Adhyaya 88
Anushasana ParvaAdhyaya 88177 Verses

Adhyaya 88

Pitṛ-śrāddha-haviḥ-phala-nirdeśa (Offerings for Ancestors and Their Stated Results)

Upa-parva: Śrāddha-vidhi and Pitṛ-tarpaṇa Anuśāsana (Ancestral Rites Instruction Unit)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma which gifts to the pitṛs become imperishable (akṣaya), which oblation suits long duration, and what yields ‘ānantya’ (enduring continuity). Bhīṣma answers by enumerating śrāddha offerings recognized by specialists: sesame, grains (rice/barley), legumes, water, roots and fruits—stating that such śrāddha pleases the pitṛs for a month. He highlights sesame as primary and cites Manu on ‘vardhamāna-tila’ śrāddha being akṣaya. He then provides a comparative schedule of satisfaction durations linked to specific foods (including fish, various meats, dairy preparations like payasa with ghee), culminating in statements about offerings that are said to lead to ānantya at pitṛ-kṣaya. The chapter also includes a remembered gāthā attributed to pitṛ tradition, referencing Sanatkumāra’s earlier instruction, and mentions ritual occasions (e.g., trayodaśī, Maghā) and the ideal of having many sons so that at least one performs lineage-affirming rites at Gayā, associated with an ‘akṣayya’ banyan. The discourse closes by asserting that water, roots, fruits, meat, food, and anything mixed with honey can be directed toward ānantya in the pitṛ-kṣaya context.

Chapter Arc: दानधर्म के प्रसंग में देवगण ब्रह्मा के पास दौड़े आते हैं—तारक नामक असुर देवताओं और ऋषियों को पीड़ित कर रहा है; जगत् की रक्षा का उपाय माँगा जाता है। → ब्रह्मा अपने समदर्शी स्वभाव का उद्घोष करते हैं—वे किसी के प्रति पक्षपात नहीं करते, पर अधर्म का पोषण भी उन्हें रुचिकर नहीं। समाधान खोजते हुए देव-ऋषि-समुदाय अग्नि के गूढ़ आविर्भाव, उसके आश्वत्थ-शमी में गमन, और तेज के रहस्य से जुड़ी घटनाओं की शृंखला में प्रवेश करता है; इसी से सुवर्ण-उत्पत्ति और दान-विधि का आधार बनता है। → अग्नि-तेज से गर्भ/आश्रय का स्पर्शमात्र ‘काञ्चनीभूत’ कर देता है—भूमि, पर्वत, द्रव्य सब स्वर्ण-प्रभा से भर उठते हैं; उसी तेज से एक दिव्य बालक त्रैलोक्य को प्रकाशित करता हुआ पर्वतों-नदियों-झरनों की ओर दौड़ पड़ता है, मानो सृष्टि के भीतर दान-धर्म का प्रत्यक्ष रूप चल पड़ा हो। → देवगण ब्रह्मा से वर/अनुग्रह पाकर संतुष्ट होते हैं; ब्रह्मा ‘तथेत्येव’ कहकर प्रसन्नतापूर्वक उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं। आगे दानधर्म का व्यावहारिक निष्कर्ष दिया जाता है—सूर्योदय-काल में विधि-मन्त्रपूर्वक सुवर्ण-दान दुःस्वप्न आदि अशुभ का प्रतिहरण करता है और पुण्य-समृद्धि का हेतु बनता है। → वरुण-ईश्वरत्व और अग्नि-प्रकाश के व्यापक दावे के साथ यह संकेत छोड़ा जाता है कि यह तेज और जल-तत्त्व मिलकर जगत्-व्यवस्था को कैसे बाँधते हैं—अगले प्रसंग में उसी तत्त्व-समन्वय का विस्तार अपेक्षित है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्ति नामक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८४ ॥। अपना छा | अफड--क+ पञ्चाशीतितमोब<् ध्याय: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन

দেবতারা বললেন—“প্রভু! তারক নামে এক অসুর আছে, যাকে আপনি বর দিয়েছেন। সে দেবতা ও ঋষিদের ভীষণ কষ্ট দিচ্ছে; অতএব তার বধের বিধান করুন।”

Verse 2

देवता बोले--प्रभो! आपने जिसे वर दे रखा है, वह तारक नामक असुर देवताओं और ऋषियोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये ।।

দেবতারা বললেন—“প্রভু! যাকে আপনি বর দিয়েছেন, সেই তারক নামের দৈত্য দেবতা ও ঋষিদের ভীষণ কষ্ট দিচ্ছে। অতএব তার বধের কোনো উপায় করুন। পিতামহ! এর ফলে আমাদের মধ্যে মহাভয় উৎপন্ন হয়েছে। দেব! আমাদের রক্ষা করুন; কারণ আমাদের আর কোনো আশ্রয় নেই।”

Verse 3

ब्रह्मोवाच समोऊहं सर्वभूतानामधर्म नेह रोचये | हन्यतां तारक: क्षिप्रं सुरर्षिगणबाधिता

ব্রহ্মা বললেন—“আমি সকল প্রাণীর প্রতি সমদৃষ্টি রাখি; তবু অধর্ম আমার প্রিয় নয়। অতএব দেবতা ও ঋষিগণকে পীড়িতকারী তারককে শীঘ্রই বধ করো।”

Verse 4

वेदा धर्माश्च नोच्छेदं गच्छेयु: सुरसत्तमा: । विहितं पूर्वमेवात्र मया वै व्येतु वो ज्वर:

“হে দেবশ্রেষ্ঠগণ! বেদ ও ধর্মের বিনাশ যেন না হয়—তার ব্যবস্থা আমি পূর্বেই করে রেখেছি। অতএব তোমাদের জ্বরতুল্য উৎকণ্ঠা দূর হোক।”

Verse 5

देवा ऊचु वरदानाद्‌ भगवतो दैतेयो बलगर्वित: । देवैर्न शक्‍्यते हन्तुं स कथं प्रशमं व्रजेत्‌

দেবতারা বললেন—“ভগবান! আপনার বরদানে সেই দৈত্য শক্তির গর্বে উন্মত্ত হয়েছে। দেবতারা তাকে বধ করতে পারে না; এমন অবস্থায় সে কীভাবে শান্ত বা সংযত হবে?”

Verse 6

स हि नैव सम देवानां नासुराणां न रक्षसाम्‌ । वध्य: स्यामिति जग्राह वरं त्वत्त: पितामह,पितामह! उसने आपसे यह वरदान प्राप्त कर लिया है कि देवताओं, असुरों तथा राक्षसोंमेंसे किसीके हाथसे भी मारा न जाऊँ

ভীষ্ম বললেন— “পিতামহ! সে আপনার কাছ থেকে এই বর লাভ করেছে— ‘দেবতা, অসুর কিংবা রাক্ষস— কারও হাতে যেন আমি নিহত না হই।’”

Verse 7

देवाश्व शप्ता रुद्राण्या प्रजोच्छेदे पुराकृते । न भविष्यति वो<पत्यमिति सर्वे जगत्पते

ভীষ্ম বললেন— “জগত্পতে! প্রাচীনকালে আমরা যখন রুদ্রাণীর সন্তানসন্ততির বিনাশ ঘটিয়েছিলাম, তখন রুদ্রাণী সকল দেবতাকে শাপ দিয়ে বলেছিলেন— ‘তোমাদের কোনো সন্তান হবে না।’”

Verse 8

ब्रह्मोवाच हुताशनो न तत्रासीच्छापकाले सुरोत्तमा: । स उत्पादयितापत्यं वधाय त्रिदशद्विषाम्‌

ব্রহ্মা বললেন— “হে দেবশ্রেষ্ঠগণ! সেই শাপের সময় সেখানে হুতাশন অগ্নিদেব উপস্থিত ছিলেন না। অতএব দেবদ্বেষীদের বিনাশের জন্য তিনিই এক সন্তান উৎপন্ন করবেন।”

Verse 9

तद्‌ वै सर्वानतिक्रम्य देवदानवराक्षसान्‌ | मानुषानथ गन्धर्वान्‌ नागानथ च पक्षिण:

ভীষ্ম বললেন— “সে দেব, দানব, রাক্ষস, মানুষ, গন্ধর্ব, নাগ এবং পক্ষী— সকলকে অতিক্রম করে— তার অমোঘ অস্ত্রশক্তিতে সেই অসুরকে বধ করবে, যাকে কেন্দ্র করে তোমাদের ভয় জন্মেছে; আর অন্যান্য দেবশত্রুকেও বিনাশ করবে।”

Verse 10

अस्त्रेणामोघपातेन शकक्‍्या तं घातयिष्यति । यतो वो भयमुत्पन्नं ये चान्ये सुरशत्रव:

ভীষ্ম বললেন— “তার অমোঘ অস্ত্রপ্রহারে সে সেই শত্রুকে বধ করতে সক্ষম হবে, যাকে কেন্দ্র করে তোমাদের ভয় জন্মেছে; আর অন্যান্য দেবশত্রুকেও সংহার করবে।”

Verse 11

सनातनो हि संकल्प: काम इत्यभिधीयते । रुद्रस्य तेज: प्रस्कन्नमग्नी निपतितं च यत्‌

চিরন্তন সংকল্পকেই ‘কাম’ বলা হয়। সেই কাম থেকেই রুদ্রের যে তেজ স্খলিত হয়ে অগ্নিতে পতিত হয়েছিল, অগ্নি তা গ্রহণ করে ধারণ করেছে। পরে দেবগণ সেই দ্বিতীয় অগ্নিসদৃশ মহাতেজ গঙ্গায় প্রতিষ্ঠা করে শিশুরূপে জন্ম দেবেন; সেই শিশুই দেবশত্রুদের বিনাশের কারণ হবে।

Verse 12

तत्तेजोडग्निर्महद्‌भूतं द्वितीयमिति पावकम्‌ | वधार्थ देवशत्रूणां गंगायां जनयिष्यति

সেই মহৎ, ভূততত্ত্বময় তেজকে পাৱক অগ্নি ‘দ্বিতীয় অগ্নি’ রূপে ধারণ করে দেবশত্রুদের বিনাশের জন্য গঙ্গায় জন্ম দেবে। তা থেকে এক শিশু জন্মাবে, আর সেই শিশুই দেবতাদের জয়ের কারণ হবে।

Verse 13

स तु नावाप त॑ शापं नष्ट: स हुतभुक्‌ तदा । तस्माद्‌ वो भयह्ृद्‌ देवा: समुत्पत्स्यति पावकि:

কিন্তু প্রকৃতপক্ষে তার ওপর সেই শাপ কার্যকর হয়নি; শাপটি নষ্ট হয়ে গেল, আর তখনই সে ‘হুতভুক্’—অগ্নি—হয়ে উঠল। অতএব, হে দেবগণ, ভয়হর পাৱক অগ্নি তোমাদের মধ্যে পুনরায় উদ্ভূত হবে।

Verse 14

अग्निदेव उस समय छिपे हुए थे, इसलिये वह शाप उन्हें नहीं प्राप्त हुआ; अतः देवताओ! अग्निके जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह तुमलोगोंका सारा भय हर लेगा ।।

সেই সময় অগ্নিদেব গোপনে ছিলেন, তাই সেই শাপ তাঁর কাছে পৌঁছায়নি। অতএব, হে দেবগণ, অগ্নির যে পুত্র জন্মাবে সে তোমাদের সমস্ত ভয় দূর করবে। জ্বালন (অগ্নি)-কে খুঁজে বের করো এবং আজই এই কাজে নিয়োজিত করো। হে নিষ্পাপ দেবগণ, তারকাসুর বধের উপায় আমি বলে দিলাম।

Verse 15

न हि तेजस्विनां शापास्तेज:सु प्रभवन्ति वै । बलान्यतिबल प्राप्य दुर्बलानि भवन्ति वै

তেজস্বীদের শাপ তেজস্বীদের ওপর সত্যিই কার্যকর হয় না। তেমনি সাধারণ শক্তি—যতই বহু হোক—অতিবলবানের সম্মুখে পড়লে দুর্বল হয়ে যায়।

Verse 16

हन्यादवध्यान्‌ वरदानपि चैव तपस्विन: । संकल्पाभिरुचि: काम: सनातनतमो5भवत्‌

ভীষ্ম বললেন: বরপ্রাপ্ত ও বরদানক্ষম, ‘অবধ্য’ বলে গণ্য তপস্বীরাও কাম দ্বারা পরাভূত হয়ে বিনষ্ট হতে পারেন। সেই কামই ‘সঙ্কল্প’ ও ‘অভিরুচি’ নামেও প্রসিদ্ধ; তা অতিপ্রাচীন ও চিরস্থায়ী। অন্তরের গভীর শক্তি হয়ে তা সিদ্ধজনকেও আচ্ছন্ন করতে পারে—অতএব ধর্মসাধনায় তাকে জেনে সংযত করা কর্তব্য।

Verse 17

जगत्पतिरनिर्देश्य: सर्वग: सर्वभावन: । हृच्छय: सर्वभूतानां ज्येष्ठो रुद्रादपि प्रभु:

ভীষ্ম বললেন: জগতের অধিপতি নির্দিষ্টভাবে বর্ণনাতীত; তিনি সর্বব্যাপী এবং সকল ভাব-অবস্থার উৎপাদক। তিনি সকল প্রাণীর হৃদয়ে অধিষ্ঠিত; তিনি আদ্য ও পরম প্রভু—রুদ্রের চেয়েও জ্যেষ্ঠ ও অধিক অধিকারী।

Verse 18

अग्निदेव इस जगत्‌के पालक, अनिर्वचनीय, सर्वव्यापी, सबके उत्पादक, समस्त प्राणियोंके हृदयमें शयन करनेवाले, सर्वसमर्थ तथा रुद्रसे भी ज्येष्ठ हैं ।।

ভীষ্ম বললেন: অগ্নিদেব এই জগতের পালনকর্তা—অবর্ণনীয়, সর্বব্যাপী, সকলের উৎপাদক, সকল প্রাণীর হৃদয়ে শয়নকারী, সর্বসমর্থ এবং রুদ্রের চেয়েও জ্যেষ্ঠ। সেই তেজোরাশি হুতাশনকে শীঘ্র অন্বেষণ কর; সেই দেব তোমাদের মনে নিহিত কামনা পূর্ণ করবেন।

Verse 19

तेजकी राशिभूत अग्निदेवका तुम सब लोग शीघ्र अन्वेषण करो। वे तुम्हारी मनोवांछित कामनाको पूर्ण करेंगे ।।

ভীষ্ম বললেন: তোমরা সকলে তেজের রাশি-স্বরূপ অগ্নিদেবকে শীঘ্র অন্বেষণ কর; তিনি তোমাদের মনোবাঞ্ছিত কামনা পূর্ণ করবেন। মহাত্মার এই বাক্য শুনে দেবতারা—সঙ্কল্পে দৃঢ় ও সাফল্যে নিশ্চিত—সেখান থেকে বিভাবসু (অগ্নি)-কে খুঁজতে রওনা হলেন।

Verse 20

ततस्त्रैलेक्यमृषयो व्यचिन्वन्त सुरै: सह । कांक्षन्तो दर्शन बल्लेः सर्वे तद्तमानसा:

তখন দেবতাদের সঙ্গে ঋষিরা ত্রিলোক জুড়ে অগ্নির অনুসন্ধান শুরু করলেন। সকলের মন সেই উদ্দেশ্যেই নিবদ্ধ ছিল, কারণ সবাই অগ্নিদেবের দর্শন কামনা করছিলেন।

Verse 21

भुगुश्रेष्ठट उत्तम तपस्यासे युक्त, तेजस्वी और लोकविख्यात सभी सिद्ध देवता सभी लोकोंमें अग्निदेवकी खोज करते रहे

ভীষ্ম বললেন—হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ! তুমি শ্রেষ্ঠ তপস্যায় যুক্ত, তেজস্বী ও লোকবিখ্যাত। তখন সর্ব সিদ্ধ ও দেবগণ সকল লোক জুড়ে অগ্নিদেব হব্যবাহনকে খুঁজতে খুঁজতে বিচরণ করতে লাগলেন।

Verse 22

नष्टमात्मनि संलीनं नाधिजम्मुर्ठुताशनम्‌ । ततः संजातसंत्रासानग्निदर्शनलालसान्‌

ভীষ্ম বললেন—অগ্নি অন্তর্ধান করে নিজের মধ্যেই লীন হয়ে গিয়েছিলেন; তাই দেবগণ তাঁর কাছে পৌঁছতে পারলেন না। তখন দেবগণ ভীতও হলেন, আবার অগ্নিদর্শনের আকাঙ্ক্ষায় ব্যাকুলও। সেই সময় এক জলচর ব্যাঙ, অগ্নির তেজে দগ্ধ ও মনে ক্লান্ত হয়ে রসাতল থেকে উঠে এসে দেবতাদের উদ্দেশে বলল।

Verse 23

जलेचर: क्लान्तमनास्तेजसाग्ने: प्रदीपित: । उवाच देवान्‌ मण्डूको रसातलतलोत्थित:

জলচর সেই ব্যাঙ, অগ্নির তেজে দগ্ধ ও মনে ক্লান্ত, রসাতলের তলদেশ থেকে উঠে এসে দেবতাদের উদ্দেশে বলল।

Verse 24

रसातलतले देवा वसत्यग्निरिति प्रभो । संतापादिह सम्प्राप्त: पावकप्रभवादहम्‌

হে প্রভু! বলা হয় রসাতলের তলে দেবগণ আছেন এবং সেখানেই অগ্নি বাস করেন। কিন্তু অগ্নিদেবের প্রভা থেকে উৎপন্ন এই দাহক সন্তাপে দগ্ধ হয়ে আমি এখানে এসে পড়েছি।

Verse 25

“'देवताओ! अग्नि रसातलमें निवास करते हैं। प्रभो! मैं अग्निजनित संतापसे ही घबराकर यहाँ आया हूँ ।।

দেবগণ! অগ্নি রসাতলে বাস করেন। হে দেবতারা! ভগবান হব্যবাহন নিজের তেজের সঙ্গে জলকে যুক্ত করে জলের মধ্যেই নিদ্রিত হয়েছেন; আর সেই তেজেই আমরা দগ্ধ হয়ে কষ্ট পাচ্ছি।

Verse 26

तस्य दर्शनमिष्टं वो यदि देवा विभावसो: । तत्रैवमधिगच्छध्वं कार्य वो यदि वल्लिना,“देवताओ! यदि आपको अग्निदेवका दर्शन अभीष्ट हो और यदि उनसे आपका कोई कार्य हो तो वहीं जाकर उनसे मिलिये

ভীষ্ম বললেন—“হে দেবগণ! যদি বিভাবসু (অগ্নিদেব)-কে দর্শন করতে ইচ্ছা হয়, আর দণ্ডধারীর সঙ্গে যদি তোমাদের কোনো কাজ থাকে, তবে সেখানেই গিয়ে তাঁর সঙ্গে সাক্ষাৎ করো।”

Verse 27

गम्यतां साधयिष्यामो वयं हाग्निभयात्‌ सुरा: । एतावदुक्त्वा मण्डूकस्त्वरितो जलमाविशत्‌,“देवगण! आप जाइये। हम भी अग्निके भयसे अन्यत्र जायँगे।! इतना ही कहकर वह मेढक तुरंत ही जलमें घुस गया

ভীষ্ম বললেন—“যাও; হে দেবগণ! আমরাও অগ্নিভয়ে নিজেদের ব্যবস্থা করব—অন্যত্র সরে যাব।” এতটুকু বলে ব্যাঙটি তৎক্ষণাৎ জলে ডুব দিল।

Verse 28

हुताशनस्तु बुबुधे मण्डूकस्य च पैशुनम्‌ शशाप स तमासाद्य न रसान्‌ वेत्स्यसीति वै

ভীষ্ম বললেন—অগ্নিদেব বুঝলেন ব্যাঙটির কুটিল নিন্দা-চুগলি। তার কাছে গিয়ে তিনি শাপ দিলেন—“তুমি আর রসের স্বাদ জানতে পারবে না।”

Verse 29

त॑ वै संयुज्य शापेन मण्डूकं॑ त्वरितो ययौ । अन्यत्र वासाय विभुर्न चात्मानमदर्शयत्‌,मेढकको शाप देकर वे तुरंत दूसरी जगह निवास करनेके लिये चले गये। सर्वव्यापी अग्निने अपने-आपको प्रकट नहीं किया

ভীষ্ম বললেন—শাপে তাকে আবদ্ধ করে অগ্নিদেব তৎক্ষণাৎ অন্যত্র বাস করতে চলে গেলেন; সর্বব্যাপী সেই প্রভু আর নিজেকে প্রকাশ করলেন না।

Verse 30

देवास्त्वनुग्रहं चक्रुर्मण्ड्रकानां भृगूत्तम । यत्तच्छूणु महाबाहो गदतो मम सर्वश:,भुगुश्रेष्॒ महाबाहो! उस समय देवताओंने मेढकोंपर जो कृपा की, वह सब बता रहा हूँ, सुनो

ভীষ্ম বললেন—“হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ, মহাবাহো! সেই সময় দেবগণ ব্যাঙদের প্রতি যে অনুগ্রহ করেছিলেন, তার সম্পূর্ণ বিবরণ আমার মুখে শোনো।”

Verse 31

देवा ऊचु अग्निशापादजिद्नापि रसज्ञानबहिष्कृता: | सरस्वती बहुविधां यूयमुच्चारयिष्यथ

দেবতারা বললেন—অগ্নির শাপে তোমরা জিহ্বাহীন হবে; অতএব রসের জ্ঞান থেকে বঞ্চিত থাকবে। তবু সরস্বতীর কৃপায় তোমরা নানা প্রকার বাক্য উচ্চারণ করতে পারবে।

Verse 32

बिलवासं गतांश्रैव निराहारानचेतस: । गतासूनपि संशुष्कान्‌ भूमि: संधारयिष्यति

ভীষ্ম বললেন—যারা গর্ত ও গুহায় গিয়ে বাস করে, আহারহীন ও চেতনাহীন—হ্যাঁ, প্রাণহীন হয়ে শুকিয়ে যাওয়া দেহকেও এই পৃথিবী ধারণ করে রাখে।

Verse 33

इत्युक्त्वा तांस्ततो देवा: पुनरेव महीमिमाम्‌

এ কথা বলে দেবতারা আবার এই পৃথিবীর দিকেই ফিরলেন।

Verse 34

अथ तान्‌ द्विरद: वक्षित्‌ सुरेन्द्रद्धिदोपम:

তখন সেই দ্বিরদ—ইন্দ্রের ন্যায় দীপ্তিমান—তাদের উদ্দেশে কথা বলল।

Verse 35

शशाप ज्वलन: सर्वान्‌ द्विरदान्‌ क्रोधमूर्च्छित:

ভীষ্ম বললেন—ক্রোধে আচ্ছন্ন হয়ে জ্বলন (অগ্নিদেব) সকল হাতিকেই শাপ দিলেন।

Verse 36

इत्युक्त्वा नि:सृतो5श्वत्थादग्निर्वारणसूचित: । प्रविवेश शमीगर्भमथ वह्नि: सुषुप्सया

এ কথা বলে হাতির ইঙ্গিতে চিহ্নিত অগ্নিদেব অশ্বত্থ বৃক্ষ থেকে বেরিয়ে শমী বৃক্ষের গর্ভে (ফোকরে) প্রবেশ করলেন; সেখানে তিনি গভীর নিদ্রায় বিশ্রাম করতে ইচ্ছুক ছিলেন।

Verse 37

अनुग्रहं तु नागानां यं चक्रुः शृणु तं प्रभो । देवा भृगुकुलश्रेष्ठ प्रीत्या सत्यपराक्रमा:,प्रभो! भृगुकुलश्रेष्ठ तब सत्यपराक्रमी देवताओंने प्रसन्न हो नागोंपर जिस प्रकार अपना अनुग्रह प्रकट किया, उसे सुनो

প্রভো! ভৃগুকুলশ্রেষ্ঠ! সত্যপরাক্রমী দেবগণ প্রসন্ন হয়ে নাগদের প্রতি যে অনুগ্রহ প্রকাশ করেছিলেন, তা শোনো।

Verse 38

देवा ऊचु प्रतीपया जिह्दयापि सर्वाहारं करिष्यथ | वाचं चोच्चारयिष्यध्वमुच्चैरव्यज्जिताक्षराम्‌

দেবগণ বললেন—হে হস্তিগণ! তোমরা উল্টো জিহ্বা দিয়েও সকল প্রকার আহার গ্রহণ করতে পারবে এবং উচ্চস্বরে বাক্য উচ্চারণও করবে; কিন্তু তাতে কোনো অক্ষর স্পষ্টভাবে প্রকাশ পাবে না।

Verse 39

इत्युक्त्वा पुनरेवाग्निमनुससुर्दिवौकस: । अश्वत्थान्नि:सृतश्चाग्नि: शमीगर्भमुपाविशत्‌,ऐसा कहकर देवताओंने पुनः अग्निका अनुसरण किया। उधर अग्निदेव अभश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर जा बैठे

এ কথা বলে দেবগণ পুনরায় অগ্নির অনুসরণ করলেন। এদিকে অগ্নিদেব অশ্বত্থ থেকে বেরিয়ে শমী বৃক্ষের গর্ভে (ফোকরে) প্রবেশ করলেন।

Verse 40

शुकेन ख्यापितो विप्र तं देवा: समुपाद्रवन्‌ । शशाप शुकममग्निस्तु वाग्विहीनो भविष्यसि

হে ব্রাহ্মণ! শুক যখন সেই বিষয়টি প্রকাশ করল, তখন দেবগণ ব্যাকুল হয়ে তার দিকে ধেয়ে এলেন। তখন অগ্নি শুককে শাপ দিলেন—“তুমি বাক্‌শক্তিহীন হবে।”

Verse 41

विप्रवर! तदनन्तर तोतेने अग्निका पता बता दिया। फिर तो देवता शमीवृक्षकी ओर दौड़े। यह देख अग्निने तोतेको शाप दे दिया--'तू वाणीसे रहित हो जायगा” ।।

ভীষ্ম বললেন—তারপর হুতভুক অগ্নি সেই টিয়ার জিহ্বাও উল্টে দিলেন, যাতে সে আর কথা বলতে না পারে। প্রজ্বলিত অগ্নি দেখে দেবতারা করুণায় উদ্বুদ্ধ হয়ে টিয়াটিকে সম্বোধন করলেন।

Verse 42

भविता न त्वमत्यन्तं शुकत्वे नष्टवागिति । आवृत्तजिद्दस्य सतो वाक्‍्यं कान्‍्तं भविष्यति

ভীষ্ম বললেন—তুমি চিরকাল টিয়ার অবস্থায়, বাকশক্তি হারিয়ে থাকবে না। যে নিজেকে সংযত করে সত্যার্থে সদাচারী হয়, তার বাক্য মধুর ও শ্রবণযোগ্য হয়।

Verse 43

इत्युक्त्वा तं शमीगर्भे वह्लिमालक्ष्य देवता:

ভীষ্ম বললেন—এ কথা বলে দেবতারা শমী বৃক্ষের গর্ভে অগ্নিকে দর্শন করলেন। তখন সকল কর্মের জন্য শমীকেই অগ্নির পবিত্র ও বিধিসিদ্ধ আবাস স্থির করলেন। সেই সময় থেকে অগ্নি শমীর অন্তরে প্রকাশিত হতে লাগলেন।

Verse 44

तदेवायतन चक्कु: पुण्यं सर्वक्रियास्वपि । ततः प्रभृति चाप्यग्नि: शमीगर्भेषु दृश्यते

ভীষ্ম বললেন—সেই (শমী) সকল ক্রিয়ায় পবিত্র আশ্রয় ও চিহ্ন হয়ে উঠল। তখন থেকে অগ্নি শমীর গর্ভে দৃশ্যমান হতে লাগলেন।

Verse 45

उत्पादने तथोपायमभिजम्मुश्न मानवा: । आपो रसालले यास्तु संस्पृष्टाश्चित्रभानुना

ভীষ্ম বললেন—হে ভার্গব! মানুষ অগ্নি উৎপন্ন করার উপায় হিসেবে শমী-কাঠ ঘর্ষণ (মন্থন)কে জেনেছে। আর রসাতলে চিত্রভানু (অগ্নি)-এর স্পর্শে যে জল উত্তপ্ত হয়েছিল, তা সেই তাপ নিঃসৃত করে পর্বতের উষ্ণ প্রস্রবণরূপে প্রকাশ পায়।

Verse 46

ता: पर्वतप्रस्नरवणैरूष्मां मुज्चन्ति भार्गव । पावकेनाधिशयता संतप्तास्तस्य तेजसा

ভীষ্ম বললেন— হে ভার্গব! অগ্নির শ্রেষ্ঠ শক্তি ও তার দীপ্তিতে দগ্ধ সেই জল পর্বতের ঝরনারূপে নিজের উষ্ণতা নিঃসৃত করে।

Verse 47

अथानिनिर्देवता दृष्टवा बभूव व्यथितस्तदा । किमागमनमित्येवं तानपृच्छत पावक:,उस समय देवताओंको देखकर अग्निदेव व्यथित हो गये और उनसे पूछने लगे --'किस उद्देश्यसे यहाँ आपलोगोंका शुभागमन हुआ है?”

তখন সেখানে দেবতাদের সমবেত দেখে অগ্নিদেব বিচলিত হলেন এবং তাঁদের জিজ্ঞাসা করলেন— “কোন উদ্দেশ্যে আপনারা এখানে আগমন করেছেন?”

Verse 48

तमूचुर्विबुधा: सर्वे ते चैव परमर्षय: । त्वां नियोक्ष्यामहे कार्ये तद्‌ भवान्‌ कर्तुमरहति

তখন সকল দেবতা ও পরম ঋষিগণ তাঁকে বললেন— “আমরা তোমাকে এক কার্যে নিযুক্ত করব; তা তোমার করাই উচিত।”

Verse 49

कृते च तस्मिन्‌ भविता तवापि सुमहान्‌ गुण:

“আর সেই কাজ সম্পন্ন হলে তোমারও অতি মহান পুণ্যলাভ হবে।”

Verse 50

अग्निरुवाच ब्रूत यद्‌ भवतां कार्य कर्तास्मि तदहं सुरा: । भवतां तु नियोज्यो5स्मि मा वो<त्रास्तु विचारणा

অগ্নি বললেন— “হে দেবগণ! আপনাদের যে কাজ, তা বলুন; আমি তা অবশ্যই সম্পন্ন করব। আমি আপনাদের নির্দেশে নিয়োজিত— এ বিষয়ে আপনাদের কোনো সংশয় থাকুক না।”

Verse 51

देवा ऊचु असुरस्तारको नाम ब्रह्मणो वरदर्पित: । अस्मान्‌ प्रबाधते वीर्याद्‌ वधस्तस्य विधीयताम्‌

দেবগণ বললেন—হে অগ্নিদেব! তারক নামে এক অসুর ব্রহ্মার বরদানে গর্বোন্মত্ত হয়ে নিজের পরাক্রমে আমাদের সকলকে পীড়িত করছে। অতএব তার বধের উপায় স্থির করা হোক।

Verse 52

इमान्‌ देवगणांस्तात प्रजापतिगणांस्तथा । ऋषींश्वापि महाभाग परित्रायस्व पावक,तात! महाभाग पावक! इन देवताओं, प्रजापतियों तथा ऋषियोंकी भी रक्षा करो

হে তাত! হে মহাভাগ পাবক! এই দেবগণ, প্রজাপতিদের সমূহ এবং ঋষিদেরও রক্ষা করো।

Verse 53

अपत्यं तेजसा युक्त प्रवीरं जनय प्रभो । यद्‌ भयं नोअसुरात्‌ तस्मान्नाशयेद्धव्यवाहन,प्रभो! हव्यवाहन! तुम एक ऐसा तेजस्वी और महावीर पुत्र उत्पन्न करो जो उस असुरसे प्राप्त होनेवाले हमारे भयका नाश करे

হে প্রভু! হে হব্যবাহন! তুমি এমন এক তেজস্বী ও মহাবীর পুত্র উৎপন্ন করো, যে সেই অসুর থেকে উদ্ভূত আমাদের ভয় বিনাশ করবে।

Verse 54

शप्तानां नो महादेव्या नान्यदस्ति परायणम्‌ | अन्यत्र भवतो वीर्य तस्मात्‌ त्रायस्व नः प्रभो

হে প্রভু! মহাদেবী আমাদের সন্তানহীনতার শাপে আবদ্ধ করেছেন; অতএব তোমার বল-পরাক্রম ছাড়া আমাদের আর কোনো আশ্রয় নেই। তাই আমাদের রক্ষা করো।

Verse 55

इत्युक्त: स तथेत्युक्त्वा भगवान्‌ हव्यवाहन: । जगामाथ दुराधर्षो गड़ां भागीरथीं प्रति,देवताओंके ऐसा कहनेपर “तथास्तु” कहकर दुर्धर्ष भगवान्‌ हव्यवाहन भागीरथी गंगाके तटपर गये

দেবগণের এমন বাক্য শুনে দুর্ধর্ষ ভগবান হব্যবাহন ‘তথাস্তु’ বলে ভাগীরথী গঙ্গার দিকে যাত্রা করলেন।

Verse 56

तया चाप्यभवन्मिश्रो गर्भ चास्यादधे तदा । ववृधे स तदा गर्भ: कक्षे कृष्णगतिर्यथा

তিনি সেখানে গঙ্গাদেবীর সঙ্গে মিলিত হলেন; তখনই গঙ্গাদেবী সেই দেব-তেজকে গর্ভরূপে ধারণ করলেন। তারপর গঙ্গার অন্তরে সেই গর্ভ এমনভাবে বৃদ্ধি পেতে লাগল, যেমন শুকনো তৃণ বা কাঠের স্তূপে লুকোনো অগ্নি হঠাৎ দাউদাউ করে জ্বলে ওঠে।

Verse 57

तेजसा तस्य देवस्य गंगा विह्ललचेतना । संतापमगमत्‌ तीव्रं सोढुं सा न शशाक ह,अग्निदेवके दिये हुए उस तेजसे गंगाजीका चित्त व्याकुल हो गया। वे अत्यन्त संतप्त हो उठीं और उसे सहन करनेमें असमर्थ हो गयीं

সেই দেবতার (অগ্নির) প্রদত্ত তেজে গঙ্গাদেবীর চিত্ত ব্যাকুল হয়ে উঠল। তিনি তীব্র দাহযন্ত্রণায় আচ্ছন্ন হলেন এবং তা সহ্য করতে পারলেন না।

Verse 58

आठिते ज्वलनेनाथ गर्भ तेजा: समन्विते । गंगायामसुर: कश्चिद्‌ भैरवं नादमानदत्‌

অগ্নির দ্বারা স্থাপিত সেই তেজস্বী গর্ভ যখন গঙ্গার জলে বৃদ্ধি পাচ্ছিল, তখনই এক অসুর সেখানে এসে হঠাৎ ভয়ংকর গর্জন করল।

Verse 59

अबुद्धिपतितेनाथ नादेन विपुलेन सा । वित्रस्तोदभ्रान्तनयना गंगा विख्बुतलोचना,उस आकस्मिक महान्‌ सिंहनादसे भयभीत हुई गंगाजीकी आँखें घूमने लगीं और उनके नेत्रोंस आँसू बहने लगा

সেই আকস্মিক, প্রবল গর্জনে গঙ্গাদেবী ভয়ে কেঁপে উঠলেন। আতঙ্কে তাঁর চোখ ঘুরে গেল, দৃষ্টি অস্থির হলো, আর নয়ন থেকে অশ্রু ঝরে পড়ল।

Verse 60

विसंज्ञा नाशकद्‌ गर्भ वोढुमात्मानमेव च । सा तु तेज:परीतांगी कम्पयन्तीव जाह्नवी

তিনি অচেতন হয়ে পড়লেন; ফলে না সেই গর্ভকে ধারণ করতে পারলেন, না নিজেকেই স্থির রাখতে পারলেন। তাঁর অঙ্গপ্রত্যঙ্গ তেজে আচ্ছন্ন হয়ে গেল। হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ! তখন জাহ্নবী দেবী সেই গর্ভশক্তিতে অভিভূত হয়ে, যেন অগ্নিতে কাঁপছেন, বললেন—“ভগবান! আপনার এই তেজ আমি ধারণ করতে অক্ষম।”

Verse 61

उवाच ज्वलनं विप्र तदा गर्भबलोद्धता । ते न शक्तास्मि भगवंस्तेजसो5स्य विधारणे

বিপ্রবর! তখন গর্ভের শক্তিতে অভিভূত হয়ে জাহ্নবী দেবী কাঁপতে কাঁপতে অগ্নিদেবকে বললেন—“ভগবন্! আপনার এই তেজ আমি ধারণ করতে অক্ষম।”

Verse 62

विमूढास्मि कृतानेन न मे स्वास्थ्यं यथा पुरा । विह्वला चास्मि भगवंश्लेतो नष्टे च मेडनघ

নিষ্পাপ অগ্নিদেব! এতে আমি যেন মূর্ছিত হয়ে পড়েছি। আমার স্বাস্থ্য আর আগের মতো নেই। ভগবন্! আমি অত্যন্ত ব্যাকুল; আমার চেতনা যেন লুপ্ত হয়ে যাচ্ছে।

Verse 63

धारणे नास्य शक्ताहं गर्भस्य तपतां वर । उत्स्रक्ष्येडहमिमं दुःखान्न तु कामात्‌ कथंचन

তপস্বীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ পাৱক! এখন আমার আর এই গর্ভ ধারণ করার শক্তি নেই। অসহ্য দুঃখে বাধ্য হয়েই আমি একে ত্যাগ করছি; কোনোভাবেই স্বেচ্ছায় নয়।

Verse 64

न तेजसो<स्ति संस्पर्शो मम देव विभावसो । आपदर्थ हि सम्बन्ध: सुसूक्ष्मोडपि महाद्युते

দেব বিভাবসু! মহাদ্যুতে! এই তেজের সঙ্গে আমার কোনো প্রকৃত স্পর্শ নেই। এখন যে অতি সূক্ষ্ম সম্পর্ক স্থাপিত হয়েছে, তাও দেবতাদের ওপর নেমে আসা বিপদ নিবারণের উদ্দেশ্যেই।

Verse 65

यदत्र गुणसम्पन्नमितरद्‌ वा हुताशन । त्वय्येव तदहं मन्ये धर्माधर्मा च केवलौ

হুতাশন! এই কর্মের ফল যদি গুণযুক্ত হয় বা অন্যথা, আর যদি এতে কেবল ধর্ম হয় বা কেবল অধর্ম—এসবের দায়িত্ব আমি আপনার ওপরই অর্পণ করি।

Verse 66

तामुवाच ततो वल्लिर्धार्यतां धार्यतामिति । गर्भो मत्तेजसा युक्तो महागुणफलोदय:

তখন বল্লী তাঁকে বললেন—“ধারণ করো, ধারণ করো। এই গর্ভ আমার তেজে যুক্ত; এর থেকে মহৎ গুণসমৃদ্ধ ফলের উদয় হবে।”

Verse 67

शक्ता हासि महीं कृत्स्नां वोढुं धारयितुं तथा । न हि ते किंचिदप्राप्पमन्यतो धारणादृते,“देवि! तुम सारी पृथ्वीको धारण करनेमें समर्थ हो, फिर इस गर्भको धारण करना तुम्हारे लिये कुछ असाध्य नहीं है”

“দেবী! তুমি সমগ্র পৃথিবীকে বহন ও ধারণ করতে সক্ষম; অতএব এই গর্ভ ধারণ করা তোমার পক্ষে অসাধ্য নয়—ধারণ ব্যতীত যা অসম্ভব, তা ছাড়া তোমার কাছে কিছুই অপ্রাপ্য নয়।”

Verse 68

सा वल्विना वार्यमाणा देवैरपि सरिद्वरा । समुत्ससर्ज तं॑ गर्भ मेरौ गिरिवरे तदा,देवताओं तथा अग्निके मना करनेपर भी सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाने उस गर्भको गिरिराज मेरुके शिखरपर छोड़ दिया

দেবতারা ও বল্বি বাধা দিলেও নদীদের শ্রেষ্ঠা গঙ্গা সেই গর্ভ ত্যাগ করলেন এবং তখন পর্বতরাজ মেরুতে তা স্থাপন করলেন।

Verse 69

समर्था धारणे चापि रुद्रतेज:प्रधर्षिता । नाशकत्‌ _त॑ तदा गर्भ संधारयितुमोजसा,यद्यपि गंगाजी उस गर्भको धारण करनेमें समर्थ थीं; तो भी रुद्रके तेजसे पराभूत होकर बलपूर्वक उसे धारण न कर सकीं

যদিও গঙ্গা ধারণ করতে সক্ষম ছিলেন, তবু রুদ্রের তেজে পরাভূত হয়ে সে সময় নিজের শক্তিতেও সেই গর্ভ ধারণ করতে পারলেন না।

Verse 70

सा समुत्सृज्य तं दुःखाद्‌ दीप्तवैश्वानरप्रभम्‌ । दर्शयामास चाग्निस्तं तदा गंगां भूगूद्धह

দুঃখে অভিভূত হয়ে গঙ্গা অগ্নির ন্যায় দীপ্ত সেই গর্ভ ত্যাগ করলেন। তারপর, হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ, অগ্নি গঙ্গার সামনে আবির্ভূত হয়ে জিজ্ঞাসা করলেন—“দেবী! তোমার গর্ভ কি সুখে-নিরাপদে প্রসব হয়েছে? সেই শিশুর কান্তি কেমন, তার রূপ কেমন দেখা যায়, এবং সে কীরূপ তেজে যুক্ত? সবই আমাকে বলো।”

Verse 71

पप्रच्छ सरितां श्रेष्ठां कच्चिद्‌ गर्भ: सुखोदय: । कीदृग्वर्णोडपि वा देवि कीद्ग्रूपश्च दृश्यते । तेजसा केन वा युक्त: सर्वमेतद्‌ ब्रवीहि मे

ভীষ্ম বললেন—অগ্নি নদীগণের শ্রেষ্ঠা গঙ্গাকে দর্শন করে জিজ্ঞাসা করলেন—“দেবি! তোমার গর্ভ কি সুখে ও কুশলে প্রসব হয়েছে? তার বর্ণ কেমন, রূপই বা কেমন দেখা যায়? সে কী ধরনের তেজে বিভূষিত? এ সবই আমাকে বলো।”

Verse 72

गंगोवाच जातरूप: स गर्भो वै तेजसा त्वमिवानघ । सुवर्णो विमलो दीप्त: पर्वतं चावभासयत्‌

গঙ্গা বললেন—“দেব! সেই গর্ভ সত্যই স্বর্ণময়। হে অনঘ, তেজে সে ঠিক তোমারই সদৃশ। স্বর্ণের মতো নির্মল দীপ্তিতে জ্বলে উঠে সে পর্বতকেও আলোকিত করে।”

Verse 73

पद्मोत्पलविमिश्राणां हृदानामिव शीतल: । गन्धो5स्य स कदम्बानां तुल्यो वै तपतां वर

ভীষ্ম বললেন—“তপস্বীদের শ্রেষ্ঠ! পদ্ম ও নীলপদ্মে শোভিত হ্রদের মতো তার দেহ শীতল; আর তার থেকে কদম্ব-পুষ্পের তুল্য মধুর সুগন্ধ ছড়িয়ে পড়ে।”

Verse 74

तेजसा तस्य गर्भस्य भास्करस्येव रश्मिशि: । यद्‌ द्रव्यं परसंसृष्टं पृथिव्यां पर्वतेषु च

ভীষ্ম বললেন—“সেই গর্ভের তেজে—সূর্যরশ্মির ন্যায়—পৃথিবীতে ও পর্বতসমূহে যে যে দ্রব্য মিশে ছড়িয়ে ছিল, তা টেনে এনে একত্রিত হয়ে গেল।”

Verse 75

पर्यधावत शैलांश्व नदी: प्र्नवणानि च

ভীষ্ম বললেন—“সে পর্বতসমূহে, নদীনদীর ধার ধরে, আর ঢালু অবতরণপথে ছুটে বেড়াতে লাগল।”

Verse 76

एवंरूप: स भगवान्‌ पुत्रस्ते हव्यवाहन । सूर्यवैश्वानरसम: कान्त्या सोम इवापर:,हव्यवाहन! आपका एऐश्वर्यशाली पुत्र ऐसे ही रूपवाला है। वह सूर्य तथा आपके समान तेजस्वी और दूसरे चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ है

হে হব্যবাহন! তোমার সেই ঐশ্বর্যশালী পুত্র সত্যই এমনই রূপবান। তেজে সে সূর্য ও বৈশ্বানরের সমান, আর কোমল কান্তিতে যেন আর-এক চন্দ্র।

Verse 77

एवमुक्‍्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत । पावकश्चापि तेजस्वी कृत्वा कार्य दिवौकसाम्‌

এ কথা বলে সেই দেবী সেখানেই অন্তর্ধান করলেন। আর তেজস্বী পাবকও দেবলোকবাসীদের কাজ সম্পন্ন করে সেখান থেকে প্রস্থান করলেন।

Verse 78

जगामेष्टं ततो देशं तदा भार्गवनन्दन । भार्गवनन्दन! ऐसा कहकर देवी गंगा वहीं अन्तर्धान हो गयीं और तेजस्वी अग्निदेव देवताओंका कार्य सिद्ध करके उस समय वहाँसे अभीष्ट देशको चले गये ।।

তখন, হে ভার্গবনন্দন, তিনি অভীষ্ট দেশে গমন করলেন। এ কথা বলে দেবী গঙ্গা সেখানেই অন্তর্ধান করলেন, আর তেজস্বী অগ্নিদেব দেবতাদের কার্য সিদ্ধ করে সেই সময় সেখান থেকে নিজের মনোনীত গন্তব্যে রওনা হলেন। এইসব কর্ম ও গুণের দ্বারাই জগতে অগ্নির নাম গীত হয়।

Verse 79

हिरण्यरेता इति वै ऋषिभिर्विबुधैस्तथा । पृथिवी च तदा देवी ख्याता वसुमतीति वै

ঋষি ও জ্ঞানীরা তাঁকে ‘হিরণ্যরেতা’ বলে অভিহিত করলেন। আর সেই সময় পৃথিবীদেবীও ‘বসুমতী’ নামে খ্যাত হলেন।

Verse 80

इन्हीं समस्त कर्मों और गुणोंके कारण देवता तथा ऋषि संसारमें अग्निको हिरण्यरेताके नामसे पुकारते हैं। उस समय अग्निजनित हिरण्य (वसु) धारण करनेके कारण पृथ्वीदेवी वसुमती नामसे विख्यात हुईं ।।

এই সকল কর্ম ও গুণের কারণেই দেবতা ও ঋষিরা জগতে অগ্নিকে ‘হিরণ্যরেতা’ নামে ডাকেন। সেই সময় অগ্নিজাত স্বর্ণতত্ত্ব (বসু) ধারণ করায় পৃথিবীদেবী ‘বসুমতী’ নামে খ্যাত হলেন। আর অগ্নির অংশ থেকে উৎপন্ন গঙ্গার সেই মহাতেজস্বী গর্ভ দিব্য শরবণ—সরকণ্ডের অরণ্যে পৌঁছে বৃদ্ধি পেতে লাগল এবং বিস্ময়কর দর্শনীয় হয়ে উঠল।

Verse 81

ददृशुः कृत्तिकास्तं तु बालार्कसदृशद्युतिम्‌ । पुत्रं वै ताश्न तं बाल॑ पुपुषु: स्तन्‍्यविस््रवै:

কৃত্তিকারা সেই শিশুটিকে দেখলেন, যার দীপ্তি উদীয়মান সূর্যের মতো। তাকে নিজের পুত্র জেনে স্তন্যধারায় দুধ ঢেলে তারা তাকে লালন-পালন করলেন।

Verse 82

ततः स कार्तिकेयत्वमवाप परमद्युति: । स्कन्नत्वात्‌ स्कन्दतां चापि गुहावासाद्‌ गुहो&भवत्‌

তারপর সেই পরম দীপ্তিমান যুবক ‘কার্ত্তিকেয়’ নামে প্রসিদ্ধ হল। স্কন্ন (স্খলিত) বীর্য থেকে উৎপন্ন হওয়ায় সে ‘স্কন্দ’ নাম পেল, আর পর্বতগুহায় বাস করায় সে ‘গুহ’ নামে পরিচিত হল।

Verse 83

एवं सुवर्णमुत्पन्नममपत्यं जातवेदस: । तत्र जाम्बूनदं श्रेष्ठ देवानामपि भूषणम्‌

এইভাবে জাতবেদস অগ্নির সন্তানরূপে স্বর্ণের উৎপত্তি হল। স্বর্ণের মধ্যে ‘জাম্বূনদ’ নামে যে স্বর্ণ, তা শ্রেষ্ঠ এবং দেবতাদেরও ভূষণ।

Verse 84

ततः प्रभृति चाप्येतज्जातरूपमुदाहतम्‌ | रत्नानामुत्तमं रत्नं भूषणानां तथैव च,तभीसे सुवर्णका नाम जातरूप हुआ। वह रत्नोंमें उत्तम रत्न और आशभृषणोंमें श्रेष्ठ आभूषण है

তখন থেকে এই পদার্থ ‘জাতরূপ’ নামে অভিহিত হল। এটি রত্নসমূহের মধ্যে শ্রেষ্ঠ রত্ন এবং ভূষণসমূহের মধ্যেও সর্বোত্তম ভূষণ।

Verse 85

पवित्र च पवित्राणां मड्गलानां च मंगलम्‌ । यत्‌ सुवर्ण स भगवानग्निरीश: प्रजापति:

স্বর্ণ পবিত্রদের মধ্যেও পরম পবিত্র এবং মঙ্গলসমূহের মধ্যেও পরম মঙ্গল। কারণ যা স্বর্ণ, তাই ভগবান অগ্নি—তাই ঈশ, তাই প্রজাপতি।

Verse 86

पवित्राणां पवित्र हि कनकं द्विजसत्तमा: । अग्नीषोमात्मकं चैव जातरूपमुदाह्ृतम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! পবিত্রকারক বস্তুসমূহের মধ্যে স্বর্ণই পরম পবিত্র। একে ‘জাতরূপ’ বলা হয়—যার স্বভাবেই অগ্নি ও সোমের তত্ত্ব নিহিত।

Verse 87

द्विजवरो! सुवर्ण सम्पूर्ण पवित्र वस्तुओंमें अतिशय पवित्र है; उसे अग्नि और सोमरूप बताया गया है ।।

বসিষ্ঠ বললেন—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! সম্পূর্ণ শুদ্ধ স্বর্ণ পবিত্র বস্তুসমূহের মধ্যে অতিশয় পবিত্র; তাকে অগ্নি ও সোম-স্বভাব বলা হয়। আর হে রাম (পরশুরাম)! আমি পূর্বে ‘ব্রহ্মদর্শন’ নামে যে প্রাচীন বৃত্তান্ত শুনেছিলাম—পরমাত্মা পিতামহ ব্রহ্মার—তা তোমাকে বলছি; শোনো।

Verse 88

देवस्य महतस्तात वारुणीं बिभ्रतस्तनुम्‌ । ऐश्व॒र्यें वारुणे राम रुद्रस्येशस्य वै प्रभो

বসিষ্ঠ বললেন—হে বৎস, হে রাম! এক সময় মহান দেব রুদ্র, সর্বেশ্বর প্রভু, বরুণের দেহ ধারণ করে বরুণের ঐশ্বর্যপূর্ণ অধিপত্যে প্রতিষ্ঠিত ছিলেন।

Verse 89

आज ममुर्मुनय: सर्वे देवाश्चाग्निपुरोगमा: । यज्ञांगानि च सर्वाणि वषट्कारश्न मूर्तिमान्‌

বসিষ্ঠ বললেন—আজ সকল মুনি আমার কাছে এসেছেন, আর অগ্নিকে অগ্রে রেখে দেবতারাও উপস্থিত। যজ্ঞের সমস্ত অঙ্গও এসেছে, এবং ‘বষট্’ ধ্বনিও যেন মূর্তিমান হয়ে প্রকাশিত হয়েছে।

Verse 90

मूर्तिमन्ति च सामानि यजूंषि च सहस्रश: । ऋग्वेदश्वागमत्‌ तत्र पदक्रमविभूषित:

বসিষ্ঠ বললেন—সেখানে সামগানসমূহ মূর্তিমান হয়ে উপস্থিত হল, আর সহস্র সহস্র যজুর্মন্ত্রও। পদ ও ক্রম-পাঠের অলংকারে বিভূষিত ঋগ্বেদও সেই স্থানে এসে পৌঁছাল।

Verse 91

लक्षणानि स्वरा: स्तोभा निरुक्तं सुरपद्धक्तय: । ओड्कारकश्नावसन्नेत्रे निग्रहप्रग्रहौ तथा

বসিষ্ঠ বললেন—সেখানে বেদের ধারক সকল অঙ্গ-উপাঙ্গ উপস্থিত ছিল—লক্ষণ, উদাত্তাদি স্বর, স্তোত্র ও তার স্তোভ, নিরুক্ত-বিদ্যা, দেবস্তুতির পংক্তি, ওঁকার, এবং যজ্ঞের নেত্রস্বরূপ নিগ্রহ ও প্রগ্রহ। সেই স্থানে বৈদিক বিধান সম্পূর্ণরূপে প্রতিষ্ঠিত ছিল।

Verse 92

वेदाक्ष॒ सोपनिषदो विद्या सावित्र्यथापि च । भूतं भव्यं भविष्यं च दधार भगवान्‌ शिव:

বসিষ্ঠ বললেন—উপনিষদসহ বেদ, বিদ্যা এবং সাবিত্রী দেবীও সেখানে উপস্থিত ছিলেন। আর ভগবান শিব নিজের অন্তরে ত্রিকাল—ভূত, বর্তমান ও ভবিষ্যৎ—ধারণ করেছিলেন।

Verse 93

संजुहावात्मना55त्मानं स्वयमेव तदा प्रभो | यज्ञं च शोभयामास बहुरूपं पिनाकधृत्‌,प्रभो! पिनाकधारी महादेवजीने अनेक रूपवाले उस यज्ञकी शोभा बढ़ायी और उन्होंने स्वयं ही अपने द्वारा अपने आपको आहुति प्रदान की

বসিষ্ঠ বললেন—প্রভু! সেই সময় পিনাকধারী মহাদেব বহু রূপ ধারণ করে সেই যজ্ঞের শোভা বৃদ্ধি করলেন; এবং তিনি নিজেই, নিজের দ্বারাই, নিজেকে আহুতি রূপে অর্পণ করলেন।

Verse 94

द्यौर्नभ: पृथिवी खं च तथा चैवैष भूपति: । सर्वविद्येश्वर: श्रीमानेष चापि विभावसु:,ये भगवान्‌ शिव ही स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी समस्त शून्य प्रदेश, राजा, सम्पूर्ण विद्याओंके अधीश्वर तथा तेजस्वी अग्निरूप हैं

বসিষ্ঠ বললেন—তিনিই স্বর্গ, তিনিই আকাশ, তিনিই পৃথিবী এবং শূন্য বিস্তার; তিনিই এই রাজাও। তিনিই সকল বিদ্যার অধীশ্বর, শ্রীসম্পন্ন; এবং তিনিই বিভাবসু—দীপ্ত অগ্নিস্বরূপ। এইভাবে ভগবান শিব সর্বত্র, সর্বরূপে প্রতিষ্ঠিত।

Verse 95

एष ब्रह्मा शिवो रुद्रो वरुणो5ग्नि: प्रजापति: । कीर्त्यते भगवान्‌ देव: सर्वभूतपति: शिव:

বসিষ্ঠ বললেন—এই ভগবান সর্বভূতপতি শিবকে ব্রহ্মা, শিব, রুদ্র, বরুণ, অগ্নি ও প্রজাপতি—এই নানাদেবনামে কীর্তন করা হয়। নানা রূপে উচ্চারিত হলেও তিনি এক ও অদ্বিতীয় কল্যাণময় প্রভু—সকল প্রাণীর রক্ষক ও অধিপতি।

Verse 96

तस्य यज्ञ: पशुपतेस्तप: क्रतव एव च | दीक्षा दीप्तव्रता देवी दिशश्व॒ सदिगी श्व॒रा:

বসিষ্ঠ বললেন—ভগবান পশুপতির সেই যজ্ঞে তপস্যা ও ক্রতু স্বয়ং উপস্থিত ছিল। দীপ্তব্রতধারিণী দীক্ষা দেবীও এলেন, আর দিক্‌পালসহ দিশাগণও সমবেত হলেন। এইভাবে পশুপতির দিব্য যজ্ঞ প্রবাহিত হতে লাগল; ধর্মধারণকারী শক্তিসমূহ একত্র হয়ে তাতে অংশ নিল।

Verse 97

देवपत्न्यश्न कन्याश्ष्‌ देवानां चैव मातर: । आजम्मुः सहितास्तत्र तदा भगुकुलोद्वह

দেবপত্নীগণ, দেবকন্যাগণ এবং দেবতাদের মাতৃগণ—সকলেই সেই সময় সেখানে একসঙ্গে উপস্থিত হলেন, হে ভৃগুকুলশ্রেষ্ঠ।

Verse 98

यज्ञ पशुपते: प्रीता वरुणस्य महात्मन: । स्वयम्भुवस्तु ता दृष्टवा रेत: समपतद्‌ भुवि

পশুপতির যজ্ঞে সেই দেবাঙ্গনাগণ অত্যন্ত প্রীত হয়েছিলেন। তাঁদের দেখে স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মার বীর্য অনিচ্ছায় ভূমিতে পতিত হল।

Verse 99

तस्य शुक्रस्य विस्पन्दान्‌ पांसून्‌ संगृहा भूमित: । त्रास्यत्‌ पूषा कराभ्यां वै तस्मिन्नेव हुताशने,तब ब्रह्माजीके वीर्यसे संसिक्त धूलिकणोंको दोनों हाथोंद्वारा भूमिसे उठाकर पूषाने उसी आगमें फेंक दिया

সেই শুক্রবীজ থেকে উৎপন্ন কাঁপতে থাকা ধূলিকণাগুলি পূষা উভয় হাতে ভূমি থেকে তুলে তৎক্ষণাৎ সেই অগ্নিতেই নিক্ষেপ করলেন।

Verse 100

ततस्तस्मिन्‌ सम्प्रवृत्ते सत्रे ज्वलितपावके । ब्रह्मणो जुद्वतस्तत्र प्रादुर्भावो बभूव ह,तदनन्तर प्रज्वलित अग्निवाले उस यज्ञके चालू होनेपर वहाँ ब्रह्माजीका वीर्य पुनः स्खलित हुआ

তারপর, যখন সেই সত্রযজ্ঞ শুরু হয়ে গিয়েছিল এবং অগ্নি প্রজ্বলিত ছিল, তখন সেখানে ব্রহ্মার সঙ্গে সম্পর্কিত এক প্রাদুর্ভাব ঘটল—তাঁর বীর্য পুনরায় স্খলিত হল।

Verse 101

स्कन्नमात्रं च तच्छुक्रे ख्रुवेण परिगृह्म सः । आज्यवन्मन्त्रतश्नापि सोडजुहोद्‌ भूगुनन्दन

যেইমাত্র বীর্য স্খলিত হল, তিনি খ্রুব (যজ্ঞ-চামচ) দিয়ে তৎক্ষণাৎ তা সংগ্রহ করলেন। তারপর, হে ভৃগুনন্দন, নিজে মন্ত্রোচ্চারণ করে ঘৃতের ন্যায় অগ্নিতে আহুতি দিলেন।

Verse 102

ततः स जनयामास भूतग्रामं च वीर्यवान्‌ । तस्य तत्‌ तेजसस्तस्माज्जज्ञे लोकेषु तैजसम्‌

তারপর সেই পরাক্রান্ত সত্তা জীবসমূহের সমষ্টিকে উৎপন্ন করলেন। তাঁরই তেজ থেকে লোকসমূহে ‘তৈজস’ সৃষ্টি প্রকাশ পেল—যা কর্মশীলতা ও গতিতে পরিপূর্ণ।

Verse 103

तमसस्तामसा भावा व्यापि सत्त्वं तथोभयम्‌ । स गुणस्तेजसो नित्यस्तस्य चाकाशमेव च

তমস থেকে তামস ভাবসমূহ প্রকাশ পায়; আর সত্ত্ব উভয় (রজ ও তম)-এর মধ্যেই ব্যাপ্ত থাকে। সেই সত্ত্ব তেজের নিত্য গুণ; এবং আকাশও তারই স্বরূপ।

Verse 104

सर्वभूतेषु च तथा सत्त्वं तेजस्तथोत्तमम्‌ | शुक्रे हुते5ग्नौ तस्मिंस्तु प्रादुरासंस्त्रय: प्रभो

তেমনি সকল প্রাণীতে সত্ত্ব ও উত্তম তেজ বিদ্যমান। হে প্রভু, যখন সেই অগ্নিতে বীর্যের আহুতি দেওয়া হল, তখন সেখানে তিন সত্তা প্রকাশ পেল।

Verse 105

पुरुषा वपुषा युक्ता: स्वैः स्वै: प्रसवजैर्गुणै: । अतः सम्पूर्ण भूतोंमें जो सत्त्वमुण तथा उत्तम तेज है, वह प्रजापतिके उस शुक्रसे ही प्रकट हुआ है। प्रभो! ब्रह्माजीके वीर्यकी जब अग्निमें आहुति दी गयी तब उससे तीन शरीरधारी पुरुष उत्पन्न हुए, जो अपने-अपने कारणजनित गुणोंसे सम्पन्न थे || १०४ $ ।।

সেই তিন পুরুষই দেহধারী ছিলেন এবং প্রত্যেকে নিজ নিজ জন্মকারণজাত গুণে সমন্বিত ছিলেন।

Verse 106

अंगारसंश्रयाच्चैव कविरित्यपरो5भवत्‌ । सह ज्वालाभिरुत्पन्नो भृगुस्तस्माद्‌ भगु: स्मृत:

অঙ্গারের আশ্রয়ে আর-এক সত্তা ‘কবি’ নামে পরিচিত হল। জ্বালার সঙ্গেই জন্ম নেওয়ায় ভৃগু ‘ভগু/ভৃগু’ নামে স্মৃত।

Verse 107

मरीचिभ्यो मरीचिस्तु मारीच: कश्यपो हाभूत्‌ | अंगारेभ्यो5ज़ितिस्तात वालखिल्या: कुशोच्चयात्‌

অগ্নির মরীচি থেকে মরীচি ঋষি জন্মালেন, আর মরীচির বংশধর কশ্যপ ‘মারীচ’ নামে খ্যাত হলেন। প্রিয় বৎস, অঙ্গার থেকে অঙ্গিরা এবং কুশঘাসের স্তূপ থেকে বালখিল্য ঋষিগণ প্রকাশিত হলেন।

Verse 108

अन्रैवात्रेति च विभो जातमत्रिं वदन्त्यपि | तथा भस्मव्यपोहेभ्यो ब्रह्मर्षिगणसम्मता:

হে মহাবলবান, সেই কুশগুচ্ছ থেকেই আর-এক ব্রহ্মর্ষি জন্মালেন, যাঁকে লোকেরা ‘অত্রি’ বলেও ডাকে। তদ্রূপ, ছাঁকা ভস্মরাশি থেকে ব্রহ্মর্ষিগণের সম্মত বৈখানসগণ প্রকাশিত হলেন।

Verse 109

वैखानसा: समुत्पन्नास्तप: श्रुतगुणेप्सव: । अश्रुतो<स्य समुत्पन्नावश्चिनौ रूपसम्मतौ

বৈখানসগণ উদ্ভূত হলেন—তাঁরা তপস্যায় নিবিষ্ট, শাস্ত্রশ্রবণে আগ্রহী এবং সদ্গুণের অন্বেষী। অগ্নির অশ্রু থেকে দুই অশ্বিনীকুমার জন্মালেন, যাঁরা রূপ-ঐশ্বর্যে সর্বত্র সম্মানিত।

Verse 110

शेषा: प्रजानां पतय: स्रोतोभ्यस्तस्य जज्ञिरे । ऋषयो रोमकूपेभ्य: स्वेदाच्छन्दो बलान्मन:

অবশিষ্ট প্রজাপতিগণ তাঁর স্রোতসমূহ (ইন্দ্রিয়-প্রবাহ) থেকে জন্মালেন। রোমকূপ থেকে ঋষিগণ, ঘাম থেকে বৈদিক ছন্দ, আর তাঁর বল/বীর্য থেকে মন উৎপন্ন হল।

Verse 111

एतस्मात्‌ कारणादाहुरग्नि: सर्वास्तु देवता: । ऋषय: श्रुतसम्पन्ना वेदप्रामाण्यदर्शनात्‌,इस कारणसे शास्त्रज्ञानसम्पन्न महर्षियोंने वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए अग्निको सर्वदेवमय बताया है

এই কারণেই শ্রুতি-সমৃদ্ধ ঋষিগণ বেদের প্রামাণ্যকে চূড়ান্ত মান্য করে বলেন—অগ্নিই সর্বদেবময়। যজ্ঞাগ্নিতেই দেবতার আরাধনা ও ধর্মের প্রতিষ্ঠা বিধিপূর্বক সম্পন্ন হয়।

Verse 112

यानि दारुणि निर्यासास्ते मासा: पक्षसंज्ञिता: अहोरात्रा मुहूर्ताश्न पित्त ज्योतिश्न दारुणम्‌

বসিষ্ঠ বললেন—যজ্ঞে ব্যবহৃত সমিধা থেকে যে কঠোর নির্যাস বেরিয়েছিল, তাই মাস, পক্ষ, দিন-রাত্রি ও মুহূর্তরূপে পরিণত হল; আর অগ্নির পিত্ত ভয়ংকর দীপ্ত তেজ হয়ে প্রকাশ পেল।

Verse 113

रौद्रे लोहितमित्याहुलोहितात्‌ कनकं स्मृतम्‌ । तन्मैत्रमिति विज्ञेयं धूमाच्च वसव: स्मृता:

বসিষ্ঠ বললেন—রুদ্র-রূপে তাকে ‘লোহিত’ বলা হয়; সেই লোহিত থেকে ‘কনক’ (স্বর্ণ) উৎপন্ন হয় বলে স্মৃত। সেই স্বর্ণকে ‘মৈত্র’—মিত্রতত্ত্ব-সম্বন্ধীয়—বুঝতে হবে; আর ধোঁয়া থেকে বসুগণের উৎপত্তি বলা হয়েছে।

Verse 114

अग्निके तेजको लोहित कहते हैं, उस लोहितसे कनक उत्पन्न हुआ। उस कनकको मैत्र जानना चाहिये तथा अग्निके धूमसे वसुओंकी उत्पत्ति बतायी गयी है ।।

বসিষ্ঠ বললেন—অগ্নির তেজকে ‘লোহিত’ বলা হয়; সেই লোহিত থেকে ‘কনক’ (স্বর্ণ) উৎপন্ন হয় বলে মানা হয়। সেই স্বর্ণকে ‘মৈত্র’—মিত্রতত্ত্বের—বুঝতে হবে; আর অগ্নির ধোঁয়া থেকে বসুগণের উৎপত্তি বলা হয়েছে। অগ্নির শিখাগুলিই একাদশ রুদ্র এবং সেই শিখাগুলিই অতিশয় দীপ্ত দ্বাদশ আদিত্য; আর যজ্ঞাগ্নির যে যে অঙ্গার নির্দেশিত, সেগুলিই আকাশে নক্ষত্রমণ্ডলরূপে জ্যোতিপুঞ্জ হয়ে অবস্থান করে।

Verse 115

आदिकर्ता च लोकस्य तत्परं ब्रह्म तद्‌ ध्रुवम्‌ । सर्वकामदमित्याहुस्तद्रहस्यमुवाच ह

বসিষ্ঠ বললেন—তিনিই জগতের আদিকর্তা; তিনিই পরম ব্রহ্ম, অচঞ্চল ধ্রুব সত্য। জ্ঞানীগণ তাঁকে সর্বকামদ—সমস্ত অভীষ্ট ফলদাতা—বলে থাকেন। সেই গূঢ় তত্ত্বই আমি বললাম।

Verse 116

इस लोकके जो आदि स्रष्टा हैं, उन ब्रह्माजीका कथन है कि अग्नि परब्रह्मस्वरूप है। वही अविनाशी परब्रह्म परमात्मा है और वही सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। यह गोपनीय रहस्य ज्ञानी पुरुष बताते हैं ।।

বসিষ্ঠ বললেন—এই জগতের আদিস্রষ্টা ব্রহ্মা ঘোষণা করেছেন যে অগ্নি পরব্রহ্মস্বরূপ। সেই অবিনাশী পরব্রহ্মই পরমাত্মা, এবং তিনিই সকল কাম্য ফল দানকারী। জ্ঞানীরা একে গোপন, রক্ষিত সত্য বলে বর্ণনা করেন। তখন মহাদেব—বরুণরূপে ও পবনাত্ম শক্তিরূপে—ঘোষণা করলেন: “এ আমার দিব্য সত্রযজ্ঞ; এখানে আমিই গৃহপতি-যজমান।”

Verse 117

त्रीणि पूर्वाण्यपत्यानि मम तानि न संशय: । इति जानीत खगमा मम यज्ञफलं हि तत्‌

বসিষ্ঠ বললেন—পূর্বে জন্ম নেওয়া সেই তিন সন্তানই আমার; এতে কোনো সন্দেহ নেই। হে আকাশচারী দেবগণ, জেনে রাখো—এই যজ্ঞের ফল সত্যই আমারই।

Verse 118

अग्निरुवाच मदड्गलेभ्य: प्रसूतानि मदाश्रयकृतानि च । ममैव तान्यपत्यानि वरुणो हवशात्मक:

অগ্নি বললেন—এরা আমারই অঙ্গ থেকে উৎপন্ন, এবং বিধাতা এদের সৃষ্টি করেছেন আমারই আশ্রয়ে স্থিত রেখে। অতএব এ তিনজন আমারই সন্তান; হবি-স্বরূপ বরুণের এদের ওপর কোনো অধিকার নেই।

Verse 119

अथाब्रवील्लोकगुरुब्रह्मा लोकपितामह: । ममैव तान्यपत्यानि मम शुक्र हुतं हि तत्‌

তখন লোকগুরু, লোকপিতামহ ব্রহ্মা বললেন—ওই সন্তানরা আমারই; কারণ সেই শুক্র আমার মধ্যেই আহুতি রূপে অর্পিত হয়েছিল।

Verse 120

तदनन्तर लोकपितामह लोकगुरु ब्रह्माजीने कहा--“ये सब मेरी ही संतानें हैं; क्योंकि मेरे ही वीर्यकी आहुति दी गयी है; जिससे इनकी उत्पत्ति हुई है ।।

বসিষ্ঠ বললেন—আমি এই সত্রযজ্ঞের কর্তা, এবং আমি-ই শুক্র (বীজ) আহুতি দানকারী হোতা। যার বীজ, ফলও তারই। যদি জন্মের ক্ষেত্রে শুক্রকেই কারণ ধরা হয়, তবে নিশ্চিতই এরা আমার পুত্র—এতে আর বিচার নেই।

Verse 121

ततोडब्रुवन्‌ देवगणा: पितामहमुपेत्य वै । कृताञ्जलिपुटा: सर्वे शिरोभिरभिवन्द्य च,इस प्रकार विवाद उपस्थित होनेपर समस्त देवताओंने ब्रह्माजीके पास जा दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनको प्रणाम किया और कहा--

এভাবে বিবাদ উঠলে সকল দেবগণ পিতামহ ব্রহ্মার নিকট গেলেন। তাঁরা করজোড়ে, মস্তক নত করে প্রণাম জানিয়ে তারপর নিবেদন করলেন—

Verse 122

वयं च भगवन्‌ सर्वे जगच्च सचराचरम्‌ | तवैव प्रसवा: सर्वे तस्मादग्निर्विभावसु:

হে ভগবান! আমরা সকলেই, আর চলমান-অচলসহ সমগ্র জগৎ—সবই আপনারই প্রসূত। অতএব দীপ্তিমান অগ্নি (বিভাবসু)ও আপনারই সন্তান।

Verse 123

निसर्गाद्‌ ब्रह्मणश्वापि वरुणो यादसाम्पति:

ব্রহ্মার নৈসর্গিক উদ্ভব থেকেই জলচরদের অধিপতি বরুণও প্রকাশিত হলেন। তারপর ব্রহ্মার আদেশে, জলাধিপতি বরুণরূপ ধারণ করে ভগবান শিব সূর্যসম দীপ্ত ভৃগুকে প্রথমে পুত্ররূপে গ্রহণ করলেন; পরে অঙ্গিরসকে অগ্নির সন্তান বলে নির্ধারণ করলেন।

Verse 124

जग्राह वै भृगुं पूर्वमपत्यं सूर्यवर्चसम्‌ । ईश्वरो$ज्लिरिसं चाग्नेरपत्यार्थमकल्पयत्‌

ঈশ্বর প্রথমে সূর্যসম দীপ্ত ভৃগুকে নিজের সন্তানরূপে গ্রহণ করলেন। তারপর সেই ঈশ্বরই সন্তান-পরম্পরার উদ্দেশ্যে অঙ্গিরসকে অগ্নির সন্তান বলে স্থির করলেন।

Verse 125

पितामहस्त्वपत्यं वै कविं जग्राह तत्त्ववित्‌ | तदा स वारुण: ख्यातो भृगुः प्रसव कर्मवित्‌

তত্ত্বজ্ঞ পিতামহ কৱিকে নিজের সন্তানরূপে গ্রহণ করলেন। সেই সময় প্রসব-ধর্মে পারদর্শী ভৃগু ‘বারুণ’ নামে খ্যাত হলেন।

Verse 126

आग्नेयस्त्वंगिरा: श्रीमान्‌ कविर्राह्मो महायशा: । भार्गवांगिरसौ लोके लोकसंतानलक्षणौ

বসিষ্ঠ বললেন—দীপ্তিমান ও মহাযশস্বী অঙ্গিরা ‘আগ্নেয়’ নামে প্রসিদ্ধ হলেন, আর মহাখ্যাত ঋষি-কবি ‘ব্রাহ্ম’ নামে খ্যাতি লাভ করলেন। ভৃগু ও অঙ্গিরা—এই দুইজনই জগতে বংশধারার মূল-লক্ষণরূপে কথিত; তাঁদের সন্তানের দ্বারা সৃষ্টির বিস্তার ঘটে।

Verse 127

एते हि प्रस्रवा: सर्वे प्रजानां पतयस्त्रय: । सर्व संतानमेतेषामिदमित्युपधारय

বসিষ্ঠ বললেন—এঁরাই সৃষ্টির সকল উৎস—প্রজাদের তিন প্রভু, প্রজাপতি। ভালো করে বুঝে নাও: বাকিরা সকলেই তাঁদেরই সন্তান; এই সমগ্র জগৎ তাঁদেরই বংশজাত।

Verse 128

भगोस्तु पुत्रा: सप्तासन्‌ सर्वे तुल्या भगोर्गुणै: । च्यवनो वज्शीर्षश्न॒ शुचिरौर्वस्तथैव च

বসিষ্ঠ বললেন—ভগের সাত পুত্র ছিলেন, সকলেই গুণে ভগের সমান। তাঁদের নাম—চ্যবন, বজ্রশীর্ষ, শুচি, ঔর্ব, শুক্র, বরেণ্য ও সবন—এই সাতজন স্মৃত। ভৃগুবংশীয়েরা সাধারণত ‘বারুণ’ নামে পরিচিত; আর সেই বংশেই তোমারও জন্ম।

Verse 129

शुक्रो वरेण्यश्न विभु: सवनश्चेति सप्त ते । भार्गवा वारुणा: सर्वे येषां वंशे भवानपि

বসিষ্ঠ বললেন—শুক্র, বরেণ্য, বিভু ও সবন—এদেরসহ মোট সাতজন। এঁরা সকলেই ভার্গব এবং পরম্পরায় ‘বারুণ’ নামে প্রসিদ্ধ; যে বংশে তোমারও জন্ম।

Verse 130

अष्टौ चांगिरस: पुत्रा वारुणास्ते5प्युदाह्नता: । बृहस्पतिरुतथ्यश्ष पयस्य: शान्तिरेव च

বসিষ্ঠ বললেন—অঙ্গিরার আট পুত্র ছিলেন; তাঁদেরও ‘বারুণ’ বলা হয়। তাঁদের নাম—বৃহস্পতি, উতথ্য, পয়স্য, শান্তি, ঘোর, বিরূপ, সংবর্ত এবং অষ্টম সুধন্বা। অগ্নিবংশে জন্ম বলে তাঁরা ‘আগ্নেয়’ নামে খ্যাত। সকলেই জ্ঞাননিষ্ঠ ও নিরাময়।

Verse 131

घोरो विरूप: संवर्त: सुधन्वा चाष्टम: स्मृत: । एतेडष्टौ वहल्लिजा: सर्वे ज्ञाननिष्ठा निरामया:

বসিষ্ঠ বললেন—ঘোর, বিরূপ, সংবর্ত এবং অষ্টম সুধন্বা—এরা তাদের মধ্যেই স্মৃত। এই আটজন অগ্নিবংশজাত, জ্ঞাননিষ্ঠ এবং নিরাময়।

Verse 132

ब्रह्मणस्तु कवे: पुत्रा वारुणास्तेडप्युदाह्मता: । अष्टौ प्रसवजैर्युक्ता गुणैब्रह्मविद: शुभा:

বসিষ্ঠ বললেন—ব্রহ্মার পুত্র কবির পুত্রগণও ‘বারুণ’ নামে অভিহিত। তারা আটজন; পুত্রোচিত গুণে সমৃদ্ধ, শুভলক্ষণ এবং ব্রহ্মজ্ঞ বলে গণ্য।

Verse 133

कवि: काव्यश्न धृष्णुश्न बुद्धिमानूशना तथा । भगुश्न विरजाश्वैव काशी चोग्रश्न धर्मवित्‌,उनके नाम ये हैं--कवि, काव्य, धुृष्णु, बुद्धिमान शुक्राचार्य, भूगु, विरजा, काशी तथा धर्मज्ञ उग्र

বসিষ্ঠ বললেন—তাদের নাম: কবি, কাব্য, ধৃষ্ণু, বুদ্ধিমান উশনা (শুক্রাচার্য), ভৃগু, বিরজা, কাশী এবং ধর্মজ্ঞ উগ্র।

Verse 134

अष्टौ कविसुता होते सर्वमेभिर्जगत्‌ ततम्‌ । प्रजापतय एते हि प्रजाभागैरिह प्रजा:

বসিষ্ঠ বললেন—কবির এই আট পুত্র; এদের দ্বারাই সমগ্র জগৎ পরিব্যাপ্ত। এরা আটজনই প্রজাপতি; আর এখানে প্রজার অংশ-গুণে অংশীদার হওয়ায় ‘প্রজা’ বলেও অভিহিত।

Verse 135

एवमड्रिरसश्लैव कवेश्ष प्रसवान्वयै: । भगोश्व भूगुशार्दूल वंशजै: सततं जगत्‌

বসিষ্ঠ বললেন—হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ! এইরূপে অড্রিরস ও কবির প্রসব-পরম্পরা দ্বারা, এবং ভগের বংশধরদের দ্বারাও, জগৎ চিরকাল ধারিত ও প্রবাহিত হয়েছে।

Verse 136

भुगुश्रेष्ठी इस प्रकार अंगिरा, कवि और भृगुके वंशजों तथा संतान-परम्पराओंसे सारा जगत्‌ व्याप्त है ।।

বসিষ্ঠ বললেন—হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ! জলের অধিপতি বরুণরূপ মহাপ্রভু শিব একদা কবি ও ভৃগুকে পুত্ররূপে গ্রহণ করেছিলেন; তাই সেই দুই ঋষি ‘বারুণ’ নামে স্মৃত।

Verse 137

जग्राहांगिरसं देव: शिखी तस्माद्भधुताशन: । तस्मादांगिरसा ज्ञेया: सर्व एव तदन्वया:

বসিষ্ঠ বললেন—জ্বালামুকুটধারী দেব অগ্নি অঙ্গিরাকে পুত্ররূপে গ্রহণ করেছিলেন; অতএব অঙ্গিরাবংশে জন্মানো সকলেই অগ্নিবংশীয় বলে জ্ঞাত হবে, এবং ‘বারুণ’ সংজ্ঞাতেও পরিচিত হবে।

Verse 138

ब्रह्मा पितामह: पूर्व देवताभि: प्रसादित: । इमे नः संतरिष्यन्ति प्रजाभिर्जगती श्वरा:

বসিষ্ঠ বললেন—পূর্বকালে দেবগণ পিতামহ ব্রহ্মাকে প্রসন্ন করে বললেন—‘প্রভো! কৃপা করুন, যেন ভৃগু প্রভৃতির বংশধররা পৃথিবী রক্ষা করতে করতে নিজেদের প্রজার দ্বারা আমাদের বিপদ থেকে উদ্ধার করে। তারা সকলেই প্রজাপতি হোক, সকলেই মহাতপস্বী হোক। আপনার প্রসাদে তারা এই সময়ে সমগ্র লোককে সঙ্কট থেকে রক্ষা করবে।’

Verse 139

सर्वे प्रजानां पतय: सर्वे चातितपस्विन: । त्वत्प्रसादादिमं लोक॑ तारयिष्यन्ति साम्प्रतम्‌

বসিষ্ঠ বললেন—তারা সকলেই প্রজাদের অধিপতি ও রক্ষক হবে, এবং সকলেই অতিশয় তপস্বী হবে; আপনার প্রসাদে তারা এই সময়েই এই লোককে সঙ্কট থেকে উদ্ধার করবে।

Verse 140

तथैव वंशकर्तारस्तव तेजोविवर्धना: । भवेयुर्वेदविदुष: सर्वे च कृतिनस्तथा,“आपकी दयासे ये सब लोग वंशप्रवर्तक, आपके तेजकी वृद्धि करनेवाले तथा वेदज्ञ पुण्यात्मा हों

বসিষ্ঠ বললেন—তদ্রূপ তারা সকলেই বংশপ্রবর্তক হোক, আপনার তেজ বৃদ্ধি করুক; তারা সকলেই বেদবিদ্ হোক এবং কর্মে কৃতী ও পুণ্যাচরণে প্রতিষ্ঠিত হোক।

Verse 141

देवपक्षचरा: सौम्या: प्राजापत्या महर्षय: । आप्नवन्ति तपश्चैव ब्रह्मचर्य परं तथा

বসিষ্ঠ বললেন—প্রজাপতিদের বংশে জন্ম নেওয়া এই মহর্ষিগণ স্বভাবে সৌম্য হোন, সর্বদা দেবপক্ষে অবস্থান করুন, এবং তপস্যা ও পরম ব্রহ্মচর্যের দ্বারা অর্জিত শক্তি লাভ করুন।

Verse 142

सर्वे हि वयमेते च तवैव प्रसव: प्रभो | देवानां ब्राह्मणानां च त्वं हि कर्ता पितामह,'प्रभो! पितामह! ये सब और हमलोग आपहीकी संतान हैं; क्योंकि देवताओं और ब्राह्मणोंकी सृष्टि करनेवाले आप ही हैं

বসিষ্ঠ বললেন—প্রভু, পিতামহ! আমরা সকলেই—এরা-ও—নিশ্চয়ই আপনারই সন্তান; কারণ দেবতা ও ব্রাহ্মণ—উভয়েরই স্রষ্টা, আদিপ্রজাপতি, আপনি।

Verse 143

मारीचमादित: कृत्वा सर्वे चैवाथ भार्गवा: । अपत्यानीति सम्प्रेक्ष्य क्षमयाम पितामह,“पितामह! कश्यपसे लेकर समस्त भृगुवंशियोंतक हम सब लोग आपहीकी संतान हैं --ऐसा सोचकर आपसे अपनी भूलोंके लिये क्षमा चाहते हैं

বসিষ্ঠ বললেন—পিতামহ! মারীচ থেকে আরম্ভ করে আমরা সকল ভার্গব, নিজেদের আপনারই সন্তান বলে জেনে, আমাদের দোষের জন্য আপনার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করি।

Verse 144

ते त्वनेनैव रूपेण प्रजनिष्यन्ति वै प्रजा: । स्थापयिष्यन्ति चात्मानं युगादिनिधने तथा

বসিষ্ঠ বললেন—তাঁরা এই একই রূপে প্রজাদের উৎপন্ন করবেন, এবং যুগের আরম্ভ থেকে তার অন্ত (প্রলয়) পর্যন্ত নিজেদেরকে বিধিবদ্ধ সীমার মধ্যে প্রতিষ্ঠিত রাখবেন।

Verse 145

इत्युक्त:ः स तदा तैस्तु ब्रह्मा लोकपितामह: । तथेत्येवाब्रवीत्‌ प्रीतस्तेडपि जग्मुर्यथागतम्‌

দেবতাদের এ কথা শুনে লোকপিতামহ ব্রহ্মা প্রসন্ন হয়ে বললেন—“তথাস্তु।” তারপর দেবতারা যেমন এসেছিল, তেমনই প্রত্যাবর্তন করল।

Verse 146

एवमेतत्‌ पुरा वृत्तं तस्य यज्ञे महात्मन: । देवश्रेष्टस्य लोकादौ वारुणीं बिशभ्रतस्तनुम्‌

বসিষ্ঠ বললেন—এভাবেই প্রাচীন কালে সেই মহাত্মা দেবশ্রেষ্ঠের যজ্ঞে ঘটনা ঘটেছিল। সৃষ্টির আদিতে তিনি বারুণী-তনু ধারণ করেছিলেন।

Verse 147

इस प्रकार पूर्वकालमें जब कि सृष्टिके प्रारम्भका समय था, वरुण-शरीर धारण करनेवाले सुरश्रेष्ठ महात्मा रुद्रके यञ्ञमें पूर्वोक्त वृत्तान्त घटित हुआ था ।।

বসিষ্ঠ বললেন—এইভাবে প্রাচীন কালে, সৃষ্টির আদিতে, বরুণ-সম্বন্ধীয় তনু ধারণকারী দেবশ্রেষ্ঠ মহাত্মা রুদ্রের যজ্ঞে পূর্বোক্ত ঘটনা ঘটেছিল। অন্নই ব্রহ্মা, পশুপতি, শর্ব, রুদ্র ও প্রজাপতি—এমনই ধারণা; আর স্বর্ণ অগ্নিরই সন্তান—এটাই সকলের মত।

Verse 148

अग्न्यभावे च कुरुते वह्निस्थानेषु काउ्चनम्‌ | जामदग्न्य प्रमाणज्ञो वेदश्रुतिनिदर्शनात्‌

বসিষ্ঠ বললেন—অগ্নি অনুপস্থিত হলে, যেখানে অগ্নির স্থান নির্দিষ্ট, সেখানে স্বর্ণ ব্যবহার করা যায়—বৈদিক শ্রুতির দৃষ্টান্তে এটি প্রমাণিত। হে জামদগ্ন্য পরশুরাম, প্রমাণজ্ঞ ব্যক্তি এভাবেই করে।

Verse 149

कुशस्तम्बे जुहोत्यग्निं सुवर्णे तत्र च स्थिते । वल्मीकस्य वपायां च कर्णे वाजस्य दक्षिणे

বসিষ্ঠ বললেন—কেউ কুশ-স্তম্ভে, তাতে স্থাপিত স্বর্ণে, ঢিবির (বাঁবি) ছিদ্রে, অথবা ছাগলের ডান কানে—এসব স্থানে অগ্নিরূপ জেনে হোম করে।

Verse 150

शकटोर्व्याँ परस्याप्सु ब्राह्मणस्य करे तथा | हुते प्रीतिकरीमृद्धिं भगवांस्तत्र मन्‍्यते

বসিষ্ঠ বললেন—গাড়ির চাকার দাগের পথে, অন্যের জলে, কিংবা ব্রাহ্মণের হাতেও যদি বিধিপূর্বক আহুতি দেওয়া হয়, তবে ভগবান অগ্নি তা সেখানেই গ্রহণ করে প্রীতিদায়ক সমৃদ্ধি বলে মানেন।

Verse 151

तस्मादग्निपरा: सर्वे देवता इति शुश्रुम । ब्रहद्मणो हि प्रभूतो5ग्निरग्नेरपि च काउ्चनम्‌,अतः सब देवताओंमें अग्नि ही श्रेष्ठ हैं। यह हमने सुना है। ब्रह्मासे अग्निकी उत्पत्ति भी है और अग्निसे सुवर्णकी

অতএব আমরা শুনেছি—সমস্ত দেবতাই অগ্নির উপর নির্ভরশীল এবং তাঁর মধ্যেই তাঁদের আশ্রয়। কারণ ব্রহ্মা থেকে অগ্নির উৎপত্তি, আর অগ্নি থেকেই আবার স্বর্ণের জন্ম। তাই সকল দেবতার মধ্যে অগ্নিই শ্রেষ্ঠ—হবিবাহক এবং পবিত্র সমৃদ্ধির উৎস।

Verse 152

तस्माद्‌ ये वै प्रयच्छन्ति सुवर्ण धर्मदर्शिन: । देवतास्ते प्रयच्छन्ति समस्ता इति नः श्रुतम्‌

অতএব ধর্মদর্শী যে পুরুষেরা স্বর্ণ দান করেন, তাঁরা যেন একযোগে সমস্ত দেবতাকেই দান করেন—এমনই আমরা পরম্পরায় শুনেছি। স্বর্ণদানকে সর্বদেবতার প্রতি সমগ্র অর্ঘ্যরূপে গণ্য করা হয়।

Verse 153

तस्य चातमसो लोका गच्छत: परमां गतिम्‌ । स्वलोके राजराज्येन सो5भिषिच्येत भार्गव

স্বর্ণদাতা যখন পরম গতি লাভের পথে অগ্রসর হয়, তখন সে অন্ধকারহীন, দীপ্তিময় লোকসমূহ প্রাপ্ত হয়। হে ভার্গব! নিজ স্বর্গলোকে তার রাজরাজ্যাভিষেক হয়—সে রাজাদের মধ্যেও রাজা হয়ে প্রতিষ্ঠিত হয়।

Verse 154

आदित्योदयसम्प्राप्ते विधिमन्त्रपुरस्कृतम्‌ । ददाति काज्चन यो वै दुःस्वप्रं प्रतिहन्ति सः,जो सूर्योदय-कालमें विधिपूर्वक मन्त्र पढ़कर सुवर्णका दान करता है, वह अपने पाप और दुःस्वप्रको नष्ट कर डालता है

সূর্যোদয়ের সময় যে ব্যক্তি বিধিপূর্বক, মন্ত্রোচ্চারণকে অগ্রে রেখে, স্বর্ণ দান করে—সে দুঃস্বপ্ন নিবারণ করে এবং তৎসংশ্লিষ্ট অশুভতা ও পাপমল দূর করে।

Verse 155

ददात्युदितमात्रे यस्तस्य पाप्मा विधूयते । मध्याद्वे ददतो रुक्मं हन्ति पापमनागतम्‌

যে সূর্যোদয়ের মুহূর্তে দান করে, তার সঞ্চিত পাপ ধুয়ে যায়। আর যে মধ্যাহ্নে স্বর্ণ দান করে, সে অনাগত—অর্থাৎ ভবিষ্যতে আসতে পারা পাপও বিনাশ করে।

Verse 156

ददाति पश्िमां संध्यां यः सुवर्ण यतव्रतः । ब्रह्मवाय्वग्निसोमानां सालोक्यमुपयाति सः,जो सायं संध्याके समय व्रतका पालन करते हुए सुवर्ण दान देता है, वह ब्रह्मा, वायु, अग्नि और चन्द्रमाके लोकोंमें जाता है

বসিষ্ঠ বললেন—যে ব্যক্তি সংযমিত ব্রত পালন করে পশ্চিম সন্ধ্যাকালে স্বর্ণ দান করে, সে ব্রহ্মা, বায়ু, অগ্নি ও সোমের লোকসমূহে তাঁদেরই সহলোকতা লাভ করে।

Verse 157

सेन्द्रेषु चैव लोकेषु प्रतिष्ठां विन्दते शुभाम्‌ इह लोके यश: प्राप्प शान्तपाप्मा च मोदते

ইন্দ্রসহ লোকপালদের লোকসমূহে সে শুভ প্রতিষ্ঠা ও সম্মান লাভ করে। আর এই লোকেই সে যশ অর্জন করে, পাপ প্রশমিত হয়ে আনন্দে বাস করে।

Verse 158

ततः सम्पद्यते<न्येषु लोकेष्वप्रतिम: सदा । अनावृतगतिश्चैव कामचारो भवत्युत

তারপর অন্য লোকসমূহেও সে সর্বদা অতুলনীয় অবস্থায় প্রতিষ্ঠিত হয়। তার গতি অবারিত হয়, এবং সে ইচ্ছামতো বিচরণ করার স্বাধীনতা লাভ করে।

Verse 159

१५८ ।। नच क्षरति तेभ्यश्व यशश्रैवाप्तुते महत्‌ । सुवर्णमक्षयं दत्त्वा लोकांश्षाप्रोति पुष्कलान्‌

অক্ষয় স্বর্ণ দানকারী সেই পুণ্যলোকসমূহ থেকে পতিত হয় না। এই সংসারে সে মহাযশ লাভ করে এবং পরলোকে বহু সমৃদ্ধ পুণ্যলোক প্রাপ্ত হয়।

Verse 160

यस्तु संजनयित्वाग्निमादित्योदयन प्रति । दद्याद्‌ वै व्रतमुद्दिश्य सर्वकामान्‌ समश्चुते

যে ব্যক্তি সূর্যোদয়ের দিকে মুখ করে অগ্নি প্রজ্বালিত করে, ব্রতের উদ্দেশ্যে স্বর্ণ দান করে, সে সকল কামনার সিদ্ধি লাভ করে।

Verse 161

अग्निमित्येव तत्‌ प्राहु: प्रदानं च सुखावहम्‌ । यथेष्टगुणसंवृत्तं प्रवर्तकमिति स्मृतम्‌

বসিষ্ঠ বললেন—এই দানকেই ‘অগ্নি’ বলা হয়, এবং এর অর্পণ সুখদায়ক। ইচ্ছানুসারে গুণে সমৃদ্ধ হয়ে এটি দানপ্রবৃত্তিকে উদ্দীপিত করে; মনোভাব অনুযায়ী পুণ্য ও যশ উৎপন্ন করে—এমনই স্মৃতিতে বলা হয়েছে।

Verse 162

एषा सुवर्णस्योत्पत्ति: कथिता ते मयानघ । कार्तिकेयस्य च विभो तद्‌ विद्धि भूगुनन्दन,प्रभो! निष्पाप भृगुनन्दन! यह मैंने तुम्हें सुवर्ण और कार्तिकेयकी उत्पत्ति बतायी है। इसे अच्छी तरह समझ लो

বসিষ্ঠ বললেন—হে নিষ্পাপ! আমি তোমাকে স্বর্ণের উৎপত্তি এবং পরাক্রমী কার্ত্তিকেয়ের উৎপত্তিও বলেছি। হে ভৃগুকুল-আনন্দ! এটি ভালো করে বুঝে নাও।

Verse 163

कार्तिकेयस्तु संवृद्ध:ः कालेन महता तदा | देवैः सेनापतित्वेन वृतः सेन्द्रैर्भगूद्धह,भुगुश्रेष्ठ! कार्तिकेय जब दीर्घकालमें बड़े हुए तब इन्द्र आदि देवताओंने उनका अपने सेनापतिके पदपर वरण किया

বসিষ্ঠ বললেন—হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ! দীর্ঘ কালের মধ্যে কার্ত্তিকেয় পূর্ণ শক্তিতে পরিণত হলে, ইন্দ্রসহ দেবগণ তাঁকে সেনাপতি পদে বরণ করে প্রতিষ্ঠা করলেন।

Verse 164

जघान तारक चापि दैत्यमन्यांस्तथासुरान्‌ । त्रिदशेन्द्राज्ञया ब्रहाँल्‍लोकानां हितकाम्यया

বসিষ্ঠ বললেন—হে ব্রাহ্মণ! লোককল্যাণের অভিপ্রায়ে এবং ত্রিদশেন্দ্র ইন্দ্রের আদেশে প্রেরিত হয়ে তিনি তারক দৈত্য এবং অন্যান্য দৈত্য-অসুরদের সংহার করলেন।

Verse 165

सुवर्णदाने च मया कथितास्ते गुणा विभो । तस्मात्‌ सुवर्ण विप्रेभ्य: प्रयच्छ ददतां वर

বসিষ্ঠ বললেন—হে প্রভু! স্বর্ণদান সম্পর্কিত গুণ ও ফল আমি তোমাকে বলেছি। অতএব, হে দাতাদের শ্রেষ্ঠ! এখন ব্রাহ্মণদের স্বর্ণ দান করো।

Verse 166

भीष्म उवाच इत्युक्त:स वसिष्ठेन जामदग्न्य: प्रतापवान्‌ । ददै सुवर्ण विप्रेभ्यो व्यमुच्यत च किल्बिषात्‌

ভীষ্ম বললেন—বসিষ্ঠের এই উপদেশ শুনে প্রতাপশালী জামদগ্ন্য (পরশুরাম) ব্রাহ্মণদের স্বর্ণ দান করলেন; আর কথিত আছে, তাতে তিনি পাপ থেকে মুক্ত হলেন।

Verse 167

भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी परशुरामजीने ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान किया। इससे वे सब पापोंसे छुटकारा पा गये ।।

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! বসিষ্ঠ এমন বলার পর পরাক্রমশালী পরশুরাম ব্রাহ্মণদের স্বর্ণ দান করলেন; সেই দানে তিনি সকল পাপ থেকে মুক্ত হলেন। হে রাজন, স্বর্ণের উৎপত্তি ও তা দানের ফল—এই সবই আমি তোমাকে, যুধিষ্ঠির, সম্পূর্ণভাবে বললাম।

Verse 168

तस्मात्‌ त्वमपि विप्रेभ्य: प्रयच्छ कनकं बहु । ददत्सुवर्ण नृपते किल्बिषाद्‌ विप्रमोक्ष्यसि,अतः नरेश्वर! अब तुम भी ब्राह्मणोंको बहुत-सा सुवर्ण दान करो। सुवर्ण दान करके तुम पापसे मुक्त हो जाओगे

অতএব, হে নরেশ! তুমিও ব্রাহ্মণদের প্রচুর স্বর্ণ দান করো। হে রাজা, স্বর্ণ দান করলে তুমি শীঘ্রই পাপ থেকে মুক্ত হবে।

Verse 231

परेण तपसा युक्ता: श्रीमन्‍्तो लोकविश्रुता: | लोकानन्वचरन्‌ सिद्धा: सर्व एव भृगूत्तम

ভীষ্ম বললেন—হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ! পরম তপস্যায় যুক্ত, ঐশ্বর্যসম্পন্ন ও সর্বলোকে খ্যাত—সেই সকল সিদ্ধ ঋষি সর্বত্র লোকলোকান্তরে অবাধে বিচরণ করতেন।

Verse 323

तमोघनायामपि वै निशायां विचरिष्यथ । बिलमें रहते समय तुम आहार न मिलनेके कारण अचेत और निष्प्राण होकर सूख जाओगे तो भी भूमि तुम्हें धारण किये रहेगी--वर्षाका जल मिलनेपर तुम पुन: जीवित हो उठोगे। घने अन्धकारसे भरी हुई रात्रिमें भी तुम विचरते रहोगे

ভীষ্ম বললেন—ঘন অন্ধকারে আচ্ছন্ন রাত্রিতেও তোমরা বিচরণ করবে। গর্তে লুকিয়ে থাকাকালে আহার না পেয়ে তোমরা অচেতন ও যেন প্রাণহীন হয়ে শুকিয়ে গেলেও পৃথিবী তোমাদের ধারণ করবে; আর বর্ষার জল পেলে তোমরা আবার জীবিত হয়ে উঠবে।

Verse 336

परीयुज्वलनस्यार्थे न चाविन्दन्‌ हुताशनम्‌ । मेढकोंसे ऐसा कहकर देवता पुनः अग्निकी खोजके लिये इस पृथ्वीपर विचरने लगे; किंतु वे अग्निदेवको कहीं उपलब्ध न कर सके

পবিত্র অগ্নিকে পুনরায় প্রজ্বলিত করার উপায় খুঁজেও তারা হুতাশনকে পেল না। ব্যাঙকে এ কথা বলে দেবতারা আবার পৃথিবীতে অগ্নির সন্ধানে বিচরণ করতে লাগলেন; কিন্তু কোথাও অগ্নিদেবকে আবিষ্কার করতে পারলেন না।

Verse 343

अश्रृत्थस्थो3ग्निरित्येवमाह देवान्‌ भृगूद्गवह | भुगुश्रेष्ठ॒ तदनन्तर देवराज इन्द्रके ऐरावतकी भाँति कोई विशालकाय गजराज देवताओंसे बोला--'अश्वत्थ अग्निरूप है'

ভৃগুবংশের শ্রেষ্ঠ ভৃগু দেবতাদের এভাবে বললেন—“অগ্নি অশ্বত্থ বৃক্ষে অবস্থান করছে।” তারপর দেবরাজ ইন্দ্র—ঐরাবতের ন্যায় মহাকায় গজরাজের মতো—দেবসমাজকে বললেন—“অশ্বত্থ অগ্নিস্বরূপ।”

Verse 353

प्रतीपा भवतां जिह्दा भवित्रीति भृगूद्गह | भगुकुलभूषण! यह सुनकर अग्निदेव क्रोधसे विह्लल हो उठे और उन्होंने समस्त हाथियोंको शाप देते हुए कहा--तुमलोगोंकी जिह्ला उलटी हो जायगी”

ভৃগু বললেন—“তোমাদের জিহ্বা উল্টে যাবে।” এ কথা শুনে অগ্নিদেব ক্রোধে বিহ্বল হয়ে সকল হাতিকে শাপ দিয়ে বললেন—“তোমাদের জিহ্বা বিপরীত হয়ে যাবে।”

Verse 426

अग्निदेवने उसकी भी जिह्ला उलट दी। अब अग्निदेवको प्रत्यक्ष देखकर देवताओंने दयायुक्त होकर शुकसे कहा--“तू शुकयोनिमें रहकर अत्यन्त वाणीरहित नहीं होगा--कुछ- कुछ बोल सकेगा। जीभ उलट जानेपर भी तेरी बोली बड़ी मधुर एवं कमनीय होगी ।।

অগ্নিদেব শুকের জিহ্বাও উল্টে দিলেন। তারপর অগ্নিকে প্রত্যক্ষ দেখে দেবতারা করুণায় শুককে বললেন—“তুমি টিয়াপাখির যোনিতে থেকেও সম্পূর্ণ বাক্‌হীন হবে না; অল্প অল্প কথা বলতে পারবে। জিহ্বা উল্টে গেলেও তোমার বাণী হবে অত্যন্ত মধুর ও মনোহর। যেমন বৃদ্ধের কাছেও শিশুর অস্পষ্ট, বিস্ময়কর তোতলামি মিষ্টি লাগে, তেমনি তোমার কথাও সকলের প্রিয় হবে।”

Verse 743

तत्‌ सर्व काज्चनीभूतं समन्तात्‌ प्रत्यदृश्यत । सूर्यकी किरणोंके समान उस गर्भसे वहाँकी भूमि या पर्वतोंपर रहनेवाले जिस किसी द्रव्यका स्पर्श हुआ, वह सब चारों ओरसे सुवर्णमय दिखायी देने लगा

চারিদিকে সবকিছুই কাঞ্চনময় হয়ে উঠল। সূর্যকিরণের মতো সেই আশ্চর্য গর্ভ থেকে যে স্পর্শই পড়ল—ভূমি হোক বা পর্বতের উপরস্থিত কোনো বস্তু—সবই চারদিক থেকে যেন খাঁটি সোনার মতো দীপ্ত হতে লাগল।

Verse 756

व्यादीपयंस्तेजसा च त्रैलोक्यं सचराचरम्‌ । वह बालक अपने तेजसे चराचर प्राणियोंको प्रकाशित करता हुआ पर्वतों, नदियों और झरनोंकी ओर दौड़ने लगा था

নিজ তেজে ত্রৈলোক্যের সমগ্র চরাচর জগতকে আলোকিত করে সেই দীপ্তিমান বালক পর্বত, নদী ও ঝরনার দিকে দৌড়াতে লাগল।

Verse 1223

वरुणश्रेश्वरो देवो लभतां काममीप्सितम्‌ | “भगवन्‌! हम सब लोग और चराचरसहित सारा जगत्‌ ये सब-के-सब आपकी ही संतान हैं। अत: अब ये प्रकाशमान अग्नि और ये वरुणरूपधारी ईश्वर महादेव भी अपना मनोवांछित फल प्राप्त करें!

বরুণশ্রেষ্ঠ সেই দেব ইচ্ছিত কামনা লাভ করুন। হে ভগবান! আমরা সকলেই এবং চরাচরসহ সমগ্র জগৎ আপনারই সন্তান; অতএব এই দীপ্তিমান অগ্নি এবং বরুণরূপধারী ঈশ্বর মহাদেবও নিজ নিজ অন্তঃকামিত ফল লাভ করুন।

Frequently Asked Questions

It asks which offerings to pitṛs yield akṣaya (imperishable benefit), which oblations produce long-lasting satisfaction, and what is described as leading to ānantya within the śrāddha framework.

Sesame (tila) is given primacy, with tradition attributing akṣaya quality to specific sesame-based śrāddha; the chapter also presents a ranked, substance-based account of how long different offerings are said to please the pitṛs.

Yes. Bhīṣma references authoritative tradition (including Manu) and introduces a gāthā connected to pitṛ song, attributing prior instruction to Sanatkumāra, thereby positioning the teaching as received and standardized rather than merely personal opinion.