
सरस्वतीतीर्थानुक्रमः — बलरामस्य तीर्थयात्रा (Sarasvatī Tīrtha Itinerary — Balarāma’s Pilgrimage)
Upa-parva: Sarasvatī-Tīrtha-Yātrā (Balarāma’s pilgrimage sequence within Śalya-parva)
Vaiśaṃpāyana narrates Balarāma’s arrival at Vinaśana, so named because Sarasvatī is said to have ‘vanished’ there due to hostility directed toward Śūdra-Ābhīras. After ritual bathing, Balarāma proceeds to Subhūmika, described as an apsaras play-ground frequented periodically by devas and gandharvas. He then visits Gandharva-tīrtha and Gargasrota, where the sage Garga is credited with instituting auspicious and ominous temporal/astral ordinances; ṛṣis attend him for knowledge of time (kāla-jñāna). Moving onward to Śaṅkha-tīrtha, Balarāma observes a great conch-like mountain and a domain associated with yakṣas, vidyādharas, rākṣasas, and piśācas living under vows. He reaches Dvaitavana, then Nāgadhanvāna—Vāsuki’s seat—where devas consecrate Vāsuki and fear of serpents is said to be absent. At a major tīrtha where Sarasvatī turns to face east (prāṅmukhī), Janamejaya asks why the river reversed; Vaiśaṃpāyana explains that during a twelve-year Naimiṣeya satra in Kṛtayuga, overcrowding of ṛṣis led Sarasvatī, out of compassion, to create many groves and temporarily reverse course, producing the famed ‘Naimiṣeya’ bend. Balarāma again performs rites and gifts, then proceeds through a richly described sacred landscape toward Saptasārasvata, associated with the siddha Maṅkaṇaka.
Chapter Arc: बलराम मुसलधारी तीर्थ-यात्रा में एक ऐसे उदपान-तीर्थ पर पहुँचते हैं, जहाँ जल का स्पर्श करते ही एक प्राचीन, विस्मयकारी कथा जाग उठती है—त्रित मुनि का यज्ञ, कूप और देवताओं का आगमन। → वैशम्पायन त्रित की कथा खोलते हैं: यज्ञ-कुशल, वेद-निष्ठ तपस्वी त्रित अपने भाइयों (एकत और द्वित) के साथ चलते हैं; पीछे रह गए भाई पशुओं को हाँकते-हाँकते ईर्ष्या/कपट से त्रित को कूप में गिरा देते हैं। कूप के अँधेरे में भी त्रित धर्मपरायण रहकर यज्ञ का संकल्प नहीं छोड़ते और वहीं से सोम-यज्ञ आरम्भ कर देते हैं; स्वर्गलोक तक वेदमंत्रों का तुमुलनाद पहुँचता है और देवता चकित-उद्विग्न हो उठते हैं। → देवपुरोहित बृहस्पति मंत्र-ध्वनि सुनकर देवताओं से कहते हैं कि त्रित का यज्ञ हो रहा है—चलो। देवगण कूप के पास पहुँचकर देखते हैं कि भीतर दीक्षित महात्मा त्रित यज्ञ चला रहे हैं; भागार्थी देवता स्वयं उपस्थित होकर यज्ञ-भाग माँगते हैं—कूप की कैद के बीच भी त्रित की तप-शक्ति और यज्ञ-तेज का सार्वभौम स्वीकार। → देवताओं और पुण्यलक्षण मुनियों की उपस्थिति से त्रित का यज्ञ सिद्ध होता है; त्रित अपने साथ हुए अधर्म का स्मरण कर भाइयों को शाप देते हैं, जिससे भ्रातृ-द्रोह का फल सुनिश्चित होता है। कथा के श्रवण के बाद बलराम उस तीर्थ में दान, ब्राह्मण-पूजन और स्नान/आचमन कर आगे बढ़ते हैं—तीर्थ का माहात्म्य स्थापित होता है। → बलराम की तीर्थ-यात्रा आगे किन-किन प्राचीन प्रसंगों और तीर्थ-माहात्म्यों को उद्घाटित करेगी, यह जिज्ञासा बनी रहती है।
Verse 1
ऑपनआक्रात बछ। 2 षट्त्रिशो5ध्याय: उदपानतीर्थकी उत्पत्तिकी तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा वैशम्पायन उवाच तस्मान्नदीगतं चापि हुदपानं यशस्विन: । त्रितस्य च महाराज जगामाथ हलायुध:,वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज! उस चमसोद्धेद-तीर्थसे चलकर बलरामजी यशस्वी त्रितमुनिके उदपान तीर्थमें गये, जो सरस्वती नदीके जलमें स्थित है
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,离开那处位于河流之中的圣地之后,持犁者哈拉尤陀(婆罗罗摩)便前往仙人特利多著名的‘乌达帕那圣渡’——那座井泉圣所,坐落在萨拉斯瓦蒂河的水域之中。”
Verse 2
तत्र दत्त्वा बहु द्रव्यं पूजयित्वा तथा द्विजान् | उपस्पृश्य च तत्रैव प्रह्ृष्टो मुसलायुध:,मुसलधारी बलरामजीने वहाँ जलका स्पर्श, आचमन एवं स्नान करके बहुत-सा द्रव्य दान करनेके पश्चात् ब्राह्मणोंका पूजन किया। फिर वे बहुत प्रसन्न हुए
在那里,他施舍大量财物,并如法礼敬诸“二生者”(婆罗门);又以触水行净礼。就在那处,执杵者(婆罗罗摩)心中充满欢喜。
Verse 3
तत्र धर्मपरो भूत्वा त्रित: स सुमहातपा: । कूपे च वसता तेन सोम: पीतो महात्मना
在那里,特利多坚住于法,苦行之力极其深厚;当他居于井中时,那位大士饮下了苏摩。
Verse 4
वहाँ महातपस्वी त्रितमुनि धर्मपरायण होकर रहते थे। उन महात्माने कुएँमें रहकर ही सोमपान किया था ।। तत्र चैनं समुत्सृज्य भ्रातरौ जम्मतुर्गहान् । ततस्तौ वै शशापाथ त्रितो ब्राह्मणसत्तम:,उनके दो भाई उस कुएँमें ही उन्हें छोड़कर घरको चले गये थे। इससे ब्राह्मणश्रेष्ठ त्रितने दोनोंको शाप दे दिया था
毗湿摩波耶那说道:在那里,两位兄弟弃他而去,径自回家。随后,特利多——婆罗门中最卓越者——便对他们宣下诅咒。
Verse 5
जनमेजय उवाच उदपानं कथं ब्रह्मन् कथं च सुमहातपा: । पतित: कि च संत्यक्तो भ्रातृभ्यां द्विजसत्तम,एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन् श्रोतव्यं यदि मन्यसे । जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! उदपान तीर्थ कैसे हुआ? वे महातपस्वी त्रितमुनि उसमें कैसे गिर पड़े और द्विजश्रेष्ठ उनके दोनों भाइयोंने उन्हें क्यों वहीं छोड़ दिया था? क्या कारण था, जिससे वे दोनों भाई उन्हें कुएँमें ही त्यागकर घर चले गये थे? वहाँ रहकर उन्होंने यज्ञ और सोमपान कैसे किया? ब्रह्मन! यदि यह प्रसंग मेरे सुननेयोग्य समझें तो अवश्य मुझे बतावें
阇那美阇耶说道:“婆罗门啊,那口井如何成为圣渡(tīrtha)?那位大苦行者特利多又是如何坠入其中?二生者中最胜者啊,他为何被两位兄弟遗弃在井里——究竟因何缘故,他们把他留在井中便回家去了?而他身处其间,又如何举行祭祀(yajña)并饮苏摩?婆罗门啊,若你认为此事值得聆听,请为我详述。”
Verse 6
कूपे कथं च हित्वैनं भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् । कथं च याजयामास पपौ सोम॑ च वै कथम्
阇那美阇耶问道:“那两兄弟如何把他弃在井中而回家?后来他又如何为他人主持祭祀?他究竟又是如何饮下苏摩的?”
Verse 7
वैशम्पायन उवाच आसन पूर्वयुगे राजन् मुनयो भ्रातरस्त्रय:,ब्रह्मलोकजित: सर्वे तपसा ब्रह्मवादिन: । वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! पहले युगमें तीन सहोदर भाई रहते थे। वे तीनों ही मुनि थे। उनके नाम थे एकत, द्वित और त्रित। वे सभी महर्षि सूर्यके समान तेजस्वी, प्रजापतिके समान संतानवान् और ब्रह्मवादी थे। उन्होंने तपस्याद्वारा ब्रह्मलोकपर विजय प्राप्त की भी
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,在久远的往昔,有三位同胞兄弟为牟尼圣者。三人皆宣说梵(Brahman)之理,并以苦行之力得胜——亦即得以进入梵天之界(梵天世界)。”
Verse 8
एकततक्ष द्वितश्रैव त्रितश्नादित्यसंनिभा: । सर्वे प्रजापतिसमा: प्रजावन्तस्तथैव च
厄迦多、提毗多与特利多——光辉如日。众人皆可比于生主(Prajāpati)这般伟大的始祖,并且各自亦有子嗣。
Verse 9
तेषां तु तपसा प्रीतो नियमेन दमेन च
他因他们的苦行、戒律与自制而心生欢喜。
Verse 10
स तु दीर्घेण कालेन तेषां प्रीतिमवाप्य च
时日既久,经过漫长岁月,他也赢得了他们的好感与亲厚。
Verse 11
राजानस्तस्य ये ह्वासन् याज्या राजन् महात्मन:
毗湿摩波耶那说道:“大王,那些本应受祭祀礼敬的诸王——高贵而具大心者——(亦在场/亦与此事相关)。”
Verse 12
तेषां तु कर्मणा राजंस्तथा चाध्ययनेन च
毗湿摩波耶那说道:“然而,大王,他们既以其行事之功,也以其研习圣学之勤——……”
Verse 13
तथा सर्वे महाभागा मुनय: पुण्यलक्षणा:
于是,诸位福德深厚的牟尼仙人——具清净瑞相与德行——(皆集会/皆在场),以其吉祥之质,使所叙之事更具道义分量。
Verse 14
अपूजयन् महाभागं यथास्य पितरं तथा । महान् सौभाग्यशाली और पुण्यात्मा सभी महर्षि भी महाभाग त्रितका उनके पिताके तुल्य ही सम्मान करते थे ।। कदाचिद्धि ततो राजन् भ्रातरावेकतद्वितौ,राजन्! एक दिनकी बात है, उनके दोनों भाई एकत और द्वित यज्ञ और धनके लिये चिन्ता करने लगे। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि हमलोग त्रितको साथ लेकर यजमानोंका यज्ञ करावें और दक्षिणाके रूपमें बहुत-से पशु प्राप्त करके महान् फलदायक यज्ञका अनुष्ठान करें और उसीमें प्रसन्नतापूर्वक सोमरसका पान करें
毗湿摩波耶那说道:大心的特利塔——有福而有德——为一切仙人所敬,如同他们敬其父一般。其后,大王,有一日,他的两位兄弟——埃迦塔与德维塔——开始商议祭祀与财利之事。他们心中生起一念:“让我们带上特利塔,同去为施主主持祭礼;以祭资之名得许多牛群,举行一场果报宏大的大祭,并在其中欢心畅饮苏摩。”
Verse 15
यज्ञार्थ चक्रतुश्निन्तां तथा वित्तार्थमेव च । तयोबुद्धि: समभवत् त्रितं गृह्य परंतप,राजन्! एक दिनकी बात है, उनके दोनों भाई एकत और द्वित यज्ञ और धनके लिये चिन्ता करने लगे। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि हमलोग त्रितको साथ लेकर यजमानोंका यज्ञ करावें और दक्षिणाके रूपमें बहुत-से पशु प्राप्त करके महान् फलदायक यज्ञका अनुष्ठान करें और उसीमें प्रसन्नतापूर्वक सोमरसका पान करें
毗湿摩波耶那说道:为求祭祀之功与财利之得,两兄弟便开始筹谋。于是他们下定决心道:“大王,克敌者啊,让我们带上特利塔,同去为施主主持祭礼;以祭资得许多牛群,举行一场宏大而多果报的祭仪,并在其中欢心畅饮苏摩。”
Verse 16
याज्यान् सर्वानुपादाय प्रतिगृहा पशूंस्तत: । सोम पास्यामहे हृष्टा: प्राप्प यज्ञ महाफलम्,राजन्! एक दिनकी बात है, उनके दोनों भाई एकत और द्वित यज्ञ और धनके लिये चिन्ता करने लगे। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि हमलोग त्रितको साथ लेकर यजमानोंका यज्ञ करावें और दक्षिणाके रूपमें बहुत-से पशु प्राप्त करके महान् फलदायक यज्ञका अनुष्ठान करें और उसीमें प्रसन्नतापूर्वक सोमरसका पान करें
毗湿摩波耶那说道:“我们将召集一切合格的祭主,又挨家挨户收取牲畜为达克希那(祭礼酬谢)。既得大祭之厚报,便当欢然饮苏摩,噢,大王!”(就其语境而言,此言含有算计之意:以司祭之职为取财之途,继而沉醉于祭饮,由此在神圣职责与逐利动机之间引出道德张力。)
Verse 17
चक्कुश्चैवं तथा राजन् भ्रातरस्त्रय एव च । तथा ते तु परिक्रम्य याज्यान् सर्वान् पशून् प्रति,प्राचीं दिशं महात्मान आजम्मुस्ते महर्षय: । राजन्! ऐसा विचार करके उन तीनों भाइयोंने वही किया। वे सभी यजमानोंके यहाँ पशुओंकी प्राप्तिके उद्देश्स्से गये और उनसे विधिपूर्वक यज्ञ करवाकर उस याज्यकर्मके द्वारा उन्होंने बहुतेरे पशु प्राप्त कर लिये। तत्पश्चात् वे महात्मा महर्षि पूर्वदिशाकी ओर चल दिये
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,恰库与其二弟——三兄弟既作此决断,便周行于诸合格祭主之间,求取牲畜为达克希那。依仪轨为诸祭主主持祭祀之后,他们凭此司祭之业得了许多牲畜。随后,那些大心的圣仙便向东方启程。”
Verse 18
याजयित्वा ततो याज्यॉल्लब्ध्वा तु सुबहून् पशून् । याज्येन कर्मणा तेन प्रतिगृह् विधानत:
毗湿摩波耶那说道:“其后,他为祭主主持祭祀,受得无数牛畜为达克希那;并依礼依制,按此仪轨所规定的方式加以受纳。”
Verse 19
त्रितस्तेषां महाराज पुरस्ताद् याति हृष्टवत्
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,特利塔欢然自信,走在他们前头,率先而行。”
Verse 20
तयोश्विन्ता समभवद् दृष्टवा पशुगणं महत्
当那二人望见浩大的畜群时,心中忽然生起对战马的渴求——此念由当下所需与战局压力所催逼而成。
Verse 22
त्रितो यज्ञेषु कुशलस्त्रितो वेदेषु निछ्ठित:
毗湿摩波耶那说道:“特里塔善于举行祭祀,特里塔亦在吠陀之学中根基牢固。”
Verse 23
अन्यास्तु बहुला गावस्त्रित: समुपलप्स्यते । तदावां सहितौ भूत्वा गा: प्रकाल्य व्रजावहे
毗湿摩波耶那说道:“别的牛群数量众多,三日之内便可在彼处寻得。故我二人当同往;驱赶这些牛前行,然后前往牛栏。”
Verse 24
त्रितो5पि गच्छतां काममावाभ्यां वै विना कृत: । “तत्रित यज्ञ करानेमें कुशल हैं, त्रित वेदोंके परिनिष्छित विद्वान् हैं, अतः वे और बहुत-सी गौएँ प्राप्त कर लेंगे। इस समय हम दोनों एक साथ होकर इन गौओंको हाँक ले चलें और त्रित हमसे अलग होकर जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जायूँ” || २२-२३ $ ।। तेषामागच्छतां रात्रौ पथिस्थानां वृको5भवत्
毗湿摩波耶那说道:“也让特里塔随其所愿而行;我们已将他撇在后方,不与同往。他善于主持祭祀,亦为通达吠陀之大智者;因此他自会得许多牛作为酬报。此刻我二人当相伴而行,驱赶这些牛前进,让特里塔独自前往他所欲之处。”他们夜间归返,行于路上时,一只狼忽然出现。
Verse 25
तत्र कूपो<विदूरे5 भूत् सरस्वत्यास्तटे महान् । रात्रिका समय था और वे तीनों भाई रास्ता पकड़े चले आ रहे थे। उनके मार्गमें एक भेड़िया खड़ा था। वहाँ पास ही सरस्वतीके तटपर एक बहुत बड़ा कुआँ था ।। अथ त्रितो वृकं दृष्टवा पथि तिष्ठन्तमग्रत:,त्रित अपने आगे रास्तेमें खड़े हुए भेड़ियेको देखकर उसके भयसे भागने लगे। भागते- भागते वे समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर उस महाघोर अगाध कूपमें गिर पड़े
毗湿摩波耶那说道:“近旁,在萨拉斯瓦蒂河岸,有一口巨井。特里塔见狼立于道前,惧而奔逃;而在那惊惶之中,兄弟们竟坠入那口广大、可怖、深不可测、令众生战栗的巨井——此事昭示:恐惧与仓促,往往使人陷入比最初所见之威胁更大的险境。”
Verse 26
तद्धयादपसर्पन् वै तस्मिन् कूपे पपात ह । अगाधे सुमहाघोरे सर्वभूतभयंकरे,त्रित अपने आगे रास्तेमें खड़े हुए भेड़ियेको देखकर उसके भयसे भागने लगे। भागते- भागते वे समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर उस महाघोर अगाध कूपमें गिर पड़े
毗湿摩波耶那说道:“他如此奔逃,果然坠入那井中——深不可底,极其可怖,令一切众生胆寒。此事昭示:惊惶与不加审思的逃避,往往把人推向远甚于最初所见之威胁的险境。”
Verse 27
त्रितस्ततो महाराज कूपस्थो मुनिसत्तम: । आर्तनादं ततश्नक्रे तौ तु शुश्रुवतुर्मुनी,महाराज! कुएँमें पहुँचनेपर मुनिश्रेष्ठ त्रितने बड़े जोरसे आर्तनाद किया, जिसे उन दोनों मुनियोंने सुना
毗舍波耶那说道:于是,国王啊,卓越的牟尼特里塔到了井边,发出一声凄厉的求救哀号。那痛苦的呼喊,被那两位圣仙听见了。
Verse 28
त॑ ज्ञात्वा पतितं कूपे भ्रातरावेकतद्वितौ । वृकत्रासाच्च लोभाच्च समुत्सृज्य प्रजग्मतु:,अपने भाईको कुएँमें गिरा हुआ जानकर भी दोनों भाई एकत और द्वित भेड़ियेके भय और लोभसे उन्हें वहीं छोड़कर चल दिये
毗舍波耶那说道:明知兄长已坠入井中,二弟厄迦特与德毗特仍将他弃置其间而离去——既惧群狼,又为贪欲所驱。
Verse 29
भ्रातृभ्यां पशुलुब्धाभ्यामुत्सृष्टः स महातपा: । उदपाने तदा राजन् निर्जले पांसुसंवृते,राजन! पशुओंके लोभमें आकर उन दोनों भाइयोंने उस समय उन महातपस्वी त्रितको धूलिसे भरे हुए उस निर्जल कूपमें ही छोड़ दिया
毗舍波耶那说道:国王啊,由于贪恋牛群,那两位兄弟竟弃那大苦行者特里塔于彼处——留他在一口无水之井中,尘土壅塞,覆满灰沙。
Verse 30
त्रित आत्मानमालक्ष्य कूपे वीरुतृतृणावृते । निमग्नं भरतश्रेष्ठ नरके दुष्कृती यथा,भरतश्रेष्ठ! जैसे पापी मनुष्य अपने-आपको नरकमें डूबा हुआ देखता है, उसी प्रकार तृण, वीर॒ुध और लताओंसे व्याप्त हुए उस कुएँमें अपने-आपको गिरा देख मृत्युसे डरे और सोमपानसे वंचित हुए विद्वान् त्रित अपनी बुद्धिसे सोचने लगे कि “मैं इस कुएँमें रहकर कैसे सोमरसका पान कर सकता हूँ?”
毗舍ṃ波耶那说道:婆罗多族中最杰出者啊,特里塔见自己陷在一口被蔓草与野草覆盖的井中,恍若罪人沉沦地狱。因惧死而战栗,又被剥夺了苏摩之饮,这位智者便以自心思量道:“我身在此井,如何得饮苏摩?”
Verse 31
स बुद्धयागणयतु प्राज्ञो मृत्योर्भीतो हसोमप: । सोम: कथं तु पातव्य इहस्थेन मया भवेत्,भरतश्रेष्ठ! जैसे पापी मनुष्य अपने-आपको नरकमें डूबा हुआ देखता है, उसी प्रकार तृण, वीर॒ुध और लताओंसे व्याप्त हुए उस कुएँमें अपने-आपको गिरा देख मृत्युसे डरे और सोमपानसे वंचित हुए विद्वान् त्रित अपनी बुद्धिसे सोचने लगे कि “मैं इस कुएँमें रहकर कैसे सोमरसका पान कर सकता हूँ?”
于是,智者特里塔——畏惧死亡,又失却苏摩之饮——便以理智反复思量:“婆罗多族中最杰出者啊,我身在此处,苏摩又怎能为我所饮?”
Verse 32
स एवमभिनिनश्ित्य तस्मिन् कूपे महातपा: । ददर्श वीरुध॑ तत्र लम्बमानां यदृच्छया,इस प्रकार विचार करते-करते महातपस्वी त्रितने उस कुएँमें एक लता देखी, जो दैवयोगसे वहाँ फैली हुई थी
他心中既已如此决断,那位大苦行者特里塔身在井中,偶然看见一条蔓藤垂挂其下。困厄之际,天命亦会赐下哪怕纤细的凭依——为奋力与忍耐开一线生门,而非教人屈服。
Verse 33
पांसुग्रस्ते ततः कूपे विचिन्त्य सलिल॑ मुनि: । अग्नीन् संकल्पयामास होतूनात्मानमेव च,मुनिने उस बालूभरे कूपमें जलकी भावना करके उसीमें संकल्पद्वारा अग्निकी स्थापना की और होता आदिके स्थानपर अपने-आपको ही प्रतिष्ठित किया
随后,在那被沙土堵塞的井中,圣者观想水之存在;又以誓愿之力(saṅkalpa)在彼处安立圣火,并唯以自身充任祭官(hotṛ)。此段彰显内在的戒律与自持的祭仪正统:纵无外缘资具,亦能守法而行。
Verse 34
ततस्तां वीरुधं॑ सोम॑ संकल्प्य सुमहातपा: । ऋचो यजूंषि सामानि मनसा चिन्तयन् मुनि:,सोमस्याभिषवं कृत्वा चकार विपुलं ध्वनिम् । तत्पश्चात् उन महातपस्वी त्रितने उस फैली हुई लतामें सोमकी भावना करके मन-ही- मन ऋग्ू, यजु और सामका चिन्तन किया। नरेश्वर! इसके बाद कंकड़ या बालू-कणोंमें सिल और लोढ़ेकी भावना करके उसपर पीसकर लतासे सोमरस निकाला। फिर जलमें घीका संकल्प करके उन्होंने देवताओंके भाग नियत किये और सोमरस तैयार करके उसकी आहुति देते हुए वेद-मन्त्रोंकी गम्भीर ध्वनि की
于是,那位苦行极严的大修行者在心中观想:那蔓延的藤蔓即是苏摩。圣者默念《梨俱》《夜柔》《娑摩》诸赞歌,于意念中行苏摩压榨之仪,发出洪亮而回荡的声响。此段彰显“誓愿”(saṅkalpa)与吠陀秩序之力:凭内在清净、正当的祭仪知识与专注之心,即使外在资具极少,神圣之行亦能成就。
Verse 35
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑नें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें प्रभासतीर्थका वर्णनविषयक पैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,ग्रावाण: शर्करा: कृत्वा प्रचक्रेडभिषवं नृप । आज्यं च सलिलं चक्रे भागांश्व॒ त्रेदिवौकसाम्
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,他以碎石代作压榨之石,使取苏摩之仪得以运转;又将酥油与清水按分配之法,作为应得之份,奉与居于三重天的诸神。”置于与杵(钵)事相关的婆罗罗摩朝圣叙事框架中,此偈唤起有序祭仪之理想:供品不为己夺取,而依定分分施,彰显克制、合度与敬畏,纵在史诗风云之中亦不失其礼。
Verse 36
स चाविशद् दिवं राजन् पुन: शब्दस्त्रितस्य वै,उदार चित्तवाले बलरामजी सरस्वती नदीके अन्तर्गत उदपानतीर्थका दर्शन करके उसकी बारंबार स्तुति-प्रशंसा करते हुए वहाँसे विनशनतीर्थमें चले गये ।। इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवती र्थयात्रायां त्रिताख्याने षट्त्रिंशो5ध्याय:
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,他(特里塔)遂入天界;而关于特里塔的传闻又一次在人间响起。”心怀高雅的婆罗罗摩瞻礼了位于萨拉斯瓦蒂河中的圣井灵迹,屡屡称颂赞叹;随后前往名为毗那舍那(Vināśana)的圣渡。此段强调朝礼圣地(tīrtha)之净化力,以及以敬念追怀典范人物与圣迹之伦理价值。
Verse 37
वर्तमाने महायज्ञे त्रितस्य सुमहात्मन:
毗舍波耶那说道:当具大德之特利塔的宏大祭祀正在进行之时,叙事转而指向那庄严祭仪的中心所展开的诸般事态;在此,祭礼的秩序与道义的意向为后续一切奠定了框架。
Verse 38
ततः सुतुमुलं शब्द शुश्रावाथ बृहस्पति:
随后——据说——布里哈斯帕提听见一声震天巨吼,昭示着冲突骤然翻涌的骚动,以及事态沉重而不可逆转的推进。
Verse 39
श्र॒त्वा चैवाब्रवीत् सर्वान् देवान् देवपुरोहित: । त्रितस्य वर्तते यज्ञस्तत्र गच्छामहे सुरा:
听罢,诸神的祭司对众天神说道:“特利塔的祭祀正在进行;诸神啊,我们当往彼处。”
Verse 40
तब देवपुरोहित बृहस्पतिजीने वेदमन्त्रोंक उस तुमुलनादको सुनकर देवताओंसे कहा --'देवगण! त्रित मुनिका यज्ञ हो रहा है, वहाँ हमलोगोंको चलना चाहिये ।। स हि क्रुद्ध: सृजेदन्यान् देवानपि महातपा: । “वे महान् तपस्वी हैं। यदि हम नहीं चलेंगे तो वे कुपित होकर दूसरे देवताओंकी सृष्टि कर लेंगे” ।। तच्छुत्वा वचनं तस्य सहिता: सर्वदेवता:
毗舍波耶那说道:于是,诸神之祭司布里哈斯帕提听见那喧腾之声,且伴随吠陀咒颂,便对众天神说道:“诸神之众啊!牟尼特利塔正在行祭;我们理当前往。他乃大苦行者——若我们不去,他或将震怒,甚至创造别的天神。”众神闻其言,齐心合一,遂备而行之。
Verse 41
प्रययुस्तत्र यत्रासौ त्रितयज्ञ: प्रवर्तते । बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर सब देवता एक साथ हो उस स्थानपर गये, जहाँ त्रितमुनिका यज्ञ हो रहा था ।। ते तत्र गत्वा विबुधास्तं कूप॑ं यत्र स त्रित:,ऊचुश्चैनं महाभागं प्राप्ता भागार्थिनो वयम् | वहाँ पहुँचकर देवताओंने उस कूपको देखा, जिसमें त्रित मौजूद थे। साथ ही उन्होंने यज्ञमें दीक्षित हुए महात्मा त्रितमुनिका भी दर्शन किया। वे बड़े तेजस्वी दिखायी दे रहे थे। उन महाभाग मुनिका दर्शन करके देवताओंने उनसे कहा--“'हमलोग यज्ञमें अपना भाग लेनेके लिये आये हैं!
毗舍波耶那说道:众神听了布里哈斯帕提之言,便一同前往特利塔祭祀正在进行之处。到达那里,诸天见到囚着特利塔的那口井,也瞻仰到那位为仪式受灌顶的大圣者,苦行光辉灿然。见此殊胜之人,他们对他说:“我们前来求取祭祀中分配给我们的份额。”
Verse 42
ददृशुस्तं महात्मान दीक्षितं यज्ञकर्मसु । दृष्टवा चैनं महात्मानं श्रिया परमया युतम्
他们看见那位大德之人,已依仪轨受灌顶净戒,奉行祭祀之业。又见那位高贵者具足无上光辉,便在他身上认出:唯有以戒律自持、以达摩为导的行持,方能显现相应的尊严与神圣。
Verse 43
अथाब्रवीदृषिर्देवान् पश्यध्वं मा दिवौकस:
于是仙人对诸天说道:“天界之众啊,请看我。”在战争逐步展开的道德张力之中,这位先知召请神明为证——祈请更高的监察与问责,使诸事在走向命定结局之时,不失天道的裁照。
Verse 44
ततस्त्रितो महाराज भागांस्तेषां यथाविधि
随后,特利多啊,大王,他依照仪轨所定,将诸神各自的份额如法分配——使分授合乎规矩与正当的程序。
Verse 45
ततो यथाविधि प्राप्तान् भागान् प्राप्प दिवौकस:
于是,诸天依照仪轨,领受了各自所分得的份额;天界众神得其所当得——这表明祭仪与分配皆按法度与秩序圆满施行。
Verse 46
सतु वत्रे वरं देवांस्त्रातुमहथ मामित:
毗舍波耶那说道:“然而此刻,诸天之中最卓越者啊,你们当从此护佑于我。”在危难与道义重压之际,说话者转而求诸神的守护,祈求庇荫与保全——当人力与世间依凭皆已不足之时。
Verse 47
तत्र चोर्मिमती राजन्नुत्पपात सरस्वती
在那里,王啊,萨拉斯瓦蒂河波涛翻涌,忽然猛涨,骤然腾起。
Verse 48
तथेति चोकक््त्वा विबुधा जग्मू राजन् यथागता:
毗湿摩衍那说:“就这样吧。”他们答道;于是那些天界众生,王啊,便离去,循原路返回——既已允诺,便依神明之礼退下,不再争辩。
Verse 49
क्रुद्धस्तु स समासाद्य तावृषी भ्रातरौ तदा
毗湿摩衍那说:他怒火中烧,便在那时走近那两位仙人兄弟。
Verse 50
उवाच परुष॑ वाक्यं शशाप च महातपा: । पशुलुब्धौ युवां यस्मान्मामुत्सृज्य प्रधाविती
毗湿摩衍那说:那位大苦行者厉声斥责,并降下诅咒:“因为你们二人贪恋猎物,竟撇下我而奔走……”
Verse 51
तस्माद् वृकाकृती रौद्रौ दंष्टिणावभितश्चरौ । भवितारौ मया शप्तौ पापेनानेन कर्मणा
因此,你们二人——将成狼形,凶暴而具利牙,四处游荡——必定如此,因为我已因这罪恶之行而诅咒了你们。
Verse 52
प्रसवश्चैव युवयोगोलाड्गूलर्क्षवानरा: | उन महातपस्वीने कुपित हो अपने उन दोनों ऋषि भाइयोंके पास पहुँचकर कठोर वाणीमें शाप देते हुए कहा--“तुम दोनों पशुओंके लोभमें फँसकर मुझे छोड़कर भाग आये। इसलिये इसी पापकर्मके कारण मेरे शापसे तुम दोनों भाई महाभयंकर भेड़ियेका शरीर धारण करके दाँढ़ोंसे युक्त हो इधर-उधर भटकते फिरोगे। तुम दोनोंकी संतानके रूपमें गोलांगूल, रीछ और वानर आदि पशुओंकी उत्पत्ति होगी" || ४९--५१ ई ।। इत्युक्तेन तदा तेन क्षणादेव विशाम्पते
毗湿摩波耶那说:“从你们二人将生出后裔,如歌罗昂古拉(golāṅgūla)、熊与猴等。”说罢,噢,人中之主,那位大苦行者因两位仙人兄弟贪恋禽兽而弃他而去,怒火中烧,便以严厉之言降下诅咒:由于此等罪业,在他的咒力之下,两兄弟立刻将取可怖之狼身,獠牙毕露,四处流离;并且从他们的血脉中,将出生种种兽类,如歌罗昂古拉、熊与猴等。
Verse 53
तत्राप्यमितविक्रान्त: स्पृष्टवा तोयं हलायुध:
在那里,执犁为兵之人——勇力无量——亦以手触水,行净化之礼,以示克制与礼法。
Verse 54
उदपानं च त॑ वीक्ष्य प्रशस्यथ च पुन: पुन:
见到那口井,他们一再称赞不已。
Verse 55
नदीगतमदीनात्मा प्राप्तो विनशनं तदा
毗湿摩波耶那说:其后,他入于河中,心神不复为恐惧与骚动所摇,遂于彼时抵达毗那舍那(Vinaśana)。
Verse 63
एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन् श्रोतव्यं यदि मन्यसे । जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! उदपान तीर्थ कैसे हुआ? वे महातपस्वी त्रितमुनि उसमें कैसे गिर पड़े और द्विजश्रेष्ठ उनके दोनों भाइयोंने उन्हें क्यों वहीं छोड़ दिया था? क्या कारण था, जिससे वे दोनों भाई उन्हें कुएँमें ही त्यागकर घर चले गये थे? वहाँ रहकर उन्होंने यज्ञ और सोमपान कैसे किया? ब्रह्मन! यदि यह प्रसंग मेरे सुननेयोग्य समझें तो अवश्य मुझे बतावें
阇那梅阇耶说道:“婆罗门啊,若你认为此事堪听,请为我开示。那口井如何成为圣地渡口(tīrtha)?大苦行者特利多(Trita)如何坠入其中?而他的两位兄弟——二生者(dvija)中之最——为何将他弃置于彼处?他们因何缘故把他留在井中便返家而去?他居于其间,又如何行祭(yajña)并饮苏摩(Soma)?若你以为此段因缘值得我聆听,务请为我详述。”
Verse 86
ब्रह्मलोकजित: सर्वे तपसा ब्रह्मवादिन: । वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! पहले युगमें तीन सहोदर भाई रहते थे। वे तीनों ही मुनि थे। उनके नाम थे एकत, द्वित और त्रित। वे सभी महर्षि सूर्यके समान तेजस्वी, प्रजापतिके समान संतानवान् और ब्रह्मवादी थे। उन्होंने तपस्याद्वारा ब्रह्मलोकपर विजय प्राप्त की भी
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,在久远的往昔,有三位同胞兄弟同住世间:厄迦多、提毗多与特利多。他们皆为苦行的牟尼,宣说梵(Brahman)之义。其光辉如日,其子嗣如生主波罗阇波提(Prajāpati)般繁盛,恒守清净戒行;凭借苦行之力,他们得以进入梵天之界——梵天世界(Brahmaloka)。”
Verse 96
अभवद् गौतमो नित्यं पिता धर्मरत: सदा । उनकी तपस्या, नियम और इन्द्रियनिग्रहसे उनके धर्म-परायण पिता गौतम सदा ही प्रसन्न रहा करते थे
毗湿摩波耶那说道:“乔多摩恒常坚定,作为父亲始终奉持达摩。凭借苦行、戒律与对诸根的制御,这位以达摩为归的父亲常得安然满足。”
Verse 103
जगाम भगवान् स्थानमनुरूपमिवात्मन: । उन पुत्रोंकी त्याग-तपस्यासे संतुष्ट रहते हुए वे पूजनीय महात्मा गौतम दीर्घकालके पश्चात् अपने अनुरूप स्थान (स्वर्गलोक)-में चले गये
毗湿摩波耶那说道:“那位可敬的圣者乔多摩,见诸子能舍离而修苦行,心甚满足;经久之后,便往与其灵性境界相称之处而去——升入天界,归于其应得之所。”
Verse 116
ते सर्वे स्वर्गते तस्मिंस्तस्य पुत्रानपूजयन् । राजन! उन महात्मा गौतमके यजमान जो राजा लोग थे, वे सब उनके स्वर्गवासी हो जानेपर उनके पुत्रोंका ही आदर-सत्कार करने लगे
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,当那位伟大的乔多摩升天之后,凡先前作为祭主(yajamāna)、供养乔多摩行祭之诸王,皆转而以敬礼与款待奉事其子。”
Verse 126
त्रितः स श्रेष्ठतां प्राप यथैवास्थ पिता तथा । नरेश्वर! उन तीनोंमें भी अपने शुभ कर्म और स्वाध्यायके द्वारा महर्षि त्रितने सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया! जैसे उनके पिता सम्मानित थे, वैसे ही वे भी हो गये
毗湿摩波耶那说道:“人中王啊,在那三人之中,圣者特利多凭自身的善业与勤修自诵圣典之学(svādhyāya),获得了最高的显荣。其父昔日受人敬仰如何,特利多亦同样受人敬仰。”
Verse 183
प्राचीं दिशं महात्मान आजम्मुस्ते महर्षय: । राजन्! ऐसा विचार करके उन तीनों भाइयोंने वही किया। वे सभी यजमानोंके यहाँ पशुओंकी प्राप्तिके उद्देश्स्से गये और उनसे विधिपूर्वक यज्ञ करवाकर उस याज्यकर्मके द्वारा उन्होंने बहुतेरे पशु प्राप्त कर लिये। तत्पश्चात् वे महात्मा महर्षि पूर्वदिशाकी ओर चल दिये
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,他们三兄弟如此思量之后,便照此行事。他们为求得牛群,前往诸多祭主之家;依正法仪轨主持祭祀,以此祭司之职而得众多牲畜。其后,那些大心的圣仙便向东方行去。”
Verse 206
कथं च स्युरिमा गाव आवाभ्यां हि विना त्रितम् । पशुओंके उस महान् समुदायको देखकर एकत और द्वितके मनमें यह चिन्ता समायी कि किस उपायसे ये गौएँ त्रितको न मिलकर हम दोनोंके ही पास रह जायँ
毗湿摩波耶那说道:“这些牛怎样才能不经由特利塔,而留在我们这里?”见到那庞大的牛群,埃迦塔与德维塔心中生起了算计的忧虑:用什么办法才能使这些牛不落到特利塔手中,却留给他们二人?
Verse 213
तावन्योन्यं समाभाष्य एकतक्ष द्वितश्ष ह 4 २१ ।। यदूचतुर्मिथ: पापौ तन्निबोध जनेश्वर | जनेश्वर! उन एकत और द्वित-दोनों पापियोंने एक-दूसरेसे सलाह करके परस्पर जो कुछ कहा, वह बताता हूँ, सुनो
毗湿摩波耶那说道:二人彼此商议之后——埃迦塔迦叉与德维塔迦叉——便相对而语。人中王啊,且听我说,那两名罪人彼此说了些什么。
Verse 353
सोमस्याभिषवं कृत्वा चकार विपुलं ध्वनिम् । तत्पश्चात् उन महातपस्वी त्रितने उस फैली हुई लतामें सोमकी भावना करके मन-ही- मन ऋग्ू, यजु और सामका चिन्तन किया। नरेश्वर! इसके बाद कंकड़ या बालू-कणोंमें सिल और लोढ़ेकी भावना करके उसपर पीसकर लतासे सोमरस निकाला। फिर जलमें घीका संकल्प करके उन्होंने देवताओंके भाग नियत किये और सोमरस तैयार करके उसकी आहुति देते हुए वेद-मन्त्रोंकी गम्भीर ध्वनि की
毗湿摩波耶那说道:“他完成苏摩的榨取,发出宏大的声响。其后,那位大苦行者特利塔,心中观想苏摩寓于草与蔓延的藤蔓之中,默念《梨俱》《夜柔》《娑摩》三吠陀的赞歌。大王啊,接着,他以卵石与沙粒观作磨石与杵臼,在其上研磨压榨藤蔓,取出苏摩汁。随后,他以神圣的誓愿(saṅkalpa)将清水观为酥油,分定诸天应得之份;备成苏摩,投供于火中,并使吠陀真言那深沉的回响轰然传扬。”
Verse 366
समवाप्य च त॑ यज्ञ यथोक्तं ब्रह्म॒वादिभि: | राजन! ब्रह्मवादियोंने जैसा बताया है, उसके अनुसार ही उस यज्ञका सम्पादन करके की हुई त्रितकी वह वेदध्वनि स्वर्गलोकतक गूँज उठी
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,他依照通晓吠陀的论师所传之法,圆满完成了那场祭祀;特利塔所发出的吠陀回响随之上腾,仿佛直达天界。”
Verse 423
ऊचुश्चैनं महाभागं प्राप्ता भागार्थिनो वयम् | वहाँ पहुँचकर देवताओंने उस कूपको देखा, जिसमें त्रित मौजूद थे। साथ ही उन्होंने यज्ञमें दीक्षित हुए महात्मा त्रितमुनिका भी दर्शन किया। वे बड़े तेजस्वी दिखायी दे रहे थे। उन महाभाग मुनिका दर्शन करके देवताओंने उनसे कहा--“'हमलोग यज्ञमें अपना भाग लेनेके लिये आये हैं!
毗舍波耶那说:“他们对那位大福德的圣者说道:‘我们前来索取我们在祭祀中应得的份额。’” 在前后叙事中,诸天来到祭场,看见特里塔——光辉灿然,已受灌顶而为仪式净戒——便为维护祭祀秩序,依达摩与仪轨之权利请求其应得之供分,表明供献当按法度与资格分配。
Verse 436
अस्मिन् प्रतिभये कूपे निमग्नं नष्टचेतसम् । उस समय महर्षिने उनसे कहा--'देवताओ! देखो, मैं किस दशामें पड़ा हूँ। इस भयानक कूपमें गिरकर अपनी सुध-बुध खो बैठा हूँ"
毗舍波耶那说:“我沉没在这可怖的井中,心识与知觉都已迷失。”于是大圣者对他们说道:“诸天啊,请看我落到何等境地——坠入这骇人的深坑,我已失却清明的意识。”
Verse 446
मन्त्रयुक्तानू समददत् ते च प्रीतास्तदा भवन् । महाराज! तदनन्तर त्रितने देवताओंको विधिपूर्वक मन्त्रोच्चारण करते हुए उनके भाग समर्पित किये। इससे वे उस समय बड़े प्रसन्न हुए
毗舍波耶那说:“大王啊,随后特里塔依仪轨诵持圣咒,将诸天应得之分如法奉献。诸天按祭法受取其份,当时皆大欢喜。”
Verse 456
प्रीतात्मानो ददुस्तस्मै वरान् यान् मनसेच्छति । विधिपूर्वक प्राप्त हुए उन भागोंको ग्रहण करके प्रसन्नचित्त हुए देवताओंने उन्हें मनोवांछित वर प्रदान किया
毗舍波耶那说:“他们心中欢悦,便赐予他心所欲求的诸般恩赐。诸天如法受纳所分之供分,既已满足,遂将他所愿之福佑尽皆施与。”
Verse 463
यश्लेहोपस्पृशेत् कूपे स सोमपगतिं लभेत् । मुनिने देवताओंसे वर माँगते हुए कहा--“मुझे इस कूपसे आपलोग बचावें तथा जो मनुष्य इसमें आचमन करे, उसे यज्ञमें सोमपान करनेवालोंकी गति प्राप्त हो”
毗舍波耶那说:“凡以此井之水行净礼而触之者,皆得如在祭祀中饮苏摩者之吉祥归趣。”于是圣者向诸天求愿道:“请救我出此井,并赐福:凡人在此处行阿遮摩那(ācamana,净礼啜水)者,皆得与祭中饮苏摩者同等之崇高果报。”
Verse 473
तयोत्क्षिप्त: समुत्तस्थौ पूजयंस्त्रिदिवौकस: । राजन! मुनिके इतना कहते ही कुएँमें तरंगमालाओंसे सुशोभित सरस्वती लहरा उठी। उसने अपने जलके वेगसे मुनिको ऊपर उठा दिया और वे बाहर निकल आये। फिर उन्होंने देवताओंका पूजन किया
毗湿摩波耶那说道:被她的水势托举,那位牟尼升出井外,立而礼敬三天之众神。大王啊!此言方毕,萨拉斯瓦蒂——其水如波纹花鬘般摇曳生辉——便在井中汹涌翻腾;凭借急湍之力,她将牟尼向上举起,使其脱出井口。随后,他恭敬祭礼诸天。
Verse 483
त्रितश्नाभ्यागमत् प्रीतः स्वमेव निलयं तदा । नरेश्वर! मुनिके माँगे हुए वरके विषयमें “तथास्तु” कहकर सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। फिर त्रित भी प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको ही लौट गये
毗湿摩波耶那说道:于是特利塔心中欢喜,回到自己的居所。大王啊!诸神来时如何,去时亦然;他们就牟尼所求之愿赐以“如是成就(tathāstu)”之言,便各自离去。其后,特利塔也满足地返归家中。
Verse 526
तथाभूतावदृश्येतां वचनात् सत्यवादिन: । प्रजानाथ! उनके इतना कहते ही वे दोनों भाई उस सत्यवादीके वचनसे उसी क्षण भेड़ियेकी शकलमें दिखायी देने लगे
毗湿摩波耶那说道:“民众之主啊!他话音未落,那两兄弟便因那位说真言者言辞之力,顷刻间被人看见变形——现出狼的形貌。”
Verse 536
दत्त्वा च विविधान् दायान् पूजयित्वा च वै द्विजान् | अमित पराक्रमी बलरामजीने उस तीर्थमें भी जलका स्पर्श किया और ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें नाना प्रकारके धन प्रदान किये
他施与种种布施,并如法礼敬“二生者”(婆罗门);勇力无量的婆罗罗摩亦在那圣渡处触水为净,复又供养婆罗门,赐予他们各类财物。
Verse 1936
एकततक्न द्वितश्वैव पृष्ठ: कालयन् पशून् । महाराज! उनमें त्रित मुनि तो प्रसन्नतापूर्वक आगे-आगे चलते थे और एकत तथा द्वित पीछे रहकर पशुओंको हाँकते जाते थे
毗湿摩波耶那说道:“大王啊!他们之中,仙人特利塔心境安宁、怡然自得,走在最前;而埃迦塔与德毗塔塔留在后方,驱赶牛群前行。”
Verse 3736
आविनन॑ त्रिदिवं सर्व कारणं च न बुद्धयते । महात्मा त्रितका वह महान् यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय सारा स्वर्गलोक उद्विग्न हो उठा, परंतु किसीको इसका कोई कारण नहीं जान पड़ा
毗湿摩波耶那说道:当那场伟大的祭祀一开始,整个天界都为之骚动不安;然而无人能洞见这扰动背后的缘由。由此可知,即便在权势与殊荣之境,若事端之根源被遮蔽、行为的法义分量尚未明了,忧惧亦会滋生。
The chapter frames place-memory through ethical causality: Vinaśana is explained via hostility (dveṣa) and its consequences, while the Naimiṣeya bend is explained through compassion (kāruṇya) toward overcrowded ascetics—contrasting destructive and restorative dispositions.
Sacred geography is portrayed as an archive of dharma: disciplined rites (snāna, dāna, pūjā) and learned stewardship (kāla-jñāna) are presented as practices that sustain communal order and interpret historical upheaval through ethical meaning.
Rather than a standalone phalaśruti formula, the chapter employs etiological meta-commentary: it explains why sites are named and revered (e.g., Vinaśana, Gargasrota, Naimiṣeya), thereby functioning as an interpretive guide for ritual practice and cultural remembrance.