Adhyaya 20
Anushasana ParvaAdhyaya 2092 Verses

Adhyaya 20

Aṣṭāvakra’s Visit to Kubera: Hospitality, Temptation, and the Ethics of Restraint (अष्टावक्र-वैश्रवणोपाख्यानम्)

Upa-parva: Aṣṭāvakra–Vaiśravaṇa (Kubera) Upākhyāna

Bhīṣma narrates Aṣṭāvakra’s northward journey to the Himālaya, including bathing at tīrthas and performing morning rites. The sage approaches Kailāsa’s environs, encounters Kubera’s guarded domain, and is ceremonially received: rākṣasas report to Vaiśravaṇa, who arrives, offers formal welcome, and arranges entertainment by apsaras with gandharva music. After an extended period in this refined setting, Aṣṭāvakra departs and reaches a remarkable, gem-like residence where seven captivating maidens appear and invite him inward. Inside, he meets an aged, ornamented woman who engages him in intimate solicitation, arguing from a desire-centered view of female motivation and social behavior. Aṣṭāvakra responds with a dharma-based refusal, explicitly rejecting contact with another’s spouse and affirming his intention to live for dharma and progeny rather than sensory indulgence. The woman advises him to remain until the appropriate time, and as evening approaches, Aṣṭāvakra requests water to perform twilight worship (saṃdhyā), emphasizing disciplined speech and controlled senses.

Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर के समक्ष ऋषि-परंपरा शिव-सहस्रनाम के पाठ की महिमा का उद्घोष करती है—यह केवल स्तुति नहीं, वरदान-मार्ग है, जिसे अनेक तपस्वियों ने अपने जीवन में सत्य पाया है। → एक-एक करके ऋषि अपने अनुभव सुनाते हैं: पुत्र-प्राप्ति हेतु घोर तप और स्तव-पाठ (V2), मनोवांछित कामनाओं की सिद्धि का आश्वासन (V3), काशी में शिवकृपा से अष्टगुण ऐश्वर्य का दान (V37), माता का करुण विलाप और पुत्र को वेद-विद्या से विभूषित करने की आकांक्षा (V53), तथा पाठ के फलस्वरूप स्वर्ग-वास की अतिशय दीर्घता का वर्णन (V83)। इन कथनों से प्रश्न तीक्ष्ण होता है—क्या केवल नाम-स्मरण से इतना महान फल संभव है? → महिमा का शिखर तब आता है जब कहा जाता है कि प्रसन्न रुद्र त्रैलोक्याधिपत्य तक दे सकते हैं (V643), और यहाँ तक कि लक्षणहीन या पापयुक्त मनुष्य भी यदि हृदय से शिव-ध्यान करे तो पाप-विनाश पा लेता है (V676)—भक्ति की सार्वभौमिकता और शिव-कृपा की असीम सीमा एक साथ उद्घाटित होती है। → कथन-श्रृंखला का निष्कर्ष यह बनता है कि शिव-सहस्रनाम का पाठ/ध्यान साधक की पात्रता को शुद्ध करता है, इच्छित सिद्धि देता है, और अंततः दुर्लभ पदों तक उठा सकता है—जैसे विश्वामित्र का क्षत्रिय से ब्राह्मण्य की ओर उठना ‘तत्प्रसादात्’ (V1636) के सूत्र में समाहित है। → युधिष्ठिर के मन में यह जिज्ञासा शेष रहती है कि इस स्तोत्र का विधि-विधान, नियम, और सर्वोत्तम आचरण-मार्ग क्या है—जिससे फल ‘अनुभव-सिद्ध’ हो सके।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--#रा< बछ। है २ >> अष्टादशो< ध्याय: शिवसहस्रनामके पाठकी महिमा तथा ऋषियोंका भगवान्‌ शंकरकी कृपासे अभीष्ट सिद्धि होनेके विषयमें अपना- अपना अनुभव सुनाना और श्रीकृष्णके द्वारा भगवान्‌ शिवजीकी महिमाका वर्णन वैशम्पायन उवाच महायोगी ततः प्राह कृष्णद्वैपायनो मुनि: । पठस्व पुत्र भद्रं ते प्रीयतां ते महेश्वर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर महायोगी श्रीकृष्णद्वैपायन मुनिवर व्यासने युधिष्ठिस्से कहा--“बेटा! तुम्हारा कल्याण हो। तुम भी इस स्तोत्रका पाठ करो, जिससे तुम्हारे ऊपर भी महेश्वर प्रसन्न हों

বৈশম্পায়নে ক’লে— তাৰ পাছত মহাযোগী মুনি কৃষ্ণদ্বৈপায়ন (ব্যাস) ক’লে— “পুত্ৰ! তোমাৰ মঙ্গল হওক। তুমিও এই স্তৱ পাঠ কৰা, যাতে মহেশ্বৰ তোমাৰ ওপৰত প্ৰসন্ন হন।”

Verse 2

पुरा पुत्र मया मेरी तप्यता परमं तप: । पुत्रहेतोर्महाराज स्तव एषो<नुकीर्तित:,“पुत्र! महाराज! पूर्वकालकी बात है, मैंने पुत्रकी प्राप्तिके लिये मेरुपर्वतपर बड़ी भारी तपस्या की थी। उस समय मैंने इस स्तोत्रका अनेक बार पाठ किया था

বৈশম্পায়নে ক’লে— হে পুত্ৰ, হে মহাৰাজ! পূৰ্বকালত পুত্ৰলাভৰ হেতু মই মেরু পৰ্বতত পৰম তপস্যা কৰিছিলোঁ; সেই সময়তে মই এই স্তৱ পুনঃপুনঃ অনুকীৰ্তন (পাঠ) কৰিছিলোঁ।

Verse 3

लब्धवानीप्सितान्‌ कामानहं वै पाण्डुनन्दन | तथा त्वमपि शर्वाद्धि सर्वान्‌ कामानवाप्स्यसि,'पाण्डुनन्दन! इसके पाठसे मैंने अपनी मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लिया था। उसी प्रकार तुम भी शंकरजीसे सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लोगे”

হে পাণ্ডুনন্দন! এই পাঠৰ দ্বাৰা মই মোৰ অভীষ্ট কামনা লাভ কৰিছিলোঁ; সেইদৰে তুমিও শৰ্ব (শিৱ)ৰ পৰা সকলো কামনা লাভ কৰিবা।

Verse 4

कपिलभश्न ततः प्राह सांख्यर्षिदेवसम्मत: । मया जन्मान्यनेकानि भकक्‍्त्या चाराधितो भव:

তাৰ পাছত কপিলভশ্ন ক’লে—সাংখ্য ঋষিসকলৰ দ্বাৰা সন্মত আৰু দেৱসমাজত পূজ্য—“অনেক জন্ম ধৰি মই ভক্তিভাৱে আপোনাক আৰাধনা কৰি আহিছোঁ; এতিয়া প্ৰসন্ন হৈ অনুগ্ৰহ কৰক।”

Verse 5

चारुशीर्षस्तत: प्राह शक्रस्य दयित: सखा | आलनम्बायन इत्येवं विश्रुतटः करुणात्मक:,तदनन्तर इन्द्रके प्रिय सखा आलम्बगोत्रीय चारुशीर्षने जो आलम्बायन नामसे ही प्रसिद्ध तथा परम दयालु हैं, इस प्रकार कहा--

তাৰ পাছত ইন্দ্ৰৰ প্ৰিয় সখা, আলম্ব গোত্ৰীয় চাৰুশীৰ্ষ—যি ‘আলনম্বায়ন’ নামে প্ৰসিদ্ধ আৰু স্বভাৱতে কৰুণাময়—এইদৰে ক’লে।

Verse 6

मया गोकर्णमासाद्य तपस्तप्त्वा शतं समा: | अयोनिजानां दान्तानां धर्मज्ञानां सुवर्चसाम्‌,'पाण्डुनन्दन! पूर्वकालमें गोकर्णतीर्थमें जाकर मैंने सौ वर्षोतक तपस्या करके भगवान्‌ शंकरको संतुष्ट किया। इससे भगवान्‌ शंकरकी ओरसे मुझे सौ पुत्र प्राप्त हुए, जो अयोनिज, जितेन्द्रिय, धर्मज्ञ, परम तेजस्वी, जरारहित, दुःखहीन और एक लाख वर्षकी आयुवाले थे”

হে পাণ্ডুনন্দন! পুৰ্বকালত মই গোকৰ্ণ তীৰ্থলৈ গৈ শতবৰ্ষ তপস্যা কৰি শংকৰক প্ৰসন্ন কৰিছিলোঁ; তাৰ ফলত মোৰ শত পুত্ৰ লাভ হৈছিল—অযোনিজ, ইন্দ্ৰিয়সংযমী, ধৰ্মজ্ঞ আৰু অতিশয় তেজস্বী।

Verse 7

अजराणामदुः:खानां शतवर्षसहस्रिणाम्‌ । लब्धं पुत्रशतं शर्वात्‌ पुरा पाण्डुनूपात्मज,'पाण्डुनन्दन! पूर्वकालमें गोकर्णतीर्थमें जाकर मैंने सौ वर्षोतक तपस्या करके भगवान्‌ शंकरको संतुष्ट किया। इससे भगवान्‌ शंकरकी ओरसे मुझे सौ पुत्र प्राप्त हुए, जो अयोनिज, जितेन्द्रिय, धर्मज्ञ, परम तेजस्वी, जरारहित, दुःखहीन और एक लाख वर्षकी आयुवाले थे”

হে পাণ্ডুৰাজপুত্ৰ! পুৰ্বকালত মই শৰ্ব (শিৱ)ৰ পৰা শত পুত্ৰ লাভ কৰিছিলোঁ—যিসকল জৰা-দুঃখহীন আৰু প্ৰত্যেকে লক্ষবছৰ আয়ুসী আছিল।

Verse 8

भगवान्‌ श्रीकृष्ण एवं विभिन्न महर्षियोंका युधिष्ठिरको उपदेश वाल्मीकिश्नाह भगवान्‌ युधिष्ठटिरमिदं वच: । विवादे साग्निमुनिभिर्त्रह्मघ्नो वै भवानिति

বৈশম্পায়ন ক’লে— ভগৱান শ্ৰীমান্ বাল্মীকিয়ে যুধিষ্ঠিৰক এই বাক্য ক’লে— “অগ্নিসম্বদ্ধ মুনিসকলৰ সৈতে বিবাদত কোৱা হয় যে তুমি ব্ৰাহ্মণহন্তা।”

Verse 9

उक्त: क्षणेन चाविष्टस्तेनाधर्मेण भारत । सो5हमीशानमनघममोघं शरणं गत:

বৈশম্পায়ন ক’লে— হে ভাৰত! কথাটি কোৱা মাত্ৰেই সেই ক্ষণতে সেই অধৰ্মপ্ৰেৰণাই মোক গ্ৰাস কৰিলে। সেয়ে মই নিষ্কলুষ, অমোঘ ঈশ্বৰৰ শৰণ ল’লোঁ।

Verse 10

मुक्तश्नास्मि ततः पापैस्ततो दुःखविनाशन: । आह मां त्रिपुरघ्नो वै यशस्तेडग्रयं भविष्यति

তেতিয়া মই পাপৰ পৰা মুক্ত হ’লোঁ আৰু নিৰ্বিঘ্নে আহাৰ গ্ৰহণ কৰিব পৰা হ’লোঁ; দুখ নাশ হ’ল। তেতিয়া ত্ৰিপুৰঘ্ন (শিৱ) মোক ক’লে—“তোমাৰ যশ সৰ্বাগ্ৰ হ’ব।”

Verse 11

इसके बाद धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ जमदग्निनन्दन परशुरामजी ऋषियोंके बीचमें खड़े होकर सूर्यके समान प्रकाशित होते हुए वहाँ कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले--

তাৰ পাছত ধৰ্মাত্মাসকলৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ জমদগ্নিনন্দন পৰশুৰাম ঋষিসকলৰ মাজত থিয় হ’ল। সূৰ্যৰ দৰে দীপ্তিমান হৈ তেওঁ তাত কুন্তীপুত্ৰ যুধিষ্ঠিৰক এইদৰে ক’লে।

Verse 12

पितृविप्रवधेनाहमार्तो वै पाण्डवाग्रज । शुचिर्भूत्वा महादेवं गतो5स्मि शरणं नूप,'ज्येष्ठ पाण्डव! नरेश्वर! मैंने पितृतुल्य बड़े भाइयोंको मारकर पितृवध और ब्राह्मणगवधका पाप कर डाला था। इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ और मैं पवित्र भावसे महादेवजीकी शरणमें गया। शरणागत होकर मैंने इन्हीं नामोंसे रुद्रदेवकी स्तुति की। इससे भगवान्‌ महादेव मुझपर बहुत संतुष्ट हुए और मुझे अपना परशु एवं दिव्यास्त्र देकर बोले -- तुम्हें पाप नहीं लगेगा। तुम युद्धमें अजेय हो जाओगे। तुमपर मृत्युका वश नहीं चलेगा तथा तुम अजर-अमर बने रहोगे”

বৈশম্পায়ন ক’লে— হে পাণ্ডৱাগ্ৰজ, হে নৰেশ্বৰ! পিতৃতুল্য জ্যেষ্ঠসকলক বধ কৰি আৰু এজন ব্ৰাহ্মণকো হত্যা কৰি মই পিতৃহত্যা আৰু ব্ৰহ্মহত্যাৰ পাপত অতি দুঃখিত হ’লোঁ। তেতিয়া শুচি-ভাব ধৰি মই মহাদেৱৰ শৰণ ল’লোঁ। শৰণাগত হৈ মই এই নামসমূহৰ দ্বাৰাই ৰুদ্ৰদেৱক স্তৱ কৰিলোঁ। তাতে ভগৱান মহাদেৱ মোৰ ওপৰত অতিশয় প্ৰসন্ন হৈ নিজৰ পৰশু আৰু দিব্যাস্ত্ৰ দান কৰি ক’লে—“তোমাক পাপ স্পৰ্শ নকৰিব। যুদ্ধত তুমি অজেয় হ’বা। মৃত্যু তোমাক পৰাভূত কৰিব নোৱাৰিব; তুমি অজৰ-অমৰ হ’বা।”

Verse 13

नामभिश्षास्तुव॑ं देवं ततस्तुष्टो5भवद्‌ भव: । परशुं च ततो देवो दिव्यान्यस्त्राणि चैव मे,'ज्येष्ठ पाण्डव! नरेश्वर! मैंने पितृतुल्य बड़े भाइयोंको मारकर पितृवध और ब्राह्मणगवधका पाप कर डाला था। इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ और मैं पवित्र भावसे महादेवजीकी शरणमें गया। शरणागत होकर मैंने इन्हीं नामोंसे रुद्रदेवकी स्तुति की। इससे भगवान्‌ महादेव मुझपर बहुत संतुष्ट हुए और मुझे अपना परशु एवं दिव्यास्त्र देकर बोले -- तुम्हें पाप नहीं लगेगा। तुम युद्धमें अजेय हो जाओगे। तुमपर मृत्युका वश नहीं चलेगा तथा तुम अजर-अमर बने रहोगे”

বৈশম্পায়নে ক’লে—“এই নামবোৰেই লৈ সেই দেৱক স্তৱ কৰোঁতে ভব (শিৱ) প্ৰসন্ন হ’ল। তাৰ পাছত দেৱতাই মোক নিজৰ পৰশু আৰু দিব্য অস্ত্ৰসমূহ দান কৰি ক’লে—‘তোমাৰ ওপৰত পাপ নলাগিব; যুদ্ধত তুমি অজেয় হ’বা; মৃত্যু তোমাৰ ওপৰত প্ৰভুত্ব কৰিব নোৱাৰিব; আৰু তুমি অজৰ-অমৰ হ’বা।’”

Verse 14

पापं च ते न भविता अजेयश्व भविष्यसि । न ते प्रभविता मृत्युरजरश्न॒ भविष्यसि,'ज्येष्ठ पाण्डव! नरेश्वर! मैंने पितृतुल्य बड़े भाइयोंको मारकर पितृवध और ब्राह्मणगवधका पाप कर डाला था। इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ और मैं पवित्र भावसे महादेवजीकी शरणमें गया। शरणागत होकर मैंने इन्हीं नामोंसे रुद्रदेवकी स्तुति की। इससे भगवान्‌ महादेव मुझपर बहुत संतुष्ट हुए और मुझे अपना परशु एवं दिव्यास्त्र देकर बोले -- तुम्हें पाप नहीं लगेगा। तुम युद्धमें अजेय हो जाओगे। तुमपर मृत्युका वश नहीं चलेगा तथा तुम अजर-अमर बने रहोगे”

“তোমাৰ ওপৰত পাপ নহ’ব; তুমি অজেয় হ’বা। মৃত্যু তোমাৰ ওপৰত প্ৰভাৱ পেলাব নোৱাৰিব; তুমি অজৰ হ’বা।”

Verse 15

आह मां भगवानेवं शिखण्डी शिवविग्रह: । तदवाप्तं च मे सर्व प्रसादात्‌ तस्य धीमतः,“इस प्रकार कल्याणमय विग्रहवाले जटाधारी भगवान्‌ शिवने मुझसे जो कुछ कहा, वह सब कुछ उन ज्ञानी महेश्वरके कृपाप्रसादसे मुझे प्राप्त हो गया”

বৈশম্পায়নে ক’লে—“এইদৰে জটাধাৰী, মঙ্গলময় শিৱবিগ্ৰহ ভগৱানে মোক যি ক’লে, সেই সকলো সেই ধীমন্ত মহেশ্বৰৰ কৃপাপ্ৰসাদে মই সম্পূৰ্ণকৈ লাভ কৰিলোঁ।”

Verse 16

विश्वामित्रस्तदोवाच क्षत्रियो5हं तदाभवम्‌ | ब्राह्मणो5हं भवानीति मया चाराधितो भव:

বৈশম্পায়নে ক’লে—তেতিয়া বিশ্বামিত্ৰে ক’লে—“সেই সময়ত মই ক্ষত্ৰিয় আছিলোঁ; এতিয়া মই ব্ৰাহ্মণ।” এইদৰে মোৰ আৰাধনাত ভব (শিৱ) প্ৰসন্ন হ’ল।

Verse 17

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महादेवसहस्रनामस्तोत्रविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ,असितो देवलश्वैव प्राह पाण्डुसुतं नृपम्‌

এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ দানধৰ্মপৰ্বত মহাদেৱ-সহস্ৰনাম-স্তোত্ৰ বিষয়ক সপ্তদশ অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল। তাৰ পাছত অসিত আৰু দেবলে পাণ্ডুপুত্ৰ নৃপতিলৈ কথা ক’লে।

Verse 18

शापाच्छक्रस्य कौन्तेय विभो धर्मोडनशत्‌ तदा । तन्मे धर्म यशश्चाग्रयमायुश्चैवाददत्‌ प्रभु:,इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपव्वाख्याने अष्टादशो< ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहनपर्वकी कथाविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ

বৈশম্পায়নে ক’লে—হে কুন্তীপুত্ৰ! ইন্দ্ৰৰ শাপত সেই মহাবলী তেতিয়া ধৰ্মৰ পৰা বঞ্চিত হৈছিল; কিন্তু প্ৰভুৱে মোক ধৰ্ম, শ্ৰেষ্ঠ যশ আৰু দীঘলীয়া আয়ু দান কৰিলে। (এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ দানধৰ্মপৰ্বত ‘মেঘবাহন’ আখ্যানৰ অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।)

Verse 19

तत्पश्चात्‌ असित देवलने पाण्डुकुमार राजा युधिष्ठिरसे कहा--“कुन्तीनन्दन! प्रभो! इन्द्रके शापसे मेरा धर्म नष्ट हो गया था; किंतु भगवान्‌ शंकरने ही मुझे धर्म, उत्तम यश तथा दीर्घ आयु प्रदान की” ।। ऋषिर्गुत्ममदो नाम शक्रस्य दयित: सखा । प्राहाजमीढं भगवान्‌ बृहस्पतिसमद्ुति:,इसके बाद इन्द्रके प्रिय सखा और बृहस्पतिके समान तेजस्वी मुनिवर भगवान्‌ गृत्समदने अजमीढवंशी युधिष्ठिरसे कहा--

তাৰ পাছত অসিত-দেৱলে পাণ্ডুপুত্ৰ ৰজা যুধিষ্ঠিৰক ক’লে—“হে কুন্তীনন্দন, হে প্ৰভু! ইন্দ্ৰৰ শাপত মোৰ ধৰ্ম নষ্ট হৈছিল; কিন্তু ভগৱান শংকৰেই মোক ধৰ্ম, উত্তম যশ আৰু দীঘলীয়া আয়ু দান কৰিলে।” তাৰ পাছত ইন্দ্ৰৰ প্ৰিয় সখা, বৃহস্পতিসদৃশ তেজস্বী গৃত্সমদ নামৰ ঋষিয়ে অজমীঢ়বংশীয় যুধিষ্ঠিৰক উদ্দেশ কৰি কথন আগবঢ়ালে।

Verse 20

वरिष्ठो नाम भगवांश्षाक्षुषस्प मनो: सुतः । शतक्रतोरचिन्त्यस्य सत्रे वर्षमहस्त्रिके,“चाक्षुष मनुके पुत्र भगवान्‌ वरिष्ठके नामसे प्रसिद्ध हैं। एक समय अचिन्त्य शक्तिशाली शतक्रतु इन्द्रका एक यज्ञ हो रहा था जो एक हजार वर्षोतक चलनेवाला था। उसमें मैं रथन्तर सामका पाठ कर रहा था। मेरे द्वारा उस सामका उच्चारण होनेपर वरिष्ठने मुझसे कहा-- द्विज श्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा रथन्तर सामका पाठ ठीक नहीं हो रहा है

বৈশম্পায়নে ক’লে—চাক্ষুষ মনুৰ পুত্ৰ ‘বৰিষ্ঠ’ নামৰ এজন পূজ্য মহাত্মা আছিল। অচিন্ত্য শক্তিধৰ শতক্ৰতু ইন্দ্ৰৰ সহস্ৰবছৰীয়া সত্রযজ্ঞত এই প্ৰসঙ্গ ঘটিছিল।

Verse 21

वर्तमाने<ब्रवीद्‌ वाक्‍्यं साम्नि ह्युच्चारिते मया । रथन्तरे द्विजश्रेष्ठ न सम्यगिति वर्तते,“चाक्षुष मनुके पुत्र भगवान्‌ वरिष्ठके नामसे प्रसिद्ध हैं। एक समय अचिन्त्य शक्तिशाली शतक्रतु इन्द्रका एक यज्ञ हो रहा था जो एक हजार वर्षोतक चलनेवाला था। उसमें मैं रथन्तर सामका पाठ कर रहा था। मेरे द्वारा उस सामका उच्चारण होनेपर वरिष्ठने मुझसे कहा-- द्विज श्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा रथन्तर सामका पाठ ठीक नहीं हो रहा है

বৈশম্পায়নে ক’লে—মই সামগান কৰি থাকোঁতে, মোৰ দ্বাৰা সাম উচ্চাৰিত হোৱাৰ পাছত তেওঁ ক’লে—“হে দ্বিজশ্ৰেষ্ঠ! ৰথন্তৰ সামপাঠ সঠিকভাৱে চলি থকা নাই।”

Verse 22

समीक्षस्व पुनर्बुद्ध्या पापं त्यक्त्वा द्विजोत्तम । अयज्ञवाहिनं पापमकार्षास्त्वं सुदुर्मते

বৈশম্পায়নে ক’লে—“হে দ্বিজোত্তম! পাপবুদ্ধি ত্যাগ কৰি, অধিক স্পষ্ট বুদ্ধিৰে পুনৰ বিবেচনা কৰা। হে দুর্মতি! তুমি যজ্ঞৰ গতি আৰু ধৰ্মৰ প্ৰবাহ ৰুদ্ধ কৰা এক ঘোৰ পাপকৰ্ম কৰিছা।”

Verse 23

“विप्रवर! तुम पापपूर्ण आग्रह छोड़कर फिर अपनी बुद्धिसे विचार करो। सुदुर्मते! तुमने ऐसा पाप कर डाला है, जिससे यह यज्ञ ही निष्फल हो गया' ।। एवमुक्त्वा महाक्रोध: प्राह शम्भुं पुनर्वच: । प्रज्ञया रहितो दुःखी नित्यभीतो वनेचर:,“ऐसा कहकर महाक्रोधी वरिष्ठने भगवान्‌ शंकरकी ओर देखते हुए फिर कहा--“तुम म्यारह हजार आठ सौ वर्षोतक जल और वायुसे रहित तथा अन्य पशुओंसे परित्यक्त केवल रुरु तथा सिंहोंसे सेवित जो यज्ञोंके लिये उचित नहीं है--ऐसे वृक्षोंसे भरे हुए विशालवनमें बुद्धिशून्य, दुखी, सर्ववा भयभीत, वनचारी और महान्‌ कष्टमें मग्न क्रूर स्वभाववाले पशु होकर रहोगे'

বৈশম্পায়নে ক’লে— “হে ব্ৰাহ্মণশ্ৰেষ্ঠ! এই পাপময় জেদ ত্যাগ কৰি নিজৰ বুদ্ধিৰে পুনৰ বিচাৰ কৰা। হে দুৰ্মতি! তুমি এনে পাপ কৰিলা যে এই যজ্ঞেই নিষ্ফল হ’ল।” এইদৰে কৈ মহাক্ৰোধী জ্যেষ্ঠজনে শম্ভুৰ ফালে চাই পুনৰ ক’লে— “বিবেকহীন, দুখী আৰু সদায় ভীত হৈ তুমি বনবাসী হ’বা। এগাৰ হাজাৰ আঠশ বছৰ ধৰি তুমি জল আৰু বায়ুবিহীন থাকিবা; আন প্ৰাণীয়ে ত্যাগ কৰা, কেৱল ৰুরু-মৃগ আৰু সিংহেৰে সঙ্গী; যজ্ঞৰ অযোগ্য গছ-গছনিয়ে ভৰা বিশাল অৰণ্যত বাস কৰি—মনশূন্য, শোকাকুল, সদা ত্ৰস্ত, মহাকষ্টত নিমগ্ন, ক্ৰূৰ স্বভাৱৰ মৃগ হৈ থাকিবা।”

Verse 24

दशवर्षसहस्राणि दशाष्टी च शतानि च । नष्टपानीयपवने मृगैरन्यैश्न वर्जिते,“ऐसा कहकर महाक्रोधी वरिष्ठने भगवान्‌ शंकरकी ओर देखते हुए फिर कहा--“तुम म्यारह हजार आठ सौ वर्षोतक जल और वायुसे रहित तथा अन्य पशुओंसे परित्यक्त केवल रुरु तथा सिंहोंसे सेवित जो यज्ञोंके लिये उचित नहीं है--ऐसे वृक्षोंसे भरे हुए विशालवनमें बुद्धिशून्य, दुखी, सर्ववा भयभीत, वनचारी और महान्‌ कष्टमें मग्न क्रूर स्वभाववाले पशु होकर रहोगे'

দহ হাজাৰ বছৰ, আৰু তাৰ ওপৰত পুনৰ দহ আৰু আঠশ—অৰ্থাৎ দহ হাজাৰ আঠশ বছৰ—যি অৰণ্যত পানীয় জল আৰু শুদ্ধ বায়ু লুপ্ত, তাত আন মৃগসমূহৰ সঙ্গও নাথাকিব।

Verse 25

अयज्ञीयद्रुमे देशे रुकुसिंहनिषेविते | भविता त्वं मृग: क्रूरो महादुः:खसमन्वित:,“ऐसा कहकर महाक्रोधी वरिष्ठने भगवान्‌ शंकरकी ओर देखते हुए फिर कहा--“तुम म्यारह हजार आठ सौ वर्षोतक जल और वायुसे रहित तथा अन्य पशुओंसे परित्यक्त केवल रुरु तथा सिंहोंसे सेवित जो यज्ञोंके लिये उचित नहीं है--ऐसे वृक्षोंसे भरे हुए विशालवनमें बुद्धिशून्य, दुखी, सर्ववा भयभीत, वनचारी और महान्‌ कष्टमें मग्न क्रूर स्वभाववाले पशु होकर रहोगे'

যজ্ঞৰ অযোগ্য গছ-গছনিয়ে ভৰা দেশত, য’ত কেৱল ৰুরু-মৃগ আৰু সিংহৰ বিচৰণ, তাত তুমি ক্ৰূৰ মৃগ হৈ মহাদুঃখেৰে আৱৃত থাকিবা।

Verse 26

तस्य वाक्यस्य निधने पार्थ जातो हाहं मृगः । ततो मां शरणं प्राप्तं प्राह योगी महेश्वर:,“कुन्तीनन्दन! उनका यह वाक्य पूरा होते ही मैं क्रूर पशु हो गया। तब मैं भगवान्‌ शंकरकी शरणमें गया। अपनी शरणमें आये हुए मुझ सेवकसे योगी महेश्वर इस प्रकार बोले --

হে পাৰ্থ! সেই বাক্য সম্পূৰ্ণ হোৱাৰ লগে লগে—হায়!—মই মৃগ হৈ পৰিলোঁ। তাৰ পাছত শৰণ ল’বলৈ মই যোগী মহেশ্বৰৰ ওচৰলৈ গ’লোঁ; শৰণাগত মোক দেখি মহেশ্বৰে ক’লে।

Verse 27

अजरश्नामरश्रैव भविता दुःखवर्जित: । साम्यं ममास्तु ते सौख्यं युवयोर्वर्धतां क्रतु:,“मुने! तुम अजर-अमर और दुःखरहित हो जाओगे। तुम्हें मेरी समानता प्राप्त हो और तुम दोनों यजमान और पुरोहितका यह यज्ञ सदा बढ़ता रहे”

তুমি জৰা-মৰণৰ পৰা মুক্ত হৈ, দুঃখবর্জিত হ’বা। মোৰ সমান সুখ তোমাৰ হওক; আৰু তোমালোক দুজনৰ—যজমান আৰু পুৰোহিতৰ—এই যজ্ঞ সদায় বৃদ্ধি আৰু সমৃদ্ধি লাভ কৰক।

Verse 28

अनुग्रहानेवमेष करोति भगवान्‌ विभु: । परं धाता विधाता च सुखदु:खे च सर्वदा,“इस प्रकार सर्वव्यापी भगवान्‌ शंकर सबके ऊपर अनुग्रह करते हैं। ये ही सबका अच्छे ढंगसे धारण-पोषण करते हैं और सर्वदा सबके सुख-दुःखका भी विधान करते हैं”

এইদৰে সৰ্বব্যাপী, সৰ্বসমৰ্থ ভগৱান শংকৰ সকলোৰে ওপৰত অনুগ্ৰহ কৰে। তেৱেঁই পৰম ধাতা আৰু বিধাতা; সদায় সকলোৰে সুখ-দুখৰ বিধানও তেৱেঁই কৰে।

Verse 29

अचिन्त्य एष भगवान्‌ कर्मणा मनसा गिरा । न मे तात युधिश्रेष्ठ विद्यया पण्डित: सम:,“तात! समरभूमिके श्रेष्ठ वीर! ये अचिन्त्य भगवान्‌ शिव मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा आराधना करने योग्य हैं। उनकी आराधनाका ही यह फल है कि पाण्डित्यमें मेरी समानता करनेवाला आज कोई नहीं है”

তাত! সমৰভূমিৰ শ্ৰেষ্ঠ বীৰ! এই অচিন্ত্য ভগৱান শিৱ মন, বাক্য আৰু কৰ্মেৰে আৰাধ্য। তেখেতৰ আৰাধনাৰ ফলতেই আজি বিদ্যাত মোৰ সমান কোনো পণ্ডিত নাই।

Verse 30

वासुदेवस्तदोवाच पुनर्मतिमतां वर: । सुवर्णाक्षो महादेवस्तपसा तोषितो मया,उस समय बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भगवान्‌ श्रीकृष्ण फिर इस प्रकार बोले--“मैंने सुवर्ण-जैसे नेत्रवाले महादेवजीको अपनी तपस्यासे संतुष्ट किया

তেতিয়া বুদ্ধিমানসকলৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ বাসুদেৱে পুনৰ ক’লে—“মোৰ তপস্যাৰে স্বৰ্ণনয়ন মহাদেৱক মই সন্তুষ্ট কৰিলোঁ।”

Verse 31

ततो5थ भगवानाह प्रीतो मां वै युधिष्ठिर । अर्थात्‌ प्रियतर: कृष्ण मत्प्रसादाद्‌ भविष्यसि

তাৰ পাছত প্ৰসন্ন হৈ ভগৱানে মোক ক’লে—“যুধিষ্ঠিৰ! মোৰ প্ৰসাদে তুমি কৃষ্ণৰ অধিক প্ৰিয় হ’বা।”

Verse 32

एवं सहस्नशश्नान्यान्‌ महादेवो वरं ददौ,“इस तरह महादेवजीने मुझे और भी सहस्रों वर दिये। पूर्वकालमें अन्य अवतारोंके समय मणिमन्थ पर्वतपर मैंने लाखों-करोड़ों वर्षोतक भगवान्‌ शंकरकी आराधना की थी

এইদৰে মহাদেৱে মোক বৰ দিলে, আৰু তদ্ৰূপে সহস্ৰ সহস্ৰ আন বৰো প্ৰদান কৰিলে।

Verse 33

मणिमन्थे<थ शैले वै पुरा सम्पूजितो मया । वर्षायुतसहस्राणां सहस्नं शतमेव च,“इस तरह महादेवजीने मुझे और भी सहस्रों वर दिये। पूर्वकालमें अन्य अवतारोंके समय मणिमन्थ पर्वतपर मैंने लाखों-करोड़ों वर्षोतक भगवान्‌ शंकरकी आराधना की थी

বৈশম্পায়নে ক’লে—পূৰ্বকালত মণিমন্থ নামৰ পৰ্বতত মই মহাদেৱক সম্পূৰ্ণ শ্ৰদ্ধাৰে পূজা কৰিছিলোঁ। হাজাৰ হাজাৰ বছৰ, আনকি লক্ষ বছৰ পৰ্যন্তও মই সেই উপাসনাত অচল হৈ আছিলোঁ।

Verse 34

ततो मां भगवान्‌ प्रीत इदं वचनमत्रवीत्‌ । वरं वृणीष्व भद्रें ते यस्ते मनसि वर्तते,“इससे प्रसन्न होकर भगवानने मुझसे कहा--“कृष्ण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनसें जैसी रुचि हो, उसके अनुसार कोई वर माँगो”

তেতিয়া ভগৱান প্ৰসন্ন হৈ মোক ক’লে—“তোৰ মঙ্গল হওক। তোৰ মনত যি বাসনা আছে, সেই অনুসাৰে বৰ বিচাৰ।”

Verse 35

ततः प्रणम्य शिरसा इदं वचनमन्रुवम्‌ । यदि प्रीतो महादेवो भक्त्या परमया प्रभु:,“यह सुनकर मैंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और कहा--“यदि मेरी परम भक्तिसे भगवान्‌ महादेव प्रसन्न हों तो ईशान! आपके प्रति नित्य-निरन्तर मेरी स्थिर भक्ति बनी रहे।' तब “एवमस्तु' कहकर भगवान्‌ शिव वहीं अन्तर्धान हो गये”

তেতিয়া মই শিৰ নত কৰি প্ৰণাম জনাই ক’লোঁ—“যদি মোৰ পৰম ভক্তিয়ে প্ৰভু মহাদেৱক প্ৰসন্ন কৰে, তেন্তে হে ঈশান! আপোনাৰ প্ৰতি মোৰ ভক্তি নিত্য-নিৰন্তৰ অচল হৈ থাকক।” এইদৰে কৈ ভগৱান শিৱে “এৱমস্তু” বুলি ক’লে আৰু তাতেই অন্তৰ্ধান কৰিলে।

Verse 36

नित्यकालं तवेशान भक्तिर्भवतु मे स्थिरा । एवमस्त्विति भगवांस्तत्रोक्त्वान्तरधीयत,“यह सुनकर मैंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और कहा--“यदि मेरी परम भक्तिसे भगवान्‌ महादेव प्रसन्न हों तो ईशान! आपके प्रति नित्य-निरन्तर मेरी स्थिर भक्ति बनी रहे।' तब “एवमस्तु' कहकर भगवान्‌ शिव वहीं अन्तर्धान हो गये”

“হে ঈশান! আপোনাৰ প্ৰতি মোৰ ভক্তি সদাকাল স্থিৰ থাকক।” এইদৰে কৈ ভগৱানে “এৱমস্তু” বুলি ক’লে আৰু তাতেই অন্তৰ্ধান কৰিলে।

Verse 37

जैगीषव्य उवाच ममाष्टगुणमैश्वर्य दत्त भगवता पुरा | यत्नेनान्येन बलिना वाराणस्यां युधिष्ठिर,जैगीषव्य बोले--युधिष्ठिर! पूर्वकालमें भगवान्‌ शिवने काशीपुरीके भीतर अन्य प्रबल प्रयत्नसे संतुष्ट हो मुझे अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ प्रदान की थीं

জৈগীষব্য ক’লে—“হে যুধিষ্ঠিৰ! পূৰ্বকালত বাৰাণসীত মোৰ এক ভিন্ন আৰু প্ৰবল তপস্যা-প্ৰচেষ্টাত প্ৰসন্ন হৈ ভগৱান শিৱে মোক অণিমা আদি অষ্টবিধ ঐশ্বৰ্য-সিদ্ধি দান কৰিছিল।”

Verse 38

गर्ग उवाच चतुःषष्ट्यड्रमददत्‌ कलाज्ञानं ममाद्भुतम्‌ | सरस्वत्यास्तटे तुष्टो मनोयज्ञेन पाण्डव,गर्गने कहा--पाण्डुनन्दन! मैंने सरस्वतीके तटपर मानस यज्ञ करके भगवान्‌ शिवको संतुष्ट किया था। इससे प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे चौंसठ कलाओंका अदभुत ज्ञान प्रदान किया। मुझे मेरे ही समान एक सहसखतर ब्रह्मवादी पुत्र दिये तथा पुत्रोंसहित मेरी दस लाख वर्षकी आयु नियत कर दी

গৰ্গে ক’লে—হে পাণ্ডৱ! সৰস্বতীৰ তীৰত মই মনৰ ভিতৰত যজ্ঞ কৰি শৰ্ব (শিৱ)ক প্ৰসন্ন কৰিছিলোঁ। সন্তুষ্ট হৈ তেওঁ মোক চৌষট্টি কলাৰ আশ্চৰ্য জ্ঞান দান কৰিলে।

Verse 39

तुल्यं मम सहस्र॑ तु सुतानां ब्रह्मवादिनाम्‌ । आयुश्चैव सपुत्रस्य संवत्सरशतायुतम्‌,गर्गने कहा--पाण्डुनन्दन! मैंने सरस्वतीके तटपर मानस यज्ञ करके भगवान्‌ शिवको संतुष्ट किया था। इससे प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे चौंसठ कलाओंका अदभुत ज्ञान प्रदान किया। मुझे मेरे ही समान एक सहसखतर ब्रह्मवादी पुत्र दिये तथा पुत्रोंसहित मेरी दस लाख वर्षकी आयु नियत कर दी

গৰ্গে ক’লে—মোৰ সমান ব্রহ্মবাদী এক সহস্ৰ পুত্ৰ মোৰ আছে; আৰু পুত্ৰসহ মোৰ আয়ু শত অযুত বছৰৰূপে নিৰ্ধাৰিত হৈছে।

Verse 40

पराशर उवाच प्रसाद्येह पुरा शर्व मनसाचिन्तयं नृप । महातपा महातेजा महायोगी महायशा:,पराशरजीने कहा--नरेश्वर! पूर्वकालमें यहाँ मैंने महादेवजीको प्रसन्न करके मन-ही- मन उनका चिन्तन आरम्भ किया। मेरी इस तपस्याका उद्देश्य यह था कि मुझे महेश्वरकी कृपासे महातपस्वी, महातेजस्वी, महायोगी, महायशस्वी, दयालु, श्रीसम्पन्न एवं ब्रह्मनिष्ठ वेदव्यासनामक मनोवांछित पुत्र प्राप्त हो

পৰাশৰে ক’লে—হে নৰেশ্বৰ! পূৰ্বকালত এই ঠাইতেই মই শৰ্ব (মহাদেৱ)ক প্ৰসন্ন কৰি মনতে তেওঁৰ ধ্যান আৰম্ভ কৰিছিলোঁ—এই কামনাৰে যে তেওঁৰ কৃপাৰে মোৰ এক পুত্ৰ হওক মহাতপস্বী, মহাতেজস্বী, মহাযোগী আৰু মহাযশস্বী।

Verse 41

वेदव्यास: श्रियावासो ब्राह्मण: करुणान्वित: । अप्यसावीप्सित: पुत्रो मम स्याद्‌ वै महेश्वरात्‌,पराशरजीने कहा--नरेश्वर! पूर्वकालमें यहाँ मैंने महादेवजीको प्रसन्न करके मन-ही- मन उनका चिन्तन आरम्भ किया। मेरी इस तपस्याका उद्देश्य यह था कि मुझे महेश्वरकी कृपासे महातपस्वी, महातेजस्वी, महायोगी, महायशस्वी, दयालु, श्रीसम्पन्न एवं ब्रह्मनिष्ठ वेदव्यासनामक मनोवांछित पुत्र प्राप्त हो

পৰাশৰে ক’লে—মহেশ্বৰৰ কৃপাৰে সেই বেদব্যাস—শ্ৰীৰ আবাস, কৰুণান্বিত ব্ৰাহ্মণ—মোৰ ইপ্সিত পুত্ৰ হওক।

Verse 42

इति मत्वा हृदि मतं प्राह मां सुरसत्तम: । मयि सम्भावना यास्या: फलात्कृष्णो भविष्यति,मेरा ऐसा मनोरथ जानकर सुरश्रेष्ठ शिवने मुझसे कहा--'मुने! तुम्हारी मेरे प्रति जो सम्भावना है अर्थात्‌ जिस वरको पानेकी लालसा है, उसीसे तुम्हें कृष्ण नामक पुत्र प्राप्त होगा

হৃদয়ত স্থিৰ হোৱা মোৰ এই অভিপ্ৰায় জানি দেৱশ্ৰেষ্ঠ (শিৱ) মোক ক’লে—“মুনে! মোৰ প্ৰতি তোমাৰ যি শ্ৰদ্ধা-আকাংক্ষা, তাৰেই ফলত তোমাৰ ‘কৃষ্ণ’ নামৰ পুত্ৰ হ’ব।”

Verse 43

प्रीतश्च भगवान्‌ ज्ञानं ददौ मम भवान्तकम्‌ | “तत्पश्चात्‌ वहाँ सांख्यके आचार्य देवसम्मानित कपिलने कहा--“मैंने भी अनेक जन्मोंतक भक्तिभावसे भगवान्‌ शंकरकी आराधना की थी। इससे प्रसन्न होकर भगवानने मुझे भवभयनाशक ज्ञान प्रदान किया था”,सावर्णस्य मनो: सर्गे सप्तर्षिश्न भविष्यति । वेदानां च स वै वक्ता कुरुवंशकरस्तथा

বৈশম্পায়নে ক’লে— প্ৰসন্ন হৈ ভগৱানে মোক ভবভয়-নাশক জ্ঞান দান কৰিলে। তাৰ পাছত দেৱসম্মানিত সাংখ্যাচাৰ্য কপিলে ক’লে— “ময়ো বহু জন্ম ধৰি ভক্তিভাৱে ভগৱান শংকৰক আৰাধনা কৰিছিলোঁ। সন্তুষ্ট হৈ ভগৱানে মোক সংসাৰভয়-ধ্বংসকাৰী জ্ঞান প্ৰদান কৰিছিল। সাবৰ্ণ মনুৰ সৃষ্টিচক্ৰত সি সপ্তৰ্ষিসকলৰ মাজত হ’ব; সি বেদৰ বক্তা আৰু কুরু-বংশৰ প্ৰৱৰ্তকো হ’ব।”

Verse 44

इतिहासस्य कर्ता च पुत्रस्ते जगतो हित: । भविष्यति महेन्द्रस्य दयित: स महामुनि:

পৰাশৰে ক’লে— তোমাৰ পুত্ৰ ইতিহাসৰ ৰচয়িতা আৰু জগতৰ হিতকাৰী হ’ব। সেই মহামুনি মহেন্দ্ৰ (ইন্দ্ৰ)-ৰো প্ৰিয় হ’ব।

Verse 45

अजरश्नामरश्वैव पराशर सुतस्तव । एवमुक्त्या स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत

পৰাশৰে ক’লে— “অজৰাশ্ন আৰু অমৰাশ্ব— এই দুয়ো তোমাৰ পুত্ৰ, হে পৰাশৰপুত্ৰ।” এইদৰে কৈ সেই পূজ্য মহর্ষি তাতেই অন্তৰ্ধান হ’ল।

Verse 46

युधिष्ठिर महायोगी वीर्यवानक्षयोडव्यय: । 'सावर्णिक मन्वन्तरके समय जो सृष्टि होगी, उसमें तुम्हारा यह पुत्र सप्तर्षिके पदपर प्रतिष्ठित होगा तथा इस वैवस्वत मन्वन्तरमें वह वेदोंका वक्ता, कौरव-वंशका प्रवर्तक, इतिहासका निर्माता, जगत्‌का हितैषी तथा देवराज इन्द्रका परम प्रिय महामुनि होगा। पराशर! तुम्हारा वह पुत्र सदा अजर-अमर रहेगा।” युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महायोगी, शक्तिशाली, अविनाशी और निर्विकार भगवान्‌ शिव वहीं अन्तर्धान हो गये ।। माण्डव्य उवाच अचौरश्लौरशड्कायां शूले भिन्नो हाहं तदा,माण्डव्य बोले--नरेश्वर! मैं चोर नहीं था तो भी चोरीके संदेहमें मुझे शूलीपर चढ़ा दिया गया। वहींसे मैंने महादेवजीकी स्तुति की। तब उन्होंने मुझसे कहा--“विप्रवर! तुम शूलसे छुटकारा पा जाओगे और दस करोड़ वर्षोतक जीवित रहोगे। तुम्हारे शरीरमें इस शूलके धँसनेसे कोई पीड़ा नहीं होगी। तुम आधि-व्याधिसे मुक्त हो जाओगे

মাণ্ডব্য ক’লে— হে নৰেশ্বৰ! মই চোৰ নাছিলোঁ, তথাপি চুৰিৰ সন্দেহত মোক শূলে বিদ্ধ কৰা হৈছিল। সেই ঠাইৰ পৰাই মই মহাদেৱ শংকৰক স্তৱ কৰিলোঁ। তেতিয়া তেওঁ মোক ক’লে— “বিপ্ৰবৰ! তুমি শূলৰ পৰা মুক্ত হ’বা আৰু দহ কোটি বছৰ জীয়াই থাকিবা। শূল দেহত বিদ্ধ থাকিলেও তোমাৰ কোনো বেদনা নহ’ব; তুমি আধি-ব্যাধিৰ পৰা মুক্ত হ’বা।”

Verse 47

तत्रस्थेन स्तुतो देव: प्राह मां वै नरेश्वर । मोक्ष प्राप्स्यसि शूलाच्च जीविष्यसि समार्बुदम्‌,माण्डव्य बोले--नरेश्वर! मैं चोर नहीं था तो भी चोरीके संदेहमें मुझे शूलीपर चढ़ा दिया गया। वहींसे मैंने महादेवजीकी स्तुति की। तब उन्होंने मुझसे कहा--“विप्रवर! तुम शूलसे छुटकारा पा जाओगे और दस करोड़ वर्षोतक जीवित रहोगे। तुम्हारे शरीरमें इस शूलके धँसनेसे कोई पीड़ा नहीं होगी। तुम आधि-व्याधिसे मुक्त हो जाओगे

মাণ্ডব্য ক’লে— হে নৰেশ্বৰ! তাত শূলে বিদ্ধ অৱস্থাতেই মই দেৱক স্তৱ কৰিলোঁ। তেতিয়া সেই দেৱে মোক ক’লে— “তুমি শূলৰ পৰা মোক্ষ পাবা আৰু দহ কোটি বছৰ জীয়াই থাকিবা।”

Verse 48

रुजा शूलकृता चैव न ते विप्र भविष्यति । आधिभिव्यधिभिश्रैव वर्जितस्त्वं भविष्यसि,माण्डव्य बोले--नरेश्वर! मैं चोर नहीं था तो भी चोरीके संदेहमें मुझे शूलीपर चढ़ा दिया गया। वहींसे मैंने महादेवजीकी स्तुति की। तब उन्होंने मुझसे कहा--“विप्रवर! तुम शूलसे छुटकारा पा जाओगे और दस करोड़ वर्षोतक जीवित रहोगे। तुम्हारे शरीरमें इस शूलके धँसनेसे कोई पीड़ा नहीं होगी। तुम आधि-व्याधिसे मुक्त हो जाओगे

মাণ্ডব্য ক’লে—“হে বিপ্ৰ! শূলৰ পৰা হোৱা বেদনা তোমাৰ নহ’ব; আৰু তুমি মানসিক ক্লেশ আৰু শাৰীৰিক ব্যাধি—দুয়োটাৰ পৰা মুক্ত থাকিবা।”

Verse 49

पादाच्चतुर्थात्‌ सम्भूत आत्मा यस्मान्मुने तव । त्वं भविष्यस्यनुपमो जन्म वै सफल॑ कुरु,“मुने! तुम्हारा यह शरीर धर्मके चौथे पाद सत्यसे उत्पन्न हुआ है। अतः तुम अनुपम सत्यवादी होओगे। जाओ, अपना जन्म सफल करो

“হে মুনি! তোমাৰ আত্মা ধৰ্মৰ চতুৰ্থ পাদ—সত্য—ৰ পৰা উদ্ভূত; সেয়ে সত্যনিষ্ঠাত তুমি অনুপম হ’বা। যোৱা, তোমাৰ জন্ম সাৰ্থক কৰা।”

Verse 50

तीर्थाभिषेक॑ सकल त्वमविध्नेन चाप्स्यसि । स्वर्ग चैवाक्षयं विप्र विदधामि तवोर्जितम्‌,“ब्रह्मन! तुम्हें बिना किसी विघ्न-बाधाके सम्पूर्ण तीर्थोमें स्नानका सौभाग्य प्राप्त होगा। मैं तुम्हारे लिये अक्षय एवं तेजस्वी स्वर्गलोक प्रदान करता हूँ”

“হে বিপ্ৰ! কোনো বিঘ্ন নোহোৱাকৈ তুমি সকলো তীৰ্থত স্নানৰ সৌভাগ্য লাভ কৰিবা; আৰু মই তোমাক অক্ষয়, দীপ্তিমান স্বৰ্গ দান কৰোঁ।”

Verse 51

एवमुकक्‍त्वा तु भगवान्‌ वरेण्यो वृषवाहन: । महेश्वरो महाराज कृत्तिवासा महाद्युति:

এইদৰে কৈ ভগৱান্ বৰেণ্য বৃষবাহন—মহেশ্বৰ, মহাৰাজ, কৃত্তিবাসা, মহাদ্যুতি—আগবাঢ়িল।

Verse 52

गालव उवाच विश्वामित्रा भ्यनुज्ञातो हाहं पितरमागत:,न तात तरुण दान्तं पिता त्वां पश्यतेडनघ । गालवजीने कहा--राजन! विश्वामित्र मुनिकी आज्ञा पाकर मैं अपने पिताजीका दर्शन करनेके लिये घरपर आया। उस समय मेरी माता वैधव्यके दुःखसे दुःखी हो जोर-जोरसे रोती हुई मुझसे बोली--'तात! अनघ! कौशिक मुनिकी आज्ञा लेकर घरपर आये हुए वेदविद्यासे विभूषित तुझ तरुण एवं जितेन्द्रिय पुत्रको तुम्हारे पिता नहीं देख सके'

গালৱ ক’লে—“ৰাজন! বিশ্বামিত্ৰৰ অনুমতি লৈ মই পিতাক দৰ্শন কৰিবলৈ ঘৰলৈ আহিছোঁ; কিন্তু হায়, বৎস! অনঘ! তোমাৰ পিতা তোমাক—এই তরুণ, জিতেন্দ্ৰিয়—দেখিব নোৱাৰিলে।”

Verse 53

अब्रवीन्मां ततो माता दुःखिता रुदती भृशम्‌ | कौशिकेनाभ्यनुज्ञातं पुत्र वेदविभूषितम्‌

তেতিয়া মোৰ মাতৃ গভীৰ দুখত আচ্ছন্ন হৈ বহুত কান্দি কান্দি মোক ক’লে— “বৎস, কৌশিকে তোমাক অনুমতি দিছে, আৰু তুমি বেদবিদ্যাৰে ভূষিত।”

Verse 54

श्रुत्वा जनन्या वचन निराशो गुरुदर्शने

মাতৃৰ বাক্য শুনি গুৰুদৰ্শনৰ আশা হেৰুৱাই মই নিৰাশ হ’লোঁ।

Verse 55

नियतात्मा महादेवमपश्यं सो<ब्रवीच्च माम्‌ | पिता माता च ते त्वं च पुत्र मृत्युविवर्जिता:

মন সংযত কৰি সি মহাদেৱক দৰ্শন কৰিলে; তেতিয়া তেওঁ মোক ক’লে— “তোমাৰ পিতা-মাতা মই; আৰু তুমি মোৰ পুত্ৰ হ’বা— মৃত্যুবিবর্জিত।”

Verse 56

भविष्यथ विश क्षिप्रं द्रष्टासि पितरं क्षये । माताकी बात सुनकर मैं पिताके दर्शनसे निराश हो गया और मनको संयममें रखकर महादेवजीकी आराधना करके उनका दर्शन किया। उस समय वे मुझसे बोले--“वत्स! तुम्हारे पिता, माता और तुम तीनों ही मृत्युसे रहित हो जाओगे। अब तुम अपने घरमें शीघ्र प्रवेश करो। वहाँ तुम्हें पिताका दर्शन प्राप्त होगा” ।। अनुज्ञातो भगवता गृहं गत्वा युधिष्ठिर,तात युधिष्ठिर! भगवान्‌ शिवकी आज्ञासे मैंने पुनः घर जाकर वहाँ यज्ञ करके यज्ञशालासे निकले हुए पिताका दर्शन किया। वे उस समय समिधा, कुश और वृक्षोंसे अपने-आप गिरे हुए पके फल आदि हव्य पदार्थ लिये हुए थे

গালৱ ক’লে— “শীঘ্ৰে গৃহত প্ৰৱেশ কৰা; নিৰাশাৰ অন্তত তুমি পিতাক দৰ্শন কৰিবা।” এই কথা শুনি মই নিৰাশা ত্যাগ কৰিলোঁ, মন সংযত কৰি মহাদেৱক আৰাধনা কৰি তেওঁৰ দৰ্শন পালোঁ। তেতিয়া ভগৱানে ক’লে— “বৎস! তোমাৰ পিতা, মাতৃ আৰু তুমি— তিনিও মৃত্যুবিবর্জিত হ’বা। এতিয়া বিলম্ব নকৰিবা; গৃহত প্ৰৱেশ কৰা— তাত তুমি পিতাক দৰ্শন পাবা।” ভগৱান শিৱৰ আজ্ঞাৰে মই ঘৰলৈ উভতি গৈ যজ্ঞ কৰিলোঁ আৰু যজ্ঞশালাৰ পৰা ওলাই অহা পিতাক দৰ্শন কৰিলোঁ— তেওঁৰ হাতত সমিধা, কুশ আৰু গছৰ পৰা আপোনা-আপুনি সৰি পৰা পকা ফল আদি হব্যদ্ৰব্য আছিল।

Verse 57

अपश्य॑ पितरं तात इष्टिं कृत्वा विनि:सृतम्‌ । उपस्पृश्य गृहीत्वेध्मं कुशांश्ष शरणाकुरून्‌,तात युधिष्ठिर! भगवान्‌ शिवकी आज्ञासे मैंने पुनः घर जाकर वहाँ यज्ञ करके यज्ञशालासे निकले हुए पिताका दर्शन किया। वे उस समय समिधा, कुश और वृक्षोंसे अपने-आप गिरे हुए पके फल आदि हव्य पदार्थ लिये हुए थे

ইষ্টি সম্পন্ন কৰি যজ্ঞশালাৰ পৰা ওলাই অহা পিতাক মই দৰ্শন কৰিলোঁ। তেওঁ আচমন কৰি সমিধা, কুশ আৰু আন যজ্ঞোপকৰণ হাতত লৈছিল।

Verse 58

तान्‌ विसृज्य च मां प्राह पिता सास्राविलेक्षण: । प्रणमन्तं परिष्वज्य मूर्ध्न्युपाप्राय पाण्डव

তেওঁলোকক বিদায় দি মোৰ পিতা—অশ্ৰুসিক্ত নয়নে—মোক ক’লে। মই প্ৰণাম কৰোঁতেই তেওঁ মোক আলিঙ্গন কৰি, হে পাণ্ডুনন্দন, মোৰ মূৰ্ত্তক চুম্বন কৰিলে।

Verse 59

वैशम्पायन उवाच एतान्यत्यदभुतान्येव कर्माण्यथ महात्मन:,युधिष्टिरं धर्मनिरधि पुरुहृतमिवेश्वर: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मुनियोंके कहे हुए महादेवजीके ये अद्भुत चरित्र सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको बड़ा विस्मय हुआ। फिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने धर्मनिधि युधिष्ठिरसे उसी प्रकार कहा जैसे श्रीविष्णु देवराज इन्द्रसे कोई बात कहा करते हैं

বৈশম্পায়ন ক’লে—হে জনমেজয়! মুনিসকলৰ মুখে মহাত্মা মহাদেৱৰ এই পৰম অদ্ভুত কৰ্মসমূহ শুনি ধৰ্মনিধি পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠিৰ বিস্ময়ে অভিভূত হ’ল। তাৰ পিছত জ্ঞানীসকলৰ শ্ৰেষ্ঠ শ্ৰীকৃষ্ণে যুধিষ্ঠিৰক তেনেদৰে ক’লে, যেনেকৈ ভগৱান বিষ্ণুৱে পুরুহূত দেৱৰাজ ইন্দ্ৰক উপদেশ দিয়ে।

Verse 60

प्रोक्तानि मुनिभि: श्रुत्वा विस्मयामास पाण्डव: । ततः कृष्णो<ब्रवीद्‌ वाक्य पुनर्मतिमतां वर:

মুনিসকলে কোৱা উপদেশ শুনি পাণ্ডৱ বিস্ময়ত পৰিল। তেতিয়া জ্ঞানীসকলৰ শ্ৰেষ্ঠ কৃষ্ণে পুনৰ তেওঁৰ সৈতে কথা ক’লে।

Verse 61

वायुदेव उवाच उपमन्युर्मयि प्राह तपन्निव दिवाकर:,भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले--राजन! सूर्यके समान तपते हुए-से तेजस्वी उपमन्युने मेरे समीप कहा था कि “जो पापकर्मी मनुष्य अपने अशुभ आचरणोंसे कलुषित हो गये हैं, वे तमोगुणी या रजोगुणी वृत्तिके लोग भगवान्‌ शिवकी शरण नहीं लेते हैं

বায়ুদেৱ ক’লে—তপস্যাত সূৰ্যৰ দৰে দীপ্ত উপমন্যুৱে এবাৰ মোৰ ওচৰত ক’লে: “যিসকলে পাপকর্ম কৰি মন কলুষিত কৰে—যিসকলৰ প্ৰবৃত্তি তামসিক বা ৰাজসিক—তেওঁলোকে ভগৱান শিৱৰ শৰণ নলয়।”

Verse 62

अशुभै: पापकर्माणो ये नरा: कलुषीकृता: । ईशान न प्रपद्यन्ते तमोराजसवृत्तय:,भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले--राजन! सूर्यके समान तपते हुए-से तेजस्वी उपमन्युने मेरे समीप कहा था कि “जो पापकर्मी मनुष्य अपने अशुभ आचरणोंसे कलुषित हो गये हैं, वे तमोगुणी या रजोगुणी वृत्तिके लोग भगवान्‌ शिवकी शरण नहीं लेते हैं

যিসকল নৰ অশুভ আচৰণে পাপকর্মত লিপ্ত হৈ কলুষিত হৈছে—যিসকলৰ প্ৰবৃত্তি তামসিক বা ৰাজসিক—তেওঁলোকে ঈশান (ভগৱান শিৱ)ৰ শৰণ নলয়।

Verse 63

ईश्वरं सम्प्रपद्यन्ते द्विजा भावितभावना: । सर्वथा वर्तमानो5पि यो भक्त: परमेश्वरे

বায়ুৱে ক’লে—যিসকল দ্বিজৰ অন্তঃকৰণ সাধিত আৰু সংস্কৃত, তেওঁলোকে ঈশ্বৰৰ শৰণ লয়। আৰু যি মানুহ যিকোনো অৱস্থাত বাস কৰিলেও, যদি সি পৰমেশ্বৰৰ ভক্ত হয়, তেন্তে সি পৰম মঙ্গলত প্রতিষ্ঠিত।

Verse 64

सदृशो<5रण्यवासीनां मुनीनां भावितात्मनाम्‌ | “जिनका अन्त:ःकरण पवित्र है, वे ही द्विज महादेवजीकी शरण लेते हैं। जो परमेश्वर शिवका भका है, वह सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी पवित्र अन्तःकरणवाले वनवासी मुनियोंके समान है || ६३ $ ।। ब्रह्मत्वं केशवत्वं वा शक्रत्वं वा सुरैः सह

সি পবিত্ৰ অন্তঃকৰণযুক্ত অৰণ্যবাসী মুনিসকলৰ সদৃশ। সি ব্ৰহ্মত্ব লাভ কৰক, কেশৱত্ব লাভ কৰক, বা দেৱসকলৰ সৈতে শক্রত্ব—

Verse 65

मनसापि शिवं तात ये प्रपद्यन्ति मानवा:,विधूय सर्वपापानि देवै: सह वसन्ति ते । “तात! जो मनुष्य मनसे भी भगवान्‌ शिवकी शरण लेते हैं, वे सब पापोंका नाश करके देवताओंके साथ निवास करते हैं

বায়ুৱে ক’লে—তাত! যিসকল মানুহে মনৰ দ্বাৰাইও শিৱৰ শৰণ লয়, তেওঁলোকে সকলো পাপ ঝাৰি পেলাই দেৱসকলৰ সৈতে বাস কৰে।

Verse 66

भित्त्वा भित्त्वा च कूलानि हुत्वा सर्वमिदं जगत्‌

বাৰে বাৰে কূলৰ বাঁধ ভাঙি, আৰু এই সমগ্ৰ জগতক যেন যজ্ঞাগ্নিত আহুতি কৰি দহি পেলোৱা।

Verse 67

यजेद्‌ देवं विरूपाक्षं न स पापेन लिप्यते । “बारंबार तालाबके तटभूमिको खोद-खोदकर उन्हें चौपट कर देनेवाला और इस सारे जगत्‌को जलती आगमें झोंक देनेवाला पुरुष भी यदि महादेवजीकी आराधना करता है तो वह पापसे लिप्त नहीं होता है ।। सर्वलक्षणहीनो<पि युक्तो वा सर्वपातकैः

যি মানুহে দেৱ বিরূপাক্ষ (মহাদেৱ)ৰ পূজা কৰে, সি পাপত লিপ্ত নহয়। সি সকলো শুভলক্ষণহীন হওক, বা সকলো পাতিক্যে যুক্ত হওক—মহাদেৱ-আৰাধনাত যুক্ত থাকিলে সি কলুষিত নহয়।

Verse 68

कीटपक्षिपतड्ानां तिरश्षामपि केशव

বায়ুৱে ক’লে— “হে কেশৱ! কীট, পক্ষী আৰু পতঙ্গৰ মাজতো—আৰু তিৰ্যক্‌-যোনিৰ প্ৰাণীৰ মাজতো—ধৰ্মৰ বিধান কাৰ্য কৰে।”

Verse 69

महादेवप्रपन्नानां न भयं विद्यते क्वचित्‌ । “केशव! कीट, पतंग, पक्षी तथा पशु भी यदि महादेवजीकी शरणमें आ जाया तो उन्हें भी कहीं किसीका भय नहीं प्राप्त होता है ।। ६८ $ ।। एवमेव महादेवं भक्ता ये मानवा भुवि,“इसी प्रकार इस भूतलपर जो मानव महादेवजीके भक्त हैं, वे संसारके अधीन नहीं होते--यह मेरा निश्चित विचार है।” तदनन्तर भगवान्‌ श्रीकृष्णने स्वयं भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे कहा--

বায়ুদেৱে ক’লে— “যিসকলে মহাদেৱৰ শৰণ লয়, তেওঁলোকৰ ক’তো ভয় নাথাকে। হে কেশৱ! কীট, পতঙ্গ, পক্ষী আৰু পশুও যদি মহাদেৱৰ আশ্ৰয় পায়, তেন্তে কাৰোৰ পৰা ভয় তেওঁলোকলৈ নপৰে। সেইদৰে এই পৃথিৱীত যিসকল মানুহ মহাদেৱভক্ত, তেওঁলোক সংসাৰবন্ধনত আবদ্ধ নহয়—ই মোৰ দৃঢ় বিশ্বাস।” তাৰ পিছত ভগৱান শ্ৰীকৃষ্ণে স্বয়ং ধৰ্মপুত্ৰ যুধিষ্ঠিৰক ক’লে—

Verse 70

न ते संसारवशगा इति मे निश्चिता मति: । ततः कृष्णो<ब्रवीद्‌ वाक्‍्यं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्‌,“इसी प्रकार इस भूतलपर जो मानव महादेवजीके भक्त हैं, वे संसारके अधीन नहीं होते--यह मेरा निश्चित विचार है।” तदनन्तर भगवान्‌ श्रीकृष्णने स्वयं भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे कहा--

“তেওঁলোক সংসাৰৰ বশৱৰ্তী নহয়”—এই মোৰ স্থিৰ মত। তেতিয়া কৃষ্ণে ধৰ্মপুত্ৰ যুধিষ্ঠিৰক কথা ক’লে।

Verse 71

विष्णुरुवाच आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च द्यौर्भूमिरापो वसवो<थ विश्वे । धातार्यमा शुक्रबृूहस्पती च रुद्रा: ससाध्या वरुणो5थगोप:,श्रीकृष्ण बोले--अजमीढवंशी धर्मराज! जो सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, वसु, विश्वदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र, बृहस्पति, रुद्रणण, साध्यगण, राजा वरुण, ब्रह्मा, इन्द्र, वायुदेव, ३>कार, सत्य, वेद, यज्ञ, दक्षिणा, वेदपाठी ब्राह्मण, सोमरस, यजमान, हवनीय हविष्य, रक्षा, दीक्षा, सब प्रकारके संयम, स्वाहा, वौषट, ब्राह्मणगण, गौ, श्रेष्ठ धर्म, कालचक्र, बल, यश, दम, बुद्धिमानोंकी स्थिति, शुभाशुभ कर्म, सप्तर्षि, श्रेष्ठ बुद्धि, मन, दर्शन, श्रेष्ठ स्पर्श, कर्मोंकी सिद्धि, ऊष्मप, सोमप, लेख, याम तथा तुषित आदि देवगण, ब्राह्मण-शरीर, दीप्तिशाली गन्धप, धूमप ऋषि, वाग्विरुद्ध और मनोविरुद्ध भाव, शुद्धभाव, निर्माण-कार्यमें तत्पर रहनेवाले देवता, स्पर्शमात्रसे भोजन करनेवाले, दर्शनमात्रसे पेय रसका पान करनेवाले, घृत पीनेवाले हैं, जिनके संकल्प करनेमात्रसे अभीष्ट वस्तु नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित होने लगती है, ऐसे जो देवताओंमें मुख्य गण हैं, जो दूसरे-दूसरे देवता हैं, जो सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच, दानव, यक्ष, चारण तथा नाग हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म, कोमल, असूक्ष्म, सुख, इस लोकके दुःख, परलोकके दुःख, सांख्य, योग एवं पुरुषार्थोमें श्रेष्ठ मोक्षरूप परम पुरुषार्थ बताया गया है; इन सबको तुम महादेवजीसे ही उत्पन्न हुआ समझो

বিষ্ণুৱে ক’লে— “সূৰ্য আৰু চন্দ্ৰ; বায়ু আৰু অগ্নি; স্বৰ্গ আৰু পৃথিৱী; জল; বসুগণ আৰু বিশ্বদেৱগণ; ধাতা আৰু আৰ্যমান; শুক্ৰ আৰু বৃহস্পতি; সাধ্যগণসহ ৰুদ্ৰগণ; আৰু বৰুণ তথা লোকপাল—এই সকলো দিৱ্য শক্তি মহাদেৱৰ পৰাই উদ্ভূত বুলি জানিবা।”

Verse 72

ब्रह्मा शक्रो मारुतो ब्रह्म सत्यं वेदा यज्ञा दक्षिणा वेदवाहा: । सोमो यष्टा यच्च हव्यं हविश्व रक्षा दीक्षा संयमा ये च केचित्‌,श्रीकृष्ण बोले--अजमीढवंशी धर्मराज! जो सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, वसु, विश्वदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र, बृहस्पति, रुद्रणण, साध्यगण, राजा वरुण, ब्रह्मा, इन्द्र, वायुदेव, ३>कार, सत्य, वेद, यज्ञ, दक्षिणा, वेदपाठी ब्राह्मण, सोमरस, यजमान, हवनीय हविष्य, रक्षा, दीक्षा, सब प्रकारके संयम, स्वाहा, वौषट, ब्राह्मणगण, गौ, श्रेष्ठ धर्म, कालचक्र, बल, यश, दम, बुद्धिमानोंकी स्थिति, शुभाशुभ कर्म, सप्तर्षि, श्रेष्ठ बुद्धि, मन, दर्शन, श्रेष्ठ स्पर्श, कर्मोंकी सिद्धि, ऊष्मप, सोमप, लेख, याम तथा तुषित आदि देवगण, ब्राह्मण-शरीर, दीप्तिशाली गन्धप, धूमप ऋषि, वाग्विरुद्ध और मनोविरुद्ध भाव, शुद्धभाव, निर्माण-कार्यमें तत्पर रहनेवाले देवता, स्पर्शमात्रसे भोजन करनेवाले, दर्शनमात्रसे पेय रसका पान करनेवाले, घृत पीनेवाले हैं, जिनके संकल्प करनेमात्रसे अभीष्ट वस्तु नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित होने लगती है, ऐसे जो देवताओंमें मुख्य गण हैं, जो दूसरे-दूसरे देवता हैं, जो सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच, दानव, यक्ष, चारण तथा नाग हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म, कोमल, असूक्ष्म, सुख, इस लोकके दुःख, परलोकके दुःख, सांख्य, योग एवं पुरुषार्थोमें श्रेष्ठ मोक्षरूप परम पुरुषार्थ बताया गया है; इन सबको तुम महादेवजीसे ही उत्पन्न हुआ समझो

বায়ুদেৱে ক’লে— “ব্ৰহ্মা, ইন্দ্ৰ আৰু মই (মাৰুত/বায়ু); ব্ৰহ্ম আৰু সত্য; বেদ, যজ্ঞ আৰু দক্ষিণা; বেদবাহকসকল; সোম; যজমান; হব্য আৰু হৱি; ৰক্ষা, দীক্ষা আৰু যি যি সংযম আছে—এই সকলো মহাদেৱৰ আশ্ৰয়ত স্থিত, এইদৰে জানিবা।”

Verse 73

स्वाहा वौषट ब्राह्मणा: सौरभेयी धर्म चाग्रयं कालचक्रं बल॑ च | यशो दमो बुद्धिमतां स्थितिश्न शुभाशुभं ये मुनयश्न सप्त,श्रीकृष्ण बोले--अजमीढवंशी धर्मराज! जो सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, वसु, विश्वदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र, बृहस्पति, रुद्रणण, साध्यगण, राजा वरुण, ब्रह्मा, इन्द्र, वायुदेव, ३>कार, सत्य, वेद, यज्ञ, दक्षिणा, वेदपाठी ब्राह्मण, सोमरस, यजमान, हवनीय हविष्य, रक्षा, दीक्षा, सब प्रकारके संयम, स्वाहा, वौषट, ब्राह्मणगण, गौ, श्रेष्ठ धर्म, कालचक्र, बल, यश, दम, बुद्धिमानोंकी स्थिति, शुभाशुभ कर्म, सप्तर्षि, श्रेष्ठ बुद्धि, मन, दर्शन, श्रेष्ठ स्पर्श, कर्मोंकी सिद्धि, ऊष्मप, सोमप, लेख, याम तथा तुषित आदि देवगण, ब्राह्मण-शरीर, दीप्तिशाली गन्धप, धूमप ऋषि, वाग्विरुद्ध और मनोविरुद्ध भाव, शुद्धभाव, निर्माण-कार्यमें तत्पर रहनेवाले देवता, स्पर्शमात्रसे भोजन करनेवाले, दर्शनमात्रसे पेय रसका पान करनेवाले, घृत पीनेवाले हैं, जिनके संकल्प करनेमात्रसे अभीष्ट वस्तु नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित होने लगती है, ऐसे जो देवताओंमें मुख्य गण हैं, जो दूसरे-दूसरे देवता हैं, जो सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच, दानव, यक्ष, चारण तथा नाग हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म, कोमल, असूक्ष्म, सुख, इस लोकके दुःख, परलोकके दुःख, सांख्य, योग एवं पुरुषार्थोमें श्रेष्ठ मोक्षरूप परम पुरुषार्थ बताया गया है; इन सबको तुम महादेवजीसे ही उत्पन्न हुआ समझो

বায়ুৱে ক’লে— যজ্ঞবিধানত ‘স্বাহা’ আৰু ‘বৌষট্’, ব্ৰাহ্মণসকল, সৌৰভেয়ী গাই, শ্ৰেষ্ঠ ধৰ্ম, কালচক্ৰ আৰু বল আছে। তদ্ৰূপ যশ, দম, বুদ্ধিমানসকলৰ স্থিতি, শুভ-অশুভ কৰ্মফল আৰু সপ্তৰ্ষিও আছে। এই সকলোকে—আৰু আগতে উল্লিখিত দিৱ্য তত্ত্বসমূহসহ—মহাদেৱৰ পৰা উদ্ভূত বুলি জানিবা।

Verse 74

अग्रया बुद्धिर्मनसा दर्शने च स्पर्शक्षाग्रय: कर्मणां या च सिद्धि: । गणा देवानामूष्मपा: सोमपाश्न लेखा: सुयामास्तुषिता ब्रह्मुकाया:,श्रीकृष्ण बोले--अजमीढवंशी धर्मराज! जो सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, वसु, विश्वदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र, बृहस्पति, रुद्रणण, साध्यगण, राजा वरुण, ब्रह्मा, इन्द्र, वायुदेव, ३>कार, सत्य, वेद, यज्ञ, दक्षिणा, वेदपाठी ब्राह्मण, सोमरस, यजमान, हवनीय हविष्य, रक्षा, दीक्षा, सब प्रकारके संयम, स्वाहा, वौषट, ब्राह्मणगण, गौ, श्रेष्ठ धर्म, कालचक्र, बल, यश, दम, बुद्धिमानोंकी स्थिति, शुभाशुभ कर्म, सप्तर्षि, श्रेष्ठ बुद्धि, मन, दर्शन, श्रेष्ठ स्पर्श, कर्मोंकी सिद्धि, ऊष्मप, सोमप, लेख, याम तथा तुषित आदि देवगण, ब्राह्मण-शरीर, दीप्तिशाली गन्धप, धूमप ऋषि, वाग्विरुद्ध और मनोविरुद्ध भाव, शुद्धभाव, निर्माण-कार्यमें तत्पर रहनेवाले देवता, स्पर्शमात्रसे भोजन करनेवाले, दर्शनमात्रसे पेय रसका पान करनेवाले, घृत पीनेवाले हैं, जिनके संकल्प करनेमात्रसे अभीष्ट वस्तु नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित होने लगती है, ऐसे जो देवताओंमें मुख्य गण हैं, जो दूसरे-दूसरे देवता हैं, जो सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच, दानव, यक्ष, चारण तथा नाग हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म, कोमल, असूक्ष्म, सुख, इस लोकके दुःख, परलोकके दुःख, सांख्य, योग एवं पुरुषार्थोमें श्रेष्ठ मोक्षरूप परम पुरुषार्थ बताया गया है; इन सबको तुम महादेवजीसे ही उत्पन्न हुआ समझो

বায়ুদেৱে ক’লে— অন্তঃকৰণৰ শক্তিসমূহৰ ভিতৰত বুদ্ধি আৰু মন, লগতে দৰ্শন আৰু স্পৰ্শশক্তি শ্ৰেষ্ঠ; আৰু কৰ্মক অভীষ্ট সিদ্ধিলৈ নিয়া যি সিদ্ধি, সেয়াও শ্ৰেষ্ঠ বুলি কীৰ্তিত। দেৱগণৰ মাজত ঊষ্মপ, সোমপ, লেখ, সুয়াম, তুষিত আৰু ব্ৰহ্মকায় নামৰ শ্ৰেণীও আছে।

Verse 75

आभासुरा गन्धपा धूमपाश्च वाचा विरुद्धाश्ष मनोविरुद्धा: । शुद्धाश्न निर्माणरताश्च देवा: स्पर्शाशना दर्शपा आज्यपाक्ष,श्रीकृष्ण बोले--अजमीढवंशी धर्मराज! जो सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, वसु, विश्वदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र, बृहस्पति, रुद्रणण, साध्यगण, राजा वरुण, ब्रह्मा, इन्द्र, वायुदेव, ३>कार, सत्य, वेद, यज्ञ, दक्षिणा, वेदपाठी ब्राह्मण, सोमरस, यजमान, हवनीय हविष्य, रक्षा, दीक्षा, सब प्रकारके संयम, स्वाहा, वौषट, ब्राह्मणगण, गौ, श्रेष्ठ धर्म, कालचक्र, बल, यश, दम, बुद्धिमानोंकी स्थिति, शुभाशुभ कर्म, सप्तर्षि, श्रेष्ठ बुद्धि, मन, दर्शन, श्रेष्ठ स्पर्श, कर्मोंकी सिद्धि, ऊष्मप, सोमप, लेख, याम तथा तुषित आदि देवगण, ब्राह्मण-शरीर, दीप्तिशाली गन्धप, धूमप ऋषि, वाग्विरुद्ध और मनोविरुद्ध भाव, शुद्धभाव, निर्माण-कार्यमें तत्पर रहनेवाले देवता, स्पर्शमात्रसे भोजन करनेवाले, दर्शनमात्रसे पेय रसका पान करनेवाले, घृत पीनेवाले हैं, जिनके संकल्प करनेमात्रसे अभीष्ट वस्तु नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित होने लगती है, ऐसे जो देवताओंमें मुख्य गण हैं, जो दूसरे-दूसरे देवता हैं, जो सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच, दानव, यक्ष, चारण तथा नाग हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म, कोमल, असूक्ष्म, सुख, इस लोकके दुःख, परलोकके दुःख, सांख्य, योग एवं पुरुषार्थोमें श्रेष्ठ मोक्षरूप परम पुरुषार्थ बताया गया है; इन सबको तुम महादेवजीसे ही उत्पन्न हुआ समझो

বায়ুৱে ক’লে— কিছুমান দীপ্তিমান দেৱগণ গন্ধ আৰু ধোঁৱা ‘পান’ কৰে। কিছুমানৰ অৱস্থা সাধাৰণ বাক্যৰো বিপৰীত, আৰু সাধাৰণ মনৰো বিপৰীত। কিছুমান শুদ্ধ দেৱ সৃষ্টিনিৰ্মাণৰ কাৰ্যত ৰত। কিছুমান স্পৰ্শমাত্ৰে আহাৰ গ্ৰহণ কৰে, কিছুমান দৰ্শনমাত্ৰে পানীয় ৰস পান কৰে, আৰু কিছুমান ঘৃত পান কৰে।

Verse 76

चिन्त्यद्योता ये च देवेषु मुख्या ये चाप्यन्ये देवताश्नाजमीढ । सुपर्णगन्धर्वपिशाचदानवा यक्षास्तथा चारणपन्नगाश्ष,श्रीकृष्ण बोले--अजमीढवंशी धर्मराज! जो सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, वसु, विश्वदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र, बृहस्पति, रुद्रणण, साध्यगण, राजा वरुण, ब्रह्मा, इन्द्र, वायुदेव, ३>कार, सत्य, वेद, यज्ञ, दक्षिणा, वेदपाठी ब्राह्मण, सोमरस, यजमान, हवनीय हविष्य, रक्षा, दीक्षा, सब प्रकारके संयम, स्वाहा, वौषट, ब्राह्मणगण, गौ, श्रेष्ठ धर्म, कालचक्र, बल, यश, दम, बुद्धिमानोंकी स्थिति, शुभाशुभ कर्म, सप्तर्षि, श्रेष्ठ बुद्धि, मन, दर्शन, श्रेष्ठ स्पर्श, कर्मोंकी सिद्धि, ऊष्मप, सोमप, लेख, याम तथा तुषित आदि देवगण, ब्राह्मण-शरीर, दीप्तिशाली गन्धप, धूमप ऋषि, वाग्विरुद्ध और मनोविरुद्ध भाव, शुद्धभाव, निर्माण-कार्यमें तत्पर रहनेवाले देवता, स्पर्शमात्रसे भोजन करनेवाले, दर्शनमात्रसे पेय रसका पान करनेवाले, घृत पीनेवाले हैं, जिनके संकल्प करनेमात्रसे अभीष्ट वस्तु नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित होने लगती है, ऐसे जो देवताओंमें मुख्य गण हैं, जो दूसरे-दूसरे देवता हैं, जो सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच, दानव, यक्ष, चारण तथा नाग हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म, कोमल, असूक्ष्म, सुख, इस लोकके दुःख, परलोकके दुःख, सांख्य, योग एवं पुरुषार्थोमें श्रेष्ठ मोक्षरूप परम पुरुषार्थ बताया गया है; इन सबको तुम महादेवजीसे ही उत्पन्न हुआ समझो

বায়ুৱে ক’লে— হে অজমীঢ়! দেৱসকলৰ মাজত যিসকল মুখ্য দীপ্তিমান, আৰু আন দেৱতাসকল; লগতে সুপৰ্ণ, গন্ধৰ্ব, পিশাচ, দানৱ, যক্ষ, চাৰণ আৰু নাগ—এই সকলোকে মহাদেৱৰ পৰা উদ্ভূত বুলি জানিবা।

Verse 77

स्थूलं सूक्ष्मं मृदु चाप्यसूक्ष्मं दुःखं सुखं दुःखमनन्तरं च । सांख्य॑ योगं तत्पराणां परं च शर्वाज्जातं विद्धि यत्‌ कीर्तितं मे,श्रीकृष्ण बोले--अजमीढवंशी धर्मराज! जो सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, वसु, विश्वदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र, बृहस्पति, रुद्रणण, साध्यगण, राजा वरुण, ब्रह्मा, इन्द्र, वायुदेव, ३>कार, सत्य, वेद, यज्ञ, दक्षिणा, वेदपाठी ब्राह्मण, सोमरस, यजमान, हवनीय हविष्य, रक्षा, दीक्षा, सब प्रकारके संयम, स्वाहा, वौषट, ब्राह्मणगण, गौ, श्रेष्ठ धर्म, कालचक्र, बल, यश, दम, बुद्धिमानोंकी स्थिति, शुभाशुभ कर्म, सप्तर्षि, श्रेष्ठ बुद्धि, मन, दर्शन, श्रेष्ठ स्पर्श, कर्मोंकी सिद्धि, ऊष्मप, सोमप, लेख, याम तथा तुषित आदि देवगण, ब्राह्मण-शरीर, दीप्तिशाली गन्धप, धूमप ऋषि, वाग्विरुद्ध और मनोविरुद्ध भाव, शुद्धभाव, निर्माण-कार्यमें तत्पर रहनेवाले देवता, स्पर्शमात्रसे भोजन करनेवाले, दर्शनमात्रसे पेय रसका पान करनेवाले, घृत पीनेवाले हैं, जिनके संकल्प करनेमात्रसे अभीष्ट वस्तु नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित होने लगती है, ऐसे जो देवताओंमें मुख्य गण हैं, जो दूसरे-दूसरे देवता हैं, जो सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच, दानव, यक्ष, चारण तथा नाग हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म, कोमल, असूक्ष्म, सुख, इस लोकके दुःख, परलोकके दुःख, सांख्य, योग एवं पुरुषार्थोमें श्रेष्ठ मोक्षरूप परम पुरुषार्थ बताया गया है; इन सबको तुम महादेवजीसे ही उत्पन्न हुआ समझो

বায়ুৱে ক’লে— স্থূল আৰু সূক্ষ্ম, মৃদু আৰু অসূক্ষ্ম; দুখ আৰু সুখ, আৰু তাৰ পিছত অহা দুখো; সাংখ্য আৰু যোগ, আৰু তাত তৎপৰ লোকসকলৰ পৰম লক্ষ্যো—মই যি কীৰ্তন কৰিলোঁ, সেয়া সকলো শৰ্ব (শিৱ)ৰ পৰা জাত বুলি জানিবা।

Verse 78

तत्सम्भूता भूतकृतो वरेण्या: सर्वे देवा भुवनस्यास्य गोपा: । आविश्येमां धरणीं ये5भ्यरक्षन्‌ पुरातनीं तस्य देवस्य सृष्टिम्‌

ভূতস্ৰষ্টাৰ সেই পৰম বৰৰ পৰা উৎপন্ন, বন্দনীয় আৰু শ্ৰেষ্ঠ সকলো দেৱতা এই জগতৰ ৰক্ষক হ’ল। তেওঁলোকে এই পৃথিৱীত প্ৰৱেশ কৰি সেই দেৱৰ প্ৰাচীন সৃষ্টিক ৰক্ষা কৰিলে আৰু লোক-ব্যৱস্থাক অক্ষুণ্ণ ৰাখিলে।

Verse 79

जो इस भूतलमें प्रवेश करके महादेवजीकी पूर्वकृत सृष्टिकी रक्षा करते हैं, जो समस्त जगतके रक्षक, विभिन्न प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले और श्रेष्ठ हैं, वे सम्पूर्ण देवता भगवान्‌ शिवसे ही प्रकट हुए हैं ।। विचिन्वन्तस्तपसा तत्स्थवीय: किंचित्‌ तत्त्व प्राणहेतोर्नतो5स्मि । ददातु देव: स वरानिहेष्टा- नभिष्टृतो नः प्रभुरव्यय: सदा

বায়ুৱে ক’লে—যিসকলে এই ভূতলত প্ৰৱেশ কৰি মহাদেৱে পূৰ্বে সৃষ্ট কৰা সৃষ্টিক ৰক্ষা কৰে, যিসকলে সমগ্ৰ জগতৰ ৰক্ষক, নানাবিধ প্ৰাণীৰ স্ৰষ্টা আৰু শ্ৰেষ্ঠ—সেই সকলো দেৱতা কেৱল ভগৱান শিৱৰ পৰাই প্ৰাদুৰ্ভূত। তপস্যাৰে সেই গাঢ় তত্ত্বৰ অনুসন্ধান কৰি, প্ৰাণৰক্ষাৰ্থে মই প্ৰণাম কৰোঁ। আমাৰ দ্বাৰা স্তূত, সদা অব্যয় প্ৰভু সেই দেৱে ইয়াত আমাক অভীষ্ট বৰ দান কৰক।

Verse 80

ऋषि-मुनि तपस्याद्वारा जिसका अन्वेषण करते हैं, उस सदा स्थिर रहनेवाले अनिर्वचनीय परम सूक्ष्म तत्त्वस्वरूप सदाशिवको मैं जीवन-रक्षाके लिये नमस्कार करता हूँ। जिन अविनाशी प्रभुकी मेरे द्वारा सदा ही स्तुति की गयी है, वे महादेव यहाँ मुझे अभीष्ट वरदान दें ।। इमं स्तवं संनियतेन्द्रियश्व भूत्वा शुचिर्य: पुरुष: पठेत । अभग्नयोगो नियतो मासमेकं सम्प्राप्तुयादश्चमेधे फलं यत्‌,जो पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करके पवित्र होकर इस स्तोत्रका पाठ करेगा और नियमपूर्वक एक मासतक अखण्डरूपसे इस पाठको चलाता रहेगा, वह अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त कर लेगा

বায়ুৱে ক’লে—ঋষি-মুনিসকলে তপস্যাৰে যাৰ অনুসন্ধান কৰে, সেই সদা স্থিৰ, অনিৰ্বচনীয়, পৰম সূক্ষ্ম তত্ত্বৰূপ সদাশিৱক মই প্ৰাণৰক্ষাৰ্থে প্ৰণাম কৰোঁ। যাক মই সদায় স্তৱ কৰি আহিছোঁ, সেই অবিনাশী প্ৰভু মহাদেৱে ইয়াত মোক অভীষ্ট বৰ দান কৰক। যি পুৰুষ ইন্দ্ৰিয় সংযম কৰি শুদ্ধ হৈ এই স্তোত্ৰ পাঠ কৰিব আৰু নিয়মেৰে এক মাহ অবিচ্ছিন্নভাৱে সাধনা চলাই যাব, সি অশ্বমেধ যজ্ঞৰ সমতুল্য ফল লাভ কৰিব।

Verse 81

वेदान्‌ कृत्स्नान्‌ ब्राह्मण: प्राप्तुयात्‌ तु जयेन्नूप: पार्थ महीं च कृत्स्नाम्‌ । वैश्यो लाभ प्राप्त॒यान्नैपुणं च शूद्रो गतिं प्रेत्य तथा सुखं च,कुन्तीनन्दन! ब्राह्मण इसके पाठसे सम्पूर्ण वेदोंके स्वाध्यायका फल पाता है। क्षत्रिय समस्त पृथ्वीपर विजय प्राप्त कर लेता है। वैश्य व्यापारकृशलता एवं महान्‌ लाभका भागी होता है और शूद्र इहलोकमें सुख तथा परलोकमें सदगति पाता है

বায়ুৱে ক’লে—কুন্তীনন্দন! ইয়াৰ পাঠে ব্রাহ্মণে সকলো বেদস্বাধ্যায়ৰ পূৰ্ণ ফল লাভ কৰে। ক্ষত্রিয়—হে পাৰ্থ—সমগ্ৰ পৃথিৱী জয় কৰে। বৈশ্যই বাণিজ্যত নৈপুণ্য আৰু মহালাভ পায়। আৰু শূদ্ৰই ইহলোকে সুখ আৰু মৃত্যুৰ পিছত পৰলোকে সদ্গতি লাভ কৰে।

Verse 82

स्तवराजमिमं कृत्वा रुद्राय दघधिरे मन: । सर्वदोषापहं पुण्यं पवित्रं च यशस्विन:,जो लोग सम्पूर्ण दोषोंका नाश करनेवाले इस पुण्यजनक पवित्र स्तवराजका पाठ करके भगवान्‌ रुद्रके चिन्तनमें मन लगाते हैं, वे यशस्वी होते हैं

বায়ুৱে ক’লে—যিসকলে ৰুদ্ৰৰ উদ্দেশ্যে এই স্তৱৰাজ পাঠ কৰি মনক তেওঁৰ ধ্যানত স্থিৰ কৰে, তেওঁলোক যশস্বী হয়। এই পবিত্ৰ আৰু পুণ্যদায়ক স্তৱৰাজে সকলো দোষ নাশ কৰে আৰু পাঠকক শুদ্ধ কৰে।

Verse 83

यावन्त्यस्य शरीरेषु रोमकूपाणि भारत । तावन्त्यब्दसहस््राणि स्वर्गे वसति मानव:,भरतनन्दन! मनुष्यके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला मनुष्य उतने ही हजार वर्षोतक स्वर्गमें निवास करता है

বায়ুদেৱে ক’লে—হে ভাৰত! মানুহৰ দেহত যিমান ৰোমকূপ আছে, এই স্তোত্ৰ পাঠ কৰা জনে সিমান সহস্ৰ বছৰ স্বৰ্গত বাস কৰে।

Verse 131

इसके बाद भगवान्‌ वाल्मीकिने राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा--'भारत! एक समय अन्निहोत्री मुनियोंके साथ मेरा विवाद हो रहा था। उस समय उन्होंने कुपित होकर मुझे शाप दे दिया कि “तुम ब्रह्महत्यारे हो जाओ।” उनके इतना कहते ही मैं क्षणभरमें उस अधर्मसे व्याप्त हो गया। तब मैं पापरहित एवं अमोघ शक्तिवाले भगवान्‌ शंकरकी शरणमें गया। इससे मैं उस पापसे मुक्त हो गया। फिर उन दुःखनाशन त्रिपुरहन्ता रुद्रने मुझसे कहा -- तुम्हें सर्वश्रेष्ठ सुयश प्राप्त होगा” ।। जामदग्न्यश्न कौन्तेयमिदं धर्मभूतां वर: । ऋषिमध्ये स्थित: प्राह ज्वलन्निव दिवाकर:

তেতিয়া জামদগ্ন্য (পৰশুৰাম)—ধৰ্মধাৰীৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ—ঋষিসকলৰ মাজত থিয় হৈ, সূৰ্যৰ দৰে জ্বলি উঠি, কুন্তীপুত্ৰ যুধিষ্ঠিৰক ক’লে।

Verse 313

अपराजितश्न युद्धेषु तेजश्ैवानलोपमम्‌ । “युधिष्ठिर! तब भगवान्‌ शिवने मुझसे प्रसन्नता-पूर्वक कहा--'श्रीकृष्ण! तुम मेरी कृपासे प्रिय पदार्थोकी अपेक्षा भी अत्यन्त प्रिय होओगे। युद्धमें तुम्हारी कभी पराजय नहीं होगी तथा तुम्हें अग्निके समान दुस्सह तेजकी प्राप्ति होगी”

“যুদ্ধত তুমি অপৰাজিত থাকিবা, আৰু অগ্নিৰ দৰে দুৰসহ তেজ লাভ কৰিবা।”

Verse 513

सगणो दैवतश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीयत । महाराज! ऐसा कहकर कृत्तिवासा, महातेजस्वी, वृषभवाहन तथा वरणीय सुरश्रेष्ठ भगवान्‌ महेश्वर अपने गणोंके साथ वहीं अन्तर्धान हो गये

এইদৰে কৈ দেৱশ্ৰেষ্ঠ মহেশ্বৰ নিজৰ গণসমেত তাতেই অন্তৰ্ধান হ’ল।

Verse 536

न तात तरुण दान्तं पिता त्वां पश्यतेडनघ । गालवजीने कहा--राजन! विश्वामित्र मुनिकी आज्ञा पाकर मैं अपने पिताजीका दर्शन करनेके लिये घरपर आया। उस समय मेरी माता वैधव्यके दुःखसे दुःखी हो जोर-जोरसे रोती हुई मुझसे बोली--'तात! अनघ! कौशिक मुनिकी आज्ञा लेकर घरपर आये हुए वेदविद्यासे विभूषित तुझ तरुण एवं जितेन्द्रिय पुत्रको तुम्हारे पिता नहीं देख सके'

“বৎস! অনঘ! কৌশিক মুনিৰ আজ্ঞা লৈ ঘৰত উভতি অহা, বেদবিদ্যাৰে ভূষিত, যুৱক আৰু জিতেন্দ্ৰিয় তোমাক তোমাৰ পিতাই দেখা নাপালে।”

Verse 583

दिष्ट्या दृष्टोडसि मे पुत्र कृतविद्य इहागत: । पाण्डुनन्दन! उन्हें देखते ही मैं उनके चरणोंमें पड़ गया; फिर पिताजीने भी उन समिधा आदि वस्तुओंको अलग रखकर मुझे हृदयसे लगा लिया और मेरा मस्तक सूँघकर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए मुझसे कहा--“बेटा! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम विद्वान होकर घर आ गये और मैंने तुम्हें भर आँख देख लिया”

গালৱে ক’লে— “সৌভাগ্যবশত, পুত্ৰ! বিদ্যা সম্পূৰ্ণ কৰি তুমি ঘৰলৈ আহিছা, আৰু মই তোমাক দেখিলোঁ। হে পাণ্ডুনন্দন! তেওঁলোকক দেখামাত্ৰেই মই তেওঁলোকৰ চৰণত পৰি গ’লোঁ। তাৰ পাছত মোৰ পিতাই সমিধা আদি যজ্ঞ-সামগ্ৰী একাষে থৈ, হৃদয়পূৰ্বক মোক আলিঙ্গন কৰিলে, স্নেহে মোৰ মূৰ ঘ্ৰাণ কৰি, অশ্ৰুসজল নয়নে ক’লে— ‘বেটা! তুমি পণ্ডিত হৈ ঘূৰি আহিলা, ই মহা সৌভাগ্য; আৰু মই মোৰ চকুৰে তোমাক পৰিপূৰ্ণভাৱে দেখিবলৈ পালোঁ, ইও মহা আশীৰ্বাদ।’”

Verse 603

युधिष्टिरं धर्मनिरधि पुरुहृतमिवेश्वर: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मुनियोंके कहे हुए महादेवजीके ये अद्भुत चरित्र सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको बड़ा विस्मय हुआ। फिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने धर्मनिधि युधिष्ठिरसे उसी प्रकार कहा जैसे श्रीविष्णु देवराज इन्द्रसे कोई बात कहा करते हैं

বৈশম্পায়নে ক’লে— “হে জনমেজয়! মুনিসকলে কোৱা মহাদেৱৰ এই আশ্চৰ্য কীৰ্তি শুনি পাণ্ডুনন্দন, ধৰ্মনিধি যুধিষ্ঠিৰ মহাবিস্ময়ে পৰিল। তাৰ পাছত জ্ঞানীসকলৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ শ্ৰীকৃষ্ণে ধৰ্মনিধি যুধিষ্ঠিৰক সেইদৰে সম্বোধন কৰিলে, যেন শ্ৰীবিষ্ণুৱে দেবৰাজ ইন্দ্ৰক কথা কয় বুলি কোৱা হয়।”

Verse 643

त्रैलोक्यस्याधिपत्यं वा तुष्टो रुद्र: प्रयच्छति । “भगवान्‌ रुद्र संतुष्ट हो जायँ तो वे ब्रह्मपद, विष्णुपद, देवताओंसहित देवेन्द्रपद अथवा तीनों लोकोंका आधिपत्य प्रदान कर सकते हैं

বায়ুৱে ক’লে— “ৰুদ্ৰ সন্তুষ্ট হ’লে ত্ৰিলোকৰ অধিপত্যও দান কৰিব পাৰে। ভগৱান ৰুদ্ৰ প্ৰসন্ন হ’লে ব্ৰহ্মপদ, বিষ্ণুপদ, দেৱসকলসহ দেৱেন্দ্ৰপদ অথবা তিনিও লোকৰ সাৰ্বভৌমত্ব প্ৰদান কৰিবলৈ সক্ষম।”

Verse 676

सर्व तुदति तत्पापं भावयज्छिवमात्मना । “समस्त लक्षणोंसे हीन अथवा सब पापोंसे युक्त मनुष्य भी यदि अपने हृदयसे भगवान्‌ शिवका ध्यान करता है तो वह अपने सारे पापोंको नष्ट कर देता है

বায়ুৱে ক’লে— “যি পাপ মানুহক সকলো দিশে কষ্ট দিয়ে থাকে, অন্তঃকৰণে শিৱক ভাবিলে সেয়া নষ্ট হয়। সকলো শুভলক্ষণহীন বা বহু পাপে ভাৰাক্ৰান্ত মানুহেও যদি হৃদয়ৰ পৰা ভগৱান শিৱৰ ধ্যান কৰে, তেন্তে সি নিজৰ সকলো পাপ দগ্ধ কৰি পেলায়।”

Verse 1636

तत्प्रसादान्मया प्राप्तं ब्राह्मुण्यं दुर्लभ महत्‌ | तदनन्तर विश्वामित्रजीने कहा, 'राजन्‌! जिस समय मैं क्षत्रिय था, उन दिनोंकी बात है, मेरे मनमें यह दृढ़ संकल्प हुआ कि मैं ब्राह्मण हो जाऊँ--यही उद्देश्य लेकर मैंने भगवान्‌ शंकरकी आराधना की। और उनकी कृपासे मैंने अत्यन्त दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया'

বিশ্বামিত্ৰে ক’লে— “তাঁৰ কৃপাৰে মই মহান আৰু অতি দুষ্প্ৰাপ্য ব্ৰাহ্মণ্য লাভ কৰিলোঁ। ৰাজন! যেতিয়া মই ক্ষত্ৰিয় আছিলোঁ, তেতিয়াই মোৰ মনত দৃঢ় সংকল্প জন্মিল— ‘মই ব্ৰাহ্মণ হ’ম’; সেই উদ্দেশ্যে মই ভগৱান শংকৰক আৰাধনা কৰিলোঁ, আৰু তেওঁৰ অনুগ্রহে এই দুষ্প্ৰাপ্য ব্ৰাহ্মণত্ব লাভ কৰিলোঁ।”

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether an ascetic may consent to an invitation framed as sexual/romantic engagement within a wealthy divine setting; Aṣṭāvakra treats it as a dharma-violating proposition when it implicates para-dāra (approaching another’s spouse).

Ethical integrity is demonstrated through consistency of practice—ritual discipline, controlled senses, and principled refusal—showing that dharma is maintained not by isolation from temptation but by regulated response to it.

No explicit phalaśruti appears in the provided excerpt; the chapter functions as exemplum (illustrative narrative) within Bhīṣma’s instruction, embedding its ‘result’ implicitly as moral clarity and purification through restraint and proper observance.