Adhyaya 52
Shalya ParvaAdhyaya 5238 Verses

Adhyaya 52

Kurukṣetra–Samantapañcaka Māhātmya: King Kuru’s Ploughing and Indra’s Boon (प्रजापतेरुत्तरवेदिः समन्तपञ्चकं)

Upa-parva: Samantapañcaka–Kurukṣetra Māhātmya (Prajāpater Uttaravedi)

The sages describe Samantapañcaka as the ancient ‘uttara-vedi’ of Prajāpati where the gods once assembled for a great sacrificial session. They recount how the region came to be famed as Kurukṣetra because the royal seer Kuru, through prolonged and intense effort, ‘cultivated/ploughed’ (kṛṣ-) the land, making it exceptionally sanctified. Balarāma (Rāma/Halāyudha) asks why Kuru undertook this labor. The sages narrate Indra’s repeated visits: he questions Kuru’s purpose, mocks and departs, yet Kuru persists in ascetic ploughing. When Indra realizes Kuru’s resolve, he consults the gods, who express concern that automatic ascent to heaven for those dying there would reduce their share of sacrificial offerings. Indra returns and offers a regulated boon: those who die in Kurukṣetra—through fasting, in properly conducted battle, and even those who meet death in other embodied states—will attain heavenly worlds. Indra departs satisfied. The sages add an Indra-gāthā stating that even dust from Kurukṣetra, carried by wind, can elevate even those of evil deeds. They cite exemplary figures and define the kṣetra’s boundaries between named tīrthas and lakes, concluding that slain rulers there attain the ‘path of the great-souled.’

Chapter Arc: जनमेजय वैषम्पायन से पूछता है—वह ‘वृद्ध कन्या’ कौन थी, किस प्रकार उसने असाध्य तप किया, और कैसे उसका विवाह शृंगवान से होकर स्वर्गगमन तथा उस तीर्थ का माहात्म्य प्रसिद्ध हुआ। → वैषम्पायन एक महावीर्य ऋषि (कुणिर्ग्ग/कुणिर्ग) की कथा से सूत्र पकड़ते हैं और बताते हैं कि कैसे वह कन्या कठोर उपवासों, पितृ-देव-पूजन और दीर्घ ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थिर रही। तप की पराकाष्ठा के साथ एक आंतरिक संकट उभरता है—देहत्याग की इच्छा और यह प्रश्न कि केवल तप से ‘लोक-विजय’ (संपूर्ण सिद्धि/फल) कैसे प्राप्त हो। → देवर्षि नारद प्रकट होकर उसे रोकते हैं—‘तुम्हारा तप परम है, पर लोक अभी नहीं जीते’—और समाधान बताते हैं: तप का अर्ध भाग पाणिग्रहण करने वाले को देने का संकल्प। कन्या ऋषि-सभा में घोषणा करती है कि जो भी उसका पाणिग्रहण करेगा, उसे वह अपने तप का अर्ध प्रदान करेगी; तब गालव-पुत्र शृंगवान सबसे पहले उसका वरण करता है और विवाह का निर्णायक क्षण घटित होता है। → कन्या ब्रह्मर्षि के साथ किए गए ‘समय’ (शर्त/प्रतिज्ञा) की पूर्ति का स्मरण कर विदा लेती है और बताती है कि नियत ब्रह्मचर्य-वर्षों का फल क्या है। विवाह, तप-वितरण और नियम-पालन के पुण्य से उसे शुभ स्वर्गगति प्राप्त होती है; साथ ही उस स्थान/तीर्थ का माहात्म्य स्थापित होता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-आक्रात बछ। चर: द्विपञज्चाशत्तमो<ड ध्याय: वृद्ध कन्याका चरित्र, शृंगवानके साथ उसका विवाह और स्वर्गगमन तथा उस तीर्थका माहात्म्य जनमेजय उवाच कथं कुमारी भगवंस्तपोयुक्ता हाभूत्‌ पुरा । किमर्थ च तपस्तेपे को वास्या नियमो5भवत्‌,जनमेजयने पूछा--भगवन्‌! पूर्वकालमें वह कुमारी तपस्यामें क्यों संलग्न हुई? उसने किसलिये तपस्या की और उसका कौन-सा नियम था?

阇那美阇耶问道:“尊者啊,往昔那位少女如何会投身苦行?她为何而行苦行,又遵守何等戒律与规制?”

Verse 2

सुदुष्करमिदं ब्रद्म॑ंस्त्वत्त: श्रुतमनुत्तमम्‌ । आखायाहि तत्त्वमखिलं यथा तपसि सा स्थिता,ब्रह्म! मैंने आपके मुखसे यह अत्यन्त उत्तम तथा परम दुष्कर तपकी बात सुनी है। आप सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बताइये; वह कन्या क्‍यों तपस्यामें प्रवृत्त हुई थी?

阇那美阇耶说道:“噢,婆罗门啊!我已从你处听闻这至为殊胜的叙述——然而其中所涉,乃是极其难行的苦行(tapas)。请你将全部真相详尽道来:那位少女如何得以安住于如此的苦行之中?她又因何缘故而发起此行?”

Verse 3

वैशम्पायन उवाच ऋषिरासीन्महावीर्य: कुणिर्ग्गों महायशा: । स तप्त्वा विपुलं राज॑ंस्तपो वै तपतां वरः

毗舍婆耶那说道:“从前有一位大有威力的仙人,名叫俱尼(Kuṇi),声名远播。大王啊,他为苦行者之最胜,曾修行并圆满成就广大而艰苦的苦行。”

Verse 4

मनसाथ सुतां सुभ्रं समुत्पादितवान्‌ विभु: । वैशम्पायनजीने कहा--राजन्‌! प्राचीन कालमें एक महान्‌ शक्तिशाली और महायशस्वी कुणिर्गग नामक ऋषि रहते थे। तपस्या करनेवालोंमें श्रेष्ठ उन महर्षिने बड़ा भारी तप करके अपने मनसे एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न की ।। तां च दृष्टवा मुनि: प्रीत: कुणिर्ग्गो महायशा:

毗舍婆耶那说道:“大王啊,古时有一位大圣者,名俱尼尔伽(Kuṇirgga),灵力雄浑,声名显赫。作为苦行者中最胜者,他修行严峻的苦行,并以心念之力生出一位光辉美丽的女儿。见到她时,这位名闻遐迩的俱尼尔伽满心欢喜。”

Verse 5

सुभ्रू: सा हाथ कल्याणी पुण्डरीकनिभेक्षणा,तदनन्तर कमलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी सती साध्वी सुन्दरी कन्या पूर्वकालमें अपने लिये आश्रम बनाकर बड़ी कठोर तपस्या तथा उपवासके साथ-साथ देवताओं और पितरोंका पूजन करती हुई वहाँ रहने लगी

毗舍婆耶那说道:“那位吉祥的少女名为苏婆卢(Subhrū),双眸如白莲。其后,她端正贤善、福德具足,于往昔为自己建立一处林居道场(āśrama)。她住在那里,行严峻苦行并持斋禁食,且不断祭奉诸天与祖灵(pitṛ)。 ”

Verse 6

महता तपसोग्रेण कृत्वा55श्रममनिन्दिता । उपवासै: पूजयन्ती पितृन्‌ देवांश्ष सा पुरा,तदनन्तर कमलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी सती साध्वी सुन्दरी कन्या पूर्वकालमें अपने लिये आश्रम बनाकर बड़ी कठोर तपस्या तथा उपवासके साथ-साथ देवताओं और पितरोंका पूजन करती हुई वहाँ रहने लगी

毗舍婆耶那说道:“往昔,那位无可指摘、具足吉祥之德的少女,以极其严峻的苦行自励,承受巨大劳苦而不退。她以斋戒禁食祭奉祖灵与诸天,如此以坚定的自制而生活。”

Verse 7

तस्यास्तु तपसोग्रेण महान्‌ कालोअत्यगान्नूप । सा पित्रा दीयमानापि तत्र नैच्छदनिन्दिता

然而由于她苦行之力极其炽烈,王啊,漫长的岁月就这样流逝了。纵使父亲欲将她许配于人,那无瑕的少女也不肯应允。

Verse 8

आत्मन: सदृशं सा तु भर्तारें नान्वपश्यत । राजन! उग्र तपस्या करते हुए उसका बहुत समय व्यतीत हो गया। पिताने अपने जीवनकालमें उसका किसीके साथ ब्याह कर देनेका प्रयत्न किया; परंतु उस अनिन्‍्द्य सुन्दरीने विवाहकी इच्छा नहीं की। उसे अपने योग्य कोई वर ही नहीं दिखायी देता था ।। ७ न! ततः सा तपसोग्रेण पीडयित्वा55त्मनस्तनुम्‌

毗湿摩波耶那说:她找不到与自己相称的夫君。大王啊,她行持严酷苦行之时,漫长岁月已然流逝。其父在世之日,曾设法为她择配;然而那无瑕的美人并无婚嫁之愿,诸多求婚者在她眼中皆不配。于是,她以苦行之力折磨自身之躯。

Verse 9

सा55त्मानं मन्यमानापि कृतकृत्यं श्रमान्विता

虽自以为所求已成,她仍疲惫不堪,困顿于劳乏之重。

Verse 10

सा नाशकद्‌ यदा गन्तुं पदात्‌ पदमपि स्वयम्‌

毗湿摩波耶那说:当她连凭自身之力迈出一步都不能再前行时,她的无助便昭然可见。

Verse 11

मोक्तुकामां तु तां दृष्टवा शरीरं नारदो<ब्रवीत्‌,तप: परमकं प्राप्तं न तु लोकास्त्वया जिता: । उसकी देहत्यागकी इच्छा देख देवर्षि नारदने उससे कहा--“महान्‌ व्रतका पालन करनेवाली निष्पाप नारी! तुम्हारा तो अभी विवाह-संस्कार भी नहीं हुआ, तुम तो अभी कन्या हो। फिर तुम्हें पुण्यलोक कैसे प्राप्त हो सकते हैं? तुम्हारे सम्बन्धमें ऐसी बात मैंने देवलोकमें सुनी है। तुमने तपस्या तो बहुत बड़ी की है; परंतु पुण्य-लोकोंपर अधिकार नहीं प्राप्त किया है”

毗湿摩波耶那说:见那女子欲舍其身,圣仙那罗陀对她说道:“你确已成就至高苦行;然而凭功德可得之诸天界,你尚未赢取。”

Verse 12

असंस्कृताया: कन्याया: कुतो लोकास्तवानघे । एवं तु श्रुतमस्माभिदेंवलोके महाव्रते

毗舍婆耶那说道:“无罪者啊,未受入门净礼(saṃskāra)的少女,怎能获得诸天之界?然而,我们确曾在天界之中听闻此事,伟誓者啊。”

Verse 13

तन्नारदवच: श्रुत्वा साब्रवीदृषिसंसदि

听罢那罗陀之言,他便在诸仙贤的集会中开口说道。

Verse 14

इत्युक्ते चास्या जग्राह पार्णिं गालवसम्भव:,यद्येकरात्र॑ वस्तव्यं त्वया सह मयेति ह । उसके ऐसा कहनेपर सबसे पहले गालवके पुत्र शृंगवान्‌ ऋषिने उसका पाणिग्रहण करनेकी इच्छा प्रकट की और सबसे पहले उसके सामने यह शर्त रखी--'शोभने! मैं एक शर्तके साथ आज तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा। विवाहके बाद तुम्हें एक रात मेरे साथ रहना होगा। यदि यह स्वीकार हो तो मैं तैयार हूँ”

毗舍婆耶那说道:她既如此言毕,伽罗婆之子便立刻表明愿执其手而成婚,却先提出条件:“美丽的女子啊,若你肯与我同住一夜,我便娶你为妻。”

Verse 15

ऋषि: प्राक्‌ शुद्रवान्नाम समयं चेममत्रवीत्‌ । समयेन तवाद्याहं पार्णिं स्प्रक्ष्यामि शोभने

毗舍婆耶那说道:“从前有一位名为输陀罗梵(Śudravān)的仙人,曾在此宣示这同一约定。凭此盟约之力,美丽的女子啊,今日我将触及你的手。”

Verse 16

तथेति सा प्रतिश्रुत्य तस्मै पार्णिं ददौ तदा,तब “बहुत अच्छा” कहकर उसने मुनिके हाथमें अपना हाथ दे दिया। फिर गालवपुत्रने शास्त्रोक्त रीतिसे विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके उसका पाणिग्रहण और विवाह-संस्कार किया

她说道:“如是。”便以允诺之意将手交与他。于是伽罗婆之子依照《沙斯特罗》(śāstra)的戒律,向圣火献供,圆满完成执手之礼与婚姻仪式。

Verse 17

यथादृष्टेन विधिना हुत्वा चाग्निं विधानत: । चक्रे च पाणिग्रहणं तस्योद्वाहं च गालवि:,तब “बहुत अच्छा” कहकर उसने मुनिके हाथमें अपना हाथ दे दिया। फिर गालवपुत्रने शास्त्रोक्त रीतिसे विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके उसका पाणिग्रहण और विवाह-संस्कार किया

毗湿摩波耶那说道:他依照所规定、亦为古来所遵行的仪轨,将供物投入圣火;随后迦罗婆如法举行执手礼(pāṇigrahaṇa),并圆满完成她的婚礼仪式。此段强调遵循《圣典》(śāstra)程序的伦理分量——个人的结合唯有在正确的祭仪秩序中,方为法(dharma)所认可并加以护持。

Verse 18

सा रात्रावभवद्‌ राजं॑स्तरुणी वरवर्णिनी । दिव्याभरणवत्त्रा च दिव्यगन्धानुलेपना,राजन! रात्रिमें वह दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और दिव्य गन्धयुक्त अंगरागसे अलंकृत परम सुन्दरी तरुणी हो गयी

毗湿摩波耶那说道:“大王啊,夜间她化作一位青春妙龄的少女,肤色绝美;身披天衣,佩戴天界珠宝,又以芬芳的神圣香膏涂抹其身。”

Verse 19

तां दृष्टवा गालवि: प्रीतो दीपयन्तीमिव श्रिया । उवास च क्षपामेकां प्रभाते साब्रवीच्च तम्‌,उसे अपनी कान्तिसे सब ओर प्रकाश फैलाती देख गालवकुमार बड़े प्रसन्न हुए और उसके साथ एक रात निवास किया। सबेरा होते ही वह मुनिसे बोली--

毗湿摩波耶那说道:见她光辉灿然,仿佛以自身的吉祥之辉照亮四方,迦罗婆心生大喜。他与她同住一夜;及至黎明,她便对那位仙人开口。此段指出:外在的美与瑞相足以引发眷恋与欢悦,从而为叙事中随后出现的伦理抉择铺陈伏笔。

Verse 20

यस्त्वया समयो विप्र कृतो मे तपतां वर । तेनोषितास्मि भद्ठं ते स्वस्ति ते5स्तु व्रजाम्यहम्‌,“तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्ष] आपने जो शर्त की थी, उसके अनुसार मैं आपके साथ रह चुकी। आपका मंगल हो, कल्याण हो। अब आज्ञा दीजिये, मैं जाती हूँ”

毗湿摩波耶那说道:“婆罗门啊,苦行者中之最胜者,你为我所立之约已然履行;我已依其条件与你同住。愿吉祥随护于你,愿你安泰。如今请准我告退——我将离去。”

Verse 21

सा निर्गताब्रवीद्‌ भूयो यो5स्मिंस्तीर्थे समाहित: । वसते रजनीमेकां तर्पयित्वा दिवौकस:,यों कहकर वह वहाँसे चल दी। जाते-जाते उसने फिर कहा--'जो अपने चित्तको एकाग्र कर इस तीर्थमें स्नान और देवताओंका तर्पण करके एक रात निवास करेगा, उसे अद्बवावन वर्षोतक विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य पालन करनेका फल प्राप्त होगा”

毗湿摩波耶那说道:她离去时又说道:“凡能摄心专注者,于此圣渡口沐浴行仪,并向诸天作供水礼(tarpana)之后,在此住一夜,所得功德等同于如法守持梵行(brahmacarya)五十二年。”

Verse 22

चत्वारिंशतमष्टौ च द्वौ चाष्टौ सम्यगाचरेत्‌ । यो ब्रह्मचर्य वर्षाणि फलं तस्य लभेत स:,यों कहकर वह वहाँसे चल दी। जाते-जाते उसने फिर कहा--'जो अपने चित्तको एकाग्र कर इस तीर्थमें स्नान और देवताओंका तर्पण करके एक रात निवास करेगा, उसे अद्बवावन वर्षोतक विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य पालन करनेका फल प्राप्त होगा”

毗湿摩波耶那说:“凡能如法修行此行持者,其功德等同于修持梵行(brahmacarya)四十八年,又加十六年;他将获得此誓愿之果。”在此语境中,此言旨在称颂此圣地(tīrtha)的神圣:若能摄心专注,于彼处沐浴,向诸天行奠水供养(tarpana),并留宿一夜,所得福德便等同于依规严持多年梵行之功。

Verse 23

एवमुक्त्वा ततः साध्वी देहं त्यक्त्वा दिवं गता । ऋषिरप्यभवद्‌ दीनस्तस्या रूप॑ विचिन्तयन्‌,ऐसा कहकर वह साध्वी तपस्विनी देह त्यागकर स्वर्गलोकमें चली गयी और मुनि उसके दिव्यरूपका चिन्तन करते हुए बहुत दुःखी हो गये

说罢,那位贤善的苦行女舍弃其身,升往天界。圣仙亦为之黯然,长久凝想她光辉灿然的形貌——显明即便眼前已有分明的灵性成就,执著与悲恸仍可能不息。

Verse 24

समयेन तपोडर्ध च कृच्छात्‌ प्रतिगृहीतवान्‌ | साधयित्वा तदा5>त्मानं तस्या: स गतिमन्वियात्‌

毗湿摩波耶那说:到了适当的时候,他也唯有在艰难之中,才接受了本应得之苦行功德(tapas)的一半。其后,他调伏自心、成就自身,遂循她之道而行——证得与她同一归趣。此段强调:灵性功德并非可轻易攫取;它须依时而受、凭勤而得,真正的成就在于内在自制,而非徒然索取。

Verse 25

दुःखितो भरतश्रेष्ठ तस्या रूपबलात्कृत: । उन्होंने शर्तके अनुसार उसकी तपस्याका आधा भाग बड़े कष्टसे स्वीकार किया। फिर वे भी अपने शरीरका परित्याग करके उसीके पथपर चले गये। भरतश्रेष्ठ) वे उसके रूपपर बलात्‌ आकृष्ट होकर अत्यन्त दुःखी हो गये थे ।। एतत्ते वृद्धकन्याया व्याख्यातं चरितं महत्‌

毗湿摩波耶那说:婆罗多族中最卓越者啊,他因她美貌之力而如被强夺般牵制,遂深陷哀恸。至此,我已为你阐明那位老处女的伟大生平。

Verse 26

तथैव ब्रह्मचर्य च स्वर्गस्थ च गति: शुभा | यह मैंने तुमसे वृद्ध कन्याके महान्‌ चरित्र, ब्रह्मचर्य-पालन तथा स्वर्गलोककी प्राप्तिरूप सदगतिका वर्णन किया ।। तत्रस्थश्लापि शुश्राव हतं शल्यं हलायुध:,वहीं रहकर शत्रुओंको संताप देनेवाले बलरामजीने शल्यके मारे जानेका समाचार सुना था। वहाँ भी मधुवंशी बलरामने ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दे समन्तपंचक द्वारसे निकलकर ऋषियोंसे कुरुक्षेत्रके सेवनका फल पूछा

毗湿摩波耶那说:“如此,我已为你叙述那位老处女的伟大事迹——她坚守梵行(brahmacarya),并以升天为吉祥而蒙福的归宿。就在他仍在彼处之时,持犁者哈拉尤陀(婆罗罗摩,Balarāma)也听闻了‘沙利耶(Śalya)已被诛杀’的消息。”

Verse 27

तत्रापि दत्त्वा दानानि द्विजातिभ्य: परंतप: । शुश्राव शल्यं संग्रामे निहतं पाण्डवैस्तदा,वहीं रहकर शत्रुओंको संताप देनेवाले बलरामजीने शल्यके मारे जानेका समाचार सुना था। वहाँ भी मधुवंशी बलरामने ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दे समन्तपंचक द्वारसे निकलकर ऋषियोंसे कुरुक्षेत्रके सेवनका फल पूछा

在那里,他也在向“二生者”(dvija)施与布施之后,听闻了消息:沙利耶(Śalya)已在战阵中为般度族(Pāṇḍava)所诛。此颂凸显史诗的伦理框架:纵在战争噩耗之间,守义之人仍敬奉婆罗门,履行施舍之责,将布施与对神圣秩序的尊重视为达摩(dharma)人生不可分割的一部分。

Verse 28

समन्तपज्चकद्धारात्‌ ततो निष्क्रम्प माधव: । पप्रच्छर्षिगणान्‌ राम: कुरुक्षेत्रस्य यत्‌ फलम्‌,वहीं रहकर शत्रुओंको संताप देनेवाले बलरामजीने शल्यके मारे जानेका समाचार सुना था। वहाँ भी मधुवंशी बलरामने ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दे समन्तपंचक द्वारसे निकलकर ऋषियोंसे कुरुक्षेत्रके सेवनका फल पूछा

毗湿摩波衍那说:随后,摩陀婆(婆罗罗摩)由萨曼塔潘恰迦之门而出。罗摩向聚集的诸仙询问:依止俱卢之野(Kurukṣetra)可得何等灵性之果——即便四周尽是战争与死亡的消息,他仍欲明了那片圣地的功德。

Verse 29

ते पृष्टा यदु्सिहेन कुरुक्षेत्रफलं विभो । समाचख्यपुर्महात्मानस्तस्मै सर्व यथातथम्‌,प्रभो! उस यदुसिंहके द्वारा कुरुक्षेत्रके फलके विषयमें पूछे जानेपर वहाँ रहनेवाले महात्माओंने उन्हें सब कुछ यथावत्‌ रूपसे बताया

当那位“夜度族之狮”询问俱卢之野的功德之果时,居于彼处的诸位大德仙人便如实无隐地将一切告知于他。此段强调神圣知识的忠实传承:以恭敬求问者,智者必以真实而完备的教诲,说明圣地之功德与正行之利益。

Verse 43

जगाम त्रिदिवं राजन्‌ संत्यज्येह कलेवरम्‌ । नरेश्वरर उसे देखकर महायशस्वी मुनि कुणिर्गर्ग बड़े प्रसन्न हुए और कुछ कालके पश्चात्‌ अपना यह शरीर छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये

毗湿摩波衍那说:“大王啊,他在此舍弃了这具形骸,便往三十三天(Tridiva,天界)而去。”叙事强调传统理想:一生功业圆满——尤其在尽了本分之后——便能安然舍身,上升至更高的境界。

Verse 51

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑नें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ

至此,《摩诃婆罗多》沙利耶篇(Śalya Parva)之中,关于“棍棒”一段、置于婆罗提婆(Baladeva)朝圣行旅背景下的“萨拉斯瓦塔传”(Sārasvata 事迹)第五十一章告终。此结语公式标示该叙事单元的完成,并将其纳入更宏阔的伦理与仪式图景:朝圣与圣传之学与战争之暴烈并置,相辅相成,共同维系达摩。

Verse 52

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने द्विपज्चाशत्तमोडध्याय:

至此,《圣摩诃婆罗多》之《沙利耶篇》(Śalya Parva)中第五十二章告终——此章隶属“伽陀篇”(Gadā-parvan,论杵/钺槌之段),载于婆罗提婆(Baladeva)巡礼诸圣渡(tīrtha)之行,尤以名为“娑罗湿伐多传”(Sārasvata 叙事)者为其要。此结语(colophon)为章回之正式封缄,将教诲安置于圣地巡礼的框架之中,强调净化、追念圣境,以及由典范故事所承载并传续之传统伦理分量。

Verse 83

पितृदेवार्चनरता बभूव विजने वने | तब वह उग्र तपस्याके द्वारा अपने शरीरको पीड़ा देकर निर्जन वनमें पितरों तथा देवताओंके पूजनमें तत्पर हो गयी

毗舍波耶那言:在荒寂无人的密林中,她专心礼敬祖灵(Pitṛ)与诸天神祇,行极严峻之苦行,甘受身躯之劳苦与痛楚,以为虔敬之供养,亦为赎罪之修持。

Verse 93

वार्थकेन च राजेन्द्र तपसा चैव कर्शिता । राजेन्द्र! परिश्रमसे थक जानेपर भी वह अपने-आपको कृतार्थ मानती रही। धीरे-धीरे बुढ़ापा और तपस्याने उसे दुर्बल बना दिया

毗舍波耶那言:“大王啊,她既为年岁渐长所耗,又为苦行所损。纵使因不息的勤苦而疲惫,她仍自以为功行圆满;久而久之,老迈与修行之严峻,使其形体日渐羸弱。”

Verse 106

चकार गमने बुद्धिं परलोकाय वै तदा । जब वह स्वयं एक पग भी चलनेमें असमर्थ हो गयी, तब उसने परलोकमें जानेका विचार किया

其后,她连一步也不能自移,便决意趋往来世——将心念从肉身的挣扎中转开,指向超越此生的最后渡越。

Verse 123

तप: परमकं प्राप्तं न तु लोकास्त्वया जिता: । उसकी देहत्यागकी इच्छा देख देवर्षि नारदने उससे कहा--“महान्‌ व्रतका पालन करनेवाली निष्पाप नारी! तुम्हारा तो अभी विवाह-संस्कार भी नहीं हुआ, तुम तो अभी कन्या हो। फिर तुम्हें पुण्यलोक कैसे प्राप्त हो सकते हैं? तुम्हारे सम्बन्धमें ऐसी बात मैंने देवलोकमें सुनी है। तुमने तपस्या तो बहुत बड़ी की है; परंतु पुण्य-लोकोंपर अधिकार नहीं प्राप्त किया है”

毗舍波耶那言:“汝诚已得至上苦行,然未因此而赢得诸天界。”见她欲舍此身,天仙圣者那罗陀告之曰:“无罪之女,坚住大誓者!汝之婚姻仪轨尚未举行——汝仍为处女。既如此,何以得至福德之界?关于汝,我在天界曾闻此言:汝虽修行广大之塔帕斯(tapas),却未获得进入吉祥诸界之资格与权分。”

Verse 153

यद्येकरात्र॑ वस्तव्यं त्वया सह मयेति ह । उसके ऐसा कहनेपर सबसे पहले गालवके पुत्र शृंगवान्‌ ऋषिने उसका पाणिग्रहण करनेकी इच्छा प्रकट की और सबसे पहले उसके सामने यह शर्त रखी--'शोभने! मैं एक शर्तके साथ आज तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा। विवाहके बाद तुम्हें एक रात मेरे साथ रहना होगा। यदि यह स्वीकार हो तो मैं तैयार हूँ”

毗湿摩波耶那说道:“若你只须与我同住一夜……”他如此言道。她既如此表明,伽罗婆之子、仙人室利伽梵最先起意欲执其手而成婚,亦最先当面提出条件:“美丽的女子啊,我今日愿受汝手,但有一约:婚礼之后,汝须与我同宿一夜。若汝允诺,我便应承。”

Verse 1363

तपसोडर्ध प्रयच्छामि पाणिग्राहस्य सत्तम । नारदजीकी यह बात सुनकर वह ऋषियोंकी सभामें उपस्थित होकर बोली --'साधुशिरोमणे! आपमें-से जो कोई मेरा पाणिग्रहण करेगा, उसे मैं अपनी तपस्याका आधा भाग दे दूँगी”

毗湿摩波耶那说道:“我将把自己苦行所得功德的一半,赐予那位最贤善、愿执我手而成婚之人。”闻此言,那罗陀之女步入仙人集会,宣告道:“诸德之冠冕啊!你们之中谁若受我之手,我便将我苦行之果的一半赠与他。”

Frequently Asked Questions

A tension arises between universal access to merit (automatic heavenly destiny for those dying in the kṣetra) and the gods’ concern for ritual reciprocity (their ‘share’ through sacrifices), prompting a negotiated settlement that preserves both sacral benefit and cosmic order.

Disciplined action sustained over time (tapas) can transform both the agent and the world, but outcomes are framed within an ordered moral economy where merit, intention, and institutionalized norms (boons, rites, boundaries) mediate spiritual claims.

Yes. The chapter embeds a functional phala-claim via Indra’s boon and gāthā: death within Kurukṣetra is declared conducive to svarga/sugati, and even contact with the region’s dust is said to elevate destiny—serving as a sacral authorization of the site’s salvific reputation.