Adhyaya 48
Shalya ParvaAdhyaya 4881 Verses

Adhyaya 48

Indratīrtha–Ādityatīrtha: Balarāma’s Ritual Bathing, Dāna, and Sacred-Historical Recollections

Upa-parva: Tīrtha-yātrā (Pilgrimage Catalogue) Episode — Indratīrtha to Ādityatīrtha (Sarasvatī bank)

Vaiśaṃpāyana reports that Balarāma, described as the foremost among the Yādavas, goes first to Indratīrtha, bathes according to prescribed procedure, and distributes wealth and jewels to brāhmaṇas. The chapter supplies an etiological account: Indra is said to have performed or completed a large cycle of sacrifices there, giving abundant wealth to Bṛhaspati; hence the ford’s enduring name and its characterization as a remover of sin. Balarāma then proceeds to Rāmatīrtha, associated with Bhārgava Rāma (Paraśurāma), who performed major sacrifices (including Vājapeya and many Aśvamedhas) under Kaśyapa’s priestly guidance and gave the earth as dakṣiṇā. Next, Balarāma reaches Yamunātīrtha, where Varuṇa is connected with a Rājasūya and a consequential cosmic-scale conflict narrative. Finally, he goes to Ādityatīrtha on the Sarasvatī, where Sūrya attains lordship among luminaries; the text lists a dense assembly of deities, semi-divine beings, and yogic sages. The chapter closes with exemplary precedents: Viṣṇu’s slaying of Madhu and Kaiṭabha and the attainment of high yogic states by Vyāsa (Dvaipāyana) and the ascetics Asita Devala, marking the site as a locus of purification and siddhi.

Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि तीर्थ-यात्रा में अग्रसर बलराम बदरपाचन नामक श्रेष्ठ तीर्थ पर पहुँचे—जहाँ तप और वरदानों की पुरानी गाथाएँ आज भी जल-धारा की तरह बहती हैं। → कथा श्रुतावती पर टिकती है—भरद्वाज-मुनि की अनुपम रूपवती, ब्रह्मचारिणी पुत्री, जो ‘देवराज इन्द्र ही मेरे पति हों’ यह निश्चय कर कठोर नियमों सहित उग्र तप करती है; तप की तीव्रता देवताओं तक को विचलित-आकर्षित कर देती है। → इन्द्र ब्राह्मण-रूप धारण कर उसके आश्रम में आते हैं, तप की महिमा का प्रतिपादन करते हैं और उसके मनोरथ को यथावत सिद्ध करने का आश्वासन देते हैं—यहाँ तप बनाम परीक्षा, वर बनाम पात्रता का निर्णायक क्षण उपस्थित होता है। → श्रुतावती की कथा के साथ तीर्थ-माहात्म्य उद्घाटित होता है—तप से दिव्य लोकों की प्राप्ति, बदरपाचन में स्नान-निवास से दुर्लभ फल, और अरुन्धती को शंकर-प्रदत्त वर से भी बढ़कर वरदान की चर्चा; भरद्वाज मुनि देवर्षि-सभा में उसका नाम ‘श्रुतावती’ रखते हैं और उसे आश्रम में स्थापित कर हिमवत् की ओर प्रस्थान करते हैं। → ऋषि के जप-प्रसंग में पर्णपुट (पत्ते के दोने) में वीर्य-पतन से कन्या-सम्भव का संकेत कथा को अगले रहस्य-प्रसंग की ओर धकेल देता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआक्रा बछ। अं अष्टचत्वारिशो&् ध्याय: बदरपाचनतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें श्रुतावती और अरुन्धतीके तपकी कथा वैशम्पायन उवाच ततस्तीर्थवरं रामो ययौ बदरपाचनम्‌ | तपस्विसिद्धचरितं यत्र कन्या धृतव्रता,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! पहले कहा गया है कि वहाँसे बलरामजी बदरपाचन नामक श्रेष्ठ तीर्थमें गये, जहाँ तपस्वी और सिद्ध पुरुष विचरण करते हैं तथा जहाँ पूर्वकालमें उत्तम व्रत धारण करनेवाली भरद्वाजकी ब्रह्मचारिणी पुत्री कुमारी कन्या श्रुतावती, जिसके रूप और सौन्दर्यकी भूमण्डलमें कहीं तुलना नहीं थी, निवास करती थी

毗舍波耶那说道:随后罗摩(婆罗罗摩)前往名为“巴达罗帕遮那”(Badarapācana)的殊胜圣地,那里常有苦行者与成就者往来。昔日此处住着一位持戒坚固的少女——婆罗陀婆阇之女、梵行女(brahmacāriṇī)室鲁塔瓦蒂(Śrutāvatī)——其容色之美,据说遍地无双。

Verse 2

भरद्वाजस्य दुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि । श्रुतावती नाम विभो कुमारी ब्रह्म॒ाचारिणी,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! पहले कहा गया है कि वहाँसे बलरामजी बदरपाचन नामक श्रेष्ठ तीर्थमें गये, जहाँ तपस्वी और सिद्ध पुरुष विचरण करते हैं तथा जहाँ पूर्वकालमें उत्तम व्रत धारण करनेवाली भरद्वाजकी ब्रह्मचारिणी पुत्री कुमारी कन्या श्रुतावती, जिसके रूप और सौन्दर्यकी भूमण्डलमें कहीं तुलना नहीं थी, निवास करती थी

毗舍波耶那说道:大能者啊,婆罗陀婆阇之女——名为室鲁塔瓦蒂的未嫁少女——乃梵行女(brahmacāriṇī),其美貌在大地之上无与伦比。

Verse 3

तपश्चचार सात्युग्रं नियमैर्बहुभिर्वृता । भर्ता मे देवराज: स्यादिति निश्चित्य भामिनी,वह भामिनी बहुत-से नियमोंको धारण करके वहाँ अत्यन्त उग्र तपस्या कर रही थी। उसने अपनी तपस्याका यही उद्देश्य निश्चित कर लिया था कि देवराज इन्द्र मेरे पति हों

毗舍波耶那说道:那位情志炽烈的女子,具足诸多严峻戒律,修行极其猛烈的苦行;她将心志定于一端:“愿天帝因陀罗(Indra),诸天之王,成为我的夫君。”

Verse 4

समास्तस्या व्यतिक्रान्ता बह्दयः कुरुकुलोद्वह । चरन्त्या नियमांस्तांस्तान्‌ स्त्रीभिस्तीव्रान्‌ सुदुश्षरान्‌

毗舍波耶那说道:库鲁族之翘楚啊,许多日子过去了;她与诸女同修,仍持续奉行那些种种修持——严酷而极难忍受。

Verse 5

कुरुकुलभूषण! स्त्रियोंके लिये जिनका पालन अत्यन्त दुष्कर और दुःसह है, उन-उन कठोर नियमोंका पालन करती हुई श्रुतावतीके वहाँ अनेक वर्ष व्यतीत हो गये ।। तस्यास्तु तेन वृत्तेन तमसा च विशाम्पते । भकक्‍्त्या च भगवान्‌ प्रीतः: परया पाकशासन:

噢,俱卢族的光饰!在那儿,舒鲁塔瓦蒂遵守着一条条严酷的戒律——对女子而言极难奉行、亦极难忍受——于是多年岁月就这样流逝。因她此等行持、苦行与至上的虔敬,天帝“惩罚者”帕迦沙萨那(因陀罗)大为欢喜。

Verse 6

प्रजानाथ! उसके उस आचरण, तपस्या तथा पराभक्तिसे भगवान्‌ पाकशासन (इन्द्र) बड़े प्रसन्न हुए ।। आजगामाश्रमं तस्यास्त्रिदशाधिपति: प्रभु: । आस्थाय रूप विप्रर्षेवसिष्ठस्य महात्मन:,वे शक्तिशाली देवराज ब्रद्मर्षि महात्मा वसिष्ठका रूप धारण करके उसके आश्रमपर आये

噢,众生之主!因她的行持、苦行与至上的虔敬,帕迦沙萨那(因陀罗)极为欢悦。于是,这位三十三天之主、威能无比的天王,化作大圣梵仙瓦西什塔的形貌,来到她的精舍。

Verse 7

सातं दृष्टवोग्रतपसं वसिष्ठ॑ तपतां वरम्‌ । आचाोरैर्मुनिभिवद्दृष्ट: पूजयामास भारत,भरतनन्दन! उसने तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ और उग्र तपस्यापरायण वसिष्ठको देखकर मुनिजनोचित आचारोंद्वारा उनका पूजन किया

毗湿摩波耶那说:噢,婆罗多啊,婆罗多族的欢欣!她见到瓦西什塔——苦行炽烈、诸修行者之最——便以仙人所认可的礼法与仪则恭敬供养他。

Verse 8

उवाच नियमज्ञा च कल्याणी सा प्रियंवदा । भगवन्‌ मुनिशार्दूल किमाज्ञापयसि प्रभो,फिर नियमोंका ज्ञान रखनेवाली और मधुर एवं प्रिय वचन बोलनेवाली कल्याणमयी श्रुतावतीने इस प्रकार कहा--'भगवन्‌! मुनिश्रेष्ठ! प्रभो! मेरे लिये क्या आज्ञा है? सुव्रत! आज मैं यथाशक्ति आपको सब कुछ दूँगी; परंतु इन्द्रके प्रति अनुराग रखनेके कारण अपना हाथ आपको किसी प्रकार नहीं दे सकूँगी

毗湿摩波耶那说:那位吉祥的舒鲁塔瓦蒂,通晓戒律誓愿,言辞柔和悦耳,恭敬地说道:“世尊,牟尼中的猛虎,主宰啊——你要我做何事?”

Verse 9

सर्वमद्य यथाशक्ति तव दास्यामि सुव्रत । शक्रभक्त्या च ते पाणिं न दास्यामि कथंचन,फिर नियमोंका ज्ञान रखनेवाली और मधुर एवं प्रिय वचन बोलनेवाली कल्याणमयी श्रुतावतीने इस प्रकार कहा--'भगवन्‌! मुनिश्रेष्ठ! प्रभो! मेरे लिये क्या आज्ञा है? सुव्रत! आज मैं यथाशक्ति आपको सब कुछ दूँगी; परंतु इन्द्रके प्रति अनुराग रखनेके कारण अपना हाथ आपको किसी प्रकार नहीं दे सकूँगी

“噢,善守誓戒者!今日我将尽我所能,奉上我所有的一切;然而因我敬奉释迦罗(因陀罗),我决不把我的手许与你为婚——无论如何都不。”

Verse 10

व्रतैश्न नियमैश्नेव तपसा च तपोधन । शक्रस्तोषयितव्यो वै मया त्रिभुवने श्वर:,“तपोधन! मुझे अपने व्रतों, नियमों तथा तपस्याद्वारा त्रिभुवनसम्राट्‌ भगवान्‌ इन्द्रको ही संतुष्ट करना है'

毗湿摩波耶那说道:“噢,苦行功德深厚者!凭我的誓戒、严谨的持守与苦修,我必当使释迦罗——三界之主因陀罗——真正欢喜。”

Verse 11

इत्युक्तो भगवान्‌ देव: स्मयन्निव निरीक्ष्य ताम्‌ उवाच निय मं ज्ञात्वा सांत्वयन्निव भारत,भारत! श्रुतावतीके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ इन्द्रने मुसकराते हुए-से उसकी ओर देखा और उसके नियमको जानकर उसे सान्त्वना देते हुए-से कहा--

被如此陈述后,福德之神因陀罗仿佛含笑地望着她;洞悉她誓愿的戒行,便开口说道——似在抚慰她——噢,婆罗多啊。

Verse 12

उग्र॑ तपश्चरसि वै विदिता मे5सि सुव्ते । यदर्थमयमारम्भस्तव कल्याणि हृद्गत:

毗湿摩波耶那说道:“你确在修行严厉的苦行;噢,持守高贵誓戒的女子,我早已知晓你。噢,吉祥者,你心中为何生起此番举动?”

Verse 13

तपसा लकभ्यते सर्व यथाभूतं भविष्यति,'शुभानने! तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तुम्हारा मनोरथ भी यथावत्‌ रूपसे सिद्ध होगा। देवताओंके जो दिव्य स्थान हैं, वे तपस्यासे प्राप्त होनेवाले हैं। महान्‌ सुखका मूल कारण तपस्या ही है

毗湿摩波耶那说道:“凭苦行,一切皆可得;将要发生之事,必依其真实本相而成。噢,容颜姣好者!以有戒有度的苦修,万事皆能获得,你所珍藏的愿望也将如你所意,分毫不差地圆满。连诸天光耀的居处,也由苦行而至。诚然,唯有苦行,乃至乐之根本。”

Verse 14

यथा स्थानानि दिव्यानि विबुधानां शुभानने । तपसा तानि प्राप्याणि तपोमूलं महत्‌ सुखम्‌,'शुभानने! तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तुम्हारा मनोरथ भी यथावत्‌ रूपसे सिद्ध होगा। देवताओंके जो दिव्य स्थान हैं, वे तपस्यासे प्राप्त होनेवाले हैं। महान्‌ सुखका मूल कारण तपस्या ही है

毗湿摩波耶那说道:“噢,容颜姣好者!正如诸天以苦行得其光耀天宫,此等境界亦唯以苦行而得。大乐以苦行为根。”

Verse 15

इति कृत्वा तपो घोरें देहं संन्यस्य मानवा: । देवत्वं यान्ति कल्याणि शृणुष्वैंके वचो मम,“कल्याणि! इस उद्देश्यसे मनुष्य घोर तपस्या करके अपने शरीरको त्यागकर देवत्व प्राप्त कर लेते हैं। अच्छा, अब तुम मेरी एक बात सुनो

毗舍波耶那说道:“如此,人们修行严酷的苦行,舍弃此身,便能获得天神之境。噢,吉祥的女子啊,如今请听我这一句话。”

Verse 16

पज्च चैतानि सुभगे बदराणि शुभव्रते । पचेत्युक्त्वा तु भगवाञज्जगाम बलसूदन:,“सुभगे! शुभव्रते! ये पाँच बेरके फल हैं। तुम इन्हें पका दो।” ऐसा कहकर भगवान्‌ इन्द्र कल्याणी श्रुतावतीसे पूछकर उस आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर स्थित उत्तम तीर्थमें गये और वहाँ स्नान करके जप करने लगे

毗舍波耶那说道:“噢,福泽之人,噢,持善誓的女子——这里有五枚枣果;把它们煮熟。”说罢,圣者、诛灭婆罗者(因陀罗)便离去。他前往离那座林庵不远的一处上妙圣渡,在那里沐浴,继而持诵真言、入于禅观——纵在大事纷扰之中,亦不失克制与敬仪。

Verse 17

आमन्त्रयतां तु कल्याणीं ततो जप्यं जजाप सः । अविदूरे ततस्तस्मादाश्रमात्‌ तीर्थमुत्तमम्‌,“सुभगे! शुभव्रते! ये पाँच बेरके फल हैं। तुम इन्हें पका दो।” ऐसा कहकर भगवान्‌ इन्द्र कल्याणी श्रुतावतीसे पूछकर उस आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर स्थित उत्तम तीर्थमें गये और वहाँ स्नान करके जप करने लगे

毗舍波耶那说道:他先向吉祥的迦利耶尼致意,随后便诵持所规定的圣咒。离那座林庵不远处有一处上妙圣渡;他前往其地,沐浴之后继续持诵(japa)——克己守仪,显示灵修的戒律与行持的清净,常与非凡之举相伴而行。

Verse 18

इन्द्रतीर्थेति विख्यात॑ त्रिषु लोकेषु मानद । तस्या जिज्ञासनार्थ स भगवान्‌ पाकशासन:

毗舍波耶那说道:“噢,赐人荣誉者,名为‘因陀罗圣渡’(Indratīrtha)的圣地,在三界之中皆享盛名。为求尽知其详,那位神圣的帕迦沙萨那(因陀罗)亲自启程,意在探询。”

Verse 19

ततः प्रतप्ता सा राजन्‌ वाग्यता विगतक्लमा,राजन! तदनन्तर शौचाचारसे सम्पन्न उस तपस्विनीने थकावटसे रहित हो मौनभावसे उन फलोंको आगपर चढ़ा दिया। नृपश्रेष्ठ! फिर वह महाव्रता कुमारी बड़ी तत्परताके साथ उन बेरके फलोंको पकाने लगी

毗舍波耶那说道:于是,那位苦行的少女,噢,大王——言语自持,毫无倦怠,且坚守清净行仪——默然将那些果实置于火上。噢,诸王之最,随后,那位持大誓的贞女以专注的勤谨,开始烹煮那五枚枣果。此景彰显:无声的自制与仪式的洁净,亦是法(dharma)的呈现,不在张扬,而在细致的行持。

Verse 20

तत्परा शुचिसंवीता पावके समधिश्रयत्‌ । अपचदू राजशार्दूल बदराणि महाव्रता,राजन! तदनन्तर शौचाचारसे सम्पन्न उस तपस्विनीने थकावटसे रहित हो मौनभावसे उन फलोंको आगपर चढ़ा दिया। नृपश्रेष्ठ! फिर वह महाव्रता कुमारी बड़ी तत्परताके साथ उन बेरके फलोंको पकाने लगी

毗舍摩耶那说道:她专注于所行之事,身披清净之德,将果实置于火上。噫,诸王之虎!那位立大誓的少女遂以沉默而恒久的勤谨烹煮枣果(jujube)——持守洁净之行,毫无倦怠。

Verse 21

तस्या: पचन्त्या: सुमहान्‌ कालो5गात्‌ पुरुषर्षभ । न च सम तान्यपच्यन्त दिनं च क्षयमभ्यगात्‌,पुरुषप्रवर! उन फलोंको पकाते हुए उसका बहुत समय व्यतीत हो गया, परंतु वे फल पक न सके। इतनेमें ही दिन समाप्त हो गया

毗舍摩耶那说道:“噫,人中之雄牛!她不断烹煮,漫长的时光已然流逝;然而那些果实仍未均匀熟透。其间,白昼也走到了尽头。”

Verse 22

हुताशनेन दग्धश्न यस्तस्या: काष्ठसंचय: । अकाष्ठमग्निं सा दृष्टवा स्वशरीरमथादहत्‌,उसने जो ईंधन जमा कर रखे थे, वे सब आगमें जल गये। तब अग्निको ईंधनरहित देख उसने अपने शरीरको जलाना आरम्भ किया

毗舍摩耶那说道:她所聚集的一堆柴薪,被炽烈的火焰尽数吞噬。见火中已无薪柴可续,她便开始以自身之躯投献于火。

Verse 23

पादौ प्रक्षिप्प सा पूर्व पावके चारुदर्शना | दग्धौ दग्धौ पुन: पादावुपावर्तयतानघ,निष्पाप नरेश! मनोहर दिखायी देनेवाली उस कन्याने पहले अपने दोनों पैर आगमें डाल दिये। वे ज्यों-ज्यों जलने लगे, त्यों-ही-त्यों वह उन्हें आगके भीतर बढ़ाती गयी

毗舍摩耶那说道:那容貌姣好的少女先将双足投入火中。双足愈烧愈烈之时,她便一次又一次将其回转再送入烈焰——噫,无罪之王、无瑕之主——执意不移,坚守其行。

Verse 24

चरणौ दहामानौ च नाचिन्तयदनिन्दिता । कुर्वाणा दुष्करं कर्म महर्षिप्रियकाम्यया,उस साध्वीने अपने जलते हुए चरणोंकी कुछ भी परवा नहीं की। वह महर्षिका प्रिय करनेकी इच्छासे दुष्कर कार्य कर रही थी

毗舍摩耶那说道:纵然双足灼烧,那无可指摘的女子也不以为念。为求取悦大圣仙(摩诃利尸),她竟行一桩极难之事——忍受剧痛,而其决心毫不动摇。

Verse 25

न वैमनस्यं तस्यास्तु मुखभेदो5थवाभवत्‌ | शरीरमग्निना55दीप्य जलमध्ये यथा स्थिता,उसके मनमें तनिक भी उदासी नहीं आयी। मुखकी कान्तिमें भी कोई अन्तर नहीं पड़ा। वह अपने शरीरको आगमें जलाकर भी ऐसी प्रसन्न थी, मानो जलके भीतर खड़ी हो

毗舍波耶那说:她心中丝毫不生沮丧,面容光彩亦无所变。纵使其身在火中炽燃,她仍安然不动——如立于水中之人——心不摇,外相之辉亦不减。

Verse 26

तच्चास्या वचन नित्यमवर्तद्धूदि भारत । सर्वथा बदराण्येव पक्तव्यानीति कन्यका

毗舍波耶那说:噢,婆罗多啊,她的话一次又一次在他心中回响:“无论如何,只能烹煮枣果(jujube)。”那少女如是说道。

Verse 27

भारत! उसके मनमें निरन्तर इसी बातका चिन्तन होता रहता था कि “इन बेरके फलोंको हर तरहसे पकाना है! ।। सा तन्मनसि कृत्वैव महर्षेरवचनं शुभा । अपचद्‌ बदराण्येव न चापच्यन्त भारत,भरतनन्दन! महर्षिके वचनको मनमें रखकर वह शुभलक्षणा कन्या उन बेरोंको पकाती ही रही, परंतु वे पक न सके

毗舍波耶那说:噢,婆罗多啊,她的心恒常系于一念:“这些枣果必须用尽一切方法使之熟透!”那吉祥的少女将大圣仙之言牢牢记在心中,反复烹煮枣果——然而,噢,婆罗多啊,它们终究不熟。

Verse 28

तस्यास्तु चरणौ वद्रनिर्ददाह भगवान्‌ स्वयम्‌ | न च तस्या मनोदु:खं स्वल्पमप्यभवत्‌ तदा,भगवान्‌ अग्निने स्वयं ही उसके दोनों पैरोंको जला दिया, तथापि उस समय उसके मनमें थोड़ा-सा भी दुःख नहीं हुआ

毗舍波耶那说:“世尊亲自以如雷霆般的烈火灼烧她的双足;然而就在那一刻,她心中连一丝苦恼也未生起。”

Verse 29

अथ तत्‌ कर्म दृष्ट्वास्या: प्रीतस्त्रिभुवने श्वर: । ततः संदर्शयामास कन्यायै रूपमात्मन:,उसका वह कर्म देखकर त्रिभुवनके स्वामी इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने उस कन्याको अपना यथार्थ रूप दिखाया

毗舍波耶那说:见她所行,因陀罗——三界之主——大为欢喜。于是他向那少女显现了自己的真实形相。

Verse 30

उवाच च सुरश्रेष्ठस्तां कन्यां सुदृढव्रताम्‌ प्रीतो5स्मि ते शुभे भकक्‍त्या तपसा नियमेन च,इसके बाद सुरश्रेष्ठ इन्द्रने दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उस कन्यासे इस प्रकार कहा--'शुभे! मैं तुम्हारी तपस्या, नियमपालन और भक्तिसे बहुत संतुष्ट हूँ। अतः कल्याणि! तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट मनोरथ है, वह पूर्ण होगा। महाभागे! तुम इस शरीरका परित्याग करके स्वर्गलोकमें मेरे पास रहोगी

毗湿摩波耶那说:于是,诸天之首因陀罗见那少女以不动摇之坚志守持誓戒,心甚欢喜,便对她说道:“吉祥者啊,我对你之虔敬、苦行与严谨持戒深感满足。因此,福慧具足的女子,你心中所珍藏的愿望必将圆满。大福德者,当你舍此身后,必与我同住天界。”

Verse 31

तस्माद्‌ योडभिमत: काम: स ते सम्पत्स्यते शुभे । देहं त्यक्त्वा महा भागे त्रिदिवे मयि वत्स्यसि,इसके बाद सुरश्रेष्ठ इन्द्रने दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उस कन्यासे इस प्रकार कहा--'शुभे! मैं तुम्हारी तपस्या, नियमपालन और भक्तिसे बहुत संतुष्ट हूँ। अतः कल्याणि! तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट मनोरथ है, वह पूर्ण होगा। महाभागे! तुम इस शरीरका परित्याग करके स्वर्गलोकमें मेरे पास रहोगी

因此,吉祥者啊,你心中最为珍爱的愿望必定实现。大福德者,当你舍此身后,必与我同住三十三天(Tridiva)之天界。(因陀罗因她的苦行、誓戒与虔敬而欢喜,遂赐予恩许,并许她居于天上。)

Verse 32

इदं च ते तीर्थवरं स्थिरं लोके भविष्यति । सर्वपापापहं सुभ्रु नाम्ना बदरपाचनम्‌,'सुभ्रु! तुम्हारा यह श्रेष्ठ तीर्थ इस जगत्‌में सुस्थिर होगा, बदरपाचन नामसे प्रसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला होगा

毗湿摩波耶那说:“你这殊胜的圣渡处(tīrtha)将长久稳固地存于世间。秀眉者啊,它将以‘巴达罗帕遮那’(Badarapācana)之名闻世,并能消除一切罪垢。”

Verse 33

विख्यातं त्रिषु लोकेषु ब्रह्मर्षिभिरभिप्लुतम्‌ । अस्मिन्‌ खलु महाभागे शुभे तीर्थवरेडनघे

毗湿摩波耶那说:“此圣地名闻三界,并为诸梵仙(Brahmarṣi)之临在与清净所加持。诚然,就在此处——这吉祥、显赫、至上的圣渡处——无垢者啊——(其神圣已牢然确立)。”

Verse 34

ततस्ते वै महाभागा गत्वा तत्र सुसंशिता:

随后,那些卓越之人意志坚定,心志不移,便前往那处圣地。

Verse 35

वृत्त्यर्थ फलमूलानि समाहर्तु ययु: किल । “वहाँ पहुँचकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले वे महाभाग महर्षि जीवन-निर्वाहके निमित्त फल-मूल लानेके लिये वनमें गये ।। ३४ $ ।। तेषां वृत्त्यर्थिनां तत्र वसतां हिमवद्वने

毗舍波耶那说:为求维持生计,他们确实前去采集果实与根茎。于是,那些苦行者住在喜马拉雅的林野之中,只以活命为念,便取用山林间朴素的食粮;叙事由此彰显其严谨自持的生活——求生而不贪取,不加害于众生。

Verse 36

ते कृत्वा चाश्रमं तत्र न्यवसन्त तपस्विन:

毗舍波耶那说:他们在那里建立了苦行者的精舍,诸位修苦行的圣贤便安住其间,归于戒律与自制的修持生活——这也暗示着从纷扰转向有序的法度(dharma)。

Verse 37

अरुन्धतीं ततो दृष्टवा तीव्रं नियममास्थिताम्‌

随后,见阿伦达蒂坚定安住于严厉的自律誓戒之中,毗舍波耶那便着重描绘她不动摇的克制——这是以苦行与坚贞行持守护法度(dharma)的象征。

Verse 38

ब्राह्मं रूपं ततः कृत्वा महादेवो महायशा:

毗舍波耶那说:随后,声名显赫的大自在天(摩诃提婆)化作婆罗门之相——这表明他由显露的神威转入与神圣权威与克制相契的行事方式。

Verse 39

प्रत्युवाच तत: सा त॑ ब्राह्म॒णं चारुदर्शना

毗舍波耶那说:随后,那位容貌姣好的女子答复了那位婆罗门——对话由此转折,她的回应开始塑造这一段落的道德旨趣与叙事走向。

Verse 40

ततो<ब्रवीन्महादेव: पचस्वैतानि सुव्रते,“तब महादेवजीने कहा--'सुव्रते! इन बेरोंको पका दो।” उनके इस प्रकार आदेश देनेपर यशस्विनी अरुन्धतीने ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे उन बेरोंको प्रज्वलित अग्निपर रखकर पकाना आरम्भ किया

于是大天(摩诃提婆)说道:“贤淑者啊,把这些煮熟。”奉其命令,光辉卓著的阿伦达蒂——为取悦婆罗门——将枣果置于燃起的火上,开始烘烤。

Verse 41

इत्युक्ता सापचत्‌ तानि ब्राह्मणप्रियकाम्यया । अधिभश्रित्य समिद्धे5ग्नौी बदराणि यशस्विनी,“तब महादेवजीने कहा--'सुव्रते! इन बेरोंको पका दो।” उनके इस प्रकार आदेश देनेपर यशस्विनी अरुन्धतीने ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे उन बेरोंको प्रज्वलित अग्निपर रखकर पकाना आरम्भ किया

毗湿摩波耶那说:她既受此嘱咐,那位声名卓著的女子——为取悦婆罗门——把那些枣果放在旺盛的火上,开始烹煮。

Verse 42

दिव्या मनोरमा: पुण्या: कथा: शुआव सा तदा । अतीता सा त्वनावृष्टिर्घोरा द्वादशवार्षिकी,“उस समय उसे परम पवित्र मनोहर एवं दिव्य कथाएँ सुनायी देने लगीं। वह बिना खाये ही बेर पकाती और मंगलमयी कथाएँ सुनती रही। इतनेमें ही बारह वर्षोकी वह भयंकर अनावृष्टि समाप्त हो गयी। वह अत्यन्त दारुण समय उसके लिये एक दिनके समान व्यतीत हो गया

当时她听闻了神圣、悦耳而如天界般的故事。其间,那可怖的十二年大旱也告终止。于是那极其艰难的时日,于她竟如一日般流逝——凭借吉祥叙事的净化之力与忍耐的坚守。

Verse 43

अनश्नन्त्या: पचन्त्याश्न शृण्वन्त्याश्व॒ कथा: शुभा: | दिनोपम: स तस्याथ कालो5तीत: सुदारुण:,“उस समय उसे परम पवित्र मनोहर एवं दिव्य कथाएँ सुनायी देने लगीं। वह बिना खाये ही बेर पकाती और मंगलमयी कथाएँ सुनती रही। इतनेमें ही बारह वर्षोकी वह भयंकर अनावृष्टि समाप्त हो गयी। वह अत्यन्त दारुण समय उसके लिये एक दिनके समान व्यतीत हो गया

毗湿摩波耶那说:她不进食,却烹烤(枣果),并聆听吉祥的故事;那极其残酷的时日于她如一日般过去——直至可怖的大旱终结。

Verse 44

ततस्तु मुनयः प्राप्ता: फलान्यादाय पर्वतात्‌ | ततः स भगवान्‌ प्रीतः प्रोवाचारुन्धतीं ततः,“तदनन्तर सप्तर्षिगण हिमालय पर्वतसे फल लेकर वहाँ आये। उस समय भगवान्‌ शंकरने प्रसन्न होकर अरुन्धतीसे कहा--:धर्मज्ञे! अब तुम पहलेके समान इन ऋषियोंके पास जाओ! धर्मको जाननेवाली देवि! मैं तुम्हारी तपस्या और नियमसे बहुत प्रसन्न हूँ

随后诸牟尼到来,从山中携来果实。于是福德之主(商羯罗)心怀欢喜,对阿伦达蒂说道:“知法者啊,如同从前一般,如今也去到这些仙人面前。通达法的女士啊,我对你的苦行与戒律修持甚为满意。”

Verse 45

उपसर्पस्व धर्मज्ञे यथापूर्वमिमानृषीन्‌ । प्रीतो5स्मि तव धर्मज्ञे तपसा नियमेन च,“तदनन्तर सप्तर्षिगण हिमालय पर्वतसे फल लेकर वहाँ आये। उस समय भगवान्‌ शंकरने प्रसन्न होकर अरुन्धतीसे कहा--:धर्मज्ञे! अब तुम पहलेके समान इन ऋषियोंके पास जाओ! धर्मको जाननेवाली देवि! मैं तुम्हारी तपस्या और नियमसे बहुत प्रसन्न हूँ

毗湿摩波耶那说道:“噢,明智而正直者,如同从前那样,再次走近这些仙圣。噢,通晓法者,我对你甚为欢喜——因你的苦行,也因你严谨的戒律与修持。”

Verse 46

ततः संदर्शयामास स्वरूपं भगवान्‌ हर: । ततोअब्रवीत्‌ तदा तेभ्यस्तस्याश्व चरितं महत्‌,"ऐसा कहकर भगवान्‌ शंकरने अपने स्वरूपका दर्शन कराया और उन सप्तर्षियोंसे अरुन्धतीके महान्‌ चरित्रका वर्णन किया

于是,尊贵的诃罗显现了自身的神圣真形。随即在那时,他对诸仙圣详尽讲述阿伦达蒂伟大而堪为楷模的行持——被奉为坚贞德行与夫妇忠贞的典范。

Verse 47

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑नमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,भवद्धि्हिमवत्पष्ठे यत्‌ तप: समुपार्जितम्‌ । अस्याश्न यत्‌ तपो विप्रा न सम॑ सन्‍मतं मम “वे बोले--“विप्रवरो! आपलोगोंने हिमालयके शिखरपर रहकर जो तपस्या की है और अरुन्धतीने यहीं रहकर जो तप किया है, इन दोनोंमें कोई समानता नहीं है (अरुन्धतीका ही तप श्रेष्ठ है)

他说:“噢,诸婆罗门中的最上者,你们居于喜马拉雅高峰所积聚的苦行,与她(阿伦达蒂)在此所行的苦行——在我看来,两者并不相等。她的苦行更为殊胜。”

Verse 48

अनया हि तपस्विन्या तपस्तप्तं सुदुश्चरम्‌ । अनश्नन्या पचन्त्या च समा द्वादश पारिता:,“इस तपस्विनीने बिना कुछ खाये-पीये बेर पकाते हुए बारह वर्ष बिता दिये हैं। इस प्रकार इसने दुष्कर तपका उपार्जन कर लिया है” इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने बदरपाचनतीर्थक थने अष्टचत्वारिंशो5ध्याय:

毗湿摩波耶那说道:“这位苦行女确已行成极其艰难的苦行。她不进饮食,却不断烹煮枣果(jujube),整整度过了十二年。由此,她获得了严酷修行所生的功德与灵力。”

Verse 49

ततः प्रोवाच भगवांस्तामेवारुन्धतीं पुन: । वरं वृणीष्व कल्याणि यत्‌ तेडभिलषितं हृदि,“इसके बाद भगवान्‌ शंकरने पुनः अरुन्धतीसे कहा--“कल्याणि! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसके अनुसार कोई वर माँग लो”

随后,圣主(商羯罗)又对阿伦达蒂说道:“噢,吉祥的女子,选择一个恩赐吧——凡你心中所愿,皆可启请。”

Verse 50

साब्रवीत्‌ पृथुताम्राक्षी देवं सप्तर्षिसंसदि । भगवान्‌ यदि मे प्रीतस्तीर्थ स्पादिदमद्भुतम्‌

毗湿摩波耶那说道:随后,那位眼眸宽大、赤如铜色的夫人,在七仙(七ṛṣi)的集会中向神明启言:“噢,具福德的主宰!若您悦纳于我,愿此奇妙的圣渡处(tīrtha)因您一触而在此地显现。”

Verse 51

सिद्धदेवर्षिदयितं नाम्ना बदरपाचनम्‌ | “तब विशाल एवं अरुण नेत्रोंवाली अरुन्धतीने सप्तर्षियोंकी सभामें महादेवजीसे कहा --“भगवान्‌ यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो यह स्थान बदरपाचन नामसे प्रसिद्ध होकर सिद्धों और देवर्षियोंका प्रिय एवं अद्भुत तीर्थ हो जाय ।। तथास्मिन्‌ देवदेवेश त्रिरात्रमुषित: शुचि:

毗湿摩波耶那说道:那地方遂以“婆陀罗波遮那”(Badarapācana)之名闻世,为悉地者与天仙圣者所爱。并且在那里,噢,诸神之主,那位清净者停驻三夜——由此奠定其神圣与声名,使之成为因虔敬与神恩而生的奇妙朝圣圣地。

Verse 52

एवमस्त्विति तां देव: प्रत्युवाच तपस्विनीम्‌

毗湿摩波耶那说道:神明对那位苦行女答道:“如是。”——允其所请,并宣示她的誓愿与苦行决不会落空。

Verse 53

ऋषयो विस्मयं जम्मुस्तां दृष्टवा चाप्यरुन्धतीम्‌

毗湿摩波耶那说道:诸仙见到她,又见阿伦达蒂,皆惊异不已,心神为那般典范的仪容与德行所震动。

Verse 54

अश्रान्तां चाविवर्णा च क्षुत्पिपासासमायुताम्‌ । “अरुन्धती भूख-प्याससे युक्त होनेपर भी न तो थकी थी और न उसकी अंगकान्ति ही फीकी पड़ी थी। उसे देखकर ऋषियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ || ५३ $ ।। एवं सिद्धि: परा प्राप्ता अरुन्धत्या विशुद्धया,“कठोर व्रतका पालन करनेवाली महाभागे! इस प्रकार विशुद्धहृदया अरुन्धती देवीने यहाँ परम सिद्धि प्राप्त की थी, जैसी कि तुमने मेरे लिये तप करके सिद्धि पायी है। भद्रे! तुमने इस व्रतमें विशेष आत्मसमर्पण किया है

毗湿摩波耶那说道:“纵受饥渴所迫,阿伦达蒂既不疲惫,容色亦不衰减。诸仙见之,皆大为惊异。于是,心地清净的阿伦达蒂在此获得了至高成就——正如你也为我而修苦行,终得圆满。温柔的女子啊,在此誓戒之中,你显出了非凡的自我奉献。”

Verse 55

यथा त्वया महाभागे मदर्थ संशितव्रते । विशेषो हि त्वया भद्ठे व्रते ह्स्मिन्‌ समर्पित:,“कठोर व्रतका पालन करनेवाली महाभागे! इस प्रकार विशुद्धहृदया अरुन्धती देवीने यहाँ परम सिद्धि प्राप्त की थी, जैसी कि तुमने मेरे लिये तप करके सिद्धि पायी है। भद्रे! तुमने इस व्रतमें विशेष आत्मसमर्पण किया है

毗舍波耶那说道:“吉祥有福的夫人啊,你坚守严峻的誓戒——正如你为我而行苦行一般,心地清净的女神阿伦达蒂也曾在此获得至高圆满。温柔的女子啊,在此戒行之中,你表现出格外的自我奉献。”

Verse 56

तथा चेदं ददाम्यद्य नियमेन सुतोषित: । विशेष तव कल्याणि प्रयच्छामि वरं वरे,“सती कल्याणि! मैं तुम्हारे नियमसे संतुष्ट होकर यह विशेष वर प्रदान करता हूँ

“因此,今日我因你守持戒律而甚为欢喜,便依仪则赐下此恩。吉祥的女子啊,诸女之最,我将赐你一项特别的恩赐。”

Verse 57

अरुन्धत्या वरस्तस्या यो दत्तो वै महात्मना । तस्य चाहं प्रभावेण तव कल्याणि तेजसा

毗舍波耶那说道:“吉祥的女子啊,凭借那位大德赐予阿伦达蒂之福的威力与光辉,我也因你的光耀而得以支撑,并得以(言说/行事)。”

Verse 58

यस्त्वेकां रजनीं तीर्थ वत्स्यते सुसमाहित:

毗舍波耶那说道:“然而,凡有人心神坚定、专注收摄,只在这圣地渡口(tīrtha)停留一夜……”

Verse 59

इत्युक्त्वा भगवान्‌ देव: सहस्राक्ष: प्रतापवान्‌

毗舍波耶那说道:“说罢此言,那位尊神——千眼的因陀罗,威勇无比——……”

Verse 60

श्रुतावतीं ततः पुण्यां जगाम त्रिदिवं पुन: । पुण्यमयी श्रुतावतीसे ऐसा कहकर सहसख्र नेत्रधारी प्रतापी भगवान्‌ इन्द्रदेव पुनः स्वर्गलोकमें चले गये ।। ५९ $ ।। गते वज्धरे राजंस्तत्र वर्ष पपात ह

说罢此言,威力无边的因陀罗——诸天之主、千眼之持者——再度启程返回三天界(天国),将名为“输多伐底”(Śrutāvatī)的圣地留在身后。叙述强调:神祇的降临能使一方土地成其清净圣域,而诸神在完成使命之后,终将回归其天上居处。

Verse 61

पुष्पाणां भरतश्रेष्ठ दिव्यानां पुण्यगन्धिनाम्‌ । देवदुन्दुभयश्चापि नेदुस्तत्र महास्वना:

毗湿摩波耶那说道:“噢,婆罗多族中最卓越者啊!芬芳清净的天花如雨纷纷飘落;其处又有天鼓(devadundubhi)轰然作响,声势浩大。”此景昭示一种庄严而超尘的认可,仿佛整个宇宙都在为方才发生之事的道德分量作证。

Verse 62

राजन! भरतश्रेष्ठ! वज्रधारी इन्द्रके चले जानेपर वहाँ पवित्र सुगन्धवाले दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी और महान्‌ शब्द करनेवाली देवदुन्दुभियाँ बज उठीं ।। मारुतश्न ववीौ पुण्य: पुण्यगन्धो विशाम्पते । उत्सृज्य तु शुभा देहं जगामास्य च भार्यताम्‌

毗湿摩波耶那说道:大王啊,婆罗多族中最卓越者!当执金刚的因陀罗离去之时,彼处便降下清香洁净的天花之雨,天鼓亦发出洪大之声。噢,人中之主,一阵圣风携带吉祥芬芳开始吹拂。随后,她舍弃了自己美好的形体,前往天界,成为他的妻子。

Verse 63

तपसोग्रेण तं लब्ध्वा तेन रेमे सहाच्युत । प्रजानाथ! पावन सुगंधसे युक्त पवित्र वायु चलने लगी। शुभलक्षणा श्रुतावती अपने शरीरको त्यागकर इन्द्रकी भार्या हो गयी। अच्युत! वह अपनी उग्र तपस्यासे इन्द्रको पाकर उनके साथ रमण करने लगी ।। ६२ $ ।। जनमेजय उवाच का तस्या भगवन्‌ माता क्व संवृद्धा च शो भना | श्रोतुमिच्छाम्यहं विप्र परं कौतूहलं हि मे

她以严峻苦行得见并获得那位天帝,遂与之同享欢悦。人主啊,带着清净圣香的圣风吹拂而起。具吉祥相的输多伐底舍弃其身,成为因陀罗之妃。阿周陀啊,她凭猛烈苦行得因陀罗,与之相乐。——于是阇那梅阇耶问道:“尊者啊,她的母亲是谁?那位美丽的女子又是在何处长成?婆罗门啊,我愿闻其详,因为我的好奇甚深。”

Verse 64

जनमेजयने पूछा--भगवन्‌! शोभामयी श्रुतावतीकी माता कौन थी और वह कहाँ पली थी? यह मैं सुनना चाहता हूँ। विप्रवर! इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है। वैशम्पायन उवाच भरद्वाजस्य विद्रष्षे: स्कन्ने रेतो महात्मन:

阇那梅阇耶问道:“尊者啊,光辉的输多伐底之母是谁?那位美丽的女子又是在何处被抚育长大?我愿听闻。婆罗门中的最上者啊,我心中生起了强烈的渴望,想要知晓此事。”毗湿摩波耶那答道:“且听:当大圣婆罗陀婆阇的精种流出之时……”

Verse 65

दृष्टवाप्सरसमायान्तीं घृताचीं पृुथुलोचनाम्‌ । वैशम्पायनजीने कहा--राजन्‌! एक दिन विशाल नेत्रोंवाली घृताची अप्सरा कहींसे आ रही थी। उसे देखकर महात्मा महर्षि भरद्वाजका वीर्य स्खलित हो गया ।। सतु जग्राह तद्रेत: करेण जपतां वर:

毗湿摩波耶那说道:“大王啊,有一次,广目天女(阿普萨拉)酥酪姬(Ghṛtācī)从某处走来。大圣婆罗堕阇(Bharadvāja)见到她,情不自禁地泄出了精种。随后,在诵持圣言者之中最为卓越的一位,将那精液以手承接收取。”

Verse 66

तस्यास्तु जातकर्मादि कृत्वा सर्व तपोधन:

毗湿摩波耶那说道:“随后,那位积聚苦行功德的仙人,为她如法举行了从‘生礼(jātakarma)’起的诸般诞生仪式,并圆满完成一切规定的净礼(saṃskāra)。”

Verse 67

नाम चास्या: स कृतवान्‌ भरद्वाजो महामुनि: । श्रुतावतीति धर्मात्मा देवर्षिगणसंसदि । स्वे च तामाश्रमे न्यस्य जगाम हिमवद्धनम्‌

大圣婆罗堕阇心怀正法,在诸天仙圣的会座中为她命名,称她为“闻持女(Śrutāvatī)”。随后,他将她安置在自己的道场中妥善照料,便启程前往喜马瓦特雪山之境。

Verse 68

तपस्याके धनी धर्मात्मा महामुनि भरद्वाजने उसके जातकर्म आदि सब संस्कार करके देवर्षियोंकी सभामें उसका नाम श्रुतावती रख दिया। फिर वे उस कन्याको अपने आश्रममें रखकर हिमालयके जंगलमें चले गये थे ।। तत्राप्युपस्पृश्य महानुभावो वसूनि दत्त्वा च महाद्विजेभ्य: । जगाम तीर्थ सुसमाहितात्मा शक्रस्य वृष्णिप्रवरस्तदानीम्‌,वृष्णिवंशावतंस महानुभाव बलरामजी उस तीर्थमें भी स्नान और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धनका दान करके उस समय एकाग्रचित्त हो वहाँसे इन्द्र-तीर्थमें चले गये

持法的大圣婆罗堕阇为她完成从生礼(jātakarma)起的一切净礼,并在天仙圣众的会座中为她取名“闻持女(Śrutāvatī)”。随后,他将那少女安置在自家道场,便前往喜马拉雅的林野。其后,那位伟岸之士——弗利什尼族之冠、弗利什尼家族的荣饰巴拉罗摩——也在圣地行沐浴之礼,并以财物布施诸上等婆罗门;当时他心神专一,从那里启程前往释迦罗(因陀罗)之圣渡口,即因陀罗圣地(Indra-tīrtha)。

Verse 126

तच्च सर्व यथाभूतं भविष्यति वरानने । 'सुव्रते! मैं जानता हूँ तुम बड़ी उग्र तपस्या कर रही हो। कल्याणि! सुमुखि! जिस उद्देश्यसे तुमने यह अनुष्ठान आरम्भ किया है और तुम्हारे हृदयमें जो संकल्प है, वह सब यथार्थरूपसे सफल होगा

毗湿摩波耶那说道:“这一切都将如其实相,分毫不差地实现,啊,容颜姣好的女子。啊,善守誓戒者,我知道你正在行极其严峻的苦行。啊,吉祥者,啊,秀面者——无论你因何目的而开始此番修持,无论你心中怀抱何等誓愿,皆将如实成就。”

Verse 183

बदराणामपचनं चकार विबुधाधिप: । मानद! वह तीर्थ तीनों लोकोंमें इन्द्रतीर्थक नामसे विख्यात है। देवराज भगवान्‌ पाकशासनने उस कन्याके मनोभावकी परीक्षा लेनेके लिये उन बेरके फलोंको पकने नहीं दिया

毗湿摩波耶那说道:诸天之主使那枣果(jujube)不得成熟。噢,赐荣者!那处圣渡在三界中以“因陀罗圣渡(Indratīrthaka)”之名闻名。于彼处,天王因陀罗——惩罚帕迦者——为考验那少女内心的情志与真诚,便令那些果实久不成熟。此事昭示:真正的德行不只在外在行为,更在希望受阻、时日延宕之际仍不动摇的本心。

Verse 336

त्यक्त्वा सप्तर्षयो जम्मुर्हिमवन्तमरुन्धतीम्‌ । “यह तीनों लोकोंमें विख्यात है। बहुत-से ब्रह्मर्षियोंने इसमें स्नान किया है। पापरहित महाभागे! एक समय सप्तर्षिगण इस मंगलमय श्रेष्ठ तीर्थमें अरुन्धतीको छोड़कर हिमालय पर्वतपर गये थे

毗湿摩波耶那说道:七圣(Saptarṣi)留下阿伦达蒂,前往喜马拉雅。此处圣地(tīrtha)名闻三界,许多梵仙(brahmarṣi)曾在此沐浴。噢,福德具足、无罪之女!曾有一时,七圣离开这吉祥至上的圣地,舍下阿伦达蒂,而登上喜马拉雅山。

Verse 356

अनावृष्टिरनुप्राप्ता तदा द्वादशवार्षिकी | “जीविकाकी इच्छासे जब वे हिमालयके वनमें निवास करते थे, उन्हीं दिनों बारह वर्षोतक इस देशमें वर्षा ही नहीं हुई

毗湿摩波耶那说道:当时降临了一场旱灾——延续了十二年。正当他们为求生计而居于喜马拉雅林中之际,这片国土竟十二年不降一滴雨。久旱夺雨,使大地陷入匮乏,提醒众人:生计与社会秩序系于自然的均衡,也系于灾厄之时君主与群体能否以责任之行共度艰难。

Verse 363

अरुन्धत्यपि कल्याणी तपोनित्याभवत्‌ तदा । “वे तपस्वी मुनि वहीं आश्रम बनाकर रहने लगे। उस समय कल्याणी अरुन्धती भी प्रतिदिन तपस्यामें ही लगी रही

毗湿摩波耶那说道:当时,吉祥的阿伦达蒂也恒常安住于苦行(tapas),日日不懈。诸苦行牟尼就在那处建立精舍(āśrama)而居。那时,善美的阿伦达蒂亦每日专注修持苦行,始终如一。

Verse 376

अथागमत्‌ त्रिनयन: सुप्रीतो वरदस्तदा । “अरुन्धतीको कठोर नियमका आश्रय लेकर तपस्या करती देख नत्रिनेत्रधारी वरदायक भगवान्‌ शंकर बड़े प्रसन्न हुए

毗湿摩波耶那说道:随后,三目之主、慈恩赐愿者,怀着极大的欢悦来到那里。见阿伦达蒂依凭严峻誓戒与自我克制而行艰苦苦行,三目之薄伽梵商羯罗(Śaṅkara)深为满足。此即昭示:招致神恩的,并非徒有权势,而是真诚的节制与虔敬的修持。

Verse 383

तामभ्येत्याब्रवीद्‌ देवो भिक्षामिच्छाम्यहं शुभे । 'फिर वे महायशस्वी महादेवजी ब्राह्मणका रूप धारण करके उनके पास गये और बोले --'शुभे! मैं भिक्षा चाहता हूँ"

神圣的主走近她,说道:“吉祥的女子啊,我来求施舍。”叙事中,摩诃提婆化作婆罗门的形貌,前来乞求布施——以此考验施主的慷慨与对达摩的坚定,显示神明亦能以谦卑的请求来检验德行。

Verse 396

क्षीणो5न्नसंचयो विप्र बदराणीह भक्षय । “तब परम सुन्दरी अरुन्धतीने उन ब्राह्मण देवतासे कहा--'विप्रवर! अन्नका संग्रह तो समाप्त हो गया। अब यहाँ ये बेर हैं, इन्हींको खाइये”

毗湿摩波耶那说:至德无双的阿伦达蒂对那位婆罗门来客说道:“尊贵的婆罗门啊,我们贮存的粮食已尽。此处有枣果(jujube),请以此充饥。”这一刻彰显待客之达摩:纵在匮乏之时,也当以恭敬与至诚奉上所能。

Verse 513

प्राप्रुयादुपवासेन फल द्वादशवार्षिकम्‌ । 'देवदेवेश्वर! इस तीर्थमें तीन राततक पवित्र भावसे रहकर वास करनेसे मनुष्यको बारह वर्षोके उपवासका फल प्राप्त हो'

毗湿摩波耶那说:在此守斋(禁食),可得等同十二年誓愿苦行之功德。此段称颂此圣地(tīrtha)的神圣:若以清净恭敬之心住此三夜,据说所得灵果与久长苦行无异,强调内在清净与虔诚行持胜于单以时日计较的艰辛。

Verse 526

सप्तर्षिभि: स्तुतो देवस्ततो लोक॑ ययौ तदा । “तब महादेवजीने उस तपस्विनीसे कहा--'एवमस्तु” (ऐसा ही हो)। फिर सप्तर्षियोंने उनकी स्तुति की। तत्पश्चात्‌ महादेवजी अपने लोकमें चले गये

为七圣仙所颂赞后,主神当即前往自己的神界。于是,在以“如是”允诺那位苦行女的请求之后,摩诃提婆受纳诸仙的赞歌而退去——显示恩赐由神圣的首肯而确证,而恭敬的颂赞常随正当祈愿的成就而来。

Verse 573

प्रवक्ष्यामि परं भूयो वरमत्र यथाविधि । “कल्याणि! महात्मा भगवान्‌ शंकरने अरुन्धती देवीको जो वर दिया था, तुम्हारे तेज और प्रभावसे मैं उससे भी बढ़कर उत्तम वर देता हूँ

毗湿摩波耶那说:“我将再一次依正法之仪宣说此处的至上恩赐。吉祥的女子啊!凭借你光辉的威德与灵性之力,我赐你一项更为殊胜的福佑,胜过大心的主神商羯罗(Śaṅkara)昔日赐予女神阿伦达蒂的那一份。”

Verse 583

स स्नात्वा प्राप्स्यते लोकान्‌ देहन्यासात्‌ सुदुर्लभान्‌ | “जो इस तीर्थमें एकाग्रचित्त होकर एक रात निवास करेगा, वह यहाँ स्नान करके देह- त्यागके पश्चात्‌ उन पुण्यलोकोंमें जायगा, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है”

毗舍波耶那说道:“凡于此圣渡口(tīrtha)专心一意住上一夜者,在此沐浴之后,及至舍身(命终)之时,必得往生彼等功德之界——那是他人极难抵达的境域。”

Verse 653

तदापतत्‌ पर्णपुटे तत्र सा संभवत्‌ सुता । जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ऋषिने उस वीर्यको अपने हाथमें ले लिया, परंतु वह तत्काल ही एक पफ्त्तेके दोनेमें गिर पड़ा। वहीं वह कन्या प्रकट हो गयी

随即它落入一只叶杯之中,就在那处,一位女儿诞生了。诸仙之最胜者——在持诵圣言者中卓然为首——本已将那种子握于掌中;然而顷刻之间,它滑脱而坠入以叶编成的小盂。正从那一点上,少女显现而出。

Frequently Asked Questions

Procedural righteousness expressed as ritual correctness (vidhi), purification through bathing, and socially stabilizing generosity to brāhmaṇas—presented as a parallel ethical response to an era of destabilizing conflict.

The text encodes a practical ethic: sacred action is not only internal intention but also disciplined public practice—honoring institutions of learning/ritual, acknowledging sacred history, and treating wealth as a vehicle for merit and communal order.

Yes, implicitly and explicitly: Indratīrtha is characterized as “sarva-pāpa-pramocana” (remover of all sins), and Ādityatīrtha is framed as a locus where divine and yogic attainments occur, implying merit through understanding and observance of these tīrthas.