Mahabharata Adhyaya 69
Vana ParvaAdhyaya 6951 Verses

Adhyaya 69

ऋतुपर्णस्य विदर्भयात्रा-निश्चयः तथा बाहुकस्य हयपरिक्षा (Ṛtuparṇa’s resolve to go to Vidarbha and Bāhuka’s examination of horses)

Upa-parva: Nalopākhyāna (The Tale of Nala and Damayantī)

Bṛhadaśva narrates that after hearing Sudeva’s words, King Ṛtuparṇa addresses Bāhuka with conciliatory speech and expresses a desire to go to Vidarbha to attend Damayantī’s proclaimed svayaṃvara, asking if the journey can be completed in a single day. Nala, hearing this while in disguise, experiences acute inner rupture—oscillating between fear that Damayantī may act under grief and hope that a deliberate stratagem is underway for his sake. He reproaches himself for past wrongdoing and weighs assumptions about human instability, yet concludes he must go to ascertain what is true and beneficial, serving both Ṛtuparṇa’s purpose and his own. With folded hands, Bāhuka promises the king that Vidarbha will be reached within one day. He proceeds to the royal stables, inspects and selects horses, and withstands Ṛtuparṇa’s initial displeasure at the seemingly inadequate team. Bāhuka asserts their capability; Ṛtuparṇa defers to his expertise. Four well-bred, swift horses are yoked; the king mounts, and Nala skillfully manages the reins, urging the team to extraordinary speed. Observers—especially Vārṣṇeya—marvel at Bāhuka’s charioteering and horse-knowledge, speculating whether he resembles Mātali, Śālihotra, or even Nala himself, noting congruence in knowledge despite bodily alteration. Ṛtuparṇa, recognizing the display of strength, zeal, and technical mastery in horse-handling, feels heightened satisfaction as the journey commences.

Chapter Arc: दमयन्ती के वियोग-वृत्तान्त से व्याकुल ब्राह्मण पृथ्वी पर भटकते-भटकते विदर्भ-राज के द्वार पर पहुँचते हैं—और कहते हैं कि वे उसी के लिए खोज में निकले हैं। → ब्राह्मण नल के पतन का समाचार सुनाते हैं—द्यूत में पराजय, राज्य-हरण, और दमयन्ती के साथ अज्ञात दिशा में प्रस्थान; फिर दमयन्ती की पहचान उसके मलिन वेश के भीतर भी उजागर होती है, जैसे बादल हटने पर चन्द्रमा। घर-परिवार का स्नेह उसे रोकना चाहता है, पर उसका लक्ष्य एक ही है: नल का पता। → दमयन्ती लज्जा त्यागकर स्वयं स्पष्ट आदेश देती है कि राजसेवक और ब्राह्मण ‘पुण्यश्लोक’ नल की खोज में लगें—और उसके संदेश/वचन को नगर-नगर, ग्राम-ग्राम सुनाते फिरें, ताकि नल तक उसकी पुकार पहुँच सके। → विदर्भ-राज के संरक्षण में खोज-योजना बनती है; ब्राह्मण और दूत पुराने राष्ट्रों, ग्रामों, गोष्ठों और आश्रमों में दमयन्ती का वचन सुनाते हुए नल की तलाश में निकल पड़ते हैं। → संदेश तो दिशाओं में फैल गया—पर नल कहाँ है, किस रूप में है, और क्या वह उस पुकार को सुन पाएगा?

Shlokas

Verse 1

हि लय ० () हि 2 7 एकोनसप्ततितमो< ध्याय: दमयन्तीका अपने पिताके यहाँ जाना और वहाँसे नलको ढूँढनेके लिये अपना संदेश देकर ब्राह्मणोंको भेजना युदेव उवाच विदर्भराजो धर्मात्मा भीमो नाम महाद्युति: । सुतेयं तस्य कल्याणी दमयन्तीति विश्रुता

قال يوديفا: «في أرض فيداربها ملكٌ يُدعى بهيما، قائمٌ على الدَّرما، عظيمُ البهاء. وهذه السيدة المباركة هي ابنته، مشهورةٌ باسم دمايانتي».

Verse 2

राजा तु नैषधो नाम वीरसेनसुतो नलः । भार्येयं तस्य कल्याणी पुण्यश्लोकस्य धीमत:,वीरसेनपुत्र नल निषधदेशके सुप्रसिद्ध राजा हैं। उन्हीं (परम) बुद्धिमान पुण्यश्लोक नलकी यह कल्याणमयी पत्नी है

«وفي نِصَدَه ملكٌ يُدعى نَلا، وهو ابنُ فيراسينَ. وهذه السيدة المباركة هي زوجةُ ذلك النَّلا الحكيم، الذي قُدِّست شهرته بأعمال البرّ والعدل.»

Verse 3

स द्ूतेन जितो क्रात्रा हृतराज्यो महीपतिः । दमयन्त्या गतः सार्ध न प्राज्ञायत कस्यचित्‌

قال يودهيشثيرا: «إن ذلك الملك، وقد غُلِب في لعبة النرد على يد المقامر، سُلِب مُلكه. ثم مضى مع دمايانتي إلى الغابة، ومنذ ذلك اليوم لم يعرف أحدٌ موضعه.»

Verse 4

ते वयं दमयन्त्यर्थे चराम: पृथिवीमिमाम्‌ । सेयमासादिता बाला तव पुत्रनिवेशने,हम अनेक ब्राह्मण दमयन्तीको ढूँढ़नेके लिये इस पृथ्वीपर विचर रहे हैं। आज आपके पुत्रके महलमें मुझे यह राजकुमारी मिली है

«نحنُ جماعةٌ من البراهمة نطوفُ هذه الأرض طلبًا لدمايانتي. واليوم، في دارِ ابنِك، وجدتُ هذه الأميرة الفتية.»

Verse 5

अस्या रूपेण सदृशी मानुषी न हि विद्यते । अस्या होष भ्रुवोर्मध्ये सहज: पिप्लुरुत्तम:,रूपमें इसकी समानता करनेवाली कोई भी मानवकन्या नहीं है। इसके दोनों भौंहोंके बीच एक जन्मजात उत्तम तिलका चिह्न है

قال يودهيشثيرا: «ليس بين فتيات البشر من تُضاهيها جمالًا. وبين حاجبيها علامةٌ فاضلةٌ خِلْقية—كأنها تِيلَكَة—موضوعةٌ هناك منذ الميلاد.»

Verse 6

श्यामाया: पद्मसंकाशो लक्षितो<न्तर्हितो मया । मलेन संवृतो हास्याश्छन्नो 5 भ्रेणेव चन्द्रमा:

قال يودهيشثيرا: «لقد لاحظتُ في هذه الأميرة السمراء علامةً على جبينها تشبه زهرة اللوتس، غير أنها مستترة. وكما يُحجَب القمرُ بكتلةٍ من السحاب، كذلك غُطِّيَت تلك العلامة—المقدَّر لها أن تتلألأ—بالغبار والدَّرن».

Verse 7

चिह्नभूतो विभूत्यर्थमयं धात्रा विनिर्मित: । प्रतिपत्कलुषस्येन्दोलेंखा नातिविराजते

قال يودهيشثيرا: «هذه العلامة صاغها الخالق لتكون دليلاً على نعمةٍ وازدهارٍ قادمين. لكنها الآن لا تتلألأ كثيراً، كالهلال الباهت الملطَّخ في أول ليلة من الشهر. ومع ذلك، وإن كان الجسد متسخاً وخالياً من الزينة، فإن نوراً فطرياً قد يبقى ظاهراً؛ فالجمال لا يُمحى حقاً. وكما يُعرَف النارُ المستتر بحرارته، كذلك—وإن كانت دمايانتي مغطّاة بالدَّرن—فقد عرفتُها بهذه العلامة على جبينها».

Verse 8

न चास्या नश्यते रूप॑ वपुर्मलसमाचितम्‌ । असंस्कृतमभिव्यक्त भाति काञ्चनसंनिभम्‌

قال يودهيشثيرا: «لم تفنَ جمالُها، وإن كان جسدُها مغطّى بالدَّرن. فحتى من غير تهيئةٍ ولا تجمّل، يسطع قوامُها واضحاً كأنه ذهب. وإن بدت في الظاهر متسخةً ومبتلاة، فإن نورها الفطري باقٍ لا ينكسر—فالفضيلة والحقيقة لا يمحوهما سوء الطالع، بل تتجليان حتى في غمرة الإهمال والشدة».

Verse 9

अनेन वपुषा बाला पिप्लुनानेन सूचिता । लक्षितेयं मया देवी निभृतो5ग्निरिवोष्मणा

قال يودهيشثيرا: «بهذا الجسد نفسه—وإن كان متسخاً وواهناً—انكشفت هذه الفتاة. لقد عرفتُ السيدة النبيلة، كما تُعرَف النارُ المستترة بحرارتها».

Verse 10

तच्छुत्वा वचन तस्य सुदेवस्य विशाम्पते | सुनन्दा शोधयामास पिप्लुप्रच्छादनं मलम्‌,युधिष्ठिर! सुदेवका यह वचन सुनकर सुनन्दाने दमयन्तीके ललाटवर्ती चिह्नको ढँकनेवाली मैल धो दी

يا سيدَ الناس، لما سمعت سونندا كلامَ سوديفا شرعت تُزيل الدَّرن الذي كان يستر العلامة على الجبين، لكيلا تبقى الهوية الحقة والكرامة مصونةً في الخفاء.

Verse 11

स मलेनापकृष्टेन पिप्लुस्तस्या व्यरोचत । दमयन्त्या यथा व्यभ्रे नभसीव निशाकर:,मैल धुल जानेपर उसके ललाटका वह चिह्न उसी प्रकार चमक उठा, जैसे बादलरहित आकाशकमें चन्द्रमा प्रकाशित होता है

فلما مُسِحَتِ الأوساخُ عنها، أشرقَتِ العلامةُ على جبينها جليّةً—كالقمرِ يلمعُ في سماءٍ صافيةٍ لا سحابَ فيها.

Verse 12

पिप्लुं दृष्टवा सुनन्दा च राजमाता च भारत । रुदत्यौ तां परिष्वज्य मुहूर्तमिव तस्थतु:,भारत! उस चिह्नको देखकर सुनन्दा और राजमाता दोनों रोने लगीं और दमयन्तीको हृदयसे लगाये दो घड़ीतक स्तब्ध खड़ी रहीं

يا بهاراتا! لما رأت سونندا وأمُّ الملك تلك العلامةَ غمرهما الحزنُ وبكتا؛ فاحتضنتا دماينتي ووقفتا ساكنتين هنيهةً بدت كأنها دهرٌ.

Verse 13

उत्सृज्य बाष्पं शनकै राजमातेदमब्रवीत्‌ । भगिन्या दुहिता मे5सि पिप्लुनानेन सूचिता

ثم مسحت أمُّ الملك دموعَها وقالت برفق: «يا ابنتي، أنتِ ابنةُ أختي. بهذه العلامة انكشف أمركِ لي، فعرفتُكِ.»

Verse 14

अहं च तव माता च राज्ञस्तस्य महात्मन: । सुते दशार्णाधिपते: सुदाम्नश्नारुदर्शने,'सुन्दरी! मैं और तुम्हारी माता दोनों दशार्णदेशके स्वामी महामना राजा सुदामाकी पुत्रियाँ हैं

«أنا وأمُّكِ كذلك ابنتان لذلك الملكِ العظيمِ النفسِ سُدامَن، سيّدِ دَشارْنَة—يا حسناءَ الطلعة.»

Verse 15

भीमस्य राज्ञ: सा दत्ता वीरबाहोरहं पुनः । त्वं तु जाता मया दृष्टा दशार्णेषु पितुर्गहिे

«أُمُّكِ زُوِّجَتْ للملكِ بهيما، وأمّا أنا فزُوِّجْتُ لفيراباهو. وأنتِ—فقد وُلِدتِ في أرضِ الدَشارْنَة، في بيتِ أبي نفسه، وقد رأيتُ ذلك بعينيّ.»

Verse 16

यथैव ते पितुर्गेहं तथैव मम भामिनि । यथैव च ममैश्वर्य दमयन्ति तथा तव,'भामिनि! तुम्हारे लिये जैसा पिताका घर है, वैसा ही मेरा घर है। दमयन्ती! यह सारा ऐश्वर्य जैसे मेरा है, उसी प्रकार तुम्हारा भी है”

«يا حبيبتي—إن بيتي لكِ كما أن بيت أبيكِ لكِ. ويا دامايَنتي—إن هذا الثراء والسلطان، كما هو لي، فهو لكِ كذلك».

Verse 17

तां प्रहटेन मनसा दमयन्ती विशाम्पते । प्रणम्य मातुर्भगिनीमिदं वचनमब्रवीत्‌,युधिष्ठि!! तब दमयन्तीने प्रसन्न हृदयसे अपनी मौसीको प्रणाम करके कहा --

يا سيدَ الناس، إن دامايَنتي—وقد انشرح صدرُها—انحنت إجلالًا لخالةِ أمّها، ثم قالت هذه الكلمات.

Verse 18

अज्ञायमानापि सती सुखमस्म्युषिता त्वयि । सर्वकामै: सुविहिता रक्षयमाणा सदा त्वया

«يا أمّاه—وإن كنتِ لم تعرفي حقيقتي، فقد أقمتُ في داركِ في راحة. هيّأتِ لي كل ما أشتهي من أسباب العيش، وكنتِ على الدوام تحمينني.»

Verse 19

सुखात्‌ सुखतरो वासो भविष्यति न संशय: । चिरविप्रोषितां मातर्मामनुज्ञातुमहसि

«لو أقمتُ هنا لكان المقام أهنأ من الهناء نفسه—لا ريب. غير أنّي، يا أمّاه، قد طال ابتعادي وتيهُي في المنفى؛ فامنحيني الإذن بالذهاب إلى فيداربها.»

Verse 20

दारकौ च हि मे नीतौ वसतस्तत्र बालकौ । पित्रा विहीनौ शोकार्तो मया चैव कथं नु तौ

قال يودهيشثيرا: «نعم، لقد كنتُ قد أرسلتُ طفليَّ الصغيرين من قبل إلى كُندينابورا، وهما يقيمان هناك. لقد حُرما من أبيهما، وها هما الآن منفصلان عني أيضًا. فكيف لهذين الغلامين المكلومين بالحزن أن يعيشا في مثل هذه الحال؟»

Verse 21

यदि चापि प्रियं किंचिन्मयि कर्तुमिहेच्छसि । विदर्भान्‌ यातुमिच्छामि शीघ्रं मे यानमादिश

قالت: «يا أمّاه، إن كنتِ حقًّا تريدين أن تفعلي ما يُرضيني، فرتّبي لي في الحال وسيلةَ سفر. إنّي أرغب في الذهاب إلى فيداربها». وقد صيغ هذا الطلب في إطار النداء المؤدّب ضمن واجب القرابة: فهي تلتمس العون العاجل لا ترفًا، بل لغايةٍ شخصيةٍ مُلحّة، متّكلةً على مسؤولية الكبيرة في الحماية وحسن النيّة.

Verse 22

बाढमित्येव तामुक्त्वा हृष्टा मातृष्वसा नृप । गुप्तां बलेन महता पुत्रस्यानुमते तत:

قالت لها: «ليكن ذلك». أيها الملك، إن خالة دَمَيَنْتِي من جهة الأم فرِحت، ثم—بعد أن نالت موافقة ابنها—أرسلت السيدة الحسناء، فأجلستها في محفةٍ (هودج) ومنحتها حرسًا مسلّحًا عظيمًا لحمايتها. وبعد أن أُحكمت ترتيبات الزاد والشراب وسائر اللوازم، انطلقت دَمَيَنْتِي نحو فيداربها، مسنودةً بعناية الكبار وحسن التدبير في الأمن.

Verse 23

प्रास्थापयद्‌ राजमाता श्रीमतीं नरवाहिना । यानेन भरतश्रेष्ठ स्वन्नपानपरिच्छदाम्‌

قال يودهيشثيرا: إن الملكةَ الأم، ذاتَ اليسر والنعمة، أرسلتها في طريقها ومعها حشدٌ قويّ من الرجال حرسًا. يا خيرَ آلِ بهاراتا، بعثت بها في مركبة، وقد أُعدّت لها مؤونة الطعام والشراب وسائر العُدّة اللازمة إعدادًا تامًّا، لتضمن سلامتها وحسن رعايتها وهي تمضي في سفرها.

Verse 24

ततः सा न चिरादेव विदर्भानगमत्‌ पुनः । तां तु बन्धु जन: सर्व: प्रहष्ट समपूजयत्‌

ثم لم يلبث أن عادت إلى فيداربها. فلما وصلت، غمر الفرحُ جميعَ ذويها—والديها وسائر أقاربها—فاستقبلوها بما يليق من الإكرام والضيافة، مُثبتين واجبَ الأسرة وفق الدَّرما في حماية أهلها والترحيب بهم عند الشدائد.

Verse 25

सर्वान्‌ कुशलिनो दृष्टवा बान्धवान्‌ दारकौ च तौ । मातरं पितरं चोभौ सर्व चैव सखीजनम्‌

قال يودهيشثيرا: «أيها الملك، لما رأت دَمَيَنْتِي ذاتَ الذكر الحسن أن جميع أقاربها بخير—وكذلك الطفلان—ورأت أمَّها وأباها، ومعهما جماعة صديقاتها كلّهن، أقامت عبادةَ الآلهة وكرّمت البراهمة وفق أتمّ الشعائر وأقومها».

Verse 26

देवता: पूजयामास ब्राह्मणांश्न यशस्विनी । परेण विधिना देवी दमयन्ती विशाम्पते

قال يودهيشثيرا: «يا سيّد الشعب، يا أيها الملك—لمّا رأت السيدة داميانتي، ذات المجد الرفيع، أقاربها وأصدقاءها جميعًا، وطفليها، ووالديها سالمين معافين، قامت على الوجه الأكمل من الشعائر المقرّرة بعبادة الآلهة وتكريم البراهمة. وتُبرز هذه الحادثة معنى الشكر بعد النجاة، والاستجابة الموافقة للدَّرْمَا عند عودة العافية والرخاء: توقيرًا للإلهيّ وسخاءً لأهل العلم.»

Verse 27

अतर्पयत्‌ सुदेवं च गोसहस््रेण पार्थिव: । प्रीतो दृष्टवैव तनयां ग्रामेण द्रविणेन च

وكان الملك، وقد غمرته البهجة لرؤية ابنته، قد أرضى البراهمن سُوديفا بأن وهبه ألف بقرة، ومعها قريةً ومالًا. وتُبرز هذه الحادثة واجب الحاكم في إكرام البراهمة المستحقّين، وفي إظهار الشكر والفرح بسخاءٍ مستقيم وفق الدَّرْمَا، لا بمجرد التنعّم الشخصي.

Verse 28

सा व्युष्टा रजनीं तत्र पितुर्वेश्मनि भाविनी । विश्रान्ता मातरं राजन्निदं वचनमब्रवीत्‌,युधिष्ठिर! भाविनी दमयन्तीने उस रातमें पिताके घरमें विश्राम किया। सबेरा होनेपर उसने मातासे कहा--

ولمّا انقضت تلك الليلة، استراحت السيدة النبيلة داميانتي في بيت أبيها. وعند انبلاج الفجر، يا أيها الملك، خاطبت أمّها بهذه الكلمات—فكان ذلك بدء الخطوة التالية في عزمها ومسارها الذي يمليه الواجب.

Verse 29

दमयन्त्युवाच मां चेदिच्छसि जीवन्तीं मातः सत्यं ब्रवीमि ते । नलस्य नरवीरस्य यतस्वानयने पुन:

قالت داميانتي: «يا أمّاه، إن كنتِ حقًّا تريدين أن تريني حيّة، فسأقول لكِ الصدق. فابذلي جهدًا متجدّدًا لإعادة نالا، ذلك الملك البطل بين الرجال.»

Verse 30

दमयन्त्या तथोक्ता तु सा देवी भृशदुः:खिता । बाष्पेणापिहिता राज्ञी नोत्तरं किंचिदब्रवीत्‌,दमयन्तीके ऐसा कहनेपर महारानीकी आँखें आँसुओंसे भर आयीं। वे अत्यन्त दुःखी हो गयीं और तत्काल उसे कोई उत्तर न दे सकी

فلما خاطبتها داميانتي بذلك، غمر الحزن الشديد الملكة؛ فاحتجبت عيناها بالدموع. وقد أصابها الأسى، فلم تستطع أن تنطق جوابًا في الحال.

Verse 31

तदवस्थां तु तां दृष्टवा सर्वमन्तःपुरं तदा । हाहाभूतमतीवासीद्‌ भृशं च प्ररुरोद ह,तब महारानीकी यह दयनीय अवस्था देख उस समय सारे अन्तःपुरमें हाहाकार मच गया। सब-के-सब फूट-फूटकर रोने लगे

فلما رأوا حالها تلك البائسة اضطربت أرجاء الحريم في القصر دفعةً واحدةً بصيحات النحيب. وغمرهم الأسى غمرًا شديدًا، فبكوا جميعًا بكاءً مُرًّا.

Verse 32

ततो भीम॑ महाराजं भार्या वचनमब्रवीत्‌ । दमयन्ती तव सुता भर्तारमनुशोचति,तदनन्तर महाराज भीमसे उनकी पत्नीने कहा--'प्राणनाथ! आपकी पुत्री दमयन्ती अपने पतिके लिये निरन्तर शोकमें डूबी रहती है

ثم خاطبت زوجةُ بهيما الملكَ بهيما قائلةً: «يا مولاي، إن ابنتك دماينتي لا تزال غارقةً على الدوام في الحزن على زوجها».

Verse 33

अपकृष्य च लज्जां सा स्वयमुक्तवती नृप । प्रयतन्तां तव प्रेष्या: पुण्यश्लोकस्य मार्गणे,“नरेश्वरर उसने लाज छोड़कर स्वयं अपने मुँहसे कहा है, अतः आपके सेवक पुण्यश्लोक महाराज नलका पता लगानेका प्रयत्न करें"

أيها الملك، لقد نزعت حياءها وتكلمت من تلقاء نفسها قائلةً: «فليجتهد خَدَمُك كلَّ الاجتهاد في البحث عن بونياشلوكا (الملك نالا)».

Verse 34

तया प्रदेशितो राजा ब्राह्मणान्‌ वशवर्तिन: । प्रास्थापयद्‌ दिश: सर्वा यतध्वं नलमार्गणे

وبإيعازٍ منها أرسل الملكُ البراهمةَ الخاضعين لسلطانه إلى جميع الجهات، قائلاً: «اجتهدوا في طلب نالا».

Verse 35

ततो विदर्भाधिपतेर्नियोगाद्‌ ब्राह्मणास्तदा । दमयन्तीमथो सृत्वा प्रस्थिता:स्मेत्यथाब्रुवन्‌

ثم بأمرِ سيدِ فيداربها انطلق البراهمة. ودنَوا من دماينتي وقالوا: «أيتها الأميرة، إنّا ماضون لالتماس خبر نالا—ألكِ رسالةٌ نبلغها؟»

Verse 36

अथ ताननब्रवीद्‌ भैमी सर्वराष्ट्रेष्विदं वच: । ब्रुवध्वं जनसंसत्सु तत्र तत्र पुन: पुन:,तब भीमकुमारीने उन ब्राह्मणोंसे कहा--'सब राष्ट्रोमें घूम-घूमकर जनसमुदायमें आपलोग बार-बार मेरी यह बात बोलें--

ثم خاطبت بهيمي (دامايانتي) أولئك البراهمة قائلةً: «إذا طُفتم بجميع الممالك، فأعلنوا كلماتي هذه مرارًا وتكرارًا في مجامع الناس، في كل موضع».

Verse 37

क्व नु त्वं कितवच्छित्त्वा बस्त्रार्थ प्रस्थितो मम । उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रियां प्रिय

«أيها المقامر، يا حبيبي! بعدما مزّقت ثوبي لتتّخذه لباسًا لك، وتركتَ في الغابة زوجتي الحبيبة نائمةً، المخلصة لزوجها—إلى أين مضيت؟»

Verse 38

सा वै यथा त्वया दृष्टा तथा<जस्ते त्वत्प्रतीक्षिणी । दहामाना भृशं बाला वस्त्रार्थेनाभिसंवृता

«إنها كما رأيتها يومئذ؛ لا تزال إلى اليوم على حالها، تنتظر عودتك. تلك الفتاة، لا تستر جسدها إلا بنصف ثوب، تلتهمها—بشدة ودون انقطاع—نار الفراق عنك.»

Verse 39

तस्या रुदत्या: सततं तेन शोकेन पार्थिव । प्रसादं कुरु वै वीर प्रतिवाक्यं ददस्व च,“वीर भूमिपाल! सदा तुम्हारे शोकसे रोती हुई अपनी उस प्यारी पत्नीपर पुनः कृपा करो और मुझे मेरी बातका उत्तर दो”

«أيها الملك، إنها تبكي على الدوام، تلتهمها تلك اللوعة. أيها البطل، أعد إليها رضاك، وأعطني جوابًا عمّا قلت.»

Verse 40

एवमन्यच्च वक्तव्यं कृपां कुर्याद्‌ यथा मयि । वायुना धूयमानो हि वनं दहति पावक:ः

«وقولوا أيضًا كثيرًا من مثل هذه الكلمات، لعلّه يرقّ لي. فإن النار إذا هبّت عليها الريح أحرقت الغابة كلّها؛ وكذلك عذابي، وقد زادته الفرقة اشتعالًا، يلتهمني.»

Verse 41

भर्तव्या रक्षणीया च पत्नी पत्या हि सर्वदा । तन्नष्टमुभयं कस्माद्‌ धर्मज्ञस्य सतस्तव

إن الزوجة حقًّا يجب أن يُعيلها زوجُها ويحميها على الدوام. فلماذا إذن قصّر هذان الواجبان فجأةً في شأنك—وأنت المعروف بالاستقامة ومعرفة الدَّرْمَا وحسن السيرة—يا سيّد حياتي؟

Verse 42

ख्यात: प्राज्ञ: कुलीनश्न सानुक्रोशो भवान्‌ सदा । संवृत्तो निरनुक्रोश: शड्के मद्धाग्यसंक्षयात्‌

أنت مشهور بالحكمة، كريم النسب، دائم الرأفة. غير أنّ الشكّ دبّ في قلبي: لعلّ حظّي قد نفد، فصرتَ تجفو عليّ وتغدو قاسيًا نحوي.

Verse 43

तत्‌ कुरुष्व नरव्यात्र दयां मयि नरर्षभ । आनुृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव हि मे श्रुतः,“नरव्याप्र! नरोत्तम! मुझपर दया करो। मैंने तुम्हारे ही मुखसे सुन रखा है कि दयालुता सबसे बड़ा धर्म है”

فافعل ذلك، يا نمرَ الرجال ويا ثورَ الرجال—أبدِ لي رحمةً. فقد سمعتُ من فمك أنت أن اللطف والشفقة هما أسمى الدَّرْمَا.

Verse 44

एवं ब्रुवाणान्‌ यदि व: प्रतिब्रूयात्‌ कथंचन । स नर: सर्वथा ज्ञेय: कश्नासौ क्‍्व नु वर्तते

قال يودهيشثيرا: «إن أنتَ تكلّمتَ على هذا النحو، ثم أجابك أحدٌ بأيّ وجهٍ كان، فلابدّ من التعرّف عليه دون تهاون: من هو وأين يقيم.»

Verse 45

यश्चैवं वचन श्रुत्वा ब्रूयात्‌ प्रतिवचो नर: । तदादाय वचस्तस्य ममावेद्यं द्विजोत्तमा:,“विप्रवरो! आपके इन वचनोंको सुनकर जो कोई मनुष्य जैसा भी उत्तर दे, उसकी वह बात याद रखकर आपलोग मुझे बतावें

قال يودهيشثيرا: «يا خيرةَ البراهمة، بعد سماع هذه الكلمات، أيًّا كانت إجابةُ أيّ رجلٍ، فاحفظوا قوله وابلغوني به.»

Verse 46

यथा च वो न जानीयाद्‌ ब्रुवतो मम शासनात्‌ | पुनरागमनं चैव तथा कार्यमतन्द्रितै:

قال يودهيشثيرا: «احرصوا ألّا يعلم أحدٌ أنكم تنطقون بهذه الكلمات بأمري. فإذا نلتم جوابًا فعودوا إلى هنا من فوركم بلا إبطاء، واطرحوا عنكم كل تهاون».

Verse 47

यदि वासौ समृद्धः स्याद्‌ यदि वाप्यधनो भवेत्‌ | यदि वाप्यसमर्थ: स्याज्ज्ञेयमस्य चिकीर्षितम्‌

«سواء أكان الرجل الذي يأتي بالجواب غنيًّا أم فقيرًا، قادرًا أم عاجزًا—فاجتهدوا أن تستبينوا ما الذي يريد فعله حقًّا. فإن قيمة الجواب لا تُقاس بمنزلة المتكلم، بل بالغاية والعزم الكامنين وراء كلماته.»

Verse 48

एवमुक्तास्त्वगच्छंस्ते ब्राह्मणा: सर्वतो दिशम्‌ नलं॑ मृगयितुं राजंस्तदा व्यसनिनं तथा

فلما قيل لهم ذلك، انطلق أولئك البراهمة في كل اتجاه يلتمسون الملك نالا، وقد كان يومئذٍ واقعًا في البلاء والضيق. امتثالًا لرجاء داميانتي، فتشوا عنه في المدن والممالك والقرى ومحطات الماشية والمناسك والآشرامات، ولكنهم لم يهتدوا إلى أثرٍ له في مكان.

Verse 49

ते पुराणि सराष्ट्राणि ग्रामान्‌ घोषांस्तथा55 श्रमान्‌ । अन्वेषन्तो नलं राजन्‌ नाधिजममुद्धिजातय:

أيها الملك، إن أولئك البراهمة، وقد اعتراهم القلق والغمّ، خرجوا في كل جهة يلتمسون الملك نالا. فتشوا في المدن والممالك العتيقة، وفي القرى، وفي مستوطنات الرعاة ومحطات الماشية، وفي الآشرامات كذلك؛ ولكن، أيها الملك، لم يعثروا له على أثر.

Verse 50

तच्च वाक्यं तथा सर्वे तत्र तत्र विशाम्पते । श्रावयांचक्रिरे विप्रा दमयन्त्या यथेरितम्‌,महाराज! दमयन्तीने जैसा बताया था, उस वाक्यको सभी ब्राह्मण भिन्न-भिन्न स्थानोंमें जाकर लोगोंको सुनाया करते थे

يا سيد الناس، كما أوصت داميانتي، مضى أولئك البراهمة جميعًا إلى مواضع شتى، وجعلوا رسالتها تُنادى هنا وهناك، يذيعون كلماتها بين الناس كما صاغتها بحكمة.

Verse 69

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलान्वेषणे एकोनसप्ततितमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी खोजविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

وهكذا، في «المهابهارتا» الشريفة، ضمن «فانا بارفا» (Vana Parva)، في القسم المعروف بـ«نالا-أوباخيانا» (Nala-upākhyāna)، تنتهي هنا الفصل التاسع والستون—المتعلق بالبحث عن نالا (Nala). (وهذا خاتمة فصلٍ لا بيتٌ على لسان شخصية.)

Frequently Asked Questions

Nala must decide whether to pursue uncertain news about Damayantī while maintaining his concealed role; he balances personal longing and remorse against the dharma of service, truthful commitment, and prudent verification.

The chapter models disciplined action under emotional strain: one may act ethically through competence, measured speech, and fidelity to duty even when identity, reputation, and outcomes remain uncertain.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-significance lies in narrative function—demonstrating how concealed virtue and technical mastery become instruments for restoration and for discerning truth within the epic’s broader dharma inquiry.

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