Adhyaya 40
Shalya ParvaAdhyaya 4042 Verses

Adhyaya 40

Baka Dālbhya at Avakīrṇa-tīrtha: Rāṣṭra-kṣaya and Release through Prasāda (Śalya-parva, Adhyāya 40)

Upa-parva: Tīrtha–Ṛṣi-Upākhyāna: Baka Dālbhya and the Depletion of Dhṛtarāṣṭra’s Rāṣṭra

Vaiśaṃpāyana recounts an earlier incident involving the ascetic Baka Dālbhya. After a twelve-year Naimiṣeya satra concludes, sages request a dakṣiṇā of healthy young cattle. Baka proposes a division of the animals and then proceeds to King Dhṛtarāṣṭra’s residence to request cattle. The king responds harshly, directing him to take cattle that have died “by chance,” using a contemptuous form of address. Baka reflects on the insult and, angered, resolves to bring about the king’s realm’s depletion. At Sarasvatī’s Avakīrṇa-tīrtha, he kindles fire and performs an austere rite, offering pieces of dead flesh, by which the rāṣṭra begins to waste away, likened to a forest endlessly cut by an axe. Distressed, Dhṛtarāṣṭra consults ritual specialists, learns the cause, and is advised to propitiate Baka at Sarasvatī. The king approaches with prostration and a formal confession, requesting forgiveness. Seeing his grief, the ṛṣi’s compassion arises; he releases the realm and performs a counter-rite for restoration. Baka accepts many cattle and returns to Naimiṣāraṇya. The chapter closes by widening the tīrtha frame with additional exempla (e.g., Bṛhaspati’s rite and Yayāti’s sacrificial context), reinforcing Sarasvatī’s landscape as a repository of ritual memory and moral causality.

Chapter Arc: जनमेजय की जिज्ञासा उठती है—आर्तिषेण ने कैसा विपुल तप किया, और कुशिकवंशी विश्वामित्र ने किस प्रकार ब्राह्मणत्व प्राप्त किया? → वैशम्पायन सत्ययुग की कथा छेड़ते हैं: आर्तिषेण गुरुकुल में नित्य अध्ययनरत, और विश्वामित्र तपोनिष्ठ, जितेन्द्रिय। फिर राजकीय वैभव और आश्रम-धर्म का टकराव उभरता है—सेना सहित प्रस्थान, वसिष्ठाश्रम की ओर गमन, और देवताओं द्वारा व्रत-विघ्न रचने की चेष्टा। → विश्वामित्र की उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर पितामह ब्रह्मा वर देने को उद्यत होते हैं; विश्वामित्र का निर्णायक वर-याचन—“मैं ब्राह्मण हो जाऊँ”—और ब्रह्मा का ‘तथास्तु’। → ब्राह्मणत्व प्राप्त कर विश्वामित्र कृतकाम होते हैं; देवतुल्य यश के साथ समस्त भूमण्डल में विचरण करते हैं—तप की सिद्धि और संकल्प की पूर्णता स्थापित होती है। → अब प्रश्न शेष रहता है—जिस ब्राह्मणत्व को तप से पाया, वह आचरण और लोक-स्वीकृति में कैसे प्रतिष्ठित हुआ, और वसिष्ठ-संबंधी संघर्ष का आगे क्या रूप बना?

Shlokas

Verse 1

ऑपन-- माल छा सं: चत्वारिशोड् ध्याय: आर्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति जनमेजय उवाच कथमार्टिषेणो भगवान्‌ विपुलं तप्तवांस्तप: । सिन्धुद्वीप: कथं चापि ब्राह्म॒ण्यं लब्धवांस्तदा,जनमेजयने पूछा--्रह्मन! मुनिश्रेष्ठ! आ्शिषिणने वहाँ किस प्रकार बड़ी भारी तपस्या की थी तथा सिन्धुद्वीप, देवापि और विश्वामित्रजीने किस तरह ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था? भगवन्‌! यह सब मुझे बताइये। इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी भारी उत्सुकता है

阇那梅阇耶问道:“婆罗门啊,最胜牟尼啊!尊者阿尔提舍那(Ārtiṣeṇa)如何修行那般广大苦行(tapas)?当时信度洲(Sindhudvīpa)又如何获得婆罗门之位?愿尊者为我详说这一切;我心中生起强烈的求知之渴。”

Verse 2

देवापिश्न कथं ब्रह्मन्‌ विश्वामित्रश्न सत्तम । तन्ममाचक्ष्व भगवन्‌ परं कौतूहलं हि मे,जनमेजयने पूछा--्रह्मन! मुनिश्रेष्ठ! आ्शिषिणने वहाँ किस प्रकार बड़ी भारी तपस्या की थी तथा सिन्धुद्वीप, देवापि और विश्वामित्रजीने किस तरह ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था? भगवन्‌! यह सब मुझे बताइये। इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी भारी उत्सुकता है

阇那梅阇耶说道:“婆罗门啊,善者之最胜者啊!提婆阿毗(Devāpi)如何成为那般?毗湿瓦密多罗(Viśvāmitra)又如何成为那般?尊者请为我开示;我心中充满至高的好奇。”

Verse 3

वैशग्पायन उवाच पुरा कृतयुगे राजन्नार्टिषेणो द्विजोत्तम: । वसन्‌ गुरुकुले नित्यं नित्यमध्ययने रत:,वैशम्पायनजीने कहा--राजन! प्राचीन कालके सत्ययुगकी बात है, द्विजश्रेष्ठ आ्टिषिण सदा गुरुकुलमें निवास करते हुए निरन्तर वेद-शास्त्रोंके अध्ययनमें लगे रहते थे

毗舍波耶那说道:“大王啊!在久远的往昔,于克利多瑜伽(Kṛtayuga)之世,有一位最胜的二生者(dvija)名为阿尔提舍那(Ārtiṣeṇa)。他常住师门(gurukula),日日不辍,专心研习吠陀与诸论典(śāstra)。”

Verse 4

तस्य राजन्‌ गुरुकुले वसतो नित्यमेव च । समाप्तिं नागमद्‌ विद्या नापि वेदा विशाम्पते,प्रजानाथ! नरेश्वर! गुरुकुलमें सर्वदा रहते हुए भी न तो उनकी विद्या समाप्त हुई और न वे सम्पूर्ण वेद ही पढ़ सके

毗舍婆耶那说道:“大王啊,尽管他长久住在师长之家(古鲁库拉)中,他的学业却始终未能圆满;而且,人民之主、人间之王啊,他也无法将诸《吠陀》尽数贯通。”

Verse 5

स निर्विण्णस्ततो राजंस्तपस्तेपे महातपा: । ततो वै तपसा तेन प्राप्य वेदाननुत्तमान्‌,नरेश्वर! इससे महातपस्वी आर्टरिषेण खिन्न एवं विरक्त हो उठे, फिर उन्होंने सरस्वतीके उसी तीर्थमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की। उस तपके प्रभावसे उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके वे ऋषिश्रेष्ठ विद्वान वेदज्ञ और सिद्ध हो गये। तदनन्तर उन महातपस्वीने उस तीर्थको तीन वर प्रदान किये--

毗舍婆耶那说道:“于是那位大苦行者,因心生厌倦而超然离欲,大王啊,便修行苦行。凭借苦行之力,人间之主啊,他得到了无上的诸《吠陀》,遂成最上见者,通达圣学,并臻于灵性成就。”

Verse 6

स विद्वान वेदयुक्तश्न सिद्धश्नाप्यूषिसत्तम: । तत्र तीर्थे वरान्‌ प्रादात्‌ त्रीनेव सुमहातपा:,नरेश्वर! इससे महातपस्वी आर्टरिषेण खिन्न एवं विरक्त हो उठे, फिर उन्होंने सरस्वतीके उसी तीर्थमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की। उस तपके प्रभावसे उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके वे ऋषिश्रेष्ठ विद्वान वेदज्ञ और सिद्ध हो गये। तदनन्तर उन महातपस्वीने उस तीर्थको तीन वर प्रदान किये--

那位最胜仙人,博学而具足吠陀之智,也臻于圆满。随后在那圣渡(tīrtha)之处,大苦行者向此渡口本身赐下三种恩赐。

Verse 7

अस्मिंस्तीर्थे महानद्या अद्यप्रभृति मानव: । आप्लुतो वाजिमेधस्य फल प्राप्स्यति पुष्कलम्‌,“आजसे जो मनुष्य महानदी सरस्वतीके इस तीर्थमें स्नान करेगा, उसे अश्वमेध-यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा। आजसे इस तीर्थमें किसीको सर्पसे भय नहीं होगा। थोड़े समयतक ही इस तीर्थके सेवनसे मनुष्यको बहुत अधिक फल प्राप्त होगा”

毗舍婆耶那说道:“自今日起,凡在大河此圣渡沐浴之人,皆将获得丰厚功德——即阿湿婆梅陀马祭(Aśvamedha)之圆满果报。自今日起,在此圣渡无人须惧蛇患;即便短暂依止此圣地,也能得极大灵福。”

Verse 8

अद्यप्रभृति नैवात्र भयं व्यालादू भविष्यति | अपि चाल्पेन कालेन फल प्राप्स्पति पुष्कललम्‌,“आजसे जो मनुष्य महानदी सरस्वतीके इस तीर्थमें स्नान करेगा, उसे अश्वमेध-यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा। आजसे इस तीर्थमें किसीको सर्पसे भय नहीं होगा। थोड़े समयतक ही इस तीर्थके सेवनसे मनुष्यको बहुत अधिक फल प्राप्त होगा”

毗舍婆耶那说道:“自今日起,此处不再有蛇患之惧。即便在短时之间,凡来依止此圣地者,也将获得丰厚功德。”

Verse 9

एवमुकक्‍्त्वा महातेजा जगाम त्रिदिवं मुनि: | एवं सिद्धः स भगवानार्शिषेण: प्रतापवान्‌,ऐसा कहकर वे महातेजस्वी मुनि स्वर्गलोकको चले गये। इस प्रकार पूजनीय एवं प्रतापी आर्डिषिण ऋषि उस तीर्थमें सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं

毗耶娑之弟子毗舍摩波耶那说道:说罢此言,那位光辉炽盛的大圣便前往三天界(Tridiva,天上世界)。如此,这位可敬而威猛的仙人阿尔希舍那(Ārṣiṣeṇa)在那神圣的渡口证得成就,昭示真实之语与清净之行终将凝成可证的功德。

Verse 10

तस्मिन्नेव तदा तीर्थे सिन्धुद्वीप: प्रतापवान्‌ । देवापिश्न महाराज ब्राह्नाण्यं प्रापतुर्महत्‌,महाराज! उन्हीं दिनों उसी तीर्थमें प्रतापी सिन्धुद्वीप तथा देवापिने वहाँ तप करके महान ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था

毗舍摩波耶那说道:“就在那同一处圣渡口,当时,威力非凡的信度洲(Sindhudvīpa)与提婆阿毗(Devāpi)也一样,噢大王,在那里修行苦行(tapas),而得大梵行之位,成就婆罗门之境。”

Verse 11

तथा च कौशिकस्तात तपोनित्यो जितेन्द्रिय: । तपसा वै सुतप्तेन ब्राह्मणत्वमवाप्तवान्‌,तात! कुशिकवंशी विश्वामित्र भी वहीं निरन्तर इन्द्रिय-संयमपूर्वक तपस्या करते थे। उस भारी तपस्याके प्रभावसे उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति हुई

毗舍摩波耶那说道:“同样地,亲爱的啊,憍尸迦(Kauśika)恒常奉行苦行,克制诸根;凭借严峻而圆满的苦行(tapas),他确实获得了婆罗门之位。”

Verse 12

गाधिनाम महानासीत्‌ क्षत्रिय: प्रथितो भुवि | तस्य पुत्रो5भवद्‌ राजन विश्वामित्र: प्रतापवान्‌,राजन! पहले इस भूतलपर गाधिनामसे विख्यात महान क्षत्रिय राजा राज्य करते थे। प्रतापी विश्वामित्र उन्हींके पुत्र थे

毗舍摩波耶那说道:“噢大王,在这大地上,往昔曾有一位伟大的刹帝利,名号为迦提(Gādhi),闻名于世。其子,噢大王,便是威猛英勇的毗湿瓦密多罗(Viśvāmitra)。”

Verse 13

स राजा कौशिकस्तात महायोग्यभवत्‌ किल । स पुत्रमभिषिच्याथ विश्वामित्रं महातपा:,तात! लोग कहते हैं कि कुशिकवंशी राजा गाधि महान्‌ योगी और बड़े भारी तपस्वी थे। उन्होंने अपने पुत्र विश्वामित्रको राज्यपर अभिषिक्त करके शरीरको त्याग देनेका विचार किया। तब सारी प्रजा उनसे नतमस्तक होकर बोली--“महाबुद्धिमान्‌ नरेश! आप कहीं न जाय, यहीं रहकर हमारी इस जगतके महान्‌ भयसे रक्षा करते रहें!

毗舍摩波耶那说道:“亲爱的啊,人们确实传说,憍尸迦一族的迦提王(Gādhi)成为了大瑜伽行者。那位大苦行者在为其子毗湿瓦密多罗(Viśvāmitra)举行灌顶、立为国王之后,便决意舍弃此身,走向出离。”

Verse 14

देहन्यासे मनश्नक्रे तमूचु: प्रणता: प्रजा: । न गन्तव्यं महाप्राज्ञ त्राहि चास्मान्‌ महाभयात्‌,तात! लोग कहते हैं कि कुशिकवंशी राजा गाधि महान्‌ योगी और बड़े भारी तपस्वी थे। उन्होंने अपने पुत्र विश्वामित्रको राज्यपर अभिषिक्त करके शरीरको त्याग देनेका विचार किया। तब सारी प्रजा उनसे नतमस्तक होकर बोली--“महाबुद्धिमान्‌ नरेश! आप कहीं न जाय, यहीं रहकर हमारी इस जगतके महान्‌ भयसे रक्षा करते रहें!

毗舍婆耶那说:当他决意舍弃此身之时,百姓俯首归顺,向他禀告:“噢,大智者!你不可离去。请留在此处,亲爱的主君,护佑我们脱离笼罩世间的巨大恐惧。”

Verse 15

एवमुक्त: प्रत्युवाच ततो गाधि: प्रजास्तत: । विश्वस्य जगतो गोप्ता भविष्यति सुतो मम,उनके ऐसा कहनेपर गाधिने सम्पूर्ण प्रजाओंसे कहा--'मैरा पुत्र सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करनेवाला होगा (अतः तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिये)”

毗舍婆耶那说:众人如此陈情后,伽陀对全体百姓答道:“我的儿子将成为护持整个世界之人;因此你们不必畏惧。”

Verse 16

इत्युक्त्वा तु ततो गाधिरविश्वामित्रं निवेश्य च । जगाम त्रिदिवं राजन विश्वामित्रो5भवन्नूप:,राजन! यों कहकर राजा गाधि विश्वामित्रको राजसिंहासनपर बिठाकर स्वर्गलोकको चले गये। तत्पश्चात्‌ विश्वामित्र राजा हुए

说罢,伽陀王将毗湿瓦密多安置于王座之上。随后,噢,国王啊,伽陀前往天界;此后毗湿瓦密多便成为统治者。

Verse 17

न स शवक्नोति पृथिवीं यत्नवानपि रक्षितुम्‌ । ततः शुश्राव राजा स राक्षसेभ्यो महाभयम्‌,वे प्रयत्नशील होनेपर भी सम्पूर्ण भूमण्डलकी रक्षा नहीं कर पाते थे। एक दिन राजा विश्वामित्रने सुना कि 'प्रजाको राक्षसोंसे महान्‌ भय प्राप्त हुआ है”

纵然竭尽心力,他仍无法守护大地周全。随后,那位国王听闻百姓因罗刹而陷入巨大的恐惧之中。

Verse 18

निर्ययौ नगराच्चापि चतुरज्भबलान्वित: । स गत्वा दूरमध्वानं वसिष्ठाश्रममभ्ययात्‌,तब वे चतुरंगिणी सेना लेकर नगरसे निकल पड़े और दूरतकका रास्ता तय करके वसिष्ठके आश्रमके पास जा पहुँचे

于是他率领完备的四部军(车、象、马、步)出离城邑。行经长途之后,他来到婆悉吒的隐修院近旁。

Verse 19

तस्य ते सैनिका राजंश्चक्रुस्तत्रानयात्‌ बहून्‌ । ततस्तु भगवान्‌ विप्रो वसिष्ठो55श्रममभ्ययात्‌,राजन! उनके उन सैनिकोंने वहाँ बहुत-से अन्याय एवं अत्याचार किये। तदनन्तर पूज्य ब्रह्मर्षि वसिष्ठ कहींसे अपने आश्रमपर आये

大王啊,他的士卒在那里犯下了许多不义与暴虐之行。随后,受人敬奉的婆罗门圣仙瓦西什塔——那位神圣的贤者——回到了自己的道场,仿佛在罪行之后,正义的清算即将展开。

Verse 20

ददृशेडथ ततः सर्व भज्यमानं महावनम्‌ | तस्य क्रुद्धो महाराज वसिष्ठो मुनिसत्तम:,आकर उन्होंने देखा कि वह सारा विशाल वन उजाड़ होता जा रहा है। महाराज! यह देखकर मुनिवर वसिष्ठ राजा विश्वामित्रपर कुपित हो उठे

毗湿摩波耶那说:随后他看见整片大森林正被摧折毁坏,渐成荒芜。大王啊,目睹此景,最上圣者瓦西什塔对毗湿瓦密特罗王怒火大作——警示世人:若权势被争竞与嗔怒驱使,连圣地也会化为废墟,并招致智者的谴责。

Verse 21

सृजस्व शबरान्‌ घोरानिति स्वां गामुवाच ह | तथोक्ता सासृजद्‌ धेनु: पुरुषान्‌ घोरदर्शनान्‌,फिर उन्होंने अपनी गौ नन्दिनीसे कहा--“तुम भयंकर भील जातिके सैनिकोंकी सृष्टि करो'। उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर उनकी होमधेनुने ऐसे पुरुषोंको उत्पन्न किया, जो देखनेमें बड़े भयानक थे

毗湿摩波耶那说:他对自己的母牛说道:“生出凶猛的舍婆罗战士吧。” 奉命之后,那头如愿神牛立刻生出一群形貌可怖的男子——此事彰显:苦行之力与神圣资粮,一旦用于护卫或争战,便能迅疾显现为可畏的威势。

Verse 22

ते तु तद्बलमासाद्य बभज्जुः सर्वतोदिशम्‌ । तच्छुत्वा दिद्वुतं सैन्यं विश्वामित्रस्तु गाधिज:

他们迎上那股力量,便从四面八方将其击碎。听闻军队骤然溃散、惊惶奔逃,毗湿瓦密特罗——迦提之子——(遂作相应举动)。此段揭示:战阵之中一旦群体纪律崩解,强盛立刻化为溃败;而统御之责与危局中的镇定,便显出其沉重的道义分量。

Verse 23

सो<स्मिंस्तीर्थवरे राजन्‌ सरस्वत्या: समाहित:

毗湿摩波耶那说:“大王啊,在那最殊胜的圣渡处,他心神澄定,专注于萨拉斯瓦蒂河。”

Verse 24

जलाहारो वायुभक्ष: पर्णाहारश्न सो5भवत्‌

毗舍波耶那说道:他修行极其严厉的苦行——有时仅以清水为食,有时仿佛只凭空气维生,有时则以落叶充饥——由此选择了严峻自制的生活。

Verse 25

असकृत्तस्य देवास्तु व्रतविध्नं प्रचक्रिरे

毗舍波耶那说道:然而诸天屡次设下障碍,阻挠他守持誓戒,扰乱他修行的轨迹。

Verse 26

ततः परेण यत्नेन तप्त्वा बहुविधं तप:

随后,他以更大的决心与努力,修持并圆满了种种苦行——自律之行愈加严峻,昭示其道德意志与有目的的坚忍,在叙事推进中愈发分明。

Verse 27

तपसा तु तथा युक्त विश्वामित्रं पितामह:

于是,祖父尊者(皮塔摩诃)见毗湿瓦密多如此具足苦行,便承认那由严谨苦修所生的威力——意在表明:灵性之努力若行之得法,足以使人的地位与效能超越凡常界限。

Verse 28

स तु वत्रे वरं राजन्‌ स्यामहं ब्राह्मणस्त्विति

然而他所求之恩,王啊,是:“愿我成为婆罗门(brāhmaṇa)。”在王权与兵戈的纷扰之中,此愿显出他有意转向与圣学与克制相连的身份与戒律,暗示他更重灵性权威而非世间权势。

Verse 29

स लब्ध्वा तपसोग्रेण ब्राह्मणत्वं महायशा:

毗耶娑波耶那说道:凭借严峻苦行之力,那位大名远扬者获得了婆罗门的地位——昭示道德的升华源于自律与克己,而非仅凭出身或世间权势。

Verse 30

तस्मिंस्तीर्थवरे राम: प्रदाय विविधं वसु

在那里,在最殊胜的圣渡口,罗摩施舍了种种财物——强调达摩的理想:朝圣并非只靠沐浴或立誓而圆满,更在于慷慨布施、扶持堪受之人。

Verse 31

पयस्विनीस्तथा थेनूर्यानानि शयनानि च । अथ वस्त्राण्यलड्कारं भक्ष्यं पेयं च शोभनम्‌

毗耶娑波耶那说道:“他们又供奉产乳之牛、车乘与卧榻;并且献上华美衣裳与饰物,以及上等饮食与佳酿。”此偈凸显了以厚礼与款待来尊敬他人的惯常伦理,即便置身战争叙事的重压之中亦然。

Verse 32

अददान्मुदितो राजन्‌ पूजयित्वा द्विजोत्तमान्‌ | ययौ राजंस्ततो रामो बकस्याश्रममन्तिकात्‌ । यत्र तेपे तपस्तीव्रं दाल्भ्यो बक इति श्रुति:

毗耶娑波耶那说道:“大王啊,罗摩欢喜施与诸礼,并依礼敬奉最尊贵的再生者(婆罗门等),随后离开了婆迦仙人住处的近旁。传闻在那地方,达尔毗耶·婆迦曾修行极其严酷的苦行。”

Verse 39

इस प्रकार श्रीमह्या भारत शल्यपव्वके अन्तर्गत गदापबव॑नें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

至此,《神圣摩诃婆罗多》舍利耶篇之伽陀分中,发生于婆罗提婆(Baladeva)朝圣行旅背景下的“娑罗湿伐多”(Sārasvata)插叙第三十九章告终。叙事在此郑重收束这一段教诲与故事,并将其安置于更宏阔的伦理框架之中:职责、克制,以及战后余波里行为所招致的果报。

Verse 40

राजन्‌! बलरामजीने उस श्रेष्ठ तीर्थमें उत्तम ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें दूध देनेवाली गौएँ, वाहन, शय्या, वस्त्र अलंकार तथा खाने-पीनेके सुन्दर पदार्थ प्रसन्नतापूर्वक दिये। फिर वहाँसे वे बकके आश्रमके निकट गये, जहाँ दल्भपुत्र बकने तीव्र तपस्या की थी || ३०-- ३२ || इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने चत्वारिंशो5ध्याय:

毗舍摩波耶那说道:“大王啊,婆罗罗摩在那卓越的圣渡处礼敬供养上等婆罗门,欢喜施与他们产乳之牛、车乘、床榻、衣服、饰物,以及精美的饮食。随后他前往婆迦的隐修处附近;在那里,达尔婆之子婆迦曾行极严厉的苦行。”

Verse 226

तप: परं मनन्‍्यमानस्तपस्येव मनो दथधे | उन्होंने विश्वामित्रकी सेनापर आक्रमण करके उनके सैनिकोंको सम्पूर्ण दिशाओं में मार भगाया। गाधिनन्दन विश्वामित्रने जब यह सुना कि मेरी सेना भाग गयी तो तपको ही अधिक प्रबल मानकर तपस्यामें ही मन लगाया

他以苦行之力(tapas)为至上,便一心系念于苦行。随后他突袭毗湿瓦密多罗的军队,击散其兵,使之四方奔逃。迦提之子毗湿瓦密多罗听闻己军溃散,便断定苦行更为强胜,于是不求报复,反而内观其心,专志于修持与忏悔。

Verse 236

नियमैश्लोपवासैश्व कर्षयन्‌ देहमात्मन: । राजन! उन्होंने सरस्वतीके उस श्रेष्ठ तीर्थमें चित्तको एकाग्र करके नियमों और उपवासोंके द्वारा अपने शरीरको सुखाना आरम्भ किया

毗舍摩波耶那说道:“大王啊,他在萨拉斯瓦蒂河那最胜的圣渡处一心专注,便开始自我调御——以戒律与斋戒使自身枯槁,降伏其身。”

Verse 246

तथा स्थण्डिलशायी च ये चान्ये नियमा: पृथक्‌ । वे कभी जल पीकर रहते, कभी वायुको ही आहार बनाते और कभी पत्ते चबाकर रहते थे। सदा भूमिकी वेदी बनाकर उसपर सोते और तपस्यासम्बन्धी जो अन्य सारे नियम हैं उनका भी पृथक्‌-पृथक्‌ पालन करते थे

毗舍摩波耶那说道:“同样地,他们卧于裸地之上,并且以各自不同的方式奉行其他一切苦行戒律。有时仅以饮水度日,有时以风为食,有时嚼食树叶。他们常以泥土筑成地坛,便卧其上;凡与苦行相关的诸般‘尼耶摩’戒行,也都分别遵守。”

Verse 256

न चास्य नियमाद्‌ बुद्धिरपयाति महात्मन: । देवताओंने उनके व्रतमें बारंबार विघ्न डाला; परंतु उन महात्माकी बुद्धि कभी नियमसे विचलित नहीं होती थी

毗舍摩波耶那说道:“纵使诸天屡屡在他的誓愿前设置障碍,那位大魂者的智慧与决意也从未偏离其自立的戒行。”

Verse 266

तेजसा भास्कराकारो गाधिज: समपद्यत । तदनन्तर महान प्रयत्नके द्वारा नाना प्रकारकी तपस्या करके गाधिनन्दन विश्वामित्र अपने तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे

毗舍波耶那说:凭借苦行的威力,迦提之子(毗湿瓦密多罗)获得了如太阳般的光辉。其后,他以宏大的、持久的精进,修习种种苦行(tapas),遂放射出日轮般的灿然辉耀。

Verse 276

अमन्यत महातेजा वरदो वरमस्य तत्‌ | विश्वामित्रको ऐसी तपस्यासे युक्त देख महातेजस्वी एवं वरदायक ब्रह्माजीने उन्हें वर देनेका विचार किया

毗舍波耶那说:见毗湿瓦密多罗如此精勤于严峻苦行,光辉灿然、素以赐福著称的梵天便决意赐他一项恩赐。

Verse 283

तथेति चाब्रवीद्‌ ब्रह्मा सर्वतोकपितामह: । राजन! तब उन्होंने यह वर माँगा कि "मैं ब्राह्मण हो जाऊँ।” सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने उन्हें “तथास्तु कहकर वह वर दे दिया

毗舍波耶那说:“如是。”万界之祖父梵天答道。大王啊,当时他祈求恩赐:“愿我成为婆罗门(brāhmaṇa)。”梵天,这位普世的始祖,便说“如是(tathāstu)”,赐予了他此愿。

Verse 296

विचचार महीं कृत्स्नां कृतकाम: सुरोपम: । उस उग्र तपस्याके द्वारा ब्राह्मणत्व पाकर सफलमनोरथ हुए महायशस्वी विश्वामित्र देवताके समान समस्त भूमण्डलमें विचरने लगे

毗舍波耶那说:其志既遂,光彩如天神,便周游遍历大地。凭借猛烈的苦行,他获得婆罗门之位;声名显赫的毗湿瓦密多罗,愿望圆满,行走于整个世界。

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns how a ruler’s impulsive, contemptuous speech toward a religious petitioner can constitute a governance failure with systemic consequences, and what constitutes adequate restitution once harm has propagated to the realm.

The chapter models restraint and accountability: authority is not merely coercive power but disciplined conduct; reconciliation becomes possible through truthful self-assessment, humility, and corrective action rather than denial.

Rather than a formal phalaśruti, the chapter functions as an etiological and didactic exemplum: it explains a pattern of misfortune through moral-ritual causality and implies that understanding tīrtha narratives supports dharma-oriented governance and social repair.