
शल्यस्य पाण्डवसेनापीडनम् — Śalya’s Assault on the Pāṇḍava Host (with Omens and Bhīma’s Counter)
Upa-parva: Śalya–Yudhiṣṭhira Saṅgrāma-prasaṅga (Battle Escalation and Omens Episode)
Sanjaya reports a chaotic, high-intensity phase of fighting marked by mutual attrition, fleeing cavalry, and the cries of elephants and infantry. The Pāṇḍavas and Kauravas exchange lethal volleys as dawn advances. Observing the Kaurava army faltering, Śalya advances toward the Pāṇḍava formation and engages aggressively, showering arrows on Yudhiṣṭhira and other principal warriors (Bhīma, the twins, Draupadī’s sons, Dhṛṣṭadyumna, Śikhaṇḍin). The text introduces omen imagery—earth tremors, meteors, and animals moving inauspiciously—signaling heightened disorder. Multiple duels and counter-attacks unfold as Kṛtavarmā, Kṛpa, Śakuni, Aśvatthāman, and others intervene to protect Śalya and check Pāṇḍava offensives. The chapter climaxes with an extended, technical depiction of Bhīma’s formidable gadā, followed by Bhīma’s close-quarters action that disrupts Śalya’s chariot team and strikes Śalya’s charioteer, forcing a tactical setback. The Pāṇḍavas acknowledge Bhīma’s performance as the engagement continues.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि जब कौरव-सेना टूटकर भागने लगती है, तब मद्रराज शल्य क्रोध और लज्जा से भर उठते हैं और सारथि को आदेश देते हैं—घोड़ों को वेग से बढ़ाकर उन्हें शत्रु-पंक्ति के बीच पहुँचा दे, ताकि आज युद्ध में उनका पराक्रम देखा जाए। → शल्य के आगे बढ़ते ही दोनों पक्षों की बिखरी टुकड़ियाँ फिर से भिड़ जाती हैं। धृष्टद्युम्न के नेतृत्व में पाण्डव-वीर तीखे बाणों की वर्षा करते हुए कौरव-सेना पर टूट पड़ते हैं। इसी उथल-पुथल में नकुल का रथ शत्रु-मध्य में चमकता है; वह बाणों को रोकते हुए परवीरों का संहार करता है और कर्ण-पुत्रों की ओर युद्ध को खींच लाता है। → नकुल और कर्ण के पुत्रों (विशेषतः सुषेण, सत्यसेन आदि) के बीच घोर रथ-युद्ध चरम पर पहुँचता है—सुषेण क्रुद्ध होकर नकुल को बाणों से बींधता है, पर नकुल प्रत्युत्तर में उनके अस्त्रों को निष्फल कर दो-दो बाणों से उन्हें घायल करता है और निर्णायक प्रहारों से कर्ण के तीन पुत्रों का वध कर देता है। → कर्ण-पुत्रों के गिरते ही कौरव-पक्ष में शोक और क्षोभ फैलता है, पर युद्ध रुकता नहीं। दोनों ओर से सैकड़ों-हजारों योद्धा कटते हैं; पाण्डव-सेना धृष्टद्युम्न के साथ आगे धकेलती है, और कौरव-सेना भी प्रतिहिंसा में प्राणघातक प्रतिरोध करती है। → रक्त-धूल से ढँके रण में शल्य का आवेग और कौरवों की जिद अगले टकराव की भूमिका बाँधती है—युद्ध का पलड़ा अभी स्थिर नहीं, और अगले क्षण किसका रथ टूटेगा, यह अनिश्चित रहता है।
Verse 1
अपन बक। ] अतिफ्ऑशाड< दशमो< ध्याय: नकुलद्वारा कर्णके तीन पुत्रोंका वध तथा उभयपक्षकी सेनाओंका भयानक युद्ध संजय उवाच तत् प्रभग्नं बल॑ दृष्टवा मद्रराज: प्रतापवान् । उवाच सारथिं तूर्ण चोदयाश्वान् महाजवान्
সেনাবল ভেঙে পড়তে দেখে প্রতাপশালী মদ্ররাজ তৎক্ষণাৎ সারথিকে বললেন—“আমার অতিবেগী অশ্বদের তাড়াও।”
Verse 2
संजय कहते हैं--राजन्! उस सेनाको इस तरह भागती देख प्रतापी मद्रराज शल्यने अपने सारथिसे कहा--'सूत! मेरे महावेगशाली घोड़ोंको शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ाओ ।।
রাজন! সেনাকে এভাবে পালাতে দেখে প্রতাপশালী মদ্ররাজ শল্য সারথিকে বললেন—“হে সূত! আমার মহাবেগী অশ্বদের তৎক্ষণাৎ এগিয়ে চালাও। দেখো, সামনে পাণ্ডুপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির দাঁড়িয়ে আছেন—মস্তকে শোভিত শুভ্র ছত্রে তিনি দীপ্তিমান।”
Verse 3
अत्र मां प्रापय क्षिप्रं पश्य मे सारथे बलम् | न समर्थों हि मे पार्थ: स्थातुमद्य पुरो युधि
“সারথি! আমাকে দ্রুত তার কাছে পৌঁছে দাও; তারপর আমার শক্তি দেখো। আজ যুদ্ধে সেই পৃথাপুত্র যুধিষ্ঠির আমার সামনে দাঁড়াতে সক্ষম নয়।”
Verse 4
एवमुक्तस्तत: प्रायान्मद्रराजस्य सारथि: । यत्र राजा सत्यसंधो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:,उनके ऐसा कहनेपर मद्रराजका सारथि वहीं जा पहुँचा, जहाँ सत्यप्रतिज्ञ धर्मपुत्र युधिष्ठिर खड़े थे
এভাবে বলা হলে মদ্ররাজের সারথি তৎক্ষণাৎ রওনা হয়ে সেখানে পৌঁছাল, যেখানে সত্যসন্ধ, ধর্মপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির দাঁড়িয়ে ছিলেন।
Verse 5
प्रापतत् तच्च सहसा पाण्डवानां महद् बलम् | दधारैको रणे शल्यो वेलोद्वृत्तमिवार्णवम्
সেই সঙ্গে পাণ্ডবদের বিশাল সেনাও হঠাৎ সেখানে এসে পড়ল; কিন্তু যেমন তট উথলে ওঠা সমুদ্রকে রোধ করে, তেমনি একাই শল্য রণক্ষেত্রে সেই সেনার অগ্রগতি থামিয়ে দিলেন।
Verse 6
पाण्डवानां बलौघस्तु शल्यमासाद्य मारिष | व्यतिष्ठत तदा युद्धे सिन्धोर्वेग इवाचलम्
হে মান্য নৃপ! পাণ্ডবদের সেনাস্রোত শল্যের কাছে এসে যুদ্ধে সেখানেই থেমে দাঁড়াল—যেমন নদীর প্রবল স্রোত পর্বতের কাছে এসে রুদ্ধ হয়।
Verse 7
मद्रराजं तु समरे दृष्टवा युद्धाय धिष्ठितम् । कुरव: संन्यवर्तन्त मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्
সমরাঙ্গণে মদ্ররাজ শল্যকে যুদ্ধের জন্য অটল দাঁড়িয়ে থাকতে দেখে কৌরবরা ফিরে এল; তারা মৃত্যুকেই প্রত্যাবর্তনের শেষ সীমা স্থির করে পুনরায় রণক্ষেত্রে প্রবেশ করল।
Verse 8
तेषु राजन् निवृत्तेषु व्यूढानीकेषु भागश: । प्रावर्तत महारौद्र: संग्राम: शोणितोदक:
রাজন! তারা সকলেই পৃথক পৃথক ব্যূহে বিন্যস্ত হয়ে ফিরে এলে, উভয় পক্ষের মধ্যে মহাভয়ংকর যুদ্ধ শুরু হল—যেখানে জলের মতো রক্ত প্রবাহিত হতে লাগল।
Verse 9
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ
সঞ্জয় বললেন—ঠিক সেই মুহূর্তে যুদ্ধোন্মত্ত নকুল কর্ণপুত্র চিত্রসেনের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল। বিচিত্র ধনুকধারী সেই দুই বীর মুখোমুখি হয়ে দক্ষিণ ও উত্তর দিক থেকে আগত দুই মহা বর্ষণমেঘের মতো পরস্পরের উপর তীরের ধারায় জলবর্ষণ করতে লাগল।
Verse 10
मेघाविव यथोद्वृत्तौ दक्षिणोत्तरवर्षिणौ । शरतोयै: सिषिचतुस्तौ परस्परमाहवे
দক্ষিণ ও উত্তর দিক থেকে বর্ষণকারী, উঁচুতে উঠা দুই মেঘের মতো তারা দু’জন যুদ্ধে পরস্পরকে তীররূপী জলে সিক্ত করতে লাগল।
Verse 11
नान्तरं तत्र पश्यामि पाण्डवस्येतरस्य च । उभौ कृतास्त्रौ बलिनौ रथचर्याविशारदौ
আমি সেখানে পাণ্ডব ও তার প্রতিদ্বন্দ্বীর মধ্যে কোনো পার্থক্য দেখি না। উভয়েই অস্ত্রবিদ্যায় সিদ্ধ, উভয়েই বলবান, এবং উভয়েই রথযুদ্ধে পারদর্শী।
Verse 12
चित्रसेनस्तु भललेन पीतेन निशितेन च
তখন চিত্রসেন হলদে বর্ণের, অত্যন্ত ধারালো ভল্ল (প্রশস্ত-মুখ) তীরে বিদ্ধ হল।
Verse 13
अथीैनं छिन्नधन्वानं रुक्मपुड्खै: शिलाशितै:
তার ধনুক ছিন্ন হয়ে গেলে, স্বর্ণপুচ্ছযুক্ত ও পাথরে শান দেওয়া তীর দিয়ে তারা তাকে বিদ্ধ করতে লাগল।
Verse 14
त्रिभि: शरैरसम्भ्रान्तो ललाटे वै समार्पयत् । धनुष कट जानेपर उनके ललाटमें शिलापर तेज किये हुए सुनहरे पंखवाले तीन बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। उस समय चित्रसेनके चित्तमें तनिक भी घबराहट नहीं हुई ।।
সঞ্জয় বললেন—অবিচলিত চিত্তে সে প্রতিপক্ষের ললাটে তিনটি বাণ গেঁথে দিল। তারপর তীক্ষ্ণ শর নিক্ষেপ করে অশ্বগুলিকেও মৃত্যুর পথে পাঠাল।
Verse 15
स शत्रुभुजनिर्मुक्तिर्ललाटस्थैस्त्रिभि: शरै:
সঞ্জয় বললেন—ললাটে গাঁথা সেই তিন বাণের ফলে সে শত্রুর বাহুবন্ধন থেকে মুক্ত হল।
Verse 16
स च्छिन्नधन्वा विरथ: खड्गमादाय चर्म च
সঞ্জয় বললেন—ধনুক ছিন্ন হয়ে রথহীন হলে সে খড়্গ ও ঢাল তুলে নিল।
Verse 17
पद्भ्यामापततस्तस्य शरवृष्टिं समासृजत्
সঞ্জয় বললেন—সে পায়ে হেঁটে ঝাঁপিয়ে পড়ে তার উপর শরবৃষ্টি বর্ষণ করল।
Verse 18
चित्रसेनरथं प्राप्य चित्रयोधी जितश्रम:
সঞ্জয় বললেন—চিত্রসেনের রথে পৌঁছে সেই বিচিত্র-যোদ্ধা, ক্লান্তি জয় করে, আবার দৃঢ়ভাবে যুদ্ধ চালিয়ে গেল।
Verse 19
सकुण्डलं समुकुटं सुनसं स्वायतेक्षणम्
সঞ্জয় বললেন—তিনি কুণ্ডল ও মুকুটে ভূষিত, সুগঠিত নাসিকাযুক্ত এবং বৃহৎ, দীর্ঘায়ত নয়নবিশিষ্ট হয়ে প্রকাশিত হলেন।
Verse 20
स पपात रथोपस्थे दिवाकरसमद्युति:,सूर्यके समान तेजस्वी चित्रसेन रथके पिछले भागमें गिर पड़ा। चित्रसेनको मारा गया देख वहाँ खड़े हुए पाण्डव महारथी नकुलको साधुवाद देने और प्रचुरमात्रामें सिंहनाद करने लगे
সঞ্জয় বললেন—সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান চিত্রসেন রথের মঞ্চে লুটিয়ে পড়ল, রথের পশ্চাৎভাগের দিকে ঢলে গেল। চিত্রসেন নিহত হয়েছে দেখে সেখানে দাঁড়ানো পাণ্ডব মহারথীরা নকুলকে সাধুবাদে প্রশংসা করল এবং প্রবল সিংহনাদ তুলল।
Verse 21
चित्रसेनं विशस्तं तु दृष्टवा तत्र महारथा: | साधुवादस्वनांश्चक्रुः सिंहनादांश्व पुष्कलान्
চিত্রসেনকে নিহত দেখে সেখানে উপস্থিত মহারথীরা সাধুবাদধ্বনি তুলল এবং প্রচুর সিংহনাদ করল।
Verse 22
विशस्तं भ्रातरं दृष्टवा कर्णपुत्रौ महारथौ । सुषेण: सत्यसेनश्व मुज्चन्ती विविधान् शरान्
সঞ্জয় বললেন—নিজ ভ্রাতাকে নিহত দেখে কর্ণের দুই পুত্র, মহারথী সুষেণ ও সত্যসেন, নানাবিধ শর নিক্ষেপ করতে লাগল।
Verse 23
ततो<भ्यधावतां तूर्ण पाण्डवं रथिनां वरम् । अपने भाईको मारा गया देख कर्णके दो महारथी पुत्र सुषेण और सत्यसेन नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र नकुलपर तुरंत ही चढ़ आये ।।
সঞ্জয় বললেন—তারপর ভ্রাতা নিহত হয়েছে দেখে কর্ণের দুই মহারথী পুত্র সুষেণ ও সত্যসেন নানাবিধ শরবর্ষণ করতে করতে রথীদের শ্রেষ্ঠ পাণ্ডুপুত্র নকুলের উপর দ্রুত ধেয়ে এল। হে রাজন, যেমন মহাবনে দুই ব্যাঘ্র এক হাতীকে বধ করার অভিপ্রায়ে তার দিকে ছুটে যায়, তেমনি সেই দুই তীক্ষ্ণস্বভাব ভ্রাতা মহারথী নকুলের উপর চারদিক থেকে শরসমূহ বর্ষণ করতে লাগল—যেন দুই মেঘ অবিরাম ধারাবৃষ্টি ঝরায়।
Verse 24
तावभ्यधावतां तीक्ष्णौ द्वावप्येनं महारथम् | शरौघान् सम्यगस्यन्तौ जीमूती सलिलं यथा
সঞ্জয় বললেন—সেই দুই তীক্ষ্ণবীর মহারথীর দিকে ধেয়ে এসে নিখুঁত লক্ষ্য স্থির করে তার উপর তীরের প্রবল বর্ষণ করতে লাগল; যেন দুই মেঘ জলধারা ঢেলে দেয়।
Verse 25
स शरै: सर्वतो विद्ध: प्रह्दष्ट इव पाण्डव: । अन्यत् कार्मुकमादाय रथमारुह्य वेगवान्
সঞ্জয় বললেন—চারদিক থেকে তীরে বিদ্ধ হয়েও সেই পাণ্ডব যেন উল্লসিত; সে আরেকটি ধনুক তুলে দ্রুত রথে আরোহণ করল।
Verse 26
तस्य तौ भ्रातरौ राजन् शरै: संनतपर्वभि:
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, তার সেই দুই ভাইও এমন তীরে আঘাতপ্রাপ্ত হল, যাদের গাঁট শক্ত ও সুগঠিত ছিল।
Verse 27
ततः प्रहस्य नकुलश्षतुर्भिश्चतुरो रणे
সঞ্জয় বললেন—তখন নকুল হাসতে হাসতে রণক্ষেত্রে চার শত্রুর মুখোমুখি দাঁড়াল।
Verse 28
ततः संधाय नाराचं रुक्मपुड्खं शिलाशितम्
সঞ্জয় বললেন—তারপর সে স্বর্ণপক্ষযুক্ত ও শিলায় শানিত নারাচ তীর সংযোজিত করে লক্ষ্য স্থির করল।
Verse 29
धनुश्चिच्छेद राजेन्द्र सत्यसेनस्थ पाण्डव: । राजेन्द्र! तत्पश्चात् सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले एक नाराचका संधान करके पाण्डुपुत्र नकुलने सत्यसेनका धनुष काट दिया || २८ $ ।।
সঞ্জয় বললেন—রাজেন্দ্র! সত্যসেনের সম্মুখে অবস্থানকারী পাণ্ডব নকুল তার ধনু ভেঙে দিল। তারপর সে অন্য রথে উঠে আরেকটি ধনু গ্রহণ করে পুনরায় যুদ্ধে প্রবৃত্ত হল।
Verse 30
अविध्यत् तावसम्भ्रान्तो माद्रीपुत्र: प्रतापवान्
তখন প্রতাপশালী মাদ্রীপুত্র (নকুল) বিচলিত না হয়ে শত্রুকে বিদ্ধ করল।
Verse 31
सुषेणस्तु ततः क्रुद्ध: पाण्डवस्य महद् धनु:
তখন ক্রুদ্ধ সুষেণ পাণ্ডবের মহাধনুর দিকে ধাবিত হল।
Verse 32
अथान्यद् धनुरादाय नकुल: क्रोधमूर्च्छित:
তখন ক্রোধে আচ্ছন্ন নকুল আরেকটি ধনু গ্রহণ করল।
Verse 33
सत्यसेनस्य च भनुर्हस्तावापं च मारिष
আর, হে মারিষ! সত্যসেনের ভানু এবং হস্তাবাপও (সেখানে ছিলেন)।
Verse 34
अथान्यद् धनुरादाय वेगघ्नं भारसाधनम्
তারপর তিনি আর-একটি ধনুক তুলে নিলেন—যা শত্রুর বেগ রোধ করতে সক্ষম এবং ভারী টান সহ্য করার উপযুক্ত—এবং যুদ্ধের পরবর্তী পর্বের জন্য প্রস্তুত হলেন।
Verse 35
संनिवार्य तु तान् बाणान् नकुल: परवीरहा
সেই তীরগুলি প্রতিহত করে, পরবীর-হন্তা নকুল ধর্মানুযায়ী অটল দাঁড়িয়ে রইল; এক পা-ও পিছিয়ে গেল না।
Verse 36
तावेन॑ प्रत्यविध्येतां पृथक् पृथगजिह्दगैः
তখন তারা দু’জনেই পৃথক পৃথকভাবে সোজা ও তীক্ষ্ণ তীরে পাল্টা আঘাত হানতে লাগল—দক্ষতা ও দৃঢ়সংকল্পের নিরন্তর সংঘর্ষ যেন।
Verse 37
सत्यसेनो रथेषां तु नकुलस्य धनुस्तथा
সঞ্জয় বললেন: রথীদের মধ্যে সত্যসেন; আর তদ্রূপ নকুলের ধনুক—যুদ্ধে বীরত্বের সঙ্গে অস্ত্র-সামগ্রীর কথাও অবিচ্ছেদ্য।
Verse 38
स रथे5तिरथस्तिष्ठन् रथशक्ति परामृशत्
সঞ্জয় বললেন: তিনি অতিরথীর মতো রথে অটল দাঁড়িয়ে রথ-শক্তি (ভালা) ধরলেন—নির্ণায়ক আঘাতের জন্য প্রস্তুত।
Verse 39
स्वर्णदण्डामकुण्ठाग्रां तैलधौतां सुनिर्मलाम् । लेलिहानामिव विभो नागकन्यां महाविषाम्
সঞ্জয় বললেন—হে প্রভু! (তিনি) সোনার দণ্ডযুক্ত, অ-কুণ্ঠিত অগ্রভাগবিশিষ্ট, তেলে ধোয়া অতিশয় নির্মল সেই শক্তি দেখলেন; জিহ্বা লেলিহান মহাবিষধর নাগকন্যার ন্যায় তা প্রতীয়মান হচ্ছিল।
Verse 40
समुद्यम्य च चिक्षेप सत्यसेनस्य संयुगे । तदनन्तर रथपर खड़े हुए अतिरथी वीर नकुलने एक रथशक्ति हाथमें ली
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে অতিরথী বীর নকুল সোনার দণ্ডযুক্ত রথশক্তি তুলে নিলেন। তার অগ্রভাগ অ-কুণ্ঠ ও অপ্রতিরোধ্য। তেলে ধোয়া সেই শক্তি নির্মল দীপ্তিতে ঝলমল করছিল; জিহ্বার মতো কাঁপতে থাকা তার ধার মহাবিষধর সর্পিণীর ন্যায় প্রতীয়মান। রণক্ষেত্রে সত্যসেনকে লক্ষ্য করে নকুল তা উঁচু করে নিক্ষেপ করলেন; তা সংঘাতে তার হৃদয় বিদীর্ণ করে প্রবেশ করল।
Verse 41
स पपात रथाद् भूमिं गतसत्त्वो5ल्पचेतन: । नरेश्वर! उस शक्ति ने रणभूमिमें उसके वक्ष:स्थलको विदीर्ण कर दिया। सत्यसेनकी चेतना जाती रही और वह प्राणशून्य होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा || ४० ई ।।
সঞ্জয় বললেন—হে নরেশ্বর! সেই শক্তি রণভূমিতে তার বক্ষস্থল বিদীর্ণ করল। তার চেতনা লুপ্ত হল; প্রাণশূন্য হয়ে সে রথ থেকে ভূমিতে পড়ে গেল। ভ্রাতাকে নিহত দেখে সুষেণ ক্রোধে মূর্ছিত হল।
Verse 42
चतुर्भिश्वतुरो वाहान् ध्वजं छित्त्वा च पञचभि:
সঞ্জয় বললেন—চারটি বাণে সে চারটি ঘোড়াকে কেটে ফেলল, আর পাঁচটি বাণে ধ্বজটিও ছিন্ন করল।
Verse 43
नकुलं विरथं दृष्टवा द्रौपदेयो महारथम्
সঞ্জয় বললেন—নকুলকে রথহীন দেখে দ্রৌপদীর পুত্র, সেই মহারথী, (অগ্রসর হল)।
Verse 44
सुतसोमो भिदुद्राव परीप्सन् पितरं रणे । महारथी नकुलको रथहीन हुआ देख द्रौपदीका पुत्र सुतमोम अपने चाचाकी रक्षाके लिये वहाँ दौड़ा आया ।। ततो5घिरुह्मु नकुलः: सुतसोमस्य तं रथम्
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধক্ষেত্রে মহারথী নকুলকে রথহীন দেখে দ্রৌপদীর পুত্র সুতসোম পিতৃব্যের রক্ষার অভিপ্রায়ে দ্রুত ধাবিত হল। তারপর নকুল সুতসোমের সেই রথে আরোহণ করলেন।
Verse 45
शुशुभे भरतश्रेष्ठो गिरिस्थ इव केसरी । तब सुतसोमके उस रथपर आरूढ़ हो भरतश्रेष्ठ नकुल पर्वतपर बैठे हुए सिंहके समान सुशोभित होने लगे ।।
সঞ্জয় বললেন—সুতসোমের রথে আরোহণ করে ভরতশ্রেষ্ঠ নকুল পর্বতশিখরে অবস্থানকারী সিংহের ন্যায় দীপ্তিমান হলেন। তারপর তিনি অন্য ধনুক গ্রহণ করে সুষেণের সঙ্গে যুদ্ধ আরম্ভ করলেন। সেই দুই বীর মহারথী তীরবৃষ্টিতে পরস্পরের মুখোমুখি হয়ে একে অন্যকে বধ করতে উদ্যত হলেন।
Verse 46
तावुभौ शरवर्षाभ्यां समासाद्य परस्परम् | परस्परवधे यत्नं चक्रतु: सुमहारथौ
সঞ্জয় বললেন—সেই দুই মহামহারথী পরস্পরের নিকট এসে তীরবৃষ্টিতে একে অন্যকে আচ্ছন্ন করল এবং পরস্পরকে বধ করতে উদ্যত হল।
Verse 47
सुषेणस्तु ततः क्रुद्ध: पाण्डवं विशिखैस्त्रिभि: | सुतसोम॑ तु विंशत्या बाह्दोरुरगसि चार्पयत्
সঞ্জয় বললেন—তখন ক্রুদ্ধ সুষেণ তিনটি তীক্ষ্ণ তীরে পাণ্ডব নকুলকে বিদ্ধ করল; আর সুতসোমের দুই বাহু ও বক্ষে বিশটি তীর নিক্ষেপ করে গেঁথে দিল।
Verse 48
ततः क्रुद्धो महाराज नकुल: परवीरहा । शरैस्तस्य दिश: सर्वाश्छादयामास वीर्यवान्
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! তখন পরবীর-সংহারী বীর্যবান নকুল ক্রুদ্ধ হয়ে উঠলেন এবং তীরের ঘন বর্ষায় শত্রুর চারিদিকের সমস্ত দিক আচ্ছন্ন করে দিলেন।
Verse 49
ततो गृहीत्वा तीक्ष्णाग्रमर्धचन्द्रं सुतेजनम् । सुवेगवन्तं चिक्षेप कर्णपुत्राय संयुगे,इसके बाद तीखी धारवाले एक अत्यन्त तेज और वेगशाली अर्धचन्द्राकार बाण लेकर उसे समरांगणमें कर्णपुत्रपर चला दिया
তখন তিনি তীক্ষ্ণধার, অর্ধচন্দ্রাকৃতি, অতি দীপ্ত ও মহাবেগবান এক শর গ্রহণ করে যুদ্ধক্ষেত্রে কর্ণপুত্রের দিকে নিক্ষেপ করলেন।
Verse 50
तस्य तेन शिर: कायाज्जहार नृपसत्तम । पश्यतां सर्वसैन्यानां तदद्भुतमिवाभवत्,नृपश्रेष्ठ॒ उस बाणसे नकुलने सम्पूर्ण सेनाओंके देखते-देखते सुषेणका मस्तक धड़से काट गिराया। वह अद्भुत-सी घटना हुई
হে নৃপশ্রেষ্ঠ! সেই শর দ্বারা তিনি সকল সেনার দৃষ্টির সামনেই তার দেহ থেকে মস্তক বিচ্ছিন্ন করলেন; ঘটনাটি যেন বিস্ময়কর বলে প্রতীয়মান হল।
Verse 51
स हत: प्रापतद् राजन् नकुलेन महात्मना । नदीवेगादिवारुग्णस्तीरज: पादपो महान्,महामनस्वी नकुलके हाथसे मारा जाकर सुषेण पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो नदीके वेगसे कटकर महान् तटवर्ती वृक्ष धराशायी हो गया हो
রাজন! মহাত্মা নকুলের হাতে নিহত হয়ে সে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল—যেন নদীর প্রবল স্রোতে উপড়ে পড়া তীরবর্তী এক মহাবৃক্ষ।
Verse 52
कर्णपुत्रवधध॑ दृष्टवा नकुलस्य च विक्रमम् । प्रदुद्राव भयात् सेना तावकी भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! कर्णपुत्रोंका वध और नकुलका पराक्रम देखकर आपकी सेना भयसे भाग चली
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! কর্ণপুত্রের বধ এবং নকুলের পরাক্রম দেখে তোমার সেনা ভয়ে ব্যাকুল হয়ে পালিয়ে গেল।
Verse 53
तां तु सेनां महाराज मद्रराज: प्रतापवान् । अपालयदू रणे शूर: सेनापतिररिंदम:,महाराज! उस समय रणभूमिमें शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर सेनापति प्रतापी मद्रराज शल्यने आपकी उस सेनाका संरक्षण किया
মহারাজ! সেই সময় রণক্ষেত্রে শত্রুদমনকারী বীর সেনাপতি, প্রতাপশালী মদ্ররাজ শল্য তোমার সেই সেনাকে রক্ষা করলেন।
Verse 54
विभीस्तस्थौ महाराज व्यवस्थाप्य च वाहिनीम् | सिंहनादं भृशं कृत्वा धनु:शब्दं च दारुणम्,राजाधिराज! वे जोर-जोरसे सिंहनाद और धनुषकी भयंकर टंकार करके कौरव- सेनाको स्थिर रखते हुए रणभूमिमें निर्भय खड़े थे
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! সেনাবাহিনীকে সুশৃঙ্খল করে স্থির স্থাপন করে তিনি রণক্ষেত্রে নির্ভয়ে অটল দাঁড়ালেন। তিনি প্রবল সিংহনাদ করলেন এবং ধনুকের ভয়ংকর টংকার তুললেন—নিজ পক্ষকে উদ্দীপ্ত করতে ও শত্রুপক্ষে ভীতি সঞ্চার করতে।
Verse 55
तावका: समरे राजन् रक्षिता दृढ्धन्वना । प्रत्युद्ययुररातींस्तु समन््ताद् विगतव्यथा:
সঞ্জয় বললেন—রাজন! দৃঢ়ধন্বী শল্যের রক্ষায় তোমার যোদ্ধারা যুদ্ধে ব্যথা-ভয়মুক্ত হয়ে চারদিক থেকে শত্রুর দিকে অগ্রসর হল।
Verse 56
मद्रराजं महेष्वासं परिवार्य समन्ततः । स्थिता राजन् महासेना योद्धुकामा समन्ततः,नरेश्वरर आपकी विशाल सेना महाथधनुर्थर मद्रराज शल्यको चारों ओरसे घेरकर शत्रुओंके साथ युद्धके लिये खड़ी हो गयी
সঞ্জয় বললেন—রাজন! মহাধনুর্ধর মদ্ররাজ শল্যকে চারদিক থেকে ঘিরে তোমার বিশাল সেনা যুদ্ধাকাঙ্ক্ষায় সর্বদিকে প্রস্তুত হয়ে দাঁড়াল।
Verse 57
सात्यकिर्भीमसेनश्व माद्रीपुत्री च पाण्डवौ । युधिष्ठिरं पुरस्कृत्य ह्वीनिषेवमरिंदमम्,उधरसे सात्यकि, भीमसेन तथा माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेव शत्रुदमन एवं लज्जाशील युधिष्ठिरको आगे करके चढ़ आये
সঞ্জয় বললেন—সাত্যকি, ভীমসেন এবং মাদ্রীপুত্র দুই পাণ্ডব (নকুল-সহদেব) শত্রুদমন, স্বভাবত সংযত ও লজ্জাশীল যুধিষ্ঠিরকে অগ্রে রেখে অগ্রসর হল।
Verse 58
परिवार्य रणे वीरा: सिंहनादं प्रचक्रिरे । बाणशड्खरवांस्तीव्रान् क्ष्वेडाश्न विविधा दधु:
সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে বীরেরা যুধিষ্ঠিরকে চারদিক থেকে ঘিরে সিংহনাদ তুলল। তারা তীক্ষ্ণ বাণধ্বনি ও শঙ্খধ্বনিতে ক্ষেত্র ভরিয়ে দিল এবং নানা রকম যুদ্ধঘোষে গর্জে উঠল।
Verse 59
तथैव तावका: सर्वे मद्राधिपतिमज्जसा । परिवार्य सुसंरब्धा: पुनर्युद्रभरोचयन्,इसी प्रकार आपके समस्त सैनिक मद्रराजको चारों ओरसे घेरकर रोष और आवेशसे युक्त हो पुनः युद्धमें ही रुचि दिखाने लगे
ঠিক তেমনি তোমার সকল যোদ্ধা দ্রুত মদ্রাধিপতিকে চারদিক থেকে ঘিরে, ক্রোধ ও উন্মাদ উদ্দীপনায় দগ্ধ হয়ে, আবার যুদ্ধের প্রতিই আগ্রহ প্রকাশ করল।
Verse 60
ततः प्रववृते युद्ध भीरूणां भयवर्धनम् । तावकानां परेषां च मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्
তারপর এমন এক ভয়ংকর যুদ্ধ শুরু হল, যা ভীরুদের ভয় বাড়ায়। তোমাদের ও শত্রুপক্ষের যোদ্ধারা এমনভাবে লড়ল যে মৃত্যুই যেন প্রত্যাবর্তনের কারণ—মানুষ কেবল নিহত হয়ে বা প্রাণঘাতী বিপদে বাধ্য হয়ে পিছু হটল।
Verse 61
यथा देवासूुरं युद्ध पूर्वमासीद् विशाम्पते । अभीतानां तथा राजन् यमराष्ट्रविवर्धनम्
হে রাজন, প্রজাপতি! যেমন প্রাচীনকালে দেবতা ও অসুরদের যুদ্ধ হয়েছিল, তেমনই এখন নির্ভীক কৌরব ও পাণ্ডবদের মধ্যে এমন এক ভয়ংকর সংগ্রাম শুরু হল, যা যমরাজের রাজ্যকে বৃদ্ধি করে।
Verse 62
ततः कपिध्वजो राजन् हत्वा संशप्तकान् रणे । अभ्यद्रवत तां सेनां कौरवीं पाण्डुनन्दन:,नरेश्वर! तदनन्तर पाण्डुनन्दन कपिध्वज अर्जुनने भी संशप्तकोंका संहार करके रणभूमिमें उस कौरवसेनापर आक्रमण किया
তারপর, হে রাজন, রণে সংশপ্তকদের বধ করে কপিধ্বজ পাণ্ডুনন্দন অর্জুন সেই কৌরবসেনার দিকে ধেয়ে গেল।
Verse 63
तथैव पाण्डवा: सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमा: । अभ्यधावन्त तां सेनां विसृजन्त: शितान् शरान्,इसी प्रकार धृष्टद्युम्म आदि समस्त पाण्डववीर पैने बाणोंकी वर्षा करते हुए आपकी उस सेनापर चढ़ आये
ঠিক তেমনি ধৃষ্টদ্যুম্নকে অগ্রে রেখে সকল পাণ্ডববীর ধারালো বাণ বর্ষণ করতে করতে সেই সেনার দিকে ধেয়ে গেল।
Verse 64
पाण्डवैरवकीर्णानां सम्मोह: समजायत | न च जज्ञुस्त्वनीकानि दिशो वा विदिशस्तथा,पाण्डवोंके बाणोंसे आच्छादित हुए कौरव-योद्धाओंपर मोह छा गया। उन्हें दिशाओं अथवा विदिशाओंका भी ज्ञान न रहा
পাণ্ডবদের বাণবৃষ্টিতে আচ্ছন্ন কৌরব-যোদ্ধাদের উপর মোহ নেমে এল। সেই বিভ্রান্তিতে তারা না ব্যূহ-রচনা চিনতে পারল, না দিক ও বিদিক নির্ণয় করতে পারল।
Verse 65
आपूर्यमाणा निशितै: शरै: पाण्डवचोदितै: । हतप्रवीरा विध्वस्ता वार्यमाणा समन्तत:
পাণ্ডবপ্রেরিত তীক্ষ্ণ শরবৃষ্টিতে সেই সেনা বিদ্ধ হয়ে ভরে উঠছিল। তার অগ্রগণ্য বীরেরা নিহত হল, সারি-সারি ভেঙে পড়ল; চারদিক থেকে ঠেকিয়ে রাখার চেষ্টা করেও তারা পিছু হটে ছিন্নভিন্ন হয়ে গেল।
Verse 66
पाण्डवोंके चलाये हुए पैने बाणोंसे व्याप्त हो कौरवसेनाके मुख्य-मुख्य वीर मारे गये। वह सेना नष्ट होने लगी और चारों ओरसे उसकी गति अवरुद्ध हो गयी ।।
পাণ্ডুপুত্র মহারথীদের হাতে কৌরব-চমূ কাটা পড়ছিল; তেমনি, রাজন, পাণ্ডবসেনাও সর্বদিক থেকে শরাঘাতে বিদ্ধ হয়ে অবরুদ্ধ হচ্ছিল।
Verse 67
ते सेने भृशसंतप्ते वध्यमाने परस्परम्
সেই দুই সেনা প্রবল দুঃখে দগ্ধ হয়ে পরস্পরকে বধ করতে লাগল।
Verse 68
व्याकुले समपद्येतां वर्षासु सरिताविव । जैसे वर्षाकालमें दो नदियाँ एक-दूसरीके जलसे भरकर व्याकुल-सी हो उठती हैं, उसी प्रकार आपसकी मार खाती हुई वे दोनों सेनाएँ अत्यन्त संतप्त हो उठीं ।।
বর্ষাকালে যেমন দুই নদী পরস্পরের জলে স্ফীত হয়ে অস্থির হয়ে ওঠে, তেমনি পরস্পর আঘাত করতে করতে সেই দুই সেনাও ব্যাকুল হয়ে উঠল। তারপর, হে রাজেন্দ্র, সেই ভয়ংকর মহাযুদ্ধে তোমার যোদ্ধাদের এবং পাণ্ডবদের হৃদয়ে তীব্র ও মহাভয় প্রবেশ করল।
Verse 113
परस्परवधे यत्तौ छिद्रान्वेषणतत्परौ । उस समय वहाँ पाण्डुपुत्र नकुल और कर्णकुमार चित्रसेनमें मुझे कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था। दोनों ही अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान
সঞ্জয় বললেন—তারা দু’জনেই পরস্পরের বিনাশে উদ্যত ছিল এবং আঘাতের যোগ্য ফাঁক খুঁজতেই সম্পূর্ণ নিমগ্ন ছিল। সেই সময় আমার দৃষ্টিতে পাণ্ডুপুত্র নকুল ও কর্ণপুত্র চিত্রসেনের মধ্যে কোনো পার্থক্য ছিল না। উভয়েই অস্ত্রশস্ত্রে পারদর্শী, বলবান এবং রথযুদ্ধে দক্ষ। পরস্পর আক্রমণে রত সেই দুই বীর একে অন্যের সামান্যতম ত্রুটি—আঘাতের সুযোগ—নিরন্তর লক্ষ্য করছিল।
Verse 126
नकुलस्य महाराज मुष्टिदेशे5च्छिनद् धनु: । महाराज! इतनेहीमें चित्रसेनने एक पानीदार पैने भल्लके द्वारा नकुलके धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट दिया
সঞ্জয় বললেন—হে মহারাজ, ততক্ষণে চিত্রসেন ধারালো, সুদৃঢ় ভল্লবাণ দিয়ে নকুলের ধনুকটি হাতের গ্রিপের ঠিক স্থানে—মুষ্টিদেশে—কেটে দিল; যুদ্ধের মাঝখানেই তার অস্ত্র অকেজো হয়ে গেল।
Verse 143
तथा ध्वजं सारथिं च त्रिभिस्त्रिेभिरपातयत् । उसने अपने तीखे बाणोंद्वारा नकुलके घोड़ोंको भी मृत्युके हवाले कर दिया तथा तीन- तीन बाणोंसे उनके ध्वज और सारथिको भी काट गिराया
সঞ্জয় বললেন—তদ্রূপ সে তিনটি করে বাণে ধ্বজ ও সারথিকে ফেলে দিল। তার তীক্ষ্ণ শর নকুলের ঘোড়াগুলোকেও মৃত্যুর হাতে সঁপে দিল; আর ধ্বজ ও সারথিকে তিন-তিন বাণে নিপাত করল।
Verse 153
नकुल: शुशुभे राजंस्त्रिशुड्र इव पर्वत: । राजन! शत्रुकी भुजाओंसे छूटकर ललाटमें धँसे हुए उन तीन बाणोंके द्वारा नकुल तीन शिखरोंवाले पर्वतके समान शोभा पाने लगे
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, শত্রুর বাহু থেকে ছুটে এসে কপালে গেঁথে থাকা সেই তিনটি বাণে নকুল ত্রিশৃঙ্গ পর্বতের মতো দীপ্তিমান হয়ে উঠল।
Verse 163
रथादवातरद् वीर: शैलाग्रादिव केसरी । धनुष कट जानेपर रथहीन हुए वीर नकुल हाथमें ढाल-तलवार लेकर पर्वतके शिखरसे उतरनेवाले सिंहके समान रथसे नीचे आ गये
সঞ্জয় বললেন—ধনুক কেটে যাওয়ায় রথহীন হয়ে পড়লেও বীর নকুল ঢাল ও তরবারি হাতে নিয়ে, পর্বতশিখর থেকে নামা সিংহের মতো রথ থেকে নেমে এল।
Verse 173
नकुलो>प्यग्रसत् तां वै चर्मणा लघुविक्रम: । उस समय चित्रसेन पैदल आक्रमण करनेवाले नकुलके ऊपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा। परंतु शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले नकुलने ढालके द्वारा ही रोककर उस बाण-वर्षाको नष्ट कर दिया
সঞ্জয় বললেন—নকুলও অগ্রসর হল। তখন পদাতিকভাবে ধেয়ে আসা নকুলের উপর চিত্রসেন তীরবৃষ্টি বর্ষণ করল; কিন্তু ক্ষিপ্রপরাক্রমী নকুল ঢাল দিয়ে তা প্রতিহত করে সেই তীরবৃষ্টিকে নিষ্ফল করে দিল।
Verse 186
आरुरोह महाबाहु: सर्वसैन्यस्य पश्यत: । विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले महाबाहु नकुल परिश्रमको जीत चुके थे। वे सारी सेनाके देखते-देखते चित्रसेनके रथके समीप जा उसपर चढ़ गये
সঞ্জয় বললেন—বিচিত্র যুদ্ধরীতিতে লড়ে মহাবাহু নকুল ক্লান্তিকে জয় করল; আর সমগ্র সেনার দৃষ্টির সামনেই চিত্রসেনের রথের কাছে গিয়ে সে তাতে উঠে পড়ল।
Verse 193
चित्रसेनशिर: कायादपाहरत पाण्डव: । तत्पश्चात् पाण्डुकुमारने सुन्दर नासिका और विशाल नेत्रोंसे युक्त कुण्डल और मुकुटसहित चित्रसेनके मस्तकको धड़से काट लिया
সঞ্জয় বললেন—পাণ্ডব চিত্রসেনের মস্তক দেহ থেকে বিচ্ছিন্ন করে নিল। তারপর পাণ্ডুপুত্র কুণ্ডল ও মুকুটে ভূষিত, সুন্দর নাসিকা ও বৃহৎ নয়নবিশিষ্ট চিত্রসেনের শির ধড় থেকে কেটে ফেলে দিল।
Verse 256
अतिष्ठत रणे वीर: क्रुद्धरूप इवान्तक: । सब ओरसे बाणोंद्वारा विद्ध होनेपर भी पाण्डुकुमार नकुल हर्ष और उत्साहमें भरे हुए वीर योद्धाकी भाँति दूसरा धनुष हाथमें लेकर बड़े वेगसे दूसरे रथपर जा चढ़े और कुपित हुए कालके समान रणभूमिमें खड़े हो गये
সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে সেই বীর ক্রুদ্ধ অন্তকের ন্যায় স্থির দাঁড়িয়ে রইল। চারদিক থেকে তীরে বিদ্ধ হয়েও পাণ্ডুপুত্র নকুল আনন্দ ও উদ্যমে ভরে, হাতে আরেকটি ধনুক তুলে মহাবেগে অন্য রথে উঠে পড়ল; তারপর ক্রুদ্ধ কালের মতো যুদ্ধভূমিতে অচল হয়ে দাঁড়িয়ে রইল।
Verse 266
रथं विशकलीकर्तु समारब्धौ विशाम्पते । राजन! प्रजानाथ! उन दोनों भाइयोंने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा नकुलके रथके टुकड़े-टुकड़े करनेकी चेष्टा आरम्भ की
সঞ্জয় বললেন—হে প্রজাপতি রাজন! জননায়ক! সেই দুই ভাই বাঁকা-গাঁটযুক্ত তীর নিক্ষেপ করে নকুলের রথকে খণ্ড-বিখণ্ড করতে উদ্যোগী হল।
Verse 273
जघान निशितैर्बाणै: सत्यसेनस्यथ वाजिन: । तब नकुलने हँसकर रणभूमिमें चार पैने बाणोंद्वारा सत्यसेनके चारों घोड़ोंको मार डाला
সঞ্জয় বললেন—তিনি তীক্ষ্ণ বাণে সত্যসেনের অশ্বদের নিপাত করলেন। তারপর রণক্ষেত্রে আত্মবিশ্বাসে হাসতে হাসতে নকুল চারটি ধারালো শর দিয়ে সত্যসেনের চার অশ্বকে ভূমিসাৎ করলেন।
Verse 293
सत्यसेन: सुषेणश्च पाण्डवं पर्यधावताम् । इसके बाद दूसरे रथपर सवार हो दूसरा धनुष हाथमें लेकर सत्यसेन और सुषेण दोनोंने पाण्डुकुमार नकुलपर धावा किया
সত্যসেন ও সুষেণ পাণ্ডবকে তাড়া করল। তারপর অন্য রথে উঠে হাতে দ্বিতীয় ধনুক নিয়ে সত্যসেন ও সুষেণ—দুজনেই—পাণ্ডুপুত্র নকুলের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।
Verse 303
द्वाभ्यां द्वाभ्यां महाराज शराभ्यां रणमूर्थनि । महाराज! माद्रीके प्रतापी पुत्र नकुलने बिना किसी घबराहटके युद्धके मुहानेपर दो-दो बाणोंसे उन दोनों भाइयोंको घायल कर दिया
মহারাজ! রণক্ষেত্রের অগ্রভাগে মাদ্রীর প্রতাপশালী পুত্র নকুল বিনা ভয়ে দুই-দুইটি শর দিয়ে সেই দুই ভাইকে বিদ্ধ করে আহত করল।
Verse 316
चिच्छेद प्रहसन युद्धे क्षुरप्रेण महारथ: । इससे सुषेणको बड़ा क्रोध हुआ। उस महारथीने हँसते-हँसते युद्धस्थलमें एक क्षुरप्रके द्वारा पाण्डुकुमार नकुलके विशाल धनुषको काट डाला
যুদ্ধের মধ্যে হাসতে হাসতে সেই মহারথী ক্ষুরপ্র বাণে নকুলের বিশাল ধনুক কেটে দিল। এতে সুষেণ প্রবল ক্রোধে জ্বলে উঠল।
Verse 326
सुषेणं पञ्चभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेन चिच्छिदे । फिर तो नकुल क्रोधसे तमतमा उठे और दूसरा धनुष लेकर उन्होंने पाँच बाणोंसे सुषेणको घायल करके एकसे उसकी ध्वजाको भी काट डाला
নকুল ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে উঠল। অন্য ধনুক নিয়ে সে পাঁচটি শর দিয়ে সুষেণকে বিদ্ধ করল এবং একটি শর দিয়ে তার ধ্বজাও কেটে ফেলল।
Verse 333
चिच्छेद तरसा युद्धे तत उच्चुक्रुशुर्जना: । आर्य! इसके बाद रणभूमिमें सत्यसेनके धनुष और दस्तानेके भी नकुलने वेगपूर्वक टुकड़े-टुकड़े कर डाले। इससे सब लोग जोर-जोरसे कोलाहल करने लगे
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধের উত্তাপে সে তীব্র বেগে তা কেটে ফেলল; তা দেখে চারদিকে লোকেরা উচ্চস্বরে চিৎকার করে উঠল। তারপর রণক্ষেত্রে নকুলও মহাবেগে সত্যসেনের ধনুক এবং তার হস্তত্রাণ/দস্তানাগুলি খণ্ড খণ্ড করে দিল; এতে সর্বত্র প্রবল কোলাহল উঠল।
Verse 343
शरै: संछादयामास समन्तात् पाण्डुनन्दनम् | तब सत्यसेनने शत्रुका वेग नष्ट करनेवाले दूसरे भारसाधक धनुषको हाथमें लेकर अपने बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन नकुलको ढक दिया
সঞ্জয় বললেন—সে চারদিক থেকে তীরের বর্ষায় পাণ্ডুনন্দনকে ঢেকে দিল। তখন সত্যসেন শত্রুর বেগ ভাঙার উদ্দেশ্যে আরেকটি ভারী-টানযুক্ত ধনুক হাতে নিয়ে নিজের তীরবৃষ্টিতে পাণ্ডবপুত্র নকুলকে সর্বদিক থেকে আচ্ছন্ন করল।
Verse 376
पृथक् शराभ्यां चिच्छेद कृतहस्त: प्रतापवान् । तत्पश्चात् सिद्धहस्त और प्रतापी वीर सत्यसेनने पृथक्-पृथक् दो-दो बाणोंसे नकुलका धनुष और उनके रथके ईषादण्ड भी काट डाले
সঞ্জয় বললেন—দক্ষহস্ত ও প্রতাপশালী সেই বীর দুটি পৃথক তীরে তা কেটে দিল। তারপর সিদ্ধহস্ত, প্রতাপী সত্যসেন পৃথক পৃথক জোড়া তীর ছুড়ে নকুলের ধনুক এবং তার রথের ঈষাদণ্ড (রথদণ্ড/ধুরা) পর্যন্ত কেটে ফেলল।
Verse 413
अभ्यवर्षच्छरैस्तूर्ण पादातं पाण्डुनन्दनम् । भाईको मारा गया देख सुषेण क्रोधसे व्याकुल हो उठा और तुरंत ही हरसा कट जानेसे पैदल हुए-से पाण्डुनन्दन नकुलपर बाणोंकी वर्षा करने लगा
সঞ্জয় বললেন—ভ্রাতার নিহত হওয়া দেখে সুষেণ ক্রোধ ও শোকে অস্থির হয়ে উঠল এবং সঙ্গে সঙ্গে, ঘোড়া কেটে পড়ায় পদাতিক হয়ে যাওয়া পাণ্ডুনন্দন নকুলের ওপর তীরের বর্ষা শুরু করল।
Verse 423
त्रिभिवव सारथिं हत्वा कर्णपुत्रो ननाद ह । उसने चार बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको मार डाला और पाँचसे उनकी ध्वजा काटकर तीनसे सारथिके भी प्राण ले लिये। इसके बाद कर्णपुत्र जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा
সঞ্জয় বললেন—সে চারটি তীরে তার চার ঘোড়াকে মেরে ফেলল, পঞ্চম তীরে ধ্বজা কেটে দিল, আর তিনটি তীরে সারথিকেও বধ করল। তারপর কর্ণপুত্র উচ্চস্বরে সিংহনাদ করে উঠল।
Verse 663
रणे5हन्यत पुत्रैस्ते शतशशो5थ सहस््रशः । राजन! महारथी पाण्डुपुत्र कौरव-सेनाका वध करने लगे। इसी प्रकार आपके पुत्र भी पाण्डव-सेनाके सैकड़ों
সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে আপনার পুত্রেরা শত শত, পরে সহস্র সহস্র যোদ্ধাকে নিধন করল। হে রাজন, পাণ্ডুপুত্রদের সেই মহারথী কৌরবসেনায় মহাবধ শুরু করল। তেমনি আপনার পুত্রেরাও সমরাঙ্গণে চারদিকে নিজেদের বাণে পাণ্ডবসেনার শত-সহস্র বীরকে সংহার করতে লাগল।
Verse 3536
सत्यसेन सुषेणं च द्वाभ्यां द्वाभ्यामविध्यत । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले नकुलने उन बाणोंका निवारण करके सत्यसेन और सुषेणको भी दो-दो बाणोंद्वारा घायल कर दिया
সঞ্জয় বললেন—সে সত্যসেন ও সুষেণকে দু’টি করে বাণে বিদ্ধ করল। শত্রুবীর-সংহারক নকুল আগত বাণগুলি প্রতিহত করে, পাল্টা আঘাতে সত্যসেন ও সুষেণকেও দু’টি করে বাণে আহত করল।
Verse 3636
सारथिं चास्य राजेन्द्र शितैर्विव्यधतु: शरै: । राजेन्द्र! फिर उन दोनों भाइयोंने भी पृथक्ू-पृथक् अनेक बाणोंसे नकुलको बींध डाला और पैने बाणोंद्वारा उनके सारथिको भी घायल कर दिया
সঞ্জয় বললেন—হে রাজেন্দ্র, তারা তীক্ষ্ণ বাণে তার সারথিকেও বিদ্ধ করল। তারপর সেই দুই ভাই পৃথক পৃথক বহু বাণে নকুলকে বিদ্ধ করল এবং ধারালো শরে তার সারথিকেও আহত করল।
The chapter frames a practical dharma-tension: whether commanders should pursue decisive personal engagement to arrest collapse (Śalya’s advance) versus the duty to preserve order and minimize cascading harm amid battlefield panic and omens.
Agency operates under constraint: even skilled leadership and valor unfold within unstable systems shaped by morale, logistics (chariots, drivers), and perceived signs of kāla; effectiveness depends on disciplined response rather than mere ferocity.
No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; its meta-function is historiographic—Sanjaya’s witnessing organizes chaos into intelligible causality, reinforcing the epic’s ethical memory of war’s systemic costs.
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