Adhyaya 96
Anushasana ParvaAdhyaya 96145 Verses

Adhyaya 96

Puṣkara-Śapatha Itihāsa (Agastya–Indra Dispute at the Tīrthas) | पुष्कर-शपथ-आख्यानम्

Upa-parva: Tīrthayātrā-Itihāsa (Puṣkara-Śapatha Episode)

Bhīṣma introduces an old itihāsa connected to pilgrimage and oath-making. A large assembly of sages and renowned figures undertake a tīrtha circuit, visiting sacred waters and bathing at Brahmasaras. During foraging for lotus-related items (bisa/mṛṇāla), they witness Agastya’s puṣkara being taken from a lake; Agastya confronts the group, suspects wrongdoing, and laments a perceived decline of dharma in society. The assembly denies theft and, to establish credibility, multiple ṛṣis and royal exemplars pronounce conditional oaths/curses specifying undesirable social, ritual, and reputational outcomes for “whoever took the puṣkara.” Indra (Śakra) then addresses Agastya, offering a countervailing assurance: the taker should instead gain Vedic learning, religious merit, and access to Brahmā’s abode, asserting that the act was motivated by a desire to hear dharma rather than by greed. Agastya accepts the explanation, receives the lotus back, and the pilgrimage continues. The chapter concludes with a phalaśruti: recitation and contemplation of this account is said to confer well-being, avert misfortune, and support auspicious outcomes, framing the narrative as both ethical instruction and ritual-textual merit.

Chapter Arc: शरशय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को गृहस्थ-धर्म के सूक्ष्म रहस्य की ओर ले जाते हैं—विशेषतः श्राद्ध-भोजन, व्रत-पालन और ‘प्रतिग्रह’ (दान-ग्रहण) के छिपे हुए दोषों पर। → भीष्म बताते हैं कि वेदोक्त व्रतों से च्युत आचरण करने वाले ब्राह्मणों का श्राद्ध-भोजन और दान-ग्रहण धर्म को दूषित कर सकता है; फिर कथा-प्रसंग में वृषादर्भि/राजा और सप्तर्षियों का संवाद उठता है, जहाँ राज-दान ‘मधु-सा’ दिखकर भी ‘विष-सा’ परिणाम देने वाला कहा जाता है। → सप्तर्षि राजा के प्रलोभन को अस्वीकार करते हुए प्रतिग्रह को विषोपम घोषित करते हैं—‘राज्ञां प्रतिग्रहो… विषोपमः’; आगे इन्द्र भिक्षु-वेष में परीक्षा लेकर तपस्वियों के वैराग्य, सत्य और संयम की कसौटी करता है, और छिपाए गए मृणाल/बिस (मृणाल-तंतु) दिखाकर परीक्षा का रहस्य प्रकट करता है। → परीक्षा का उद्देश्य स्पष्ट होता है—भगवत्-स्वभाव वाले महर्षियों की निष्कलुषता और प्रतिग्रह-त्याग की महिमा; भीष्म गृहस्थ को संयम, पवित्र-पाठ, ऋत-वचन, नियत-आहार जैसे नियमों का उपदेश देते हैं और कथा-कीर्तन के फल (यश, अर्थ, देव-ऋषि-पितृ-प्रसन्नता) का प्रतिपादन करते हैं। → युधिष्ठिर के सामने प्रश्न खुला रह जाता है कि गृहस्थ-धर्म में आवश्यक दान-व्यवहार और प्रतिग्रह के विष-तुल्य खतरे के बीच संतुलन कैसे साधा जाए।

Shlokas

Verse 1

०४८ श्यु 8 त्रिनववतितमो<्थ्याय: गृहस्थके धर्मोका रहस्य

যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! যদি ব্রতধারী দ্বিজেরা কোনো ব্রাহ্মণের অনুরোধ পূরণ করতে হব্য/শ্রাদ্ধ-অন্ন গ্রহণ করে, তবে এ বিষয়ে আপনার বিচার কী? এ ক্ষেত্রে কোনটি ধর্মসঙ্গত— ব্রত অক্ষুণ্ণ রাখা, না শ্রদ্ধা ও কর্তব্যবোধে ব্রাহ্মণের ইচ্ছা মান্য করা?

Verse 2

भीष्म उवाच अवेदोत्तव्रताश्चैव भुज्जाना: कामकारणे । वेदोक्तेषु तु भुज्जाना व्रतलुप्ता युधिष्ठिर

ভীষ্ম বললেন— যুধিষ্ঠির! যারা বেদবিহিত ব্রত মানে না, তারা কেবল কামনা-প্রবৃত্তিতে আহার করে। কিন্তু যারা বেদোক্ত বিধি মেনে আহার করে, তারাও যদি ব্রতের সংযম ও উদ্দেশ্য ত্যাগ করে, তবে তারা ‘ব্রতভ্রষ্ট’ বলে গণ্য হয়।

Verse 3

भीष्मजीने कहा--युधिष्छिर! जो वेदोक्त व्रतका पालन नहीं करते, वे ब्राह्मणकी इच्छापूर्तिके लिये श्राद्धमें भोजन कर सकते हैं; किंतु जो वैदिक व्रतका पालन कर रहे हों, वे यदि किसीके अनुरोधसे श्राद्धका अन्न ग्रहण करते हैं तो उनका व्रत भंग हो जाता है ।।

যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! সাধারণ লোকেরা উপবাসকেই ‘তপ’ বলে। এ বিষয়ে আপনার মত কী? এখানে কি সত্যিই উপবাসই তপ, না তপের আর কোনো রূপও আছে?

Verse 4

भीष्म उवाच मासार्धमासोपवासाद्‌ यत्‌ तपो मन्यते जन: । आत्मतन्त्रोपघाती यो न तपस्वी न धर्मवित्‌

ভীষ্ম বললেন— রাজন! যারা পনেরো দিন বা এক মাস উপবাস করাকেই তপস্যা মনে করে, তারা বৃথাই নিজের দেহকে কষ্ট দেয়। এভাবে স্বেচ্ছাচারী ও আত্মঘাতী ব্যক্তি না তপস্বী, না ধর্মজ্ঞ।

Verse 5

त्यागस्य चापि सम्पत्ति: शिष्यते तप उत्तमम्‌ | सदोपवासी च भवेद्‌ ब्रह्मचारी तथैव च

ভীষ্ম বললেন— ত্যাগের যে সম্পদ, তাকেই সর্বোত্তম তপ বলা হয়েছে। মানুষের উচিত সদা আহারে সংযমী থাকা এবং তদ্রূপ ব্রহ্মচারী—আচরণ ও ইন্দ্রিয়সংযমে দৃঢ়—হওয়া।

Verse 6

कुट॒म्बिको धर्मकाम: सदास्वप्रश्चन मानव:

ভীষ্ম বললেন—গৃহস্থের উচিত ধর্মে অনুরক্ত ও ন্যায়াচরণে প্রবৃত্ত হয়ে, সদা সংযমী, আত্মনিয়ন্ত্রিত এবং আচরণে সতর্ক মানবের ন্যায় জীবন যাপন করা।

Verse 7

अमांसाशी सदा च स्यातू्‌ पवित्र च सदा पठेत्‌ । ऋतवादी सदा च स्यान्नियतश्न सदा भवेत्‌

ভীষ্ম বললেন—সদা মাংস ভক্ষণ থেকে বিরত থাকা উচিত এবং যা পবিত্র করে তার নিয়মিত পাঠ করা উচিত। সর্বদা সত্য ভাষণ করতে হবে এবং আহারে সদা নিয়ম-সংযম বজায় রাখতে হবে।

Verse 8

विघसाशी कथं च स्याद्‌ सदा चैवातिथिप्रिय: । अमृताशी सदा च स्यात्‌ पवित्री च सदा भवेत्‌

ভীষ্ম বললেন—মানুষ কীভাবে ‘বিঘসাশী’ হবে—অর্থাৎ অন্যদের তৃপ্ত করার পর যা অবশিষ্ট থাকে তাই ভক্ষণ করবে—এবং সদা অতিথিসৎকারে প্রীত হবে? কীভাবে সে অমৃতভোজীর ন্যায় জীবন যাপন করে আচরণে নিরন্তর পবিত্র থাকবে?

Verse 9

धर्मपालनकी इच्छासे ही उसको स्त्री आदि कुटुम्बका संग्रह करना चाहिये (विषयभोगके लिये नहीं)। ब्राह्मणको उचित है कि वह सदा जाग्रत्‌ रहे

যুধিষ্ঠির জিজ্ঞাসা করলেন—হে পৃথিবীনাথ! ব্রাহ্মণ কীভাবে সদা উপবাসী ও ব্রহ্মচারী হতে পারে? আর কীভাবে সে ‘বিঘসাশী’ ও অতিথিসৎকারপ্রিয় হতে পারে?

Verse 10

भीष्म उवाच अन्तरा सायमाशं च प्रातराशं च यो नर: । सदोपवासी भवति यो न भुंक्तेडन्तरा पुन:

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি সন্ধ্যার আহার ও প্রাতঃকালের আহারের মাঝখানে কিছুই খায় না, সে প্রকৃতপক্ষে সদা উপবাসী; কারণ মধ্যবর্তী সময়ে সে পুনরায় আহার গ্রহণ করে না।

Verse 11

भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! जो मनुष्य केवल प्रात:काल और सायंकाल ही भोजन करता है, बीचमें कुछ नहीं खाता, उसे सदा उपवासी समझना चाहिये ।।

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! যে মানুষ কেবল প্রাতে ও সায়ং আহার করে, মাঝখানে কিছুই গ্রহণ করে না, তাকে সদা উপবাসী বলে গণ্য করা উচিত। যে কেবল ঋতুকালে ধর্মপত্নীর নিকট গমন করে, সে ব্রহ্মচারী বলেই মান্য। আর যে সদা দানশীল, তাকে নিত্য সত্যনিষ্ঠ বলে জানতে হবে।

Verse 12

अभक्षयन्‌ वृथा मांसममांसाशी भवत्युत । दानं ददत्‌ पवित्री स्यादस्वप्नश्न दिवास्वपन्‌

ভীষ্ম বললেন—যে মাংস ভক্ষণ করে না, সে-ই সত্যই অমাংসাশী। যে নিরন্তর দান করে, সে পবিত্র হয়। আর যে দিনে ঘুমায় না, তাকে সদা জাগ্রত বলে গণ্য করা হয়।

Verse 13

भृत्यातिथिषु यो भुंक्ते भुक्तवत्सु नर: सदा | अमृतं केवल भुंक्ते इति विद्धि युधिछ्चिर

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! যে ব্যক্তি সর্বদা ভৃত্য ও অতিথিদের আহার করিয়ে তবেই নিজে আহার করে, তাকে জেনে রেখো—সে যেন কেবল অমৃতই ভক্ষণ করে।

Verse 14

अभुक्तवत्सु नाक्षाति ब्राह्मणेषु तु यो नर: । अभोजनेन तेनास्य जित: स्वर्गों भवत्युत,जबतक ब्राह्मण भोजन नहीं कर लें तबतक जो अन्न ग्रहण नहीं करता, वह मनुष्य अपने उस व्रतके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय पाता है

ভীষ্ম বললেন—যতক্ষণ ব্রাহ্মণগণ আহার না করেন, ততক্ষণ যে ব্যক্তি অন্ন গ্রহণ করে না, সে সেই সংযম-ব্রত দ্বারাই যেন স্বর্গলোক জয় করে।

Verse 15

देवेभ्यश्न पितृभ्यश्न संश्रितेभ्यस्तथैव च | अवशिष्टनि यो भुंक्ते तमाहुर्विघसाशिनम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি প্রথমে দেবগণকে, পিতৃগণকে এবং তদ্রূপ আশ্রিতজনকে অন্ন অর্পণ করে, তারপর অবশিষ্ট যা থাকে তা ভক্ষণ করে—তাকে ‘বিঘসাশী’ বলা হয়।

Verse 16

तेषां लोका हा[पर्यन्ता: सदने ब्रह्मण: स्मृता: । उपस्थिता हृप्सरसो गन्धर्वैश्व जनाधिप

ভীষ্ম বললেন—তাঁদের লোকসমূহ ব্রহ্মার সদন পর্যন্ত বিস্তৃত বলে স্মৃতিতে কথিত। সেখানে, হে নরাধিপ, অপ্সরাগণ সেবায় উপস্থিত ছিলেন, এবং গন্ধর্বগণও তদ্রূপ উপস্থিত ছিলেন।

Verse 17

नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों और आश्रितोंको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नको ही स्वयं भोजन करता है उसे विघसाशी कहते हैं। उन मनुष्योंको ब्रह्मधाममें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है तथा गन्धर्वोंसहित अप्सराएँ उनकी सेवामें उपस्थित होती हैं ।।

ভীষ্ম বললেন—হে নরেশ্বর! যে ব্যক্তি প্রথমে দেবতা, পিতৃগণ ও আশ্রিতজনকে ভোজন করিয়ে পরে অবশিষ্ট অন্নই নিজে ভোজন করে, তাকে ‘বিঘসাশী’ বলা হয়। এমন মানুষ ব্রহ্মধামে অক্ষয় লোক লাভ করে; গন্ধর্বসহ অপ্সরাগণ তাদের সেবায় সদা উপস্থিত থাকে। আর যারা দেবতা ও অতিথির সঙ্গে পিতৃগণের জন্য অন্নের অংশ পৃথক করে পরে নিজে ভোজন করে, তারা এই লোকেতে পুত্র-পৌত্রসহ আনন্দ ভোগ করে এবং মৃত্যুর পরে সর্বোত্তম, অনুত্তম গতি লাভ করে।

Verse 18

युधिषछ्िर उवाच ब्राह्मणेभ्य: प्रयच्छन्ति दानानि विविधानि च । दातृप्रतिग्रहीत्रोवं को विशेष: पितामह

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! লোকেরা ব্রাহ্মণদের নানাবিধ দান প্রদান করে। দাতা ও প্রতিগ্রহীতার মধ্যে প্রকৃত পার্থক্য কী?

Verse 19

भीष्म उवाच साधोर्य: प्रतिगृह्लीयात्‌ तथैवासाधुतो द्विज: । गुणवत्यल्पदोष: स्यान्निर्गुणे तु निमज्जति

ভীষ্ম বললেন—রাজন! ব্রাহ্মণ যদি সাধু থেকেও দান গ্রহণ করে এবং অসাধু থেকেও গ্রহণ করে, তবে গুণবান থেকে গ্রহণে দোষ অল্প; কিন্তু নির্গুণ, দুষ্কর্মী থেকে গ্রহণ করলে সে পাপে নিমজ্জিত হয়।

Verse 20

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । वृषादर्भेश्व॒ संवादं सप्तर्षीणां च भारत,भारत! इस विषयमें राजा वृषादर्भि और सप्तर्षियोंके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है

ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! এ বিষয়েও একটি প্রাচীন ইতিহাস দৃষ্টান্তরূপে বলা হয়—রাজা বৃষাদর্ভি ও সপ্তর্ষিদের সংলাপ।

Verse 22

सर्वेषामथ तेषां तु गण्डा भूत्‌ कर्मकारिका । शूद्र: पशुसखश्वैव भर्ता चास्या बभूव ह

তখন তাদের সকলের মধ্যে গণ্ডা হাতে-কলমে শ্রম করে জীবিকা নির্বাহকারী কর্মকারিণী হয়ে উঠল। আর পশুপালনকারী ‘পশুসখ’ নামে এক শূদ্রই তার স্বামী হল।

Verse 23

ते च सर्वे तपस्यन्त: पुरा चेरुर्महीमिमाम्‌ | समाधिनोपशिक्षन्तो ब्रह्मलोक॑ सनातनम्‌

আর তারা সকলেই তপস্যা করতে করতে একদা এই পৃথিবী জুড়ে বিচরণ করেছিল। সমাধির দ্বারা তারা নিজেদেরকে সনাতন ব্রহ্মলোকের লক্ষ্যে শাসিত ও শিক্ষিত করত।

Verse 24

एक समयकी बात है, कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि और पतिव्रता देवी अरुन्धती--ये सब लोग समाधिके द्वारा सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या करते हुए इस पृथ्वीपर विचर रहे थे। इन सबकी सेवा करनेवाली एक दासी थी, जिसका नाम था “गण्डा'। वह पशुसख नामक एक शूद्रके साथ व्याही गयी थी (पशुसख भी इन्हीं महर्षियोंके साथ रहकर सबकी सेवा किया करता था) || २१-- २३ || अथाभवदनावृष्टिमहती कुरुनन्दन । कृच्छुप्राणो&भवद्‌ यत्र लोको<यं वै क्षुधान्वित:,कुरुनन्दन! एक बार पृथ्वीपर दीर्घकालतक वर्षा नहीं हुई। जिससे अकाल पड़ जानेके कारण यह सारा जगत्‌ भूखसे पीड़ित रहने लगा। लोग बड़ी कठिनाईसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे

কুরুনন্দন! এক সময় কশ্যপ, অত্রি, বশিষ্ঠ, ভরদ্বাজ, গৌতম, বিশ্বামিত্র, জমদগ্নি এবং পতিব্রতা দেবী অরুন্ধতী—এঁরা সকলেই সমাধির দ্বারা সনাতন ব্রহ্মলোক লাভের আকাঙ্ক্ষায় তপস্যা করতে করতে এই পৃথিবীতে বিচরণ করছিলেন। তাঁদের সকলের সেবায় নিয়োজিত ‘গণ্ডা’ নামে এক দাসী ছিল। তার বিবাহ হয়েছিল ‘পশুসখ’ নামের এক শূদ্রের সঙ্গে; সেও এই মহর্ষিদের সঙ্গেই থেকে সকলের সেবা করত। তারপর, কুরুনন্দন, একবার দীর্ঘকাল বৃষ্টি না হওয়ায় ভয়ংকর অনাবৃষ্টি দেখা দিল; দুর্ভিক্ষে সমগ্র জগৎ ক্ষুধায় কাতর হয়ে অতি কষ্টে প্রাণ ধারণ করল।

Verse 25

कम्मिंश्रिच्च पुरा यज्ञे शैब्येन शिबिसूनुना । दक्षिणार्थेड्थ ऋत्विग्भ्यो दत्त: पुत्र: पुरा किल,पूर्वकालमें शिबिके पुत्र शैब्यने किसी यज्ञमें दक्षिणाके रूपमें अपना एक पुत्र ही ऋत्विजोंको दे दिया था

প্রাচীন কালে শিবির পুত্র শৈব্য এক যজ্ঞে দক্ষিণা হিসেবে ঋত্বিজদের কাছে নিজের পুত্রকেই দান করেছিল।

Verse 26

अस्मिन्‌ काले5थ सोल्पायुर्दिष्टान्तमगमत्‌ प्रभु: । ते त॑ क्षुधाभिसंतप्ता: परिवार्योपतस्थिरे

সেই সময় স্বল্পায়ু রাজপুত্রটি তার নির্ধারিত অন্তে উপনীত হল। আর ঋষিগণ ক্ষুধায় দগ্ধ হয়ে সেই মৃত বালকটিকে ঘিরে চারদিক থেকে দাঁড়ালেন।

Verse 27

वृषादार्थिर्वाच (प्रतिग्रहो ब्राह्मणानां सृष्टा वृत्तिरनिन्दिता ।) प्रतिग्रहस्तारयति पुष्टिवैं प्रतिगृह्मुताम्‌ मयि यद्‌ विद्यते वित्त तद्‌ वृणुध्वं तपोधना:

ভীষ্ম বললেন—বৃষাদর্ভি বলল—ব্রাহ্মণদের জন্য প্রতিগ্রহ (দান গ্রহণ) নির্দোষ জীবিকারূপে বিধিত হয়েছে। প্রতিগ্রহ গ্রহণকারীদের দুর্ভিক্ষ ও ক্ষুধার দুঃখ থেকে উদ্ধার করে এবং পুষ্টি ও কল্যাণের কারণ হয়। অতএব, হে তপোধন ঋষিগণ, আমার কাছে যে ধন আছে তা গ্রহণ করুন।

Verse 28

प्रियो हि मे ब्राह्मणो याचमानो दद्यामहं वो<श्चवतरीसहस्रम्‌ । एकैकश: सवृषा: सम्प्रसूता: सर्वेषां वै शीघ्रगा: श्वेतरोमा:

ভীষ্ম বললেন—যে ব্রাহ্মণ আমার কাছে প্রার্থনা করে, সে আমার অতি প্রিয়। তাই আমি তোমাদের প্রত্যেককে এক হাজার করে খচ্চরী দিচ্ছি; আর তোমাদের সকলকে শ্বেতরোমা, দ্রুতগামী, বাছুর-প্রসূতা গাভী—ষাঁড়সহ—দিতে প্রস্তুত আছি।

Verse 29

कुलंभराननडुह: शतं शतान्‌ धुर्यान्‌ श्वेतान्‌ सर्वशो5हं ददामि । प्रष्ाहीनां पीवराणां च ताव- दग्रया गृष्ट्यो धेनव: सुव्रताश्ष

ভীষ্ম বললেন—আমি সর্বতোভাবে শত শত শ্বেত, দৃঢ়, জোয়াল-যোগ্য বলদ দিচ্ছি—যারা এক গৃহস্থের ভার বহনে সক্ষম। তদ্রূপ আমি শ্রেষ্ঠ দুধেল গাভীও দিচ্ছি—যারা তরুণী, সুপুষ্ট, প্রথমবার প্রসূতা, সদাচারিণী ও উত্তম ব্রতপরায়ণা, এবং প্রচুর দুধ দেয়।

Verse 30

वरान्‌ ग्रामान्‌ व्रीहिरसं यवांश्व रत्नं चान्यद्‌ दुर्लभ कि ददानि | नास्मिन्नभक्ष्ये भावमेवं कुरुध्व॑ पुष्टयर्थ व: कि प्रयच्छाम्यहं वै

ভীষ্ম বললেন—এ ছাড়াও আমি উৎকৃষ্ট গ্রাম, ধান ও তার পুষ্টিকর সার, যব, রত্ন এবং আরও বহু দুর্লভ বস্তু দিতে পারি। বলো—আমি তোমাদের কী দেব? যা ভক্ষণীয় নয়, তা ভক্ষণে মন দিও না। বলো—তোমাদের দেহপুষ্টির জন্য আমি কী দান করব?

Verse 31

ऋषय ऊचु: राजन प्रतिग्रहो राज्ञां मध्वास्वादो विषोपम: । तज्जानमान: कस्मात्‌ त्वं कुरुषे न: प्रलोभनम्‌

ঋষিরা বললেন—হে রাজন! রাজাদের দান গ্রহণ প্রথমে মধুর মতো মিষ্টি লাগে, কিন্তু পরিণামে বিষের মতো ভয়ংকর হয়। তা জেনেও তুমি কেন আমাদের প্রলোভনে ফেলছ?

Verse 32

क्षेत्र हि दैवतमिदं ब्राह्मणान्‌ समुपाश्रितम्‌ । अमलो होष तपसा प्रीत: प्रीणाति देवता:

ব্রাহ্মণের দেহই দেবতাদের আশ্রয়স্থান; তাতে সকল দেবতা অধিষ্ঠিত থাকেন। ব্রাহ্মণ তপস্যায় নির্মল ও তুষ্ট হলে তিনি সমগ্র দেবতাকে প্রসন্ন করেন।

Verse 33

अल्वापहि तपो जातु ब्राह्मणस्योपजायते । तद्‌ दाव इव निर्दह्यात्‌ प्राप्तो राजप्रतिग्रह:

ব্রাহ্মণ দিনভর যে সামান্য তপও সঞ্চয় করে, রাজার দান গ্রহণ করলে তা বনদাহের মতো পুড়ে নষ্ট হয়।

Verse 34

कुशलं सह दानेन राजन्नस्तु सदा तव | अर्थिभ्यो दीयतां सर्वमित्युक्त्वान्येन ते ययु:

রাজন! এই দানের সঙ্গে আপনি সদা কুশল থাকুন। যারা আপনার কাছে প্রার্থনা করে, তাদেরই সব দান করা হোক—এ কথা বলে তারা অন্য পথে চলে গেল।

Verse 35

तत:ः प्रचोदिता राज्ञा वन॑ गत्वास्य मन्त्रिण: । प्रचीयोदुम्बराणि सम दातु तेषां प्रचक्रिरे,तब राजाकी प्रेरणासे उनके मन्त्री वनमें गये और गूलरके फल तोड़कर उन्हें देनेकी चेष्टा करने लगे

তখন রাজার প্রেরণায় তার মন্ত্রীরা বনে গিয়ে উদুম্বর (গোলর) ফল সংগ্রহ করতে লাগল এবং সেগুলি সমানভাবে বণ্টন করার উদ্যোগ নিল।

Verse 36

उदुम्बराण्यथान्यानि हेमगर्भाण्युपाहरन्‌ । भृत्यास्तेषां ततस्तानि प्रग्राहितुमुपाद्रवन्‌

মন্ত্রীরা উদুম্বরসহ নানা বৃক্ষের ফল এনে তার ভেতরে স্বর্ণমুদ্রা ভরে দিল। তারপর রাজসেবকেরা সেই ফলগুলি ঋষিদের হাতে তুলে দিতে তাদের পেছনে ধাওয়া করল।

Verse 37

गुरूणीति विदित्वाथ न ग्राह्माण्यत्रिरब्रवीत्‌ न स्महे मन्दविज्ञाना न स्महे मन्दबुद्धयः

গুরুজনদের প্রতি যথোচিত নীতি বুঝে মহর্ষি অত্রি বললেন—“এগুলি গ্রহণযোগ্য নয়। আমাদের বুদ্ধি মন্দ হয়নি, আমাদের বিবেচনাশক্তিও লুপ্ত নয়।” তিনি দেখলেন ফলগুলি অস্বাভাবিকভাবে ভারী হয়েছে এবং দানের অন্তর্নিহিত উদ্দেশ্যও বুঝলেন। তখন বললেন—“লোভ ও ছলনায় কলুষিত যা কিছু, তা গ্রহণ করলে পরলোকে তিক্ত ফল ভোগ করতে হয়। অতএব যে ইহলোক ও পরলোক—উভয়েই মঙ্গল চায়, তার পক্ষে এমন লাভ অগ্রাহ্য।”

Verse 38

हैमानीमानि जानीम: प्रतिबुद्धा: सम जागृूम । इह होतदुपादत्तं प्रेत्य स्पात्‌ कटुकोदयम्‌ । अप्रतिग्राह्ममेवैतत्‌ प्रेत्पेह च सुखेप्सुना

“আমরা জানি, এগুলি ভিতরে সোনায় ভরা। আমরা সম্পূর্ণ জাগ্রত ও সতর্ক; আমাদের বোধশক্তি ম্লান হয়নি। এই ফলগুলির মধ্যে স্বর্ণ গোপন আছে—এ কথা আমাদের সুস্পষ্ট। যদি আমরা এখনই এগুলি গ্রহণ করি, তবে মৃত্যুর পরে এর ফল তিক্তভাবে উদিত হবে। অতএব যে ইহলোক ও পরলোক—উভয়েই সুখ-কল্যাণ চায়, তার পক্ষে এ দান সম্পূর্ণ অগ্রাহ্য।”

Verse 39

हर प्ज् (४ ब्र्‌ कर ४ [४4 वसिष्ठ उवाच शतेन निष्कगणितं सहस्रेण च सम्मितम्‌ । तथा बहु प्रतीच्छन्‌ वै पापिष्ठां पतते गतिम्‌

বসিষ্ঠ বললেন—“একটি নিষ্ক (স্বর্ণমুদ্রা) গ্রহণ করলেও তার দোষ যেন শত নিষ্ক গ্রহণের সমান গণ্য হয়; আর সহস্র গ্রহণ করলে তা আরও বৃহৎ বলে ধরা হয়। অতএব যে এমন বহু নিষ্ক গ্রহণ করে, সে ঘোর পাপময় গতিতে পতিত হয়।”

Verse 40

कश्यप उवाच यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय: । सर्व तन्नालमेकस्य तस्माद्‌ विद्वान्‌ शमं चरेत्‌

কাশ্যপ বললেন—“এই পৃথিবীতে যত ধান-যব, স্বর্ণ, পশু ও নারী আছে—সবই যদি এক জনের অধিকারে আসে, তবুও তার তৃপ্তি হবে না। অতএব এই সত্য জেনে জ্ঞানী ব্যক্তি মন의 তৃষ্ণা সংযত করে অন্তঃশান্তি সাধন করুক।”

Verse 41

भरद्वाज उवाच उत्पन्नस्य रुरो: शंंगं वर्धमानस्य वर्धते । प्रार्थना पुरुषस्येव तस्य मात्रा न विद्यते

ভরদ্বাজ বললেন—“যেমন ‘রুরু’ সাপের শিং একবার জন্মালে বাড়তে বাড়তে ক্রমেই বাড়ে, তেমনি মানুষের প্রার্থনা—অর্থাৎ আকাঙ্ক্ষা—বিস্তৃত হতে থাকে; তার কোনো নির্দিষ্ট পরিমাপ বা সীমা নেই।”

Verse 42

भरद्वाज बोले--जैसे उत्पन्न हुए मृगका सींग उसके बढ़नेके साथ-साथ बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मनुष्यकी तृष्णा सदा बढ़ती ही रहती है, उसकी कोई सीमा नहीं है ।।

গৌতম বললেন—এই জগতে এমন কোনো ধন বা বস্তু নেই যা মানুষের তৃষ্ণাকে সম্পূর্ণ তৃপ্ত করতে পারে। মানুষ সমুদ্রের মতো—সে কখনোই পূর্ণ হয় না; তার আকাঙ্ক্ষা সর্বদাই বাড়তে থাকে, তার কোনো সীমা নেই।

Verse 43

विश्वामित्र उवाच काम कामयमानस्य यदा काम: समृध्यते । अथैनमपर: कामस्तृष्णाविध्यति बाणवत्‌

বিশ্বামিত্র বললেন—ভোগের কামনা করা মানুষের একটি ইচ্ছা পূর্ণ হলে, তার স্থানে আরেকটি নতুন ইচ্ছা জাগে। এভাবে তৃষ্ণা তীরের মতো বারবার মনকে বিদ্ধ করে।

Verse 44

(भत्रिरुवाच न जातु काम: कामनामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ।।

অত্রি বললেন—বিষয়ভোগে কামনা কখনো শান্ত হয় না; ঘৃতাহুতি পেলে যেমন অগ্নি আরও দাউদাউ করে জ্বলে ওঠে, তেমনি তা আরও বৃদ্ধি পায়। জমদগ্নি বললেন—দান গ্রহণ না করলে ব্রাহ্মণ নিশ্চিতই সংযম রক্ষা করে এবং তপস্যা অটুট থাকে। তপস্যাই এখানে ব্রাহ্মণের প্রকৃত ধন; কিন্তু যে পার্থিব ধনের লোভে পড়ে, তার তপস্যার ধন ক্ষয়ে গিয়ে নষ্ট হয়।

Verse 45

अरुन्धत्युवाच धर्मार्थ संचयो यो वै द्रव्याणां पक्षसम्मत: । तप:संचय एवेह विशिष्टो द्रव्यसंचयात्‌

অরুন্ধতী বললেন—কিছু লোকের মত এই যে ধর্মের জন্য ধন সঞ্চয় করা উচিত; কিন্তু আমার মতে ধনসঞ্চয়ের চেয়ে তপস্যার সঞ্চয়ই অধিক শ্রেষ্ঠ।

Verse 46

गण्डोवाच उग्रादितो भयाद्‌ यस्माद्‌ बिभ्यतीमे ममेश्वरा: । बलीयांसो दुर्बलवद्‌ बिभेम्यहमत: परम्‌

গণ্ড বলল—কঠোর ভয় দেখানোয় ভীতি জেগেছে; তাই আমার প্রভু ও রক্ষকরাও এখন কাঁপছে। শক্তিমানদের দুর্বলের মতো কাঁপতে দেখে আমিও আরও বেশি আতঙ্কিত হয়ে পড়েছি।

Verse 47

गण्डाने कहा--मेरे ये मालिक लोग अत्यन्त शक्तिशाली होते हुए भी जब इस भयंकर प्रतिग्रहके भयसे इतना डरते हैं, तब मेरी क्या सामर्थ्य है? मुझे तो दुर्बल प्राणियोंकी भाँति इससे बहुत बड़ा भय लग रहा है ।।

পশুসখ বলল—ধর্মানুসারে জীবনযাপনে যে ধন লাভ হয়, তার চেয়ে শ্রেষ্ঠ ধন আর নেই। ব্রাহ্মণরাই সেই ধনকে প্রকৃত ধন বলে জানেন; তাই সেই ধর্মজাত ধন লাভের শৃঙ্খলা ও উপায় শিখতে আমি যথাসাধ্য বিনীতভাবে এক পরম বিদ্বান ব্রাহ্মণের সেবায় নিজেকে নিয়োজিত করেছি।

Verse 48

ऋषय ऊचु: कुशलं सह दानेन तस्मै यस्य प्रजा इमा: । फलान्युपधियुक्तानि य एवं न: प्रयच्छति

ঋষিরা বললেন—যে রাজার প্রজারা ছলমিশ্রিত ফল এনে দিয়েছে, এবং যে রাজা ফল দানের অজুহাতে আমাদের স্বর্ণ দান করছে, সেই রাজা দানের সঙ্গে সঙ্গে কল্যাণ ও নিরাপত্তায় স্থিত থাকুক।

Verse 49

भीष्म उवाच इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि हित्वा तानि फलानि वै | ऋषयो जम्मुरन्यत्र सर्व एव धृतव्रता:

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! এ কথা বলে সেই সকল দৃঢ়ব্রত মহর্ষি স্বর্ণভরা ফলগুলি ত্যাগ করে সেখান থেকে অন্যত্র চলে গেলেন।

Verse 50

मन्त्रिण ऊचु. उपधिं शंकमानास्ते हित्वा तानि फलानि वै । ततोडन्येनैव गच्छन्ति विदितं तेडस्तु पार्थिव

মন্ত্রীগণ বললেন—মহারাজ! আপনার জ্ঞাত হোক, সেই ফলগুলি দেখামাত্র ঋষিদের মনে প্রতারণার সন্দেহ জাগে; তাই তারা ফলগুলি ত্যাগ করে অন্য পথ ধরে চলে গেছেন।

Verse 51

इत्युक्तः स तु भृत्यैस्तैर्वषादर्भिश्ुकोप ह । तेषां वै प्रतिकर्तु च सर्वेषामगमद्‌ गृहम्‌

ভীষ্ম বললেন—চাকরদের এ কথা শুনে রাজা বৃষাদর্ভি প্রবল ক্রোধে উন্মত্ত হলেন; এবং সেই ঋষিদের কাছে অপমানের প্রতিশোধ নেওয়ার সংকল্প করে তিনি নিজের নগরীতে (রাজধানীতে) ফিরে গেলেন।

Verse 52

स गत्वा हवनीये>ग्नौ तीव्रं नियममास्थित: । जुहाव संस्कृतैर्मन्त्रेरकेकामाहुतिं नृप:,वहाँ जाकर अत्यन्त कठोर नियमोंका पालन करते हुए वे आहवनीय अम्निमें आभिचारिक मन्त्र पढ़कर एक-एक आहुति डालने लगे

সেখানে গিয়ে অত্যন্ত কঠোর নিয়ম পালন করে রাজা আহবনীয় অগ্নিতে বিধিপূর্বক সংস্কৃত মন্ত্র উচ্চারণ করে একে একে আহুতি দিতে লাগলেন।

Verse 53

तस्मादग्ने: समुत्तस्थौ कृत्या लोकभयंकरी । तस्या नाम वृषादर्भियातुधानीत्यथाकरोत्‌,आहुति समाप्त होनेपर उस अग्निसे एक लोकभयंकर कृत्या प्रकट हुई। राजा वृषादर्भिने उसका नाम यातुधानी रखा

তখন সেই অগ্নি থেকে সমগ্র লোককে ভীতিকর এক কৃত্যা উদ্ভূত হল। রাজা বৃষাদর্ভি তার নাম রাখলেন ‘যাতুধানী’।

Verse 54

सा कृत्या कालरात्रीव कृताञज्जलिरुपस्थिता । वृषादर्भि नरपतिं कि करोमीति चाब्रवीत्‌

কালরাত্রির ন্যায় ভয়ংকর রূপ ধারণ করে সেই কৃত্যা করজোড়ে রাজা বৃষাদর্ভির সামনে উপস্থিত হয়ে বলল—“মহারাজ! আমি আপনার কোন আদেশ পালন করব?”

Verse 55

वृषादार्थिऱवाच ऋषीणां गच्छ सप्तानामरुन्धत्यास्तथैव च । दासीभर्तुश्न दास्याश्न मनसा नाम धारय

বৃষাদর্ভি বললেন—“যাতুধানী! তুমি সাত ঋষির কাছে যাও, আর অরুন্ধতীর কাছেও। তাদের দাসী ও সেই দাসীর স্বামীর নামও জেনে মনে ধারণ করো।”

Verse 56

मुनिश्च स्थात्‌ सदा विप्रो वेदांश्वैव सदा जपेत्‌ । त्यागका सम्पादन ही सबसे उत्तम तपस्या है। ब्राह्मणको सदा उपवासी (व्रतपरायण)

ব্রাহ্মণ সর্বদা মুনিস্বভাব হয়ে বেদ জপ করুক। এদের সকলের নাম জেনে এদের সকলকে বিনাশ কর; আর তারা বিনষ্ট হলে, তোমার ইচ্ছামতো যেখানে খুশি চলে যেয়ো।

Verse 57

सा तथेति प्रतिश्रुत्य यातुधानी स्वरूपिणी । जगाम तद्‌ वन यत्र विचेरुस्ते महर्षय:,राजाकी यह आज्ञा पाकर यातुधानीने “तथास्तु” कहकर इसे स्वीकार किया और जहाँ वे महर्षि विचरा करते थे, उस वनमें चली गयी

রাজার আদেশ পেয়ে রূপধারিণী যাতুধানী ‘তথাস্তु’ বলে প্রতিশ্রুতি দিল এবং যেখানে সেই মহর্ষিরা বিচরণ করতেন, সেই বনের দিকে চলে গেল।

Verse 58

भीष्म उवाच अथात्रिप्रमुखा राजन्‌ वने तस्मिन्‌ महर्षय: । व्यचरन्‌ भक्षयन्तो वै मूलानि च फलानि च,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! उन दिनों वे अत्रि आदि महर्षि उस वनमें फल-मूलका आहार करते हुए घूमा करते थे

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, সেই সময় অত্রি প্রমুখ মহর্ষিরা সেই বনে ফল-মূল আহার করে বিচরণ করতেন।

Verse 59

अथापश्यन्‌ सुपीनांसपाणिपादमुखोदरम्‌ । परिव्रजन्तं स्थूलांगं परिव्राजं शुना सह

তখন সেই ঋষিরা দেখলেন—এক পরিব্রাজক সন্ন্যাসী কুকুরসহ এদিক-ওদিক ঘুরে বেড়াচ্ছে। তার দেহ ছিল স্থূল; কাঁধ, হাত, পা, মুখ, উদর—সব অঙ্গই সুন্দর ও সুসমঞ্জস।

Verse 60

अरुन्धती तु त॑ दृष्टवा सर्वांगोपचितं शुभम्‌ | भवितारो भवन्तो वै नैवमित्यब्रवीदृूषीन्‌

অরুন্ধতী সেই শুভ, সর্বাঙ্গে পুষ্ট সন্ন্যাসীকে দেখে ঋষিদের বললেন—“আপনারা কি কখনও এমন হতে পারবেন না?”

Verse 61

वसिष्ठ उवाच नैतस्थेह यथास्माकमग्निहोत्रमनिर्ठठतम्‌ । सायं प्रातश्न होतव्यं तेन पीवाउ्छुना सह

বসিষ্ঠ বললেন—“আমাদের মতো এর চিন্তা নেই যে আজ অগ্নিহোত্র অসম্পন্ন রইল, আর প্রাতে-সায়ে তা করতেই হবে; তাই কুকুরের সঙ্গেই থেকে এ এমন ফেঁপে-ফুলে উঠেছে।”

Verse 62

अत्रिर्वाच नैतस्येह यथास्माकं क्षुधा वीर्य समाहतम्‌ । कृच्छाधीतं प्रणष्टं च तेन पीवाउछुना सह

অত্রি বললেন—আমাদের মতো ক্ষুধা এর শক্তিকে চূর্ণ করে নষ্ট করেনি। আর বহু কষ্টে অর্জিত বৈদিক অধ্যয়নও আমাদের মতো এর থেকে লুপ্ত হয়নি। তাই সেই কুকুরের সঙ্গেও এ স্থূল-পুষ্ট হয়েছে।

Verse 63

विश्वामित्र उवाच नैतस्येह यथास्माकं शभश्रच्छास्त्रं जरद्गव: | अलस: क्षुत्परो मूर्खस्तेन पीवाउछुना सह

বিশ্বামিত্র বললেন—হে জরদ্গব! এ আমাদের মতো নয়—ক্ষুধার চাপে আমাদের চিরন্তন শাস্ত্র বিস্মৃত হয়েছে, আর শাস্ত্রবিহিত ধর্মও ম্লান হয়ে গেছে। কিন্তু এ অলস, কেবল উদরপূর্তির তাড়নায় চালিত, এবং মূঢ়; তাই সেই কুকুরের সঙ্গেও এ স্থূল হয়েছে।

Verse 64

जगदग्निरुवाच नैतस्थेह यथास्माकं भक्तमिन्धनमेव च । संचिन्त्यं वार्षिक चित्ते तेन पीवाउछुना सह

জমদগ্নি বললেন—আমাদের মতো এর মনে সারা বছরের জন্য অন্ন ও জ্বালানি জোগাড়ের দুশ্চিন্তা নেই। তাই সেই কুকুরের সঙ্গেও এ পুষ্ট হয়েছে।

Verse 65

कश्यप उवाच नैतस्थेह यथास्माकं चत्वारश्न सहोदरा: । देहि देहीति भिक्षन्ति तेन पीवाउछुना सह

কাশ্যপ বললেন—এ আমাদের মতো নয়। আমাদের চার সহোদর ভাই প্রতিদিন ‘দাও, দাও’ বলে ভিক্ষা চায়; তাই বৃহৎ কুটুম্বের অন্ন-বস্ত্রের ভার আমাদেরই বহন করতে হয়। এই সন্ন্যাসীর তেমন দুশ্চিন্তা নেই; তাই সে কুকুরের সঙ্গেও পুষ্ট।

Verse 66

भरद्वाज उवाच नैतस्येह यथास्माकं ब्रह्मुबन्धोरचेतस: । शोको भार्यापवादेन तेन पीवाउछुना सह

ভরদ্বাজ বললেন—এই অচেতন ‘ব্রাহ্মণ-বন্ধু’ আমাদের মতো নয়। স্ত্রীর ওপর আরোপিত অপবাদ থেকে যে শোক জন্মায়, তা এর মধ্যে নেই; তাই সেই করুণ আর্তনাদের সঙ্গেও এ অবিচল রইল।

Verse 67

भरद्वाज बोले--इस विवेकशून्य ब्राह्मणबन्धुको हमलोगोंकी तरह अपनी स्त्रीके कलंकित होनेका शोक नहीं है। इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ।।

গৌতম বললেন—এ ব্যক্তি এখানে আমাদের মতো কুশ-দড়ির তিন-সুতো মেখলা ও মৃগচর্ম—প্রতিটি তিন বছর করে ধারণ করে—বাস করতে বাধ্য নয়। তাই সেই কুকুরটির সঙ্গে থাকতে থাকতে সে মোটা ও স্বচ্ছন্দ হয়ে উঠেছে।

Verse 68

भीष्म उवाच अथ दृष्टवा परिव्राट्‌ स तान्‌ महर्षीन्‌ शुना सह । अभिगम्य यथान्यायं पाणिस्पर्शमभथाचरत्‌

ভীষ্ম বললেন—রাজন! কুকুরসহ আগত সেই পরিব্রাজক মহর্ষিদের দেখে তাঁদের কাছে গিয়ে সন্ন্যাস-ধর্মের বিধি অনুসারে তাঁদের হাতে স্পর্শ করে প্রণাম করল।

Verse 69

परिचर्या बने तां तु क्षुत्प्रतिघातकारिकाम्‌ । अन्योन्येन निवेद्याथ प्रातिष्ठन्त सहैव ते

তারপর তারা পরস্পরের কুশল জিজ্ঞাসা করে বলল—“ক্ষুধা নিবারণের জন্যই আমরা এই অরণ্যে বিচরণ করি।” এ কথা বলে তারা সকলে একসঙ্গে সেখান থেকে রওনা হল।

Verse 70

एकनिश्चषयकार्याश्ष व्यचरन्त वनानि ते । आददाना: समुद्धृत्य मूलानि च फलानि च,उन सबके निश्चय और कार्य एक-से थे। वे फल-मूलका संग्रह करके उन्हें साथ लिये उस वनमें विचर रहे थे

তাদের সকলের সংকল্প ও কর্ম এক ছিল। তারা শিকড় ও ফল উপড়ে সংগ্রহ করে, তা সঙ্গে নিয়ে সেই অরণ্যে বিচরণ করত।

Verse 71

कदाचिद्‌ विचरन्तस्ते वृक्षैरविरलैवृताम्‌ । शुचिवारिप्रसन्नोदां ददृशु: पद्मिनीं शुभाम्‌

একদিন ঘুরতে ঘুরতে তারা এক শুভ পদ্মিনী (কমল-সরোবর) দেখল, যা ঘন ও অবিচ্ছিন্ন বৃক্ষরাজিতে পরিবেষ্টিত। তার জল ছিল নির্মল, পবিত্র ও শান্ত।

Verse 72

बालादित्यवपु:प्रख्यै: पुष्करैरुपशोभिताम्‌ । वैदूर्यवर्णसदृशै: पद्मपत्रैरथावृताम्‌

প্রভাতের কিশোর সূর্যের মতো অরুণাভ দেহবিশিষ্ট পদ্মে সেই সরোবর শোভিত ছিল; আর বৈদূর্যমণির ন্যায় দীপ্ত পদ্মপত্রে তা চারিদিক থেকে আচ্ছাদিত ছিল।

Verse 73

नानाविधैश्व विहगैर्जलप्रकरसेविभि: । एकद्वारामनादेयां सूपतीर्थामकर्दमाम्‌

সেখানে নানা প্রকার জলাশ্রয়ী পাখি নানাবিধ কলরবে মুখর করে তার প্রাচুর্য জল পান করত। তাতে প্রবেশের একটিই দ্বার ছিল; সেখান থেকে কিছুই নেওয়া নিষিদ্ধ ছিল। স্নানের জন্য উৎকৃষ্ট ঘাট-সিঁড়ি নির্মিত ছিল, এবং তা শ্যাওলা ও কাদামাটি থেকে সম্পূর্ণ মুক্ত ছিল।

Verse 74

वृषादर्भिप्रयुक्ता तु कृत्या विकृतदर्शना । यातुधानीति विख्याता पदूमिनीं तामरक्षत,राजा वृषादर्भिकी भेजी हुई भयानक आकारवाली यातुधानी कृत्या उस तालाबकी रक्षा कर रही थी

রাজা বৃষাদর্ভী কর্তৃক প্রেরিত, বিকৃতদর্শনা এবং ‘যাতুধানী’ নামে খ্যাত সেই কৃত্যা সেই পদ্মিনী (কমল-সরোবর) রক্ষা করছিল।

Verse 75

पशुसखसहायास्तु बिसार्थ ते महर्षय: । पद्मिनीमभिजम्मुस्ते सर्वे कृत्याभिरक्षिताम्‌,पशुसखके साथ वे सभी महर्षि मृणाल लेनेके लिये उस सरोवरके तटपर गये, जो उस कृत्याके द्वारा सुरक्षित था

পশুসখের সহায়তায় সেই সকল মহর্ষি মৃণাল সংগ্রহের উদ্দেশ্যে সেই পদ্মিনীর নিকট গেলেন, যা সেই কৃত্যার দ্বারা রক্ষিত (এবং দুর্লঙ্ঘ্য) ছিল।

Verse 76

ततस्ते यातुधानीं तां दृष्टवा विकृतदर्शनाम्‌ । स्थितां कमलिनीतीरे कृत्यामूचुर्महर्षय:,सरोवरके तटपर खड़ी हुई उस यातुधानी कृत्याको जो बड़ी विकराल दिखायी देती थी, देखकर वे सब महर्षि बोले--

তখন কমলিনী-তীরে দাঁড়িয়ে থাকা বিকৃতদর্শনা সেই যাতুধানী কৃত্যাকে দেখে মহর্ষিগণ তাকে সম্বোধন করলেন।

Verse 77

एका तिष्ठसि का च त्वं कस्यार्थे कि प्रयोजनम्‌ । पद्मिनीतीरमाश्रित्य ब्रूहि त्वं किं चिकीर्षसि

ভীষ্ম বললেন—“তুমি কে, যে একা এখানে দাঁড়িয়ে আছ, আর কার জন্য এখানে এসেছ? কী উদ্দেশ্যে তুমি এ স্থানে উপস্থিত? পদ্মভরা এই সরোবরের তীরে আশ্রয় নিয়ে বলো—তুমি কী সাধন করতে চাও?”

Verse 78

यातुधान्युवाच यास्मि सास्म्यनुयोगो मे न कर्तव्य: कथंचन । आरक्षिणीं मां पद्मिन्या वित्त सर्वे तपोधना:

যাতুধানী বলল—“আমি যা, তাই-ই আমি; আমার বিষয়ে কোনোভাবেই তোমাদের জিজ্ঞাসাবাদ করার অধিকার নেই। হে তপোধন তপস্বীগণ, এতটুকু জেনে রাখো—আমি এই পদ্মিনী সরোবরের রক্ষিণী।”

Verse 79

ऋषय ऊचु: सर्व एव क्षुधार्ता: सम न चान्यत्‌ किंचिदस्ति न: । भवत्या: सम्मते सर्वे गृहल्लीयाम बिसान्युत

ঋষিরা বললেন—“ভদ্রে! আমরা সকলেই এখন ক্ষুধায় কাতর, আর আমাদের কাছে আহারের জন্য আর কিছুই নেই। অতএব যদি তোমার সম্মতি হয়, তবে আমরা এই সরোবর থেকে কিছু মৃণাল (পদ্মনাল) গ্রহণ করি।”

Verse 80

यातुधान्युवाच समयेन बिसानीतो गृह्नीध्वं कामकारत: । एकैको नाम मे प्रोक्‍्त्वा ततो गृह्नीत माचिरम्‌

যাতুধানী বলল—“একটি শর্তে তোমরা ইচ্ছামতো এই সরোবর থেকে মৃণাল নিতে পারো। তবে একে একে এসো; আগে আমাকে তোমাদের নাম ও উদ্দেশ্য বলো, তারপর গ্রহণ করো—বিলম্ব কোরো না।”

Verse 81

भीष्म उवाच विज्ञाय यातुधानीं तां कृत्यामृषिवधैषिणीम्‌ । अत्रि: क्षुधापरीतात्मा ततो वचनमत्रवीत्‌

ভীষ্ম বললেন—“রাজন! তার কথা শুনে মহর্ষি অত্রি বুঝলেন—এ এক যাতুধানী, ঋষিবধে উদ্যত কৃত্যা। তবু ক্ষুধায় অন্তর ব্যাকুল হয়ে অত্রি তখন এই বাক্য বললেন।”

Verse 82

अत्रिरवाच अरात्रिरत्रि: सा रात्रियां नाथीते त्रिरद्य वै अरात्रिरत्रिरित्येव नाम मे विद्धि शोभने

অত্রি বললেন—“আমি আরাত্রি অত্রি। সেই রাত্রি আজ শক্তিহীন হয়েছে—আজ তা ত্রিবিধভাবে পরাভূত। অতএব, হে শোভনে, আমার নাম কেবল ‘আরাত্রি অত্রি’ বলেই জানো।”

Verse 83

अत्रि बोले--कल्याणी! काम आदि शत्रुओंसे त्राण करनेवालेको अरात्रि कहते हैं और अत्‌ (मृत्यु) से बचानेवाला अत्रि कहलाता है। इस प्रकार मैं ही अरात्रि होनेके कारण अत्रि हूँ। जबतक जीवको एकमात्र परमात्माका ज्ञान नहीं होता

অত্রি বললেন—“কল্যাণী! কাম প্রভৃতি শত্রুদের থেকে যে উদ্ধার করে, তাকে ‘আরাত্রি’ বলা হয়; আর ‘অৎ’—মৃত্যু—থেকে যে রক্ষা করে, সে ‘অত্রি’ নামে পরিচিত। অতএব ‘আরাত্রি’ হওয়ার কারণেই আমি ‘অত্রি’ও। যতক্ষণ জীব একমাত্র পরমাত্মার জ্ঞান লাভ না করে, ততক্ষণ সেই অবস্থা ‘রাত্রি’ নামে অভিহিত। সেই অজ্ঞানাবস্থা থেকে মুক্ত বলেই আমি ‘আরাত্রি’ ও ‘অত্রি’। আর যে পরমাত্মতত্ত্ব সকল প্রাণীর কাছে অজ্ঞাত বলে রাত্রির ন্যায়, তাতে আমি সদা জাগ্রত থাকি; তাই আমার কাছে তা রাত্রির মতো নয়—এই ব্যুৎপত্তি অনুসারেও আমি ‘আরাত্রি’ ও ‘অত্রি’ (জ্ঞानी) নাম ধারণ করি। এটাই আমার নামের তাৎপর্য।” যাতুধানী বলল—“হে মহাদ্যুতি মহর্ষি! আপনি যেভাবে আপনার নামের অর্থ বললেন, তা আমার মনে ধারণ করা কঠিন। এখন যান—পদ্মভরা সরোবরে অবতরণ করুন।”

Verse 84

वसिष्ठ उवाच वसिष्ठो5स्मि वरिष्ठो5स्मि वसे वासगृहेष्वपि । वसिष्ठत्वाच्च वासाच्च वसिष्ठ इति विद्धि माम्‌

বসিষ্ঠ বললেন—“আমি বসিষ্ঠ; আমি সর্বশ্রেষ্ঠ। আশ্রয়দাতা গৃহেও আমি বাস করি। আমার শ্রেষ্ঠতা এবং বাস—উভয় কারণেই আমাকে ‘বসিষ্ঠ’ নামে জানো।”

Verse 85

वसिष्ठ बोले--मेरा नाम वसिष्ठ है, सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण लोग मुझे वरिष्ठ भी कहते हैं। मैं गृहस्थ-आश्रममें वास करता हूँ; अतः वसिष्ठता (ऐश्वर्य-सम्पत्ति) और वासके कारण तुम मुझे वसिष्ठ समझो ।।

বসিষ্ঠ বললেন—“আমার নাম বসিষ্ঠ। সর্বশ্রেষ্ঠ বলে গণ্য হওয়ায় লোকেরা আমাকে ‘বরিষ্ঠ’ও বলে। আমি গৃহস্থাশ্রমে বাস করি; অতএব বসিষ্ঠতা—ঐশ্বর্য-সমৃদ্ধি ও উৎকর্ষ—এবং বাস—এই দুই কারণেই আমাকে ‘বসিষ্ঠ’ বলে জানো।” যাতুধানী বলল—“মুনে! আপনি আপনার নামের যে ব্যাখ্যা দিলেন, তার অক্ষর উচ্চারণ করাও কঠিন। আমি এ নাম ধারণ করতে পারি না। যান—পদ্মভরা সরোবরে অবতরণ করুন।”

Verse 86

कश्यप उवाच कुलं कुलं च कुवम: कुवम: कश्यपो द्विज: । काश्य: काशनिकाशत्वादेतन्मे नाम धारय

কশ্যপ বললেন—“যাতুধানী! ‘কশ্য’ হলো দেহের নাম; যে তাকে পালন করে, সে ‘কশ্যপ’ নামে পরিচিত। আমি প্রত্যেক ‘কুল’—অর্থাৎ প্রত্যেক দেহে—অন্তর্যামী রূপে প্রবেশ করে তাকে রক্ষা করি, তাই আমি কশ্যপ। আর ‘কু’ অর্থাৎ পৃথিবীতে ‘বম’—বৃষ্টি—বর্ষণ করায় যে সূর্য, সেও আমারই স্বরূপ; তাই আমাকে ‘কুবম’ও বলা হয়। আমার দেহকান্তি কাশফুলের মতো উজ্জ্বল, তাই আমি ‘কাশ্য’ নামেও প্রসিদ্ধ। এটাই আমার নাম—এটি ধারণ করো।”

Verse 87

यातुधान्युवाच यथोदाह्वतमेतत्‌ ते मयि नाम महाद्युते । दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम्‌

যাতুধানী বলল—হে মহাদ্যুতি ঋষি! আপনি যেমন ব্যাখ্যা করলেন, তেমন করে আমার পক্ষে আপনার নামের অর্থ মন দিয়ে ধারণ করা অত্যন্ত কঠিন। এসো—পদ্মভরা সরোবরে নেমে পড়ো।

Verse 88

भरद्वाज उवाच भरे5सुतान्‌ भरेडशिष्यान्‌ भरे देवान्‌ भरे द्विजान्‌ । भरे भार्या भरे द्वाजं भरद्वाजोडस्मि शोभने

ভরদ্বাজ বললেন—কল্যাণী! আমি আমার পুত্রদের পালন করি, শিষ্যদেরও; যথাবিধি অর্ঘ্য-হোমে দেবতাদেরও তুষ্ট করি এবং দানধর্মে দ্বিজদেরও ধারণ করি। আমি আমার পত্নীকেও, আর ‘দ্বাজ’ (বর্ণসংকর) নামে পরিচিত লোকদেরও পালন করি; তাই, হে শোভনে, আমি ভরদ্বাজ নামে প্রসিদ্ধ।

Verse 89

यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत्‌ ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्‌ | नैतद्‌ धारयितुं शक्‍्यं गच्छावतर पद्मिनीम्‌

যাতুধানী বলল—হে মুনিবর! আপনার নামের এই নিরুক্তও আমার কাছে কষ্টে উচ্চারিত অক্ষরের মতো মনে হয়; আমি তা ধারণ করতে পারি না। যাও—পদ্মভরা সরোবরে নেমে পড়ো।

Verse 90

गौतम उवाच गोदमो दमतो<5धूमो5दमस्ते समदर्शनात्‌ । विद्धि मां गौतमं कृत्ये यातुधानि निबोध माम्‌

গৌতম বললেন—হে কৃত্যা! আমি ‘গো’—ইন্দ্রিয়সমূহকে দমন করেছি, তাই আমি ‘গোদম’ নামে পরিচিত। আমি ধোঁয়াহীন অগ্নির মতো দীপ্তিমান। সমদৃষ্টির কারণে তুমি বা অন্য কেউ আমাকে দমন করতে পারবে না। আমাকে গৌতম বলে জানো, হে যাতুধানী—আমাকে বুঝে নাও।

Verse 91

यातुधान्युवाच यथोदाह्नतमेतत्‌ ते मयि नाम महामुने । नैतद्‌ धारयितुं शक्‍्यं गच्छावतर पद्मिनीम्‌,यातुधानी बोली--महामुने! आपके नामकी व्याख्या भी मैं नहीं समझ सकती। जाइये, पोखरेमें प्रवेश कीजिये

যাতুধানী বলল—হে মহামুনি! আপনি যেমন বললেন, তেমন করে আমার পক্ষে আপনার নামের অর্থ বোঝা তো দূরের কথা, তা ধারণ করাও সম্ভব নয়। এসো—পদ্মভরা সরোবরে নেমে পড়ো।

Verse 92

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें श्राद्धकल्पविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

বিশ্বামিত্র বললেন— বিশ্বেদেবগণ আমার বন্ধু, আর আমিও গাভীদের বন্ধু। আমি সমগ্র জগতেরই বন্ধু; তাই জগতে ‘বিশ্বামিত্র’ নামে প্রসিদ্ধ। হে যাতুধানী, মনোযোগ দিয়ে শোন, আমাকে যথার্থভাবে জেনে নাও।

Verse 93

यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत्‌ ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्‌ | नैतद्‌ धारयितुं शक्‍्यं गच्छावतर पद्मिनीम्‌

যাতুধানী বলল— মহর্ষে! আপনার নামের এই ব্যুৎপত্তি আমার পক্ষে অক্ষর অক্ষর উচ্চারণ করাও কষ্টকর। এটি স্মরণে রাখা আমার সাধ্য নয়। অতএব যান— পদ্মভরা সরোবরে অবতরণ করুন।

Verse 94

जगदग्निरुवाच जाजमद्यजजाने5हं जिजाहीह जिजायिषि । जमदग्निरिति ख्यातस्ततो मां विद्धि शोभने

জমদগ্নি বললেন— কল্যাণী! আজ আমি দেবতাদের আহবনীয় যজ্ঞাগ্নি থেকে জন্মেছি। অতএব আমাকে ‘জমদগ্নি’ নামে প্রসিদ্ধ বলে জানো।

Verse 95

यातुधान्युवाच यथोदाह्नतमेतत्‌ ते मयि नाम महामुने । नैतद्‌ धारयितुं शक्‍्यं गच्छावतर पद्मिनीम्‌

যাতুধানী বলল— মহামুনে! আপনি যেভাবে আপনার নামের অর্থ ব্যাখ্যা করলেন, তা বোঝা ও ধারণ করা আমার পক্ষে কঠিন। অতএব যান— পদ্মভরা সরোবরে অবতরণ করুন।

Verse 96

अरुन्धत्युवाच धरान्‌ धरित्रीं वसुधां भर्तुस्तिष्ठाम्यनन्तरम्‌ । मनो<नुरुन्धती भर्तुरिति मां विद्धयारुन्धतीम्‌

অরুন্ধতী বললেন— হে যাতুধানী! আমি আমার শক্তিতে পর্বত, পৃথিবী ও বসুধাকে ধারণ করি। আমি স্বামীর থেকে কখনও বিচ্ছিন্ন থাকি না এবং তাঁর মনের অনুগামী হই; তাই আমার নাম ‘অরুন্ধতী’।

Verse 97

यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत्‌ ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्‌ | नैतद्‌ धारयितुं शक्‍्यं गच्छावतर पद्मिनीम्‌

যাতুধানী বলল—দেবী! আপনার নামের যে ব্যাখ্যা আপনি দিলেন, তার অক্ষরগুলি আমার উচ্চারণে দুঃখদায়ক ও কষ্টকর। আমি তা মনে রাখতে পারি না। এসো—পদ্মিনী সরোবরে অবতরণ করো।

Verse 98

गण्डोवाच वक्त्रैकदेशे गण्डेति धातुमेतं प्रचक्षते । तेनोन्नतेन गण्डेति विद्धि मानलसम्भवे

গণ্ড বলল—অগ্নিজাত কৃত্যে! ‘গণ্ড্’ ধাতু মুখের এক অংশ—গাল (কপোল)—কে বোঝায়। আমার কপোল উঁচু, তাই লোকেরা আমাকে ‘গণ্ড’ বলে।

Verse 99

यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत्‌ ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्‌ | नैतद्‌ धारयितुं शक्‍्यं गच्छावतर पद्मिनीम्‌

যাতুধানী বলল—তোমার নামের এই ব্যাখ্যাও আমার কাছে উচ্চারণে কষ্টদায়ক; তাই তা মনে রাখা অসম্ভব। যাও—তুমিও পদ্মিনীতে অবতরণ করো।

Verse 100

पशुसख उवाच पशून्‌ रज्जामि दृष्टवाहं पशूनां च सदा सखा | गौणं पशुसखेत्येवं विद्धि मामग्निसम्भवे

পশুসখ বলল—অগ্নিজ কৃত্যে! আমি পশুদের আনন্দিত রাখি এবং সর্বদা তাদের সখা। এই গুণ থেকেই আমার নাম ‘পশুসখ’।

Verse 101

यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत्‌ ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्‌ | नैतद्‌ धारयितुं शक्‍्यं गच्छावतर पद्मिनीम्‌

যাতুধানী বলল—তুমি তোমার নামের যে ব্যাখ্যা করলে, তার অক্ষরগুলিও আমার কাছে কষ্টদায়ক; তাই আমি তা মনে রাখতে পারি না। এখন তুমিও পুকুরে যাও।

Verse 102

शुनःसख उवाच एभिरुक्तं यथा नाम नाहं वक्तुमिहोत्सहे । शुन:ः:सखसखायं मां यातुधान्युपधारय

শুনঃসখ বললেন—এরা যেমন করে নিজেদের নাম বলেছে, তেমন করে আমি এখানে বলতে সক্ষম নই। আমাকে শুনঃসখের সঙ্গী বলে জেনো; তবে আমাকে যাতুধানীর সঙ্গে যুক্ত বলে মনে রেখে সতর্ক থেকো।

Verse 103

शुन:सख (संन्यासी) ने कहा--यातुधानी! इन ऋषियोंने जिस प्रकार अपना नाम बताया है; उस तरह मैं नहीं बता सकता। तू मेरा नाम शुन:सख समझ ।।

শুনঃসখ (সন্ন্যাসী) বললেন—হে যাতুধানী! এই ঋষিরা যেভাবে নিজেদের নাম বলেছেন, সেভাবে আমি আমার নাম বলতে পারি না। আমার নাম ‘শুনঃসখ’ বলেই জেনো। যাতুধানী বলল—হে ব্রাহ্মণ! তুমি সন্দিগ্ধ বাক্যে নিজের নাম বলেছ; অতএব এখন আবার স্পষ্ট করে বলো—তোমার প্রকৃত নাম কী।

Verse 104

शुन:सख उवाच सकृदुक्त मया नाम न गृहीतं त्वया यदि । तस्मात्‌ त्रिदण्डाभिहता गच्छ भस्मेति मा जिरम्‌

শুনঃসখ বললেন—আমি একবারই আমার নাম বলেছি; তবু যদি তুমি তা গ্রহণ না করো, তবে এই অবহেলার ফলস্বরূপ আমার ত্রিদণ্ডের আঘাতে এখনই ভস্ম হয়ে যাও—বিলম্ব নয়।

Verse 105

सा ब्रह्मदण्डकल्पेन तेन मूर्थ्नि हता तदा । कृत्या पपात मेदिन्यां भस्म सा च जगाम ह

তখন তিনি ব্রহ্মদণ্ডসম শক্তিশালী দণ্ড দিয়ে তার মস্তকে আঘাত করলেন। সেই কৃত্যা ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল এবং ভস্ম হয়ে গেল—এমনই বলা হয়।

Verse 106

यह कहकर उस संन्यासीने ब्रह्मदण्डके समान अपने त्रिदण्डसे उसके मस्तकपर ऐसा हाथ जमाया कि वह यातुधानी पृथ्वीपर गिर पड़ी और तुरंत भस्म हो गयी ।।

এভাবে সেই মহাবলবতী যাতুধানীকে বধ করে শুনঃসখ তাঁর ত্রিদণ্ড ভূমিতে গেঁথে দিলেন এবং সেখানেই ঘাসে ঢাকা মাটিতে বসে পড়লেন।

Verse 107

ततस्ते मुनय: सर्वे पुष्कराणि बिसानि च । यथाकाममुपादाय समुत्तस्थुर्मुदान्विता:,तदनन्तर वे सभी महर्षि इच्छानुसार कमलके फूल और मृणाल लेकर प्रसन्नतापूर्वक सरोवरसे बाहर निकले

তখন সেই সকল মুনি ইচ্ছামতো পদ্মফুল ও মৃণাল সংগ্রহ করে আনন্দভরে সরোবর থেকে উঠে এলেন।

Verse 108

श्रमेण महता कृत्वा ते बिसानि कलापश: । तीरे निक्षिप्य पद्मिन्यास्तर्पणं चक्रुरम्भसा,फिर बहुत परिश्रम करके उन्होंने अलग-अलग बोझे बाँधे। इसके बाद उन्हें किनारेपर ही रखकर वे सरोवरके जलसे तर्पण करने लगे

তারপর বহু পরিশ্রম করে তারা মৃণালগুলো আলাদা আলাদা গুচ্ছে বাঁধল। পদ্মভরা সরোবরের তীরে রেখে, তারা সেই জলে তर्पণ করল।

Verse 109

अथोत्थाय जलात्‌ तस्मातू्‌ सर्वे ते समुपागमन्‌ । नापश्यंश्वापि ते तानि बिसानि पुरुषर्षभा:,थोड़ी देर बाद जब वे पुरुषप्रवर पानीसे बाहर निकले तो उन्हें रखे हुए अपने वे मृणाल नहीं दिखायी पड़े

কিছুক্ষণ পরে সেই শ্রেষ্ঠ পুরুষেরা জল থেকে উঠে একত্র হলেন; কিন্তু তীরে রাখা সেই মৃণালগুলো আর দেখতে পেলেন না।

Verse 110

ऋषय ऊचु: केन क्षुधापरीतानामस्माकं पापकर्मणाम्‌ । नृशंसेनापनीतानि बिसान्याहारकांक्षिणाम्‌

ঋষিরা বললেন—“হায়! আমরা ক্ষুধায় কাতর, এখন আহার কামনা করছি; তবু কোনো নিষ্ঠুর ব্যক্তি আমাদের—পাপভারে জর্জরিতদের—মৃণাল কেড়ে নিল। সে কে?”

Verse 111

ते शंकमानास्त्वन्योन्यं पप्रच्छुद्धिजसत्तमा: । त ऊचु:ः समयं सर्वे कुर्म इत्यरिकर्शन

সন্দেহে পড়ে সেই শ্রেষ্ঠ দ্বিজেরা পরস্পরকে জিজ্ঞাসাবাদ করতে লাগলেন। শেষে সবাই বললেন—“হে শত্রুদমন! এসো, আমরা সকলে মিলে শপথবদ্ধ এক চুক্তি করি।”

Verse 112

त उक्त्वा बाढमित्येवं सर्व एव तदा समम्‌ | क्षुधार्ता: सुपरिश्रान्ता: शपथायोपचक्रमु:

শপথের কথা শুনে সবাই একসঙ্গে বলল—“বেশ।” তারপর ক্ষুধায় কাতর ও পরিশ্রমে সম্পূর্ণ ক্লান্ত সেই ব্রাহ্মণরা একযোগে শপথ গ্রহণের জন্য প্রস্তুত হল।

Verse 113

अत्रिऱवाच सगां स्पृशतु पादेन सूर्य च प्रतिमेहतु । अनध्यायेष्वधीयीत बिसस्तैन्यं करोति यः:

অত্রি বললেন—“যে গাভীকে পা দিয়ে স্পর্শ করে, আর সূর্যের দিকে মুখ করে মূত্রত্যাগ করে; এবং অনধ্যায়ের দিনে অধ্যয়ন করে—সে মৃণাল-চুরির পাপ করে।”

Verse 114

अत्रि बोले--जो मृणालकी चोरी करता हो उसे गायको लात मारने, सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करने और अनध्यायके समय अध्ययन करनेका पाप लगे ।।

বসিষ্ঠ বললেন—“যে নিষিদ্ধ সময়ে বেদপাঠ করে, সে লোকের মধ্যে কুকুরের দ্বারা টেনে-হিঁচড়ে নেওয়ার মতো দোষে পতিত হয়। আর যে পরিব্রাজক হয়েও কাম-ইচ্ছার বশে চলে—সেও মৃণাল-চুরির পাপ করে।”

Verse 115

शरणागतं हन्तु स वै स्वसुतां चोपजीवतु । अर्थान्‌ कांक्षतु कीनाशाद्‌ बिसस्तैन्यं करोति यः

বসিষ্ঠ বললেন—“যে আশ্রয়প্রার্থীকে হত্যা করে, যে নিজের কন্যাকে বিক্রি করে জীবিকা চালায়, যে কৃষকের ধন লোভ করে কেড়ে নেয়, এবং যে মৃণাল চুরি করে—সে মহাপাপে পতিত হয়।”

Verse 116

कश्यप उवाच सर्वत्र सर्व लपतु न्यासलोपं करोतु च । कूटसाक्षित्वमभ्येतु बिसस्तैन्यं करोति यः:

কাশ্যপ বললেন—“যে সর্বত্র সবকিছু গ্রাস করে, যে আমানত (ন্যাস) আত্মসাৎ করে, এবং যে মিথ্যা সাক্ষ্য দেয়—সে মৃণাল-চুরির পাপ করে।”

Verse 117

कश्यपने कहा--जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसको सब जगह सब तरहकी बातें कहने, दूसरोंकी धरोहर हड़प लेने और झूठी गवाही देनेका पाप लगे ।।

কাশ্যপ বললেন—যে বিসা (পদ্মনালের তন্তু) চুরি করে, সে অকারণে মাংসাহারের পাপের কলঙ্ক বহন করে; তার দান নিষ্ফল হয়; এবং দিবাকালে নারীর সঙ্গে সম্ভোগের পাপও তার উপর বর্তায়। অতএব সামান্য বলে মনে হলেও এই চুরি বহু ধর্মদোষ ডেকে আনে।

Verse 118

भरद्वाज उवाच नृशंसस्त्यक्तधर्मस्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च । ब्राह्मणं चापि जयतां बिसस्तैन्यं करोति यः

ভরদ্বাজ বললেন—যে বিসা চুরি করে, তাকে নিষ্ঠুর ও ধর্মত্যাগী বলে গণ্য করা হয়। সে নারীদের প্রতি, নিজের আত্মীয়স্বজনের প্রতি এবং গাভীদের প্রতি পাপাচরণের কলঙ্ক বহন করে; আর বিতর্কে ব্রাহ্মণকে পরাজিত করার পাপও তার উপর বর্তায়।

Verse 119

उपाध्यायमध: कृत्वा ऋचो<ध्येतु अजूंषि च । जुहोतु च स कक्षाग्नौ बिसस्तैन्यं करोति यः:

যে বিসা চুরি করে, তার পাপ হয় যেন সে উপাধ্যায়কে নীচে বসিয়ে ঋগ্বেদ ও যজুর্বেদ অধ্যয়ন করে এবং খড়কুটোর আগুনে আহুতি দেয়।

Verse 120

जगदग्निरुवाच पुरीषमुत्सृजत्वप्सु हन्तु गां चैव द्रह्मतु । अनृतौ मैथुन यातु बिसस्तैन्यं करोति यः:

জমদগ্নি বললেন—যে বিসা চুরি করে, তার উপর জলে মলত্যাগের পাপ বর্তায়; গাভী হত্যা বা গাভীর প্রতি দ्रोহ করার দোষও লাগে; এবং ঋতুকাল ব্যতীত নারীর সঙ্গে সহবাসের পাপও তাকে স্পর্শ করে।

Verse 121

द्वेष्यो भार्योपजीवी स्यादू दूरबन्धुश्न वैरवान्‌ । अन्योन्यस्यातिथिकश्षास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः:

ভরদ্বাজ বললেন—যে বিসা চুরি করে, সে সকলের ঘৃণিত হয়; স্ত্রীর উপার্জনে জীবনধারণ করে; আত্মীয়স্বজন থেকে বিচ্ছিন্ন থাকে; সবার সঙ্গে বৈরিতা বাঁধে; এবং পরাধীন হয়ে একের পর একের ঘরে অতিথির মতো ঘুরে বেড়ায়।

Verse 122

गौतम उवाच अधीत्य वेदांस्त्यजतु त्रीनग्नीनपविध्यतु । विक्रीणातु तथा सोम॑ बिसस्तैन्यं करोति यः

গৌতম বললেন—যে মৃণাল (বিস) চুরি করে, তার পাপ হয় যেন সে বেদ অধ্যয়ন করে তা ত্যাগ করেছে, তিন পবিত্র অগ্নি পরিত্যাগ করেছে এবং সোমরস বিক্রি করেছে।

Verse 123

उदपानप्लवे ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपति: । तस्य सालोक्‍्यतां यातु बिसस्तैन्यं करोति यः

যে গ্রামে এক কূপ থেকে সকলেই জল তোলে, সেখানে যে ব্রাহ্মণ শূদ্রা-স্ত্রীর সঙ্গে সহবাস করে—মৃণাল (বিস) চোর সেই ব্রাহ্মণেরই লোক প্রাপ্ত হোক।

Verse 124

विश्वामित्र उवाच जीवतो वै गुरून्‌ भृत्यान्‌ भरन्त्वस्य परे जना: । अगतिर्षहुपुत्र: स्याद्‌ बिसस्तैन्यं करोति यः

বিশ্বামিত্র বললেন—যে মৃণাল (বিস) চুরি করে, তার উপর সেই পাপই পড়ুক—জীবিত থাকতেই যেন তার গুরুজন ও আশ্রিতদের ভরণপোষণ অন্যেরা করে; সে যেন দুর্দশায় পতিত হয়; এবং বহু পুত্র থাকলেও কর্তব্যভ্রষ্ট হয়।

Verse 125

अशुचिर्त्रद्यकूटो5स्तु ऋद्धया चैवाप्यहंकृत: । कर्षको मत्सरी चास्तु बिसस्तैन्यं करोति य:

বিশ্বামিত্র বললেন—যে মৃণাল (বিস) অপহরণ করে, সে অপবিত্র হোক; বেদ-নিন্দক নাস্তিক হোক; ধন-ঐশ্বর্যে অহংকারী হোক; ব্রাহ্মণ হয়েও চাষ করে জীবিকা করুক; এবং পরশ্রীকাতর হোক।

Verse 126

वर्षाचरो<स्तु भृतको राज्ञश्नास्तु पुरोहित: । अयाज्यस्य भवेदृत्विग्‌ बिसस्तैन्यं करोति यः:

বিশ্বামিত্র বললেন—যে মৃণাল (বিস) চুরি করে, সে বর্ষাকালে পরদেশে ভ্রমণকারী হোক; ব্রাহ্মণ হয়েও বেতনে কাজ করা ভৃত্য হোক; রাজার অন্নভোজী পুরোহিত হোক; এবং যজ্ঞের অযোগ্য ব্যক্তিরও ঋত্বিক হোক।

Verse 127

अरुन्धत्युवाच नित्यं परिभवेच्छवश्रूं भर्तुर्भवतु दुर्मना: । एका स्वादु समाश्षातु बिसस्तैन्यं करोति या

অরুন্ধতী বললেন—যে নারী মৃণাল/বিসা (পদ্মনাল) চুরি করে, তার দোষ হয়—প্রতিদিন শাশুড়িকে অবমাননা করা, স্বামীর মনে দুঃখ দেওয়া, এবং একাই সুস্বাদু ভোজন করা।

Verse 128

ज्ञातीनां गृहमध्यस्था सक्तूनत्तु दिनक्षये । अभोग्या वीरसूरस्तु बिसस्तैन्यं करोति या

বিশ্বামিত্র বললেন—যে নারী মৃণাল/বিসা চুরি করেছে, সে আত্মীয়স্বজনের মধ্যে গৃহে থেকেও অপমানিত থাকে, দিনের শেষে কেবল সত্তু খায়; কলঙ্কিত হয়ে স্বামীর দাম্পত্যসুখের অযোগ্য হয়; এবং ব্রাহ্মণী হয়েও ক্ষত্রিয়স্বভাবের উগ্র, বীর পুত্র প্রসব করে—এটাই তার পাপফল।

Verse 129

गण्डोवाच अनृतं भाषतु सदा बन्धुभिश्च विरुध्यतु । ददातु कन्यां शुल्केन बिसस्तैन्यं करोति या

গণ্ড বললেন—যে নারী মৃণাল/বিসা চুরি করে, সে সর্বদা মিথ্যা বলুক, আত্মীয়দের সঙ্গেও বিরোধে থাকুক, এবং পণ নিয়ে কন্যাদান করুক।

Verse 130

गण्डा बोली--जिस स्त्रीने मृणालकी चोरी की हो उसे सदा झूठ बोलनेका, भाई- बन्धुओंसे लड़ने और विरोध करने और शुल्क लेकर कन्यादान करनेका पाप लगे ।।

গণ্ডা বললেন—যে নারী মৃণাল/বিসা চুরি করেছে, তার পাপ হয়—সর্বদা মিথ্যা বলা, ভাই-বান্ধব ও আত্মীয়দের সঙ্গে কলহ-বিরোধ করা, এবং পণ নিয়ে কন্যাদান করা। সে নিজে রান্না করে একাই খাবে, পরের দাসত্বে জীর্ণ হবে, এবং কুকর্মের ফলে সর্বনাশা মৃত্যু বরণ করবে—এটাই মৃণাল-চুরির ফল।

Verse 131

पशुसख उवाच दास एव प्रजायेतामप्रसूतिरकिंचन: । दैवतेष्वनमस्कारो बिसस्तैन्यं करोति यः

পশুসখ বললেন—যে ব্যক্তি মৃণাল/বিসা চুরি করে, সে পরজন্মে দাসীর ঘরেই জন্মায়, সন্তানহীন ও নিঃস্ব হয়, এবং দেবতাদের প্রণাম না করার পাপও ভোগ করে।

Verse 132

शुन:सख उवाच अध्वर्यवे दुहितरं वा ददातु च्छन्दोगे वा चरितब्रह्यचर्ये आशरथर्वणं वेदमधीत्य विप्र: स्‍्नायीत वा यो हरते बिसानि

শুনঃসখ বলল—যে মৃণাল (পদ্মডাঁটা) চুরি করেছে, সে প্রায়শ্চিত্তস্বরূপ যজুর্বেদের অধ্বর্যু বা ব্রহ্মচর্য সম্পন্ন সামবেদের ছান্দোগ পণ্ডিতকে কন্যাদান করুক; অথবা অথর্ববেদ সম্পূর্ণ অধ্যয়ন করে সেই ব্রাহ্মণ শীঘ্রই স্নাতক-স্নান গ্রহণ করুক।

Verse 133

ऋषय ऊचु: इष्टमेतद्‌ द्विजातीनां योड्यं ते शपथ: कृत: । त्वया कृतं बिसस्तैन्यं सर्वेषां न: शुन:सख

ঋষিরা বললেন—হে শুনঃসখ, তুমি যে শপথ গ্রহণ করেছ, তা দ্বিজদের কাছে অত্যন্ত প্রিয়। অতএব মনে হয় আমাদের মৃণাল-চুরি তোমারই কৃত।

Verse 134

शुन:सख उवाच न्यस्तमद्यं न पश्यदूभिर्यदुक्तं कृतकर्मभि: । सत्यमेतन्न मिथ्यैतद्‌ बिसस्तैन्यं कृतं मया

শুনঃসখ বলল—আপনারা কর্মে নিয়োজিত ছিলেন, তাই দেখতে পাননি; আপনারা যা বলেছেন তা সত্য, মিথ্যা নয়। মৃণাল-চুরি আমি-ই করেছি।

Verse 135

मया हान्तर्हितानीह बिसानीमानि पश्यत । परीक्षार्थ भगवतां कृतमेवं॑ मयानघा:,मैंने उन मृणालोंको यहाँ छिपा दिया था। देखिये, ये रहे आपके मृणाल। निष्पाप मुनियो! मैंने आपलोगोंकी परीक्षाके लिये ही ऐसा किया था

আমি এই মৃণালগুলো এখানে লুকিয়ে রেখেছিলাম; দেখুন, এই নিন। হে নিষ্পাপ মুনিগণ, আপনাদের পরীক্ষা করতেই আমি এমন করেছি।

Verse 136

रक्षणार्थ च सर्वेषां भवतामहमागत: । यातुधानी ह्ूतिक्रूरा कृत्यैषा वो वधैषिणी,मैं आप सब लोगोंकी रक्षाके लिये यहाँ आया था यह यातुधानी अत्यन्त क्रूर स्वभाववाली कृत्या थी और आपलोगोंका वध करना चाहती थी

আমি আপনাদের সকলের রক্ষার্থে এখানে এসেছি। এই যাতুধানী—অতিশয় নিষ্ঠুর স্বভাবের—এই কৃত্যা আপনাদের বিনাশ চাইছিল।

Verse 137

वृषादर्भिप्रयुक्तैषा निहता मे तपोधना: । दुष्टा हिंस्थादियं पापा युष्मान्‌ प्रत्यग्निसम्भवा

শুনঃসখ বলল—বৃষ ও দর্ভ-তৃণ প্রয়োগ করে এই নারী আমার তপোধন, কষ্টার্জিত পুণ্য নষ্ট করেছে। অগ্নিজা এই দুষ্টা, হিংস্রা ও পাপিনী; সে আমাকে আঘাত করেছে, আর তার বিদ্বেষ তোমাদের প্রতিও নিবদ্ধ।

Verse 138

तस्मादस्म्यागतो विप्रा वासवं मां निबोधत । अलोभादक्षया लोकाः: प्राप्ता वै सार्वकामिका:

অতএব, হে ব্রাহ্মণগণ, আমি (তোমাদের কাছে) এসেছি; আমাকে বাসব (ইন্দ্র) বলে জানো। লোভত্যাগের দ্বারাই সেই অক্ষয় লোক লাভ হয়, যা সকল কামনা পূর্ণ করে।

Verse 139

उत्तिष्ठ ध्वमित: क्षिप्रं तानवाप्लुत वै द्विजा:

শুনঃশখ বলল—হে ব্রাহ্মণগণ, এখান থেকে তৎক্ষণাৎ উঠো এবং দ্রুত গিয়ে স্নান করো।

Verse 140

तपोधनो! राजा वृषादर्भिने इसे भेजा था

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! ইন্দ্রের বাক্য শুনে মহর্ষিরা পরম আনন্দিত হলেন। তাঁরা পুরন্দরকে ‘তথাস্তु’ বলে আদেশ গ্রহণ করলেন; এবং ত্রিদশদের অধিপতি দেবেন্দ্রের সঙ্গে সকলেই ত্রিবিষ্টপ—স্বর্গলোকে—প্রস্থান করলেন।

Verse 141

एवमेते महात्मानो भोगैर्बहुविधैरपि । क्षुधा परमया युक्ताश्छन्द्यमाना महात्मभि:

এইভাবে সেই মহাত্মারা প্রবল ক্ষুধায় কাতর হয়েও, এবং মহাজনদের নানাবিধ ভোগের প্রলোভন সত্ত্বেও, তখন লোভে পতিত হলেন না।

Verse 142

नैव लोभ॑ तदा चक्रुस्तत: स्वर्गमवाप्रुवन्‌

ভীষ্ম বললেন—তখনও তারা লোভে পতিত হয়নি; তাই তারা স্বর্গ লাভ করেছিল। অত্যন্ত ক্ষুধার্ত হয়েও, মহাজনদের নানাবিধ ভোগের প্রলোভনে টলেনি সেই মহাত্মারা; কাম-আকাঙ্ক্ষার বশে না গিয়ে তারা স্বর্গপদ অর্জন করল।

Verse 143

तस्मात्‌ सर्वास्ववस्थासु नरो लोभ विवर्जयेत्‌ । एष धर्म: परो राजंस्तस्माल्लोभं॑ विवर्जयेत्‌

অতএব জীবনের সকল অবস্থায় মানুষকে লোভ ত্যাগ করা উচিত। হে রাজন, এটাই পরম ধর্ম; সুতরাং লোভ অবশ্যই পরিত্যাগ করো।

Verse 144

इदं नर: सुचरितं समवायेषु कीर्तयन्‌ । अर्थभागी च भवति न च दुर्गाण्यवाप्तुते

যে ব্যক্তি জনসমাবেশে এই পবিত্র সুচরিতের কীর্তন ও প্রচার করে, সে ঐশ্বর্য ও মনঃকামিত লাভের অংশীদার হয় এবং কখনও দুর্দশা বা বিপদে পতিত হয় না।

Verse 145

प्रीयन्ते पितरक्षास्य ऋषयो देवतास्तथा । यशोधर्मार्थभागी च भवति प्रेत्य मानव:

তার দ্বারা পিতৃগণ, ঋষিগণ এবং দেবতাগণ সকলেই প্রসন্ন হন। সে মানুষ এই লোকেই যশ, ধর্ম ও ঐশ্বর্যের অংশীদার হয়; আর মৃত্যুর পরে তার জন্য স্বর্গ সহজলভ্য হয়।

Verse 231

कश्यपोडत्रिर्वसिष्ठ क्ष भरद्वाजो5थ गौतम: । विश्वामित्रो जमदग्नि: साध्वी चैवाप्यरुन्धती

ভীষ্ম বললেন—কাশ্যপ, অত্রি, বশিষ্ঠ, ভরদ্বাজ ও গৌতম; বিশ্বামিত্র ও জমদগ্নি; এবং সাধ্বী অরুন্ধতীও।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns adjudicating an apparent theft within a sacred context: whether the taking of Agastya’s puṣkara should be treated as criminal appropriation or as an act whose ethical status depends on intention and the pursuit of dharma-knowledge.

Ethical judgment should not rest solely on appearances; intent and context matter, and reconciliation through truthful explanation and restitution can prevent escalation—especially when authoritative speech (oaths/curses) carries real social-ritual consequences.

Yes. The closing verses present benefits for reciting/reflecting on the account—protection from misfortune and illness, auspicious progeny and social standing, and posthumous attainment of higher worlds—positioning the chapter as both instruction and merit-bearing text.