়—শুধু প্রেম থেকে। মুনি-সমাজের (ভরদ্বাজ-আশ্রম) সৎসঙ্গে এই প্রেম ‘কীর্তি-বিধু’ উপমায় উজ্জ্বল হয়—রাম-প্রেম মৃগ-রূপ, যেখানে বাস করে সেখানে কীর্তি চন্দ্রের মতো অনুপম হয়। ঋদ্ধি-সিদ্ধি-রচিত বৈভব-पूজা দেখিয়ে তুলসীদাস সূক্ষ্ম সিদ্ধান্ত স্থাপন করেন: তপোবলে ঐশ্বর্য আসতে পারে, কিন্তু ভরতের লক্ষ্য ঐশ্বর্য নয়—‘রাম-পদ-দর্শন’; এটাই ভক্তির নিষ্কাম স্বরূপ। পরে দেবগুরুর উপদেশ ‘নির্গুণ-অলেপ’ রামের ‘সগুণ’ হওয়ার কারণ বলে—ভক্ত-প্রেম। এভাবে খণ্ড-রচনায় এই প্রসঙ্গ সোপান-ক্রমে সাধককে ‘শোক’ থেকে ‘সেবা’, আর ‘সেবা’ থেকে ‘সমর্পণ’-এর সিঁড়ি বেয়ে তোলে।

Spoken translationRamcharitmanas Ayodhya Kanda, Prakarana 22

Verses

চৌপাই 210.1-4

कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा।जहँ बस राम पेम मृगरूपा।।

तात गलानि करहु जियँ जाएँ।डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ।।

सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं।उदासीन तापस बन रहहीं।।

सब साधन कर सुफल सुहावा।लखन राम सिय दरसनु पावा।।

तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा।सहित पयाग सुभाग हमारा।।

भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ।कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ।।

सुनि मुनि बचन सभासद हरषे।साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।

धन्य धन्य धुनि गगन पयागा।सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा।।

kīrati bidhu tumha kīnha anūpā |jahã basa rāma pema mṛgarūpā ||

tāta galāni karahu jiyã jāẽ |ḍarahu daridrahi pārasu pāẽ ||

sunahu bharata hama jhūṭha na kahahīṁ |udāsīna tāpasa bana rahahīṁ ||

saba sādhana kara suphala suhāvā |lakhana rāma siya darasanu pāvā ||

tehi phala kara phalu darasa tumhārā |sahita payāga subhāga hamārā ||

bharata dhanya tumha jasu jagu jayaū |kahi asa pema magana puni bhayaū ||

suni muni bacana sabhāsada haraṣe |sādhu sarāhi sumana sura baraṣe ||

dhanya dhanya dhuni gagana payāgā |suni suni bharatu magana anurāgā ||

তুমি অনুপম কীর্তির চন্দ্র সৃষ্টি করেছ, যাতে রামের প্রেম হরিণরূপে বাস করে। বৎস, হৃদয়ে কেন অনুতাপ কর? পারস পাথর পেয়ে দরিদ্রতা ভয় কর? শোন ভরত, আমরা মিথ্যা বলি না। আমরা উদাসীন তাপস, বনে বাস করি। সকল সাধনের সুফল সুন্দর ফল এই, লক্ষণ, রাম ও সীতার দর্শন পেয়েছি। সেই ফলের ফল তোমার দর্শন। প্রয়াগ ও আমি উভয়েই সৌভাগ্যবান। ভরত, তুমি ধন্য, তোমার যশ জগতে জয়লাভ করেছে। এই বলে মুনি পুনরায় প্রেমে মগ্ন হলেন। মুনির বাক্য শুনে সভাসদরা আনন্দিত হলেন; সাধুরা প্রশংসা করলেন, আর দেবতারা পুষ্প বর্ষণ করলেন। "ধন্য, ধন্য!" ধ্বনিতে আকাশ ও প্রয়াগ প্রকম্পিত হলো, বারবার শুনে ভরত প্রেমে মগ্ন হলেন।

দোহা 210

पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन।करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन।।⁠210।।

pulaka gāta hiyã rāmu siya sajala saroruha naina |kari pranāmu muni maṁḍalihi bole gadagada baina ||⁠210||

শরীরে রোমাঞ্চ, হৃদয়ে রাম ও সীতা, কমল-নয়ন অশ্রুতে ভরা, ভরত মুনিমণ্ডলকে প্রণাম করে আবেগে আটকে যাওয়া কণ্ঠে কথা বললেন।

চৌপাই 211.1-4

मुनि समाजु अरु तीरथराजू।साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।।

एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई।एहि सम अधिक न अघ अधमाई।।

तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ।उर अंतरजामी रघुराऊ।।

मोहि न मातु करतब कर सोचू।नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू।।

नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू।पितहु मरन कर मोहि न सोकू।।

सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए।लछिमन राम सरिस सुत पाए।।

राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू।भूप सोच कर कवन प्रसंगू।।

राम लखन सिय बिनु पग पनहीं।करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही।।

muni samāju aru tīratharājū |sā̃cihũ sapatha aghāi akājū ||

ehiṁ thala jauṁ kichu kahia banāī |ehi sama adhika na agha adhamāī ||

tumha sarbagya kahaũ satibhāū |ura aṁtarajāmī raghurāū ||

mohi na mātu karataba kara socū |nahiṁ dukhu jiyã jagu jānihi pocū ||

nāhina ḍaru bigarihi paralokū |pitahu marana kara mohi na sokū ||

sukṛta sujasa bhari bhuana suhāe |lachimana rāma sarisa suta pāe ||

rāma birahã taji tanu chanabhaṁgū |bhūpa soca kara kavana prasaṁgū ||

rāma lakhana siya binu paga panahīṁ |kari muni beṣa phirahiṁ bana banahī ||

এখানে মুনিদের সমাবেশ এবং তীর্থরাজ উপস্থিত। এখানে সত্য শপথও গুরুতর বিষয়, আর মিথ্যা কথা এখানে পাপ ও অনর্থ ছাড়া আর কিছুই আনবে না। এই স্থানে যদি কেউ কিছু মিথ্যা কথা বলে, তবে তার চেয়ে বড় পাপ ও অধমতা আর নেই। আপনি সর্বজ্ঞ, আমি সত্য কথা বলছি, এবং রঘুরাজ অন্তর্যামী, হৃদয়ের কথা জানেন। আমার মাতার কৃতকর্ম নিয়ে আমার কোনো চিন্তা নেই, এবং জগৎ আমাকে হীন মনে করবে ভেবে হৃদয়ে কোনো দুঃখ নেই। পরলোক বিনষ্ট হবে বলে আমার কোনো ভয় নেই, এবং পিতার মৃত্যুতে আমার কোনো শোক নেই। তাঁর সুকৃতি ও সুযশে সুন্দর লোকগুলি ভরে গেছে, এবং তিনি লক্ষ্মণ ও রামের মতো পুত্র লাভ করেছিলেন। রামের বিরহে তিনি ক্ষণভঙ্গুর দেহ ত্যাগ করেছেন, তবে রাজার জন্য শোক করার কী প্রসঙ্গ থাকে? কিন্তু রাম, লক্ষ্মণ ও সীতা, পায়ে পাদুকা না দিয়ে, মুনিবেশ ধারণ করে, বন থেকে বনে ঘুরে বেড়াচ্ছেন।

দোহা 211

अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात।।⁠211।।

ajina basana phala asana mahi sayana ḍāsi kusa pāta |basi taru tara nita sahata hima ātapa baraṣā bāta ||⁠211||

হরিণের চামড়া পরিধান করে, ফল ভক্ষণ করে, মাটির উপর কুশঘাস ও পাতা বিছিয়ে শয়ন করে, গাছের নিচে বাস করে প্রতিদিন শীত, রৌদ্র, বৃষ্টি ও বায়ু সহ্য করেন।

চৌপাই 212.1-4

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती।भूख न बासर नीद न राती।।

एहि कुरोग कर औषधु नाहीं।सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं।।

मातु कुमत बढ़ई अघ मूला।तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला।।

कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू।गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु।।

मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा।घालेसि सब जगु बारहबाटा।।

मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ।बसइ अवध नहिं आन उपाएँ।।

भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई।सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई।।

तात करहु जनि सोचु बिसेषी।सब दुखु मिटहि राम पग देखी।।

ehi dukha dāhã dahai dina chātī |bhūkha na bāsara nīda na rātī ||

ehi kuroga kara auṣadhu nāhīṁ |sodheũ sakala bisva mana māhīṁ ||

mātu kumata baṛhaī agha mūlā |tehiṁ hamāra hita kīnha bãsūlā ||

kali kukāṭha kara kīnha kujaṁtrū |gāṛi avadhi paṛhi kaṭhina kumaṁtru ||

mohi lagi yahu kuṭhāṭu tehiṁ ṭhāṭā |ghālesi saba jagu bārahabāṭā ||

miṭai kujogu rāma phiri āẽ |basai avadha nahiṁ āna upāẽ ||

bharata bacana suni muni sukhu pāī |sabahiṁ kīnha bahu bhā̃ti baṛāī ||

tāta karahu jani socu biseṣī |saba dukhu miṭahi rāma paga dekhī ||

এই জ্বলন্ত দুঃখে দিনরাত আমার বক্ষ পুড়ছে। দিনে ক্ষুধা নেই, রাতে নিদ্রা নেই। এই কুরোগের কোনও ওষুধ নেই। মনে মনে আমি সমগ্র বিশ্ব খুঁজেছি। আমার মাতার কুমন্ত্রণা, যা পাপের মূল, সেই ছিল ছুতার, আর সে আমার হিতকে বানিয়ে দিল কুঠার। কলিযুগের কুকাঠ দিয়ে সে বানাল কুযন্ত্র, আর বনবাসের কঠিন কুমন্ত্র পড়ে তা ভূমিতে গেড়ে দিল। আমার জন্যই সে এই কুটচাল রচনা করল, আর সমগ্র জগতকে বিধ্বস্ত করে পথে বসিয়ে দিল। রাম ফিরে এসে অযোধ্যায় বাস করলে এই কুযোগ মিটবে। অন্য কোনও উপায় নেই। ভরতের কথা শুনে মুনি সুখ পেলেন, আর সকলেই তাঁর বহুবিধ প্রশংসা করলেন। "তাত, এমন বিশেষ শোক করো না। রামের চরণ দেখলে সমস্ত দুঃখ মিটে যাবে।"

দোহা 212

करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।⁠212।।

kari prabodha munibara kaheu atithi pemapriya hohu |kaṁda mūla phala phūla hama dehiṁ lehu kari chohu ||⁠212||

ভরতকে সান্ত্বনা দিয়ে মহামুনি বললেন, প্রেমে প্রিয় হয়ে আমাদের অতিথি হও। কন্দ, মূল, ফল ও ফুল আমরা দিচ্ছি, কৃপা করে গ্রহণ করো।

চৌপাই 213.1-4

सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू।भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।।

जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी।चरन बंदि बोले कर जोरी।।

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा।परम धरम यहु नाथ हमारा।।

भरत बचन मुनिबर मन भाए।सुचि सेवक सिष निकट बोलाए।।

चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई।कंद मूल फल आनहु जाई।।

भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए।प्रमुदित निज निज काज सिधाए।।

मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता।तसि पूजा चाहिअ जस देवता।।

सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई।आयसु होइ सो करहिं गोसाई।।

suni muni bacana bharata hiṁya socū |bhayau kuavasara kaṭhina sãkocū ||

jāni garui gura girā bahorī |carana baṁdi bole kara jorī ||

sira dhari āyasu karia tumhārā |parama dharama yahu nātha hamārā ||

bharata bacana munibara mana bhāe |suci sevaka siṣa nikaṭa bolāe ||

cāhie kīnha bharata pahunāī |kaṁda mūla phala ānahu jāī ||

bhalehīṁ nātha kahi tinha sira nāe |pramudita nija nija kāja sidhāe ||

munihi soca pāhuna baṛa nevatā |tasi pūjā cāhia jasa devatā ||

suni ridhi sidhi animādika āī |āyasu hoi so karahiṁ gosāī ||

মুনির কথা শুনে ভরতের হৃদয়ে চিন্তা হল; সেটি এক অকাল সময় ছিল, এবং তিনি কষ্টকর সংকোচ অনুভব করলেন। তারপর গুরুর বাক্যের গুরুত্ব জেনে তিনি তাঁর চরণে প্রণাম করে হাত জোড় করে বললেন। "আপনার আজ্ঞা আমি মস্তকে ধারণ করব এবং যা আদেশ করবেন তাই করব; এই, প্রভু, আমাদের পরম ধর্ম।" ভরতের কথায় মুনিবরের মন সন্তুষ্ট হল, এবং তিনি তাঁর পবিত্র ও বিশ্বস্ত সেবক ও শিষ্যদের নিকট ডাকলেন। "ভরতকে উপযুক্ত অতিথ্য দিতে হবে; যাও এবং কন্দ, মূল ও ফল নিয়ে এসো।" "ভাল, প্রভু" বলে তারা মস্তক নত করে প্রীতিসহ প্রত্যেকে নিজ নিজ কাজে চলে গেল। মুনি ভাবলেন: "আমি এক মহান অতিথিকে নিমন্ত্রণ করেছি, এবং তাঁর পূজা দেবতার মতো করা উচিত।" এই কথা শুনে ঋদ্ধি, সিদ্ধি, অণিমা প্রভৃতি শক্তিগণ এসে বললেন, "স্বামী, আপনি যা আজ্ঞা দেবেন, তাই আমরা করব।"

দোহা 213

राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज।।⁠213।।

rāma biraha byākula bharatu sānuja sahita samāja |pahunāī kari harahu śrama kahā mudita munirāja ||⁠213||

রামের বিরহে ব্যাকুল ভরত কনিষ্ঠ ভ্রাতা ও সমস্ত সঙ্গীসহ উপস্থিত ছিলেন। মুনিরাজ আনন্দের সহিত বলিলেন, অতিথিরূপে আপ্যায়ন করিয়া তাহাদের শ্রম দূর কর।

চৌপাই 214.1-4

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी।बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।।

कहहिं परसपर सिधि समुदाई।अतुलित अतिथि राम लघु भाई।।

मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू।होइ सुखी सब राज समाजू।।

अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना।जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना।।

भोग बिभूति भूरि भरि राखे।देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे।।

दासीं दास साजु सब लीन्हें।जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें।।

सब समाजु सजि सिधि पल माहीं।जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं।।

प्रथमहिं बास दिए सब केही।सुंदर सुखद जथा रुचि जेही।।

ridhi sidhi sira dhari munibara bānī |baṛabhāgini āpuhi anumānī ||

kahahiṁ parasapara sidhi samudāī |atulita atithi rāma laghu bhāī ||

muni pada baṁdi karia soi ājū |hoi sukhī saba rāja samājū ||

asa kahi raceu rucira gṛha nānā |jehi biloki bilakhāhiṁ bimānā ||

bhoga bibhūti bhūri bhari rākhe |dekhata jinhahi amara abhilāṣe ||

dāsīṁ dāsa sāju saba līnheṁ |jogavata rahahiṁ manahi manu dīnheṁ ||

saba samāju saji sidhi pala māhīṁ |je sukha surapura sapanehũ nāhīṁ ||

prathamahiṁ bāsa die saba kehī |suṁdara sukhada jathā ruci jehī ||

ঋদ্ধি ও সিদ্ধি মুনিবরের বাণী মস্তকে ধারণ করে নিজেদেরকে অত্যন্ত ভাগ্যবতী মনে করল। সিদ্ধিগণ পরস্পরের সঙ্গে বলল: রামের অনুজ ভ্রাতা অতুলনীয় অতিথি। মুনির চরণে প্রণাম করে আজ সেই কাজ করা হোক, যাতে সমস্ত রাজসমাজ সুখী হয়। এই বলে তাঁরা অনেক রমণীয় গৃহ নির্মাণ করল, যা দেখে দেবগণের বিমানসমূহও লজ্জিত হয়। সেখানে প্রচুর ভোগ ও ঐশ্বর্য ভরে রাখল, যা দেখে অমরগণও অভিলাষে আকৃষ্ট হল। দাসী ও দাসদের সমস্ত সাজ-সরঞ্জামসহ গ্রহণ করল, তারা মনোযোগে সেবায় নিযুক্ত রইল। এক মুহূর্তে সিদ্ধিগণ সমস্ত সমাজকে সেই সুখে সজ্জিত করল, যা দেবপুরীতেও স্বপ্নে পাওয়া যায় না। প্রথমে সকলকে বাসস্থান দিল, সুন্দর ও সুখদায়ক, যার যার যেমন রুচি।

দোহা 214

बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह।।⁠214।।

bahuri saparijana bharata kahũ riṣi asa āyasu dīnha |bidhi bisamaya dāyaku bibhava munibara tapabala kīnha ||⁠214||

তারপর ঋষি ভরতকে তাঁর পরিজনসহ এইরূপ আদেশ দিলেন, আর মুনিবর তপস্যার বলে ব্রহ্মাকেও বিস্মিত করবে এমন ঐশ্বর্য সৃষ্টি করলেন।

চৌপাই 215.1-4

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका।सब लघु लगे लोकपति लोका।।

सुख समाजु नहिं जाइ बखानी।देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी।।

आसन सयन सुबसन बिताना।बन बाटिका बिहग मृग नाना।।

सुरभि फूल फल अमिअ समाना।बिमल जलासय बिबिध बिधाना।।

असन पान सुच अमिअ अमी से।देखि लोग सकुचात जमी से।।

सुर सुरभी सुरतरु सबही कें।लखि अभिलाषु सुरेस सची कें।।

रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी।सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।।

स्रक चंदन बनितादिक भोगा।देखि हरष बिसमय बस लोगा।।

muni prabhāu jaba bharata bilokā |saba laghu lage lokapati lokā ||

sukha samāju nahiṁ jāi bakhānī |dekhata birati bisārahīṁ gyānī ||

āsana sayana subasana bitānā |bana bāṭikā bihaga mṛga nānā ||

surabhi phūla phala amia samānā |bimala jalāsaya bibidha bidhānā ||

asana pāna suca amia amī se |dekhi loga sakucāta jamī se ||

sura surabhī surataru sabahī keṁ |lakhi abhilāṣu suresa sacī keṁ ||

ritu basaṁta baha tribidha bayārī |saba kahã sulabha padāratha cārī ||

sraka caṁdana banitādika bhogā |dekhi haraṣa bisamaya basa logā ||

যখন ভরত মুনির প্রভাব দেখলেন, তখন লোকপতিদের সমস্ত লোক তাঁর কাছে তুচ্ছ মনে হলো। সুখের সমাবেশ বর্ণনা করা যায় না; তা দেখে জ্ঞানীরাও বৈরাগ্য ভুলে গেলেন। আসন, শয্যা, সুবস্ত্র, বিতান, বন, উদ্যান, বহু প্রকার পক্ষী ও মৃগ ছিল। সুগন্ধি ফুল ও ফল অমৃতের সমান, বিবিধ বিধানে নির্মল জলাশয় ছিল। আহার ও পানীয় পবিত্র ও অমৃতের ন্যায়; তা দেখে পার্থিব লোকেরা লজ্জায় সংকুচিত হলেন। সকলের জন্য ছিল দিব্য গাভী ও কল্পবৃক্ষ; তা দেখে ইন্দ্র ও শচীর অভিলাষ জাগ্রত হলো। বসন্ত ঋতু, ত্রিবিধ বায়ু প্রবাহিত; চারটি পদার্থ সকলের কাছে সুলভ ছিল। মালা, চন্দন, নারী প্রভৃতি ভোগ; তা দেখে লোকেরা আনন্দ ও বিস্ময়ে আবিষ্ট হলেন।

দোহা 215

संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।⁠215।।

saṁpata cakaī bharatu caka muni āyasa khelavāra |tehi nisi āśrama piṁjarā̃ rākhe bhā bhinusāra ||⁠215||

সাংসারিক ঐশ্বর্য ছিল চাকবি পাখি, ভরত ছিল চাকওয়া পাখি, আর মুনির আজ্ঞা ছিল সেই পাখির ব্যবসায়ী যিনি তাদের সাথে খেলা করেন। সেই রাতে তিনি তাদের আশ্রমের পিঞ্জরে রাখলেন, যতক্ষণ না ভোর হলো।

চৌপাই 216.1-4

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा।नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा।।

रिषि आयसु असीस सिर राखी।करि दंडवत बिनय बहु भाषी।।

पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे।चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें।।

रामसखा कर दीन्हें लागू।चलत देह धरि जनु अनुरागू।।

नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया।पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया।।

लखन राम सिय पंथ कहानी।पूँछत सखहि कहत मृदु बानी।।

राम बास थल बिटप बिलोकें।उर अनुराग रहत नहिं रोकैं।।

दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला।भइ मृदु महि मगु मंगल मूला।।

kīnha nimajjanu tīratharājā |nāi munihi siru sahita samājā ||

riṣi āyasu asīsa sira rākhī |kari daṁḍavata binaya bahu bhāṣī ||

patha gati kusala sātha saba līnhe |cale citrakūṭahiṁ citu dīnheṁ ||

rāmasakhā kara dīnheṁ lāgū |calata deha dhari janu anurāgū ||

nahiṁ pada trāna sīsa nahiṁ chāyā |pemu nemu bratu dharamu amāyā ||

lakhana rāma siya paṁtha kahānī |pū̃chata sakhahi kahata mṛdu bānī ||

rāma bāsa thala biṭapa bilokeṁ |ura anurāga rahata nahiṁ rokaiṁ ||

daikhi dasā sura barisahiṁ phūlā |bhai mṛdu mahi magu maṁgala mūlā ||

ভরত তীর্থরাজ প্রয়াগে স্নান করলেন, এবং সমস্ত সঙ্গ সহ মুনির কাছে মস্তক নত করলেন। ঋষির আজ্ঞা ও আশীর্বাদ মস্তকে ধারণ করে দণ্ডবৎ প্রণাম করলেন, এবং বহু বিনয়ী অনুনয় করলেন। পথ চলার কুশলী সকল সঙ্গী সাথে নিলেন, এবং চিত্রকূটের দিকে মন দিয়ে চললেন। রামের সখার হাতে হাত রাখলেন, চলতে চলতে যেন অনুরাগ দেহ ধারণ করেছে। পায়ে পাদত্রাণ নেই, মস্তকে ছায়া নেই; প্রেম, নিয়ম, ব্রত ও ধর্ম ছলচাতুরি রহিত। লক্ষ্মণ, রাম ও সীতার পথযাত্রার কাহিনী সখাকে জিজ্ঞাসা করলেন, সখা কোমল বাণীতে বর্ণনা করলেন। রাম যেখানে বাস করেছিলেন সেই বৃক্ষ দেখে, হৃদয়ের অনুরাগ আর রুদ্ধ রইল না। তাঁর অবস্থা দেখে দেবতারা ফুল বর্ষণ করলেন, পৃথিবী কোমল হলো এবং পথ মঙ্গলের মূল হলো।

দোহা 216

किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात।।⁠216।।

kiẽ jāhiṁ chāyā jalada sukhada bahai bara bāta |tasa magu bhayau na rāma kahã jasa bhā bharatahi jāta ||⁠216||

ছায়া দিয়ে মেঘ সঙ্গে সঙ্গে চলল, আর সুখদায়ী মন্দ বাতাস বইল। রামের কাছে পথ কখনো এমন স্নিগ্ধ হয়নি, যেমন ভরত যাওয়ার সময় হয়েছিল।

চৌপাই 217.1-4

जड़ चेतन मग जीव घनेरे।जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।।

ते सब भए परम पद जोगू।भरत दरस मेटा भव रोगू।।

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं।सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं।।

बारक राम कहत जग जेऊ।होत तरन तारन नर तेऊ।।

भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता।कस न होइ मगु मंगलदाता।।

सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं।भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं।।

देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू।जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू।।

गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई।रामहि भरतहि भेंट न होई।।

jaṛa cetana maga jīva ghanere |je citae prabhu jinha prabhu here ||

te saba bhae parama pada jogū |bharata darasa meṭā bhava rogū ||

yaha baṛi bāta bharata kai nāhīṁ |sumirata jinahi rāmu mana māhīṁ ||

bāraka rāma kahata jaga jeū |hota tarana tārana nara teū ||

bharatu rāma priya puni laghu bhrātā |kasa na hoi magu maṁgaladātā ||

siddha sādhu munibara asa kahahīṁ |bharatahi nirakhi haraṣu hiyã lahahīṁ ||

dekhi prabhāu suresahi socū |jagu bhala bhalehi poca kahũ pocū ||

gura sana kaheu karia prabhu soī |rāmahi bharatahi bheṁṭa na hoī ||

জড় ও চেতন অসংখ্য জীব পথে ছিল, যারা প্রভুকে দেখেছিল এবং যাদের প্রভু দেখেছিল। তারা সকলেই পরম পদের যোগ্য হল, এবং ভরতের দর্শনে সংসাররোগ দূর হল। এটি ভরতের জন্য বড় কথা নয়, যাকে রাম মনে স্মরণ করেন। জগতে যারা একবার রামের নাম কহে, তারাও উত্তারণ ও তারণে সমর্থ হয়। ভরত রামের প্রিয় এবং আবার তাঁর ছোট ভাই, তবে কি করে পথ মঙ্গলদাতা না হবে? সিদ্ধ, সাধু ও মুনিবরেরা এইরূপ বললেন, ভরতকে দেখে হৃদয়ে আনন্দ প্রাপ্ত হলেন। ভরতের প্রভাব দেখে সুরেশ চিন্তিত হলেন, জগতে ভালো ভালোর কাছে মেলে, নীচ নীচের কাছে মেলে। গুরুকে বললেন, গুরু, এমন কিছু করুন যেন রাম ও ভরতের মিলন না হয়।

দোহা 217

रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि।।⁠217।।

rāmu sãkocī prema basa bharata sapema payodhi |banī bāta begarana cahati karia jatanu chalu sodhi ||⁠217||

রাম প্রেমের বশে সংকুচিত, আর ভরত প্রেমের সমুদ্র। সুবিধাগত বিষয়টি আপনা থেকে আপনি নষ্ট হতে চলেছে; চেষ্টা করতে হবে এবং কৌশল অন্বেষণ করতে হবে।

চৌপাই 218.1-4

बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने।सहसनयन बिनु लोचन जाने।।

मायापति सेवक सन माया।करइ त उलटि परइ सुरराया।।

तब किछु कीन्ह राम रुख जानी।अब कुचालि करि होइहि हानी।।

सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ।निज अपराध रिसाहिं न काऊ।।

जो अपराधु भगत कर करई।राम रोष पावक सो जरई।।

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा।यह महिमा जानहिं दुरबासा।।

भरत सरिस को राम सनेही।जगु जप राम रामु जप जेही।।

bacana sunata suraguru musakāne |sahasanayana binu locana jāne ||

māyāpati sevaka sana māyā |karai ta ulaṭi parai surarāyā ||

taba kichu kīnha rāma rukha jānī |aba kucāli kari hoihi hānī ||

sunu suresa raghunātha subhāū |nija aparādha risāhiṁ na kāū ||

jo aparādhu bhagata kara karaī |rāma roṣa pāvaka so jaraī ||

lokahũ beda bidita itihāsā |yaha mahimā jānahiṁ durabāsā ||

bharata sarisa ko rāma sanehī |jagu japa rāma rāmu japa jehī ||

তাঁর কথা শুনে দেবগুরু মুচকি হাসলেন, কারণ তিনি বুঝলেন যে সহস্রনয়ন ইন্দ্র আসলে দেখার চোখ ছাড়াই আছেন। হে দেবরাজ, মায়াপতির সেবকের কাছে যদি কেউ মায়া করে, তবে তা উল্টে নিজের ওপরই পড়ে। তখন আমি রামের মনোভাব বুঝে কিছু করেছিলাম; এখন তুমি যদি কুচক্র করো তবে কেবল ক্ষতিই হবে। শোনো হে দেবেশ, রঘুনাথের স্বভাব এই যে নিজের প্রতি কৃত অপরাধে তিনি কারও ওপর রাগ করেন না। কিন্তু যে তাঁর ভক্তের প্রতি অপরাধ করে, সে রামের রোষের অগ্নিতে দগ্ধ হয়। এই ইতিহাস লোকে ও বেদে প্রসিদ্ধ; এই মহিমা দুর্বাসা ভালো করে জানেন। রামের কাছে ভরতের মতো প্রিয় আর কে? জগৎ রামের নাম জপ করে, আর রাম জপ করেন ভরতের নাম।

দোহা 218

मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु।।⁠218।।

manahũ na ānia amarapati raghubara bhagata akāju |ajasu loka paraloka dukha dina dina soka samāju ||⁠218||

হে অমরপতি, মনেও রঘুবরের ভক্তের অনিষ্ট ভাবিও না। এতে এ লোকে অপকীর্তি, পরলোকে দুঃখ, আর দিন দিন শোকের সমাগম বাড়ে।

চৌপাই 219.1-4

सुनु सुरेस उपदेसु हमारा।रामहि सेवकु परम पिआरा।।

मानत सुखु सेवक सेवकाई।सेवक बैर बैरु अधिकाई।।

जद्यपि सम नहिं राग न रोषू।गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू।।

करम प्रधान बिस्व करि राखा।जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।

तदपि करहिं सम बिषम बिहारा।भगत अभगत हृदय अनुसारा।।

अगुन अलेप अमान एकरस।रामु सगुन भए भगत पेम बस।।

राम सदा सेवक रुचि राखी।बेद पुरान साधु सुर साखी।।

अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई।करहु भरत पद प्रीति सुहाई।।

sunu suresa upadesu hamārā |rāmahi sevaku parama piārā ||

mānata sukhu sevaka sevakāī |sevaka baira bairu adhikāī ||

jadyapi sama nahiṁ rāga na roṣū |gahahiṁ na pāpa pūnu guna doṣū ||

karama pradhāna bisva kari rākhā |jo jasa karai so tasa phalu cākhā ||

tadapi karahiṁ sama biṣama bihārā |bhagata abhagata hṛdaya anusārā ||

aguna alepa amāna ekarasa |rāmu saguna bhae bhagata pema basa ||

rāma sadā sevaka ruci rākhī |beda purāna sādhu sura sākhī ||

asa jiyã jāni tajahu kuṭilāī |karahu bharata pada prīti suhāī ||

শোনো দেবরাজ, আমার উপদেশ: রামের কাছে তাঁর সেবক পরম প্রিয়। সেবকের সেবায় তিনি সুখ পান, আর সেবকের প্রতি বৈরিতা তাঁর কাছে অধিক বৈরিতা। যদিও তিনি সম, না রাগ না রোষ, না পাপ না পুণ্য, না গুণ না দোষ গ্রহণ করেন, তবু বিশ্বে কর্মকে প্রধান করে রেখেছেন, যেমন করে যে তেমনই ফল ভোগ করে। তথাপি তিনি সমভাবে ও বিষমভাবে আচরণ করেন, ভক্ত ও অভক্তের হৃদয় অনুসারে। গুণহীন, নির্লেপ, অহংকারশূন্য, একরস হয়েও ভক্তের প্রেমে বশীভূত রাম সগুণ রূপ ধারণ করেছেন। রাম সদা সেবকের রুচি রক্ষা করেছেন, বেদ, পুরাণ, সাধু ও দেবতারা এর সাক্ষী। এইরূপ হৃদয়ে জেনে কুটিলতা ত্যাগ করো, ভরতের চরণে সুন্দর প্রেম করো।

দোহা 219

राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल।।⁠219।।

rāma bhagata parahita nirata para dukha dukhī dayāla |bhagata siromani bharata teṁ jani ḍarapahu surapāla ||⁠219||

রামের ভক্তরা পরের হিতে নিয়ত, অন্যের দুঃখে দুঃখী, এবং দয়ালু। হে দেবরাজ, ভরত ভক্তদের শিরোমণি, তাঁকে ভয় করো না।

Frequently Asked Questions

परम्परागत मान्यता में यह अंश ‘भरत-भक्ति’ का स्मरण कराता है: निष्काम सेवा, गुरु-वचन-पालन, और भक्त-अपराध से बचने की शिक्षा देता है। इसके पाठ से ‘विरह’ शोक न रहकर साधना बनता है, तथा ‘भव-रोग’ (अहं/आसक्ति) शान्त होता है—विशेषतः ‘राम भगत परहित निरत’ वाले सिद्धान्त का संस्कार दृढ़ होता है।

इस प्रसंग में प्रचलित समपुट/पुनरावृत्ति-रूप से ‘राम’ नाम-जप (जैसे ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’) या ‘राम-भरत-मिलाप’ की कामना हेतु ‘श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन’ का पाठ कई परम्पराओं में जोड़ा जाता है; किन्तु निश्चित सार्वदेशिक समपुट-मानक नहीं—स्थानीय मानस-गायन परम्परा के अनुसार भेद मिलता है।

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