
मानसतीर्थ-शौचप्रशंसा | Praise of the ‘Mental Tīrtha’ and the Marks of Purity
Upa-parva: Tīrtha-Śauca-Anuśāsana (Discourse on Pilgrimage and Purity)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to identify the श्रेष्ठ (best) among all tīrthas and to explain where ‘parama śauca’ (supreme purity) is found. Bhīṣma responds that all tīrthas have value for the discerning, yet the highest tīrtha is internal: an ‘agādha, vimala, śuddha’ mental ford filled with satya (truth) and sustained by dhṛti (steadfastness). He enumerates purity-markers as ethical and psychological disciplines—gentleness, sincerity, straightforwardness, ahiṃsā, compassion, dama and śama—along with non-possessiveness and absence of ego. He reframes ‘snāna’ (bathing) as ‘dama-snāta’ (bathed in restraint), yielding both external and internal cleanliness. While affirming the sanctity of earthly tīrthas and their rites (prayer, bathing, ancestral offerings) as purifying, he concludes that accomplishment arises from combining bodily/ritual purity with tīrtha-purity understood as inner discipline, paralleling the need to unite ‘strength’ and ‘action’ for success.
Chapter Arc: युधिष्ठिर का प्रश्न—जब यज्ञ बहु-सामग्री, धन और राजवैभव मांगते हैं, तब दरिद्र मनुष्य किस उपाय से वही पुण्य-फल प्राप्त कर सकता है? → भीष्म समझाते हैं कि अनेक यज्ञ ‘बहूपकरण’ हैं; निर्धन के लिए उनका अनुष्ठान कठिन है। तब वे उपवास-विधियों का क्रमबद्ध विधान खोलते हैं—मिताहार, इन्द्रिय-निग्रह, अहिंसा, और अग्निहोत्र-जैसे जप-हवन के साथ दीर्घकालिक व्रत—जिनसे यज्ञ-फल की समता संभव होती है। → भीष्म का निर्णायक प्रतिपादन—उपवास-धर्म का फल यज्ञ-फल के तुल्य है; जो बारह मास तक नियम, मिताहार, जितेन्द्रियता और वैराग्य के साथ आचरण करता है, वह उच्च लोकों का दर्शन/प्राप्ति करता है और दिव्य भोग-सम्पदा से युक्त होकर दीर्घकाल सुख भोगता है। → उपवास के फल का ‘अनुपूर्व्येण’ (क्रमशः) व्याख्यान पूर्ण होता है: दरिद्र मनुष्य भी शुद्ध आचरण, संयम और अहिंसा-प्रधान व्रत से वही आध्यात्मिक उपलब्धि पा सकता है जो सम्पन्न जन यज्ञों से पाते हैं। → भीष्म आगे के अध्यायों के लिए संकेत छोड़ते हैं कि दान-धर्म और व्रत-धर्म के अन्य सूक्ष्म भेदों/फल-विशेषों का विस्तार आगे क्रमशः कहा जाएगा।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवासविधिविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥/ १०६ ॥/ ऑपन-माज बछ। अफि्-छऋाज सप्ताधिकशततमो< ध्याय: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन युधिछिर उवाच पितामहेन विधिवद् यज्ञा: प्रोक्ता महात्मना । गुणाश्रैषां यथातथ्यं प्रेत्य चेह च सर्वश:,युधिष्ठिरने कहा--महात्मा पितामहने विधिपूर्वक यज्ञोंका वर्णन किया और इहलोक तथा परलोकमें जो उनके सम्पूर्ण गुण हैं, उनका भी यथावत्रूपसे प्रतिपादन किया
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— পিতামহ! মহাত্মাই বিধিপূৰ্বক যজ্ঞসমূহৰ বৰ্ণনা কৰিছে আৰু ইহলোক আৰু পৰলোকত সিহঁতৰ সকলো গুণো যথাযথভাৱে প্ৰতিপাদন কৰিছে।
Verse 2
न ते शक््या दरिद्रेण यज्ञा: प्राप्तुं पितामह । बहूपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तरा:,किन्तु पितामह! दरिद्र मनुष्य उन यज्ञोंका लाभ नहीं उठा सकता; क्योंकि उन यज्ञोंके उपकरण बहुत हैं और अनेक प्रकारके आयोजनोंके कारण उनका विस्तार बहुत बढ़ जाता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— পিতামহ! দৰিদ্ৰ মানুহে সেই যজ্ঞসমূহৰ ফল লাভ কৰিব নোৱাৰে; কিয়নো যজ্ঞত বহু উপকৰণ লাগে আৰু নানা সামগ্ৰী-আয়োজনৰ বাবে তাৰ বিস্তাৰ বহুত বাঢ়ি যায়।
Verse 3
पार्थिवै राजपुत्रैर्वा शक््या: प्राप्तुं पितामह । नार्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतै:,दादाजी! राजा अथवा राजपुत्र ही उन यज्ञोंका लाभ ले सकते हैं। जिनके पास धनकी कमी है, जो गुणहीन, एकाकी और असहाय हैं, वे उस प्रकारके यज्ञ नहीं कर सकते
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— পিতামহ! ৰজা বা ৰাজপুত্ৰসকলেই কেৱল সেই যজ্ঞসমূহৰ ফল লাভ কৰিব পাৰে। যিসকল ধনত কম, গুণহীন, একাকী আৰু আশ্ৰয়হীন, তেওঁলোকে তেনে যজ্ঞ কৰিব নোৱাৰে।
Verse 4
यो दरिद्रैरपि विधि: शकक्य: प्राप्तुं सदा भवेत् | अर्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतै:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— যি বিধিসন্মত ধৰ্মাচৰণ দৰিদ্ৰসকলেও সদায় কৰিব পাৰে—ধনহীন, দোষযুক্ত হলেও একনিষ্ঠ আৰু অবিভক্তচিত্ত লোকেও—সেই ধৰ্ম মোক কওক।
Verse 5
तुल्यो यज्ञफलैरेतैस्तन्मे ब्रूहि पितामह । इसलिये जिस कर्मका अनुष्ठान दरिद्रों, गुणहीनों, एकाकी और असहायोंके लिये भी सुगम तथा बड़े-बड़े यज्ञोंके समान फल देनेवाला हो, उसीका मुझसे वर्णन कीजिये ।। ४ $ || भीष्म उवाच इदमज्िरसा प्रोक्तमुपवासफलात्मकम्
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— পিতামহ! এই মহাযজ্ঞসমূহৰ ফলৰ সমান ফল দিয়া যি অনুশীলন, সেয়া মোক কওক। ভীষ্মে ক’লে— ই উপবাসফল-স্বৰূপ ধৰ্ম; অঙ্গিৰা ঋষিয়ে ইয়াক উপদেশ দিছিল।
Verse 6
यस्तु कल्यं तथा सायं भुञज्जानो नान्तरा पिबेत्,जो सबेरे और शामको ही भोजन करता है, बीचमें जलतक नहीं पीता तथा अहिंसापरायण होकर नित्य अग्निहोत्र करता है, उसे छ: वर्षोमें ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है --इसमें संशय नहीं है
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্যক্তি কেৱল পুৱা আৰু গধূলি আহাৰ কৰে, মাজত পানীও নপীয়ে, আৰু অহিংসাত স্থিৰ হৈ নিত্য অগ্নিহোত্ৰ পালন কৰে, সি মাত্ৰ ছয় বছৰৰ ভিতৰতে সিদ্ধি লাভ কৰে—ইয়াত কোনো সন্দেহ নাই।
Verse 7
अहिंसानिरतो नित्यं जुह्नमानो जातवेदसम् | षड्भिरेव स वर्षैस्तु सिध्यते नाज संशय:,जो सबेरे और शामको ही भोजन करता है, बीचमें जलतक नहीं पीता तथा अहिंसापरायण होकर नित्य अग्निहोत्र करता है, उसे छ: वर्षोमें ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है --इसमें संशय नहीं है
যি নিত্য অহিংসাত ৰত হৈ জাতবেদস (অগ্নি)-ত আহুতি দিয়ে, সি ছয় বছৰৰ ভিতৰতে সিদ্ধি লাভ কৰে—ইয়াত সন্দেহ নাই।
Verse 8
तप्तकाञ्चनवर्ण च विमान लभते नर: । देवस्त्रीणामधीवासे नृत्यगीतनिनादिते
মানুহে তপ্ত সোণৰ দৰে দীপ্তিমান বিমান লাভ কৰে আৰু দেৱস্ত্ৰীসকলৰ নিবাসত বাস পায়—য’ত নৃত্য-গীতৰ নিনাদ সদায় গুঞ্জৰি থাকে।
Verse 9
त्रीणि वर्षाणि य: प्राशेत् सततं त्वेकभोजनम्
যি তিন বছৰ ধৰি নিৰন্তৰ দিনে মাত্ৰ এবাৰ আহাৰ কৰে…
Verse 10
यज्ञ बहुसुवर्ण वा वासवप्रियमाचरेत्
যজ্ঞ কৰক বা বহুসোণ দান কৰক—বাসৱ (ইন্দ্ৰ)ক যি বিশেষ প্ৰিয়, সেই কৰ্মেই আচৰণ কৰক।
Verse 11
सत्यवान् दानशीलबश्र ब्रह्माण्यश्वञानसूयक: । क्षान्तो दान्तो जितक्रोध: स गच्छति परां गतिम्
যি সত্যবাদী আৰু দানশীল, ব্ৰাহ্মণভক্ত আৰু অসূয়াৰহিত; যি ক্ষমাশীল, ইন্দ্ৰিয়নিগ্ৰহী আৰু ক্ৰোধজয়ী—সেই জনে পৰম গতি লাভ কৰে।
Verse 12
जो बहुत-सी सुवर्णकी दक्षिणासे युक्त इन्द्रप्रिय यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा सत्यवादी, दानशील, ब्राह्मणभक्त, अदोषदर्शी, क्षमाशील, जितेन्द्रिय और क्रोधविजयी होता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है ।। पाण्डुरा भ्रप्रतीकाशे विमाने हंसलक्षणे | द्वे समाप्ते ततः पद्मे सो5प्सरोभिवसेत् सह,वह सफेद बादलोंके समान चमकीले हंसोपलक्षित विमानपर बैठकर दो पद्म वर्षोतक समय समाप्त होनेतक अप्सराओंके साथ वहाँ निवास करता है
যি ইন্দ্ৰপ্ৰিয় যজ্ঞ বহুসুস্বৰ্ণ-দক্ষিণাসহ অনুষ্ঠান কৰে, যি সত্যবাদী, দানশীল, ব্ৰাহ্মণভক্ত, দোষ নেদেখা, ক্ষমাশীল, জিতেন্দ্ৰিয় আৰু ক্ৰোধজয়ী—সেই জনে উত্তম গতি লাভ কৰে। শ্বেত মেঘসম দীপ্ত, হংসচিহ্নিত বিমানে আৰূঢ় হৈ, দুটা ‘পদ্ম’ কাল সম্পূৰ্ণ নোহোৱালৈকে অপ্সৰাসকলৰ সৈতে তাতে বাস কৰে।
Verse 13
द्वितीये दिवसे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् | सदा द्वादशमासांस्तु जुह्मानो जातवेदसम्
যি দ্বিতীয় দিন একবাৰেই আহাৰ কৰে আৰু বাৰ মাহ ধৰি নিৰন্তৰ জাতবেদস অগ্নিত আহুতি দিয়ে—এনে সংযম আৰু অবিচল উপাসনা ধৰ্ম্য ব্ৰত ৰূপে প্ৰশংসিত।
Verse 14
अग्निकार्यपरो नित्यं नित्यं कल्यप्रबोधन: । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फल प्राप्रोति मानव:
যি মানুহ নিত্য অগ্নিকাৰ্যত পৰায়ণ থাকে আৰু নিত্য যথাসময়ত জাগে, সি অগ্নিষ্টোম যজ্ঞৰ ফল লাভ কৰে।
Verse 15
जो मनुष्य नित्य अग्निमें होम करता हुआ एक वर्षतक प्रति दूसरे दिन एक बार भोजन करता है तथा प्रतिदिन अग्निकी उपासनामें तत्पर रहकर नित्य सबेरे जागता है, वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है ।। हंससारसयुक्तं च विमानं लभते नर: | इन्द्रलोके च वसते वरस्त्रीभि: समावृत:,वह मानव हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानको पाता है और इन्द्रलोकमें सुन्दरी स्त्रियोंसे घिरा हुआ निवास करता है
যি মানুহ এক বছৰ ধৰি নিত্য অগ্নিত হোম কৰে, প্ৰতি দ্বিতীয় দিন একবাৰেই আহাৰ কৰে, প্ৰতিদিন অগ্নি-উপাসনাত তৎপৰ হৈ নিত্য প্ৰভাততে জাগে—সেই জনে অগ্নিষ্টোম যজ্ঞৰ ফল লাভ কৰে। সি হংস আৰু সাৰসযুত বিমানে আৰূঢ় হৈ ইন্দ্ৰলোকে শ্ৰেষ্ঠ নাৰীৰে পৰিবেষ্টিত হৈ বাস কৰে।
Verse 16
तृतीये दिवसे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् | सदा द्वादशमासांस्तु जुह्दानो जातवेदसम्,जो बारह महीनोंतक प्रति तीसरे दिन एक समय भोजन करता, नित्य सबेरे उठता और अग्निकी परिचर्यामें तत्पर हो नित्य अग्निमें आहुति देता है, वह अतिरात्र यागका परम उत्तम फल पाता है
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্যক্তি প্ৰতি তৃতীয় দিনত কেৱল এবাৰ আহাৰ গ্ৰহণ কৰে আৰু বাৰ মাহ ধৰি অবিৰত জাতবেদস্ (অগ্নি)ত আহুতি অৰ্পণ কৰি থাকে, সি অতিরাত্ৰ যজ্ঞৰ পৰম উৎকৃষ্ট ফল লাভ কৰে।
Verse 17
अग्निकार्यपरो नित्यं नित्यं कल्यप्रबोधन: । अतितात्रस्य यज्ञस्य फल प्राप्रोत्यनुत्तमम्,जो बारह महीनोंतक प्रति तीसरे दिन एक समय भोजन करता, नित्य सबेरे उठता और अग्निकी परिचर्यामें तत्पर हो नित्य अग्निमें आहुति देता है, वह अतिरात्र यागका परम उत्तम फल पाता है
যি নিত্য অগ্নিকাৰ্যত তৎপৰ থাকে আৰু প্ৰতিদিন পুৱাতে জাগে, সি অতিরাত্ৰ যজ্ঞৰ অনুত্তম ফল লাভ কৰে।
Verse 18
मयूरहंसयुक्तं च विमानं लभते नर: । सप्तर्षीणां सदा लोके सो5प्सरोभिव॑सेत् सह
সেই ব্যক্তি ময়ূৰ আৰু হাঁসযুক্ত এক দিব্য বিমান লাভ কৰে আৰু সপ্তর্ষিসকলৰ লোকত অপ্সৰাসকলৰ সৈতে সদায় বাস কৰে।
Verse 19
निवर्तनं च तत्रास्य त्रीणि पद्मानि चैव ह । उसे मोरोंसे जुता हुआ विमान प्राप्त होता है और वह सदा सप्तर्षियोंके लोकमें अप्सराओंके साथ निवास करता है। वहाँ तीन पद्म वर्षोतक वह निवास करता है ॥| १८३ || दिवसे यश्नतुर्थे तु प्राश्नीयादेकभोजनम्,जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बारह महीनोंतक प्रति चौथे दिन एक बार भोजन करता है, वह वाजपेय यज्ञका परम उत्तम फल पाता है
তাৰ বাবে তাতকৈও উচ্চ অৱস্থালৈ গমন (প্ৰত্যাৱর্তন) আছে, আৰু তিন ‘পদ্ম’ কাললৈ তাত নিবাসো আছে। আৰু যি ব্যক্তি নিত্য অগ্নিহোত্ৰ পালন কৰি বাৰ মাহ ধৰি প্ৰতি চতুৰ্থ দিনত কেৱল এবাৰ আহাৰ গ্ৰহণ কৰে, সি বাজপেয় যজ্ঞৰ অনুত্তম ফল লাভ কৰে।
Verse 20
सदा द्वादशमासान् वै जुह्बमानो जातवेदसम् | वाजपेयस्य यज्ञस्य फल प्राप्रोत्यनुत्तमम्,जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बारह महीनोंतक प्रति चौथे दिन एक बार भोजन करता है, वह वाजपेय यज्ञका परम उत्तम फल पाता है
যি নিশ্চয় বাৰ মাহ ধৰি অবিৰত জাতবেদস্ (অগ্নি)ত আহুতি অৰ্পণ কৰি থাকে, সি বাজপেয় যজ্ঞৰ অনুত্তম ফল লাভ কৰে।
Verse 21
इन्द्रकन्याभिरूढं च विमानं लभते नर: । सागरस्य च पर्यन्ते वासवं लोकमावसेत्
মানৱে ইন্দ্ৰকন্যাসকলৰ আৰূঢ় দিৱ্য বিমান লাভ কৰে; আৰু সাগৰৰ অন্তিম প্ৰান্তত গৈ বাসৱ (ইন্দ্ৰ) লোকত বাস কৰে।
Verse 22
दिवसे पउ्चमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम्,अनसूयुरपापस्थो द्वादशाहफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर पाँचवें दिन एक समय भोजन करता है और लोभहीन, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त, अहिंसक और अदोषदर्शी होकर सदा पापकमोंसे दूर रहता है, उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है
যি ব্যক্তি প্ৰতি পঞ্চম দিনত একবাৰেই আহাৰ গ্ৰহণ কৰে, অসূয়াৰহিত আৰু পাপৰ পৰা দৃঢ়ভাৱে দূৰত থাকে, সি দ্বাদশাহ যজ্ঞৰ সমান ফল লাভ কৰে।
Verse 23
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्दानो जातवेदसम् | अलुब्ध: सत्यवादी च ब्रह्मण्यश्वाविहिंसक:
যি বাৰো মাহ ধৰি সদায় জাতবেদস্ (অগ্নি)ত আহুতি দিয়ে থাকে, লোভহীন, সত্যবাদী, ব্ৰাহ্মণ্যধৰ্মত শ্ৰদ্ধাবান আৰু অহিংস—সেইজন ধৰ্মলক্ষণে বিভূষিত।
Verse 24
जाम्बूनदमयं दिव्यं विमान हंसलक्षणम्
জাম্বূনদ স্বৰ্ণে নিৰ্মিত, হংস-লক্ষণযুক্ত দিৱ্য বিমান।
Verse 25
सूर्यमालासमाभासमारोहेत् पाण्डुरं गृहम् आवर्तनानि चत्वारि तथा पद्मानि द्वादशश
সূৰ্যমালাৰ দৰে দীপ্ত পাণ্ডুৰ গৃহত সি আৰোহণ কৰে; তাত চাৰিটা আবর্তন (বৃত্তাকাৰ প্ৰাঙ্গণ) আৰু বাৰটা পদ্মসদৃশ লক্ষণ থাকে।
Verse 26
शराग्निपरिमाणं च तत्रासौ वसते सुखम् । वह सूर्यकी किरणमालाओंके समान प्रकाशमान तथा जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए श्वेतकान्तिवाले हंसलक्षित दिव्य विमानकर आरूढ़ होता तथा चार, बारह एवं पैंतीस (कुल मिलाकर इक्यावन) पद्म वर्षोतक स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है || २४-२५ ई || दिवसे यस्तु षछ्े वै मुनि: प्राशेत भोजनम्,गवां मेधस्य यज्ञस्य फल प्राप्नोत्यनुत्तमम् । जो बारह महीनेतक सदा अन्निहोत्र करता, तीनों संध्याओंके समय स्नान करता, ब्रह्मचर्यका पालन करता, दूसरोंके दोष नहीं देखता तथा मुनिवृत्तिसे रहकर प्रति छठे दिन एक बार भोजन करता है, वह गोमेध यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है
ভীষ্মে ক’লে—যি মুনি সংযতচিত্তে প্ৰতি ষষ্ঠ দিনত মাত্ৰ এবাৰ আহাৰ কৰে, সি গোমেধ যজ্ঞৰ ফলস্বৰূপ অনুত্তম পুণ্য লাভ কৰে।
Verse 27
सदा द्वादशमासान् वै जुह्मानो जातवेदसम् | सदा त्रिषवणस्नायी ब्रह्मचार्यनसूयक:
ভীষ্মে ক’লে—যি পূৰ্ণ দ্বাদশ মাহ ধৰি নিৰন্তৰ জাতবেদ (অগ্নি)ত আহুতি দিয়ে, যি সদা ত্ৰিসন্ধ্যাত স্নান কৰে, যি ব্ৰহ্মচৰ্যত স্থিত আৰু যি অসূয়াৰহিত—সেইজন ধৰ্মে প্ৰশংসিত স্থিৰ, আত্মশুদ্ধিকাৰক আচৰণৰ মূৰ্ত ৰূপ।
Verse 28
अग्निज्वालासमाभासं हंसबर्हिणसेवितम्
সেয়া অগ্নিজ্বালাৰ দৰে দীপ্তিমান, আৰু হাঁহ (হংস) আৰু ময়ূৰে সেবিত।
Verse 29
शातकुम्भसमायुक्त साधयेद् यानमुत्तमम् | तथैवाप्सरसामड्के प्रतिसुप्त: प्रबोध्यते
ভীষ্মে ক’লে—শাতকুম্ভ (বিশুদ্ধ সোণ) সংযুক্ত উত্তম যান প্রস্তুত কৰা উচিত; আৰু যেনেকৈ অপ্সৰাসকলৰ অঙ্কত গভীৰ নিদ্ৰাত থকা জনক জগোৱা হয়, তেনেকৈ সিও (ভোগ-নিদ্ৰাত নিমগ্ন) প্ৰবোধিত হয়।
Verse 30
नूपुराणां निनादेन मेखलानां च नि:स्वनै: । उसे अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान, हंस और मयूरोंसे सेवित, सुवर्णजटित उत्तम विमान प्राप्त होता है और वह अप्सराओंके अंकमें सोकर उन्हींके कांचीकलाप तथा नूपुरोंकी मधुर ध्वनिसे जगाया जाता है ।। कोटीसहसंरं वर्षाणां त्रीणि कोटिशतानि च,लोम्नां प्रमाणेन सम॑ ब्रह्मलोके महीयते । वह मनुष्य दो पताका (महापद्मा), अठारह पद्मा, एक हजार तीन सौ करोड़ और पचास अयुत वर्षोतक तथा सौ रीछोंके चमड़ोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है
ভীষ্মে ক’লে—নূপুৰৰ নিনাদ আৰু মেখলাৰ মধুৰ নিঃস্বনত সি জাগ্ৰত হয়। সি অগ্নিজ্বালাৰ দৰে দীপ্ত, সোণেৰে অলংকৃত, হাঁহ আৰু ময়ূৰে সেবিত এক দিৱ্য বিমান লাভ কৰে; অপ্সৰাসকলৰ অঙ্কত শয়ন কৰি, তেওঁলোকৰ ৰত্নজটিত কটিবন্ধ আৰু নূপুৰৰ সুমধুৰ ধ্বনিত উণ্ঠে। অপাৰ বৰ্ষগণনা অনুসাৰে—উপমাত কোৱা ৰোমসংখ্যা যিমান—সিমান বৰ্ষ সি ব্ৰহ্মলোকে সন্মানিত থাকে।
Verse 31
पद्मान्यष्टादश तथा पताके द्वे तथैव च । अयुतानि च पज्चाशदृक्षचर्मशतस्य च
ভীষ্মে ক’লে—“অষ্টাদশ পদ্মচিহ্ন, তদ্ৰূপ দুটা পতাকা; আৰু পঞ্চাশ অযুত—সঙ্গে এশ ভালুকচৰ্ম।”
Verse 32
दिवसे सप्तमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम्,जो बारह महीनोंतक प्रति सातवें दिन एक समय भोजन करता, प्रतिदिन अम्निमें आहुति देता, वाणीको संयममें रखता और ब्रह्मचर्यका पालन करता एवं फूलोंकी माला, चन्दन, मधु और मांसका सदाके लिये त्याग कर देता है, वह पुरुष मरुद्गणों तथा इन्द्रके लोकमें जाता है
ভীষ্মে ক’লে—যি পুৰুষে বাৰো মাহ ধৰি প্ৰতি সপ্তম দিন একবাৰেই আহাৰ কৰে, প্ৰতিদিন পবিত্ৰ অগ্নিত আহুতি দিয়ে, বাক্সংযম ৰাখে আৰু ব্রহ্মচৰ্য পালন কৰে; আৰু পুষ্পমালা, চন্দন, মধু আৰু মাংস চিৰদিনলৈ ত্যাগ কৰে—সেই পুৰুষ মৰুদ্গণৰ সৈতে ইন্দ্ৰলোকলৈ গমন কৰে।
Verse 33
सदा द्वादशमासान् वै जुह्मानो जातवेदसम् | सरस्वती गोपयानो ब्रह्मचर्य समाचरन्,जो बारह महीनोंतक प्रति सातवें दिन एक समय भोजन करता, प्रतिदिन अम्निमें आहुति देता, वाणीको संयममें रखता और ब्रह्मचर्यका पालन करता एवं फूलोंकी माला, चन्दन, मधु और मांसका सदाके लिये त्याग कर देता है, वह पुरुष मरुद्गणों तथा इन्द्रके लोकमें जाता है
ভীষ্মে ক’লে—যি পুৰুষে পূৰ্ণ বাৰো মাহ ধৰি সদায় জাতবেদস অগ্নিত আহুতি দিয়ে, সৰস্বতীৰূপ বাক্ক ৰক্ষা কৰি সংযমত ৰাখে আৰু ব্রহ্মচৰ্য আচৰণ কৰে; আৰু পুষ্পমালা, চন্দন, মধু আৰু মাংস চিৰদিনলৈ ত্যাগ কৰে—সেই পুৰুষ মৰুতলোক আৰু ইন্দ্ৰলোক প্ৰাপ্ত হয়।
Verse 34
सुमनोवर्णकं चैव मधुमांसं च वर्जयन् । पुरुषो मरुतां लोकमिन्द्रलोक॑ च गच्छति,जो बारह महीनोंतक प्रति सातवें दिन एक समय भोजन करता, प्रतिदिन अम्निमें आहुति देता, वाणीको संयममें रखता और ब्रह्मचर्यका पालन करता एवं फूलोंकी माला, चन्दन, मधु और मांसका सदाके लिये त्याग कर देता है, वह पुरुष मरुद्गणों तथा इन्द्रके लोकमें जाता है
ভীষ্মে ক’লে—যি পুৰুষে পুষ্পমালা আৰু চন্দন, লগতে মধু আৰু মাংস ত্যাগ কৰে—সেই পুৰুষ মৰুতলোক আৰু ইন্দ্ৰলোক প্ৰাপ্ত হয়।
Verse 35
तत्र तत्र हि सिद्धार्थों देवकन्याभिरच्र्यते । फलं॑ बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते नर:
ভীষ্মে ক’লে—“সেই সেই লোকত সিদ্ধাৰ্থ পুৰুষক দেবকন্যাসকলে পূজা-সন্মান কৰে। সি বহুসুৱৰ্ণে সম্পন্ন যজ্ঞৰ সমান ফল লাভ কৰে।”
Verse 36
यस्तु संवत्सरं क्षान्तो भुड्क्तेडहन्यष्टमे नर:,जो एक वर्षतक प्रति आठवें दिन एक बार भोजन करता, सबके प्रति क्षमाभाव रखता, देवताओंके कार्यमें तत्पर रहता और नित्यप्रति अग्निहोत्र करता है, उसे पौण्डरीक यागका सर्वश्रेष्ठ फल मिलता है
ভীষ্মে ক’লে—যি মানুহে সম্পূৰ্ণ এক বছৰ সকলোৰে প্ৰতি ক্ষমাশীল আৰু ধৈৰ্যশীল থাকে, প্ৰতি অষ্টম দিনত মাত্ৰ এবাৰ আহাৰ কৰে, দেৱকাৰ্যত সদা তৎপৰ থাকে আৰু নিত্য অগ্নিহোত্ৰ সম্পাদন কৰে—সেইজন পৌণ্ডৰীক যজ্ঞৰ সৰ্বোত্তম ফল লাভ কৰে।
Verse 37
देवकार्यपरो निन््यं॑ जुह्मानो जातवेदसम् | पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फल प्राप्रोत्यनुत्तमम्,जो एक वर्षतक प्रति आठवें दिन एक बार भोजन करता, सबके प्रति क्षमाभाव रखता, देवताओंके कार्यमें तत्पर रहता और नित्यप्रति अग्निहोत्र करता है, उसे पौण्डरीक यागका सर्वश्रेष्ठ फल मिलता है
ভীষ্মে ক’লে—যি সদা দেৱকাৰ্যত তৎপৰ থাকে আৰু প্ৰতিদিন জাতবেদস অগ্নিত আহুতি দিয়ে, সি পৌণ্ডৰীক যজ্ঞৰ অনুত্তম ফল লাভ কৰে।
Verse 38
पद्मवर्णनिभं चैव विमानमधिरोहति । कृष्णा: कनकगोर्यश्व नार्य: श्यामास्तथापरा:
ভীষ্মে ক’লে—তাৰ পাছত সি পদ্মবৰ্ণৰ দৰে দীপ্তিমান বিমানে আৰোহণ কৰে। তাৰ চাৰিওফালে নাৰীসকল থাকে—কিছুমান কৃষ্ণবৰ্ণা, কিছুমান কনক-গৌৰী, আৰু কিছুমান শ্যামল—এনে এক মনোৰম পৰিকৰ গঢ়ে।
Verse 39
यस्तु संवत्सरं भुड्क्ते नवमे नवमे5हनि,जो एक वर्षतक नौ-नौ दिनपर एक समय भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञका परम उत्तम फल प्राप्त होता है
ভীষ্মে ক’লে—যি মানুহে সম্পূৰ্ণ এক বছৰ প্ৰতি নবম দিনত মাত্ৰ এবাৰ আহাৰ কৰে আৰু বাৰোটা মাহ জুৰি প্ৰতিদিন অগ্নিত আহুতি দিয়ে—সেইজন সহস্ৰ অশ্বমেধ যজ্ঞৰ সমান পৰম উৎকৃষ্ট ফল লাভ কৰে।
Verse 40
सदा द्वादशमासान् वै जुह्मानो जातवेदसम् | अश्वमेधसहस्रस्य फल प्राप्रोत्यनुत्तमम्,जो एक वर्षतक नौ-नौ दिनपर एक समय भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञका परम उत्तम फल प्राप्त होता है
ভীষ্মে ক’লে—যি বাৰোটা মাহ জুৰি সদায় জাতবেদস অগ্নিত আহুতি দি থাকে, সি সহস্ৰ অশ্বমেধ যজ্ঞৰ সমান অনুত্তম ফল লাভ কৰে।
Verse 41
पुण्डरीकप्रकाशं च विमानं लभते नर: । दीप्तसूर्याग्नितेजोभिर्दिव्यमालाभिरेव च
মানুহে শ্বেত পদ্মৰ দৰে উজ্জ্বল এক দিৱ্য বিমান লাভ কৰে; সেয়া সূৰ্য আৰু অগ্নিৰ তেজে দীপ্ত আৰু দেৱমালাৰে ভূষিত।
Verse 42
नीयते रुद्रकन्याभि: सो<न्तरिक्षं सनातनम् | अष्टादश सहस््राणि वर्षाणां कल्पमेव च
ৰুদ্রৰ কন্যাসকলে তাক চিৰন্তন অন্তৰীক্ষ-লোকলৈ লৈ যায়; তাত সে আঠাৰো হাজাৰ বছৰ—অৰ্থাৎ এক কল্পসম দীঘল কাল—অৱস্থান কৰে।
Verse 43
कोटीशतसहस्रं च तेषु लोकेषु मोदते । तथा वह पुण्डरीकके समान श्वेत वर्णोका विमान पाता है। दीप्तिमान् सूर्य और अग्निके समान तेजस्विनी और दिव्यमालाधारिणी रुद्रकन्याएँ उसे सनातन अन्तरिक्ष-लोकमें ले जाती हैं और वहाँ वह एक कल्प लाख करोड़ एवं अठारह हजार वर्षोतक सुख भोगता है ।। यस्तु संवत्सरं भुड्क्ते दशाहे वै गते गते
সেই লোকসমূহত সে কোটিশতসহস্ৰৰ মাজত আনন্দ কৰে। শ্বেত পদ্মসম দীপ্তিমান বিমান লাভ কৰি, সূৰ্য আৰু অগ্নিৰ দৰে তেজস্বিনী, দিৱ্য মালা ধাৰণ কৰা ৰুদ্রকন্যাসকলে তাক চিৰন্তন অন্তৰীক্ষ-লোকলৈ লৈ যায়। তাত সে কল্পসম দীঘল কাল—লক্ষ-কোটি আৰু আঠাৰো হাজাৰ বছৰ পৰ্যন্ত—সুখ ভোগ কৰে। (পাছত:) কিন্তু যি এ বছৰ ধৰি, প্ৰতিটো দহদিন পাৰ হ’লে হ’লে, ভোগ কৰে…
Verse 44
सदा द्वादशमासान् वै जुह्मानो जातवेदसम् | ब्रह्मकन्यानिवासे च सर्वभूतमनोहरे
যি বাৰো মাহ ধৰি সদায় জাতবেদস্ (অগ্নি)-ত আহুতি অৰ্পণ কৰে, সি সকলো প্ৰাণীৰ মন হৰণ কৰা ব্রহ্মকন্যাসকলৰ নিবাসত বাস লাভ কৰে।
Verse 45
अश्वमेधसहस्रस्य फल प्राप्रोत्यनुत्तमम् रूपवत्यश्नल तं कन्या रमयन्ति सनातनम्
সি সহস্ৰ অশ্বমেধ যজ্ঞৰ ফলৰ সমান অনুত্তম ফল লাভ কৰে; আৰু ৰূপৱতী কন্যাসকলে সেই চিৰন্তনক আনন্দিত কৰে।
Verse 46
जो एक वर्षतक दस-दस दिन बीतनेपर एक बार भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह सम्पूर्ण भूतोंके लिये मनोहर ब्रह्मकन्याओंके निवास- स्थानमें जाकर एक हजार अभश्व-मेध यज्ञोंका परम उत्तम फल पाता है और उस सनातन पुरुषका वहाँकी रूपवती कन्याएँ मनोरंजन करती हैं ।। नीलोत्पलनि भैर्वर्ण रक्तोत्पलनिभैस्तथा । विमान मण्डलावर्तमावर्तगहनाकुलम्
ভীষ্মে ক’লে—যি এজন এক বছৰ ধৰি প্ৰতি দহ দিন অন্তৰে এবাৰকৈ আহাৰ গ্ৰহণ কৰে আৰু বাৰো মাহ প্ৰতিদিন অগ্নিত আহুতি অৰ্পণ কৰে, সি সকলো ভূতৰ মনোহৰ ব্ৰহ্মকন্যাসকলৰ ৰম্য নিবাসস্থানলৈ গৈ সহস্ৰ অশ্বমেধ যজ্ঞৰ তুল্য পৰম উত্তম ফল লাভ কৰে। তাত সেই সনাতন পুৰুষক সেই লোকৰ ৰূপৱতী কন্যাসকলে ক্ৰীড়া-বিনোদে ৰঞ্জিত কৰে। সেই ধাম নীল আৰু ৰক্ত পদ্মসদৃশ বৰ্ণে দীপ্ত, বিমান-মণ্ডলৰ ঘূৰ্ণিচক্ৰ আৰু গহিন আবৰ্তে ঘন হৈ আছে।
Verse 47
सागरोर्मिप्रतीकाशं लभेद् यानमनुत्तमम् | विचित्रमणिमालाभिननदितं शंखनि:स्वनै:
ভীষ্মে ক’লে—সি সাগৰৰ ঢৌসদৃশ দীপ্তিমান এক অনুত্তম যান লাভ কৰে; বিচিত্ৰ মণিমালাৰ ঝংকাৰ আৰু শঙ্খধ্বনিৰ প্ৰতিধ্বনিয়ে তাক নিনাদিত কৰে।
Verse 48
वह नीले और लाल कमलके समान अनेक रंगोंसे सुशोभित, मण्डलाकार घूमनेवाला, भँवरके समान गहन चक्कर लगानेवाला, सागरकी लहरोंके समान ऊपर-नीचे होनेवाला, विचित्र मणिमालाओंसे अलंकृत और शंखध्वनिसे परिपूर्ण सर्वोत्तम विमान प्राप्त करता है ।। स्फाटिकैर्वज्सारैश्व स्तम्भै: सुकृतवेदिकम् । आरोहति महद् यानं॑ हंससारसनादितम्
ভীষ্মে ক’লে—সি নীল আৰু ৰক্ত পদ্মসদৃশ নানা বৰ্ণে শোভিত, মণ্ডলাকাৰে ঘূৰ্ণায়মান, ভঁৱৰাৰ দৰে গহিন আবৰ্তে ভৰা, সাগৰৰ ঢৌৰ দৰে ওপৰ-তল হোৱা, বিচিত্ৰ মণিমালাৰে অলংকৃত আৰু শঙ্খধ্বনিয়ে পৰিপূৰ্ণ এক সৰ্বোত্তম বিমান লাভ কৰে। স্ফটিক আৰু বজ্ৰসাৰ স্তম্ভে ভৰ কৰা, সুগঠিত বেদিকাযুক্ত সেই মহাযান হংস আৰু সাৰসৰ নাদে নিনাদিত; তাতেই সি আৰোহণ কৰে।
Verse 49
उसमें स्फटिक और वज्रसारमणिके खम्भे लगे होते हैं। उसपर सुन्दर ढंगसे बनी हुई वेदी शोभा पाती है तथा वहाँ हंस और सारस पक्षी कलरव करते रहते हैं। ऐसे विशाल विमानपर चढ़ता और स्वच्छन्द घूमता है ।। एकादशे तु दिवसे य: प्राप्ते प्राशते हवि: । सदा द्वादशमासांस्तु जुह्नानो जातवेदसम्
ভীষ্মে ক’লে—সেই বিমানত স্ফটিক আৰু বজ্ৰসাৰ মণিৰ স্তম্ভ থাকে। তাৰ ওপৰত সুগঠিত বেদিকা শোভা পায় আৰু তাত হংস আৰু সাৰস পখী সদায় কলৰৱ কৰি থাকে। এনেকুৱা বিশাল বিমানত আৰোহণ কৰি সি স্বচ্ছন্দে বিচৰণ কৰে। আৰু যি একাদশ দিন উপস্থিত হ’লে হবি প্ৰাশন কৰে আৰু বাৰো মাহ সদায় জাতবেদস অগ্নিত আহুতি দিয়ে—
Verse 50
परस्त्रियं नाभिलषेद् वाचाथ मनसापि वा । अनृतं च न भाषेत मातापित्रो: कृतेपि वा
ভীষ্মে ক’লে—পৰস্ত্ৰীক কামনা নকৰিবা—বাক্যৰে নহয়, মনৰেও নহয়। আৰু অনৃত কথা নক’বা—মাতাপিতাৰ কাৰণেও নহয়।
Verse 51
अभिगच्छेन्महादेवं विमानस्थं महाबलम् । अश्वमेधसहस्रस्य फल प्राप्नोत्यनुत्तमम्
ভীষ্মে ক’লে—যি মহাবলী, বিমানস্থ মহাদেৱৰ ওচৰলৈ গৈ দৰ্শন লাভ কৰে, সি সহস্ৰ অশ্বমেধ যজ্ঞৰ সমতুল্য অনুত্তম পুণ্যফল পায়।
Verse 52
जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ प्रति ग्यारहवें दिन एक बार हविष्यान्न ग्रहण करता है, मन-वाणीसे भी कभी परस्त्रीकी अभिलाषा नहीं करता है और माता-पिताके लिये भी कभी झूठ नहीं बोलता है, वह विमानमें विराजमान परम शक्तिमान् महादेवजीके समीप जाता और हजार अभश्वमेध यज्ञोंका सर्वोत्तम फल पाता है | ४९-- ५१ || स्वायम्भुवं च पश्येत विमान समुपस्थितम् । कुमार्य: काउ्चनाभासा रूपवत्यो नयन्ति तम्
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্যক্তি বাৰো মাহ ধৰি প্ৰতিদিন অগ্নিহোত্ৰ পালন কৰে আৰু প্ৰতিটো একাদশ দিনত এবাৰ কেৱল হবিশ্যান্ন গ্ৰহণ কৰে; যি মন আৰু বাক্যতো কেতিয়াও পৰস্ত্ৰীৰ কামনা নকৰে; আৰু যি মাতাপিতাৰ কাৰণেও কেতিয়াও মিছা নকয়—সেইজন বিমানে অধিষ্ঠিত পৰম শক্তিমান মহাদেৱৰ সান্নিধ্যলৈ গৈ সহস্ৰ অশ্বমেধ যজ্ঞৰ সমতুল্য শ্ৰেষ্ঠ ফল লাভ কৰে। সি ওচৰলৈ অহা স্বয়ম্ভূ বিমান দৰ্শন কৰে, আৰু কাঁচনবৰ্ণ দীপ্তিৰে উজ্জ্বল, ৰূপৱতী কুমাৰীসকলে তাক আগলৈ নি যায়।
Verse 53
विधिं यज्ञफलैस्तुल्यं तन्निबोध युधिष्ठिर । भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! अंगिरा मुनिकी बतलायी हुई जो उपवासकी विधि है, वह यज्ञोंके समान ही फल देनेवाली है। उसका पुनः वर्णन करता हूँ, सुनो,वर्षाण्यपरिमेयानि युगान्ताग्निसमप्र भ:
ভীষ্মে ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ, বুজি লোৱা: ঋষি অঙ্গিৰাই কোৱা উপবাস-বিধি যজ্ঞফলৰ সমান ফল দান কৰে। মই তাক পুনৰ বৰ্ণনা কৰোঁ—শুনা। তাৰ পুণ্য অપરিমেয় বছৰ ধৰি যুগান্তৰ অগ্নিৰ দৰে দীপ্ত হৈ প্ৰকাশিত থাকে।
Verse 54
कोटीशतसहस््नं च दशकोटिशतानि च । रुद्रं नित्यं प्रणमते देवदानवसम्मतम्
ভীষ্মে ক’লে—দেৱ-দানৱ উভয়ে সম্মত ৰুদ্ৰক সি নিত্য প্ৰণাম কৰে—কোটি-শত-সহস্ৰ সংখ্যাত, আৰু পুনৰ দশ-কোটি-শত সংখ্যাত।
Verse 55
स तस्मै दर्शन प्राप्तो दिवसे दिवसे भवेत् | वहाँ वह प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी शरीर धारण करके असंख्य वर्षोतक एक लाख एक हजार करोड़ वर्षोतक निवास करता हुआ प्रतिदिन देवदानव-सम्मानित भगवान् रुद्रको प्रणाम करता है। वे भगवान् उसे नित्य-प्रति दर्शन देते रहते हैं ।। दिवसे द्वादशे यस्तु प्राप्ते वै प्राशते हवि:
ভীষ্মে ক’লে—তাৰ বাবে সেই ভগৱানৰ দৰ্শন দিনেদিনে নিত্য নিশ্চিত হয়। তাত সি যুগান্তৰ অগ্নিৰ দৰে দীপ্ত দেহ ধাৰণ কৰি অપરিমেয় বছৰ ধৰি বাস কৰে আৰু প্ৰতিদিন দেৱ-দানৱ-সম্মানিত ভগৱান ৰুদ্ৰক প্ৰণাম কৰে। সেই ভগৱানেও তাক নিত্যপ্ৰতি দৰ্শন দি থাকে। আৰু দ্বাদশ দিন উপস্থিত হ’লে সি হবি (যজ্ঞাৰ্পিত আহাৰ) গ্ৰহণ কৰে।
Verse 56
आदित्यद्वादशं तस्य विमान संविधीयते,उसके लिये बारह सूर्योके समान तेजस्वी विमान प्रस्तुत किया जाता है। बहुमूल्यमणि, मुक्ता और मूँगे उस विमानकी शोभा बढ़ाते हैं। हंसश्रेणीसे परिवेष्टित और नागवीथीसे परिव्याप्त वह विमान कलरव करते हुए मोरों और चक्रवाकोंसे सुशोभित तथा ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित है। उसके भीतर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनी हुई हैं। राजन! वह नित्य- निवासस्थान अनेक नर-नारियोंसे भरा हुआ होता है। यह बात महाभाग धर्मज्ञ ऋषि अंगिराने कही थी
ভীষ্মে ক’লে—তাঁৰ বাবে বাৰটা সূৰ্যৰ দৰে দীপ্তিমান এক দিব্য বিমান সাজি থোৱা হয়। অমূল্য মণি, মুক্তা আৰু প্ৰৱাল তাৰ শোভা বৃদ্ধি কৰে। হাঁসৰ শ্ৰেণীৰে পৰিবেষ্টিত আৰু ‘নাগবীথি’ নামৰ বক্ৰ দীপ্তিপথেৰে ব্যাপ্ত সেই বিমান কলৰৱময়; ময়ূৰ আৰু চক্ৰৱাক পক্ষীৰে সুশোভিত হৈ ব্ৰহ্মলোকত প্ৰতিষ্ঠিত। তাৰ ভিতৰত উচ্চ উচ্চ অট্টালিকা আছে। হে ৰাজন, সেই নিত্য নিবাস বহু নৰ-নাৰীৰে পৰিপূৰ্ণ। এই কথা ধৰ্মজ্ঞ মহাভাগ ঋষি অঙ্গিৰাই ঘোষণা কৰিছিল।
Verse 57
मणिमुक्ताप्रवालैश्न महाहैरुपशोभितम् । हंसमालापरिक्षिप्तं नागवीथीसमाकुलम्
মণি, মুক্তা আৰু প্ৰৱাল, লগতে মহাহাৰেৰে ই অতিশয় সুশোভিত আছিল। হাঁস-মালাৰে পৰিবেষ্টিত আৰু নাগবীথিৰে পৰিপূৰ্ণ আছিল।
Verse 58
मयूरैश्वक्रवाकैश्व कूजद्भिरुपशोभितम् । अट्टैर्महद्धि: संयुक्त ब्रह्मलोके प्रतिष्ठितम्
মধুৰ কলৰৱ কৰা ময়ূৰ আৰু চক্ৰৱাক পক্ষীৰে ই সুশোভিত আছিল। বৃহৎ অট্টালিকাৰে যুক্ত হৈ মহাসমৃদ্ধিসহ ব্ৰহ্মলোকত প্ৰতিষ্ঠিত আছিল।
Verse 59
नित्यमावसथं राजन् नरनारीसमावृतम् | ऋषिरेवं महाभागस्त्वड्िरा प्राह धर्मवित्
হে ৰাজন, সেই নিত্য নিবাস নৰ-নাৰীৰে ঘেৰাও আৰু পৰিপূৰ্ণ আছিল। ধৰ্মজ্ঞ মহাভাগ ঋষি অঙ্গিৰাই এইদৰে কৈছিল।
Verse 60
त्रयोदशे तु दिवसे प्राप्ते यः प्राशते हवि: । सदा द्वादशमासान् वै देवसत्रफलं लभेत्
নিৰ্দিষ্ট সময়ত ত্ৰয়োদশ দিন উপস্থিত হ’লে যি হবি (যজ্ঞৰ আহুতি) প্ৰাশন কৰে, সি বাৰো মাহজুৰি সদায় দেবসত্ৰৰ সমান ফল লাভ কৰে।
Verse 61
जो बारह महीनोंतक सदा तेरहवें दिन हविष्यात्र भोजन करता है, उसे देवसत्रका फल प्राप्त होता है ।। रक्तपद्मोदयं नाम विमान साधयेन्नर: । जातरूपप्रयुक्ते च रत्नसंचयभूषितम्,उस मनुष्यको रक्तपद्मोदय नामक विमान उपलब्ध होता है, जो सुवर्णसे जटित तथा रत्नसमूहसे विभूषित है। उसमें देवकन्याएँ भरी रहती हैं, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित उस विमानकी बड़ी शोभा होती है। उससे पवित्र सुगन्ध प्रकट होती रहती है तथा वह दिव्य विमान वायव्यास्त्रसे शोभायमान होता है
ভীষ্মে ক’লে—যি মানুহে বাৰ মাহ ধৰি ত্ৰয়োদশী তিথিত নিয়মে সদায় হৱিষ্য-ভোজন কৰে, সি দেবসত্রৰ ফল লাভ কৰে। তেনে ব্যক্তিয়ে ‘ৰক্তপদ্মোদয়’ নামৰ এক দিব্য বিমান পায়—সুৱৰ্ণে জড়িত আৰু ৰত্নসঞ্চয়ে ভূষিত। তাত দেবকন্যাসকল ভৰি থাকে; দিব্য আভৰণে ই দীপ্তিমান। তাৰ পৰা সদায় পবিত্ৰ সুগন্ধ উত্থিত হয়, আৰু বায়ব্য অস্ত্ৰৰ প্ৰভাৰে সেই বিমান অধিক শোভিত হয়।
Verse 62
देवकन्याभिराकीर्ण दिव्याभरणभूषितम् । पुण्यगन्धोदयं दिव्यं वायव्यैरुपशोभितम्,उस मनुष्यको रक्तपद्मोदय नामक विमान उपलब्ध होता है, जो सुवर्णसे जटित तथा रत्नसमूहसे विभूषित है। उसमें देवकन्याएँ भरी रहती हैं, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित उस विमानकी बड़ी शोभा होती है। उससे पवित्र सुगन्ध प्रकट होती रहती है तथा वह दिव्य विमान वायव्यास्त्रसे शोभायमान होता है
সেই দিব্য বিমান দেবকন্যাৰে পৰিপূৰ্ণ আৰু দিব্য আভৰণে ভূষিত। তাৰ পৰা পুণ্যময়, মঙ্গল সুগন্ধ উত্থিত হয়; আৰু বায়ব্য শক্তি/অস্ত্ৰৰ সান্নিধ্যত ই অধিক শোভিত হয়।
Verse 63
तत्र शंखपताके द्वे युगान्तं कल्पमेव च । अयुतायुतं तथा पद्म समुद्र च तथा वसेत्,वह व्रतधारी पुरुष दो शंख, दो पताका (महापद्मय), एक कल्प एवं एक चतुर्युग तथा दस करोड़ एवं चार पद्म वर्षोतक ब्रह्मलोकमें निवास करता है
তাত ব্ৰতধাৰী পুৰুষে অপাৰ কাললৈ বাস কৰে—দুই ‘শঙ্খ’ আৰু দুই ‘পতাকা’ কাল, তাৰ পাছত ‘যুগান্ত’, ‘কল্প’, ‘অযুতাযুত’, ‘পদ্ম’ আৰু ‘সমুদ্ৰ’—অর্থাৎ ব্ৰহ্মলোকত অসাধাৰণ দীঘলীয়া নিবাস, যি তাৰ সংযমধৰ্মৰ ফল।
Verse 64
गीतगन्धर्वघोषैश्न भेरीपणवनि:स्वनै: । सदा प्रह्लादितस्ताभिवदेवकन्याभिरिज्यते,वहाँ देवकन्याएँ गीत और वाद्योंके घोष तथा भेरी और पणवकी मधुर ध्वनिसे उस पुरुषको आनन्द प्रदान करती हुई सदा उसका पूजन करती हैं
তাত গীতৰ ঘোষ, গন্ধৰ্বসদৃশ মধুৰ স্বৰ, আৰু ভেৰী-পণৱৰ ৰম্য নিনাদে দেবকন্যাসকলে তাক সদায় আনন্দিত কৰি নিৰন্তৰ পূজা কৰে।
Verse 65
चतुर्दशे तु दिवसे यः पूर्णे प्राशते हवि: । सदा द्वादशमासांस्तु महामेधफलं लभेत्
ভীষ্মে ক’লে—যি মানুহে পূৰ্ণ চতুৰ্দশী তিথিত হবি (হৱিষ্য) গ্ৰহণ কৰে, সি বাৰ মাহ ধৰি নিৰন্তৰ ‘মহামেধ’ নামৰ মহাযজ্ঞৰ সমতুল্য ফল লাভ কৰে।
Verse 66
जो बारह महीनेतक प्रति चौदहवें दिन हविष्यान्न भोजन करता है, वह महामेध यज्ञका फल पाता है ।। अनिर्देश्यवयोरूपा देवकन्या: स्वलंकृता: । मृष्टतप्तांगदधरा विमानैरुपयान्ति तम्,जिनके यौवन तथा रूपका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी देवकन्याएँ तपाये हुए शुद्ध स्वर्णके अंगद (बाजूबन्द) और अन्यान्य अलंकार धारण करके विमानोंद्वारा उस पुरुषकी सेवामें उपस्थित होती हैं
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্যক্তি বাৰ মাহ ধৰি প্ৰতি চতুৰ্দশীত হৱিষ্যান্ন (যজ্ঞৰ সৰল আহাৰ) ভোজন কৰে, সি মহামেধ যজ্ঞৰ সমান ফল লাভ কৰে। যিসকলৰ যৌৱন আৰু ৰূপ বৰ্ণনাতীত, সেই সু-অলংকৃত দেৱকন্যাসকল তাপি শুদ্ধ কৰা সোণৰ অঙ্গদ আদি অলংকাৰ ধৰি, বিমানযোগে তাৰ ওচৰলৈ আহি সেবাত উপস্থিত হয়।
Verse 67
कलहंसविनिर्धोषैर्नूपुराणां च नि:स्वनै: । काज्चीनां च समुत्कर्षस्तत्र तत्र निबोध्यते,वह सो जानेपर कलहंसोंके कलरवों, नूपुरोंकी मधुर झनकारों तथा काउ्चीकी मनोहर ध्वनियोंद्वारा जगाया जाता है
ভীষ্মে ক’লে—তাত তাত পুনঃপুনঃ কলহংসৰ কলৰৱ, নূপুৰৰ মধুৰ ঝংকাৰ আৰু কাঁচী (কটিবন্ধ)ৰ মনোহৰ ধ্বনিৰ উচ্ছ্বাস বোধ হয়।
Verse 68
देवकन्यानिवासे च तस्मिन् वसति मानव: । जाह्ववीवालुकाकीर्ण पूर्ण संवत्सरं नर:,वह मानव देवकन्याओंके उस निवासस्थानमें उतने वर्षोतक निवास करता है, जितने कि गंगाजीमें बालूके कण हैं
ভীষ্মে ক’লে—দেৱকন্যাসকলৰ সেই নিবাসত সেই মানুহজন জাহ্নৱী (গঙ্গা) নদীৰ বালুকণিকা যিমান, সিমান বছৰ বাস কৰে।
Verse 69
यत्तु पक्षे गते भुडक्ते एकभक्तं जितेन्द्रिय: । सदा द्वादशमासांस्तु जुह्दानो जातवेदसम्,जो जितेन्द्रिय पुरुष बारह महीनोंतक प्रति पंद्रहवें दिन एक बार खाता और प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वह एक हजार राजसूय यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है और हंस तथा मोरोंसे सेवित दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है
ভীষ্মে ক’লে—কিন্তু যি জিতেন্দ্ৰিয় পুৰুষ পক্ষ পাৰ হোৱাৰ পাছত নিয়ত দিনত একবাৰেই আহাৰ কৰে আৰু বাৰ মাহ সদায় জাতবেদ (অগ্নি)ত আহুতি দিয়ে থাকে, সি মহৎ ফল লাভ কৰে।
Verse 70
राजसूयसहस्रस्य फल प्राप्नोत्यनुत्तमम् । यानमारोहते दिव्यं हंसबर्हिणसेवितम्,जो जितेन्द्रिय पुरुष बारह महीनोंतक प्रति पंद्रहवें दिन एक बार खाता और प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वह एक हजार राजसूय यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है और हंस तथा मोरोंसे सेवित दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है
ভীষ্মে ক’লে—সি সহস্ৰ ৰাজসূয় যজ্ঞৰ অনুত্তম ফল লাভ কৰে আৰু হাঁহ আৰু ময়ূৰে সেবিত দিব্য বিমানত আৰোহণ কৰে।
Verse 71
मणिमण्डलवकैश्षित्रं जातरूपसमावृतम् | दिव्याभरणशोभाभिरर्वरस्त्रीभिरलंकृतम्,वह विमान सुवर्णपत्रसे जटित तथा मणिमय मण्डलाकार चिह्ढोंसे विचित्र शोभासम्पन्न है। दिव्य वस्त्राभूषणोंसे शोभायमान सुन्दरी रमणियाँ उसे सुशोभित किये रहती है
ভীষ্মে ক’লে—সেই বিমান অতি আশ্চৰ্য; মণিৰ মণ্ডলাকাৰ নক্সাৰে বিচিত্ৰ আৰু সোণেৰে আৱৃত। দিব্য বস্ত্ৰ-আভূষণে দীপ্ত অপ্সৰাসকলেই তাক শোভিত কৰি আছিল।
Verse 72
एकस्तम्भं चतुर्द्धारं सप्तभौमं सुमंगलम् । वैजयन्तीसहसैश्न शोभितं गीतनि:स्वनै:
ভীষ্মে ক’লে—(মই) এটা স্তম্ভত স্থিত, চাৰিটা দুৱাৰযুক্ত, সাত তলালৈ উঠা, অতি মঙ্গলময় এক ভৱন দেখিলোঁ; সহস্ৰ বৈজয়ন্তী মালাৰে শোভিত আৰু গীতধ্বনিয়ে মুখৰিত।
Verse 73
उस विमानमें एक ही खम्भा होता है, चार दरवाजे लगे होते हैं। वह सात तल्लोंसे युक्त एवं परममंगलमय विमान सहस्रों वैजयन्ती पताकाओंसे सुशोभित तथा गीतोंकी मधुर- ध्वनिसे व्याप्त होता है ।। दिव्यं दिव्यगुणोपेतं विमानमधिरोहति । मणिमुक्ताप्रवालैश्न भूषितं वैद्युतप्रभम्
ভীষ্মে ক’লে—সেই বিমানত এটা মাত্র স্তম্ভ, চাৰিটা দুৱাৰ; সাত তলাযুক্ত আৰু পৰম মঙ্গলময়। সহস্ৰ বৈজয়ন্তী পতাকাৰে শোভিত আৰু গীতৰ মধুৰ ধ্বনিয়ে পৰিপূৰ্ণ। দিব্য গুণেৰে সমন্বিত সেই দিব্য বিমানে সি আৰোহণ কৰে; বিদ্যুৎসম দীপ্ত, মণি-মুক্তা-প্ৰবালে ভূষিত।
Verse 74
वसेद् युगसहस्नं च खड्गकुञ्जरवाहन: । मणि, मोती और मूँगोंसे विभूषित वह दिव्य विमान विद्युत्की-सी प्रभासे प्रकाशित तथा दिव्य गुणोंसे सम्पन्न होता है। वह व्रतधारी पुरुष उसी विमानपर आरूढ़ होता है। उसमें गेंडे और हाथी जुते होते हैं तथा वहाँ एक सहस्र युगोंतक वह निवास करता है ।। ७३ *॥ षोडशे दिवसे प्राप्ते य: कुयादिकभोजनम्
ভীষ্মে ক’লে—ব্ৰতধাৰী পুৰুষ গণ্ডাৰ আৰু হাতী যোজিত সেই বিমানে আৰোহণ কৰি সহস্ৰ যুগলৈ তাত বাস কৰে। আৰু যি ষোড়শ দিন আহিলে একবাৰেই আহাৰ কৰে—
Verse 75
सदा द्वादशमासान् वै सोमयज्ञफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रति सोलहवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे सोमयागका फल मिलता है ।। सोमकन्यानिवासेषु सो5ध्यावसति नित्यश:
ভীষ্মে ক’লে—সি নিশ্চয়েই দ্বাদশ মাস সোমযজ্ঞৰ ফল লাভ কৰে। আৰু সোমকন্যাসকলৰ নিবাসত সি সদা নিত্য বাস কৰে।
Verse 76
सौम्यगन्धानुलिप्तश्न॒ कामकारगतिर्भवेत् । वह सोम-कन्याओंके महलोंमें नित्य निवास करता है, उसके अंगोंमें सौम्य गन्धयुक्त अनुलेप लगाया जाता है। वह अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहता है, घूमता है ।। सुदर्शनाभिनरिभिर्मधुराभिस्तथैव च
সেই সোম-কন্যাসকলৰ প্ৰাসাদত সদায় বাস কৰে। তাৰ অঙ্গত মৃদু আৰু মনোহৰ সুগন্ধিযুক্ত অনুলেপ লগোৱা হয়। সি নিজৰ ইচ্ছামতে য’তে বিচাৰে ত’তে বিচৰণ কৰে। সুন্দৰী আৰু মধুৰস্বভাৱা নাৰীসকলেও তাক নিত্য পৰিচৰ্যা কৰে॥
Verse 77
अर्च्यते वै विमानस्थ: कामभोगैश्न सेव्यते । वह विमानपर विराजमान होता है और देखनेमें परम सुन्दरी तथा मधुरभाषिणी दिव्य नारियाँ उसकी पूजा करती तथा उसे काम-भोगका सेवन कराती हैं ।। फलं पद्मशतप्रख्यं महाकल्पं दशाधिकम्
সি দিব্য বিমানে অধিষ্ঠিত হৈ বিরাজ কৰে আৰু কামভোগে সেবিত হয়। পৰম সুন্দৰী আৰু মধুৰভাষিণী দিব্য নাৰীসকলে তাক পূজা কৰি তাৰ ইচ্ছিত ভোগ অৰ্ঘ্য কৰে। তাৰ ফল শত পদ্মৰ ন্যায় দীপ্তিমান, এক মহাকল্প আৰু তাৰ ওপৰত দহ অধিক কাললৈ স্থায়ী হয়॥
Verse 78
दिवसे सप्तदशमे य: प्राप्ते प्राशते हवि:,जो मनुष्य बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ सोलह दिन उपवास करके सत्रहवें दिन केवल हविष्यात्र भोजन करता है, वह वरुण, इन्द्र, रुद्र, मरुत, शुक्राचार्यजी तथा ब्रह्माजीके लोकमें जाता है और उन लोकोंमें देवताओंकी कन्याएँ आसन देकर उसका पूजन करती हैं
যি ব্যক্তি বাৰো মাহ ধৰি প্ৰতিদিন অগ্নিহোত্ৰ পালন কৰে, তাৰ পিছত ষোল দিন উপবাস কৰি সপ্তদশ দিনত কেৱল হৱিষ্য-ভোজন গ্ৰহণ কৰে, সি বৰুণ, ইন্দ্ৰ, ৰুদ্ৰ, মৰুত, উশনস্ (শুক্ৰাচাৰ্য) আৰু ব্ৰহ্মাৰ লোকসমূহ লাভ কৰে। সেই লোকসমূহত দেৱকন্যাসকলে তাক আসন দি পূজা কৰে॥
Verse 79
सदा द्वादशमासान् वै जुह्मानो जातवेदसम् | स्थानं वारुणमैन्द्रं च रौद्रं वाप्पधिगच्छति,जो मनुष्य बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ सोलह दिन उपवास करके सत्रहवें दिन केवल हविष्यात्र भोजन करता है, वह वरुण, इन्द्र, रुद्र, मरुत, शुक्राचार्यजी तथा ब्रह्माजीके लोकमें जाता है और उन लोकोंमें देवताओंकी कन्याएँ आसन देकर उसका पूजन करती हैं
যি ব্যক্তি বাৰো মাহ ধৰি নিৰন্তৰ জাতবেদস্ (অগ্নি)-ত আহুতি অৰ্ঘ্য কৰে, সি বৰুণ, ইন্দ্ৰ আৰু ৰুদ্ৰৰ লোক লাভ কৰে॥
Verse 80
मारुतौशनसे चैव ब्रह्मलोक॑ स गच्छति । तत्र दैवतकन्याभिरासनेनोपचर्यते,जो मनुष्य बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ सोलह दिन उपवास करके सत्रहवें दिन केवल हविष्यात्र भोजन करता है, वह वरुण, इन्द्र, रुद्र, मरुत, शुक्राचार्यजी तथा ब्रह्माजीके लोकमें जाता है और उन लोकोंमें देवताओंकी कन्याएँ आसन देकर उसका पूजन करती हैं
সি মৰুতসকলৰ লোক, উশনস্ (শুক্ৰ)ৰ লোক আৰু ব্ৰহ্মলোকলৈও গমন কৰে। তাত দেৱতাকন্যাসকলে তাক আসন দি আদৰেৰে উপচাৰ কৰে॥
Verse 81
भूर्भुवं चापि देवर्षि विश्वरूपमवेक्षते | तत्र देवाधिदेवस्थ कुमार्यो रमयन्ति तम्
ভীষ্মে ক’লে—হে দেৱৰ্ষি! তেওঁ ভূঃ আৰু ভুৱঃ লোকক আৱৰি ধৰা বিশ্বৰূপ দৰ্শন কৰে। তাত দেৱাধিদেৱৰ সান্নিধ্যত দিব্য কুমাৰীসকলে তেওঁক আনন্দিত কৰি ৰমাই তোলে।
Verse 82
चन्द्रादित्यावुभी यावद् गगने चरत: प्रभो
হে প্ৰভু! যেতিয়ালৈকে চন্দ্ৰ আৰু সূৰ্য—উভয়েই—আকাশত বিচৰণ কৰি থাকিব…
Verse 83
अष्टादशे यो दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम्
যি অষ্টাদশ দিনত কেৱল এবাৰেই আহাৰ গ্ৰহণ কৰে,
Verse 84
रथै: सनन्दिघोषैश्न पृष्तत: सो5नुगम्यते
আনন্দধ্বনিত মুখৰ ৰথসমূহ থাকিলেও তেওঁক পিঠিৰ ফালৰ পৰা অনুসৰণ কৰা উচিত নহয়।
Verse 85
देवकन्याधिरूैस्तु भ्राजमानै: स्वलंकृतै: । उसके पीछे आनन्दपूर्वक जयघोष करते हुए बहुत-से तेजस्वी एवं सजे-सजाये रथ चलते हैं। उन रथोंपर देवकन्याएँ बैठी होती हैं ।। ८४ $ || व्याप्रसिंहप्रयुक्ते च मेघस्वननिनादितम्
তেওঁৰ পিছে আনন্দেৰে জয়ধ্বনি কৰি বহু দীপ্তিমান আৰু সুসজ্জিত ৰথ আগবাঢ়ে। সেই ৰথসমূহত দেৱকন্যাসকল আৰূঢ় হৈ আসীন থাকে।
Verse 86
प्राजापत्ये वसेत् पद्म वर्षाणामग्निसंनिभे | वह मनुष्य तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् विमान पाता है और अग्नितुल्य तेजस्वी प्रजापतिलोकमें नृत्य तथा गीतोंसे गूँजते हुए देवांगनाओंके महलमें एक पद्म वर्षोतक निवास करता है,तत्र कल्पसहस्रं स कन्याभि: सह मोदते
ভীষ্মে ক’লে—অগ্নিসদৃশ দীপ্তিমান হৈ সি প্ৰজাপতি-লোকত ‘পদ্ম’ পৰিমাণ বছৰৰ বাবে বাস কৰে। তাত দেবাঙ্গনাসকলৰ গীত-নৃত্যৰে মুখৰ প্ৰাসাদত সি কন্যাসকলৰ সৈতে সহস্ৰ কল্পলৈ আনন্দ কৰে।
Verse 87
एकोनविंशतिदिने यो भुड्क्ते एकभोजनम्
যি উনবিংশ দিনত কেৱল এবাৰ আহাৰ কৰে…
Verse 88
उत्तमं लभते स्थानमप्सरोगणसेवितम्
সি অপ্সৰাগণৰ দ্বাৰা সেবিত উত্তম স্থান লাভ কৰে।
Verse 89
तत्रामरवरस्त्रीभिमोंदते विगतज्वर:
তাত সকলো তাপ-জ্বৰ নোহোৱা হৈ সি শ্ৰেষ্ঠ দেবস্ত্ৰীসকলৰ সৈতে আনন্দ কৰে।
Verse 90
पूर्णेडथ विंशे दिवसे यो भुड्क्ते होकभोजनम्,स लोकान् विपुलान् रम्यानादित्यानामुपाश्षुते । जो लगातार बारह महीनेतक पूरे बीस दिनपर एक बार भोजन करता, सत्य बोलता, व्रतका पालन करता, मांस नहीं खाता, ब्रह्मचर्यका पालन करता तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहता है, वह सूर्यदेवके विशाल एवं रमणीय लोकोंमें जाता है
ভীষ্মে ক’লে—পূৰ্ণ বিশ দিন পাৰ হ’লে যি কেৱল এবাৰ আহাৰ কৰে, সত্যভাষী থাকে, ব্ৰত পালন কৰে, মাংস ত্যাগ কৰে, ব্ৰহ্মচৰ্য ৰক্ষা কৰে আৰু সকলো প্ৰাণীৰ হিতত তৎপৰ থাকে—সি আদিত্যসকলৰ, অৰ্থাৎ সূৰ্যদেৱৰ, বিস্তৃত আৰু মনোৰম লোকসমূহ লাভ কৰে।
Verse 91
सदा द्वादशमासांस्तु सत्यवादी धृतव्रत: । अमांसाशी ब्रह्मचारी सर्वभूतहिते रत:
ভীষ্মে ক’লে—সেই ব্যক্তি পূৰ্ণ বাৰো মাহ সদায় সত্যবাদী আৰু দৃঢ়ব্ৰতী থাকে; মাংস ত্যাগ কৰে, ব্ৰহ্মচৰ্য পালন কৰে আৰু সকলো ভূতৰ হিতত ৰত থাকে।
Verse 92
गन्धर्वैरप्सरोभिश्व दिव्यमाल्यानुलेपनै:
ভীষ্মে ক’লে—(সেই/সকলে) গন্ধৰ্ব আৰু অপ্সৰাৰ দ্বাৰা সেবিত, দিব্য মালা আৰু সুগন্ধি অনুলেপনে অলংকৃত থাকে।
Verse 93
एकविंशे तु दिवसे यो भुड्क्ते होकभोजनम्,सेव्यमानो वरस्त्रीभि: क्रीडत्यमरवत् प्रभु: । जो लगातार बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ इक्कीसवें दिनपर एक बार भोजन करता है, वह शुक्राचार्य तथा इन्द्रके दिव्यलोकमें जाता है। इतना ही नहीं, उसे अश्विनीकुमारों और मरुद्गणोंके लोकोंकी भी प्राप्ति होती है। उन लोकोंमें वह सदा सुख भोगनेमें ही तत्पर रहता है। दुःखोंका तो वह नाम भी नहीं जानता है और श्रेष्ठ विमानपर विराजमान हो सुन्दरी स्त्रियोंसे सेवित होता हुआ शक्तिशाली देवताके समान क्रीड़ा करता है
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্যক্তি প্ৰতিদিন অগ্নিহোত্ৰৰ নিয়ম পালন কৰি একুশতম দিনত কেৱল এবাৰ নিয়ত (সৰল) আহাৰ গ্ৰহণ কৰে, সি দিব্য লোকসমূহ লাভ কৰে। তাত শ্ৰেষ্ঠ বিমানে আৰূঢ়, উৎকৃষ্ট নাৰীৰ দ্বাৰা সেবিত হৈ, সি অমৰলোকৰ প্ৰভুৰ দৰে ক্ৰীড়া কৰে; শোক তাক স্পৰ্শ নকৰে।
Verse 94
सदा द्वादशमासान् वै जुद्धानो जातवेदसम् | लोकमौशनसं दिव्यं शक्रलोकं॑ च गच्छति
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্যক্তি পূৰ্ণ বাৰো মাহ নিৰন্তৰ জাতবেদস্ (অগ্নি)ত আহুতি দিয়ে থাকে, সি দিব্য ঔশনস লোক আৰু শক্র (ইন্দ্ৰ) লোকো লাভ কৰে।
Verse 95
अश्रिनोर्मरुतां चैव सुखेष्वभिरत: सदा । अनभि्शज्ञिश्व दुःखानां विमानवरमास्थित:
ভীষ্মে ক’লে—সি সদায় সুখতহে অভিৰত থাকে আৰু যেন অশ্বিনীকুমাৰ আৰু মৰুদ্গণৰ আশ্ৰয়ত থাকে। দুঃখৰ সৈতে অপৰিচিত হৈ সি শ্ৰেষ্ঠ বিমানে আৰূঢ় থাকে।
Verse 96
धर्मपत्नीरतो नित्यमग्निष्टोमफलं लभेत् । जो अपनी ही धर्मपत्नीमें अनुराग रखते हुए निरन्तर तीन वर्षोतक प्रतिदिन एक समय भोजन करके रहता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है,द्वाविंशे दिवसे प्राप्ते यो भुडक्ते होकभोजनम्
যি মানুহে সদায় নিজৰ ধৰ্মপত্নীত অনুৰক্ত থাকে, সি অগ্নিষ্টোম যজ্ঞৰ ফল লাভ কৰে। আৰু যি বায়িছতম দিন উপস্থিত হ’লে সংযমেৰে কেৱল এবাৰ আহাৰ কৰে, সিও যজ্ঞফল পায়।
Verse 97
सदा द्वादशमासान् वै जुह्मानो जातवेदसम् | अहिंसानिरतो धीमान् सत्यवागनसूयक:
যি ব্যক্তি বাৰো মাহ ধৰি সদায় জাতবেদস (যজ্ঞাগ্নি)ত আহুতি দিয়ে থাকে, অহিংসাত নিৰত, ধীমান, সত্যভাষী আৰু দোষ-অন্বেষণৰ পৰা মুক্ত—সেইজনেই ধৰ্মে প্ৰশংসা কৰা সংযমী নৈতিক জীৱনৰ আদৰ্শ।
Verse 98
लोकान् वसूनामाप्रोति दिवाकरसमप्रभ: । कामचारी सुधाहारो विमानवरमास्थित:
সি সূৰ্যৰ দৰে দীপ্তিমান হৈ বসুসকলৰ লোকসমূহ লাভ কৰে। ইচ্ছামতে বিচৰণ কৰে, অমৃতসম আহাৰে জীৱিত থাকে আৰু শ্ৰেষ্ঠ বিমানে অধিষ্ঠিত হয়।
Verse 99
रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरण भूषित: । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बाईसवाँ दिन प्राप्त होनेपर एक बार भोजन करता है तथा अहिंसामें तत्पर, बुद्धिमान, सत्यवादी और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी रूप धारण करके श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो वसुओंके लोकमें जाता है। वहाँ इच्छानुसार विचरता, अमृत पीकर रहता और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है || ९६--९८ $ ।। त्रयोविंशे तु दिवसे प्राशेद् यस्त्वेकभोजनम्
সি দিব্য অলংকাৰৰে ভূষিত হৈ দেৱকন্যাসকলৰ সৈতে ৰমণ কৰে। আৰু যি তেইশতম দিন উপস্থিত হ’লে কেৱল এবাৰ আহাৰ কৰে, সিও (এই নিয়মৰ) ফল লাভ কৰে।
Verse 100
सदा द्वादशमासांस्तु मिताहारो जितेन्द्रिय: । वायोरुशनसश्लैव रुद्रलोक॑ च गच्छति
যি ব্যক্তি বাৰো মাহ ধৰি সদায় মিতাহাৰী আৰু জিতেন্দ্ৰিয় থাকে, সি বায়ুৰ লোক, উশনস (শুক্ৰ)ৰ লোক আৰু ৰুদ্ৰলোকো লাভ কৰে।
Verse 101
जो लगातार बारह महीनोंतक मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर तेईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह वायु, शुक्राचार्य तथा रुद्रके लोकमें जाता है ।। कामचारी कामगम: पूज्यमानो5प्सरोगणै: । अनेकगुणपर्यन्तं विमानवरमास्थित:
ভীষ্মে ক’লে—যি জনে বাৰ মাহ ধৰি নিৰন্তৰ মিতাহাৰী আৰু জিতেন্দ্ৰিয় হৈ তেইশতম দিনত মাত্ৰ এবাৰ আহাৰ কৰে, সি বায়ু, শুক্ৰাচাৰ্য আৰু ৰুদ্ৰৰ লোক লাভ কৰে। তাত সি ইচ্ছামতে বিচৰণ কৰি যি বিচাৰে সি পায়; অপ্সৰাগণৰ দ্বাৰা পূজিত হৈ, বহুগুণিত পুণ্যকাললৈকে শ্ৰেষ্ঠ বিমানে অধিষ্ঠিত হৈ বাস কৰে।
Verse 102
चतुर्विंशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राशते हवि:
চব্বিশতম দিনত, সময় উপস্থিত হ’লে, যি হবি (যজ্ঞৰ আহুতি) গ্ৰহণ কৰে…
Verse 103
सदा द्वादशमासांश्व जुह्नानो जातवेदसम् | आदित्यानामधीवासे मोदमानो वसेच्चिरम्
যি বাৰ মাহ ধৰি সদায় জাতবেদ (অগ্নি)-ত আহুতি দান কৰে আৰু আদিত্যসকলৰ অধিবাসত আনন্দেৰে বাস কৰে, সি তাত দীৰ্ঘকাল থাকে।
Verse 104
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपन: । जो लगातार बारह महीनोंतक अग्निहोत्र करता हुआ चौबीसवें दिन एक बार हविष्यान्न भोजन करता है, वह दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध तथा दिव्य अनुलेपन धारण करके सुदीर्घकालतक आदित्यलोकमें सानन्द निवास करता है || १०२-१०३ ई || विमाने काउ्चने दिव्ये हंसयुक्ते मनोरमे
ভীষ্মে ক’লে—সি দিব্য মালা আৰু দিব্য বস্ত্ৰ ধাৰণ কৰে, আৰু স্বৰ্গীয় সুগন্ধেৰে অনুলিপ্ত হয়। যি বাৰ মাহ অগ্নিহোত্ৰ পালন কৰি চব্বিশতম দিনত এবাৰ হবিশ্যান্ন ভোজন কৰে, সি অতি দীৰ্ঘকাল আনন্দেৰে আদিত্যলোকত বাস কৰে; হাঁসযুক্ত মনোৰম দিব্য সোণালী বিমানে আৰূঢ় হৈ থাকে।
Verse 105
रमते देवकन्यानां सहस्रैरयुतैस्तथा । वहाँ हंसयुक्त मनोरम एवं दिव्य सुवर्णमय विमानपर वह सहस्रों तथा अयुतों देवकन्याओंके साथ रमण करता है || १०४ $ ।। पज्चविंशे तु दिवसे य: प्राशेदेकभोजनम्
সি তাত সহস্ৰ আৰু অযুত দেৱকন্যাৰ সৈতে ৰমণ কৰে। আৰু পঁচিশতম দিনত যি মাত্ৰ এবাৰ আহাৰ কৰে…
Verse 106
सिंहव्याप्रप्रयुक्तैस्तु मेघनि:स्वननादितैः,उसके पीछे सिंहों और व्याप्रोंसे जुते हुए तथा मेघोंकी गम्भीर गर्जनासे निनादित बहुसंख्यक रथ सानन्द विजयघोष करते हुए चलते हैं। उन सुवर्णमय, निर्मल एवं मंगलकारी रथोंपर देवकन्याएँ आरूढ़ होती हैं
ভীষ্মে ক’লে— তেওঁলোকৰ পিছফালে সিংহ আৰু ব্যাঘ্ৰে যোজিত, মেঘগর্জনৰ দৰে গম্ভীৰ নাদে নিনাদিত অসংখ্য ৰথ আগবাঢ়ে। আনন্দে বিজয়ধ্বনি কৰি কৰি সেই ৰথসমূহ চলি যায়। সেয়া স্বৰ্ণময়, নিৰ্মল আৰু মঙ্গলকাৰী ৰথ; তাত দেবকন্যাসকল আৰূঢ় থাকে।
Verse 107
स रथैनन्दिघोषैश्न पृष्ठतो हानुगम्यते । देवकन्यासमारूढै: काउ्चनैर्विमलै: शुभै:,उसके पीछे सिंहों और व्याप्रोंसे जुते हुए तथा मेघोंकी गम्भीर गर्जनासे निनादित बहुसंख्यक रथ सानन्द विजयघोष करते हुए चलते हैं। उन सुवर्णमय, निर्मल एवं मंगलकारी रथोंपर देवकन्याएँ आरूढ़ होती हैं इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उपवासविधिरनाम सप्ताधिकशततमो<ध्याय:
ভীষ্মে ক’লে— তেওঁৰ পিছফালে আনন্দময় বিজয়ধ্বনিয়ে নিনাদিত, মেঘগর্জনৰ দৰে গম্ভীৰ ধ্বনিযুক্ত বহু ৰথ অনুসৰণ কৰে। সেই ৰথসমূহ কাঁচনময়, নিৰ্মল আৰু মঙ্গলকাৰী; তাত দেবকন্যাসকল আৰূঢ় থাকে। (ইতি শ্রীমহাভারতে অনুশাসনপৰ্বণি দানধর্মপৰ্বণি উপবাসবিধিৰ্নাম সপ্তাধিকশততমোऽধ্যায়ঃ।)
Verse 108
विमानमुत्तमं दिव्यमास्थाय सुमनोहरम् | तत्र कल्पसहसंरं वै वसते स्त्रीशतावृते
ভীষ্মে ক’লে— পৰম উত্তম, দিব্য আৰু অতিশয় মনোহৰ বিমানত আৰূঢ় হৈ, তাত শত শত নাৰীৰে পৰিবৃত হৈ, সি নিশ্চয় সহস্ৰ কল্পকাল বাস কৰে।
Verse 109
षड्विंशे दिवसे यस्तु प्रकुयदिकभोजनम्,जो लगातार बारह महीनोंतक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मिताहारी हो छब्बीसवें दिन एक बार भोजन करता है तथा वीतराग और जितेन्द्रिय हो प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह महाभाग मनुष्य अप्सराओंसे पूजित हो सात मरुदगणों और आठ वसुओंके लोकोंमें जाता है
ভীষ্মে ক’লে— যি ব্যক্তি ছাব্বিশতম দিনত একবাৰ আহাৰ কৰে আৰু একেৰাহে বাৰো মাহ মন আৰু ইন্দ্ৰিয় সংযত কৰি মিতাহাৰী হৈ থাকে; যি আসক্তিহীন, জিতেন্দ্ৰিয় হৈ প্ৰতিদিন অগ্নিত আহুতি দিয়ে— সেই মহাভাগ্যবান নৰ অপ্সৰাসকলৰ দ্বাৰা পূজিত হৈ সপ্ত মৰুদ্গণ আৰু অষ্ট বসুৰ লোক লাভ কৰে।
Verse 110
सदा द्वादशमासांस्तु नियतो नियताशन: । जितेन्द्रियो वीतरागो जुह्मानो जातवेदसम्,जो लगातार बारह महीनोंतक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मिताहारी हो छब्बीसवें दिन एक बार भोजन करता है तथा वीतराग और जितेन्द्रिय हो प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह महाभाग मनुष्य अप्सराओंसे पूजित हो सात मरुदगणों और आठ वसुओंके लोकोंमें जाता है
ভীষ্মে ক’লে— যি ব্যক্তি বাৰো মাহ সদায় নিয়মবদ্ধ হৈ থাকে, নিয়ত আহাৰ কৰে, জিতেন্দ্ৰিয় আৰু আসক্তিহীন হৈ প্ৰতিদিন জাতবেদা (অগ্নি)-ত আহুতি দিয়ে— সেই মহাভাগ্যবান নৰ নিত্যে অপ্সৰাসকলৰ দ্বাৰা সমর্চিত হৈ সপ্ত মৰুদ্গণ আৰু অষ্ট বসুৰ লোক লাভ কৰে।
Verse 111
स प्राप्नोति महाभाग: पूज्यमानो5प्सरोगणै: । सप्तानां मरुतां लोकान् वसूनां चापि सो5श्षुते,जो लगातार बारह महीनोंतक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मिताहारी हो छब्बीसवें दिन एक बार भोजन करता है तथा वीतराग और जितेन्द्रिय हो प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह महाभाग मनुष्य अप्सराओंसे पूजित हो सात मरुदगणों और आठ वसुओंके लोकोंमें जाता है
এনে মহাভাগ্যবান পুৰুষ—অপ্সৰাগণৰ দ্বাৰা পূজিত—সপ্ত মৰুতৰ লোক আৰু বসুসকলৰ লোকো লাভ কৰে। যি ব্যক্তি বাৰ মাহ ধৰি মন আৰু ইন্দ্ৰিয় সংযমত ৰাখি মিতাহাৰী হৈ থাকে, ছাব্বিশতম দিনত এবাৰ আহাৰ কৰে, বৈৰাগ্যসম্পন্ন আৰু জিতেন্দ্ৰিয় হৈ প্ৰতিদিন অগ্নিত আহুতি অৰ্পণ কৰে—সেই মহাভাগ্যবানেই সেই দিৱ্য লোকসমূহত গমন কৰে।
Verse 112
विमानै: स्फाटिकैर्दिव्यै: सर्वरत्नैरलंकृतै: गन्धर्वैरप्सरोभिश्व पूज्यमान: प्रमोदते
সেই ব্যক্তি সকলো ৰত্নে অলংকৃত দিৱ্য স্ফটিক-বিমানে বিচৰণ কৰে; গন্ধৰ্ব আৰু অপ্সৰাসকলৰ দ্বাৰা পূজিত হৈ পৰমানন্দত থাকে।
Verse 113
सप्तविंशेडथ दिवसे य: कुयदिकभोजनम्,जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर सत्ताईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह प्रचुर फलका भागी होता और देवलोकमें सम्मान पाता है
যি ব্যক্তি প্ৰতিটো সাতাশতম দিনত এবাৰ মাত্ৰ আহাৰ কৰে আৰু বাৰ মাহ ধৰি প্ৰতিদিন অগ্নিহোত্ৰ পালন কৰে—সেই নিয়মে চলি সি প্ৰচুৰ ফল লাভ কৰে আৰু দেৱলোকত সন্মানিত হয়।
Verse 114
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्मानो जातवेदसम् | फल प्राप्रोति विपुलं देवलोके च पूज्यते,जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर सत्ताईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह प्रचुर फलका भागी होता और देवलोकमें सम्मान पाता है
যি ব্যক্তি পূৰ্ণ বাৰ মাহ ধৰি সদায় জাতবেদস্ (অগ্নি)-ত আহুতি অৰ্পণ কৰে, সি বিপুল ফল লাভ কৰে আৰু দেৱলোকত পূজিত হয়।
Verse 115
अमृताशी वसंस्तत्र स वितृष्ण: प्रमोदते । देवर्षिचरितं राजन् राजर्षिभिरनुछितम्,युगकल्पसहस्राणि त्रीण्यावसति वै सुखम् । वहाँ उसे अमृतका आहार प्राप्त होता है तथा वह तृष्णारहित हो वहाँ रहकर आनन्द भोगता है। राजन! वह दिव्यरूपधारी पुरुष राजर्षियोंद्वारा वर्णित देवर्षियोंके चरित्रका श्रवण-मनन करता है और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो मनोरम सुन्दरियोंके साथ मदोन्मत्तभावसे रमण करता हुआ तीन हजार युगों एवं कल्पोंतक वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है
তাত সি অমৃতসম আহাৰ লাভ কৰি, তৃষ্ণাৰহিত হৈ আনন্দিত থাকে। হে ৰাজন! ৰাজর্ষিসকলে উপদেশ দিয়া দেবর্ষিসকলৰ চৰিত্ৰ সি শ্ৰৱণ-মনন কৰে; আৰু শ্ৰেষ্ঠ বিমানে আৰূঢ় হৈ মনোহৰ সুন্দৰীসকলৰ সৈতে পৰমানন্দত ৰমণ কৰি, তিনি হাজাৰ যুগ আৰু কল্প পৰ্যন্ত তাত সুখে বাস কৰে।
Verse 116
अध्यावसति दिव्यात्मा विमानवरमास्थित: । स्त्रीभिर्मनोभिरामाभी रममाणो मदोत्कट:
ভীষ্ম ক’লে—সেই দিব্যাত্মা শ্ৰেষ্ঠ বিমানত আৰূঢ় হৈ তাতেই বাস কৰে; মনোহৰী নাৰীৰ সৈতে ক্ৰীড়া কৰি, আনন্দ-মদত উন্মত্ত হৈ থাকে।
Verse 117
योडष्टाविंशे तु दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम्,जो बारह महीनोंतक सदा अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर अट्ठाईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह देवर्षियोंको प्राप्त होनेवाले महान् फलका उपभोग करता है
ভীষ্ম ক’লে—যি বাৰো মাহ ধৰি মন আৰু ইন্দ্ৰিয় সংযত ৰাখি অষ্টাবিংশ দিনত কেৱল এবাৰ আহাৰ কৰে, সি দেবর্ষিসকলৰ প্ৰাপ্য মহান ফল ভোগ কৰে।
Verse 118
सदा द्वादशमासांस्तु जितात्मा विजितेन्द्रिय: । फल देवर्षिचरितं विपुलं समुपाश्ुते,जो बारह महीनोंतक सदा अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर अट्ठाईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह देवर्षियोंको प्राप्त होनेवाले महान् फलका उपभोग करता है
ভীষ্ম ক’লে—যি বাৰো মাহ সদায় আত্মসংযমী আৰু ইন্দ্ৰিয়জয়ী হৈ থাকে, সি দেবর্ষিসকলৰ আচৰণৰ পৰা উদ্ভূত বিপুল ফল লাভ কৰে।
Verse 119
भोगवांस्तेजसा भाति सहस्रांशुरिवामल: । सुकुमार्यश्न नार्यस्तं रममाणा: सुवर्चस:,सर्वकामगमे दिव्ये कल्पायुतशतं समा: । वह भोगसे सम्पन्न हो अपने तेजसे निर्मल सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है और सुन्दर कान्तिवाली, पीन उरोज, जाँच और जघन प्रदेशवाली, दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुकुमारी रमणियाँ सूर्यके समान प्रकाशित और सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले मनोरम दिव्य विमानपर बैठकर उस पुण्यात्मा पुरुषका दस लाख कल्पोंके वर्षोतक मनोरंजन करती हैं
ভীষ্ম ক’লে—ভোগসমৃদ্ধ হৈ সি নিজৰ তেজে সহস্ৰকিৰণ নিৰ্মল সূৰ্যৰ দৰে দীপ্তিমান হয়। সুকুমাৰী, কান্তিমতী নাৰীসকলে তাৰ সৈতে ৰমণ কৰে; আৰু সূৰ্যসদৃশ, সৰ্বকামপ্ৰদ দিৱ্য বিমানত তাৰ সৈতে বহি, সেই পুণ্যকৰ্মীক অসংখ্য কল্পকাললৈকে বিনোদিত কৰে।
Verse 120
पीनस्तनोरुजघना दिव्याभरणभूषिता: । रमयन्ति मनःकान्ते विमाने सूर्यसंनिभे
ভীষ্ম ক’লে—দিব্য অলংকাৰে ভূষিতা, পূৰ্ণস্তনা আৰু বিস্তৃত নিতম্বা সেই নাৰীসকলে সূৰ্যসদৃশ বিমানত বিচৰণ কৰি প্ৰিয়জনৰ মন আনন্দিত কৰে।
Verse 121
एकोनत्रिंशे दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम्,जो बारह महीनोंतक सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर हो उन््तीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे देवर्षियों तथा राजर्षियोंद्वारा पूजित दिव्य मंगलमय लोक प्राप्त होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্যক্তি বাৰো মাহ ধৰি নিৰন্তৰ সত্যব্ৰতত অটল হৈ থাকে আৰু ঊনত্রিশতম দিনত কেৱল এবাৰ আহাৰ গ্ৰহণ কৰে, সি দেবর্ষি আৰু ৰাজর্ষিসকলৰ দ্বাৰা পূজিত দিব্য আৰু মঙ্গলময় লোকসমূহ লাভ কৰে।
Verse 122
सदा द्वादशमासान् वै सत्यव्रतपरायण: । तस्य लोका: शुभा दिव्या देवराजर्षिपूजिता:,जो बारह महीनोंतक सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर हो उन््तीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे देवर्षियों तथा राजर्षियोंद्वारा पूजित दिव्य मंगलमय लोक प्राप्त होते हैं
যি ব্যক্তি বাৰো মাহ সদায় সত্যব্ৰতত পৰায়ণ থাকে, সি দেব আৰু ৰাজর্ষিসকলৰ দ্বাৰা পূজিত শুভ আৰু দিব্য লোকসমূহ লাভ কৰে।
Verse 123
विमान सूर्यचन्द्रा भं दिव्यं समधिगच्छति । जातरूपमयं युक्त सर्वरत्नसमन्वितम्,वह सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित, सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित तथा आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त सुवर्णमय दिव्य विमान प्राप्त करता है
সি সূৰ্য-চন্দ্ৰৰ দৰে দীপ্তিমান, স্বৰ্ণময়, যথাযথভাৱে সজ্জিত আৰু সকলো ৰত্নে বিভূষিত এক দিব্য বিমান লাভ কৰে।
Verse 124
अप्सरोगणसम्पूर्ण गन्धर्वैरभिनादितम् | तत्र चैनं शुभा नार्यों दिव्याभरणभूषिता:
সেয়া অপ্সৰাগণৰে পৰিপূৰ্ণ আছিল আৰু গন্ধৰ্বসকলৰ গীত-বাদ্যৰে মুখৰিত হৈছিল। তাত দিব্য অলংকাৰৰে ভূষিতা শুভা স্বৰ্গীয় নাৰীসকলে তাক পৰিচৰ্যা কৰিছিল।
Verse 125
भोगवांस्तेजसा युक्तो वैश्वानरसमप्रभ:,रुद्राणां च तथा लोकं ब्रह्मलोक॑ च गच्छति । वह पुरुष भोगसम्पन्न, तेजस्वी, अग्निके समान दीप्तिमानू, अपने दिव्य शरीरसे देवताकी भाँति प्रकाशमान तथा दिव्यभावसे युक्त हो वसुओं, मरुद्गणों, साध्यगणों, अश्विनीकुमारों, रुद्रों तथा ब्रह्माजीके लोकमें भी जाता है
সি ভোগসমৃদ্ধ, তেজস্বী, বৈশ্বানৰ অগ্নিৰ দৰে দীপ্তিমান হৈ ৰুদ্রসকলৰ লোক আৰু ব্ৰহ্মলোকলৈও গমন কৰে।
Verse 126
दिव्यो दिव्येन वपुषा भ्राजमान इवामर: । वसूनां मरुतां चैव साध्यानामश्विनोस्तथा
ভীষ্মে ক’লে—তেওঁ দিব্য দেহে দীপ্তিমান, যেন অমৰৰ দৰে। সেই জ্যোতিত তেওঁ বসু, মৰুত, সাধ্য আৰু অশ্বিনীকুমাৰসকলৰ সদৃশ প্ৰতীয়মান হ’ল।
Verse 127
यस्तु मासे गते भुड्क्ते एकभक्तं शमात्मक:
ভীষ্মে ক’লে—যি এক মাহ পাৰ হ’লে কেৱল এবাৰ আহাৰ কৰে, সংযমী আৰু শান্তস্বভাৱী হৈ, ধৰ্মব্ৰতত নিয়মবদ্ধ সংযম অনুশীলন কৰে।
Verse 128
सुधारसकृताहार: श्रीमान् सर्वमनोहर:
ভীষ্মে বৰ্ণনা কৰিলে—তেওঁৰ আহাৰ যেন অমৃতৰসৰ দৰে শুদ্ধ আৰু মধুৰ; তেওঁ শ্ৰীসমৃদ্ধ আৰু সকলোৰে মনোহৰ।
Verse 129
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपन:
ভীষ্মে ক’লে—তেওঁ দিব্য মালা আৰু বস্ত্ৰ ধাৰণ কৰে, আৰু দিব্য সুগন্ধে অনুলিপ্ত থাকে।
Verse 130
स्वयंप्रभाभिनरिीभिर्विमानस्थो महीयते,नानामधुरभाषाभिनानारतिभिरेव च | वह विमानपर आरूढ़ हो अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारियोंद्वारा सम्मानित होता है। रुद्रों तथा देवर्षियोंकी कन्याएँ सदा उसकी पूजा करती हैं। वे कन्याएँ नाना प्रकारके रमणीय रूप, विभिन्न प्रकारके राग, भाँति-भाँतिकी मधुर भाषणकला तथा अनेक तरहकी रति-क्रीड़ाओंसे सुशोभित होती हैं
ভীষ্মে ক’লে—তেওঁ দিব্য বিমানত আসীন হৈ, নিজৰেই প্ৰভাৰে দীপ্তিমান দিৱ্য নাৰীসকলৰ দ্বাৰা সন্মানিত হয়; তেওঁলোকে নানাবিধ মধুৰ বাক্য আৰু বিভিন্ন ৰতি-ৱিনোদেৰে তেওঁৰ সেৱা-সত্কাৰ কৰে।
Verse 131
रुद्रदेवर्षिकन्याभि: सततं चाभिपूज्यते । नानारमणरूपाभिनननारागाभिरेव च
ভীষ্ম ক’লে—ৰুদ্ৰ, দেৱসকল আৰু দেৱৰ্ষিসকলৰ কন্যাসকলে তেওঁক সদায় শ্ৰদ্ধাৰে পূজা কৰে; আৰু নানাবিধ মনোমোহা ৰূপে, বিভিন্ন ৰাগ-ৰুচি আৰু ভক্তিভাৱৰ নানান প্ৰকাশে তেওঁক আৰাধনা কৰা হয়।
Verse 132
विमाने गगनाकारे सूर्यवैदूर्यसंनिभे
ভীষ্ম ক’লে—আকাশসম বিস্তৃত, সূৰ্যসম দীপ্ত আৰু বৈদূৰ্য-মণি (কেট্ছ-আই) সদৃশ কান্তিযুক্ত এক দিৱ্য বিমানে…
Verse 133
पृष्ठत: सोमसंकाशे उदर्क चाभ्रसन्निभे | दक्षिणायां तु रक्ताभे अधस्तान्नीलमण्डले
ভীষ্ম ক’লে—পিছফালে সি চন্দ্ৰসম কান্তিময় আছিল; ওপৰত মেঘপুঞ্জ সদৃশ দেখা গৈছিল। দক্ষিণফালে ৰক্তাভ আভা, আৰু তলত নীলবৰ্ণ মণ্ডলাকাৰ বিস্তাৰ আছিল।
Verse 134
ऊर्ध्व विचित्रसंकाशे नैको वसति पूजित: । जिस विमानपर वह विराजमान होता है, वह आकाशके समान विशाल दिखायी देता है। सूर्य और वैदूर्यमणिके समान तेजस्वी जान पड़ता है। उसका पिछला भाग चन्द्रमाके समान, वामभाग मेघके सदृश, दाहिना भाग लाल प्रभासे युक्त, निचला भाग नीलमण्डलके समान तथा ऊपरका भाग अनेक रंगोंके सम्मिश्रणसे विचित्र-सा प्रतीत होता है। उसमें वह अनेक नर-नारियोंके साथ सम्मानित होकर रहता है || १३२-१३३ $ ।। यावद् वर्षसहस्त्रं वै जम्बूद्वीपे प्रवर्षति
ভীষ্ম ক’লে—ওপৰভাগ নানাৰঙৰ আশ্চৰ্য বৈচিত্ৰ্যে দীপ্ত সেই দিৱ্য ধামত এক নহয়, বহু পূজ্য সত্তা বাস কৰে। আৰু জম্বুদ্বীপত সহস্ৰ বছৰৰ পৰ্যন্ত বৰষুণ পৰি থাকিলেও যিমান কাল, সিমান কালেই সেই পূজ্য ব্যক্তি তাত অৱস্থান কৰে।
Verse 135
विप्रुषश्चैव यावन्त्यो निपतन्ति नभस्तलातू
ভীষ্ম ক’লে—আকাশমণ্ডলৰ পৰা যিমান অসংখ্য সূক্ষ্ম বিন্দু তললৈ পৰে…
Verse 136
मासोपवासी वर्षैस्तु दशभि: स्वर्गमुत्तमम्
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্যক্তি প্ৰতিমাহ উপবাস-ব্ৰত দহ বছৰ ধৰি নিৰন্তৰ পালন কৰে, সি উত্তম স্বৰ্গ লাভ কৰে।
Verse 137
मुनिर्दान्तो जितक्रोधो जितशिश्रोदर: सदा
ভীষ্মে ক’লে—মুনি দান্ত আৰু সদা সংযমী হ’ব লাগে; যিয়ে ক্ৰোধ জয় কৰিছে আৰু ইন্দ্ৰিয় আৰু উদৰৰ বেগ দমন কৰিছে।
Verse 138
जुद्वन्नग्नींक्ष नियत: संध्योपासनसेविता । बहुभिननियमैरेवं शुचिरश्षाति यो नर:
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্যক্তি নিয়মমতে অগ্নিত আহুতি দিয়ে সন্ধ্যোপাসনা কৰে, আৰু এইদৰে বহু নিয়ম পালন কৰি শুচি হৈ আহাৰ গ্ৰহণ কৰে—সি ধৰ্মপূৰ্বক পবিত্ৰ আহাৰ গ্ৰহণ কৰে।
Verse 139
अभ्रावकाशशीलक्ष् तस्य भानोरिव त्विष: । जो मनुष्य सदा मुनि, जितेन्द्रिय, क्रोधको जीतनेवाला, शिश्रव और उदरके वेगको सदा काबूमें रखनेवाला, नियमपूर्वक तीनों अग्नियोंमें आहुति देनेवाला और संध्योपासनामें तत्पर रहनेवाला है तथा जो पवित्र होकर इन पहले बताये हुए अनेक प्रकारके नियमोंके पालनपूर्वक भोजन करता है, वह आकाशके समान निर्मल होता है और उसकी कान्ति सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित होती है ।। दिवं गत्वा शरीरेण स्वेन राजन् यथामर:
ভীষ্মে ক’লে—তেনে মানুহৰ দীপ্তি সূৰ্যপ্ৰভাৰ দৰে হয় আৰু তাৰ স্বভাৱ আকাশৰ দৰে নিৰ্মল আৰু উন্মুক্ত হয়। যি ব্যক্তি সদা মুনিৰ দৰে জীৱন যাপন কৰে—জিতেন্দ্ৰিয়, ক্ৰোধজয়ী, কামবেগ আৰু উদৰৰ বেগ দমনকাৰী, নিয়মমতে তিনিও অগ্নিত আহুতি দানকাৰী আৰু সন্ধ্যোপাসনাত নিবিষ্ট—আৰু শুচি হৈ পূৰ্বোক্ত বহু নিয়ম পালন কৰি তবেই আহাৰ গ্ৰহণ কৰে; সি আকাশৰ দৰে নিষ্কলুষ হয় আৰু তাৰ জ্যোতি সূৰ্যপ্ৰভাৰ দৰে দীপ্ত হয়। হে ৰাজন, সি নিজৰ দেহসহ স্বৰ্গলৈ গৈ দেৱতুল্য হয়।
Verse 140
एष ते भरतश्रेष्ठ यज्ञानां विधिरुत्तम:,भरतमश्रेष्ठ! यह तुम्हें यज्ञोंका उत्तम विधान क्रमशः: विस्तारपूर्वक बताया गया है। इसमें उपवासके फलपर प्रकाश डाला गया है। कुन्तीनन्दन! दरिद्र मनुष्योंने इन उपवासात्मक व्रतोंका अनुष्ठान करके यज्ञोंका फल प्राप्त किया है
ভীষ্মে ক’লে—হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ, যজ্ঞসমূহৰ এই উত্তম বিধি তোমাক কোৱা হ’ল। ইয়াত উপবাসৰ ফলও প্ৰকাশিত; হে কুন্তীনন্দন, দৰিদ্ৰ লোকেও এই উপবাসাত্মক ব্ৰতসমূহ অনুষ্ঠান কৰি যজ্ঞফল লাভ কৰিছে।
Verse 141
व्याख्यातो ह्ानुपूर्व्येण उपवासफलात्मक: । दरिद्रेर्मनुजै: पार्थ प्राप्त यज्ञफलं यथा,भरतमश्रेष्ठ! यह तुम्हें यज्ञोंका उत्तम विधान क्रमशः: विस्तारपूर्वक बताया गया है। इसमें उपवासके फलपर प्रकाश डाला गया है। कुन्तीनन्दन! दरिद्र मनुष्योंने इन उपवासात्मक व्रतोंका अनुष्ठान करके यज्ञोंका फल प्राप्त किया है
ভীষ্ম ক’লে— হে পাৰ্থ! উপবাসৰ ফলক সাৰ কৰি থকা এই ধৰ্মবিধান মই ক্ৰমে ক্ৰমে ব্যাখ্যা কৰিলোঁ। যিদৰে যজ্ঞফল লাভ হয়, তেনেদৰে দৰিদ্ৰ মানুহেও এই উপবাস-আধাৰিত ব্ৰতসমূহ পালন কৰি যজ্ঞফলেই লাভ কৰিছে। হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! যজ্ঞসমূহৰ পৰম বিধান মই তোমাক পদে পদে বিস্তাৰে কৈছোঁ; তাত উপবাসজনিত পুণ্যো স্পষ্ট কৰি দিছোঁ। হে কুন্তীনন্দন! ধনহীন লোকেও এই উপবাস-ব্ৰত অনুশীলন কৰি যজ্ঞসমান ফল লাভ কৰে।
Verse 142
उपवासानिमान् कृत्वा गच्छेच्च परमां गतिम् । देवद्विजातिपूजायां रतो भरतसत्तम,भरतश्रेष्ठ) देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजामें तत्पर रहकर जो इन उपवासोंका पालन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है
ভীষ্ম ক’লে— হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! যি এই উপবাসসমূহ পালন কৰে আৰু দেৱতা আৰু দ্বিজ (ব্ৰাহ্মণ) পূজাত ৰত থাকে, সি পৰম গতি লাভ কৰে।
Verse 143
उपवासविधिवस्त्वेष विस्तरेण प्रकीर्तित: । नियतेष्वप्रमत्तेषु शौचवत्सु महात्मसु,भारत! नियमशील, सावधान, शौचाचारसे सम्पन्न, महामनस्वी, दम्भ और द्रोहसे रहित, विशुद्ध बुद्धि, अचल और स्थिर स्वभाववाले मनुष्योंके लिये मैंने यह उपवासकी विधि विस्तारपूर्वक बतायी है। इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये
ভীষ্ম ক’লে— হে ভাৰত! উপবাসৰ এই বিধি আৰু প্ৰক্ৰিয়া মই বিস্তাৰে বৰ্ণনা কৰিলোঁ। ই নিয়মশীল, সতৰ্ক আৰু শুচিতাত নিবিষ্ট মহাত্মাসকলৰ বাবে। সেয়ে এই উপদেশ সম্পৰ্কে তোমাৰ সন্দেহ কৰা উচিত নহয়।
Verse 144
दम्भद्रोहनिवृत्तेषु कृतबुद्धिषु भारत । अचलेष्वप्रकम्पेषु मा ते भूदत्र संशय:,भारत! नियमशील, सावधान, शौचाचारसे सम्पन्न, महामनस्वी, दम्भ और द्रोहसे रहित, विशुद्ध बुद्धि, अचल और स्थिर स्वभाववाले मनुष्योंके लिये मैंने यह उपवासकी विधि विस्तारपूर्वक बतायी है। इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये
ভীষ্ম ক’লে— হে ভাৰত! যিসকলে দম্ভ আৰু দ্ৰোহ ত্যাগ কৰিছে, যিসকলৰ বুদ্ধি শুদ্ধ আৰু দৃঢ়নিশ্চয়, যিসকল অচল আৰু অকম্প স্বভাৱৰ—তেওঁলোকৰ বিষয়ে এই কথাত তোমাৰ কোনো সন্দেহ নাথাকক।
Verse 216
देवराजस्य च क्रीडां नित्यकालमतवेक्षते । उस मनुष्यको देवकन्याओंसे आरूढ़ विमान उपलब्ध होता है और वह पूर्वसागरके तटपर इन्द्रलोकमें निवास करता है तथा वहाँ रहकर वह प्रतिदिन देवराजकी क्रीडाओंको देखा करता है
সেই মানুহে নিত্যকাল দেৱৰাজ ইন্দ্ৰৰ ক্ৰীড়া আৰু দিব্য বিনোদন দৰ্শন কৰি থাকে। তেনে ব্যক্তিয়ে দেৱকন্যাসকলৰ দ্বাৰা পৰিবৃত এক বিমান লাভ কৰে; সি পূৰ্বসাগৰৰ তীৰত ইন্দ্ৰলোকে বাস কৰে আৰু তাত থাকি প্ৰতিদিন দেৱৰাজৰ দিব্য ক্ৰীড়া দৰ্শন কৰে।
Verse 236
अनसूयुरपापस्थो द्वादशाहफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर पाँचवें दिन एक समय भोजन करता है और लोभहीन, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त, अहिंसक और अदोषदर्शी होकर सदा पापकमोंसे दूर रहता है, उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है
ভীষ্মে কয়—যি ঈৰ্ষাহীন, পাপশূন্য আচাৰত দৃঢ়, বাৰ মাহ প্ৰতিদিন অগ্নিহোত্ৰ কৰে, প্ৰতি পঞ্চম দিন একবাৰ আহাৰ কৰে, লোভহীন, সত্যবাদী, ব্ৰাহ্মণভক্ত, অহিংসক আৰু দোষ নেদেখা স্বভাৱৰ হৈ সদায় পাপকর্মৰ পৰা দূৰত থাকে—সেইজন দ্বাদশাহ যজ্ঞৰ ফল লাভ কৰে।
Verse 273
गवां मेधस्य यज्ञस्य फल प्राप्नोत्यनुत्तमम् । जो बारह महीनेतक सदा अन्निहोत्र करता, तीनों संध्याओंके समय स्नान करता, ब्रह्मचर्यका पालन करता, दूसरोंके दोष नहीं देखता तथा मुनिवृत्तिसे रहकर प्रति छठे दिन एक बार भोजन करता है, वह गोमेध यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है
যি বাৰ মাহ নিত্য অগ্নিহোত্ৰ কৰে, তিনিওটা সন্ধ্যাত স্নান কৰে, ব্ৰহ্মচৰ্য পালন কৰে, আনৰ দোষ নেদেখে, মুনিবৃত্তিত থাকে আৰু প্ৰতি ষষ্ঠ দিন একবাৰ আহাৰ কৰে—সেইজন গোমেধ যজ্ঞৰ সৰ্বোত্তম ফল লাভ কৰে।
Verse 313
लोम्नां प्रमाणेन सम॑ ब्रह्मलोके महीयते । वह मनुष्य दो पताका (महापद्मा), अठारह पद्मा, एक हजार तीन सौ करोड़ और पचास अयुत वर्षोतक तथा सौ रीछोंके चमड़ोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है
ভীষ্মে কয়—সেইজন লোমৰ সংখ্যাৰ পৰিমাপ অনুসাৰে ব্ৰহ্মলোকে সন্মানিত হয়; অৰ্থাৎ নিৰ্দিষ্ট চর্মসমূহত যিমান লোম আছে, সিমান বছৰ ব্ৰহ্মলোকে পূজিত থাকে।
Verse 353
संख्यामतिगुणां चापि तेषु लोकेषु मोदते । उन सभी स्थानोंमें सफलमनोरथ होकर वह देवकन्याओंद्वारा पूजित होता है तथा जिस यज्ञमें बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा दी जाती है, उसके फलको वह प्राप्त कर लेता है और असंख्य वर्षोतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है
ভীষ্মে কয়—সেইজন সেই লোকসমূহত গণনাতকৈও অধিক পৰিমাণে আনন্দ ভোগ কৰে। তাৰ সকলো মনোৰথ সিদ্ধ হয়; দেবকন্যাসকলে তাক পূজা কৰে। যি যজ্ঞত প্ৰচুৰ স্বৰ্ণ দক্ষিণা দিয়া হয়, তাৰ ফলও সি লাভ কৰে আৰু অসংখ্য বছৰ সেই লোকসমূহত সুখ ভোগ কৰে।
Verse 383
वयोरूपविलासिन्यो लभते नात्र संशय: । वह कमलके समान वर्णवाले विमानपर चढ़ता है और वहाँ उसे श्यामवर्णा, सुवर्णसदश गौर वर्णवाली, सोलह वर्षकी-सी अवस्थावाली और नूतन यौवन तथा मनोहर रूप- विलाससे सुशोभित देवांगनाएँ प्राप्त होती हैं। इसमें संशय नहीं है
ভীষ্মে কয়—সেইজন পদ্মবৰ্ণ বিমানে আৰোহণ কৰে আৰু তাত শ্যামবৰ্ণা, স্বৰ্ণসদৃশ গৌৰবৰ্ণা, ষোলো বছৰৰ ন্যায় বয়সধাৰিণী, নবযৌবন আৰু মনোহৰ ৰূপ-লাস্যে শোভিত দেবাঙ্গনাসকলক লাভ কৰে; ইয়াত কোনো সন্দেহ নাই।
Verse 523
रुद्राणां तमधीवासं दिवि दिव्यं मनोहरम् । वह अपने पास ब्रह्माजीका भेजा हुआ विमान स्वतः उपस्थित देखता है। सुवर्णके समान रंगवाली रूपवती कुमारियाँ उसे उस विमानद्वारा झुलोकमें दिव्य मनोहर रुद्रलोकमें ले जाती हैं
তেওঁ স্বৰ্গত ৰুদ্ৰসকলৰ সেই দিব্য, মনোহৰ আবাস দৰ্শন কৰে। তেতিয়া ব্ৰহ্মাই প্ৰেৰণ কৰা বিমানখন স্বয়ং তেওঁৰ কাষতে উপস্থিত হয়। সোণালী বৰ্ণৰ ৰূপৱতী কুমাৰীসকলে তেওঁক সেই বিমানেৰে স্বৰ্গৰ দীপ্তিময়, দিব্য আৰু মনোৰম ৰুদ্ৰলোকলৈ লৈ যায়।
Verse 556
सदा द्वादशमासान् वै सर्वमेधफलं लभेत् | जो बारह महीनोंतक प्रति बारहवें दिन केवल हविष्यान्न ग्रहण करता है, उसे सर्वमेध यज्ञका फल मिलता है
যি ব্যক্তি বাৰো মাহ ধৰি নিয়ম কৰি প্ৰতি দ্বাদশী দিনত কেৱল হবিশ্যান্ন গ্ৰহণ কৰে, তেওঁ সৰ্বমেধ যজ্ঞৰ সমান পুণ্যফল লাভ কৰে।
Verse 559
उसके लिये बारह सूर्योके समान तेजस्वी विमान प्रस्तुत किया जाता है। बहुमूल्यमणि, मुक्ता और मूँगे उस विमानकी शोभा बढ़ाते हैं। हंसश्रेणीसे परिवेष्टित और नागवीथीसे परिव्याप्त वह विमान कलरव करते हुए मोरों और चक्रवाकोंसे सुशोभित तथा ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित है। उसके भीतर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनी हुई हैं। राजन! वह नित्य- निवासस्थान अनेक नर-नारियोंसे भरा हुआ होता है। यह बात महाभाग धर्मज्ञ ऋषि अंगिराने कही थी
তেনে ব্যক্তিৰ বাবে বাৰো সূৰ্যৰ সমান দীপ্তিময় এক দিব্য বিমান সাজু কৰা হয়। অমূল্য মণি, মুক্তা আৰু প্ৰৱাল তাৰ শোভা বৃদ্ধি কৰে। হাঁসৰ শ্ৰেণীৰে পৰিবেষ্টিত আৰু ‘নাগবীথি’ৰে ব্যাপ্ত সেই বিমান কলৰৱ কৰি ময়ূৰ আৰু চক্ৰৱাক পখীৰে সুশোভিত হৈ ব্ৰহ্মলোকত প্ৰতিষ্ঠিত থাকে। তাৰ ভিতৰত ডাঙৰ ডাঙৰ অট্টালিকা নিৰ্মিত থাকে। হে ৰাজন! সেই নিত্য নিবাসস্থান বহু নৰ-নাৰীৰে পৰিপূৰ্ণ। এই কথা মহাভাগ, ধৰ্মজ্ঞানী ঋষি অঙ্গিৰাই কৈছিল।
Verse 773
आवर्तनानि चत्वारि साधयेच्चाप्यसौ नर: । वह पुरुष सौ पद्म वर्षोके समान दस महाकल्प तथा चार चतुर्युगीतक अपने पुण्यका फल भोगता है
যি পুৰুষে চাৰিটা আৱৰ্তন সফলভাৱে সম্পন্ন কৰে, তেওঁ নিজৰ পুণ্যফল অতি দীঘলীয়া কাল ভোগ কৰে—শত পদ্ম-বৰ্ষ, দহ মহাকল্প আৰু চাৰ চতুৰ্যুগৰ সমান।
Verse 813
द्वात्रिंशद् रूपधारिण्यो मधुरा: समलंकृता: । वह पुरुष भूलोक, भुवर्लोक तथा विश्वरूपधारी देवर्षिका वहाँ दर्शन करता है और देवाधिदेवकी कुमारियाँ उसका मनोरंजन करती हैं। उनकी संख्या बत्तीस है। वे मनोहर रूपधारिणी, मधुरभाषिणी तथा दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत होती हैं
তেওঁ তাত ভূলোকে, ভুৱৰ্লোকে আৰু বিশ্বৰূপধাৰী দেৱৰ্ষিক দৰ্শন কৰে; আৰু দেৱাধিদেৱৰ কুমাৰীসকলে তেওঁক আনন্দিত কৰে। তেওঁলোকৰ সংখ্যা বত্রিশ। তেওঁলোক মনোহৰ ৰূপধাৰিণী, মধুৰভাষিণী আৰু দিব্য অলংকাৰৰে অলংকৃত।
Verse 823
तावच्चरत्यसौ धीर: सुधामृतरसाशन: । प्रभो! जबतक आकाशकमें चन्द्रमा और सूर्य विचरते हैं, तबतक वह धीर पुरुष सुधा एवं अमृतरसका भोजन करता हुआ ब्रह्मलोकमें विहार करता है
যেতিয়ালৈকে আকাশত চন্দ্ৰ আৰু সূৰ্য বিচৰণ কৰে, তেতিয়ালৈকে সেই ধীৰ পুৰুষ—সুধা আৰু অমৃতৰসৰ আস্বাদে পুষ্ট—ব্ৰহ্মলোকত বিচৰণ কৰে।
Verse 833
सदा द्वादशमासान् वै सप्तलोकान् स पश्यति । जो लगातार बारह महीनोंतक प्रति अठारहवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है
যি ব্যক্তি একেৰাহে বাৰো মাহ ধৰি প্ৰতি আঠাৰোতম দিনত মাত্ৰ এবাৰ আহাৰ গ্ৰহণ কৰে, সি ভূ আদি সাত লোকৰ দৰ্শন লাভ কৰে।
Verse 856
विमानमुत्तमं दिव्यं सुसुखी हाधिरोहति । उसके सामने व्याप्र और सिंहोंसे जुता हुआ तथा मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाला दिव्य एवं उत्तम विमान प्रस्तुत होता है, जिसपर वह अत्यन्त सुखपूर्वक आरोहण करता है
তাৰ সন্মুখত বাঘ আৰু সিংহে জোঁতা, মেঘগর্জনৰ দৰে গম্ভীৰ নিনাদ কৰা দিব্য আৰু উত্তম বিমান প্ৰকট হয়; আৰু সি পৰম সুখে তাত আৰোহণ কৰে।
Verse 863
सुधारयं च भुज्जीत अमृतोपममुत्तमम् । उस दिव्य लोकमें वह एक हजार कल्पोंतक देवकन्याओंके साथ आनन्द भोगता और अमृतके समान उत्तम सुधारसका पान करता है
সেই দিব্য লোকত সি অমৃতসম উত্তম সুধাৰস পান কৰে আৰু দেৱকন্যাসকলৰ সৈতে সহস্ৰ কল্পলৈকে আনন্দ ভোগ কৰে।
Verse 883
गन्धर्वैरुपगीतं च विमान सूर्यवर्चसम् । उसे अप्सराओंद्वारा सेवित उत्तम स्थान--गन्धर्वोंके गीतोंसे गूँजता हुआ सूर्यके समान तेजस्वी विमान प्राप्त होता है
সি সূৰ্যৰ দৰে দীপ্তিমান এক বিমান লাভ কৰে—গন্ধৰ্বসকলৰ গীতে মুখৰিত, অপ্সৰাসকলৰ সেৱাৰে শোভিত—আৰু সেই উত্তম স্থানত উপনীত হয়।
Verse 896
दिव्याम्बरधर: श्रीमानयुतानां शतं शतम् । उस विमानमें वह सुन्दरी देवांगगाओंके साथ आनन्द भोगता है। उसे कोई चिन्ता तथा रोग नहीं सताते। दिव्यवस्त्रधारी और श्रीसम्पन्न रूप धारण करके वह दस करोड़ वर्षोतक वहाँ निवास करता है
দিব্য বস্ত্ৰ পৰিধান কৰি, শ্ৰীসমৃদ্ধ হৈ সি তাত দেৱাঙ্গনাসকলৰ সৈতে স্বৰ্গীয় আনন্দ ভোগ কৰে। তাক ন চিন্তা স্পৰ্শ কৰে, ন ৰোগ। এইদৰে সি দহ কোটি বছৰলৈ তাত বাস কৰে।
Verse 913
स लोकान् विपुलान् रम्यानादित्यानामुपाश्षुते । जो लगातार बारह महीनेतक पूरे बीस दिनपर एक बार भोजन करता, सत्य बोलता, व्रतका पालन करता, मांस नहीं खाता, ब्रह्मचर्यका पालन करता तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहता है, वह सूर्यदेवके विशाल एवं रमणीय लोकोंमें जाता है
সি আদিত্যসকলৰ—সূৰ্যদেৱৰ গণৰ—বিশাল আৰু মনোৰম লোকসমূহ লাভ কৰে। যি বাৰ মাহ ধৰি নিৰন্তৰভাৱে প্ৰতি বিশ দিনত এবাৰহে আহাৰ কৰে, সত্য কথা কয়, ব্ৰত পালন কৰে, মাংস ত্যাগ কৰে, ব্ৰহ্মচৰ্য ৰক্ষা কৰে আৰু সকলো প্ৰাণীৰ হিতত ৰত থাকে—সি সূৰ্যদেৱৰ বিস্তৃত আৰু সুন্দৰ লোকসমূহলৈ গমন কৰে।
Verse 926
विमानै: काज्चनै्ईट्यै: पृष्ठतश्नानुगम्यते । उसके पीछे-पीछे दिव्यमाला और अनुलेपन धारण करनेवाले गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे सेवित सोनेके मनोरम विमान चलते हैं
তাৰ পিছফালে পিছফালে শুভ আৰু দীপ্তিমান সোণৰ মনোৰম বিমান চলি থাকে; দিব্য মালা আৰু সুগন্ধি অনুলেপন ধাৰণ কৰা গন্ধৰ্ব আৰু অপ্সৰাসকলৰ দলে সিহঁতক সেবা কৰে।
Verse 953
सेव्यमानो वरस्त्रीभि: क्रीडत्यमरवत् प्रभु: । जो लगातार बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ इक्कीसवें दिनपर एक बार भोजन करता है, वह शुक्राचार्य तथा इन्द्रके दिव्यलोकमें जाता है। इतना ही नहीं, उसे अश्विनीकुमारों और मरुद्गणोंके लोकोंकी भी प्राप्ति होती है। उन लोकोंमें वह सदा सुख भोगनेमें ही तत्पर रहता है। दुःखोंका तो वह नाम भी नहीं जानता है और श्रेष्ठ विमानपर विराजमान हो सुन्दरी स्त्रियोंसे सेवित होता हुआ शक्तिशाली देवताके समान क्रीड़ा करता है
শ্ৰেষ্ঠ নাৰীৰ সেবাত পৰিবৃত হৈ সি অমৰৰ দৰে ক্ৰীড়া কৰে। যি বাৰ মাহ ধৰি নিৰন্তৰভাৱে প্ৰতিদিন অগ্নিহোত্ৰ সম্পাদন কৰে আৰু একুশতম দিনত এবাৰহে আহাৰ কৰে, সি শুক্ৰাচাৰ্য আৰু ইন্দ্ৰৰ দিব্য লোক লাভ কৰে; তদুপৰি অশ্বিনীকুমাৰ আৰু মৰুদ্গণৰ লোকসমূহো প্ৰাপ্ত হয়। সেই লোকসমূহত সি সদায় সুখভোগত ৰত থাকে; দুঃখৰ নামো সি নাজানে। শ্ৰেষ্ঠ বিমানে অধিষ্ঠিত হৈ, সুন্দৰী নাৰীৰ দ্বাৰা সেবিত, সি পৰাক্ৰমী দেৱতাৰ দৰে ক্ৰীড়া কৰে।
Verse 1013
रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषित: । वहाँ अनेक गुणोंसे युक्त श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो इच्छानुसार विचरता, जहाँ इच्छा होती वहाँ जाता और अप्सराओंद्वारा पूजित होता है। उन लोकोंमें वह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है
দিব্য অলংকাৰৰে ভূষিত হৈ সি দেৱকন্যাসকলৰ সৈতে ৰমণ কৰে। তাত বহু গুণে সমৃদ্ধ হৈ শ্ৰেষ্ঠ বিমানে আৰোহণ কৰি সি ইচ্ছামতে বিচৰণ কৰে—য’ত ইচ্ছা ত’ত যায়—আৰু অপ্সৰাসকলৰ দ্বাৰা পূজিত হয়।
Verse 1053
सदा द्वादशमासांस्तु पुष्कलं यानमारुहेत् । जो लगातार बारह महीनोंतक पचीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसको सवारीके लिये बहुत-से विमान या वाहन प्राप्त होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্যক্তি পূৰ্ণ বাৰ মাহ ধৰি প্ৰতিমাহৰ পঁচিশতম দিনত মাত্ৰ এবাৰ আহাৰ কৰি নিয়ম পালন কৰে, তাৰ যাত্ৰাৰ বাবে বহু বিমান আৰু নানা বাহন লাভ হয়।
Verse 1083
सुधारसं चोपजीवन्नमृतोपममुत्तमम् | वह दिव्य, उत्तम एवं मनोहर विमानपर विराजमान हो सैकड़ों सुन्दरियोंसे भरे हुए महलमें सहस्र कल्पोंतक निवास करता है। वहाँ देवताओंके भोज्य अमृतके समान उत्तम सुधारसको पीकर वह जीवन बिताता है
ভীষ্মে ক’লে—অমৃতসম উত্তম সুধাৰসৰ দ্বাৰা জীৱন ধাৰণ কৰি সি দিব্য, শ্ৰেষ্ঠ আৰু মনোহৰ বিমানে অধিষ্ঠিত হয়; শত শত সুন্দৰীৰে পৰিপূৰ্ণ প্ৰাসাদত সহস্ৰ কল্পলৈকে বাস কৰে। তাত দেৱভোজ্য, অমৃতোপম পৰম সুধাৰস পান কৰি সি জীৱন যাপন কৰে।
Verse 1126
द्वे युगानां सहस्रे तु दिव्ये दिव्येन तेजसा । सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत स्फटिक मणिमय दिव्य विमानोंसे सम्पन्न हो गन्धर्वों और अप्सराओंद्वारा पूजित होता हुआ दिव्य तेजसे युक्त हो देवताओंके दो हजार दिव्य युगोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है
ভীষ্মে ক’লে—দিব্য তেজে দীপ্ত, স্ফটিক-মণিময় আৰু সম্পূৰ্ণ ৰত্নে অলংকৃত দিব্য বিমানে সমৃদ্ধ, গন্ধৰ্ব আৰু অপ্সৰাসকলৰ দ্বাৰা পূজিত, দিৱ্য প্ৰভাযুক্ত হৈ সি সেই লোকসমূহত দেৱতাসকলৰ দুহাজাৰ দিব্য যুগলৈকে আনন্দ ভোগ কৰে।
Verse 1203
सर्वकामगमे दिव्ये कल्पायुतशतं समा: । वह भोगसे सम्पन्न हो अपने तेजसे निर्मल सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है और सुन्दर कान्तिवाली, पीन उरोज, जाँच और जघन प्रदेशवाली, दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुकुमारी रमणियाँ सूर्यके समान प्रकाशित और सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले मनोरम दिव्य विमानपर बैठकर उस पुण्यात्मा पुरुषका दस लाख कल्पोंके वर्षोतक मनोरंजन करती हैं
ভীষ্মে ক’লে—সৰ্ব কামনা পূৰণকাৰী সেই মনোহৰ দিব্য বিমানে সেই পুণ্যাত্মা পুৰুষ ভোগসম্পন্ন হৈ নিজৰ তেজে নিৰ্মল সূৰ্যৰ দৰে প্ৰকাশিত হয়। দিব্য বস্ত্ৰ-আভৰণে বিভূষিতা, সূৰ্যসম প্ৰভাময় সুকুমাৰী দেৱাঙ্গনাসকলে সেই বিমানে আসীন হৈ লক্ষ লক্ষ কল্পবছৰলৈকে তাক ৰমায়।
Verse 1246
मनो5भिरामा मधुरा रमयन्ति मदोत्कटा: । उस विमानमें अप्सराएँ भरी रहती हैं, गन्धर्वोके गीतोंकी मधुर ध्वनिसे वह विमान गूँजता रहता है। उस विमानमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित, शुभ लक्षणसम्पन्न, मनोभिराम, मदमत्त एवं मधुरभाषिणी रमणियाँ उस पुरुषका मनोरंजन करती हैं
ভীষ্মে ক’লে—সেই বিমানে অপ্সৰাসকল ভৰি থাকে, আৰু গন্ধৰ্বসকলৰ গীতৰ মধুৰ ধ্বনিয়ে সি সদায় গুঞ্জৰিত হয়। তাত দিব্য আভৰণে বিভূষিতা, শুভ লক্ষণসম্পন্ন, মনোহৰ, আনন্দে মদমত্ত আৰু মধুৰভাষিণী ৰমণীসকলে সেই পুৰুষক ৰমায়।
Verse 1263
रुद्राणां च तथा लोकं ब्रह्मलोक॑ च गच्छति । वह पुरुष भोगसम्पन्न, तेजस्वी, अग्निके समान दीप्तिमानू, अपने दिव्य शरीरसे देवताकी भाँति प्रकाशमान तथा दिव्यभावसे युक्त हो वसुओं, मरुद्गणों, साध्यगणों, अश्विनीकुमारों, रुद्रों तथा ब्रह्माजीके लोकमें भी जाता है
এনেকুৱা পুৰুষে ৰুদ্ৰসকলৰ লোক আৰু ব্ৰহ্মলোকো লাভ কৰে। ভোগ-সমৃদ্ধিত সমৃদ্ধ, তেজস্বী, অগ্নিৰ দৰে দীপ্তিমান, দিব্য দেহে দেৱতাৰ দৰে প্ৰকাশমান আৰু দিব্যভাবযুক্ত হৈ সি বসুসকল, মৰুদ্গণ, সাধ্যগণ, অশ্বিনী-কুমাৰ, ৰুদ্ৰসকল আৰু ব্ৰহ্মাৰ লোকলৈও গমন কৰে।
Verse 1276
सदा द्वादशमासान् वै ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् । जो बारह महीनोंतक प्रत्येक मास व्यतीत होनेपर तीसवें दिन एक बार भोजन करता और सदा शान्तभावसे रहता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है
যি ব্যক্তি বাৰো মাহ ধৰি প্ৰতিমাহৰ ত্ৰিশতম দিনত একবাৰ মাত্ৰ আহাৰ গ্ৰহণ কৰে আৰু সদায় শান্তভাব বজাই ৰাখে, সি ব্ৰহ্মলোক লাভ কৰে।
Verse 1283
तेजसा वपुषा लक्ष्म्या भ्राजते रश्मिवानिव । वह वहाँ सुधारसका भोजन करता और सबके मनको हर लेनेवाला कान्तिमान् रूप धारण करता है। वह अपने तेज, सुन्दर शरीर तथा अंगकान्तिसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है
সি তাত সুধাৰস আহাৰ কৰে আৰু সকলোৰে মন হৰণ কৰা কান্তিময় ৰূপ ধাৰণ কৰে। নিজৰ তেজ, সুন্দৰ দেহ আৰু অঙ্গকান্তিৰে সি ৰশ্মিযুক্ত সূৰ্যৰ দৰে দীপ্ত হয়।
Verse 1313
नानामधुरभाषाभिनानारतिभिरेव च | वह विमानपर आरूढ़ हो अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारियोंद्वारा सम्मानित होता है। रुद्रों तथा देवर्षियोंकी कन्याएँ सदा उसकी पूजा करती हैं। वे कन्याएँ नाना प्रकारके रमणीय रूप, विभिन्न प्रकारके राग, भाँति-भाँतिकी मधुर भाषणकला तथा अनेक तरहकी रति-क्रीड़ाओंसे सुशोभित होती हैं
সি বিমানে আৰূঢ় হৈ, নিজৰেই প্ৰভাৰে দীপ্তিমান দিব্য নাৰীৰ দ্বাৰা সন্মানিত হয়। ৰুদ্ৰসকল আৰু দেৱৰ্ষিসকলৰ কন্যাসকলে সদায় তাৰ পূজা কৰে। নানাবিধ মনোহৰ ৰূপ, বিভিন্ন ৰাগ, ভিন্ন-ভিন্ন মধুৰ বাক্শৈলী আৰু বহু প্ৰকাৰ ৰতি-ক্ৰীড়াৰে শোভিত সেই কন্যাসকলে তাৰ পৰিচৰ্যা কৰে।
Verse 1346
तावत् संवत्सरा: प्रोक्ता ब्रह्मलोकेडस्यथ धीमत: । मेघ जम्बूद्वीपमें जितने जलबिन्दुओंकी वर्षा करता है, उतने हजार वर्षोतक उस बुद्धिमान् पुरुषका ब्रह्मलोकमें निवास बताया गया है
জম্বূদ্বীপত মেঘে যিমান জলবিন্দু বৰষায়, সিমান সহস্ৰ বছৰলৈ সেই ধীমান পুৰুষৰ ব্ৰহ্মলোকত বাস বুলি কোৱা হৈছে।
Verse 1353
वर्षासु वर्षतस्तावन्निवसत्यमरप्रभ: । वर्षा-ऋतुमें आकाशसे धरतीपर जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने वर्षोतक वह देवोपम तेजस्वी पुरुष ब्रह्मलोकमें निवास करता है
ভীষ্মে ক’লে—বৰ্ষাঋতুত যিমান সময় বৰষুণ পৰি থাকে, সিমানেই—অৰ্থাৎ আকাশৰ পৰা পৃথিৱীত যিমান বৰষুণৰ বিন্দু পৰে, সিমান বছৰৰ সমান কাল—সেই দেৱসম দীপ্তিমান পুৰুষ ব্ৰহ্মলোকত বাস কৰে।
Verse 1366
महर्षित्वमथासाद्य सशरीरगतिर्भवेत् । दस वर्षोतक एक-एक मास उपवास करके एकतीसवें दिन भोजन करनेवाला पुरुष उत्तम स्वर्ग लोकको जाता है। वह महर्षि पदको प्राप्त होकर सशरीर दिव्यलोककी यात्रा करता है
ভীষ্মে ক’লে—মহর্ষিপদ লাভ কৰিলে সি দেহসহ দিৱ্যলোকগতি পায়। যি পুৰুষে দহ বছৰ ধৰি প্ৰতিমাহ উপবাস কৰি একত্রিশতম দিনত মাত্ৰ আহাৰ গ্ৰহণ কৰে, সি উত্তম স্বৰ্গলোকলৈ যায়; মহর্ষি হৈ দেহসহ দিৱ্যধামলৈ যাত্ৰা কৰে।
Verse 1393
स्वर्ग पुण्यं यथाकाममुपभुड्धक्ते तथाविध: । राजन! ऐसे गुणोंसे युक्त पुरुष देवताके समान अपने शरीरके साथ ही देवलोकमें जाकर वहाँ इच्छाके अनुसार स्वर्गके पुण्यफलका उपभोग करता है
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! এনেকুৱা গুণেৰে যুক্ত পুৰুষ দেৱতাৰ সমান হয়। সি দেহসহ দেৱলোকলৈ গৈ তাত নিজৰ ইচ্ছামতে স্বৰ্গৰ পুণ্যফল ভোগ কৰে।
Verse 8736
सदा द्वादशमासान् वै सप्तलोकान् स पश्यति । जो लगातार बारह महीनोंतक उन्नीसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भी भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है
ভীষ্মে ক’লে—সি সম্পূৰ্ণ বাৰ মাহ ধৰি সপ্তলোক দৰ্শন কৰে। যি পুৰুষে একেৰাহে বাৰ মাহ উনিশতম দিনত এবাৰ মাত্ৰ আহাৰ গ্ৰহণ কৰে, সিও ভূ-আদি সাত লোকৰ দৰ্শন লাভ কৰে।
Verse 11636
युगकल्पसहस्राणि त्रीण्यावसति वै सुखम् । वहाँ उसे अमृतका आहार प्राप्त होता है तथा वह तृष्णारहित हो वहाँ रहकर आनन्द भोगता है। राजन! वह दिव्यरूपधारी पुरुष राजर्षियोंद्वारा वर्णित देवर्षियोंके चरित्रका श्रवण-मनन करता है और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो मनोरम सुन्दरियोंके साथ मदोन्मत्तभावसे रमण करता हुआ तीन हजार युगों एवं कल्पोंतक वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है
ভীষ্মে ক’লে—সি তাত তিন হাজাৰ যুগ আৰু কল্প পৰ্যন্ত সুখে বাস কৰে। তাত সি অমৃতসম আহাৰ লাভ কৰে; তৃষ্ণা-আকাঙ্ক্ষাহীন হৈ আনন্দ ভোগ কৰে। হে ৰাজন! সেই দিৱ্যৰূপধাৰী পুৰুষে ৰাজর্ষিসকলে বৰ্ণনা কৰা দেবর্ষিসকলৰ চৰিত্ৰ শ্ৰৱণ-মনন কৰে; শ্ৰেষ্ঠ বিমানে আৰূঢ় হৈ মনোৰমা সুন্দৰীসকলৰ সৈতে মদোন্মত্ত ভাবত ক্ৰীড়া কৰি কৰি তাত তিন হাজাৰ যুগ-কল্প সুখে অৱস্থান কৰে।
Verse 12963
सुखेष्वभिरतो भोगी दुःखानामविजानक: । दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध और दिव्य अनुलेपन धारण करके वह भोगकी शक्ति और साधनसे सम्पन्न हो सुख-भोगमें ही रत रहता है। दुःखोंका उसे कभी अनुभव नहीं होता है
সুখত নিমগ্ন ভোগী দুখক নাজানে। দিব্য মালা, দিব্য বস্ত্ৰ, দিব্য সুগন্ধ আৰু দিব্য অনুলেপন ধাৰণ কৰি, ভোগৰ শক্তি আৰু উপায়েৰে সম্পন্ন হৈ, সি কেৱল সুখভোগতেই ৰত থাকে; দুখ তাৰ অনুভৱৰ ভিতৰলৈ কেতিয়াও নাহে।
The chapter evaluates what counts as ‘best’ in religious practice: whether purity is primarily achieved through external tīrtha-bathing or through internal ethical purification, and how to rank these without dismissing either.
True ‘snāna’ is the cleansing of mind and conduct—truth, compassion, restraint, and non-attachment—so that ritual acts become meaningful extensions of disciplined character rather than substitutes for it.
Yes: it asserts a results-framework in which success/purification arises from conjunction—inner purity with outer practice—illustrated by the analogy that strength without action, or action without strength, fails, while their union succeeds.