
Bhagadattā’s Deployment Against Ghaṭotkaca; Elephant-Corps Escalation
Upa-parva: Bhagadatta–Ghaṭotkaca–Bhīmasena Saṅgrāma (Strategic Engagement Episode)
Saṃjaya reports that, amid a severe engagement, Duryodhana approaches Bhīṣma with deference and recounts Ghaṭotkaca’s success and his own reverse, requesting a decisive remedy. Bhīṣma counsels the king to prioritize self-preservation in battle and to prosecute the war in alignment with rāja-dharma, noting the availability of senior Kaurava champions and allies. He then directs Bhagādattā of Prāgjyotiṣa—renowned for divine weapons and experience against formidable opponents—to move swiftly and check the Haiḍimba (Ghaṭotkaca) as Indra once checked Tāraka. Bhagādattā advances with a martial cry; Pāṇḍava leaders converge, and a large-scale clash follows with intense missile exchanges and elephant-on-elephant engagements. Bhagādattā’s elephant Supratīka drives into formations, compressing Pāṇḍava forces; Ghaṭotkaca counters with terrifying displays and heavy weapons, which Bhagādattā neutralizes with precise archery. Bhagādattā’s subsequent volleys unhorse and wound key fighters, forcing Bhīma to fight on foot with a mace, heightening Kaurava anxiety. Arjuna, with Kṛṣṇa as charioteer, arrives and charges into the approaching Kaurava host; Bhagādattā continues pressing through the melee, extending the engagement toward Yudhiṣṭhira as the battlefield front broadens.
Chapter Arc: आठवें दिन के रण में धर्मपुत्र युधिष्ठिर की आज्ञा से समस्त पाण्डव-सेना गंगानन्दन भीष्म पर टूट पड़ती है—मानो एक ही लक्ष्य पर समूचा युद्ध सिमट आया हो। → रणश्लाघी भीष्म अपने तीक्ष्ण बाणों से सोमक, सृंजय और महेष्वास पाञ्चालों को गिराते जाते हैं; पाण्डव-पक्ष में भय और क्रोध साथ-साथ उठते हैं, और भीमसेन के सिवा कोई उनके सामने टिकता नहीं दिखता। → भीमसेन भीष्म के रथ पर झपटता है, उनके सारथि को मार गिराता है और रथ को अस्त-व्यस्त कर देता है; उसी उथल-पुथल में कौरव-वीरों से भीम का घोर संघर्ष होता है, जहाँ वह धृतराष्ट्र-पुत्रों का संहार करने की प्रतिज्ञा-सी निभाता दिखाई देता है। → कौरव-पक्ष में भीम के प्रचण्ड पराक्रम को देखकर चेतावनी और उपदेश का स्वर उठता है—राजा से कहा जाता है कि स्थिर होकर दृढ़ निश्चय करे, स्वर्ग को अंतिम आश्रय मानकर युद्ध में डटा रहे; पर रण का परिणाम तत्काल निर्णीत नहीं होता। → भीम के हाथों धृतराष्ट्र-पुत्रों के वध का क्रम आगे भी बढ़ने वाला है—अगले प्रहार में कौन-सा ‘अपराजित’ भी पराजित होगा, यह भय कौरव-शिविर पर छाया रहता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें आठवें दिनके युद्धसे सम्बन्ध रखनेवाला सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८७ ॥ अपन हू< बक। है २ >> अष्टाशीतितमो<् ध्याय: भीष्मका पराक्रम, भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके आठ पुत्रोंका वध तथा दुर्योधन और भीष्मकी युद्धविषयक बातचीत संजय उवाच भीष्म तु समरे क्रुद्धं प्रतपन््तं समन््ततः । न शेकुः पाण्डवा द्रष्ट॑ं तपनन्तमिव भास्करम्,संजय कहते हैं--राजन्! जैसे तपते हुए सूर्यकी ओर देखना कठिन होता है, उसी प्रकार जब भीष्म उस समरमें कुपित हो सब ओर अपना प्रताप प्रकट करने लगे, उस समय पाण्डवसैनिक उनकी ओर देख न सके
قال سنجيا: أيها الملك، لما غضب بهيشما في ساحة القتال وأخذ يتوهّج ببأسه من كل جانب، لم يستطع الباندافا أن يثبتوا أبصارهم عليه—كما لا يطيق المرء التحديق في الشمس حين تبلغ أشدّ لهيبها.
Verse 2
ततः सर्वाणि सैन्यानि धर्मपुत्रस्य शासनात् | अभ्यद्रवन्त गाड़ेयं मर्दयन्तं शितै: शरै:,तदनन्तर धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी आज्ञासे समस्त सेनाएँ गंगानन्दन भीष्मपर टूट पड़ीं, जो अपने तीखे बाणोंसे पाण्डव-सेनाका मर्दन कर रहे थे
ثمّ، بأمر دارمابوترا يودهيشثيرا، اندفعت الجيوش كلّها نحو بهيشما، ابن الغانغا. ومع أنّه كان يفتك بجيش الباندافا بسهامٍ حادّة، فقد أسرعوا لملاقاته ومجابهته.
Verse 3
स तु भीष्मो रणश्लाघी सोमकान् सहसृञज्जयान् | पज्चालांश्व महेष्वासान् पातयामास सायकै:,युद्धकी स्पृहा रखनेवाले भीष्म अपने बाणोंके द्वारा सोमक, सृंजय और पांचाल महाधनुर्धरोंको रणभूमिमें गिराने लगे
قال سنجيا: إنّ بهيشما، وقد طرب للقتال، أخذ يُسقط بسهامه السومَكَةَ والسهاسرِنْجَيَةَ وعِظامَ رماة القِسيّ من البانچالا، فيطرحهم صرعى على أرض المعركة.
Verse 4
ते वध्यमाना भीष्मेण पठ्चाला: सोमकै: सह । भीष्ममेवाभ्ययुस्तूर्ण त्यक्त्वा मृत्युकृतं भयम्,भीष्मके द्वारा घायल किये जाते हुए वे सोमक (सूृंजय) और पांचाल भी मृत्युका भय छोड़कर तुरंत भीष्मपर ही टूट पड़े
قال سنجيا: مع أنّ بهيشما كان يضربهم ويصرعهم، فإنّ البانچالا مع السومَكَة نبذوا خوف الموت، وأسرعوا بعزمٍ خاطف يندفعون مباشرةً نحو بهيشما نفسه.
Verse 5
स तेषां रथिनां वीरो भीष्म: शान्तनवो युधि । चिच्छेद सहसा राजन् बाहूनथ शिरांसि च,राजन! वीर शान्तनुनन्दन भीष्म उस युद्धके मैदानमें सहसा उन रथियोंकी भुजाओं और मस्तकोंको काट-काटकर गिराने लगे
قال سنجيا: أيها الملك، في تلك المعركة أخذ بهيشما الشجاع، ابن شانتانو، يقطع فجأةً أذرع أولئك المقاتلين على المركبات، بل ورؤوسهم أيضًا، فيُسقطهم صرعى.
Verse 6
विरथान् रथिनश्षक्रे पिता देवव्रतस्तव । पतितान्युत्तमाज़ानि हयेभ्यो हयसादिनाम्,आपके ताऊ देवव्रतने बहुत-से रथियोंको रथहीन कर दिया। घोड़ोंसे घुड़सवारोंके मस्तक कट-कटकर गिरने लगे
قال سانجيا: إن أباك ديفافراتا (بيشما) جرّد كثيرًا من مقاتلي العربات من عرباتهم؛ ومن فوق خيولهم كانت رؤوس الفرسان تتساقط، مقطوعةً مرة بعد مرة.
Verse 7
निर्मनुष्यांश्न मातज्रान् शयानान् पर्वतोपमान् | अपश्याम महाराज भीष्मास्त्रेण प्रमोहितान्,महाराज! हमने देखा, भीष्मके अस्त्रसे मूर्च्छित हो बहुत-से पर्वताकार गजराज रणभूमिमें पड़े हैं और उनके पास कोई मनुष्य नहीं है
قال سانجيا: أيها الملك، لقد رأينا الفيلة العظام، كأنها جبال، مطروحةً في ساحة القتال، وقد زال ركّابها، وأصابها الإغماء بسلاح بيشما.
Verse 8
न तत्रासीत् पुमान् कश्नित् पाण्डवानां विशाम्पते । अन्यत्र रथिनां श्रेष्ठाद् भीमसेनान्महाबलात्,प्रजानाथ! उस समय वहाँ रथियोंमें श्रेष्ठ महाबली भीमसेनके सिवा पाण्डवपक्षका कोई भी वीर भीष्मके सामने नहीं ठहर सका
قال سانجيا: يا سيد الرعية، في ذلك الحين لم يستطع أحد من رجال الباندافا الثبات أمام بيشما، سوى بهيمسينا العظيم القوة، وهو أبرع مقاتلي العربات.
Verse 9
स हि भीष्म समासाद्य ताडयामास संयुगे | ततो निष्ठानको घोरो भीष्मभीमसमागमे,वे ही युद्धमें भीष्मका सामना करते हुए उनपर अपने बाणोंका प्रहार कर रहे थे। भीष्म और भीमसेनमें युद्ध होते समय सम्पूर्ण सेनाओंमें भयंकर कोलाहल मच गया और पाण्डव हर्षमें भरकर जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे
قال سانجيا: لقد دنا منه في ساحة الوغى وراح يضرب بيشما بسِهامه مرة بعد مرة. ثم لما التقى بيشما وبهيمسينا في قتال ضارٍ، ارتفع في جموع الجيوش كلها صخبٌ مروّع؛ وامتلأ الباندافا ابتهاجًا فأطلقوا زئيرًا عاليًا كزئير الأسود.
Verse 10
बभूव सर्वसैन्यानां घोररूपो भयानक: । तथैव पाण्डवा हृष्टा: सिंहनादमथानदन्,वे ही युद्धमें भीष्मका सामना करते हुए उनपर अपने बाणोंका प्रहार कर रहे थे। भीष्म और भीमसेनमें युद्ध होते समय सम्पूर्ण सेनाओंमें भयंकर कोलाहल मच गया और पाण्डव हर्षमें भरकर जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे
قال سانجيا: قام بين جميع الجيوش صخبٌ رهيبٌ مخيف. وفي الوقت نفسه، امتلأ الباندافا ابتهاجًا فأطلقوا زئيرًا عاليًا كزئير الأسود.
Verse 11
ततो दुर्योधनो राजा सोदर्य: परिवारित: । भीष्म॑ जुगोप समरे वर्तमाने जनक्षये,जिस समय युद्धमें वह जनसंहार हो रहा था, उसी समय राजा दुर्योधन अपने भाइयोंसे घिरा हुआ वहाँ आ पहुँचा और भीष्मकी रक्षा करने लगा
قال سنجيا: ثم إنّ الملك دوريودhana، محاطًا بإخوته الأشقّاء، وصل إلى هناك؛ وبينما كانت المعركة مستعرةً وفيها مذبحة عظيمة للرجال، نهض ليحمي بهيشما. وفي قلب القتل الجماعي ظهرت وفاءُ الملك لقائده وشيخه—فعلٌ امتزج فيه الواجب بالتعلّق وسط فوضى الحرب الأخلاقية.
Verse 12
भीमस्तु सारथिं हत्वा भीष्मस्य रथिनां वर: । प्रद्रुताश्वे रथे तस्मिन् द्रवमाणे समनन््तत:ः,इसी समय रथियोंमें श्रेष्ठ भीमसेनने भीष्मके सारथिको मार डाला। फिर तो उनके घोड़े उस रथको लेकर रणभूमिमें चारों ओर दौड़ लगाने लगे
قال سنجيا: إنّ بهيما، وهو أبرع المقاتلين على العربة، قتل سائق عربة بهيشما. فلما سقط السائق، انفلتت الخيول من السيطرة، وأخذت تجرّ تلك العربة وهي تعدو في ساحة القتال في كل اتجاه.
Verse 13
(चचार युधि राजेन्द्र भीमो भीमपराक्रम: । सुनाभस्तव पुत्रो वै भीमसेनमुपाद्रवत् ।। जघान निशितैर्बाणैर्भीमं विव्याध सप्तभि: । भीमसेन: सुसंक्रुद्ध: शरेण नतपर्वणा ।।) सुनाभस्य शरेणाशु शिरकश्षिच्छेद भारत । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन स हतो न्यपतद् भुवि,राजेन्द्र! भयंकर पराक्रमी भीमसेन युद्धमें सब ओर विचरने लगे। उस समय आपके पुत्र सुनाभने भीमसेनपर धावा किया और उन्हें सात तीखे बाणोंसे बींध डाला। भारत! तब भीमसेनने भी अत्यन्त कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले क्षुरप्र नामक बाणसे शीघ्र ही सुनाभका सिर काट दिया। उस तीखे क्षुरप्रसे मारा जाकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा
قال سنجيا: أيها الملك، كان بهيما ذو البأس المهيب يجول في ساحة القتال. عندئذ اندفع ابنك سونابها نحو بهيماسينا وطعنه بسبعة سهام حادّة. فاستشاط بهيماسينا غضبًا، فقطع رأس سونابها سريعًا بسهم ذي حدّ كحدّ الموسى، شديد الإحكام، ذو عقدة منحنية. وبذلك السهم الرهيب سقط سونابها على الأرض صريعًا.
Verse 14
हते तस्मिन् महाराज तव पुत्रे महारथे । नामृष्यन्त रणे शूरा: सोदरा: सप्त संयुगे,महाराज! आपके उस महारथी पुत्रके मारे जानेपर उसके सात रणवीर भाई, जो वहीं मौजूद थे, भीमसेनका यह अपराध सहन न कर सके
قال سنجيا: أيها الملك، لما قُتل ذلك الفارس العظيم على العربة—ابنك—لم يستطع إخوته الأشقّاء السبعة، وهم أبطال شجعان حاضرون في ساحة القتال، أن يحتملوا الأمر. لم يطيقوا فعل بهيماسينا، واشتعلت فيهم رغبة الانتقام.
Verse 15
आदित्यकेतुर्बह्नाशी कुण्डधारो महोदर: । अपराजित: पण्डितको विशालाक्ष: सुदुर्जय:,आदित्यकेतु, बह्नाशी, कुण्डधार, महोदर, अपराजित, पण्डितक और अत्यन्त दुर्जय वीर विशालाक्ष--ये सातों शत्रुमर्दन भाई विचित्र वेशभूषासे सुसज्जित हो विचित्र कवच और ध्वज धारण किये संग्राम-भूमिमें युद्धकी इच्छासे पाण्डुपुत्र भीमसेनपर टूट पड़े
قال سنجيا: أديتياكيتو، وبهنāشي، وكونḍadhāra، وماهودارا، وأباراجيتا، وبانḍيتاكا، والبطل فيشالاكشا شديد العسر على القهر—هؤلاء الإخوة السبعة ساحقو الأعداء، تزيّنوا بلباس غريب لافت، وحملوا دروعًا ورايات غير مألوفة، ثم اندفعوا إلى ساحة القتال بشهوة الحرب، ليهجموا على بهيماسينا ابن باندو.
Verse 16
पाण्डवं चित्रसंनाहा विचित्रकवचधध्वजा: । अभ्यद्रवन्त संग्रामे योद्धुकामारिमर्दना:,आदित्यकेतु, बह्नाशी, कुण्डधार, महोदर, अपराजित, पण्डितक और अत्यन्त दुर्जय वीर विशालाक्ष--ये सातों शत्रुमर्दन भाई विचित्र वेशभूषासे सुसज्जित हो विचित्र कवच और ध्वज धारण किये संग्राम-भूमिमें युद्धकी इच्छासे पाण्डुपुत्र भीमसेनपर टूट पड़े
قال سنجيا: إن سبعة إخوة—مشهورين بسحق الأعداء—قد تزيّنوا بعدّة قتال لافتة، وحملوا دروعًا ورايات شتّى، فاندفعوا إلى المعركة متعطّشين للقتال. آديتياكيتو، وبهنآشي، وكونددهارا، وماهودارا، وأباراجيتا، وبانديتاكا، ومعهم فيشالاكشا الجسور الذي يعسر قهره—كلّهم في زينةٍ بهيّة، يلبسون دروعًا مميّزة ويرفعون ألويةً خاصة—اجتاحوا ساحة الوغى قاصدين مقاتلة بهيمسينا ابن باندو.
Verse 17
महोदरस्तु समरे भीम॑ विव्याध पत्रिभि: | नवभिर्वज्ञसंकाशैर्नमुचिं वृत्रहा यथा,जैसे वृत्रविनाशक इन्द्रने नमुचि नामक दैत्यपर प्रहार किया था, उसी प्रकार महोदरने समरभूमिमें अपने वज़सरीखे नौ बाणोंसे भीमसेनको घायल कर दिया
قال سنجيا: في غمرة القتال، طعن ماهودارا بهيما بتسعة سهام تلمع كصاعقة فَجْرَةِ إندرا، كما ضرب قاتل فِرِترا من قبلُ العفريت ناموتشي.
Verse 18
आदित्यकेतु: सप्तत्या बह्ॉलाशी चापि पञ्चभि: | नवत्या कुण्डधारश्न विशालाक्षश्न पञ्चभि:,महाराज! आदित्यकेतुने सत्तर, बह्नाशीने पाँच, कुण्डधारने नब्बे, विशालाक्षने पाँच और अपराजितने महारथी महाबली भीमसेनको पराजित करनेके लिये उन्हें बहुत-से बाणोंद्वारा पीड़ित किया
أيها الملك العظيم! رماه آديتياكيتو بسبعين سهمًا، وبهنآشي بخمسة، وكونددهارا بتسعين، وفيشالاكشا بخمسة؛ ثم إن أباراجيتا كذلك آذاه بسهام كثيرة، يريد قهر بهيمسينا، ذلك المَهارَثي الجبار.
Verse 19
अपराजितो महाराज पराजिएष्णुर्महारथम् | शरैर्बहुभिरानर्च्छद् भीमसेन॑ महाबलम्,महाराज! आदित्यकेतुने सत्तर, बह्नाशीने पाँच, कुण्डधारने नब्बे, विशालाक्षने पाँच और अपराजितने महारथी महाबली भीमसेनको पराजित करनेके लिये उन्हें बहुत-से बाणोंद्वारा पीड़ित किया
أيها الملك العظيم! إن أباراجيتا، وهو مَهارَثيّ يتوق إلى إذلال الخصم، أمطر بهيمسينا الجبار بسهام كثيرة، يريد إسقاطه في ساحة القتال.
Verse 20
रणे पण्डितकश्नैनं त्रिभिर्बाणै: समार्पयत् । स तन्न ममृषे भीम: शत्रुभिर्वधमाहवे,पण्डितकने उस युद्धमें तीन बाणोंसे भीमसेनको घायल कर दिया। तब भीम उस रणक्षेत्रमें शत्रुओंद्वारा किये हुए प्रहारको सहन न कर सके
قال سنجيا: في غمرة القتال، أصاب بانديتاكا بهيمسينا بثلاثة سهام. فلم يستطع بهيما أن يحتمل تلك الضربة التي أنزلها به أعداؤه في ساحة الوغى، فاشتعل غضبه.
Verse 21
धनु: प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शन: । शिरक्षिच्छेद समरे शरेणानतपर्वणा
قال سنجيا: ضاغطًا القوس بإحكام بيده اليسرى، ذلك القاهر للأعداء، وفي غمرة القتال، قطع رأس خصمه بسهمٍ مستقيم العُقَد غير منثنٍ—فأبانت الفعلة دقّة الحرب القاسية وعواقبها التي لا رجعة فيها حين يُؤدَّى واجبُ المحارب بلا تردّد.
Verse 22
पराजितस्य भीमेन निपपात शिरो महीम्,भीमसेनसे पराजित हुए अपराजितका मस्तक धरतीपर जा गिरा। तत्पश्चात् भीमसेनने एक-दूसरे भल्ल्लके द्वारा सब लोगोंके देखते-देखते महारथी कुण्डधारको यमराजके लोकमें भेज दिया
قال سنجيا: لما غُلِبَ على يد بهيما سقط رأسُ المهزوم على الأرض. ثم، على مرأى من الجميع، أرسل بهيماسينا بسهمٍ حادٍّ آخر المقاتلَ العظيم على العربة كُṇḍadhāraka إلى مملكة يَما. وتُبرز الآية حسمَ الكارما في ساحة القتال: فالبأسُ والعزمُ يقرّران الحياةَ والموتَ في الحرب، وشهادةُ الناس تجعل النصرَ والسقوطَ سواءً في عدم إمكان إنكارهما.
Verse 23
अथापरेण भल््लेन कुण्डधारं महारथम् | प्राहिणोन्मृत्युलोकाय सर्वलोकस्य पश्यत:,भीमसेनसे पराजित हुए अपराजितका मस्तक धरतीपर जा गिरा। तत्पश्चात् भीमसेनने एक-दूसरे भल्ल्लके द्वारा सब लोगोंके देखते-देखते महारथी कुण्डधारको यमराजके लोकमें भेज दिया
قال سنجيا: ثم بسهمٍ حادٍّ آخر أسقط بهيماسينا كُṇḍadhāra، المقاتلَ العظيم على العربة، وأرسله إلى مملكة الموت على مرأى من العالمين. ويؤكد المشهد أخلاقَ الحرب القاسية في المهابهارتا: فالبأسُ والعزمُ يحكمان بالحياة والموت في القتال، وشهادةُ الناس تُضخِّم المجدَ كما تُضخِّم الثمنَ المأساوي للعنف.
Verse 24
ततः पुनरमेयात्मा प्रसंधाय शिलीमुखम् | प्रेषयामास समरे पण्डितं प्रति भारत,भरतनन्दन! तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न भीमने समरमें पुन: एक बाणका संधान करके उसे पण्डितककी ओर चलाया
قال سنجيا: ثم عاد ذلك المحارب ذو الروح التي لا تُقاس، فركّب سهمًا حادًّا بعناية، وأطلقه في خضمّ المعركة نحو پَṇḍita، يا بهاراتا. وتُبرز الآية استعمال القوة في الحرب استعمالًا مقصودًا مُدرَّبًا—فعلًا يُؤدَّى بسكينة ودقّة لا باندفاع الغضب.
Verse 25
स शर: पण्डितं हत्वा विवेश धरणीतलम् | यथा नरं निहत्याशु भुजग: कालचोदित:,जैसे कालप्रेरित सर्प किसी मनुष्यको शीघ्र ही डँँसकर लापता हो जाता है, उसी प्रकार वह बाण पण्डितककी हत्या करके धरतीमें समा गया
قال سنجيا: بعدما قتل پَṇḍita غاص ذلك السهم في وجه الأرض. وكما أن حيّةً مدفوعةً بالكالَة (الزمن/القدر) تلسع إنسانًا سريعًا ثم تختفي، كذلك السهم—بعد أن أردى پَṇḍita—توارى في التراب، مُثيرًا معنى الحتمية الكئيبة التي تحكم الموت في الحرب.
Verse 26
विशालाक्षशिरश्छित्त्वा पातयामास भूतले । त्रिभि: शरैरदीनात्मा स्मरन् क्लेशं पुरातनम्,उसके बाद उदार हृदयवाले भीमने अपने पूर्व-क्लेशोंका स्मरण करके तीन बाणोंद्वारा विशालाक्षके मस्तकको काटकर धरतीपर गिरा दिया
قال سنجيا: إذ استحضر مشاقَّ الماضي، هوى المحارب الذي لا يلين على فيشالاكشا، فقطع رأسه بثلاثة سهام وألقاه على الأرض. ويُصوَّر هذا الفعل بوصفه عاقبةً قاتمةً لمعاناةٍ قديمة، إذ تُوقد ذكرى الجراح عزماً لا يرحم وسط واجب الحرب وقسوتها.
Verse 27
महोदरं महेष्वासं नाराचेन स्तनान्तरे । विव्याध समरे राजन् स हतो न््यपतद् भुवि,राजन! तत्पश्चात् उन्होंने महाधनुर्धर महोदरकी छातीमें एक नाराचसे प्रहार किया। उससे मारा जाकर वह युद्धमें धरतीपर गिर पड़ा
قال سنجيا: أيها الملك، في غمرة القتال طعن صدر ماهودارا، الرامي العظيم، بسهمٍ من نوع «ناراجا». فصُرِع ماهودارا وسقط على الأرض—مشهدٌ يبرز قسوة خاتمة الحرب المفروضة بالواجب، حيث تنطفئ البراعة والحياة في لحظة.
Verse 28
आदित्यकेतो: केतुं च छित्त्वा बाणेन संयुगे । भल्लेन भृशतीक्ष्णेन शिरश्रिच्छेद भारत,भारत! तदनन्तर भीमने रणक्षेत्रमें एक बाणसे आदित्यकेतुकी ध्वजा काटकर अत्यन्त तीखे भल्लके द्वारा उसका मस्तक भी काट दिया
قال سنجيا: يا بهاراتا، في غمرة القتال قطع بهيما أولاً راية آديتياكيتو بسهمٍ واحد؛ ثم بسهم «بهلّا» حادٍّ كالموسى جزَّ رأسه. وتُبرز الآية حسمَ حرب الكشاتريا القاتم، حيث تُظهر البراعة والعزيمة بأفعالٍ سريعةٍ قاتلة تحت مقتضى الواجب في ساحة الوغى.
Verse 29
बह्बाशिनं ततो भीम: शरेणानतपर्वणा । प्रेषयामास संक़रुद्धो यमस्य सदन प्रति,इसके बाद क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे मारकर बह्लाशीको यमलोक भेज दिया
قال سنجيا: ثم إن بهيما، وقد اشتعل غضباً، ضرب بهفاشين بسهمٍ معقوف العُقَد، وأرسله إلى دار يَما. وفي أخلاق ساحة القتال القاسية المقيدة بالواجب، لا يُعرض الفعل كقسوةٍ شخصية، بل كتنفيذٍ سريعٍ لدور المحارب تحت ناموس الموت الذي لا يُردّ، الحاكم للحرب.
Verse 30
प्रदुद्रुवुस्ततस्ते<न्ये पुत्रास्तव विशाम्पते । मन्यमाना हि तत् सत्यं सभायां तस्य भाषितम्,प्रजानाथ! तब आपके दूसरे पुत्र भीमसेनके द्वारा सभामें की हुई उस प्रतिज्ञाको सत्य मानकर वहाँसे भाग खड़े हुए
قال سنجيا: ثم إن أبناءك الآخرين، يا سيدَ الرعية، فرّوا من هناك، إذ حسبوا صادقاً ما قيل في المجلس. وتُبرز الآية كيف أن نذراً أو تهديداً إذا أُطلق أمام الشهود اكتسب قوةً أخلاقيةً ونفسية، تُلزم حتى ذوي السلطان بالحركة خوفاً من العاقبة.
Verse 31
ततो दुर्योधनो राजा भ्रातृव्यसनकर्शित: । अबवीत् तावकान् योधान् भीमो<यं युधि वध्यताम्,भाइयोंके मरनेसे राजा दुर्योधनको बड़ा कष्ट हुआ। अतः उसने आपके समस्त सैनिकोंको आज्ञा दी कि इस भीमसेनको युद्धमें मार डालो
ثم إنّ الملك دُريودَهَنَة، وقد عذّبه البلاء الذي نزل بإخوته، خاطب محاربيك قائلاً: «هذا بِهيما—فاقتلوه في ساحة القتال».
Verse 32
एवमेते महेष्वासा: पुत्रास्तव विशाम्पते । भ्रातृन् संदृश्य निहतानू प्रास्मरंस्ते हि तद् वच:,प्रजानाथ! इस प्रकार ये आपके महाथनुर्धर पुत्र अपने भाइयोंको मारा गया देख उन बातोंकी याद करने लगे, जिन्हें महाज्ञानी विदुरने कहा था। वे सोचने लगे--दिव्यदर्शी विदुरने हमारे कुशल एवं हितके लिये जो बात कही थी, वह आज सिरपर आ गयी
قال سَنجايا: «هكذا، يا سيّدَ الشعب، إنّ أبناءك—وهم رماةٌ أشدّاء—لمّا رأوا إخوتهم صرعى أخذوا يذكرون تلك الكلمات بعينها. فإنّ مشورةَ الحكيم فيدورا التي قيلت لخيرهم وصلاحهم الحقّ بدت لهم الآن وقد جاءت كعاقبةٍ لا مفرّ منها.»
Verse 33
यदुक्तवान् महाप्राज्ञ: क्षत्ता हितमनामयम् | तदिदं समनुप्राप्तं वचन दिव्यदर्शिन:,प्रजानाथ! इस प्रकार ये आपके महाथनुर्धर पुत्र अपने भाइयोंको मारा गया देख उन बातोंकी याद करने लगे, जिन्हें महाज्ञानी विदुरने कहा था। वे सोचने लगे--दिव्यदर्शी विदुरने हमारे कुशल एवं हितके लिये जो बात कही थी, वह आज सिरपर आ गयी
قال سَنجايا: «لقد نطق فيدورا، حاجبُ القصر شديدُ الحكمة، بكلماتٍ لخيرنا خاليةٍ من الأذى. يا سيّدَ الشعب، ها إنّ قولَ ذلك البصير قد تحقّق الآن.»
Verse 34
लोभमोहसमादविष्ट: पुत्रप्रीत्या जनाधिप । न बुध्यसे पुरा यत् तत् तथ्यमुक्तं वचो महत्,जनेश्वर! आपने अपने पुत्रोंके प्रति प्रेमके कारण लोभ और मोहके वशीभूत हो, विदुरने पहले जो सत्य एवं हितकी महत्त्वपूर्ण बात बतायी थी, उसपर ध्यान नहीं दिया
قال سَنجايا: «يا حاكمَ الرجال، لقد غلب عليك الطمعُ والضلالُ بسبب مودّتك لأبنائك، فلم تُصغِ من قبل إلى تلك المشورة العظيمة الصادقة التي قيلت لخيرك.»
Verse 35
तथैव च वधार्थाय पुत्राणां पाण्डवो बली । नूनं जातो महाबाहुर्यथा हन्ति सम कौरवान्,उनके कथनानुसार ही बलवान पाण्डुपुत्र महाबाहु भीम आपके पुत्रोंके वधका कारण बनते जा रहे हैं और उसी प्रकार वे कौरवोंका सर्वनाश कर रहे हैं
قال سَنجايا: «وكذلك، من أجل قتل أبنائك بعينها، قد نهض الباندَفيُّ القويّ. حقًّا إنّ ذلك البطلَ عظيمَ الساعدين وُلد على نحوٍ يضرب به الكورَڤا جميعًا على السواء، دافعًا إيّاهم إلى الهلاك التامّ.»
Verse 36
ततो दुर्योधनो राजा भीष्ममासाद्य संयुगे । दुःखेन महता5<विष्टो विललाप सुदु:ःखित:,उस समय राजा दुर्योधन युद्धभूमिमें भीष्मके पास जाकर महान् दुःखसे व्याप्त एवं अत्यन्त शोकमग्न होकर विलाप करने लगा--
ثم إنّ الملك دُريودَهَنَةَ دنا من بِهِيشْمَةَ في ساحة القتال، وقد غمره حزنٌ عظيم واشتدّ عليه الكرب، فشرع ينوح ويندب.
Verse 37
निहता भ्रातर: शूरा भीमसेनेन मे युधि | यतमानास्तथान्ये5पि हन्यन्ते सर्वसैनिका:,“पितामह! भीमसेनने युद्धमें मेरे शूरवीर बन्धुओंको मार डाला और दूसरे भी समस्त सैनिक विजयके लिये पूर्ण प्रयत्न करते हुए भी असफल हो उनके हाथसे मारे जा रहे हैं
قال سَنْجَيَا: «يا جدّاه! لقد قَتَلَ بِهِيمَسِينَا إخوتي الأبطال في المعركة. وسائر الجيش كذلك—مع أنهم يبذلون غاية الجهد طلبًا للنصر—فإنهم يُصرَعون على يده.»
Verse 38
भवांश्व॒ मध्यस्थतया नित्यमस्मानुपेक्षते । सो<हं कुपथमारूढ: पश्य दैवमिदं मम,“आप मध्यस्थ बने रहनेके कारण सदा हम-लोगोंकी उपेक्षा करते हैं। मैं बड़े बुरे मार्गपर चढ़ आया। मेरे इस दुर्भाग्यको देखिये"
قال سَنْجَيَا: «إنك ما دمتَ قائمًا على الحياد دائمًا، فإنك تُهمِلُنا على الدوام. وهكذا ركبتُ طريقًا خبيثًا—فانظر إلى هذا المصير الذي آل إليّ.»
Verse 39
एतच्छुत्वा वचः क्रूरं पिता देवव्रतस्तव । दुर्योधनमिदं वाक्यमब्रवीत् साश्रुलोचन:,यह क्रूरतापूर्ण वचन सुनकर आपके ताऊ भीष्म अपने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए वहाँ दुर्योधनसे इस प्रकार बोले--
قال سَنْجَيَا: لما سمع جدّك دِيفَفْرَتَةُ (بِهِيشْمَةُ) تلك الكلمات القاسية الجافية، ودموعه تملأ عينيه، خاطب دُريودَهَنَةَ قائلاً على هذا النحو.
Verse 40
उक्तमेतन्मया पूर्व द्रोणेन विदुरेण च । गान्धार्या च यशस्विन्या तत् त्वं तात न बुद्धवान्,“तात! मैंने, द्रोणाचार्यने, विदुरने तथा यशस्विनी गान्धारी देवीने भी पहले ही यह सब बात कह दी थी, परंतु तुमने इसपर ध्यान नहीं दिया
قال سَنْجَيَا: «لقد قيل هذا كلّه من قبل—مني، ومن دْرُونَا، ومن فِيدُورَا، وكذلك من غَانْدْهَارِي ذات المجد. ولكنك يا بُنيّ لم تأخذه إلى قلبك، ولم تعمل بفهمٍ وحكمة.»
Verse 41
समयश्न मया पूर्व कृतो वै शत्रुकर्शन । नाहं युधि नियोक्तव्यो नाप्याचार्य: कथंचन,'शत्रुसूदन! मैंने पहले ही यह निश्चय प्रकट कर दिया था कि तुम्हें मुझे या द्रोणाचार्यको युद्धमें किसी प्रकार भी नहीं लगाना चाहिये (क्योंकि हमलोगोंका कौरवों तथा पाण्डवोंके प्रति समान स्नेह है)
قال سَنْجَايَا: «يا قاهرَ الأعداء، لقد أعلنتُ هذا العزمَ من قبل: لا ينبغي أن أُكلَّف بالقتال في هذه الحرب، ولا أن يُستَخدم المُعلِّم (دْرُونَا) بأي وجهٍ كان. فأساسُ الدَّرْمَا واضحٌ—مَن يحملُ مودةً متساويةً للطرفين لا يجوز أن يُكرَه على عنفٍ حزبيٍّ منحاز.»
Verse 42
य॑ य॑ हि धार्तराष्ट्राणां भीमो द्रक्ष्यति संयुगे । हनिष्यति रणे नित्यं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते,“मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ कि भीमसेन धृतराष्ट्रके पुत्रोमेंसे जिस-जिसको युद्धमें (अपने सामने आया हुआ) देख लेंगे, उसे प्रतिदिनके संग्राममें अवश्य मार डालेंगे
إني أقول لك الحق: في ساحة القتال، أيُّ واحدٍ من أبناءِ دْهْرِتَرَاشْتْرَا يراهُ بِهِيمَسِينَا في المعمعة، فسيقتله لا محالة، يومًا بعد يومٍ في الحرب.
Verse 43
स त्वं राजन् स्थिरो भूत्वा रणे कृत्वा दृढां मतिम् । योधयस्व रणे पार्थान् स्वर्ग कृत्वा परायणम्
لذلك، أيها الملك، اثبتْ ولا تَضْطَرِب. وفي هذه المعركة اجعل عزمك صلبًا لا يتزعزع، وقاتِل أبناءَ پْرِثَا. واجعل السماء غايتك وملاذك الأخير—وامضِ بقصدٍ ثابتٍ دون تردد.
Verse 44
“अतः राजन! तुम स्थिर होकर युद्धके विषयमें अपना दृढ़ निश्चय बना लो और स्वर्गको ही अन्तिम आश्रय मानकर रणभूमिमें पाण्डवोंके साथ युद्ध करो ।। न शक्या: पाण्डवा जेतु सेन्द्रैरपि सुरासुरै: । तस्माद् युद्धे स्थिरां कृत्वा मतिं युद्धयस्व भारत,'भारत! इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी पाण्डवोंको जीत नहीं सकते। अतः युद्धके लिये पहले अपनी बुद्धिको स्थिर कर लो। उसके बाद युद्ध करो”
لذلك، أيها الملك، ثبّتْ نفسك واصنعْ عزمًا لا يتزعزع بشأن الحرب. واجعل السماء ملاذك الأخير، وقاتِل الباندافا في ساحة الوغى. إن الباندافا لا يُغلَبون—ولو اجتمعت الآلهةُ والأسورا جميعًا، وعلى رأسهم إندرا، لما قدروا على قهرهم. فلهذا، يا سليلَ بهاراتا، ثبّتْ عقلك أولًا للقتال، ثم ادخل الحرب.
Verse 88
इति श्रीमहा भारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सुनाभादिधृतराष्ट्रपुत्रवधे अष्टाशीतितमो<ध्याय:
وهكذا، في «المهابهاراتا» الموقَّرة، ضمن «قسم بهيشما»—وخاصةً في الجزء المتعلّق بمقتل بهيشما—تنتهي الفصولُ الثمانيةُ والثمانون، واصفةً مقتلَ سونابها وغيرِه من أبناءِ دْهْرِتَرَاشْتْرَا. وهذه الخاتمةُ (الكولوفون) تُعلن إغلاقَ وحدةٍ سرديةٍ تُبرز ثِقَلَ الدَّرْمَا في الحرب، من خلال سقوطِ ورثةِ المُلك، وسيرِ القدرِ الذي لا يُردّ في ميدان القتال.
Verse 213
अपराजितस्य सुनसं तव पुत्रस्य संयुगे । उन शत्रुसूदन वीरने बायें हाथसे धनुषको अच्छी तरह दबाकर झुकी हुई गाँठवाले बाणसे समरभूमिमें आपके पुत्र अपराजितका सुन्दर नासिकासे युक्त मस्तक काट डाला
قال سنجيا: في غمرة القتال، شدَّ ذلك البطلُ قاهرُ الأعداء قوسَه بإحكام بيده اليسرى، ثم بسهمٍ ذي شُوكةٍ معقوفة قطع في ساحة الحرب رأسَ ابنِك أباراجيتا، الرأسَ الحسنَ ذي الأنفِ الجميل. ويُبرز هذا المشهدُ حسمَ قتالِ الكشاتريا القاسي، حيث تُعرَض الشجاعةُ والمهارةُ حتى والروحُ تُزهَق في لمح البصر.
The tension lies between a ruler’s impulse for immediate retaliation and the disciplined requirement of rāja-dharma: Bhīṣma frames the king’s body and continuity of rule as strategic goods, urging action governed by legitimacy and prudence rather than by wounded honor alone.
Leadership should convert battlefield emotion into policy: preserve command continuity, rely on coordinated senior capability, and pursue objectives through role-appropriate conduct—so that tactical choices remain accountable to governance ethics.
No explicit phalaśruti is presented in the supplied passage; the chapter functions primarily as operational narration and ethical counsel embedded in dialogue, contributing interpretive guidance through Bhīṣma’s advisory statements rather than through a formal benedictory colophon.