
Chapter Arc: युधिष्ठिर (धर्मराज) पितामह भीष्म से धर्म-निर्णय का मूल पूछते हैं—धर्म के विषय में प्रत्यक्ष बड़ा है या आगम (शास्त्र/परम्परा) और दोनों में कारण-निर्णायक क्या है। → भीष्म स्पष्ट करते हैं कि धर्म का क्षेत्र सूक्ष्म है; केवल इन्द्रिय-प्रत्यक्ष से उसका पूरा निर्णय नहीं होता। वे साधु-असाधु के लक्षण, शिष्टाचार, और काम-अर्थ-लोभ-मोह के पीछे चलने वाली प्रवृत्तियों से धर्म का भ्रम कैसे पैदा होता है—यह दिखाते हुए सावधान करते हैं। → भीष्म का निर्णायक प्रतिपादन: धर्म-विषय में आगम-प्रमाण की श्रेष्ठता और शिष्ट-आचरण की कसौटी; साथ ही नैतिक मनोविज्ञान का शिखर—‘पाप को छिपाना उसे बढ़ाता है; साधुओं के सामने स्वीकार करने से शमन होता है’ तथा ‘धर्म समस्त प्राणियों का मानसी (हृदयगत) आधार है’। → अध्याय शिष्टाचार और आचरण-शुद्धि के व्यावहारिक निर्देशों में उतरता है—दम्भ-रहित देव-पूजा, कपट-रहित गुरु-सेवा, पितृ-देव-ग्रह-पूजन, और दान/यज्ञादि के शुद्ध रूप; धर्म को बाह्य प्रदर्शन नहीं, अंतःकरण की सत्यता और शास्त्र-सम्मत आचरण से जोड़कर निष्कर्ष देता है।
Verse 1
अफड--रू--> द्विषष्ट्याधिकशततमो< ध्याय: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! দেবকীনন্দন ভগবান শ্রীকৃষ্ণ এভাবে কথা বলার পর, ধর্মের প্রমাণের শ্রেষ্ঠতা, ধর্ম-অধর্মের ফল, সাধু-অসাধুর লক্ষণ এবং শিষ্টাচারের বিধান স্পষ্ট করে জানার জন্য যুধিষ্ঠির আবার শান্তনুনন্দন ভীষ্মকে প্রশ্ন করলেন।
Verse 2
निर्णये वा महाबुद्धे सर्वधर्मविदां वर । प्रत्यक्षमागमो वेति कि तयो: कारणं भवेत्
হে মহাবুদ্ধিমান পিতামহ, ধর্মজ্ঞদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! ধর্মবিষয়ে সিদ্ধান্ত স্থির করতে প্রত্যক্ষ প্রমাণ গ্রহণীয়, না কি আগম? এই দুটির মধ্যে কোনটি সিদ্ধান্ত-নির্ণয়ে প্রধান কারণ হয়?
Verse 3
भीष्म उवाच नास्त्यत्र संशय: कश्रिदिति मे वर्तते मतिः । शृणु वक्ष्यामि ते प्राज्ञ सम्यक् त्वं मेडनुपृच्छसि
ভীষ্ম বললেন—হে প্রাজ্ঞ রাজা! তুমি যথার্থভাবেই প্রশ্ন করেছ। শোনো, আমি তোমাকে উত্তর বলছি। আমার মতে এ বিষয়ে কোনো সংশয়ই নেই।
Verse 4
संशय: सुगमस्तत्र दुर्गमस्तस्य निर्णय: । दृष्ट श्रुतमनन्तं हि यत्र संशयदर्शनम्
ধর্মবিষয়ে সংশয় তোলা সহজ, কিন্তু তার নিশ্চিত সিদ্ধান্তে পৌঁছানো অত্যন্ত কঠিন। কারণ প্রত্যক্ষ ও আগম—দেখা ও শোনা—উভয়ই অনন্ত; আর উভয়ের মধ্যেই সংশয়ের অবকাশ দেখা দেয়।
Verse 5
प्रत्यक्ष कारणं दृष्टवा हैतुका: प्राज्ञमानिन: । नास्तीत्येवं व्यवस्यन्ति सत्यं संशयमेव च
প্রত্যক্ষ কারণই দেখে, নিজেদের জ্ঞানী মনে করা হেতুবাদী তর্কিকেরা পরোক্ষ বস্তুর অস্তিত্ব অস্বীকার করে; আর যা সত্য, তার অস্তিত্ব নিয়েও সন্দেহে থাকে।
Verse 6
तदसयुक्त व्यवस्यन्ति बाला: पण्डितमानिन: । अथ चेन्मन्यसे चैकं कारणं कि भवेदिति
যারা এখনও অপরিণত, অথচ অহংকারে নিজেদের পণ্ডিত মনে করে, তারা সত্যের সঙ্গে অসংযুক্ত সিদ্ধান্তে পৌঁছে। আর যদি তুমি জিজ্ঞাস কর—‘একটিমাত্র কারণ কীভাবে হতে পারে?’—তবে জেনে রেখো, সেই পরম তত্ত্বের দর্শন একমাত্র অবিচল সাধনা ও নিরন্তর প্রয়াসেই সম্ভব; অন্য কোনো উপায়ে নয়।
Verse 7
शक्यं दीर्घेण कालेन युक्तेनातन्द्रितेन च । प्राणयात्रामनेकां च कल्पमानेन भारत
হে ভারত! দীর্ঘকাল সংযমযুক্ত ও অপ্রমত্ত থেকে মানুষ নানাবিধ উপায়ে নিজের প্রাণযাত্রা—জীবনধারণ—চালাতে পারে।
Verse 8
हेतूनामन्तमासाद्य विपुलं ज्ञानमुत्तमम्
যখন তর্ক-বিতর্কের সীমা শেষ হয়, তখনই বিপুল ও উত্তম জ্ঞান লাভ হয়। সেই জ্ঞানই সমগ্র জগতের পরম আলো। হে রাজন, কেবল যুক্তি থেকে যে ‘জ্ঞান’ জন্মায় তা প্রকৃত জ্ঞান নয়; তাই তাকে প্রমাণ বলে মানা উচিত নয়। যা বেদে প্রতিষ্ঠিত নয়, সেই জ্ঞান ত্যাগ করাই শ্রেয়।
Verse 9
ज्योति: सर्वस्य लोकस्य विपुल प्रतिपद्यते । न त्वेव गमन॑ राजन् हेतुतो गमनं तथा । अग्राह्मुमनिबद्धं च वाचा सम्परिवर्जयेत्
সেই বিপুল জ্ঞানই সমগ্র লোকের আলো হয়ে ওঠে। কিন্তু হে রাজন, কেবল যুক্তি দিয়ে যে ‘পৌঁছনো’ হয়, তা সত্যে পৌঁছনোর মতো নির্ভরযোগ্য গতি নয়। অতএব যা গ্রহণযোগ্য নয় এবং যা ভিত্তিহীন, তা বাক্যেও সম্পূর্ণ পরিহার করা উচিত।
Verse 10
युधिछिर उवाच प्रत्यक्ष लोकतः सिद्धिलोकश्नागमपूर्वक: । शिष्टाचारो बहुविधस्तन्मे ब्रूहि पितामह
যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! ধর্ম নির্ণয়ে বহু প্রমাণ দেখা যায়— প্রত্যক্ষ, লোকপ্রসিদ্ধ সিদ্ধ কথা, আগম-সমর্থিত অনুমান, এবং শিষ্টজনের নানাবিধ আচরণ। এদের মধ্যে কোনটি সর্বাধিক বলবান প্রমাণ? অনুগ্রহ করে বলুন।
Verse 11
भीष्म उवाच धर्मस्य द्वियमाणस्य बलवद्/िद्दुरात्मभि: । संस्था यत्नैरपि कृता कालेन प्रतिभिद्यते
ভীষ্ম বললেন— বৎস! যখন শক্তিশালী দুষ্টচিত্ত লোকেরা ধর্মকে আঘাত করতে থাকে, তখন সাধারণ মানুষের বহু প্রচেষ্টায় গড়া রক্ষাব্যবস্থাও কালের প্রবাহে ভেঙে পড়ে।
Verse 12
अधर्मो धर्मरूपेण तृणै:ः कूप इवावृत: । ततसस््तैर्भिद्यते वृत्तं शूणु चैव युधिष्ठिर
ভীষ্ম বললেন— অধর্ম ধর্মের রূপ ধারণ করে এমনভাবে প্রকাশ পায়, যেন ঘাসে-খড়ে ঢাকা কূপ। তারপর সেই আচ্ছাদনের আড়ালেই সদাচারের সীমারেখা ভেঙে যায়। যুধিষ্ঠির, মনোযোগ দিয়ে শোন।
Verse 13
अवृत्ता ये तु भिन्दन्ति श्रुतित्यागपरायणा: । धर्मविद्वेषिणो मन्दा इत्युक्तस्तेषु संशय:
ভীষ্ম বললেন— যারা আচরণহীন, মর্যাদা ভাঙে, শ্রুতি (বৈদিক বাণী) ত্যাগে আসক্ত, ধর্মবিদ্বেষী ও মন্দবুদ্ধি— তাদের সম্পর্কে সন্দেহই বিধেয়। তারা সজ্জনদের প্রতিষ্ঠিত ধর্ম ও আচারের সীমা লঙ্ঘন করে; অতএব তাদের উপর বিশ্বাস করা উচিত নয়।
Verse 14
अतृप्यन्तस्तु साधूनां य एवागमबुद्धय: । परमित्येव संतुष्टास्तानुपास्व च पूच्छ च
ভীষ্ম বললেন— যারা সাধুসঙ্গ পেয়ে কখনও তৃপ্ত হয় না, যাদের বুদ্ধি আগম-প্রমাণকেই শ্রেষ্ঠ মানে, যারা সন্তুষ্টচিত্ত এবং ধর্মকেই পরম বলে জানে— এমন মহাপুরুষদের সেবা করো, তাদের সান্নিধ্যে থাকো, আর তোমার সংশয় তাদের কাছে জিজ্ঞাসা করো।
Verse 15
कामार्थो पृष्ठत: कृत्वा लोभमोहानुसारिणौ । धर्म इत्येव सम्बुद्धास्तानुपास्व च पृच्छ च
কাম ও অর্থ—যা লোভ ও মোহের অনুসারী—সেগুলিকে পশ্চাতে রেখে কেবল ধর্মকেই পরম কল্যাণ বলে জেনো। যে মহাপুরুষেরা সদ্সঙ্গের জন্য নিত্য ব্যাকুল, তাতে কখনও তৃপ্ত হন না, আগমকে সর্বোচ্চ প্রমাণ মানেন এবং সদা সন্তুষ্ট থাকেন—তাঁদের সেবায় থাকো; তাঁদের সেবা করো এবং তোমার সংশয় তাঁদের কাছে জিজ্ঞাসা করে দূর করো।
Verse 16
न तेषां भिद्यते वृत्तं यज्ञा: स्वाध्यायकर्म च । आचार: कारणं चैव धर्मश्वैकस्त्रयं पुन:
এমন সাধুজনের স্থিত জীবনাচার কখনও ভঙ্গ হয় না; তাঁদের যজ্ঞ, স্বাধ্যায় ও অন্যান্য পুণ্যকর্মেও বিঘ্ন ঘটে না। তাঁদের মধ্যে আচরণ, তা ব্যাখ্যা করা বেদ-শাস্ত্র এবং ধর্ম—এই তিনটি পরস্পর বিরোধী নয়; এক সুরে একত্র থাকে।
Verse 17
युधिछिर उवाच पुनरेव हि मे बुद्धि: संशये परिमुहति । अपारे मार्गमाणस्य परं तीरमपश्यत:
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! আবারও আমার বুদ্ধি সংশয়ে বিভ্রান্ত হয়ে পড়ছে। এই অপরিমেয় বিস্তারে পথ খুঁজতে খুঁজতে আমি পার হতে চাই, কিন্তু খুঁজেও আমি দূর তীর দেখতে পাচ্ছি না।
Verse 18
वेद: प्रत्यक्षमाचार: प्रमाणं तत्त्रयं यदि । पृथक्त्वं लभ्यते चैषां धर्मश्चैकस्त्रयं कथम्
যদি বেদ, প্রত্যক্ষ জ্ঞান এবং শিষ্টাচার—এই তিনটিই প্রমাণ বলে মানা হয়, তবে এগুলি তো পৃথক পৃথকভাবে উপলব্ধ হয়; অথচ ধর্ম এক। তবে ধর্মের বিষয়ে এই তিনটি কীভাবে (সমানভাবে নির্ণায়ক) হতে পারে?
Verse 19
भीष्म उवाच धर्मस्य द्वियमाणस्य बलवद्/िद्दुरात्मभि: । यद्येवं मन्यसे राजंस्त्रिधा धर्मविचारणा
ভীষ্ম বললেন—রাজন! যদি তুমি মনে কর যে প্রবল দুরাত্মাদের আঘাতে ধর্ম দ্বিধা হয়ে যায় এবং তাই ধর্মবিচার ত্রিধা হয়, তবে সে মত যথার্থ নয়। প্রকৃতপক্ষে ধর্ম এক; তার বিচার তিনভাবে হয়—বেদ, প্রত্যক্ষ এবং শিষ্টাচার—এই তিন প্রমাণের দ্বারা তাকে পর্যালোচনা করা হয়।
Verse 20
एक एवेति जानीहि त्रिधा धर्मस्य दर्शनम् | पृथक्त्वे च न मे बुद्धिस्त्रयाणामपि वै तथा
নিশ্চয় জেনে রাখো—ধর্ম একটিই। তিন প্রমাণের দ্বারা তার ত্রিবিধ দর্শন হয়; কিন্তু আমি মানি না যে এই তিনটি পৃথক পৃথক ও পরস্পর-বিরুদ্ধ ধর্ম স্থাপন করে।
Verse 21
उक्तो मार्गस्त्रयाणां च तत्तथैव समाचर । जिज्ञासा न तु कर्तव्या धर्मस्य परितर्कणात्
তিন প্রমাণের দ্বারা যে ধর্মময় পথ বলা হয়েছে, ঠিক সেইভাবেই তা আচরণ করো। কেবল তর্ক-বিতর্কের আশ্রয়ে ধর্মকে ‘পরীক্ষা’ করতে যেয়ো না।
Verse 22
सदैव भरतश्रेष्ठ मा ते5भूदत्र संशय: । अन्धो जड इवाशड्की यद् ब्रवीमि तदाचर
হে ভরতশ্রেষ্ঠ, এ বিষয়ে তোমার কখনও সংশয় যেন না থাকে। আমি যা বলি, তা অন্ধ ও জড়ের মতো নিঃসন্দেহে গ্রহণ করে সেই অনুযায়ী আচরণ করো।
Verse 23
अहिंसा सत्यमक्रोधो दानमेतच्चतुष्टयम् । अजातकशत्रो सेवस्व धर्म एब सनातन:,अजातशत्रो! अंहिसा, सत्य, अक्रोध और दान--इन चारोंका सदा सेवन करो। यह सनातन धर्म है
হে অজাতশত্রু, অহিংসা, সত্য, অক্রোধ ও দান—এই চারটিই সর্বদা পালন করো। এটাই সনাতন ধর্ম।
Verse 24
ब्राह्मणेषु च वृत्तिया पितृपैतामहोचिता । तामन्वेहि महाबाहो धर्मस्यैते हि देशिका:
হে মহাবাহু, ব্রাহ্মণদের প্রতি তোমার পিতা-পিতামহদের যে চিরাচরিত আচরণ ছিল, তুমিও তাই অনুসরণ করো; কারণ ব্রাহ্মণরাই ধর্মের উপদেশক ও পথপ্রদর্শক।
Verse 25
प्रमाणमप्रमाणं वै यः: कुर्यादबुधो जन: । नस प्रमाणतामहों विवादजननो हि स:,जो मूर्ख मनुष्य प्रमाणको भी अप्रमाण बनाता है, उसकी बातको प्रामाणिक नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वह केवल विवाद करनेवाला है
যে মূর্খ ব্যক্তি প্রমাণকে অপ্রমাণ করে তোলে, তার কথা প্রামাণ্য বলে গ্রহণ করা উচিত নয়; কারণ সে প্রকৃতপক্ষে পথপ্রদর্শক নয়, কেবল বিবাদ সৃষ্টিকারী।
Verse 26
ब्राह्मणानेव सेवस्व सत्कृत्य बहुमन्य च । एतेष्वेव त्विमे लोका: कृत्स्ना इति निबोध तान्
শুধু ব্রাহ্মণদেরই সেবা কর—যথোচিত সম্মান-সত্কার করে এবং গভীর মর্যাদা দিয়ে। ভালো করে জেনে রাখো, এই সমস্ত লোকসমূহ সম্পূর্ণরূপে তাঁদেরই উপর প্রতিষ্ঠিত।
Verse 27
युधिछिर उवाच ये च धर्ममसूयन्ते ये चैनं पर्युपासते । ब्रवीतु मे भवानेतत् क्व ते गच्छन्ति तादृूशा:
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! যারা ধর্মকে নিন্দা করে এবং যারা ধর্মকে পালন করে তার সেবা করে—এমন লোকেরা মৃত্যুর পরে কোন কোন লোক লাভ করে? অনুগ্রহ করে আমাকে বলুন।
Verse 28
भीष्म उवाच रजसा तमसा चैव समवस्तीर्णचेतस: । नरकं प्रतिपद्यन्ते धर्मविद्वेषिणो जना:
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! যাদের চিত্ত রজস ও তমসে আচ্ছন্ন, এবং সেই কারণেই যারা ধর্মকে ঘৃণা করে—তারা নরকে পতিত হয়।
Verse 29
ये तु धर्म महाराज सततं पर्युपासते । सत्यार्जवपरा: सन्तस्ते वै स्वर्गभुजो नरा:,महाराज! जो सत्य और सरलतामें तत्पर होकर सदा धर्मका पालन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकका सुख भोगते हैं
ভীষ্ম বললেন—মহারাজ! যারা সত্য ও সরলতায় নিবিষ্ট থেকে সর্বদা ধর্মকে পালন ও সেবা করে, সেই সজ্জনরা স্বর্গলোকের সুখ ভোগ করে।
Verse 30
धर्म एव गतिस्तेषामाचार्योपासनाद् भवेत् | देवलोकं प्रपद्यन्ते ये धर्म पर्युपासते,आचार्यकी सेवा करनेसे मनुष्योंको एकमात्र धर्मका ही सहारा रहता है और जो धर्मकी उपासना करते हैं, वे देवलोकमें जाते हैं
ভীষ্ম বললেন—আচার্যের নিষ্ঠাপূর্ণ সেবার দ্বারা তাদের একমাত্র আশ্রয় ও গতি হয় ধর্মই। যারা অবিচলভাবে ধর্মের উপাসনা করে, তারা দেবলোকে গমন করে।
Verse 31
मनुष्या यदि वा देवा: शरीरमुपताप्य वै | धर्मिण: सुखमेधन्ते लोभद्वेषविवर्जिता:,मनुष्य हों या देवता, जो शरीरको कष्ट देकर भी धर्माचरणमें लगे रहते हैं तथा लोभ और द्वेषका त्याग कर देते हैं, वे सुखी होते हैं
ভীষ্ম বললেন—মানুষ হোক বা দেবতা, যারা তপস্যা ও সংযমে দেহকে কষ্ট দিয়েও ধর্মাচরণে নিবিষ্ট থাকে এবং লোভ-দ্বেষ ত্যাগ করে, তারা সুখ ও কল্যাণে বৃদ্ধি পায়।
Verse 32
प्रथमं ब्रह्मण: पुत्र धर्ममाहुर्मनीषिण: । धर्मिण: पर्युपासन्ते फलं पक्वमिवाशय:
ভীষ্ম বললেন—জ্ঞানীরা ধর্মকে ব্রহ্মার প্রথমজ পুত্র বলেন। যেমন ভোক্তার মন পাকা ফলই বেশি চায়, তেমনি ধর্মনিষ্ঠেরা পরিণত ও ফলপ্রদ ধর্মকেই উপাসনা করে।
Verse 33
युधिछ्िर उवाच असतां कीदृशं रूपं साधव: किं च कुर्वते । ब्रवीतु मे भवानेतत् सनन््तो5सन्तश्न॒ कीदृशा:
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! অসাধুদের স্বভাব ও রূপ কেমন? সাধুরা কী কর্ম করে? সজ্জন ও দুর্জনের লক্ষণ কী? অনুগ্রহ করে আমাকে স্পষ্ট করে বলুন।
Verse 34
भीष्म उवाच दुराचाराश्र दुर्धर्षा दुर्मुखा श्वाप्पसाधव: । साधव: शीलसम्पन्ना: शिष्टाचारस्य लक्षणम्
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! দুষ্টেরা দুষ্কর্মপরায়ণ, নিষ্ঠুর, দমন করা কঠিন এবং কটু ভাষী—যেন হিংস্র পশুর মতো। কিন্তু সাধুরা শীলসম্পন্ন। এখন আমি শিষ্টাচারের লক্ষণ বলছি।
Verse 35
राजमार्गे गवां मध्ये धान्यमध्ये च धर्मिण: । नोपसेवन्ति राजेन्द्र सर्ग मूत्रपुरीषयो:,धर्मात्मा पुरुष सड़कपर, गौओंके बीचमें तथा खेतमें लगे हुए धान्यके भीतर मल- मूत्रका त्याग नहीं करते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে রাজশ্রেষ্ঠ! ধার্মিক মানুষ রাজপথে, গোরুর মধ্যে কিংবা দাঁড়ানো শস্যক্ষেতের ভিতরে মূত্র বা মল ত্যাগ করে না; এই সংযম জনসম্মান, জীবের প্রতি করুণা এবং অন্যের জীবিকার প্রতি শ্রদ্ধার চিহ্ন।
Verse 36
पञज्चानामशनं दत्त्वा शेषमश्नन्ति साधव: । न जल्पन्ति च भुज्जाना न निद्रान्त्याद्रपाणय:
ভীষ্ম বললেন—সাধুজন প্রথমে পাঁচজনের জন্য অন্ন নিবেদন করে—দেবতা, পিতৃগণ, ভূত-প্রাণী, অতিথি এবং নিজ গৃহস্থালি—তারপর অবশিষ্ট অন্ন গ্রহণ করে। তারা আহারের সময় অনর্থক কথা বলে না, আর ভেজা হাতে শয়নও করে না; এটাই নিত্যাচারের শৃঙ্খলা।
Verse 37
चित्रभानुमनड्वाहं देवं गोष्ठं चतुष्पथम् । ब्राह्मणं धार्मिकं वृद्ध ये कुर्वन्ति प्रदक्षिणम्
ভীষ্ম বললেন—যারা অগ্নি (চিত্রভানু), বলদ, দেবতা, গোশালা, চৌরাস্তা, ব্রাহ্মণ, ধার্মিক ব্যক্তি ও বৃদ্ধের প্রতি শ্রদ্ধায় প্রদক্ষিণ করে ডান দিক দিয়ে চলে, তারা পুণ্যবান সদাচারী বলে গণ্য; এটাই বিনয়রূপ ধর্মাচরণ।
Verse 38
वृद्धानां भारतप्तानां स्त्रीणां चक्रधरस्य च । ब्राह्मणानां गवां राज्ञां पन्थानं ददते च ये
ভীষ্ম বললেন—যারা বৃদ্ধদের, ভারবাহী ক্লান্ত মানুষদের, নারীদের, চক্রধারীকে (রথ/গাড়ির চালককে), এবং ব্রাহ্মণ, গোরু ও রাজাকে পথ ছেড়ে দেয়, তারা বিনয়ী সদাচারী বলে গণ্য; জনাচারও ধর্মই বটে।
Verse 39
अतिथीनां च सर्वेषां प्रेष्याणां स्वजनस्य च । तथा शरणकामानां गोप्ता स्यात् स्वागतप्रद:
ভীষ্ম বললেন—সৎপুরুষের উচিত সকল অতিথি, গৃহের সেবক, স্বজন এবং আশ্রয়প্রার্থী—এদের রক্ষক হওয়া ও যথাযোগ্যভাবে তাদের স্বাগত জানানো; যে পরাশ্রিতকে রক্ষা করে, সেই ধর্মাত্মা।
Verse 40
सायंप्रातर्मनुष्पयाणामशन देवनिर्मितम् । नान्तरा भोजन दृष्टमुपवासविधिहिं स:
ভীষ্ম বললেন—মানুষের জন্য দেবতারা আহারের বিধান করেছেন কেবল দুই সময়ে—প্রাতে ও সায়ংকালে। মাঝখানে আহারের কোনো বিধি দেখা যায় না। এই সংযম পালন করলে উপবাসেরই পুণ্য লাভ হয়। এই নীতির ভিতরে সংযত গৃহস্থের কর্তব্য—অতিথি, সেবক, স্বজন ও শরণাগত সকলের রক্ষা ও সাদর অভ্যর্থনা করা, যাতে ব্যক্তিগত আত্মসংযম সামাজিক দায়িত্বকে দৃঢ় করে।
Verse 41
होमकाले यथा वदह्नलि: कालमेव प्रतीक्षते । ऋतुकाले तथा नारी ऋतुमेव प्रतीक्षते,जैसे होमकालमें अग्निदेव होमकी ही प्रतीक्षा करते हैं, उसी प्रकार ऋतुकालमें स्त्री ऋतुकी ही प्रतीक्षा करती है
ভীষ্ম বললেন—যেমন হোমের নির্দিষ্ট কালে অগ্নি কেবল সেই যথাযথ মুহূর্তেরই অপেক্ষা করে, তেমনই ঋতুকালে নারীও কেবল নিজের ঋতুরই অপেক্ষা করে। এই বাক্য কাম ও মিলনকে যথাসময় ও যথাক্রমের শাসনে স্থাপন করে; সংযম ও শিষ্টাচারকে ধর্মের অঙ্গরূপে দেখায়।
Verse 42
नान्यदा गच्छते यस्तु ब्रह्मचर्य च तत् स्मृतम् । अमृतं ब्राह्मणा गाव इत्येतत् त्रयमेकत: । तस्माद् गोब्राद्मणं नित्यमर्चयेत यथाविधि
ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি ঋতুকাল ব্যতীত অন্য কোনো সময়ে নারীর কাছে যায় না, তার সেই আচরণকে ব্রহ্মচর্য বলা হয়। অমৃত, ব্রাহ্মণ ও গাভী—এই তিনটি এক উৎস থেকেই উদ্ভূত, এমনই ঘোষণা আছে। অতএব গাভী ও ব্রাহ্মণকে সর্বদা বিধিপূর্বক সম্মান ও পূজা করা উচিত।
Verse 43
स्वदेशे परदेशे वाप्यतिथिं नोपवासयेत् । कर्म वै सफल कृत्वा गुरूणां प्रतिपादयेत्
ভীষ্ম বললেন—নিজ দেশে হোক বা পরদেশে, কোনো অতিথিকে উপবাসী করে রাখা উচিত নয়। আর গুরুজন যে কাজের আদেশ দেন, তা সফলভাবে সম্পন্ন করে তাঁদের কাছে নিবেদন করে জানাতে হবে।
Verse 44
गुरुभ्यस्त्वासनं देयमभिवाद्याभिपूज्य च । गुरुम भ्यर्च्य वर्धन्ते आयुषा यशसा श्रिया
ভীষ্ম বললেন—গুরু আগমন করলে তাঁকে প্রণাম করে যথাবিধি সম্মান ও পূজা করে বসার জন্য আসন দিতে হবে। গুরুর সেবাপূজা করলে মানুষের আয়ু, যশ ও শ্রী বৃদ্ধি পায়।
Verse 45
वृद्धान् नाभिभवेज्जातु न चैतान् प्रेषयेदिति । नासीन: स्यात् स्थितेष्वेवमायुरस्य न रिष्यते
ভীষ্ম বললেন— বৃদ্ধদের কখনও অপমান বা দমন করবে না, আর তাদেরকে কাজের জন্য এদিক-ওদিক পাঠাবে না। তারা দাঁড়িয়ে থাকলে নিজে বসে থাকবে না। এভাবে চললে মানুষের আয়ু ক্ষয় হয় না।
Verse 46
न नग्नामीक्षते नारीं न नग्नान् पुरुषानपि | मैथुनं सततं गुप्तमाहारं च समाचरेत्,नंगी स्त्रीकी ओर न देखे, नग्न पुरुषोंकी ओर भी दृष्टिपात न करे। मैथुन और भोजन सदा एकान्त स्थानमें ही करे
ভীষ্ম বললেন— নগ্ন নারীর দিকে তাকাবে না, নগ্ন পুরুষদের দিকেও দৃষ্টি দেবে না। সহবাস এবং আহার সর্বদা একান্তে, লোকচক্ষুর আড়ালে, গোপনে করা উচিত।
Verse 47
तीर्थानां गुरवस्तीर्थ चोक्षाणां हृदयं शुचि । दर्शनानां परं ज्ञानं संतोष: परमं॑ सुखम्
তীর্থসমূহের মধ্যে শ্রেষ্ঠ তীর্থ হলেন গুরুজন; পবিত্র বস্তুর মধ্যে হৃদয়ই সর্বাধিক পবিত্র। দর্শনসমূহের মধ্যে পরমার্থ-তত্ত্বজ্ঞানই শ্রেষ্ঠ, আর সন্তোষই পরম সুখ।
Verse 48
सायं प्रातश्न वृद्धानां शृणुयात् पुष्कला गिर: । श्रुतमाप्रोति हि नर: सततं वृद्धसेवया
ভীষ্ম বললেন— সন্ধ্যায় ও প্রভাতে বৃদ্ধদের বলা প্রাচুর্যপূর্ণ উপদেশ মনোযোগ দিয়ে সম্পূর্ণ শুনতে হবে। কারণ বৃদ্ধসেবায় নিয়ত থাকলে মানুষ সত্যই শ্রুত—শাস্ত্রজ্ঞান—লাভ করে।
Verse 49
स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् | यच्छेद्वाड्मनसी नित्यमिन्द्रियाणि तथैव च,स्वाध्याय और भोजनके समय दाहिना हाथ उठाना चाहिये तथा मन, वाणी और इन्द्रियोंको सदा अपने अधीन रखना चहिये
ভীষ্ম বললেন— স্বাধ্যায় ও ভোজনের সময় ডান হাত যথাযথভাবে ব্যবহার করবে। আর বাক্ ও মনকে সর্বদা সংযত রাখবে, তদ্রূপ ইন্দ্রিয়গুলিকেও বশে রাখবে।
Verse 50
संस्कृतं पायसं नित्यं यवागूं कूसरं हवि: । अष्टका: पितृदैवत्या ग्रहाणामभिपूजनम्
ভীষ্ম বললেন—নিত্য উত্তমভাবে প্রস্তুত পায়স (ক্ষীর), যবাগূ (জাউ/খিচুড়ি), কূসর (হালুয়া সদৃশ) ও হবি (হবিষ্য) প্রভৃতি নিবেদন করে পিতৃদেবতার উদ্দেশ্যে অষ্টকা-শ্রাদ্ধ করা উচিত; এবং নবগ্রহেরও যথাবিধি পূজা করা উচিত।
Verse 51
श्मश्रुकर्मणि मड़ल्यं क्षुतानामभिनन्दनम् । व्याधितानां च सर्वेषामायुषामभिनन्दनम्
ভীষ্ম বললেন—গোঁফ-দাড়ি ছাঁটার সময় মঙ্গলসূচক বাক্য উচ্চারণ করা উচিত। যে হাঁচি দেয় তাকে ‘শতঞ্জীবী হও’ ইত্যাদি বলে আশীর্বাদ করতে হবে; আর যারা রোগাক্রান্ত, তাদের সকলকে দীর্ঘায়ুর শুভকামনা জানিয়ে অভিবাদন করতে হবে।
Verse 52
न जातु त्वमिति ब्रूयादापन्नो5पि महत्तरम् | त्वंकारो वा वधो वेति विद्वत्सु न विशिष्यते
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! মহাবিপদেও কোনো শ্রেষ্ঠ পুরুষকে ‘তুমি’ বলে সম্বোধন কোরো না। জ্ঞানীদের মতে ‘তুমি’ বলে অবমাননা করা আর বধ করা—এই দুইয়ের মধ্যে বিশেষ পার্থক্য নেই।
Verse 53
अवराणां समानानां शिष्याणां च समाचरेत् । पापमाचक्षते नित्यं हृदयं पापकर्मिण:
ভীষ্ম বললেন—যারা মর্যাদায় নীচে, যারা সমান, কিংবা যারা শিষ্য—তাদের ‘তুমি’ বলে সম্বোধন করলে দোষ হয় না। কিন্তু পাপকর্মী মানুষের হৃদয়ই নিত্য তার পাপ প্রকাশ করে দেয়।
Verse 54
ज्ञानपूर्वकृतं कर्म च्छादयन्ते हासाधव: । ज्ञानपूर्व विनश्यन्ति गूहमाना महाजने
ভীষ্ম বললেন—অসাধুরা জেনে-বুঝে করা পাপকর্মও অন্যের কাছ থেকে ঢাকতে চায়; কিন্তু মহাজনের সামনে তা গোপন রাখতে গিয়ে তারা অবশেষে বিনষ্ট হয়।
Verse 55
नमां मनुष्या: पश्यन्ति न मां पश्यन्ति देवता: । पापेनापिहित: पाप: पापमेवाभिजायते
ভীষ্ম বললেন— “পাপ করতে গেলে আমাকে না মানুষ দেখে, না দেবতারা দেখে।” এই ভেবে পাপে আচ্ছন্ন পাপাত্মা বারবার পাপই করে, আর শেষে পাপযোনিতেই জন্ম লাভ করে।
Verse 56
यथा वार्धुषिको वृद्धि दिनभेदे प्रतीक्षते । धर्मेण पिहित॑ पापं धर्ममेवाभिवर्धयेत्
যেমন সুদখোর দিন দিন সুদের বৃদ্ধি অপেক্ষা করে, তেমনই পাপও কালের সঙ্গে বাড়তে থাকে; কিন্তু সেই পাপকে যদি ধর্ম দিয়ে ঢেকে সংযত করা যায়, তবে তা ধর্মকেই বৃদ্ধি করে।
Verse 57
यथा लवणमम्भोभिराप्लुतं प्रविलीयते । प्रायश्षित्तहतं पापं तथा सद्यः प्रणश्यति,जैसे नमककी डली जलमें डालनेसे गल जाती है, उसी प्रकार प्रायश्चित्त करनेसे तत्काल पापका नाश हो जाता है
যেমন জলে ডুবলে লবণের দলা গলে যায়, তেমনই প্রায়শ্চিত্তে আঘাতপ্রাপ্ত পাপ তৎক্ষণাৎ বিনষ্ট হয়।
Verse 58
तस्मात् पापं न गूहेत गूहमानं विवर्धयेत् । कृत्वा तत् साधुष्वाख्येयं ते तत् प्रशमयन्त्युत
অতএব পাপ গোপন করা উচিত নয়; গোপন পাপই বৃদ্ধি পায়। যদি কখনও পাপ ঘটে যায়, তবে তা সাধুজনের কাছে স্বীকার করা উচিত; তাঁরা তার প্রশমন করেন।
Verse 59
आशगया संचितं द्रव्यं कालेनैवोपभुज्यते । अन््ये चैतत् प्रपद्यन्ते वियोगे तस्य देहिन:
আশায় সঞ্চিত ধন প্রকৃতপক্ষে কালই ভোগ করে; দেহধারীর দেহত্যাগ হলে সেই ধন অন্যের হাতে চলে যায়।
Verse 60
मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिण: । तस्मात् सर्वाणि भूतानि धर्ममेव समासते,मनीषी पुरुष धर्मको समस्त प्राणियोंका हृदय कहते हैं। अतः समस्त प्राणियोंको धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये
মনীষীগণ বলেন, ধর্মই সকল জীবের মন ও অন্তঃকরণ। অতএব সকল প্রাণীর উচিত একমাত্র ধর্মকেই আশ্রয় করা—চিন্তা, নির্বাচন ও আচরণের ভিত্তি হিসেবে।
Verse 61
एक एव चरेद् धर्म न धर्मध्वजिको भवेत् | धर्मवाणिजका होते ये धर्ममुपभुज्जते
মানুষের উচিত, একা হলেও ধর্মাচরণ করা; কিন্তু ধর্মকে পতাকা করে প্রদর্শনকারী (ধর্মধ্বজী) হওয়া নয়। যারা লাভের জন্য ধর্মকে ‘ভোগ’ করে, ধর্মের নামে জীবিকা চালায়—তারা ধর্মের ব্যবসায়ী মাত্র।
Verse 62
अर्चेद् देवानदम्भेन सेवेतामायया गुरून् । निर्धि निदध्यात् पारत्र्यं यात्रार्थ दानशब्दितम्
দম্ভ ত্যাগ করে দেবতাদের পূজা করুক; ছল-কপট বর্জন করে গুরুজন ও বয়োজ্যেষ্ঠদের সেবা করুক। আর পরলোকযাত্রার জন্য ‘দান’ নামে এক ধন সঞ্চয় করুক—অর্থাৎ পরলৌকিক মঙ্গলের উদ্দেশ্যে উদারভাবে দান করুক।
Verse 73
तत्परेणैव नान्येन शक््यं होतस्य दर्शनम् । किंतु वे बालक हैं। अहंकारवश अपनेको पण्डित मानते हैं। अतः वे जो पूर्वोक्त निश्चय करते हैं
সেই পরম তত্ত্বের দর্শন একাগ্র নিবেদন ছাড়া অন্য কোনো উপায়ে সম্ভব নয়। কেবল ইন্দ্রিয়-প্রত্যক্ষের জোরে সত্য নির্ণয় সর্বত্র যুক্তিসঙ্গত নয়; যেমন আকাশের নীলিমা প্রত্যক্ষে দেখা গেলেও শেষ পর্যন্ত তা মিথ্যা প্রতীয়মান। অতএব ধর্ম, ঈশ্বর ও পরলোক প্রভৃতি বিষয়ে শাস্ত্র-প্রমাণই সর্বোচ্চ, কারণ অন্য জ্ঞান-উপায় সেখানে পৌঁছাতে পারে না। আর যদি কেউ জিজ্ঞাসা করে—ব্রহ্ম একাই কীভাবে জগতের কারণ হতে পারে—তবে উত্তর এই: আলস্য ত্যাগ করে দীর্ঘকাল যোগাভ্যাস করুক, তত্ত্ব-সাক্ষাৎকারের জন্য নিরন্তর সাধনায় রত থাকুক, এবং ন্যায়পথে জীবনধারণ করতে করতে অগ্রসর হোক; এমন অবিরাম প্রয়াসী সাধকই সেই তত্ত্বকে প্রত্যক্ষ করতে পারে, অন্য কেউ নয়।
Verse 162
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि धर्मप्रमाणकथने द्विषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ধর্ম-প্রমাণকথন বিষয়ক একশো বাষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।