Adhyaya 54
Anushasana ParvaAdhyaya 5450 Verses

Adhyaya 54

Cyavana’s Yogic Display and Kuśika’s Recognition of Tapas (च्यवन-योगप्रभावः कुशिकस्य तपःप्रशंसा च)

Upa-parva: Tapas–Brahmarṣi-Prabhāva Episode (Kuśika–Cyavana Narrative Unit)

Bhīṣma narrates how King Kuśika, awakening at night’s end and completing morning observances, proceeds with his wife toward a forest by the Gaṅgā. He beholds an extraordinary, palace-like vision: golden structures with jeweled pillars, landscaped hills, lotus ponds, ornamental gateways, and abundant flowering trees. The environment includes refined comforts—seats, beds, coverings, food and drink—and a soundscape of birds and sweet singing, with occasional sightings of gandharvas and apsarases. The king doubts whether the experience is dream, delusion, or reality. He then perceives the sage Cyavana reclining in a radiant aerial/palatial setting; when approached, Cyavana and the scene vanish, reappearing elsewhere with the sage seated in ascetic posture, engaged in japa. Through yogabala, the sage repeatedly manifests and withdraws the entire spectacle, and the riverbank returns to its prior, ordinary condition. Astonished, Kuśika praises tapas as superior even to universal dominion, extolling Cyavana’s capacity and the rarity of true brahminical power. Summoned, the king approaches, bows, and is welcomed; Cyavana commends Kuśika’s restraint over the senses and offers a boon. Kuśika declares the sage’s satisfaction itself as the chief boon, then raises a remaining doubt for clarification, setting up the subsequent instruction.

Chapter Arc: दानधर्म के उपाख्यान में राजा नहुष शौच-आचमन कर, अंजलि बाँध, महात्मा च्यवन के सम्मुख आत्म-परिचय देकर विनयपूर्वक उपस्थित होता है—राजा का तेज और ऋषि का तप एक ही क्षण में आमने-सामने आ खड़े होते हैं। → नहुष पूछता है—‘द्विजश्रेष्ठ! मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’ पुरोहित भी सत्यव्रती, देवकल्प च्यवन की विधिवत् अर्चना करता है। संतोष का उपाय खोजते हुए दान का प्रश्न उभरता है: ब्राह्मण और गौ—दोनों की मर्यादा, मूल्य और ‘अप्रतिग्रह’ की सीमा क्या है? → उपाख्यान का तीखा बिंदु तब आता है जब ‘कैवर्त’ (मल्लाह) गौ अर्पित करते हैं और ऋषि कहते हैं—‘मैं तुम्हारी दी हुई धेनु स्वीकार करता हूँ; तुम मत्स्यों सहित शीघ्र स्वर्ग जाओ।’ यहाँ दान की शक्ति, दाता की जाति/वृत्ति, और ग्रहणकर्ता की तप-प्रतिष्ठा—तीनों का धर्म-निर्णय एक साथ उद्घाटित होता है। → कथा-प्रवक्ता (भीष्म) युधिष्ठिर से कहता है कि तुम्हारे प्रश्न के अनुसार यह प्रसंग—गौ-दान की महिमा और धर्म-विनिश्चय—कह दिया गया; अर्थात् दान का फल दाता की श्रद्धा और विधि से पुष्ट होता है, केवल सामाजिक श्रेणी से नहीं। → इसी बीच ‘गाय के पेट से उत्पन्न’ एक अन्य वनवासी मुनि (फल-मूलाहारी) नहुष के पास आते हैं और द्विजसत्तम राजा से संवाद आरम्भ करते हैं—अगले प्रसंग में नया धर्म-सूत्र खुलने का संकेत।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवनमुनिका उपाख्यानविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५० ॥ एकपज्चाशत्तमो< ध्याय: राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना, मुनिके द्वारा गौओंका माहात्म्य-कथन तथा मत्स्यों और मल्लाहोंकी सदगति भीष्म उवाच नहुषस्तु ततः श्र॒त्वा च्यवनं त॑ं तथागतम्‌ । त्वरित: प्रययौ तत्र सहामात्यपुरोहित:,भीष्मजी कहते हैं--भरतनन्दन! च्यवनमुनिको ऐसी अवस्थामें अपने नगरके निकट आया जान राजा नहुष अपने पुरोहित और मन्त्रियोंको साथ ले शीघ्र वहाँ आ पहुँचे

ভীষ্মে ক’লে—হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! চ্যৱন মুনি তেনে অৱস্থাত ওচৰলৈ আহিছে বুলি শুনি ৰজা নহুষে মন্ত্ৰী আৰু পুৰোহিতসহ তৎক্ষণাৎ তাত উপস্থিত হ’ল।

Verse 2

शौचं कृत्वा यथान्यायं प्राज्जलि: प्रयतो नृप: । आत्मानमाचचक्षे च च्यवनाय महात्मने,उन्होंने पवित्रभावसे हाथ जोड़कर मनको एकाग्र रखते हुए न्‍्यायोचित रीतिसे महात्मा च्यवनको अपना परिचय दिया

যথানিয়মে শৌচ সম্পন্ন কৰি, কৰযোৰে আৰু সংযতচিত্তে সেই নৃপতিয়ে মহাত্মা চ্যৱনৰ ওচৰত নিজৰ পৰিচয় দিলে।

Verse 3

अर्चयामास तं चापि तस्य राज्ञ: पुरोहित: । सत्यव्रतं महात्मानं देवकल्पं विशाम्पते,प्रजानाथ! राजाके पुरोहितने देवताओंके समान तेजस्वी सत्यव्रती महात्मा च्यवनमुनिका विधिपूर्वक पूजन किया

হে প্ৰজানাথ! সেই ৰজাৰ পুৰোহিতেও সত্যব্ৰতী, দেৱসদৃশ তেজস্বী মহাত্মা চ্যৱন মুনিক বিধিপূৰ্বক পূজা কৰিলে।

Verse 4

नहुष उवाच करवाणि प्रियं कि ते तन्‍मे ब्रूहि द्विजोत्तम । सर्व कर्तास्मि भगवन्‌ यद्यपि स्यात्‌ सुदुष्करम्‌

নহুষে ক’লে—হে দ্বিজোত্তম! আপোনাৰ প্ৰিয় কোন সেৱা মই কৰোঁ? সেয়া মোক কওক। ভগৱন, সেয়া অতি দুৰূহ হ’লেও মই সকলো কৰিবলৈ সাজু।

Verse 5

तत्पश्चात्‌ राजा नहुष बोले--द्विजश्रेष्ठ! बताइये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? भगवन्‌! आपकी आज्ञासे कितना ही कठिन कार्य क्‍यों न हो, मैं सब पूरा करूँगा ।। च्यवन उवाच श्रमेण महता युक्ता: कैवर्ता मत्स्यजीविन: । मम मूल्यं प्रयच्छैभ्यो मत्स्यानां विक्रयैः सह,च्यवनने कहा--राजन्‌! मछलियोंसे जीविका चलानेवाले इन मल्लाहोंने आज बड़े परिश्रमसे मुझे अपने जालमें फँसाकर निकाला है; अत: आप इन्हें इन मछलियोंके साथ- साथ मेरा भी मूल्य चुका दीजिये

চ্যৱনে ক’লে—হে ৰাজন! মাছ ধৰি জীৱিকা কৰা এই কৈৱৰ্তসকলে মহাশ্ৰমে নিজৰ জালত মোক ধৰি বাহিৰলৈ টানি আনিছে। সেয়ে এই মাছৰ বিক্ৰয়মূল্যৰ সৈতে মোৰো যথোচিত মূল্য তেওঁলোকক দিয়া।

Verse 6

नह॒ष उवाच सहस्र॑ं दीयतां मूल्यं निषादेभ्य: पुरोहित | निष्क्रयार्थे भगवतो यथा55ह भृगुनन्दन:,तब नहुषने अपने पुरोहितसे कहा--पुरोहितजी! भृगुनन्दन च्यवनजी जैसी आज्ञा दे रहे हैं, उसके अनुसार इन पूज्यपाद महर्षिके मूल्यके रूपमें मल्‍लाहोंको एक हजार अशर्फियाँ दे दीजिये

নহুষে নিজৰ পুৰোহিতক ক’লে—পুৰোহিত! ভৃগুনন্দনে যিদৰে কৈছে, ভগৱানৰ নিষ্ক্ৰয়াৰ্থে নিষাদসকলক মূল্যস্বৰূপে এক হাজাৰ মুদ্ৰা দিয়া।

Verse 7

च्यवन उवाच सहस्रन॑ नाहमहामि किं वा त्वं मन्‍्यसे नृप । सदृशं दीयतां मूल्यं स्वबुद्ध्या निश्चयं कुरु,च्यवनने कहा--नरेश्वर! मैं एक हजार मुद्राओंपर बेचने योग्य नहीं हूँ। क्या आप मेरा इतना ही मूल्य समझते हैं, मेरे योग्य मूल्य दीजिये और वह मूल्य कितना होना चाहिये--यह अपनी ही बुद्धिसे विचार करके निश्चित कीजिये

চ্যৱনে ক’লে—হে নৰেশ্বৰ! মই এক হাজাৰ মুদ্ৰাত ক্ৰয়যোগ্য নহয়। তুমি কি মোৰ মূল্য ইমানেই ভাবিছা? মোৰ যোগ্য মূল্য দিয়া; সেয়া কিমান হ’ব লাগে, নিজৰ বুদ্ধিৰে বিচাৰ কৰি স্থিৰ কৰা।

Verse 8

नहुष उवाच सहस्राणां शतं विप्र निषादेभ्य: प्रदीयताम्‌ । स्यादिदं भगवन्‌ मूल्यं कि वान्यन्मन्यते भवान्‌

নহুষে ক’লে—হে বিপ্ৰ! এক হাজাৰৰ ভিতৰত শত মুদ্ৰা নিষাদসকলক দিয়া হওক। ভগৱন, এইয়েই মূল্য হওক; নতুবা আপুনি আন কোন ব্যৱস্থা যথাযথ মনে কৰে?

Verse 9

नहुष बोले--विप्रवर! इन निषादोंको एक लाख मुद्रा दीजिये। (यों पुरोहितको आज्ञा देकर वे मुनिसे बोले--) भगवन्‌! क्या यह आपका उचित मूल्य हो सकता है या अभी आप कुछ और देना चाहते हैं? ।। च्यवन उवाच नाहं शतसहस्त्रेण निमेय: पार्थिवर्षभ । दीयतां सदृशं मूल्यममात्यै:ः सह चिन्तय,च्यवनने कहा--नृपश्रेष्ठ! मुझे एक लाख रुपयेके मूल्यमें ही सीमित न कीजिये। उचित मूल्य चुकाइये। इस विषयमें अपने मन्त्रियोंक साथ विचार कीजिये

নহুষ ক’লে—“বিপ্ৰবৰ! এই নিষাদসকলক এক লক্ষ মুদ্ৰা দিয়া।” (পুৰোহিতক আজ্ঞা দি মুনিক ক’লে—) “ভগৱন! এইটোৱেই কি আপোনাৰ যথোচিত মূল্য, নে আপুনি আৰু কিবা দিবলৈ ইচ্ছা কৰে?” চ্যৱন ক’লে—“নৃপশ্ৰেষ্ঠ! মোক কেৱল এক লক্ষত মাপি নাথাকিবা। যি উপযুক্ত প্ৰতিদান, সেয়াই দিয়া; মন্ত্ৰীসকলৰ সৈতে পৰামৰ্শ কৰি স্থিৰ কৰা।”

Verse 10

नहुष उवाच कोटि: प्रदीयतां मूल्यं निषादेभ्य: पुरोहित । यदेतदपि नो मूल्यमतो भूय: प्रदीयताम्‌,नहुषने कहा--पुरोहितजी! आप इन निषादोंको एक करोड़ मुद्रा मूल्यके रूपमें दीजिये और यदि यह भी ठीक मूल्य न हो तो और अधिक दीजिये

নহুষ ক’লে—“পুৰোহিত! এই নিষাদসকলক মূল্য হিচাপে এক কোটি মুদ্ৰা দিয়া। আৰু যদি এইটোও যথেষ্ট নহয়, তেন্তে ইয়াতকৈও অধিক দিয়া।”

Verse 11

च्यवन उवाच राजन्‌ नाहंम्यहं कोटिं भूयो वापि महाद्युते । सदृशं दीयतां मूल्यं ब्राह्मणैः सह चिन्तय,च्यवनने कहा--महातेजस्वी नरेश। मैं एक करोड़ या उससे भी अधिक मुद्राओंमें बेचने योग्य नहीं हूँ। जो मेरे लिये उचित हो वही मूल्य दीजिये और इस विषयमें ब्राह्मणोंके साथ विचार कीजिये

চ্যৱন ক’লে—“হে ৰাজন, হে মহাতেজস্বী! মই এক কোটি—বা তাতকৈও অধিক—মুদ্ৰাত বিক্ৰেয় নহয়। মোৰ বাবে যি উপযুক্ত, সেই প্ৰতিদান দিয়া; ব্ৰাহ্মণসকলৰ সৈতে পৰামৰ্শ কৰা।”

Verse 12

नहुष उवाच अर्ध राज्यं समग्रं वा निषादेभ्य: प्रदीयताम्‌ | एतन्मूल्यमहं मन्ये कि वान्यन्मन्यसे द्विज,नहुष बोले--ब्रह्मन्‌! यदि ऐसी बात है तो इन मल्लाहोंको मेरा आधा या सारा राज्य दे दिया जाय। इसे ही मैं आपके लिये उचित मूल्य मानता हूँ। आप इसके अतिरिक्त और क्या चाहते हैं?

নহুষ ক’লে—“হে ব্ৰাহ্মণ! যদি তেনেহ’লে এই নিষাদসকলক মোৰ অর্ধ ৰাজ্য—বা সমগ্ৰ ৰাজ্য—দিয়া হওক। মই ইয়াকেই আপোনাৰ যথোচিত মূল্য বুলি মানো। হে দ্বিজ, ইয়াৰ বাহিৰে আপুনি আৰু কি ভাবে?”

Verse 13

च्यवन उवाच अर्ध राज्यं समग्र च मूल्यं नाहामि पार्थिव । सदृशं दीयतां मूल्यमृषिभि: सह चिन्त्यताम्‌,च्यवनने कहा--पृथ्वीनाथ! आपका आधा या सारा राज्य भी मेरा उचित मूल्य नहीं है। आप उचित मूल्य दीजिये और वह मूल्य आपके ध्यानमें न आता हो तो ऋषियोंके साथ विचार कीजिये

চ্যৱন ক’লে—“হে পৃথ্বীনাথ! আপোনাৰ অর্ধ ৰাজ্য বা সমগ্ৰ ৰাজ্যও মোৰ যথোচিত মূল্য নহয়। উপযুক্ত প্ৰতিদান দিয়া; আৰু যদি তাৰ মাপ আপোনাৰ মনলৈ নাহে, তেন্তে ঋষিসকলৰ সৈতে পৰামৰ্শ কৰি স্থিৰ কৰা।”

Verse 14

भीष्म उवाच महर्षेरवचनं श्रुत्वा नहुषो दुःखकर्शित: । स चिन्तयामास तदा सहामात्यपुरोहित:,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! महर्षिका यह वचन सुनकर राजा नहुष दुःखसे कातर हो उठे और मन्त्री तथा पुरोहितके साथ इस विषयमें विचार करने लगे

ভীষ্মে ক’লে—মহৰ্ষিৰ বাক্য শুনি দুখে কাতৰ হোৱা ৰজা নহুষ অতি ব্যাকুল হৈ উঠিল। তেতিয়া তেওঁ মন্ত্ৰীসকল আৰু কুল-পুৰোহিতৰ সৈতে মিলি কি কৰা উচিত সেই বিষয়ে চিন্তা-পরামৰ্শ কৰিবলৈ ধৰিলে।

Verse 15

तत्र त्वन्यो वनचर: कश्चिन्मूलफलाशन: । नहुषस्य समीपस्थो गविजातो5भवन्मुनि:

ভীষ্মে ক’লে—তাত আন এজন বনচাৰী, যি মূল-ফল খাই তপস্যা কৰিছিল, নহুষৰ ওচৰতে এজন মুনি গোৰূপে জন্ম ল’লে।

Verse 16

तोषयिष्याम्यहं क्षिप्रं यथा तुष्टो भविष्यति,“राजन! ये मुनि कैसे संतुष्ट होंगे--इस बातको मैं जानता हूँ। मैं इन्हें शीघ्र संतुष्ट कर दूँगा। मैंने कभी हँसी-परिहासमें भी झूठ नहीं कहा है; फिर ऐसे समयमें असत्य कैसे बोल सकता हूँ? मैं आपसे जो कहूँ, वह आपको नि:शंक होकर करना चाहिये”

“মই সোনকালে তেওঁলোকক এনেদৰে সন্তুষ্ট কৰিম যে তেওঁলোক প্ৰসন্ন হ’ব।”

Verse 17

नाहं मिथ्यावचो ब्रूयां स्वैरेष्वपि कुतो5न्यथा । भवतो यदहं ब्रूयां तत्कार्यममविशंकया,“राजन! ये मुनि कैसे संतुष्ट होंगे--इस बातको मैं जानता हूँ। मैं इन्हें शीघ्र संतुष्ट कर दूँगा। मैंने कभी हँसी-परिहासमें भी झूठ नहीं कहा है; फिर ऐसे समयमें असत्य कैसे बोल सकता हूँ? मैं आपसे जो कहूँ, वह आपको नि:शंक होकर करना चाहिये”

“ৰাজন! মই স্বচ্ছন্দ বিনোদতো মিছা কথা নকওঁ; তেন্তে এনে সময়ত অসত্য কেনেকৈ ক’ম? মই যি ক’ম, সেয়া আপুনি নিঃসন্দেহে পালন কৰক।”

Verse 18

नहुष उवाच ब्रवीतु भगवान्‌ मूल्यं महर्षे: सदृशं भूगो: । परित्रायस्व मामस्मद्विषयं च कुलं च मे,नहुषने कहा--भगवन्‌! आप मुझे भृगुपुत्र महर्षि च्यवनका मूल्य, जो इनके योग्य हो बता दीजिये और ऐसा करके मेरा, मेरे कुलका तथा समस्त राज्यका संकटसे उद्धार कीजिये

নহুষে ক’লে—“ভগৱন! ভৃগুবংশীয় মহৰ্ষিৰ যোগ্য যি মূল্য, সেয়া কওক। তেনে কৰি মোক, মোৰ ৰাজ্যক আৰু মোৰ কুলক এই বিপদৰ পৰা উদ্ধাৰ কৰক।”

Verse 19

हन्याद्धि भगवान्‌ क्रुद्धस्त्रलोक्यमपि केवलम्‌ | किं पुनर्मा तपोहीनं बाहुवीर्यपरायणम्‌

ভগৱান ক্ৰুদ্ধ হ’লে একাই ত্ৰিলোকো ধ্বংস কৰিব পাৰে; তেন্তে তপোবলহীন আৰু কেৱল বাহুবলত নিৰ্ভৰ কৰা মোৰ দৰে জনক বিনাশ কৰা তেওঁৰ বাবে কিমানেই বা কঠিন?

Verse 20

ये भगवान्‌ च्यवन मुनि यदि कुपित हो जायँ तो तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर सकते हैं; फिर मुझ-जैसे तपोबलशून्य केवल बाहुबलका भरोसा रखनेवाले नरेशको नष्ट करना इनके लिये कौन बड़ी बात है? ।। अगाधाम्भसि मग्नस्य सामात्यस्य सऋत्विज: । प्लवो भव महर्षे त्वं कुरु मूल्यविनिश्चयम्‌,महर्षे! मैं अपने मन्त्री और पुरोहितके साथ संकटके अगाध महासागरमें डूब रहा हूँ। आप नौका बनकर मुझे पार लगाइये। इनके योग्य मूल्यका निर्णय कर दीजिये

নহুষে ক’লে—“পূজ্য মুনি চ্যৱন ক্ৰুদ্ধ হ’লে তিনিও লোক জ্বলাই ভস্ম কৰিব পাৰে; তেন্তে তপোবলহীন আৰু কেৱল বাহুবলত ভৰসা কৰা মোৰ দৰে ৰজাক ধ্বংস কৰা তেওঁৰ বাবে কিমানেই বা ডাঙৰ কথা? মই মোৰ মন্ত্ৰীসকল আৰু ঋত্বিজ পুৰোহিতসহ বিপদৰ অগাধ সাগৰত ডুবি আছোঁ। হে মহর্ষি! আপুনি নাও হৈ মোক পাৰ কৰাওক; উপযুক্ত প্ৰতিদানৰ সিদ্ধান্ত কৰক।”

Verse 21

भीष्म उवाच नहुषस्य वच: श्रुत्वा गविजात: प्रतापवान्‌ । उवाच हर्षयन्‌ सर्वानमात्यान्‌ पार्थिवं च तम्‌,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! नहुषकी बात सुनकर गायके पेटसे उत्पन्न हुए वे प्रतापी महर्षि राजा तथा उनके समस्त मन्त्रियोंको आनन्दित करते हुए बोले--

ভীষ্মে ক’লে—ৰাজন! নহুষৰ কথা শুনি, গাভীৰ গৰ্ভজাত সেই প্ৰতাপৱান মহর্ষিয়ে সেই ৰজা আৰু সকলো মন্ত্ৰীক আনন্দিত কৰি ক’লে।

Verse 22

(ब्राह्मणानां गवां चैव कुलमेकं द्विधा कृतम्‌ । एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति हविरन्यत्र तिष्ठतति ।।) अनर्घेया महाराज द्विजा वर्णेषु चोत्तमा: । गावश्व पुरुषव्याप्र गौर्मूल्यं परिकल्प्यताम्‌,“महाराज! ब्राह्मणों और गौओंका कुल एक है, पर ये दो रूपोंमें विभक्त हो गये हैं। एक जगह मन्त्र स्थित होते हैं और दूसरी जगह हविष्य। पुरुषसिंह! ब्राह्मण सब वर्णोमें उत्तम हैं। उनका और गौओंका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता; इसलिये आप इनकी कीमतमें एक गौ प्रदान कीजिये”

“মহারাজ! ব্ৰাহ্মণ আৰু গোৰ কুল একেই, কিন্তু সেয়া দুটা ৰূপত বিভক্ত—এঠাইত মন্ত্র থাকে, আন ঠাইত হৱিস (যজ্ঞাহুতি) থাকে। ৰাজন! দ্বিজসকল বৰ্ণসমূহৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ আৰু অমূল্য; আৰু গোৰাও, হে পুৰুষব্যাঘ্ৰ, মূল্যাতীত। সেয়ে সন্মান-চিহ্নৰূপে এটা গোকেই ‘মূল্য’ নিৰ্ধাৰণ কৰক।”

Verse 23

महर्षि च्यवनका मूल्याड्कन नहुषस्तु ततः श्रुत्वा महर्षेवचनं नृप । हर्षेण महता युक्त: सहामात्यपुरोहितः,“नरेश्वर! महर्षिका यह वचन सुनकर मन्त्री और पुरोहितसहित राजा नहुषको बड़ी प्रसन्नता हुई

হে নৰেশ্বৰ! মহর্ষিৰ এই বাক্য শুনি, মন্ত্ৰী আৰু পুৰোহিতসহ ৰজা নহুষ মহা হর্ষেৰে পৰিপূৰ্ণ হ’ল।

Verse 24

अभिगम्य भृगो: पुत्र च्यवनं संशितव्रतम्‌ । इदं प्रोवाच नृपते वाचा संतर्पयज्निव,राजन! वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले भृगुपुत्र महर्षि च्यवनके पास जाकर उन्हें अपनी वाणीद्वारा तृप्त करते हुए-से बोले

ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! ভৃগুৰ পুত্ৰ, কঠোৰ ব্ৰতত দৃঢ় মহৰ্ষি চ্যৱনৰ ওচৰলৈ গৈ, যেন শ্ৰদ্ধাভৰা মধুৰ বাক্যৰে তেওঁক সন্তুষ্ট কৰে, তেনে কৰি এই কথা ক’লে।

Verse 25

नहुष उवाच उत्तिषोत्तिष्ठ विप्रर्षे गवा क्रीतोडसि भार्गव । एतन्मूल्यमहं मनन्‍्ये तव धर्मभूतां वर,नहुषने कहा--धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्ष! भूगुनन्दन! मैंने एक गौ देकर आपको खरीद लिया; अतः उठिये, उठिये, मैं यही आपका उचित मूल्य मानता हूँ

নহুষে ক’লে—উঠা, উঠা, বিপ্ৰর্ষে! হে ভার্গৱ! এটা গাই দি মই তোমাক কিনিছোঁ; ধৰ্মাত্মাসকলৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ, এইটোকেই মই তোমাৰ যোগ্য মূল্য বুলি মানোঁ।

Verse 26

व्यवन उवाच उत्तिष्ठाम्येष राजेन्द्र सम्यक्‌ क्रीतो5स्मि तेडनघ । गोभिस्तुल्यं न पश्यामि धनं किंचिदिहाच्युत,च्यवनने कहा--निष्पाप राजेन्द्र! अब मैं उठता हूँ। आपने उचित मूल्य देकर मुझे खरीदा है। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले नरेश! मैं इस संसारमें गौओंके समान दूसरा कोई धन नहीं देखता हूँ

চ্যৱনে ক’লে—হে নিষ্পাপ ৰাজেন্দ্ৰ! মই এতিয়া উঠিছোঁ। তুমি যথোচিত মূল্য দি মোক কিনিছা। মৰ্যাদাৰ পৰা কেতিয়াও নচ্যুত হোৱা নৰেশ! এই জগতত গাইৰ সমান আন কোনো ধন মই নেদেখোঁ।

Verse 27

कीर्तन श्रवर्णं दान॑ दर्शनं चापि पार्थिव | गवां प्रशस्यते वीर सर्वपापहरं शिवम्‌,वीर भूपाल! गौओंके नाम और गुणोंका कीर्तन तथा श्रवण करना, गौओंका दान देना और उनका दर्शन करना--इनकी शाम्त्रोंमें बड़ी प्रशंसा की गयी है। ये सब कार्य सम्पूर्ण पापोंको दूर करके परम कल्याणकी प्राप्ति करानेवाले हैं

হে বীৰ পাৰ্থিৱ! গাইৰ নাম-গুণৰ কীৰ্তন আৰু শ্ৰৱণ, গোদান আৰু গোদৰ্শন—এই সকলোকে শাস্ত্ৰত বিশেষভাৱে প্ৰশংসা কৰা হৈছে। এই কৰ্মসমূহে সকলো পাপ হৰণ কৰি পৰম মঙ্গল প্ৰদান কৰে বুলি কোৱা হৈছে।

Verse 28

गावो लक्ष्म्या: सदा मूलं गोषु पाप्मा न विद्यते । अन्नमेव सदा गावो देवानां परमं हवि:,गौएँ सदा लक्ष्मीकी जड़ हैं। उनमें पापका लेशमात्र भी नहीं है। गौएँ ही मनुष्योंको सर्वदा अन्न और देवताओंको हविष्य देनेवाली हैं

চ্যৱনে ক’লে—গাই সদায় লক্ষ্মীৰ মূল; গাইত পাপৰ লেশমাত্ৰও নাই। গাইয়ে মানুহক সদায় অন্ন যোগায়, আৰু দেৱতাসকলৰ বাবে পৰম হৱিষ্য।

Verse 29

स्वाहाकारवषट्कारीौ गोषु नित्यं प्रतिछ्ठितौ । गावो यज्ञस्य नेत्र्यो वै तथा यज्ञस्य ता मुखम्‌,स्वाहा और वषट्कार सदा गौआओंमें ही प्रतिष्ठित होते हैं। गौएँ ही यज्ञका संचालन करनेवाली तथा उसका मुख हैं

‘স্বাহা’ আৰু ‘বষট্’—এই যজ্ঞোচ্চাৰ সদায় গাইসমূহতেই প্ৰতিষ্ঠিত। গাইসমূহেই যজ্ঞক আগুৱাই নিয়া নেত্ৰী, আৰু গাইসমূহেই যজ্ঞৰ মুখ।

Verse 30

अमृतं हाृव्ययं दिव्यं क्षरन्ति च वहन्ति च । अमृतायतनं चैता: सर्वलोकनमस्कृता:,वे विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती और दुहनेपर अमृत ही देती हैं। वे अमृतकी आधारभूत हैं। सारा संसार उनके सामने नतमस्तक होता है

সিহঁতে দিৱ্য, অব্যয় অমৃত ধাৰণ কৰে আৰু দোহনত অমৃতেই স্ৰৱায়। সিহঁতেই অমৃতৰ আশ্ৰয়-আধাৰ; সকলো লোক সিহঁতৰ আগত নতমস্তক।

Verse 31

तेजसा वपुषा चैव गावो वह्लिसमा भुवि | गावो हि सुमहत्‌ तेज: प्राणिनां च सुखप्रदा:,इस पृथ्वीपर गौएँ अपनी काया और कान्तिसे अग्निके समान हैं। वे महान्‌ तेजकी राशि और समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाली हैं

এই পৃথিৱীত গাইসমূহ নিজৰ তেজ আৰু ৰূপে অগ্নিসমান। গাইসমূহ মহাতেজৰ আধাৰ আৰু সকলো প্ৰাণীৰ সুখদায়িনী।

Verse 32

निविष्टं गोकुलं यत्र श्वासं मुडचति निर्भयम्‌ । विराजयति त॑ देशं पापं चास्यापकर्षति,गौओंका समुदाय जहाँ बैठकर निर्भयतापूर्वक साँस लेता है, उस स्थानकी शोभा बढ़ा देता है और वहाँके सारे पापोंको खींच लेता है

য’ত গাইৰ গোকুল বহি নিৰ্ভয়ে শ্বাস মেলে, সেই ঠাই সিহঁতে শোভিত কৰে আৰু সেই দেশৰ পাপো টানি আঁতৰাই দিয়ে।

Verse 33

गाव: स्वर्गस्य सोपानं गाव: स्वर्गेडपि पूजिता: । गाव: कामदुहो देव्यो नान्यत्‌ किंचित्‌ परं स्मृतम्‌,गौएँ स्वर्गकी सीढ़ी हैं। गौएँ स्वर्गमें भी पूजी जाती हैं। गौएँ समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाली देवियाँ हैं। उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है

গাইসমূহ স্বৰ্গলৈ উঠাৰ সোপান; স্বৰ্গতো গাইসমূহ পূজিত। গাইসমূহ কামধেনু-স্বৰূপা দিৱ্য দেবী; সিহঁতৰ ওপৰতকৈ পৰম বুলি আন একো সোঁৱৰণ কৰা নহয়।

Verse 34

इत्येतद्‌ गोषु मे प्रोक्त माहात्म्यं भरतर्षभ । गुणैकदेशवचनं शक्‍यं पारायणं न तु

এইদৰে, হে ভৰতবংশৰ শ্ৰেষ্ঠ! মই তোমাক গোৱালৈৰ মাহাত্ম্য ক’লোঁ। কিন্তু মই কোৱা কথাখিনি তেওঁলোকৰ গুণৰ কেৱল এটা অংশ; অলপ কোৱা সম্ভৱ, কিন্তু সকলো গুণ সম্পূৰ্ণকৈ পঢ়ি শেষ কৰা অসম্ভৱ।

Verse 35

भरतश्रेष्ठ! यह मैंने गौओंका माहात्म्य बताया है। इसमें उनके गुणोंका दिग्दर्शन मात्र कराया गया है। गौओंके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता ।। निषादा ऊचु. दर्शन॑ं कथनं चैव सहास्माभि: कृतं मुने । सतां साप्तपदं मैत्र॑ प्रसादं नः कुरु प्रभो,इसके बाद निषादोंने कहा--मुने! सज्जनोंके साथ सात पग चलनेमात्रसे मित्रता हो जाती है। हमने तो आपका दर्शन किया और हमारे साथ आपकी इतनी देरतक बातचीत भी हुई; अतः प्रभो! आप हमलोगोंपर कृपा कीजिये

নিষাদসকলে ক’লে—মুনে! আমি আপোনাৰ দৰ্শনো কৰিলোঁ আৰু আপোনাৰ সৈতে কথোপকথনো কৰিলোঁ। সজ্জনসকলৰ মাজত একেলগে সাত খোজ চলিলেই মৈত্ৰী স্থাপিত হয়; সেয়ে, প্ৰভো! আমাৰ ওপৰত প্ৰসন্ন হৈ কৃপা কৰক।

Verse 36

हवींषि सर्वाणि यथा हुपभुड्धक्ते हुताशन: । एवं त्वमपि धर्मात्मन्‌ पुरुषाग्नि: प्रतापवान्‌,धर्मात्मन्‌! जैसे अग्निदेव सम्पूर्ण हविष्योंको आत्मसात्‌ कर लेते हैं, उसी प्रकार आप भी हमारे दोष-दुर्गुणोंको दग्ध करनेवाले प्रतापी अग्निरूप हैं

ব্যাসে ক’লে—ধৰ্মাত্মন! যেনেকৈ হৱিভোজী অগ্নিদেৱে সকলো আহুতি গ্ৰাস কৰে, তেনেকৈ আপুনিও ‘পুৰুষাগ্নি’ৰ দৰে প্ৰতাপৱান; আমাৰ দোষ-দুৰ্গুণ দহিবলৈ সক্ষম।

Verse 37

प्रसादयामहे विद्वन्‌ भवन्तं प्रणता वयम्‌ । अनुग्रहार्थमस्माकमियं गौ: प्रतिगृह्यताम्‌,विद्वान! हम आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर आपको प्रसन्न करना चाहते हैं। आप हमलोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये हमारी दी हुई यह गौ स्वीकार कीजिये

হে বিদ্বান! আমি নতশিৰে আপোনাক প্ৰসন্ন কৰিব বিচাৰোঁ। আমাৰ ওপৰত অনুগ্ৰহ কৰিবলৈ আমি আগবঢ়োৱা এই গাইখন গ্ৰহণ কৰক।

Verse 38

(अत्यन्तापदि मग्नानां परित्राणं हि कुर्वताम्‌ । या गतिर्विदिता त्वद्य नरके शरणं भवान्‌ ।।) अत्यन्त आपत्तिमें डूबे हुए जीवोंका उद्धार करनेवाले पुरुषोंको जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वह आपको विदित है। हमलोग नरकमें डूबे हुए हैं। आज आप ही हमें शरण देनेवाले हैं ।। च्यवन उवाच कृपणस्य च यच्चक्षुर्मुनेशशीविषस्य च । नरं समूलं दहति कक्षमग्निरिव ज्वलन्‌,च्यवन बोले--निषादगण! किसी दीन-दुखियाकी, ऋषिकी तथा विषधर सर्पकी रोषपूर्ण दृष्टि मनुष्यको उसी प्रकार जड़मूलसहित जलाकर भस्म कर देती है, जैसे प्रज्वलित अग्नि सूखे घास-फ़ूसके ढेरको

চ্যৱনে ক’লে—হে নিষাদসকল! দীন-দুখীয়াৰ, মুনিৰ আৰু বিষধৰ সাপৰ ক্ৰোধভৰা দৃষ্টিয়ে মানুহক শিপাসহ দহি পেলায়; যেনেকৈ জ্বলন্ত অগ্নিয়ে শুকান ঘাঁহ-ঝোপা ভস্ম কৰে।

Verse 39

प्रतिगृह्नामि वो धेनुं कैवर्ता मुक्तकिल्बिषा: | दिवं गच्छत वै क्षिप्रं मत्स्यै: सह जलोद्धवै:,मल्लाहो! मैं तुम्हारी दी हुई गौ स्वीकार करता हूँ। इस गोदानके प्रभावसे तुम्हारे सारे पाप दूर हो गये। अब तुमलोग जलमें पैदा हुई इन मछलियोंके साथ ही शीघ्र स्वर्गको जाओ

হে মল্লাহসকল! তোমালোকৰ দিয়া গাইখন মই গ্ৰহণ কৰিলোঁ। এই গোদানৰ প্ৰভাৱত তোমালোকৰ সকলো পাপ নাশ হ’ল। এতিয়া জলত জন্মা এই মাছবোৰৰ সৈতে তোমালোক শীঘ্ৰে স্বৰ্গলৈ যোৱা।

Verse 40

भीष्म उवाच ततस्तस्य प्रभावात्‌ ते महर्षेर्भावितात्मन: । निषादास्तेन वाक्येन सह मत्स्यैर्दिवं ययु:,भीष्मजी कहते हैं--भारत! तदनन्तर विशुद्ध अन्तःकरणवाले उन महर्षि च्यवनके पूर्वोक्त बात कहते ही उनके प्रभावसे वे मल्‍लाह उन मछलियोंके साथ ही स्वर्गलोकको चले गये

ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! তাৰ পিছত বিশুদ্ধ অন্তঃকৰণৰ মহর্ষি চ্যৱনে সেই বাক্য কোৱাৰ লগে লগে, তেওঁৰ প্ৰভাৱত সেই নিষাদ (মল্লাহ)সকল মাছবোৰৰ সৈতে স্বৰ্গলোকলৈ গ’ল।

Verse 41

ततः स राजा नहुषो विस्मित: प्रेक्ष्य धीवरान्‌ । आरोहमाणांस्त्रिदिवं मत्स्यांक्ष भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ] उस समय उन मल्लाहों और मत्स्योंको भी स्वर्गलोककी ओर जाते देख राजा नहुषको बड़ा आश्चर्य हुआ

হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! তেতিয়া সেই মল্লাহসকল আৰু মাছবোৰো স্বৰ্গলোকলৈ উঠি যোৱা দেখি ৰজা নহুষ অতি বিস্মিত হ’ল।

Verse 42

ततस्तौ गविजश्नैव च्यवनश्न भूगूद्वह: । वराभ्यामनुरूपाभ्यां छन्दयामासतुर्न॒ुपम्‌

তাৰ পিছত গৱিজ আৰু ভৃগুকুলশ্ৰেষ্ঠ চ্যৱন—এই দুয়োজনে—ৰাজাৰ ওচৰলৈ আহি, তেওঁৰ পদৰ অনুৰূপ দুটা বৰ দিয়া বুলি কৈ, তেওঁৰ সন্মতি লাভ কৰিবলৈ তেওঁক সন্তুষ্ট কৰিবলৈ ধৰিলে।

Verse 43

तत्पश्चात्‌ गौसे उत्पन्न महर्षि और भृगुनन्दन च्यवन दोनोंने राजा नहुषसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ।। ततो राजा महावीर्यों नहुष: पृथिवीपति: । परमित्यब्रवीत्‌ प्रीतस्तदा भरतसत्तम

তাৰ পিছত গৱিজৰ পৰা উদ্ভৱ হোৱা মহর্ষি আৰু ভৃগুনন্দন চ্যৱন—এই দুয়োজনে—ৰজা নহুষক ইচ্ছামতে বৰ বিচাৰিবলৈ ক’লে। তেতিয়া মহাবীৰ্য, পৃথিৱীপতি ৰজা নহুষ আনন্দিত হৈ ক’লে—“পৰম (তথাস্তु),” হে ভৰতসত্তম!

Verse 44

भरतभूषण! तब वे महापराक्रमी भूपाल राजा नहुष प्रसन्न होकर बोले--“बस, आपलोगोंकी कृपा ही बहुत है' ।। ततो जग्राह धर्मे स स्थितिमिन्द्रनिभो नृपः । तथेति चोदित: प्रीतस्तावृषी प्रत्यपूजयत्‌,फिर दोनोंके आग्रहसे उन इन्द्रके समान तेजस्वी नरेशने धर्ममें स्थित रहनेका वरदान माँगा और उनके तथास्तु कहनेपर राजाने उन दोनों ऋषियोंका विधिवत्‌ पूजन किया

তেতিয়া ইন্দ্ৰসম দীপ্তিমান নৃপতিয়ে ধৰ্মত স্থিৰ হৈ থাকিবলৈ বৰ বিচাৰিলে। দুয়ো ঋষিয়ে প্ৰসন্ন হৈ “তথাস্তु” বুলি অনুমোদন দিলে। তাতে আনন্দিত ৰজাই বিধিপূৰ্বক দুয়ো ঋষিক পূজা-সন্মান কৰিলে।

Verse 45

समाप्तदीक्षश्ष्यवनस्ततोडगच्छत्‌ स्वमाश्रमम्‌ | गविजश्न महातेजा: स्वमाश्रमपर्द ययौ,उसी दिन महर्षि च्यवनकी दीक्षा समाप्त हुई और वे अपने आश्रमपर चले गये। इसके बाद महातेजस्वी गोजात मुनि भी अपने आश्रमको पधारे

সেই দিনাই মহর্ষি চ্যৱনৰ দীক্ষা সমাপ্ত হ’ল আৰু তেওঁ নিজৰ আশ্ৰমলৈ গ’ল। তাৰ পিছত মহাতেজস্বী গবিষ্ঠ (গোজাত) মুনিও নিজৰ আশ্ৰমলৈ উভতি আহিল।

Verse 46

निषादाश्च दिवं जग्मुस्ते च मत्स्या जनाधिप । नहुषो5पि वरं लब्ध्वा प्रविवेश स्वकं पुरम्‌,नरेश्वर! वे मलल्‍लाह और मत्स्य तो स्वर्गलोकमें चले गये और राजा नहुष भी वर पाकर अपनी राजधानीको लौट आये

হে জনাধিপ! নিষাদ আৰু মৎস্যসকল স্বৰ্গলোকলৈ গ’ল; আৰু নহুষ ৰজাও বৰ লাভ কৰি নিজৰ ৰাজধানীত প্ৰৱেশ কৰিলে।

Verse 47

एतत्ते कथितं तात यन्मां त्वं परिपृच्छसि । दर्शने यादृश: स्नेह: संवासे वा युधिछ्िर,तात युधिष्ठिर! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह सारा प्रसंग सुनाया है। दर्शन और सहवाससे कैसा स्नेह होता है? गौओंका माहात्म्य क्या है? तथा इस विषयमें धर्मका निश्चय क्या है? ये सारी बातें इस प्रसंगसे स्पष्ट हो जाती हैं। अब मैं तुम्हें कौन-सी बात बताऊँ? वीर! तुम्हारे मनमें क्या सुननेकी इच्छा है?

বৎস, তুমি যি সুধিছিলা, সেই সকলো মই তোমাক ক’লোঁ। হে যুধিষ্ঠিৰ, কেৱল দৰ্শনে যিধৰণৰ স্নেহ জন্মে আৰু সহবাসে যিধৰণৰ—সেয়াও এই কাহিনীৰে স্পষ্ট হৈছে।

Verse 48

महाभाग्यं गवां चैव तथा धर्मविनिश्चयम्‌ । कि भूय: कथ्यतां वीर कि ते हृदि विवक्षितम्‌,तात युधिष्ठिर! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह सारा प्रसंग सुनाया है। दर्शन और सहवाससे कैसा स्नेह होता है? गौओंका माहात्म्य क्या है? तथा इस विषयमें धर्मका निश्चय क्या है? ये सारी बातें इस प्रसंगसे स्पष्ट हो जाती हैं। अब मैं तुम्हें कौन-सी बात बताऊँ? वीर! तुम्हारे मनमें क्या सुननेकी इच्छा है?

গৰুৰ মহাভাগ্য আৰু এই বিষয়ত ধৰ্মৰ স্থিৰ নিৰ্ণয়ো মই কৈ দিলোঁ। হে বীৰ, এতিয়া আৰু কি ক’ম? তোমাৰ হৃদয়ত আৰু কি শুনিবলৈ ইচ্ছা আছে?

Verse 51

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनोपाख्याने एकपज्चाशत्तमो5ध्याय:

এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ দানধৰ্মপৰ্বত চ্যৱনোপাখ্যানৰ অন্তৰ্গত একাৱনতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।

Verse 156

स तमाभाष्य राजानमब्रवीद्‌ द्विजसत्तम: । इतनेहीमें फल-मूलका भोजन करनेवाले एक दूसरे वनवासी मुनि, जिनका जन्म गायके पेटसे हुआ था, राजा नहुषके समीप आये और वे द्विजश्रेष्ठ उन्हें सम्बोधित करके कहने लगे--

এইদৰে ৰজাক সম্বোধন কৰি দ্বিজসত্তমে ক’লে। তেতিয়াই ফল-মূলভোজী আন কিছুমান বনবাসী মুনি—যাঁহাদের জন্ম গাভীৰ উদৰৰ পৰা হৈছিল বুলি শুনা যায়—ৰজা নহুষৰ ওচৰলৈ আহিল। তেতিয়া দ্বিজশ্ৰেষ্ঠে তেওঁলোকক সম্বোধন কৰি কথা আৰম্ভ কৰিলে।

Frequently Asked Questions

Kuśika must interpret an overwhelming sensory spectacle without losing discernment—testing whether a ruler’s perception is governed by curiosity and desire or by disciplined inquiry and humility.

Extraordinary power is portrayed as secondary to its foundation: tapas and mastery of the senses. The chapter teaches that ethical self-governance is a prerequisite for stable external governance.

Rather than a formal phalaśruti, the text embeds an evaluative claim: Cyavana affirms Kuśika’s moral purity and sense-restraint, presenting the sage’s approval (prasāda) and the offer of a boon as the operative “result” of disciplined conduct.