
Vāg-yuddha and Nimitta-darśana before the Gadāyuddha (Verbal Duel and Omens)
Upa-parva: Gadāyuddha-prastāva (Prelude to the Mace-Duel)
Vaiśaṃpāyana narrates a tense sequence in which a verbal duel (vāg-yuddha) and omen imagery frame the imminent mace engagement. Dhṛtarāṣṭra, described as grief-stricken, laments the reversal of fortune: his son—once commander of vast forces—goes forward on foot with a mace, a sign of narrowed options and approaching finality. Saṃjaya then reports the challenger’s summons to Pārtha’s side for combat and the appearance of alarming portents: harsh winds, dust-rain, darkness over directions, thunderous sounds, meteors, an untimely eclipse, trembling earth, falling mountain peaks, agitated animals, and disembodied cries. Observing these nimittas, Bhīma addresses Yudhiṣṭhira, declaring long-contained anger and vowing to end Duryodhana, explicitly listing prior grievances—attempted burning at Vāraṇāvata, the dice deception, Draupadī’s public humiliation, exile and concealment—thus converting personal memory into a public moral indictment. Duryodhana replies that rhetoric is sufficient and demands action, and the gathered kings encourage him. The chapter closes with both sides moving toward the formal commencement of the gadā encounter amid heightened battlefield soundscape and readiness.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं—बलराम के सान्निध्य में, गदायुद्ध उपस्थित होने पर, मेरा पुत्र दुर्योधन भीम के सामने कैसे उतरा? → संजय बताता है कि बलराम को निकट पाकर दुर्योधन का उत्साह और युद्ध-लालसा प्रज्वलित हो उठती है। समन्तपञ्चक तीर्थ में राजाओं और पाण्डव-पक्ष सहित सभासदों का विशाल समुदाय बैठता है; दुर्योधन सबको निकट बैठकर निर्णायक द्वंद्व देखने का निमंत्रण देता है। दोनों योद्धा—बलराम के शिष्य—क्रोध से भरे, हाथों में गदा लिए, गजों और अग्नि के समान उग्र दिखते हैं। → भीम और दुर्योधन एक-दूसरे को प्रलयकाल के दो सूर्य-सम तेजस्वी, काल-मृत्यु के समान परंतप रूप में देखते हैं—और समस्त सभा के सामने गदायुद्ध का क्षण उपस्थित हो जाता है, जहाँ दोनों की क्रुद्ध प्रतिज्ञा और कौशल टकराने को तत्पर है। → सभा-व्यवस्था और दर्शक-समूह की स्वीकृति के साथ युद्ध-स्थल का विधान पूर्ण होता है; द्वंद्व को सार्वजनिक, नियमबद्ध और बलराम की छाया में प्रतिष्ठा मिलती है। → दोनों महाबली आमने-सामने खड़े हैं—पहला प्रहार किसका होगा, और किसकी गदा धर्म-यश का निर्णय करेगी?
Verse 1
/ ऑपनआक्रात बछ। आर: 2 पञ्चपज्चाशत्तमो< ध्याय: बलरामजीकी सलाहसे सबका कुरुक्षेत्रके समन््तपंचक तीर्थमें जाना और वहाँ हे तथा दुर्योधनमें गदायुद्धकी या वैशम्पायन उवाच एवं तदभवद् युद्ध तुमुलं जनमेजय । यत्र दुःखान्वितो राजा धृतराष्ट्रोडब्रवीदिदम्
قال فايشَمبايانا: «يا جاناميجايا، هكذا وقع ذلك القتال العاصف؛ وعندئذٍ تكلّم الملك دْهريتاراشترا، وقد غمره الأسى، بهذه الكلمات». فالبيت لا يصوّر الحرب مشهداً فحسب، بل كارثةً أخلاقيةً أول ثمارها الحزن، حتى ليحمل الملك الأعمى على مساءلة ما جرى.
Verse 2
धृतराष्ट्र रवाच राम॑ संनिहितं दृष्टवा गदायुद्ध उपस्थिते । मम पुत्र: कथं भीम॑ प्रत्ययुध्यत संजय
قال دْهريتاراشترا: «يا سانجيا، حين ابتدأ نزال الصولجان ورأيتُ راما (بلاراما) قائماً قريباً، فكيف قاتل ابني بهيما في قتالٍ مضاد؟»
Verse 3
संजय उवाच रामसांनिध्यमासाद्य पुत्रो दुर्योधनस्तव । युद्धकामो महाबाहु: समहृष्यत वीर्यवान्
قال سانجيا: أيها الملك، لما بلغ ابنك دُريودَهَنَةُ حضرةَ راما (بلاراما)—وهو عظيمُ الساعد، شديدُ البأس، متلهّفٌ للقتال—امتلأ فرحاً عظيماً. ويُبرز البيت كيف أن قربَ شيخٍ مُهابٍ ومحاربٍ جليل قد يُلهب عزيمة المقاتل، وإن ظلّت رهانات الحرب الأخلاقية ثقيلة.
Verse 4
दृष्टवा लाडूलिन राजा प्रत्युत्थाय च भारत । प्रीत्या परमया युक्त: समभ्यर्च्य यथाविधि
قال سانجيا: لما رأى الملك لادُولين، يا بهاراتا، نهض لاستقباله؛ وقد امتلأ بأسمى المودّة، فأكرمه على الوجه اللائق وفقاً للعرف والطقس. ويُظهر المشهد أنّه حتى في قسوة الحرب تبقى شريعة الاستقبال باحترام وحسن السلوك محفوظة.
Verse 5
ततो युधिष्छिरं रामो वाक्यमेतदुवाच ह
قال سنجيا: ثم خاطب راما (بالاراما) يودهيشتيرا بهذه الكلمات—لحظة حاسمة في النصح المُلقى وسط وطأة الحرب الأخلاقية، حيث تُقدَّم الكلمة هدايةً وكفًّا للنفس لا مجرد طلبٍ للنصر.
Verse 6
मधुरं धर्मसंयुक्त शूराणां हितमेव च | तब बलरामने युधिष्ठिरसे मधुर वाणीमें शूरवीरोंके लिये हितकर धर्मयुक्त वचन कहा --][५% || मया श्रुतं कथयतामृषीणां राजसत्तम
قال سنجيا: وتكلّم بكلامٍ عذب النبرة، موصولٍ بالدارما، نافعٍ حقًّا للمحاربين—كلامٌ أُريد به تهذيب السلوك وإرشاده حتى في قسوة الحرب.
Verse 7
कुरुक्षेत्रं परं पुण्यं पावन स्वर्ग्यमेव च । दैवतैर्ऋषिभिर्जुषं ब्राह्मणैश्व महात्मभि:
قال سنجيا: «إن كوروكشيترا أقدسُ البقاع—تُطهِّر وتمنح السماء حقًّا. وقد سمعتُ من أفواه الحكماء الذين يروون عظمتها أن هذا الميدان المقدّس تُلازمه زيارةُ الآلهة والريشيّين والبراهمة ذوي النفوس العظيمة، ويُجلّونه على الدوام.»
Verse 8
तत्र वै योत्स्यमाना ये देहं त्यक्ष्यन्ति मानवा: । तेषां स्वर्गे ध्रुवी वास: शक्रेण सह मारिष
قال سنجيا: «أيها الجليل، إن الرجال الذين يقاتلون هناك ثم يتركون أجسادهم، ينالون لا محالة مقامًا ثابتًا في السماء، ساكنين في صحبة شَكْرَة (إندرا).»
Verse 9
तस्मात् समन्तपञ्चकमितो याम द्रुतं नूप । प्रथितोत्तरवेदी सा देवलोके प्रजापते:
قال سنجيا: «لذلك، أيها الملك، لنمضِ سريعًا من هنا إلى سَمَنْتَپَنْچَكَة (Samantapañcaka). فهذه الأرض مشهورة في عالم الآلهة بأنها “الأوتّراڤيدي” (uttaravedī)، أي “المذبح الشمالي” لبراجاپتي (Prajāpati). وفي ذلك المَعلَم الأقدس والأزلي في العوالم الثلاثة، من يلقَ حتفه في القتال فمصيره إلى السماء لا محالة.»
Verse 10
तस्मिन् महापुण्यतमे त्रैलोक्यस्य सनातने । संग्रामे निधन प्राप्य ध्रुवं स्वर्गे भविष्यति
قال سانجيا: «في تلك البقعة المقدّسة الأسمى بركةً والأبدية، المشهورة في العوالم الثلاثة، من لقي حتفه في ساحة القتال نال السماء يقينًا».
Verse 11
तथेत्युक्त्वा महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । समन्तपज्चकं वीर: प्रायादभिमुख: प्रभु:
قال سانجيا: «هكذا يكون.» ثم بعد أن قال ذلك، أيها الملك، انطلق يودهيشتيرا البطل، ابن كونتي، السيدُ الملك، متوجّهًا بوجهه نحو سمانتابانتشكا.
Verse 12
ततो दुर्योधनो राजा प्रगृह्म महतीं गदाम् | पदभ्याममर्षी द्युतिमानगच्छत् पाण्डवैः सह
قال سانجيا: ثم إن الملك دوريوذانا تناول هراوةً عظيمة وسار على قدميه. كان يشتعل حنقًا، ومع ذلك يلمع بعزم المحارب، فتقدّم مع الباندافا، أيها الملك العظيم.
Verse 13
तथा<<यान्तं गदाहस्तं वर्मणा चापि दंशितम् | अन्तरिक्षचरा देवा: साधु साध्वित्यपूजयन्
قال سانجيا: ولمّا رأى الآلهة السائرون في الفضاء دوريوذانا يتقدّم على تلك الهيئة—الهراوة في يده والدرع عليه—هتفوا مادحين: «أحسنت! أحسنت!»
Verse 14
वातिकाश्चारणा ये तु दृष्टवा ते हर्षमागता: । स पाण्डवै: परिवृत: कुरुराजस्तवात्मज:
قال سانجيا: ولمّا رآه أولئك الرواة والمنشدون السماويون امتلأوا فرحًا. وكان ابنك، ملك الكورو، قائمًا محاطًا بالباندافا.
Verse 15
मत्तस्येव गजेन्द्रस्य गतिमास्थाय सो5व्रजत् । वातिक और चारण भी उसे देखकर हर्षसे खिल उठे। पाण्डवोंसे घिरा हुआ आपका पुत्र कुरुराज दुर्योधन मतवाले गजराजकी-सी गतिका आश्रय लेकर चल रहा था ।।
قال سنجيا: مع أنّ الباندافا كانوا يطوّقونه، أيها الملك، فإن ابنك دوريودhana تقدّم بخطى كخطى فيلٍ سيّدٍ هائجٍ في سُعار الفحولة—خطوةً متعجرفةً قويةً تُعلن التحدّي وهو محصور بين الأعداء. ثم دوّى نفيرُ الأصداف وارتجّت الميدانَ قعقعةُ الطبول العظام، فاهتزّت ساحة القتال بأصدائها.
Verse 16
ततस्ते तु कुरुक्षेत्रं प्राप्ता नरवरोत्तमा:
قال سنجيا: ثم بلغ أولئك السادة من الرجال كوروكشيترا. ولما وجدوا تلك الناحية خاليةً من الأرض السبخة القاحلة، صالحةً لمسيرٍ ميمون، اختاروا ذلك الموضع بعينه ميدانًا للقتال—ليُحسم أمر الحرب على أرضٍ تُعدّ لائقة، لا في بقعةٍ مدنّسة أو مشؤومة.
Verse 17
प्रतीच्यभिमुखं देशं यथोद्दिष्टं सुतेन ते । दक्षिणेन सरस्वत्या: स्वयनं तीर्थमुत्तमम्
قال سنجيا: «(ساروا) نحو الناحية المواجهة للغرب كما أشار ابنك تمامًا—على امتداد الضفة الجنوبية لنهر ساراسفتي—قاصدين سفَيانا، ذلك المخاض المقدّس الأسمى.»
Verse 18
ततो भीमो महाकोटिं गदां गृह्माथ वर्मभूत्
قال سنجيا: عندئذٍ قبض بهيما على دبّوسٍ عظيمٍ حادّ الحافة كالنصل، وتدرّع كأنما صار درعًا حيًّا، متهيّئًا للمنعطف العنيف التالي في المعركة.
Verse 19
अवबद्धशिरस्त्राण: संख्ये काज्चनवर्म भूत्
قال سنجيا: وفي غمرة القتال كان قد شدّ خوذته بإحكام، وارتدى درعًا من ذهب—صورةً لاستعدادٍ مقصودٍ وعزمٍ منضبطٍ تحت وطأة الأخلاق الثقيلة للحرب.
Verse 20
वर्मभ्यां संयतो वीरी भीमदुर्योधनावुभौ
قال سانجيا: إنّ البطلين—بهِيما ودوريودhana—كانا مشدودين بإحكام في دروعهما، ضابطين لأنفسهما تمام الضبط، مستعدين للقتال، وهما يتقابلان في المبارزة الحاسمة.
Verse 21
रणमण्डलमध्यस्थौ भ्रातरौ तौ नरर्षभौ
قال سانجيا: في قلب دائرة القتال وقف ذانك الأخوان، ثورين بين الرجال، ثابتين في مركز المعمعة.
Verse 22
तावन्योन्यं निरीक्षेतां क्रुद्धाविव महाद्विपौ
قال سانجيا: وقف الاثنان متقابلين، يحدّق كلٌّ منهما في الآخر—كفيلين عظيمين في هيجان السَّعار، غاضبين مستعدين للاصطدام.
Verse 23
सम्प्रहष्टमना राजन् गदामादाय कौरव:
قال سانجيا: أيها الملك، إنّ الكورَفيّ، وقد طرب قلبه وازداد نشوة، تناول هراوته—متلهّفًا للقتال، تسوقه عاصفة الحرب العاتية.
Verse 24
सृक्किणी संलिहन् राजन् क्रोधरक्तेक्षण: श्वसन | ततो दुर्योधनो राजन् गदामादाय वीर्यवान्
قال سانجيا: «أيها الملك، كان يلعق زوايا فمه، يلهث، وعيناه محمرّتان من الغضب؛ ثم إنّ دوريودhana، الجسور شديد البأس، تناول هراوته.»
Verse 25
भीमसेनमभिप्रेक्ष्य गजो गजमिवादह्दयत् | नरेश्वर! तदनन्तर शक्तिशाली कुरुवंशी राजा दुर्योधन प्रसन्नचित्त हो गदा हाथमें ले क्रोधसे लाल आँखें करके गलफरोंको चाटता और लंबी साँसें खींचता हुआ भीमसेनकी ओर देखकर उसी प्रकार ललकारने लगा, जैसे एक हाथी दूसरे हाथीको पुकार रहा हो ।।
قال سنجيا: لما رأى دوريوذانا بهيماسينا تحدّاه كما ينادي فيلٌ فيلًا. ثم إن ذلك الملك الجبّار من سلالة الكورو—دوريوذانا، وقد استقرّ قلبه على ثقةٍ قاتمة—أخذ هراوته؛ وعيناه محمرّتان من الغضب، يلعق شفتيه ويجذب أنفاسًا طويلة، فزأر في وجه بهيما زئيرَ الفيلِ الذكرِ في خصومةٍ مع ندّه. وكذلك رفع بهيما الشجاع هراوته الرهيبة.
Verse 26
तावुद्यतगदापाणी दुर्योधनवृकोदरौ
قال سنجيا: ثم وقف الاثنان—دوريوذانا وفْرِكودَرا—وقد رفعا الهراوتين في أيديهما، متأهّبين للقتال.
Verse 27
तावुभौ समतिक्रुद्धावुभी भीमपराक्रमौ
قال سنجيا: كانا كليهما متساويين في اشتعال الغضب، محاربين ذوي بأسٍ كَبأسِ بهيما؛ يضاهي كلٌّ منهما الآخر في عزمٍ شرسٍ كلما ارتفعت حُمّى المعركة.
Verse 28
उभौ सदृशकर्माणौ यमवासवयोरिव
قال سنجيا: أيها الملك العظيم، إن هذين البطلين الجبّارين كانا متشابهين في الأفعال، كَيَما وفاسافا (إندرا). كانا يُلهبان أعداءهما عذابًا، ويُظهران بأسًا يضاهي بأس يَما وإندرا وفارونا وكريشنا وبالاراما وكوبيرا؛ ويشبهان كذلك أزواج الخصوم المشهورين: مادهو وكيتابها، سوندا وأوباسوندا، راما ورافانا، وبالي وسوغريفا. بل بدَوَا كأنهما الزمان والموت بعينهما.
Verse 29
तथा सदृशकर्माणौ वरुणस्य महाबलौ । वासुदेवस्य रामस्य तथा वैश्रवणस्य च
قال سنجيا: أيها الملك، إن هذين البطلين الجبّارين كانت أفعالهما تضاهي أفعال فارونا، وكذلك أفعال فاسوديفا (كريشنا) وراما (بالاراما) وفايشرافانا (كوبيرا)؛ وكانا يُحرقان أعداءهما. وقد أظهرا بأسًا كَبأس يَما وإندرا وفارونا وكريشنا وبالاراما وكوبيرا، وكبأس الخصوم المشهورين—مادهو وكيتابها، سوندا وأوباسوندا، راما ورافانا، وبالي وسوغريفا—حتى ليبدوا كأنهما الزمان والموت بعينهما.
Verse 30
सदृशौ तौ महाराज मधुकैटभयोर्युधि । उभौ सदृशकर्माणौ तथा सुन्दोपसुन्दयो:
قال سانجيا: أيها الملك، كان هذان متشابهين في ساحة القتال كمادهو وكيتابها؛ ومتساويين في الأفعال كسوندا وأوباسوندا. وفي لهيب الحرب بدَوَا كفارسَين لا نظير لهما، يحرقان الأعداء، حتى ليبعثان رهبةً كأنما الزمان والموت نفسيهما قد تجسّدا، على قدر ما أُوتيا من بأسٍ واقتدار.
Verse 31
रामरावणयोश्रैव वालिसुग्रीवयोस्तथा । तथैव कालस्य समीौ मृत्योश्रैव परंतपौ
قال سانجيا: أيها الملك، إن هذين البطلين، معذِّبي الأعداء، بدَوَا كأنهما نِدٌّ لراما ورافانا، وكذلك لفالي وسوغريفا؛ وعلى النحو نفسه ظهرا كأنهما الزمان ذاته والموت ذاته—صورتان لقوة لا تُقاوَم.
Verse 32
अन्योन्यमभिधावन्तौ मत्ताविव महाद्विपौ । वासितासंगमे दृप्ती शरदीव मदोत्कटौ
قال سانجيا: كفيلَين عظيمَين سكرانَين بسُعار الفحولة يندفعان أحدهما إلى الآخر—متكبرَين هائجَين كما في الخريف حين يسرعان إلى الاقتران بأنثى مستجيبة—هكذا تقدّم ذانك البطلان، مزهوَّين بقوتهما، ليصطدما. وكان كلٌّ منهما، قاهرَ الأعداء، يحدّق في صاحبه بغيظ، كأنما يقذف سمَّ الغضب المتّقد، مثل أفعوانين.
Verse 33
उभौ क्रोधविषं दीप्तं वमन््तावुरगाविव । अन्योन्यमभिसंरब्धौ प्रेक्षमाणावरिंदमौ
قال سانجيا: كان المحاربان كلاهما كأفعوانين ينفثان سُمًّا متّقدًا، وقد اشتعلا غضبًا. وفي غمرة سخطٍ متبادل، ظلّ قاهرا الأعداء يتبادلان التحديق، متأهّبَين للاصطدام.
Verse 34
उभौ भरतशार्दूलौ विक्रमेण समन्वितौ । सिंहाविव दुराधर्षों गदायुद्धविशारदौ,भरतवंशके वे विक्रमशाली सिंह दो जंगली सिंहोंके समान दुर्जय थे और दोनों ही गदायुद्धके विशेषज्ञ माने जाते थे
قال سانجيا: كانا كلاهما من “نمور” سلالة بهاراتا، موفورَي البأس، عصيَّين على القهر كأَسَدَين؛ وكانا معًا مُعترَفًا بهما سادةً في قتال الصولجان (الغَدَا).
Verse 35
नखदंष्टायुधौ वीरौ व्याप्राविव दुरुत्सहौ । प्रजासंहरणे क्षुब्धौ समुद्राविव दुस्तरी
قال سنجيا: «كان هذان البطلان، كأنهما مسلّحان بالمخالب والأنياب، مثل نمرين—ضاريين عسيري الاحتمال. وقد اضطربا لإهلاك الرجال، فكانا كمحيطين هائجين، يستحيل اجتيازهما.»
Verse 36
लोहिताज्विव क्रुद्धौ प्रतपन््तोी महारथौ । पंजों और दाढ़ोंसे प्रहार करनेवाले दो व्याप्रोंक समान उन दोनों वीरोंका वेग शत्रुओंके लिये दुः:सह था। प्रलयकालनमें विक्षुब्ध हुए दो समुद्रोंके समान उन्हें पार करना कठिन था। वे दोनों महारथी क्रोधमें भरे हुए दो मंगल ग्रहोंक समान एक-दूसरेको ताप दे रहे थे || ३५६ || पूर्वपश्चिमजौ मेघौ प्रेक्षमाणावरिंदमौ
قال سنجيا: كان هذان المقاتلان العظيمان على العربة، وقد استعر فيهما الغضب، يتوهجان كجمرتين حمراوين. وكزوجٍ من النمور يضربان بالمخالب والأنياب، كان اندفاعهما لا يُطاق على الأعداء. وكبحرين هائجين في زمن الفناء، كان اجتيازهما عسيراً. ممتلئين سخطاً، كان هذان المَهارَثَان يُحرق أحدهما الآخر ككوكبين شبيهين بالمريخ، كلٌّ منهما يزيد الآخر لهيباً في غضبٍ متبادل.
Verse 37
गर्जमानौ सुविषमं क्षरन्तौ प्रावृषीव हि । जैसे वर्षा-ऋतुमें पूर्व और पश्चिम दिशाओंमें स्थित दो वृष्टिकारक मेघ भयंकर गर्जना कर रहे हों, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेको देखते हुए भयानक सिंहनाद कर रहे थे ।।
قال سنجيا: كانا يزأران بزئيرٍ رهيب الشدة، ويفيض منهما البأس كما يفيض المطر في موسم الرياح. وهذان المحاربان العظيمان، الساميان نفساً، المتلألئان، الجباران—كغيمتين حاملتين للمطر قائمتين في جهتي الشرق والغرب—ثبّتا نظرهما أحدهما في الآخر وأطلقا زئيرين كزئير الأسد يبعثان الرعب، عازمين على سحق الأعداء.
Verse 38
व्यात्राविव सुसंरब्धौ गर्जन्ताविव तोयदौ
قال سنجيا: كان الاثنان في غاية السعار، كأنهما نمران؛ وكالسحب الحاملة للمطر كانا يزمجران—صورةٌ لغضب المعركة وهو ينتفخ حتى يصير عاصفة، حيث يدفع السخط والكبرياء المحاربين إلى مواجهةٍ عنيفة.
Verse 39
गजाविव सुसंरब्धौ ज्वलिताविव पावकौ
قال سنجيا: كان الاثنان في غاية الهيجان، كفيلين في حال السُّعار (المَسْت)؛ يشتعلان غضباً كالنار الموقدة—صورةٌ لكيف يحوّل الغضب المنفلت في الحرب القوةَ إلى دمارٍ آكلٍ لا يُبقي.
Verse 40
रोषात् प्रस्फुरमाणोष्ठी निरीक्षन्तौ परस्परम्
قال سنجيا: كانت شفاههما ترتجف من الغضب، وقد ثبّت كلٌّ منهما نظره في الآخر—علامة ظاهرة لسخطٍ كامن؛ وفي المناخ الأخلاقي للحرب تُنذر هذه الحال بكلامٍ أو فعلٍ تدفعه العاطفة أكثر مما يضبطه كبحُ النفس.
Verse 41
उभौ परमसंदहृष्टावुभी परमसम्मतौ
قال سنجيا: كان كلاهما في غاية الابتهاج، وكان كلٌّ منهما موضعَ أرفع تقدير—صورةٌ لنشوةٍ متبادلة واعترافٍ متقابل وسط المناخ الأخلاقي القاسي للحرب.
Verse 42
सदश्चवाविव हेषन्तौ बृहन्ताविव कुञ्जरौ । वृषभाविव गर्जन्तौ दुर्योधनवृकोदरौ
قال سنجيا: «كان دُريودَهَنَة وفِرِكودَرَة (بهِيما) يصهلان كجيادٍ جامحة، ويشمخان كفيلةٍ عظيمة، ويزأران كثورين جبارين». وفي هذا المشهد الحربي يرفع الشاعر حدّة التوتر الأخلاقي: بطلان تدفعهما الكبرياء والغيظ وثِقلُ نذورٍ سالفة، يتقابلان بقوةٍ أشبه بقوة الحيوان—مُوحياً بأن المعركة قد تُنقص تروّي الإنسان وكبحه الدارمي إلى اندفاعٍ خامٍّ طاغٍ.
Verse 43
आसन च ददौ तस्मै पर्यपृच्छदनामयम् । भरतनन्दन! हलधरको देखते ही राजा युधिष्ठिर उठकर खड़े हो गये और बड़े प्रेमसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करके उन्हें बैठनेके लिये उन्होंने आसन दिया तथा उनके स्वास्थ्यका समाचार पूछा
قال سنجيا: إن يودهيشتِهيرا، ابن بهاراتا، نهض في الحال حين رأى هالادهارا (بالاراما). وبخشوعٍ مفعمٍ بالمودة أكرمه على الوجه اللائق، وقدّم له مقعدًا وسأل عن عافيته—فعلٌ يصون الدارما بالضيافة، وبإجلال الكبار، وبالتحفّظ حتى في خضم توترات الحرب.
Verse 44
भ्रातृभि: सहितं चैव कृष्णेन च महात्मना । रामेणामितवीर्येण वाक््यं शौटीर्यसम्मतम्
قال سنجيا: وكان معه إخوته، ومعهم أيضًا كريشنا العظيم النفس، وراما (بالاراما) ذو البأس الذي لا يُقاس، فتكلّم بكلامٍ يوافق الجرأة والفروسية—قولٌ يليق بالمحاربين في قلب الأزمة.
Verse 45
केकयै: सृग्जयैर्दप्तं पञ्चालैश्व महात्मभि: । राजन्! तदनन्तर दुर्योधनने अमितपराक्रमी बलराम, महात्मा श्रीकृष्ण, महामनस्वी पांचाल, संजय, केकयगण तथा अपने भाइयोंके साथ खड़े हुए अभिमानी युधिष्ठिरसे इस प्रकार गर्वयुक्त वचन कहा-- ।।
قال سانجيا: «أيها الملك، بعدما أُضرِمت الحماسة في الكِكَيَة والسِرِنْجَيَة والبَانْچَالَة ذوي النفوس العظيمة، تكلّم يُدْهِشْتِيرَةُ المتكبّر—وهو قائمٌ مع بَلَرَامَةَ ذي البأس الذي لا يُقاس، ومع شري كْرِشْنَةَ العظيم النفس، ومع قادة البانچالة ذوي الهمة السامية، ومع سانجيا، وجموع الكِكَيَة، وإخوته—بهذه الكلمات المتباهية: “لقد حُسِمَ هذا القتالُ حسمًا ثابتًا—بينِي وبين بِهِيمَة، لنا نحن الاثنين.”»
Verse 46
श्र॒त्वा दुर्योधनवच: प्रत्यपद्यन्त तत्तथा
قال سانجيا: «فلما سمع الملوك المجتمعون كلام دُريودhana أقرّوه على ذلك. ثم جلست تلك الجماعة العظيمة من الحكّام من كل جانب. وبدا مجلس الملوك كقرص الشمس في السماء. وفي وسطهم أشرق بَلَرَامَةُ—عظيم الساعدين، متلألئًا، وهو الأخ الأكبر الموقَّر للرب شري كْرِشْنَة. أيها الملك، وقد أُكرم من كل جهة، كان بَلَبْهَدْرَةُ لابسًا ثيابًا زرقاء، ناصعَ اللون، يزدهي بين الملوك كالبدر في الليل تحيط به النجوم.»
Verse 47
ततः समुपविष्टं तत् सुमहद्राजमण्डलम् । विराजमान ददृशे दिवीवादित्यमण्डलम्
قال سانجيا: «ثم إن ذلك المجلس العظيم من الملوك، بعدما جلسوا، بدا متلألئًا—كقرص الشمس في السماء.»
Verse 48
तेषां मध्ये महाबाहु: श्रीमान् केशवपूर्वज: । उपविष्टो महाराज पूज्यमान: समन्ततः
قال سانجيا: «أيها الملك، وفي وسطهم جلس الجليلُ عظيمُ الساعدين، الأخُ الأكبر لكِشَفَة (كْرِشْنَة)، مُكرَّمًا من كل جانب.»
Verse 49
शुशुभे राजमध्यस्थो नीलवासा: सितप्रभ: । नक्षत्रैरिव सम्पूर्णो वृतो नेशि निशाकर:
قال سانجيا: «وفي وسط الملوك كان بالاديفا المتلألئ—لابسًا الأزرق، مشرقًا ببياضٍ صافٍ—في أبهى بهائه. وقد أحاط به الحكّام المجتمعون، فكان كالبدر في الليل تحفّ به النجوم.»
Verse 50
तो तथा तु महाराज गदाहस्तौ सुदुःसहौ । अन्योन्यं वाम्भिरुग्राभिस्तक्षमाणौ व्यवस्थितौ,महाराज! हाथमें गदा लिये वे दोनों दुःसह वीर एक-दूसरेको अपने कठोर वचनोंद्वारा पीड़ा देते हुए खड़े थे
قال سانجيا: أيها الملك، هكذا وقف البطلان اللذان لا يُقاوَمان، وكلٌّ منهما قابضٌ على هراوةٍ في يده، متقابلين، يجرح أحدهما الآخر بكلماتٍ قاسيةٍ ضارية—تمهيدٌ مشؤومٌ للعنف الآتي، حين يطغى الكِبرُ والغضبُ على كبح النفس، حتى بين العظماء.
Verse 51
अप्रियाणि ततो<न्योन्यमुक्त्वा तौ कुरुसत्तमौ । उदीक्षन्तौ स्थितौ तत्र वृत्रशक्रौ यथा55हवे
وبعد أن قذف كلٌّ منهما الآخر بكلماتٍ قاسيةٍ مكروهة، ثبت بطلا آل كورو، وهما من أرفع فرسانهم، في ذلك الموضع بساحة القتال، يحدّق أحدهما في الآخر—كفِترَ وإندرا حين يقفان للحرب—راسخين مستعدين للقتال.
Verse 54
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑नें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ
وهكذا انتهى الفصل الرابع والخمسون من «شَليَة پَرفا» من «شري مهابهارتا»، ضمن مقطع «گَداپَرفَن»، في سياق حجّ بالاديفا (Baladeva) إلى التيَرثات، والمتعلّق بالحكاية المعروفة باسم «ساراسڤَتا أوباخيانا».
Verse 55
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि युद्धारम्भे पजचपड्चाशत्तमो<5 ध्याय: ।। ५५ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें युद्धका आरम्भविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ
قال سانجيا: «وهكذا، في «شري مهابهارتا»، ضمن «شَليَة پَرفا»—وخاصةً في قسم «گَداپَرفَن» المتعلّق بقتال الهراوات—ينتهي الفصل الخامس والخمسون، واصفًا ابتداء المعركة».
Verse 156
सिंहनादैश्व शूराणां दिश: सर्वा: प्रपूरिता: । उस समय शंखोंकी ध्वनि, रणभेरियोंके गम्भीर घोष और शूरवीरोंके सिंहनादोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठी थीं
قال سانجيا: بصيحات الأبطال التي تشبه زئير الأسد امتلأت الجهات كلها ودوّت—موجةٌ مهيبةٌ مشؤومة من الحماسة الحربية تُنذر بتصاعد القتال، وتكشف عزم المقاتلين مجتمعين على أن يبذلوا الأرواح في سبيل القضية التي اختاروها.
Verse 173
तस्मिन् देशे त्वनिरिणे ते तु युद्धमरोचयन् । तदनन्तर वे सभी श्रेष्ठ नरवीर आपके पुत्रके साथ पश्चिमाभिमुख चलकर पूर्वोक्त कुरक्षेत्रमें आ पहुँचे। वह उत्तम तीर्थ सरस्वतीके दक्षिण तटपर स्थित एवं सदगतिकी प्राप्ति करानेवाला था। वहाँ कहीं ऊसर भूमि नहीं थी। उसी स्थानमें आकर सबने युद्ध करना पसंद किया
قال سنجيا: في تلك الناحية التي لا قفرَ فيها ولا أرضَ ملحيةً سبخة، اختاروا أن يقاتلوا. ثم إن أولئك الأبطالَ الأفاضل جميعًا، مع ابنِك، ساروا وهم يواجهون الغرب حتى بلغوا كوروكشيترا المذكورة آنفًا. وكان ذلك المَعبرُ المقدّسُ الفاضل على الضفة الجنوبية لنهر سَرَسْوَتِي، ويُقال إنه يمنح مصيرًا مباركًا. ولم تكن هناك أرضٌ موحشةٌ في أي موضع. فلما اجتمعوا في ذلك المكان بعينه، آثروا جميعًا أن يخوضوا غمار القتال.
Verse 183
बिश्रद्रूपं महाराज सदृशं हि गरुत्मत: । फिर तो भीमसेन कवच पहनकर बहुत बड़ी नोकवाली गदा हाथमें ले गरुडका-सा रूप धारण करके युद्धके लिये तैयार हो गये
قال سنجيا: «أيها الملك العظيم، لقد اتخذ هيئةً بهيّةً مهيبةً تُلقي الرهبة، كأنها هيئةُ غارودا حقًّا». ثم إن بهيماسينا لبس درعه، وأخذ بيده هراوةً عظيمةً ذات سنٍّ حاد، وتقمّص مظهرًا كالغارودا، وتهيّأ للقتال.
Verse 193
रराज राजन पुत्रस्ते काउचन: शैलराडिव । तत्पश्चात् दुर्योधन भी सिरपर टोप लगाये सोनेका कवच बाँधे भीमके साथ युद्धके लिये डट गया। राजन! उस समय आपका पुत्र सुवर्णमय गिरिराज मेरुके समान शोभा पा रहा था
قال سنجيا: أيها الملك، إن ابنك الكاورافي كان يلمع كسيّد الجبال. ثم إن دوريوذَنَة وضع خوذةً على رأسه وشدّ درعًا ذهبيًّا على صدره، فثبت راسخًا مستعدًّا لقتال بهيما. أيها الملك، في تلك اللحظة بدا ابنك متألّقًا—كجبل ميرو الذهبي—يشعّ ببهاء قمةٍ شامخة.
Verse 206
संयुगे च प्रकाशेते संरब्धाविव कुञ्जरी । कवच बाँधे हुए दोनों वीर भीमसेन और दुर्योधन युद्धभूमिमें कुपित हुए दो मतवाले हाथियोंके समान प्रकाशित हो रहे थे
قال سنجيا: في خضمّ المعركة كان بهيماسينا ودوريوذَنَة—وهما بطلان جباران وقد شُدّت دروعهما—يبرزان في ساحة القتال كفيلين هائجين مخمورين. لقد جعل غضبهما وبهاؤهما الحربيّ حضورهما صارخًا للعيان.
Verse 216
अशोभेतां महाराज चन्द्रसूर्याविवोदितौ । महाराज! रणमण्डलके बीचमें खड़े हुए ये दोनों नरश्रेष्ठ भ्राता उदित हुए चन्द्रमा और सूर्यके समान शोभा पा रहे थे
قال سنجيا: «أيها الملك العظيم، لقد أشرق الاثنان كالقمر والشمس عند طلوعهما». واقفين في قلب ساحة القتال، بدا البطلان الشقيقان متلألئين كالقمر والشمس حين ينهضان في الأفق.
Verse 226
दहन्तौ लोचनै राजन् परस्परवधैषिणौ । राजन! क्रोधमें भरे हुए दो गजराजोंके समान एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले वे दोनों वीर परस्पर इस प्रकार देखने लगे, मानो नेत्रोंद्वारा एक-दूसरेको भस्म कर डालेंगे
قال سانجيا: أيها الملك، إنّ هذين البطلين—وقد عزم كلٌّ منهما على قتل الآخر—ثبّت كلٌّ نظره في صاحبه كأنهما سيحرقان الخصم رمادًا بعيونهما. ويكشف هذا المشهد كيف تتحوّل الشجاعة، إذا أُطلقت لها العنان نارُ الغضب، إلى لهبٍ آكل، حتى يبدو الهلاك المتبادل أمرًا مرغوبًا.
Verse 256
आह्वयामास नृपतिं सिंहं सिंहो यथा वने । उसी प्रकार पराक्रमी भीमसेनने लोहेकी गदा लेकर राजा दुर्योधनको ललकारा, मानो वनमें एक सिंह दूसरे सिंहको पुकार रहा हो
قال سانجيا: كما ينادي أسدٌ أسدًا في الغابة، كذلك تناول بهيماسينا الجبار صولجانًا من حديد وتحدّى الملك دوريودhana. وتبرز هذه الصورة ذروة المواجهة وجهًا لوجه بين القوة والعزم في ظل العبء الأخلاقي لحربٍ أخويةٍ دامية، حيث يصطدم كبرياء المُلك بواجب الكشاتريا (kṣatriya-dharma) في الامتحان الأخير للبأس.
Verse 266
संयुगे च प्रकाशेतां गिरी सशिखराविव । दुर्योधन और भीमसेन दोनोंकी गदाएँ ऊपरको उठी थीं। उस समय रणभूमिमें वे दोनों शिखरयुक्त दो पर्वतोंके समान प्रकाशित हो रहे थे
قال سانجيا: في لُجّة القتال لمع الاثنان كجبلين توأمين تتوَّجهما القمم. كان دوريودhana وبهيماسينا قد رفعا صولجانيهما عاليًا، وعلى ساحة الحرب جعلتهما الأسلحة المرفوعة يبدوان ككتلتين شامختين متألقتين—صورةً ناصعة لكبرياء المحاربين وللعزم الرهيب الذي يدفع الحرب إلى خاتمتها المقدَّرة.
Verse 386
जहृषाते महाबाहू सिंहकेसरिणाविव । रोषमें भरे हुए दो व्याप्रों, गरजते हुए दो मेघों और दहाड़ते हुए दो सिंहोंके समान वे दोनों महाबाहु वीर हर्षोत्फुल्ल हो रहे थे
قال سانجيا: ابتهج البطلان عظيمَا الساعدين، وقد انتفخت أرواحهما بغضبٍ ضارٍ—كَنَمِرَينِ مشحونين بالسخط، وكغيمتين رعديتين تزأران، وكأسدين يزمجران. لم تكن فرحتهما لذّةً وادعة، بل نشوةَ المحاربين على عتبة قتالٍ حاسم.
Verse 396
ददृशाते महात्मानौ सशृज्भाविव पर्वतौ । वे दोनों महामनस्वी योद्धा परस्पर कुपित हुए दो हाथियों, प्रज्वलित हुई दो अग्नियों और शिखरययुक्त दो पर्वतोंके समान दिखायी देते थे
قال سانجيا: بدا هذان المحاربان العظيمَا النفس كجبلين ذوي قرون. وقفا وجهًا لوجه في غضبٍ وجلال، فتجلّت قوتهما وعزيمتهما حين تقابلا في قلب الحرب.
Verse 406
तौ समेतौ महात्मानौ गदाहस्तौ नरोत्तमौ । उन दोनोंके ओठ रोषसे फड़क रहे थे। वे दोनों नरश्रेष्ठ एक-दूसरेपर दृष्टिपात करते हुए हाथमें गदा ले परस्पर भिड़नेके लिये उद्यत थे
قال سنجيا: إنّ هذين البطلين العظيمي النفس، خيرَ الرجال، قد تقابلا وجهاً لوجه وهما قابضان على الدُّبّوسين. كانت شفاههما ترتجف من الغضب؛ يحدّق كلٌّ منهما في الآخر، واقفاً على أهبة الاصطدام—إذ كانت الحميّة تدفعهما إلى لقاءٍ حاسمٍ عنيف في قلب انهيار القيم في الحرب.
Verse 453
उपोपविष्टा: पश्यध्वं सहितैर्नुपपुड़वैः । “वीरो! मेरा और भीमसेनका जो यह युद्ध निश्चित हुआ है, इसे आप लोग सभी श्रेष्ठ नरेशोंके साथ निकट बैठकर देखिये”
قال سنجيا: «اجلسوا قريباً وانظروا، مع صفوة الملوك. أيها البطل، إنّ النزال الذي تقرّر وثبت بيني وبين بهيماسينا—فليجلس جميعكم، مع خير الحكّام، قريباً وليشهدوه.»
Verse 2736
उभौ शिष्यौ गदायुद्धे रोहिणेयस्य धीमत: । दोनों ही अत्यन्त क्रोधमें भरे थे। दोनों भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले थे और दोनों ही गदायुद्धमें बुद्धिमान् रोहिणीनन्दन बलरामजीके शिष्य थे
قال سنجيا: كان كلاهما تلميذين للحكيم روهِنييَ (بلاراما) في فنّ القتال بالدُّبّوس. وقد اشتعلا غضباً شديداً، فأظهر كلٌّ منهما بأساً مروّعاً—صورةٌ لكيف تتحوّل المهارة الحربية، إذا ساقها السخط، إلى قوّةٍ مرعبة في ساحة الوغى.
Verse 3736
ददृशाते कुरुश्रेष्ठी कालसूर्याविवोदितौ । महामनस्वी महाबली कुरुश्रेष्ठ दुर्योधन और भीमसेन प्रखर किरणोंसे युक्त, प्रलयकालमें उगे हुए दो दीप्तिशाली सूर्योके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे
قال سنجيا: بدا سيّدا الكورو، دوريوذانا وبهيمسينا، كأنهما شمسـان متّقدتان طلعتا في زمن الفناء، تتفجّر منهما أشعّةٌ شرسة. وفي تلك اللحظة اشتدّ ثقل الحرب الأخلاقي: عزيمةٌ وقوّةٌ عظيمتان تشعّان، غير أنّ ذلك الإشعاع كان في مشهد الخراب، حيث تقف البسالة والدمار جنباً إلى جنب.
The dilemma concerns whether end-stage resolution through single-combat can remain aligned with kṣātra-dharma when the combatants’ motivations are shaped by accumulated grievances and the demand for retributive closure.
The chapter frames speech as ethical memory: earlier choices persist as causal forces, and public narratives of justice emerge through explicit recollection of harms, even as duty requires disciplined action rather than prolonged provocation.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is carried by nimitta imagery and layered narration, signaling interpretive gravity and preparing the listener for consequential resolution rather than offering a stated salvific benefit.
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