
Strī Parva, Adhyāya 2 — Vidura’s Consolation on Kāla, Karma, and the Limits of Lamentation (विदुरोपदेशः)
Upa-parva: Vidura-upadeśa (Counsel to Vaicitravīrya’s heir / Dhṛtarāṣṭra) — Strī Parva, early consolatory discourse
Vaiśaṃpāyana introduces Vidura’s speech addressed to the Kuru ruler (Vaicitravīrya’s heir, Dhṛtarāṣṭra). Vidura urges the king to rise from grief and asserts a general law of impermanence: accumulations end in loss, elevations end in fall, unions end in separation, and life ends in death (anityatā). He argues that when death draws both the courageous and the fearful alike, excessive lamentation does not alter outcomes; time (kāla) cannot be overstepped. He reframes battlefield death as culturally valorized for kṣatriyas, presenting it as non-futile in terms of reputation and posthumous reward, while also grounding counsel in śāstric authority. The discourse then widens into a philosophical anthropology: across saṃsāra, relationships recur in countless forms, so possessiveness and exclusive claims are unstable. Vidura distinguishes the unwise, who are repeatedly seized by daily grief and fear, from the wise, who practice restraint and satisfaction (saṃtoṣa). He offers a practical cognitive ethic: do not ruminate on sorrow; acting without grief is presented as a remedy, because brooding amplifies distress. Finally, he emphasizes karmic continuity: prior action follows a person in every posture and circumstance, and each deed yields fruit in the corresponding condition—reasserting moral causality amid collective loss.
Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के धूमिल श्मशान-सम वातावरण में धृतराष्ट्र शोक से भूमि पर पड़े हैं; राज्य, वंश और विजय—सब राख-सा प्रतीत होता है। → विदुर धृतराष्ट्र को उठाकर धैर्य देने लगते हैं—जीवन-मरण, संयोग-वियोग, संग्रह-क्षय की अनिवार्यता बताते हुए शोक की निरर्थकता पर कठोर, पर हितकारी वाणी रखते हैं। धृतराष्ट्र का मन बार-बार पुत्र-हानि की ओर लौटता है, और विदुर उसे तर्क, नीति और आत्मसंयम से रोकते हैं। → विदुर का निर्णायक उपदेश: ‘संयोग का अंत वियोग है, जीवन का अंत मरण; शोक न अर्थ साधता है, न धर्म, न सुख—यह कर्तव्य-शक्ति को ही क्षीण करता है।’ वे धृतराष्ट्र से कहते हैं कि शोक में डूबने के बजाय कारण-निवारण और आत्म-स्थैर्य का पुरुषार्थ करो। → धृतराष्ट्र को शोक-वेग से बाहर निकालने हेतु विदुर संतोष, विवेक और त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) की मर्यादा का स्मरण कराते हैं; शोक को ‘अग्नि’ मानकर उसे बुझाने का उपाय—धैर्य, विचार और कर्तव्य—स्थापित करते हैं। → धृतराष्ट्र का शोक कुछ थमता है, पर भीतर का ज्वार बना रहता है—अब प्रश्न यह है कि वे इस उपदेश को कर्म में बदल पाएँगे या शोक पुनः उन्हें गिरा देगा।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्या भारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शीकका निवारणविषयक पहला जध्याय पूरा हुआ
বৈশম্পায়ন বললেন— তারপর বিদুর অমৃতসম মধুর বাক্যে পুরুষশ্রেষ্ঠ ধৃতরাষ্ট্রকে আনন্দিত করে বিচিত্রবীর্যের পুত্রকে যা বলেছিলেন, তা শোনো। যুদ্ধোত্তর নগ্ন শোক থেকে কাহিনি এখন ধর্মনিষ্ঠ উপদেশের দিকে মোড় নেয়—এ বাক্য শোককে তোষামোদ করতে নয়, রাজার মনকে স্থির করে সংযম ও যথার্থ বোধে প্রতিষ্ঠিত করতে।
Verse 2
विदुर उवाच उत्तिष्ठ राजन् कि शेषे धारयात्मानमात्मना । एषा वै सर्वसत्त्वानां लोकेश्वर परा गति:
বিদুর বললেন— “রাজন! কেন এভাবে শুয়ে আছ? ওঠো, এবং নিজের বুদ্ধি দ্বারা মনকে স্থির করো। লোকেশ্বর! সকল প্রাণীরই এটাই পরম (শেষ) গতি।”
Verse 3
सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छुया: । संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्
“সব সঞ্চয়ের শেষ ক্ষয়েই; সব উত্থানের শেষ পতনেই; সব মিলনের শেষ বিচ্ছেদেই; আর জীবনের শেষ মৃত্যুতে।”
Verse 4
यदा शूरं च भीरुं च यम: कर्षति भारत । तत् कि न योत्स्यन्ति हि ते क्षत्रिया: क्षत्रियर्षभ
“হে ভারতনন্দন! হে ক্ষত্রিয়শ্রেষ্ঠ! যখন যম বীর ও ভীরু—উভয়কেই টেনে নিয়ে যায়, তখন সেই ক্ষত্রিয়রা যুদ্ধ করবে না কেন?”
Verse 5
अयुध्यमानो ग्रियते युध्यमानश्न जीवति । काल प्राप्प महाराज न कश्चिदतिवर्तते
“মহারাজ! যে যুদ্ধ করে না, সেও মরে; আর যে যুদ্ধ করে, সে-ও বেঁচে থাকতে পারে। নির্ধারিত কাল এসে গেলে কেউই তাকে অতিক্রম করতে পারে না।”
Verse 6
अभावादीनि भूतानि भावमध्यानि भारत । अभावनिधनान्येव तत्र का परिदेवना
হে ভারত! জীবেরা জন্মের আগে অব্যক্ত ছিল, মাঝখানে অল্পকাল ব্যক্ত হয়ে প্রকাশ পায়, আর শেষে আবার অব্যক্ততায় লীন হয়। যখন এটাই জীবনের স্বভাব, তখন বিলাপেরই বা কী ফল?
Verse 7
न शोचन् मृतमन्वेति न शोचन् प्रियते नर: । एवं सांसिद्धिके लोके किमर्थमनुशोचसि
শোকাতুর মানুষ মৃতের সঙ্গে যেতে পারে না, শোক করেও সে নিজে মরে না। যখন জগতের স্বাভাবিক বিধান এমনই, তখন তুমি কেন বারবার শোক করছ?
Verse 8
काल: कर्षति भूतानि सर्वाणि विविधान्युत । न कालस्य प्रिय: वक्रिन्न द्वेष्प: कुरुसत्तम
হে কুরুশ্রেষ্ঠ! কাল নানা প্রকার সকল প্রাণীকেই টেনে নিয়ে যায়। কালের কাছে কেউ প্রিয় নয়, কেউ দ্বেষ্যও নয়।
Verse 9
यथा वायुस्तृणाग्राणि संवर्तयति सर्वश: । तथा कालवशं यान्ति भूतानि भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ जैसे हवा तिनकोंको सब ओर उड़ाती और डालती रहती है, उसी प्रकार समस्त प्राणी कालके अधीन होकर आते-जाते हैं
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যেমন বায়ু তৃণের অগ্রভাগকে সর্বদিকে ঘুরিয়ে-ফিরিয়ে উড়িয়ে দেয়, তেমনই সকল প্রাণী কালের বশে এসে-যায়।
Verse 10
एक्सरार्थप्रयातानां सर्वेषां तत्र गमिनाम् | यस्य काल: प्रयात्यग्रे तत्र का परिदेवना
যারা একসঙ্গে সংসার-যাত্রায় বেরিয়েছে, তাদের সকলকেই একদিন সেই গন্তব্যে (পরলোকে) যেতে হবে। যার সময় আগে এসে পড়ে, সে আগে চলে যায়—এ অবস্থায় শোকই বা কেন?
Verse 11
न चाप्येतान् हतान् युद्धे राजन् शोचितुमर्हसि । प्रमाणं यदि शास्त्राणि गतास्ते परमां गतिम्
রাজন! যুদ্ধে নিহত এই বীরদের জন্য আপনার শোক করা উচিত নয়। আপনি যদি শাস্ত্রকে প্রমাণ মানেন, তবে তারা নিশ্চয়ই পরম গতি লাভ করেছে।
Verse 12
सर्वे स्वाध्यायवन्तो हि सर्वे च चरितव्रता: । सर्वे चाभिमुखा: क्षीणास्तत्र का परिदेवना
তাঁরা সকলেই বেদের স্বাধ্যায়ে নিবিষ্ট ছিলেন; সকলেই নিয়ম-সংযমের ব্রত পালন করতেন। আর সকলেই শত্রুর সম্মুখে দাঁড়িয়ে যুদ্ধে প্রাণ ত্যাগ করেছেন—তবে শোকের অবকাশ কোথায়?
Verse 13
अदर्शनादापतिताः: पुनश्चादर्शनं गता: । नैते तव न तेषां त्वं तत्र का परिदेवना
তাঁরা অদৃশ্য থেকে এসেছিলেন, আবার অদৃশ্যেই ফিরে গেছেন। তাঁরা তোমার নন, তুমিও তাঁদের নও—তবে এখানে শোকের কারণ কী?
Verse 14
हतो5पि लभते स्वर्ग हत्वा च लभते यश: । उभयं नो बहुगुणं नास्ति निष्फलता रणे
যুদ্ধে যে নিহত হয়, সে স্বর্গ লাভ করে; আর যে শত্রুকে বধ করে, সে যশ অর্জন করে। উভয়ই আমাদের জন্য মহালাভ—রণে নিষ্ফলতা বলে কিছু নেই।
Verse 15
तेषां कामदु्घाल्लोकानिन्द्र: संकल्पयिष्यति । इन्द्रस्यातिथयो होते भवन्ति भरतर्षभ
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! ইন্দ্র তাঁদের জন্য কামদুঘা—ইচ্ছামতো ভোগদায়ক—লোকসমূহের ব্যবস্থা করবেন। তাঁরা সকলেই ইন্দ্রের অতিথি হবেন।
Verse 16
न यज्ञैर्दक्षिणावद्धिर्न तपोभिरन विद्यया । स्वर्ग यान्ति तथा मर्त्या यथा शूरा रणे हता:
যুদ্ধক্ষেত্রে নিহত বীরেরা যেমন সহজে স্বর্গে গমন করে, তেমন সহজে মানুষ দানসমৃদ্ধ যজ্ঞ, তপস্যা বা বিদ্যার দ্বারাও স্বর্গে পৌঁছাতে পারে না।
Verse 17
शरीराग्निषु शूराणां जुह॒वुस्ते शराहुती: । हूयमानान् शरांश्वैव सेहुस्तेजस्विनो मिथ:
শূরদের দেহরূপ অগ্নিতে তারা বাণের আহুতি দিল; আর সেই তেজস্বী বীরেরা পরস্পরের দেহাগ্নিতে হোম হতে থাকা বাণসমূহ সহ্য করল।
Verse 18
एवं राजंस्तवाचक्षे स्वर्ग्य पन्थानमुत्तमम् । न युद्धादधिकं किंचित् क्षत्रियस्येह विद्यते
হে রাজন, এইভাবে আমি তোমাকে স্বর্গগামী সর্বোত্তম পথ বলছি—এই জগতে ক্ষত্রিয়ের জন্য ধর্মযুদ্ধের চেয়ে শ্রেষ্ঠ আর কিছু নেই।
Verse 19
क्षत्रियास्ते महात्मान: शूरा: समितिशो भना: । आशिष: परमा: प्राप्ता न शोच्या: सर्व एव हि
তারা মহাত্মা ক্ষত্রিয়, বীর—সমরের সংঘর্ষে যাদের শোভা প্রকাশ পেত। তারা নিজেদের কাম্য পরম ফল লাভ করে উৎকৃষ্ট লোকসমূহে পৌঁছেছে; অতএব তারা কেউই শোকযোগ্য নয়।
Verse 20
आत्मानमात्मना55श्वास्य मा शुचः पुरुषर्षभ । नाद्य शोकाभि भूतस्त्वं कायमुत्स्रष्टमहसि
হে পুরুষশ্রেষ্ঠ, নিজের অন্তঃশক্তি দিয়ে নিজেকে সান্ত্বনা দাও; শোক কোরো না। আজ শোকে আচ্ছন্ন হয়ে তোমার দেহ ত্যাগ করা (আত্মবিনাশে প্রবৃত্ত হওয়া) উচিত নয়।
Verse 21
पुरुषप्रवर! आप स्वयं ही अपने मनको सान्त्वना देकर शोकका परित्याग कीजिये। आज शोकसे व्याकुल होकर आपको अपने शरीरका त्याग नहीं करना चाहिये ।।
বিদুর বললেন— হে পুরুষশ্রেষ্ঠ! নিজ মনকে সান্ত্বনা দিয়ে শোক ত্যাগ করো। আজ শোকে ব্যাকুল হয়ে দেহত্যাগের কথা ভাবা তোমার উচিত নয়। সংসারে বারংবার জন্ম নিয়ে আমরা সহস্র সহস্র মাতা-পিতা এবং শত শত পুত্র-স্ত্রীর সান্নিধ্য ভোগ করেছি—কিন্তু আজ তারা কার, আর আমরা কার?
Verse 22
शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्,शोकके हजारों स्थान हैं और भयके भी सैकड़ों स्थान हैं। वे प्रतिदिन मूढ़ मनुष्यपर ही अपना प्रभाव डालते हैं, विद्वान् पुरुषपर नहीं
শোকের হাজারো কারণ আছে, ভয়েরও শত শত কারণ আছে। দিন দিন সেগুলি কেবল মোহগ্রস্ত মানুষকেই গ্রাস করে; পণ্ডিতকে নয়।
Verse 23
न कालस्य प्रिय: वक्षरिन्न द्वेष्प: कुरुसत्तम । न मध्यस्थ: क्वचित्काल: सर्व काल: प्रकर्षति
হে কুরুশ্রেষ্ঠ! কালের কারও প্রতি প্রীতি নেই, কারও প্রতি দ্বেষও নেই। কাল কখনও নিরপেক্ষ হয়ে থাকে না; কাল সকলকেই টেনে নিয়ে যায়।
Verse 24
काल: पचति भूतानि काल: संहरते प्रजा: । काल: सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रम:
কালই সকল প্রাণীকে পরিপক্ব করে, কালই প্রজাদের সংহার করে। সকলের নিদ্রার মধ্যেও কাল জাগ্রত থাকে; কাল অতিক্রম করা সত্যিই দুরূহ।
Verse 25
अनित्यं यौवन रूप॑ं जीवित द्रव्यसंचय: । आरोग्यं प्रियसंवासो गृद्धयेदेषु न पण्डित:
যৌবন ও রূপ অনিত্য; জীবন এবং ধনসঞ্চয়ও অনিত্য। আরোগ্য এবং প্রিয়জনদের সঙ্গে একত্র বাসও ক্ষণস্থায়ী; তাই পণ্ডিত ব্যক্তি এগুলিতে আসক্ত হয় না।
Verse 26
न जानपदिकं दुःखमेक: शोचितुमहसि । अप्यभावेन युज्येत तच्चास्य न निवर्तते
যে দুঃখ সমগ্র রাজ্যে নেমে এসেছে, তার জন্য একা তোমারই শোক করা উচিত নয়। শোকে শীর্ণ হয়ে কেউ মরেও গেলে, তবু সেই শোক দূর হয় না।
Verse 27
अशोचन् प्रतिकुर्वीत यदि पश्येत् पराक्रमम् । भैषज्यमेतदू् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत्
যে শোকে আচ্ছন্ন নয়, সে প্রতিপক্ষের পরাক্রম ও উদ্যোগ দেখলে যথোচিত প্রতিকার করবে। দুঃখের প্রকৃত ঔষধ এটাই—বারবার তা নিয়ে চিন্তা না করা।
Verse 28
अनिष्टसम्प्रयोगाच्च विप्रयोगात् प्रियस्य च
অপ্রিয়ের সংযোগ থেকে এবং প্রিয়ের বিচ্ছেদ থেকে (দুঃখ জন্মায়)।
Verse 29
नार्थों न धर्मो न सुखं यदेतदनुशोचसि
যে বিষয়ে তুমি শোক করছ, তাতে না অর্থসিদ্ধি হয়, না ধর্ম, না সুখ।
Verse 30
अन्यामन्यां धनावस्थां प्राप्प वैशेषिकीं नरा:
মানুষ নানা রকম ধন-অবস্থা লাভ করে, প্রত্যেকে নিজের নিজের বিশেষ অবস্থায় পৌঁছে যায়।
Verse 31
प्रज्ञया मानसं दु:खं हन्याच्छारीरमौषधै: । एतद् विज्ञानसामर्थ्य न बालै: समतामियात्
মানুষের উচিত বুদ্ধি-বিবেচনায় মানসিক দুঃখ দূর করা এবং ঔষধে শারীরিক কষ্ট নিবারণ করা—এটাই বিজ্ঞানের শক্তি; শিশুসুলভ অবিবেকী আচরণ তার করা উচিত নয়।
Verse 32
शयानं चानुशेते हि तिष्ठन्तं चानुतिष्ठति । अनुधावति धावन्तं कर्म पूर्वकृतं नरम्,मनुष्यका पूर्वकृत कर्म उसके सोनेपर साथ ही सोता है, उठनेपर साथ ही उठता है और दौड़नेपर भी साथ-ही-साथ दौड़ता है
মানুষের পূর্বকৃত কর্ম তার সঙ্গে অবিচ্ছিন্ন থাকে—সে শোলে কর্মও শোয়, সে ওঠে কর্মও ওঠে, আর সে দৌড়ালে কর্মও পাশাপাশি দৌড়ায়।
Verse 33
यस्यां यस्यामवस्थायां यत् करोति शुभाशुभम् | तस्यां तस्यथामवस्थायां तत्फलं समुपाश्चुते,मनुष्य जिस-जिस अवस्थामें जो-जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसी-उसी अवस्थामें उसका फल भी पा लेता है
মানুষ যে-যে অবস্থায় যে-যে শুভ বা অশুভ কর্ম করে, সেই-সেই অবস্থাতেই তার ফল ভোগ করে।
Verse 34
येन येन शरीरेण यद्यत् कर्म करोति यः । तेन तेन शरीरेण तत्फलं समुपाश्चुते,जो जिस-जिस शरीरसे जो-जो कर्म करता है, दूसरे जन्ममें वह उसी-उसी शरीरसे उसका फल भोगता है
যে যে দেহে মানুষ যে যে কর্ম করে, পরজন্মে সে সেই সেই দেহধারণেই তার ফল ভোগ করে।
Verse 35
आत्मैव ह्ात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: । आत्मैव हात्मन: साक्षी कृतस्यापकृतस्य च,मनुष्य आप ही अपना बन्धु है, आप ही अपना शत्रु है और आप ही अपने शुभ या अशुभ कर्मका साक्षी है
মানুষ নিজেই নিজের বন্ধু, নিজেই নিজের শত্রু; আর নিজের কৃত ও অকৃত—শুভ ও অশুভ কর্মের সাক্ষীও সে নিজেই।
Verse 36
शुभेन कर्मणा सौख्यं दु:ःखं पापेन कर्मणा । कृतं भवति सर्वत्र नाकृतं विद्यते क्वचित्,शुभकर्मसे सुख मिलता है और पापकर्मसे दुःख, सर्वत्र किये हुए कर्मका ही फल प्राप्त होता है, कहीं भी बिना कियेका नहीं
শুভ কর্মে সুখ, পাপ কর্মে দুঃখ। সর্বত্র কৃত কর্মেরই ফল লাভ হয়; অকৃত কর্মের ফল কোথাও হয় না।
Verse 37
न हि ज्ञानविरुद्धेषु बह्नपायेषु कर्मसु । मूलघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधा:
আপনার মতো বুদ্ধিমানরা জ্ঞানের বিরুদ্ধ, বহু বিপদে ভরা এবং মূলে আঘাতকারী কর্মে আসক্ত হন না।
Verse 273
चिन्त्यमानं हि न व्येति भूयश्चापि प्रवर्धते । यदि अपनेमें पराक्रम देखे तो शोक न करते हुए शोकके कारणका निवारण करनेकी चेष्टा करे। दुःखको दूर करनेके लिये सबसे अच्छी दवा यही है कि उसका चिन्तन छोड़ दिया जाय
দুঃখকে বারবার চিন্তা করলে তা দূর হয় না; বরং আরও বেড়ে যায়। তাই নিজের মধ্যে শক্তি দেখলে শোকে ডুবে না থেকে শোকের কারণ দূর করার চেষ্টা করো; দুঃখ নিবারণের শ্রেষ্ঠ ঔষধ হলো তার চিন্তা ত্যাগ করা।
Verse 283
मानुषा मानसैर्दु:खैर्दहान्ते चाल्पबुद्धय: । मन्दबुद्धि मनुष्य ही अप्रिय वस्तुका संयोग और प्रिय वस्तुका वियोग होनेपर मानसिक दुःखोंसे दग्ध होने लगते हैं
অল্পবুদ্ধি মানুষ মানসিক দুঃখে দগ্ধ হয়; অপ্রিয়ের সংযোগ বা প্রিয়ের বিয়োগ ঘটলে তারা অন্তরে অন্তরে জ্বলে ওঠে।
Verse 296
न च नापैति कार्यार्थात्र्त्रिवर्गाच्चैव हीयते । जो आप यह शोक कर रहे हैं
এই শোক না কোনো কার্যসিদ্ধি করে, না অর্থ, না ধর্ম, না সুখ। এতে মানুষ কর্তব্যপথ থেকে বিচ্যুত হয় এবং ধর্ম-অর্থ-কাম—এই ত্রিবর্গ থেকেও বঞ্চিত হয়।
Verse 306
असंतुष्टा: प्रमुहान्ति संतोष॑ यान्ति पण्डिता: । धनकी भिन्न-भिन्न अवस्थाविशेषको पाकर असंतोषी मनुष्य तो मोहित हो जाते हैं; परंतु विद्वान् पुरुष सदा संतुष्ट ही रहते हैं
ধনের নানা অবস্থাভেদ লাভ করে অসন্তুষ্ট মানুষ মোহগ্রস্ত হয়ে পড়ে; কিন্তু পণ্ডিতজন সর্বদা সন্তোষে স্থিত থাকেন। অসন্তোষ বিচারবুদ্ধিকে আচ্ছন্ন করে, আর সন্তোষ মনকে ধর্মে স্থির রাখে।
The dilemma is whether a ruler should remain absorbed in personal grief after mass loss or reassert disciplined agency; Vidura argues that lamentation cannot reverse kāla and that duty requires composure and action.
Recognize impermanence and the neutrality of time; reduce suffering by limiting rumination; cultivate discernment and contentment; and accept karmic continuity—actions yield results and must be met with responsible conduct.
No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is instructional, positioning grief-management and karmic realism as prerequisites for ethical governance and for progressing toward later, more formal dharma discourses.
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