
Udyoga Parva Adhyāya 132 — Vidura’s Counsel on Udyama, Yaśas, and Kṣātra-Dharma
Upa-parva: Sañjaya–Vidura Nīti (Counsel on Kṣātra-Dharma and Resolve)
Adhyāya 132 presents a sustained ethical admonition attributed to Vidura, directed to Sañjaya, structured as a critique of relinquishing personal valor and adopting a ‘lowly, well-trodden’ path of dependency. Vidura argues that a kṣatriya who withholds his power out of fear of death is socially condemned, and that well-reasoned counsel fails to reach a listener who has become inwardly resigned. The chapter then expands into a warning about political opportunism: observers, emboldened by perceived weakness, consolidate allies and await a moment of crisis. Vidura pivots to a name-ethics motif—Sañjaya should embody his name through victory-oriented resolve—and recalls a prognostic utterance by a brāhmaṇa to sustain hope. A long exemplum on poverty and degradation (described as a form of ‘alternate death’) underscores the stakes of failing to maintain one’s station and dependents. The discourse culminates in a normative kṣatriya profile: do not bow from fear; initiative itself is manliness; maintain deference to brāhmaṇas for dharma while restraining wrongdoing; remain steadfast with or without allies. Across the unit, the instructional aim is the preservation of dignity, institutional responsibility, and ethically bounded decisiveness in governance and service.
Chapter Arc: कुन्ती श्रीकृष्ण से कहती है कि नीति-धर्म के इस संकटकाल में विदुला और उसके पुत्र का प्राचीन संवाद उदाहरण रूप में स्मरण किया जाता है—जहाँ एक माँ अपने पराजित पुत्र को रणभूमि से लौटते देखती है। → विदुला—क्षत्रधर्मरता, दीर्घदर्शिनी और राजसभाओं में विख्यात—अपने पुत्र की पलायन-वृत्ति पर कठोर प्रहार करती है। वह उसे बताती है कि क्षणिक प्रज्वलन भी राख-सी ठंडी दीर्घजीविता से श्रेष्ठ है; पराजय से उपजी लोक-निन्दा, तिरस्कार और आत्म-ग्लानि से मुक्त होने का एक ही मार्ग है—फिर उठना, साहस बाँधना, और अपना राज्य/अधिकार पुनः साधना। → विदुला का तीखा आह्वान चरम पर पहुँचता है: ‘तिन्दुक की जलती लकड़ी की तरह अभी प्रज्वलित हो—धुएँ की तरह निष्प्रभ मत जी।’ वह पुत्र को ‘आयसं हृदयं कृत्वा’—लोहे-सा हृदय कर—पुनः अपने लक्ष्य का शिकार करने को कहती है, और पुरुषार्थ की परिभाषा रखती है: शत्रु के वेग को सहकर सामना करने वाला ही ‘पुरुष’ है; अन्यथा जीवन व्यर्थ-नाम है। → उपदेश का निष्कर्ष यह बनता है कि राजधर्म में प्रिय-सुख का त्याग कर संपत्ति/राज्य की खोज करने वाला शीघ्र ही मंत्रियों का हर्ष बढ़ाता है, प्रजा का विश्वास जगाता है, और अपने मान-सत्त्व-पौरुष को प्रतिष्ठित करता है। विदुला यह भी संकेत देती है कि वीरगति भी लोक में तेज और उत्साह का दीपक बनती है—प्रजा ऐसे राजा पर गर्व करती है। → कुन्ती का यह उदाहरण-प्रस्ताव आगे के संवाद के लिए भूमि बनाता है—क्या धृतराष्ट्र-पुत्रों के अन्याय के सामने पाण्डव ‘धुआँ’ बनकर सहेंगे, या ‘अलात’ बनकर धर्मयुद्ध के लिए प्रज्वलित होंगे?
Verse 1
अपन कातज बा | अरूण त्रयस्त्रिशर्दाधिकशततमोब& ध्याय: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना कुन्त्युवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । विदुलायाश्च संवादं पुत्रस्य च परंतप
কুন্তী বললেন—হে পরন্তপ! এখানেও এক প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত বলা হয়—বিদুলা ও তার পুত্রের সংলাপ।
Verse 2
कुन्ती बोली--शतन्नुओंको संताप देनेवाले श्रीकृष्ण! इस प्रसंगमें विद्वान् पुरुष विदुला और उसके पुत्रके संवाद-रूप इस पुरातन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। अन्र श्रेयश्व भूयश्व॒ यथावद् वक्तुमरहसि । यशस्विनी मन्युमती कुले जाता विभावरी
কুন্তী বললেন—হে শ্রীকৃষ্ণ, অগণিত জনের দুঃখ-সন্তাপ নাশকারী! এই প্রসঙ্গে পণ্ডিতেরা বিদুলা ও তার পুত্রের সংলাপরূপ প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত দেন। এখানে আপনি যথাক্রমে শ্রেয় ও ভূয়—উভয়ই যথাযথভাবে ব্যাখ্যা করুন। সেই যশস্বিনী, মনস্বিনী, কুলজাত, দীপ্তিমতী বিদুলা (বিভাবরী)…
Verse 3
क्षत्रधर्मरता दान्ता विदुला दीर्घदर्शिनी । विश्रुता राजसंसत्सु श्रुत॒वाक्या बहुश्रुता
বিদুলা ক্ষত্রিয়ধর্মে নিবিষ্ট, সংযমশীলা ও দূরদর্শিনী ছিলেন। রাজসভায় তিনি সুপরিমিত বাক্য ও বহুশ্রুত বিদ্যার জন্য প্রসিদ্ধ ছিলেন।
Verse 4
विदुला नाम राजन्या जगरहें पुत्रमौरसम् । निर्जितं सिन्धुराजेन शयानं दीनचेतसम्
বায়ু বললেন—বিদুলা নামে এক রাজকন্যা/রানী নিজের ঔরস পুত্রকে কঠোরভাবে তিরস্কার করলেন; সিন্ধুরাজের কাছে পরাজিত হয়ে সে দীনচিত্তে শয্যায় পড়ে ছিল।
Verse 5
इस इतिहासमें जो कल्याणकारी उपदेश हो, उसे तुम युधिष्ठिरके सामने यथावत् रूपसे फिर कहना। विदुला नामसे प्रसिद्ध एक क्षत्रिय महिला हो गयी हैं, जो उत्तम कुलमें उत्पन्न, यशस्विनी, तेजस्विनी, मानिनी, जितेन्द्रिया, क्षत्रिय-धर्मपरायणा और दूरदर्शिनी थीं। राजाओंकी मण्डलीमें उनकी बड़ी ख्याति थी। वे अनेक शास्त्रोंको जाननेवाली और महापुरुषोंके उपदेश सुनकर उससे लाभ उठानेवाली थीं। एक समय उनका पुत्र सिन्धुराजसे पराजित हो अत्यन्त दीनभावसे घर आकर सो रहा था। राजरानी विदुलाने अपने उस औरस पुत्रको इस दशामें देखकर उसकी बड़ी निन्दा की ।। विदुलोवाच अनन्दन मया जात द्विषतां हर्षवर्धन । न मया त्वं न पित्रा च जातः क्वाभ्यागतो हासि,विदुला बोली--अरे, तू मेरे गर्भसे उत्पन्न हुआ है तो भी मुझे आनन्दित करनेवाला नहीं है। तू तो शत्रुओंका ही हर्ष बढ़ानेवाला है, इसलिये अब मैं ऐसा समझने लगी हूँ कि तू मेरी कोखसे पैदा ही नहीं हुआ। तेरे पिताने भी तुझे उत्पन्न नहीं किया; फिर तुझ-जैसा कायर कहाँसे आ गया?
বিদুলা বললেন—হে পুত্র! আমার গর্ভে জন্মেও তুমি আমাকে আনন্দ দাও না; বরং শত্রুদেরই হর্ষ বাড়াও। তাই মনে হয়, তুমি না আমার থেকে জন্মেছ, না তোমার পিতার থেকে; তবে এমন কাপুরুষ আমাদের মধ্যে কোথা থেকে এলে?
Verse 6
निर्मन्युश्नाप्पसंख्येय: पुरुष: क्लीबसाधन: । यावज्जीवं निराशोडसि कल्याणाय धुरं वह,तू सर्वथा क्रोधशून्य है, क्षत्रियोंमें गणना करनेयोग्य नहीं है। तू नाममात्रका पुरुष है। तेरे मन आदि सभी साधन नपुंसकोंके समान हैं। क्या तू जीवनभरके लिये निराश हो गया? अरे! अब भी तो उठ और अपने कल्याणके लिये पुनः युद्धका भार वहन कर
বায়ু বললেন—তোমার মধ্যে ধর্মসম্মত ক্রোধ নেই; ক্ষত্রিয়দের মধ্যে গণ্য হওয়ার যোগ্য নও। তুমি কেবল নামে পুরুষ; তোমার মন ও সকল সামর্থ্য নপুংসকের মতো। তুমি কি সারাজীবনের জন্য নিরাশ হয়ে গেলে? এখনও ওঠো—নিজ কল্যাণের জন্য আবার যুদ্ধের ভার গ্রহণ করো।
Verse 7
मा55त्मानमवमन्यस्व मैनमल्पेन बीभर: । मन: कृत्वा सुकल्याणं मा भैस्त्वं प्रतिसंहर,अपनेको दुर्बल मानकर स्वयं ही अपनी अवहेलना न कर, इस आत्माका थोड़े धनसे भरण-पोषण न कर, मनको परम कल्याणमय बनाकर--उसे शुभ संकल्पोंसे सम्पन्न करके निडर हो जा, भयको सर्वथा त्याग दे
নিজেকে দুর্বল ভেবে আত্মঅবমাননা কোরো না। তুচ্ছ উপায়ে এই আত্মাকে টিকিয়ে রেখো না। মনকে সর্বতোভাবে কল্যাণময়—উচ্চ সংকল্পে পূর্ণ—করে নির্ভয় হও; ভয় থেকে মনকে ফিরিয়ে এনে সম্পূর্ণভাবে তা ত্যাগ করো।
Verse 8
उत्तिष्ठ हे कापुरुष मा शेष्वैवं पराजित: । अमित्रान् नन्दयन् सर्वान् निर्मानो बन्धुशोकद:,ओ कायर! उठ, खड़ा हो, इस तरह शत्रुसे पराजित होकर घरमें शयन न कर (उद्योगशून्य न हो जा)। ऐसा करके तो तू सब शत्रुओंको ही आनन्द दे रहा है और मान- प्रतिष्ठासे वंचित होकर बन्धु-बान्धवोंको शोकमें डाल रहा है
হে কাপুরুষ! ওঠ, দাঁড়াও; শত্রুর কাছে পরাজিত হয়ে এভাবে ঘরে শুয়ে থেকো না। এই নিষ্ক্রিয়তায় তুমি সকল শত্রুকেই আনন্দ দাও; সম্মান-আত্মমর্যাদা হারিয়ে নিজের স্বজনদের দুঃখের কারণ হয়ে ওঠো।
Verse 9
सुपूरा वै कुनदिका सुपूरो मूषिकाउ्जलि: । सुसंतोष: कापुरुष: स्वल्पकेनैव तुष्यति,जैसे छोटी नदी थोड़े जलसे अनायास ही भर जाती है और चूहेकी अंजलि थोड़े अन्नसे ही भर जाती है, उसी प्रकार कायरको संतोष दिलाना बहुत सुगम है, वह थोड़ेसे ही संतुष्ट हो जाता है
যেমন ছোট নদী অল্প জলেই সহজে ভরে যায়, আর ইঁদুরের কুঞ্জি অল্প শস্যেই পূর্ণ হয়, তেমনি কাপুরুষকে তুষ্ট করা বড় সহজ—সে সামান্যতেই সন্তুষ্ট হয়ে যায়।
Verse 10
अप्यहेरारुजन् दंष्टामाश्वेव निधनं व्रज । अपि वा संशयं प्राप्प जीविते5पि पराक्रमे:,तू शत्रुरूपी साँपके दाँत तोड़ता हुआ तत्काल मृत्युको प्राप्त हो जा। प्राण जानेका संदेह हो तो भी शत्रुके साथ युद्धमें पराक्रम ही प्रकट कर
শত্রুরূপী সাপের দাঁত ভেঙে দিতে গিয়ে যদি তৎক্ষণাৎ মৃত্যুও আসে, তবু এগিয়ে যাও—মৃত্যুকেও গ্রহণ কর। আর যদি প্রাণ নিয়ে সংশয় হয়, তবু যুদ্ধক্ষেত্রে বীর্যই প্রকাশ কর।
Verse 11
अप्यरे: श्येनवच्छिद्रं पश्येस्त्वं विपरिक्रमन् । विनदन् वाथवा तृष्णीं व्योम्नि वापरिशड्कितः,आकाशमें नि:शंक होकर उड़नेवाले बाज पक्षीकी भाँति रणभूमिमें निर्भय विचरता हुआ तू गर्जना करके अथवा चुप रहकर शत्रुके छिद्र देखता रह
আকাশে নিঃসংশয়ে উড়ে বেড়ানো বাজপাখির মতো রণভূমিতে নির্ভয়ে বিচরণ কর; গর্জন করো বা নীরব থাকো—শত্রুর ফাঁক, তার দুর্বলতার সুযোগ, সতর্ক দৃষ্টিতে খুঁজে দেখো।
Verse 12
त्वमेवं प्रेतवच्छेषे कस्माद् वज़हतो यथा । उत्तिष्ठ हे कापुरुष मा स्वाप्सी: शत्रुनिर्जित:,कायर! तू इस प्रकार बिजलीके मारे हुए मुर्देकी भाँति यहाँ क्यों निश्चेष्ट होकर पड़ा है? बस, तू खड़ा हो जा, शत्रुओंसे पराजित होकर यहाँ पड़ा मत रह
বায়ু বললেন— বজ্রাহত মৃতদেহের মতো তুমি এখানে কেন নিথর পড়ে আছ? ওঠো, হে কাপুরুষ! শত্রুদের কাছে পরাজিত হয়ে এখানে পড়ে থেকো না; অসহায় ভীরুতায় ডুবে যেয়ো না।
Verse 13
मास्तं गमस्त्वं कृपणो विश्रूयस्व स्वकर्मणा । मा मध्ये मा जघन्ये त्वं माधो भूस्तिष्ठ गर्जित:,तू दीन होकर असा न हो जा। अपने शौर्यपूर्ण कर्मसे प्रसिद्धि प्राप्त कर। तू मध्यम, अधम अथवा निकृष्टभावका आश्रय न ले, वरं युद्धभूमिमें सिंहनाद करके डट जा
হতাশায় ডুবে যেয়ো না; দীন-হীন হয়ো না। নিজের বীর্যপূর্ণ কর্মে খ্যাতি অর্জন কর। মধ্যম, অধম বা নীচ ভাবের আশ্রয় নিও না; বরং রণক্ষেত্রে সিংহনাদ করে অটল হয়ে দাঁড়াও।
Verse 14
अलातं तिन्दुकस्येव मुहूर्तमपि विज्वल । मा तुषाग्निरिवानर्चिर्धूमायस्व जिजीविषु:,तू तिन्दुककी जलती हुई लकड़ीके समान दो घड़ीके लिये भी प्रज्वलित हो उठ (थोड़ी देरके ही लिये सही, शत्रुके सामने महान् पराक्रम प्रकट कर); परंतु जीनेकी इच्छासे भूसीकी ज्वालारहित आगके समान केवल धुआँ न कर (मन्द पराक्रमसे काम न ले)
তিন্দুক-কাঠের জ্বলন্ত অঙ্গারের মতো, ক্ষণমাত্র হলেও, জ্বলে ওঠ—শত্রুর সামনে সিদ্ধান্তমূলক বীরত্ব দেখাও। কিন্তু বাঁচার লোভে খড়কুটোর নিঃশিখা আগুনের মতো শুধু ধোঁয়া তুলো না; ভীরু ও নিষ্ফল চেষ্টা কোরো না।
Verse 15
मुहूर्त ज्वलितं श्रेयो न च धूमायितं चिरम् । मा ह सम कस्यचिद् गेहे जनि राज्ञ: खरो मृदु:,दो घड़ी भी प्रज्वलित रहना अच्छा; परंतु दीर्घकालतक धूआँ छोड़ते हुए सुलगना अच्छा नहीं। किसी भी राजाके घरमें अत्यन्त कठोर अथवा अत्यन्त कोमल स्वभावके पुरुषका जन्म न हो
ক্ষণমাত্র জ্বলে ওঠাই শ্রেয়; দীর্ঘকাল শুধু ধোঁয়া দিয়ে জ্বলা নয়। আর কোনো রাজার গৃহে যেন এমন পুরুষের জন্ম না হয়, যে হয় অতিশয় কঠোর, নয়তো অতিশয় কোমল।
Verse 16
कृत्वा मानुष्यकं कर्म सृत्वाजिं यावदुत्तमम् । धर्मस्यानृण्यमाप्रोति न चात्मानं विगर्हते,वीर पुरुष युद्धमें जाकर यथाशक्ति उत्तम पुरुषार्थ प्रकट करके धर्मके ऋणसे उऋण होता है और अपनी निन्दा नहीं कराता है
যে বীর পুরুষ মানবধর্মের কর্তব্য পালন করে—যুদ্ধে প্রবেশ করে—যথাশক্তি সর্বোচ্চ পুরুষার্থ প্রকাশ করে, সে ধর্মের ঋণ থেকে মুক্ত হয় এবং আত্মগ্লানিতে দগ্ধ হয় না।
Verse 17
अलब्ध्वा यदि वा लब्ध्वा नानुशोचति पण्डित: । आनन्तर्य चारभते न प्राणानां धनायते,विद्वान पुरुषको अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो या न हो, वह उसके लिये शोक नहीं करता। वह (अपनी पूरी शक्तिके अनुसार) प्राणपर्यन्त निरन्तर चेष्टा करता है और अपने लिये धनकी इच्छा नहीं करता
পণ্ডিত ব্যক্তি প্রিয় ফল না পেলেও বা পেলেও শোক করে না। সে প্রাণান্ত পর্যন্ত অবিরাম চেষ্টা করে, আর ধনের জন্য প্রাণকে তুচ্ছ করে না।
Verse 18
उद्धावयस्व वीर्य वा तां वा गच्छ ध्रुवां गतिम् । धर्म पुत्राग्रतः कृत्वा किंनिमित्तं हि जीवसि
বায়ু বললেন—“তোমার বীর্য জাগাও ও কর্মে প্রবৃত্ত হও; নতুবা সেই নিশ্চিত, চূড়ান্ত গতি লাভ করো। ধর্মপুত্রদের (পাণ্ডবদের) অগ্রে স্থাপন করে, তবে তুমি কোন উদ্দেশ্যে এখনও বেঁচে আছ?”
Verse 19
बेटा! धर्मको आगे रखकर या तो पराक्रम प्रकट कर अथवा उस गतिको प्राप्त हो जा, जो समस्त प्राणियोंके लिये निश्चित है, अन्यथा किसलिये जी रहा है? ।। इष्टापूर्त हि ते क्लीब कीर्तिश्न सकला हता । विच्छिन्नं भोगमूलं ते किनिमित्तं हि जीवसि
বায়ু বললেন—“বৎস! ধর্মকে অগ্রে রেখে হয় বীরত্ব প্রকাশ করো, নয়তো সেই ধ্রুব গতি লাভ করো যা সকল প্রাণীর জন্য নির্ধারিত; নইলে তুমি কেন বেঁচে আছ? হে নপুংসক! তোমার ইষ্ট-আপূর্ত কর্ম ও সমগ্র কীর্তি বিনষ্ট; তোমার ভোগের মূলই ছিন্ন—তবে তুমি কোন কারণে জীবিত?”
Verse 20
कायर! तेरे इष्ट और आपूर्त कर्म नष्ट हो गये, सारी कीर्ति धूलमें मिल गयी और भोगका मूल साधन राज्य भी छिन गया, अब तू किसलिये जी रहा है? ।। शत्रुर्निमज्जता ग्राह्मो जड्घायां प्रपतिष्यता । विपरिच्छिन्नममूलो5पि न विषीदेत् कथंचन
বায়ু বললেন—“শত্রু ডুবতে থাকলেও তাকে আঁকড়ে ধরতে হয়; সে পিছলে পড়তে উদ্যত হলেও উরুতে আঘাত করে তাকে ফেলে দিতে হয়। আশ্রয় ছিন্ন হয়ে, মূলহীন বলে মনে হলেও, কোনোভাবেই হতাশ হওয়া উচিত নয়।”
Verse 21
कुरु सत्त्वं च मानं च विद्धि पौरुषमात्मन:
বায়ু বললেন—“সাহস ও স্থৈর্য ধারণ কর, আত্মসম্মান ও মান রক্ষা কর। জেনে রাখো—পৌরুষ তোমার নিজের মধ্যেই নিহিত।”
Verse 22
यस्य वृत्तं न जल्पन्ति मानवा महदद्भुतम्
যার মহৎ ও বিস্ময়কর চরিত্রের কথা মানুষ একেবারেই উচ্চারণ করে না…
Verse 23
दाने तपसि सत्ये च यस्य नोच्चरितं यश:
দান, তপস্যা ও সত্যে নিবিষ্ট হয়েও যার যশ উচ্চারিত হয় না।
Verse 24
श्रुतेन तपसा वापि श्रिया वा विक्रमेण वा
শ্রুতি-বিদ্যা দ্বারা হোক, তপস্যা দ্বারা হোক, শ্রী-সমৃদ্ধি দ্বারা হোক, কিংবা বীরত্ব-পরাক্রম দ্বারা—
Verse 25
न त्वेव जालमीं कापालीं वृत्तिमेषितुमहसि
কিন্তু তুমি কখনোই জাল-কারের বা কপালধারী কপালিকের জীবিকা অবলম্বন করতে চেয়ো না।
Verse 26
यमेनमभिनन्देयुरमित्रा: पुरुष कृशम्
হে পুরুষ! সে ক্ষীণ হয়ে, যেন যমের অধীন হয়েছে—এমন দেখে তার শত্রুরা আনন্দ করুক।
Verse 27
लोकस्य समवज्ञातं निहीनासनवाससम् । अहोलाभकरं हीनमल्पजीवनमल्पकम्
যে জগতের দ্বারা তিরস্কৃত, যার আসন ও বস্ত্র নীচ, যে সামান্য লাভই আনে, সর্বতোভাবে হীন ও দীন—এমন জীবন স্বল্পায়ু এবং তুচ্ছ মূল্যবান।
Verse 28
नेदृशं बन्धुमासाद्य बान्धव: सुखमेधते । जिस दुर्बल मनुष्यका शत्रुपक्षेके लोग अभिनन्दन करते हों, जो सब लोगोंके द्वारा अपमानित होता हो, जिसके आसन और वस्त्र निकृष्ट श्रेणीके हों, जो थोड़े लाभसे ही संतुष्ट होकर विस्मय प्रकट करता हो, जो सब प्रकारसे हीन, क्षुद्र जीवन बितानेवाला और ओछे स्वभावका हो, ऐसे बन्धुको पाकर उसके भाई-बन्धु सुखी नहीं होते | २६-२७ ह ।। अवृत्त्यैव विपत्स्यामो वयं राष्ट्रात् प्रवासिता:
এমন আত্মীয়কে পেলে স্বজনেরা সুখে উন্নতি লাভ করে না। যে দুর্বল, যাকে শত্রুপক্ষও প্রশংসা করে, যে সকলের দ্বারা অপমানিত, যার আসন-বস্ত্র নীচ, যে সামান্য লাভেই বিস্মিত ও সন্তুষ্ট হয়, এবং যে সর্বতোভাবে হীন, ক্ষুদ্র ও নীচস্বভাব—এমন ‘আত্মীয়’ আশ্রয় নয়, লজ্জা ও দুঃখের কারণ হয়।
Verse 29
अवल्गुकारिणं सत्सु कुलवंशस्थ नाशनम्
সজ্জনদের মধ্যে যে নীচ ও ঘৃণ্য আচরণ করে, সে কুল-वंশের প্রতিষ্ঠিত মর্যাদা ধ্বংসকারী হয়।
Verse 30
निरमर्ष निरुत्साहं निर्वार्यमरिनन्दनम्
তার মধ্যে না ক্রোধ আছে, না উদ্যম; তবু, হে শত্রুদমন, তাকে নিবৃত্ত করা যায় না।
Verse 31
मा धूमाय ज्वलात्यन्तमाक्रम्य जहि शात्रवान्
শুধু ধোঁয়ায় বিচলিত হয়ো না; প্রবল জ্বালার মধ্যে পদক্ষেপ করে শত্রুদের বিনাশ করো।
Verse 32
एतावानेव पुरुषो यदमर्षी यदक्षमी
বায়ু বললেন—“মানুষ ততটাই, যতটা সে অমর্ষী (রোষ না করা) ও অক্ষমী (অসহিষ্ণু না হওয়া)।”
Verse 33
संतोषो वै श्रियं हन्ति तथानुक्रोश एव च
বায়ু বললেন—“সন্তোষই সত্যিই শ্রী (সমৃদ্ধি) নষ্ট করে—আর অনুকম্পাও তেমনি।”
Verse 34
एभ्यो निकृतिपापे भ्य: प्रमुड्चात्मानमात्मना
বায়ু বললেন—“এই নিকৃতি-রূপ পাপ (প্রতারণার পাপ) থেকে নিজের আত্মবলেই নিজেকে মুক্ত করো।”
Verse 35
परं विषहते यस्मात् तस्मात् पुरुष उच्यते
বায়ুদেব বললেন—“যে পরম (অত্যন্ত) দুঃখও সহ্য করতে পারে, তাই সে ‘পুরুষ’ নামে অভিহিত।”
Verse 36
शुरस्योर्जितसत्त्वस्य सिंहविक्रान्तचारिण:
বায়ু বীরের প্রশংসা করেন—সেই শূরের, যার সত্ত্বশক্তি উর্জিত, আর যে সিংহের ন্যায় বিক্রান্ত পদক্ষেপে চলে।
Verse 37
य आत्मन: प्रियसुखे हित्वा मृगयते श्रियम्,जो अपने प्रिय और सुखका परित्याग करके सम्पत्तिका अन्वेषण करता है, वह शीघ्र ही अपने मन्त्रियोंका हर्ष बढ़ाता है
বায়ু বললেন— যে ব্যক্তি নিজের প্রিয় আরাম-সুখ ত্যাগ করে সমৃদ্ধির অন্বেষণে প্রবৃত্ত হয়, সে অচিরেই তার মন্ত্রীদের আনন্দ ও আস্থা বৃদ্ধি করে।
Verse 38
अमात्यानामथो हर्षमादधात्यचिरेण स:,जो अपने प्रिय और सुखका परित्याग करके सम्पत्तिका अन्वेषण करता है, वह शीघ्र ही अपने मन्त्रियोंका हर्ष बढ़ाता है
বায়ু বললেন— যে ব্যক্তি নিজের প্রিয় আরাম-সুখ এক পাশে রেখে ধন ও উপায়-উপকরণের সাধনায় নিয়োজিত হয়, সে অচিরেই তার মন্ত্রীদের আনন্দ ও আস্থা বাড়ায়; এতে বোঝা যায়, শাসকের সংযম ও অধ্যবসায় রাষ্ট্রসেবকদের মনোবল দৃঢ় করে।
Verse 39
पुत्र उवाच कि नु ते मामपश्यन्त्या: पृथिव्या अपि सर्वया । किमाभरणकृत्यं ते कि भोगैर्जीवितेन वा,पुत्र बोला--माँ! यदि तू मुझे न देखे तो यह सारी पृथ्वी मिल जानेपर भी तुझे क्या सुख मिलेगा? मेरे न रहनेपर तुझे आभूषणोंकी भी क्या आवश्यकता होगी? भाँति-भाँतिके भोगों और जीवनसे भी तेरा कया प्रयोजन सिद्ध होगा?
পুত্র বলল— মা, তুমি যদি আমাকে দেখতে না পাও, তবে সমগ্র পৃথিবী পেলেও তোমার কী আনন্দ হবে? আমি না থাকলে অলংকারেরই বা কী দরকার? নানাবিধ ভোগ— কিংবা জীবন নিজেই— তোমার কোন কাজে লাগবে?
Verse 40
मातोवाच किमद्यकानां ये लोका द्विषन्तस्तानवाप्नुयु: । ये त्वादृतात्मनां लोका: सुहृदस्तान् व्रजन्तु नः,विदुला बोली--बेटा! आज क्या भोजन होगा? इस प्रकारकी चिन्तामें पड़े हुए दरिद्रोंके जो लोक हैं, वे हमारे शत्रुओंको प्राप्त हों और सर्वत्र सम्मानित होनेवाले पुण्यात्मा पुरुषोंके जो लोक हैं, उनमें हमारे हितैषी सुहृद् पधारें
মাতা বললেন— “আজ কী খাব?” এইরূপ দৈনন্দিন ক্ষুধা-দারিদ্র্যের চিন্তায় ডুবে থাকা লোকদের যে লোক, তা আমাদের শত্রুরাই লাভ করুক; আর সর্বত্র সম্মানিত পুণ্যবানদের যে লোক, সেখানে আমাদের হিতৈষী সুহৃদগণ গমন করুন।
Verse 41
भृत्यैर्विहीयमानानां परपिण्डोपजीविनाम् । कृपणानामसत्त्वानां मा वृत्तिमनुवर्तिथा:,संजय! भृत्यहीन, दूसरोंके अन्नपर जीनेवाले, दीन-दुर्बल मनुष्योंकी वृत्तिका अनुसरण न कर
হে সংজয়, যাদের ভৃত্যরা ত্যাগ করেছে, যারা পরের অন্নে জীবিকা চালায়— সেই কৃপণ, নির্জীব লোকদের আচরণ অনুসরণ কোরো না।
Verse 42
अनु त्वां तात जीवन्तु ब्राह्मणा: सुह्ृदस्तथा । पर्जन्यमिव भूतानि देवा इव शतक्रतुम्,तात! जैसे सब प्राणियोंकी जीविका मेघके अधीन है तथा जैसे सब देवता इन्द्रके आश्रित होकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण तथा हितैषी सुहृद् तेरे सहारे जीवन-निर्वाह करें
হে তাত! যেমন সকল প্রাণী মেঘের উপর নির্ভর করে জীবিকা ধারণ করে এবং যেমন সকল দেবতা শতক্রতু ইন্দ্রের আশ্রয়ে জীবন ধারণ করে, তেমনি ব্রাহ্মণগণ ও হিতৈষী সুহৃদগণ তোমার আশ্রয়ে জীবিকা নির্বাহ করুক।
Verse 43
यमाजीवन्ति पुरुष सर्वभूतानि संजय । पकक्वं द्रुममिवासाद्य तस्य जीवितमर्थवत्,संजय! पके फलवाले वृक्षके समान जिस पुरुषका आश्रय लेकर सब प्राणी जीविका चलाते हैं, उसीका जीवन सार्थक है
হে সঞ্জয়! পাকা ফলভরা বৃক্ষের ন্যায় যে পুরুষের আশ্রয় নিয়ে সকল প্রাণী জীবিকা নির্বাহ করে, সেই পুরুষের জীবনই অর্থবহ।
Verse 44
यस्य शूरस्य विक्रान्तैरेधन्ते बान्धवा: सुखम् | त्रिदशा इव शक्रस्य साधु तस्येह जीवितम्,जैसे इन्द्रके पराक्रमसे सब देवता सुखी रहते हैं, उसी प्रकार जिस शूरवीर पुरुषके बल और पुरुषार्थसे उसके भाई-बन्धु सुखपूर्वक उन्नति करते हैं, इस संसारमें उसीका जीवन श्रेष्ठ है
যেমন ইন্দ্রের পরাক্রমে সকল দেবতা সুখে থাকে, তেমনি যে বীরপুরুষের শক্তি ও পুরুষার্থে তার স্বজনেরা সুখে উন্নতি লাভ করে—এই জগতে তার জীবনই শ্রেষ্ঠ।
Verse 45
स्वबाहुबलमाश्रित्य यो<भ्युज्जीवति मानव: । स लोके लभते कीर्ति परत्र च शुभां गतिम्,जो मनुष्य अपने बाहुबलका आश्रय लेकर उत्कृष्ट जीवन व्यतीत करता है, वही इस लोकमें उत्तम कीर्ति और परलोकमें शुभ गति पाता है
যে মানুষ নিজের বাহুবলের আশ্রয়ে উন্নতভাবে জীবন যাপন করে, সে-ই এই লোকেতে উত্তম কীর্তি লাভ করে এবং পরলোকে শুভ গতি পায়।
Verse 132
इस प्रकार श्रीमह्या भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कुन्तीवाक्यविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে কুন্তীবাক্য-বিষয়ক একশ বত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 133
इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि विदुलापुत्रानुशासने त्रयस्त्रिंशयदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें विदुलाका अपने पुत्रको उपदेशविषयक एक सौ तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে ‘বিদুলার পুত্রকে উপদেশ’ নামক একশো তেত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 206
उद्यम्य धुरमुत्कर्षेदाजानेयकृतं स्मरन् | मनुष्य डूबते समय अथवा ऊँचेसे नीचे गिरते समय भी शत्रुकी टाँग अवश्य पकड़े और ऐसा करते समय यदि अपना मूलोच्छेद हो जाय तो भी किसी प्रकार विषाद न करे। अच्छी जातिके घोड़े न तो थकते हैं और न शिथिल ही होते हैं। उनके इस कार्यको स्मरण करके अपने ऊपर रखे हुए युद्ध आदिके भारको उद्योगपूर्वक वहन करे
বায়ুদেব বললেন— “উদ্যম করে জোয়াল তুলে ধর; উত্তমজাত অশ্বদের কীর্তি স্মরণ কর। মানুষ ডুবতে বসুক বা উচ্চতা থেকে পড়ুক, তবু শত্রুর পা আঁকড়ে ধরবে; আর তা করতে গিয়ে প্রাণের মূলই যদি ছিন্ন হয়, তবু বিষাদে ভেঙে পড়বে না। সুশিক্ষিত অশ্বরা না ক্লান্ত হয়, না শিথিল হয়। তাদের দৃষ্টান্ত মনে রেখে যুদ্ধ ও কর্তব্যের ভার অটল প্রয়াসে বহন কর।”
Verse 216
उद्धावय कुल मग्नं त्वत्कृते स्वयमेव हि । बेटा! तू धैर्य और स्वाभिमानका अवलम्बन कर। अपने पुरुषार्थकों जान और तेरे कारण डूबे हुए इस वंशका तू स्वयं ही उद्धार कर
বায়ু বললেন— “পুত্র! তোমার কারণেই যে বংশ ডুবে গেছে, তাকে তোমাকেই নিজে উদ্ধার করতে হবে। ধৈর্য ও আত্মসম্মানের আশ্রয় নাও; নিজের পুরুষার্থ চিনে নাও, এবং নিজের শক্তিতেই এই পতিত কুলকে তুলে ধর।”
Verse 226
राशिवर्धनमात्र स नैव स्त्री न पुन: पुमान् | जिसके महान् और अद्धुत पुरुषार्थ एवं चरित्रकी सब लोग चर्चा नहीं करते हैं, वह मनुष्य अपने द्वारा जनसंख्याकी वृद्धिमात्र करनेवाला है। मेरी दृष्टिमें न तो वह स्त्री है और न पुरुष ही है
বায়ু বললেন— “যে কেবল লোকসংখ্যা বাড়ায়, অথচ যার মহান ও বিস্ময়কর পুরুষার্থ এবং চরিত্রের কথা মানুষ বলে না—সে কেবল সংখ্যাবৃদ্ধি মাত্র। আমার দৃষ্টিতে সে না নারী, না পুরুষ।”
Verse 236
विद्यायामर्थलाभे वा मातुरुच्चार एव स: । दान, तपस्या, सत्यभाषण, विद्या तथा धनोपार्जनमें जिसके सुयशका सर्वत्र बखान नहीं होता है, वह मनुष्य अपनी माताका पुत्र नहीं, मल-मूत्रमात्र ही है
বায়ু বললেন— “বিদ্যা হোক বা অর্থলাভ—যার সুনাম সর্বত্র গীত হয় না, সে সত্যই মায়ের পুত্র নয়; সে যেন মল-মূত্রসম। দান, তপস্যা, সত্যভাষণ, বিদ্যা ও ধনার্জনে যার খ্যাতি ছড়ায় না, তার জন্ম বৃথা।”
Verse 246
जनान् यो5भिभवत्यन्यान् कर्मणा हि स वै पुमान् जो शास्त्रज्ञान, तपस्या, धन-सम्पत्ति अथवा पराक्रमके द्वारा दूसरे लोगोंको पराजित कर देता है, वह उसी श्रेष्ठ कर्मके द्वारा पुरुष कहलाता है
বায়ু বললেন—যে ব্যক্তি নিজের কার্যক্ষম কর্মের দ্বারা অন্যদের অতিক্রম করে, সেই-ই প্রকৃত অর্থে ‘পুরুষ’ নামে অভিহিত হয়। শাস্ত্রজ্ঞান, তপস্যা, ধন-সম্পদ কিংবা পরাক্রম—যে উপায়েই সে লোকদের পরাজিত করুক, সেই উৎকৃষ্ট কর্মের দ্বারাই সে ‘পুরুষ’ বলে স্বীকৃত।
Verse 256
नृशंस्थामयशस्यां च दुःखां कापुरुषोचिताम् | तुझे हिजड़ों, कापालिकों, क्रूर मनुष्यों तथा कायरोंके लिये उचित भिक्षा आदि निन्दनीय वृत्तिका आश्रय कभी नहीं लेना चाहिये; क्योंकि वह अपयश फैलानेवाली और दुःखदायिनी होती है
বায়ুদেব বললেন—হিজড়া, কপালিক, নিষ্ঠুর মানুষ ও কাপুরুষদের উপযুক্ত ভিক্ষা প্রভৃতি নিন্দনীয় জীবিকা কখনও গ্রহণ করা উচিত নয়; কারণ তা অপযশ ডেকে আনে এবং দুঃখদায়িনী।
Verse 286
सर्वकामरसैहीना: स्थानभ्रष्टा अकिंचना: । तेरी कायरताके कारण हमलोग इस राज्यसे निर्वासित होनेपर सम्पूर्ण मनोवांछित सुखोंसे हीन, स्थानभ्रष्ट और अकिंचन हो जीविकाके अभावमें ही मर जायँगे
তোমার কাপুরুষতার কারণে যদি আমরা এই রাজ্য থেকে নির্বাসিত হই, তবে আমরা সকল কাম্য সুখের আস্বাদ থেকে বঞ্চিত, নিজ অবস্থানচ্যুত ও নিঃস্ব হয়ে পড়ব; আর জীবিকার অভাবে শেষ পর্যন্ত মরেই যাব।
Verse 293
कलिं पुत्रप्रवादेन संजय त्वामजीजनम् | संजय! तू सत्पुरुषोंके बीचमें अशोभन कार्य करनेवाला है, कुल और वंशकी प्रतिष्ठाका नाश करनेवाला है। जान पड़ता है, तेरे रूपमें पुत्रके नामपर मैंने कलि-पुरुषको ही जन्म दिया है
বায়ু বললেন—হে সঞ্জয়, ‘পুত্র’ বলে ডাকার অজুহাতে যেন আমি কলিকেই জন্ম দিয়েছি। সঞ্জয়, সৎপুরুষদের মধ্যে থেকেও তুমি অশোভন কর্ম কর; তুমি কুল ও বংশের মর্যাদা ধ্বংস কর। মনে হয়, তোমার রূপে ও পুত্রনামে আমি সত্যিই কলি-পুরুষকেই উৎপন্ন করেছি।
Verse 306
मा सम सीमन्तिनी काचिज्जनयेत् पुत्रमीदृशम् । संसारकी कोई भी नारी ऐसे पुत्रको जन्म न दे, जो अमर्षशून्य, उत्साहहीन, बल और पराक्रमसे रहित तथा शत्रुओंका आनन्द बढ़ानेवाला हो
বায়ু বললেন—জগতে কোনো নারী যেন এমন পুত্র প্রসব না করে—যে ন্যায়সঙ্গত ক্রোধশূন্য, উৎসাহহীন, বল ও পরাক্রমবর্জিত, আর শত্রুদের আনন্দই কেবল বাড়ায়।
Verse 313
ज्वल मूर्धन्यमित्राणां मुहूर्तमपि वा क्षणम् | अरे! धूमकी तरह न उठ। जोर-जोरसे प्रज्वलित हो जा और वेगपूर्वक आक्रमण करके शत्रुसैनिकोंका संहार कर डाल। तू एक मुहूर्त या एक क्षणके लिये भी वैरियोंके मस्तकपर जलती हुई आग बनकर छा जा
বায়ুদেব বললেন—শত্রুদের মস্তকের উপর দাউদাউ করে জ্বলে ওঠ; মুহূর্তও নয়, ক্ষণও নয়—একটুও থেমো না। ধূমকেতুর মতো শুধু উঠে দাঁড়িয়ে থেকো না; প্রবল অগ্নিশিখা হয়ে দ্রুত আঘাত হেনে শত্রুসেনাদের সংহার কর। এক মুহূর্ত বা এক ক্ষণও শত্রুদের শিরে জ্বলন্ত অগ্নির মতো ছেয়ে থাকো।
Verse 326
क्षमावान् निरमर्षश्न नैव स्त्री न पुन: पुमान् । जिस क्षत्रियके हृदयमें अमर्ष है और जो शत्रुओंके प्रति क्षमाभाव धारण नहीं करता, इतने ही गुणोंके कारण वह पुरुष कहलाता है। जो क्षमाशील और अमर्षशून्य है, वह क्षत्रिय नतो स्त्री है और न पुरुष ही कहलाने योग्य है
বায়ু বললেন—যে কেবল ক্ষমাশীল এবং অমর্ষহীন, ক্ষাত্রধর্মের বিচারে সে না ‘স্ত্রী’, না ‘পুরুষ’। যে ক্ষত্রিয়ের হৃদয়ে অমর্ষের আগুন জ্বলে এবং যে শত্রুর প্রতি অনুচিত ক্ষমা ধারণ করে না, সেই গুণেই তাকে ‘পুরুষ’ বলা হয়। কিন্তু যে শুধু ক্ষমাশীল ও অমর্ষশূন্য, সে না ক্ষত্রিয়, না সেই অর্থে ‘পুরুষ’ নামে যোগ্য।
Verse 336
अनुत्थानभये चोभे निरीहो नाश्षुते महत् । संतोष, दया, उद्योगशून्यता और भय--ये सम्पत्तिका नाश करनेवाले हैं। निश्चेष्ट मनुष्य कभी कोई महत्त्वपूर्ण पद नहीं पा सकता
বায়ু বললেন—যে নিষ্ক্রিয় এবং কর্মে উঠতে ভয় পায়, সে কোনো মহৎ ফল লাভ করে না। সন্তোষ যদি আত্মতুষ্টির অলসতায় পরিণত হয়, অনুচিত দয়া, উদ্যোগহীনতা ও ভয়—এগুলোই সমৃদ্ধি নষ্ট করে। যে চেষ্টা করে না, সে কখনও গুরুত্বপূর্ণ পদে পৌঁছায় না।
Verse 346
आयसं हृदयं कृत्वा मृगयस्व पुन: स्वकम् | पराजयके कारण जो लोकमें तेरी निन्दा और तिरस्कार हो रहे हैं, इन सब दोषोंसे तू स्वयं ही अपने-आपको मुक्त कर और अपने हृदयको लोहेके समान दृढ़ बनाकर पुन: अपने योग्य पद (राज्यवैभव)-का अनुसंधान कर
বায়ুদেব বললেন—হৃদয়কে লোহার মতো কঠিন করে আবার যা তোমারই, তা অনুসন্ধান কর। পরাজয়ের কারণেই জগতে তোমাকে নিয়ে যে নিন্দা ও তিরস্কার চলছে, নিজের প্রচেষ্টায় সেই সব দোষ থেকে নিজেকে মুক্ত কর। সংকল্পকে লোহার মতো দৃঢ় করে পুনরায় তোমার যোগ্য পদ—রাজ্যঐশ্বর্য ও সার্বভৌমত্ব—অন্বেষণ কর।
Verse 353
तमाहुर्व्यर्थनामान स्त्रीवद् य इह जीवति । जो पर अर्थात् शत्रुका सामना करके उसके वेगको सह लेता है, वही उस पुरुषार्थके कारण पुरुष कहलाता है। जो इस जगत्में स्त्रीकी भाँति भीरुतापूर्ण जीवन बिताता है, उसका 'पुरुष' नाम व्यर्थ कहा गया है
বায়ু বললেন—যে এ জগতে নারীর মতো ভীরু হয়ে বাঁচে, তাকে ‘পুরুষ’ বলা হয় কেবল নামে। যে শত্রুর মুখোমুখি দাঁড়িয়ে তার আক্রমণের বেগ সহ্য করে, সেই পুরুষার্থের বলেই সত্য ‘পুরুষ’ নামে অভিহিত হয়। কিন্তু যে ভয়ে কাঁপতে কাঁপতে নারীর মতো জীবন কাটায়, তার ‘পুরুষ’ নাম বৃথা।
Verse 366
दिष्टभावं गतस्यापि विषये मोदते प्रजा । यदि बढ़े हुए तेज और उत्साहवाला, शूरवीर एवं सिंहके समान पराक्रमी राजा युद्धमें दैववश वीर-गतिको प्राप्त हो जाय तो भी उसके राज्यमें प्रजा सुखी ही रहती है
বায়ু বললেন—রাজা নিয়তির শেষ পরিণতি লাভ করলেও তার রাজ্যে প্রজারা আনন্দিত থাকে। কারণ তেজ ও উদ্যমে পরিপূর্ণ, শূর এবং সিংহসম পরাক্রমী রাজা যদি দৈববশত যুদ্ধে বীরগতি প্রাপ্ত হন, তবু তাঁর ধর্মময় শাসনের শক্তি ও সেই মহৎ অন্তের মর্যাদায় প্রজারা সন্তুষ্টই থাকে।
Whether preserving life through submissive dependency is ethically acceptable for a kṣatriya, or whether such conduct constitutes a loss of dharmic station—requiring initiative and risk-bearing to protect dignity, dependents, and political legitimacy.
Udyama is presented as the operational core of manliness and leadership: disciplined effort, timely action, and refusal to internalize defeat, while maintaining dharmic boundaries such as respect for brāhmaṇas and restraint of wrongdoing.
No explicit phalaśruti is stated in this unit; the chapter’s self-justifying frame is pragmatic-ethical, implying that understanding and adopting this counsel yields stability, honor, and strategic viability rather than promising ritualized merit through recitation.