Adhyaya 43
Sabha ParvaAdhyaya 4329 Verses

Adhyaya 43

मायासभायां दुर्योधनस्य अवमान-प्रसङ्गः (Duryodhana’s Humiliation in the Hall of Māyā)

Upa-parva: Māyā-sabhā (The Hall of Māyā) — Duryodhana’s Discomfiture Episode

Vaiśaṃpāyana narrates Duryodhana’s tour of the extraordinary assembly hall alongside Śakuni. Duryodhana encounters engineered illusions: a crystal floor he mistakes for water prompts him to lift his garments; elsewhere he mistakes a crystal-water pond for solid ground and falls in, after which attendants laugh and provide fresh garments by royal order. Seeing the incident, Bhīma, Arjuna, and the twins also laugh; Duryodhana suppresses his reaction to preserve outward dignity. Additional misreadings follow—he strikes an apparently open doorway with his forehead and then withdraws, believing it closed. Granted leave by the Pāṇḍavas, he departs for Hāstinapura with an ungladdened mind after witnessing Yudhiṣṭhira’s unparalleled prosperity and the rājasūya’s grandeur. On the way, his internal monologue intensifies: he compares the rite to Indra’s, notes rivals subdued, recalls Śiśupāla’s fall, and describes himself as burning with envy, even contemplating self-destruction. He frames the Pāṇḍavas’ rise as fate’s triumph over his earlier efforts and asks Śakuni to report his distress and resentment to Dhṛtarāṣṭra—marking humiliation as a psychological turning point with political consequences.

Chapter Arc: सभामण्डल में भीष्म वाणी उठती है—वे चेदिराजकुल में जन्मे शिशुपाल के अद्भुत, भयावह जन्म-लक्षणों का वृत्तान्त सुनाते हैं: त्र्यक्ष, चतुर्भुज शिशु, जिसकी आकृति देख माता-पिता और बन्धु काँप उठते हैं। → राजा, रानी, पुरोहित और मन्त्रियों सहित चिन्ता में डूबते हैं; तभी आकाशवाणी/अशरीरी वाणी प्रकट होकर भविष्यवाणी करती है—यह बालक तभी मरेगा जब कोई उसे गोद में लेकर उसके विकार-चिह्नों का ‘मृत्यु-सूचक’ दर्शन करेगा। पुत्रस्नेह और भय के बीच जननी प्रश्न करती है, और उत्तर और भी कठोर बनता जाता है। → अशरीरी वाणी का निर्णायक कथन—जिसके द्वारा गोद में लिये जाने पर (भयावह) संकेत प्रकट होंगे, वही इसका मृत्यु-कारण बनेगा; इस भविष्यवाणी को टालने/परखने हेतु चेदिराज शिशु को क्रमशः असंख्य राजाओं की गोद में रखवाते हैं, ताकि वह ‘वह’ व्यक्ति पहचाना जा सके। → हजारों नरेशों की गोद में चढ़ने पर भी मृत्यु-सूचक लक्षण प्रकट नहीं होते; तत्काल संकट टलता है, पर भविष्यवाणी का काँटा राज्य और कुल के हृदय में धँसा रह जाता है—शिशुपाल का अंत किसी अज्ञात, नियत हाथ से बँधा है। → जिसके अंक में बैठते ही लक्षण प्रकट होंगे—वह कौन है, और कब यह नियति अपना संकेत देगी?

Shlokas

Verse 1

भीकम (2 अमान त्रिचत्वारिशो 5 ध्याय: भीष्मजीके द्वारा शिशुपालके जन्मके वृत्तान्तका वर्णन भीष्म उवाच चेदिराजकुले जातस्त्र्यक्ष एष चतुर्भुज: । रासभारावसदृशं ररास च ननाद च,भीष्मजी बोले--भीमसेन! सुनो, चेदिराज दमघोषके कुलमें जब यह शिशुपाल उत्पन्न हुआ, उस समय इसके तीन आँखें और चार भुजाएँ थीं। इसने रोनेकी जगह गदहेके रेंकनेकी भाँति शब्द किया और जोर-जोरसे गर्जना भी की

ভীষ্ম বললেন— “হে ভীমসেন, শোনো। চেদিরাজ দমঘোষের বংশে যখন এই শিশুপাল জন্মাল, তখন তার তিনটি চোখ ও চারটি বাহু ছিল। সে শিশুর কান্নার বদলে গাধার ডাকে মতো শব্দ করত এবং উচ্চস্বরে গর্জনও করত।”

Verse 2

* 53 है ०५ >> 5555 वैकृतं तस्य तौ दृष्टवा त्यागायाकुरुतां मतिम्‌,इससे इसके माता-पिता अन्य भाई-बन्धुओंसहित भयसे थर्रा उठे। इसकी वह विकराल आकृति देख उन्होंने इसे त्याग देनेका निश्चय किया

তার সেই বিকৃত ও ভয়ংকর রূপ দেখে পিতা-মাতা অন্যান্য ভাই-বান্ধবসহ ভয়ে কেঁপে উঠল এবং তাকে ত্যাগ করার সিদ্ধান্ত নিল।

Verse 3

ततः सभार्य नृपतिं सामात्यं सपुरोहितम्‌ । चिन्तासम्मूढहृदयं वागुवाचाशरीरिणी,पत्नी, पुरोहित तथा मन्त्रियोंसहित चेदिराजका हृदय चिन्तासे मोहित हो रहा था। उस समय आकाशवाणी हुई--

তখন রানি, মন্ত্রীগণ ও পুরোহিতসহ চেদিরাজের হৃদয় চিন্তায় আচ্ছন্ন হয়ে পড়ল। সেই সময় আকাশবাণী শোনা গেল।

Verse 4

एष ते नृपते पुत्र: श्रीमान्‌ जातो बलाधिक: । तस्मादस्मान्न भेतव्यमव्यग्र: पाहि वै शिशुम्‌,“राजन! तुम्हारा यह पुत्र श्रीसम्पन्न और महाबली है, अतः तुम्हें इससे डरना नहीं चाहिये। तुम शान्तचित्त होकर इस शिशुका पालन करो

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, তোমার এই পুত্র শ্রীসম্পন্ন ও অতিবলবান হয়ে জন্মেছে। অতএব আমাদের কারণে ভয় কোরো না; নিরুদ্বিগ্ন হয়ে শিশুটিকে পালন ও রক্ষা করো।

Verse 5

नच वै तस्य मृत्युर्वे न काल: प्रत्युपस्थित: । मृत्यु्न्तास्य शस्त्रेण स चोत्पन्नो नराधिप,“नरेश्वर! अभी इसकी मृत्यु नहीं आयी है और न काल ही उपस्थित हुआ है। जो इसकी मृत्युका कारण है तथा जो शस्त्रद्वारा इसका वध करेगा, वह अन्यत्र उत्पन्न हो चुका है!

ভীষ্ম বললেন—হে নরেশ্বর, এখনও তার মৃত্যু আসেনি, নির্ধারিত কালও উপস্থিত হয়নি। যার দ্বারা তার মৃত্যু হবে—এবং যে অস্ত্র দিয়ে তাকে বধ করবে—সে অন্যত্র ইতিমধ্যেই জন্মেছে।

Verse 6

संश्रुत्योदाह्तं वाक्‍्यं भूतमन्तर्हितं ततः । पुत्रस्नेहाभिसंतप्ता जननी वाक्यमब्रवीत्‌,तदनन्तर यह आकाशवाणी सुनकर उस अन्तहित भूतको लक्ष्य करके पुत्रस्नेहसे संतप्त हुई इसकी माता बोली--

সে কথা শুনে, যে অদৃশ্য সত্তা অন্তর্হিত হয়ে গিয়েছিল তাকে লক্ষ্য করে, পুত্রস্নেহে দগ্ধ জননী বললেন—

Verse 7

येनेदमीरितं वाक्‍्यं ममैतं तनयं प्रति । प्राउजलिस्तं नमस्यामि ब्रवीतु स पुनर्वच:,“मेरे इस पुत्रके विषयमें जिन्होंने यह बात कही है, उन्हें मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ। चाहे वे कोई देवता हों अथवा और कोई प्राणी? वे फिर मेरे प्रश्नका उत्तर दें। मैं यह यथार्थरूपसे सुनना चाहती हूँ कि मेरे इस पुत्रकी मृत्युमें कौन निमित्त बनेगा?”

আমার এই পুত্র সম্বন্ধে যিনি এ কথা বলেছেন, তাঁকে আমি করজোড়ে প্রণাম করি। তিনি দেবতা হন বা অন্য কোনো সত্তা—তিনি যেন আবার বলেন এবং আমার প্রশ্নের উত্তর দেন। আমি সত্যিই জানতে চাই, আমার পুত্রের মৃত্যুর কারণ কে হবে?

Verse 8

याथातथ्येन भगवान्‌ देवो वा यदि वेतर: । श्रोतुमिच्छामि पुत्रस्य को<स्य मृत्युर्भविष्यति,“मेरे इस पुत्रके विषयमें जिन्होंने यह बात कही है, उन्हें मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ। चाहे वे कोई देवता हों अथवा और कोई प्राणी? वे फिर मेरे प्रश्नका उत्तर दें। मैं यह यथार्थरूपसे सुनना चाहती हूँ कि मेरे इस पुत्रकी मृत्युमें कौन निमित्त बनेगा?”

ভগবান! যথাযথ সত্যে—তিনি দেবতা হন বা অন্য কেউ—আমি শুনতে চাই, আমার এই পুত্রের মৃত্যুর কারণ কে হবে?

Verse 9

अन्तर्भूतं ततो भूतमुवाचेद॑ं पुनर्वच: । यस्योत्सड़े गृहीतस्य भुजावभ्यधिकावुभौ,निमज्जिष्यति यं दृष्टवा सो<स्य मृत्युर्भविष्यति । तब पुनः उसी अदृश्य भूतने यह उत्तर दिया--'जिसके द्वारा गोदमें लिये जानेपर पाँच सिरवाले दो सर्पोकी भाँति इसकी पाँचों अँगुलियोंसे युक्त दो अधिक भुजाएँ पृथ्वीपर गिर जायँगी और जिसे देखकर इस बालकका ललाटवर्ती तीसरा नेत्र भी ललाटमें लीन हो जायगा, वही इसकी मृत्युमें निमित्त बनेगा”

তখন অন্তর্লীন সেই অদৃশ্য সত্তা আবার বলল— “যার কোলে এই শিশুকে তোলা হবে, তার কোলে উঠতেই শিশুটির পাঁচ ফণা-ওঠা দুই সাপের মতো, পাঁচ আঙুল-যুক্ত দুই অতিরিক্ত বাহু মাটিতে পড়ে ডুবে গিয়ে লীন হয়ে যাবে। আর যার দর্শনে এ ঘটনা ঘটবে, সেই-ই হবে তার মৃত্যুর কারণ।”

Verse 10

पतिष्यत: क्षितितले पञ्चशीर्षाविवोरगौ । तृतीयमेतद्‌ बालस्य ललाटस्थं तु लोचनम्‌

ভীষ্ম বললেন— “ভূমিতে পড়তে উদ্যত হতেই পাঁচ ফণা-ওঠা দুই সাপের মতো (দুটি চক্ষু) প্রকাশ পেল; আর এটাই শিশুটির কপালে স্থিত তৃতীয় নয়ন।”

Verse 11

त्र्यक्ष॑ चतुर्भुजं श्रुव्वा तथा च समुदाह्ृतम्‌

ভীষ্ম বললেন— “তাকে ‘ত্রিনয়ন’ ও ‘চতুর্ভুজ’ বলে শুনে, এবং সেইভাবেই উচ্চস্বরে ঘোষিত হতে দেখে…”

Verse 12

पृथिव्यां पार्थिवा: सर्वे अभ्यागच्छन्‌ दिदृक्षव: । चार बाँह और तीन आँखवाले बालकके जन्मका समाचार सुनकर भूमण्डलके सभी नरेश उसे देखनेके लिये आये ।। ११ $ ।। तान्‌ पूजयित्वा सम्प्राप्तान्‌ यथाह स महीपति:

ভীষ্ম বললেন— “চার বাহু ও তিন নয়নবিশিষ্ট শিশুর জন্মসংবাদ শুনে, তাকে দেখার আকাঙ্ক্ষায় পৃথিবীর সকল রাজাই এসে উপস্থিত হলেন। তখন সেই নৃপতি আগত রাজাদের যথোচিত সম্মান জানিয়ে, উপযুক্তরূপে তাদের সঙ্গে কথা বললেন।”

Verse 13

एवं राजसहस््राणां पृथक्त्वेन यथाक्रमम्‌

ভীষ্ম বললেন— “এইভাবে সহস্র সহস্র রাজাকে ক্রমানুসারে পৃথক পৃথকভাবে বিবেচনা করা হল।”

Verse 14

एतदेव तु संभश्रुत्य द्वारवत्यां महाबलौ,द्वारका्में यही समाचार सुनकर महाबली बलराम और श्रीकृष्ण दोनों यदुवंशी वीर अपनी बुआसे मिलनेके लिये उस समय चेदिराज्यकी राजधानीमें गये

দ্বারকায় এই সংবাদ শুনে মহাবলী যাদববীর বলরাম ও শ্রীকৃষ্ণ—দুজনেই—পিতৃভগিনী (পিসি)-কে দর্শন করতে সেই সময় চেদিরাজ্যের রাজধানীর উদ্দেশে রওনা হলেন।

Verse 15

ततश्रैदिपुरं प्राप्तौ संकर्षणजनार्दनौ | यादवौ यादवीं द्र॒ष्टं स्‍्वसारं तौ पितुस्तदा,द्वारका्में यही समाचार सुनकर महाबली बलराम और श्रीकृष्ण दोनों यदुवंशी वीर अपनी बुआसे मिलनेके लिये उस समय चेदिराज्यकी राजधानीमें गये

তখন সংকর্ষণ (বলরাম) ও জনার্দন (শ্রীকৃষ্ণ)—দুজন যাদব—চেদিনগরে পৌঁছালেন; এবং সেই সময় পিতৃভগিনী, যাদবকুলের সেই নারী (পিসি)-কে দর্শন করতে সেখানে গেলেন।

Verse 16

अभिवाद्य यथान्यायं यथाश्रेष्ठ नृपं च ताम्‌ कुशलानामयं पृष्टवा निषण्णौ रामकेशवौ,वहाँ बलराम और श्रीकृष्णने बड़े-छोटेके क्रमसे सबको यथायोग्य प्रणाम किया एवं राजा दमघोष और अपनी बुआ श्रुतश्रवासे कुशल और आरोग्यविषयक प्रश्न किया। तत्पश्चात्‌ दोनों भाई एक उत्तम आसनपर विराजमान हुए

সেখানে বলরাম ও কেশব যথান্যায়, জ্যেষ্ঠ-কনিষ্ঠের ক্রমে সকলকে প্রণাম করলেন; তারপর রাজা ও সেই দেবীর কুশল-ক্ষেম ও আরোগ্যের সংবাদ জিজ্ঞাসা করলেন; অতঃপর দুই ভ্রাতা উৎকৃষ্ট আসনে উপবিষ্ট হলেন।

Verse 17

साभ्यर्च्य तौ तदा वीरीौ प्रीत्या चाभ्यधिकं ततः । पुत्रं दामोदरोत्सज्रे देवी संन्यदधात्‌ स्‍्वयम्‌,महादेवी श्रुतश्रवाने बड़े प्रेमसे उन दोनों वीरोंका सत्कार किया और स्वयं ही अपने पुत्रको श्रीकृष्णकी गोदमें डाल दिया

তখন দেবী স্নেহভরে সেই দুই বীরকে যথোচিত সম্মান করলেন; আর আরও অধিক প্রীতিতে নিজ হাতে নিজের পুত্রকে দামোদর (শ্রীকৃষ্ণ)-এর কোলে স্থাপন করলেন।

Verse 18

न्यस्तमात्रस्य तस्याड्के भुजावभ्यधिकावुभौ । पेततुस्तच्च नयनं न्‍्यमज्जत ललाटजम्‌,उनकी गोदमें रखते ही बालककी वे दोनों बाँहें गिर गयीं और ललाटवर्ती नेत्र भी वहीं विलीन हो गया

তাঁর কোলে রাখা মাত্রই শিশুটির দুই বাহু ঢলে পড়ল; আর কপালে স্থাপিত সেই নয়নও সেখানেই ডুবে গিয়ে অদৃশ্য হয়ে গেল।

Verse 19

तद्‌ दृष्टवा व्यथिता त्रस्ता वरं कृष्णमयाचत । ददस्व मे वरं कृष्ण भयारताया महाभुज,यह देखकर बालककी माता भयभीत हो मन-ही-मन व्यथित हो गयी और श्रीकृष्णसे वर माँगती हुई बोली--“महाबाहु श्रीकृष्ण! मैं भयसे व्याकुल हो रही हूँ। मुझे इस पुत्रकी जीवनरक्षाके लिये कोई वर दो

এ দৃশ্য দেখে শিশুর জননী ভয়ে কাঁপতে কাঁপতে অন্তরে ব্যথিত হয়ে কৃষ্ণের কাছে বর প্রার্থনা করে বলল—“মহাবাহু শ্রীকৃষ্ণ! আমি ভয়ে ব্যাকুল; এই পুত্রের প্রাণরক্ষার জন্য আমাকে একটি বর দিন।”

Verse 20

त्वं ह्वार्तानां समाश्चासों भीतानामभयप्रद: । एवमुक्तस्तत: कृष्ण: सोडब्रवीद्‌ यदुनन्दन:,'क्योंकि तुम संकटमें पड़े हुए प्राणियोंक सबसे बड़े सहारे और भयभीत मनुष्योंको अभय देनेवाले हो।” अपनी बुआके ऐसा कहनेपर यदुनन्दन श्रीकृष्णने कहा--

“কারণ তুমি বিপন্নদের সর্বশ্রেষ্ঠ আশ্রয় এবং ভীতদের অভয়দাতা।” এ কথা শুনে পিতৃবোনের অনুরোধে যদুনন্দন শ্রীকৃষ্ণ তখন উত্তর দিলেন—

Verse 21

मा भेस्त्वं देवि धर्मज्ञे न मत्तोडस्ति भयं तव । ददामि कं वरं कि च करवाणि पितृष्वस:,*देवि! धर्मज्ञे! तुम डरो मत। तुम्हें मुझसे कोई भय नहीं है। बुआ! तुम्हीं कहो, मैं तुम्हें कौन-सा वर दूँ? तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध कर दूँ?

“দেবি, ধর্মজ্ঞে! ভয় কোরো না; আমার থেকে তোমার কোনো ভয় নেই। পিতৃবোন, বলো—আমি তোমাকে কোন বর দেব, আর তোমার কোন কাজ সম্পন্ন করে দেব?”

Verse 22

शक्‍्यं वा यदि वाशक्यं करिष्यामि वचस्तव । एवमुक्ता तत:ः कृष्णमब्रवीद्‌ यदुनन्दनम्‌,“सम्भव हो या असम्भव, तुम्हारे वचनका मैं अवश्य पालन करूँगा।” इस प्रकार आश्वासन मिलनेपर श्रुतश्रवा यदुनन्दन श्रीकृष्णसे बोली--

“সম্ভব হোক বা অসম্ভব—তোমার বাক্য আমি অবশ্যই পালন করব।” এই আশ্বাস পেয়ে শ্রুতাশ্রবা তখন যদুনন্দন শ্রীকৃষ্ণকে বললেন—

Verse 23

शिशुपालस्यथापराधान्‌ क्षमेथास्त्वं महाबल । मत्कृते यदुशार्दूल विद्धयेनं मे वरं प्रभो,“महाबली यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण! तुम मेरे लिये शिशुपालके सब अपराध क्षमा कर देना। प्रभो! यही मेरा मनोवांछित वर समझो”

“মহাবলী, যদুশার্দূল শ্রীকৃষ্ণ! আমার জন্য শিশুপালের সকল অপরাধ ক্ষমা করো। প্রভু! এটিকেই আমার অভীষ্ট বর বলে জানো।”

Verse 24

श्रीकृष्ण उवाच अपराधशतं क्षाम्यं मया हास्य पितृष्वस: । पुत्रस्य ते वधाहस्य मा त्वं शोके मन: कृथा:,श्रीकृष्णने कहा--बुआ! तुम्हारा पुत्र अपने दोषोंके कारण मेरे द्वारा यदि वधके योग्य होगा, तो भी मैं इसके सौ अपराध क्षमा करूँगा। तुम अपने मनमें शोक न करो

শ্রীকৃষ্ণ বললেন—পিতৃভগিনী! তোমার পুত্র যদি নিজের দোষে আমার হাতে বধযোগ্যও হয়, তবু আমি তার একশো অপরাধ ক্ষমা করব। তুমি মনে শোক এনো না।

Verse 25

भीष्म उवाच एवमेष नृप: पाप: शिशुपाल: सुमन्दधी: । त्वां समाह्नयते वीर गोविन्दवरदर्पित:,भीष्मजी कहते हैं--वीरवर भीमसेन! इस प्रकार यह मन्दबुद्धि पापी राजा शिशुपाल भगवान्‌ श्रीकृष्णके दिये हुए वरदानसे उन्मत्त होकर तुम्हें युद्धेके लिये ललकार रहा है

ভীষ্ম বললেন—হে বীর ভীমসেন! এই পাপী রাজা শিশুপাল, অতি মন্দবুদ্ধি, গোবিন্দের প্রদত্ত বরদানে গর্বোন্মত্ত হয়ে তোমাকে যুদ্ধে আহ্বান করছে।

Verse 43

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवृत्तान्तकथने त्रिचत्वारिंशो ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापवके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें शिशुपालवृत्तान्तवर्णनविषयक तैंतालीयवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত শিশুপালবধপর্বে শিশুপালের বৃত্তান্তকথন-বিষয়ক তেতাল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 106

निमज्जिष्यति यं दृष्टवा सो<स्य मृत्युर्भविष्यति । तब पुनः उसी अदृश्य भूतने यह उत्तर दिया--'जिसके द्वारा गोदमें लिये जानेपर पाँच सिरवाले दो सर्पोकी भाँति इसकी पाँचों अँगुलियोंसे युक्त दो अधिक भुजाएँ पृथ्वीपर गिर जायँगी और जिसे देखकर इस बालकका ललाटवर्ती तीसरा नेत्र भी ललाटमें लीन हो जायगा, वही इसकी मृत्युमें निमित्त बनेगा”

ভীষ্ম বললেন—যাকে দেখে সে বিনাশে নিমজ্জিত হবে, সেই-ই তার মৃত্যুর কারণ হবে। তখন সেই অদৃশ্য সত্তা আবার বলল—যার কোলে তোলা হলে পাঁচ-মস্তক সাপের ন্যায় পাঁচ-পাঁচ আঙুলবিশিষ্ট তার দুই অতিরিক্ত বাহু ভূমিতে ঝরে পড়বে, এবং যাকে দেখামাত্র তার কপালে থাকা তৃতীয় নয়নও কপালের মধ্যেই লীন হয়ে যাবে—সেই-ই তার মৃত্যুর নিমিত্ত হবে।

Verse 126

एकैकस्य नृपस्याड्के पुत्रमारोपयत्‌ तदा । चेदिराजने अपने घर पधारे हुए उन सभी नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके अपने पुत्रको हर एककी गोदमें रखा

তখন চেদিরাজ গৃহাগত সকল নৃপতিকে যথাযোগ্য সম্মান জানিয়ে, একে একে প্রত্যেক রাজার কোলে নিজের পুত্রকে বসালেন।

Verse 133

शिशुरड्कसमारूढो न तत्‌ प्राप निदर्शनम्‌ इस प्रकार वह शिशु क्रमश: सहस्रों राजाओंकी गोदमें अलग-अलग रखा गया, परन्तु मृत्युसूचक लक्षण कहीं भी प्राप्त नहीं हुआ

ভীষ্ম বললেন—শিশুটিকে একের পর এক বহু রাজার কোলে বসানো হয়েছিল, তবু পূর্বঘোষিত মৃত্যুচিহ্ন কোথাও দেখা গেল না।

Frequently Asked Questions

The pressure point is how a ruler should respond to public embarrassment: whether to absorb it with restraint and restore composure, or to convert wounded honor into retaliatory intent that can compromise ethical governance.

Unregulated envy and honor-injury distort perception and judgment; when emotion becomes policy, it can reframe others’ legitimate success as intolerable injustice, accelerating unethical decision-making.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-function is narrative causality—explaining the psychological origin of later strategic hostility and situating it within the epic’s broader inquiry into how inner states precipitate public conflict.