
Trita in the Well (Udapāna-kathā) — Balarāma’s Tīrtha Observances
Upa-parva: Trita-udapāna Tīrtha-kathā (Balarāma at the Well of Trita)
Vaiśaṃpāyana recounts that Balarāma visits the famed udapāna of the illustrious ṛṣi Trita, gives gifts, honors brāhmaṇas, and performs ablution. Janamejaya asks how the well became significant and how Trita was abandoned. The narrative backtracks to an earlier age: three ṛṣi-brothers—Ekatā, Dvitā, and Trita—excel in tapas and Vedic learning; Trita becomes preeminent. Seeking wealth for sacrifice, they conduct yajña and acquire many cattle; while traveling, Ekatā and Dvitā conspire to exclude Trita. A wolf appears at night; in fear Trita falls into a deep, terrifying well near the Sarasvatī. Hearing his cries, the brothers knowingly abandon him. Trapped, Trita resolves to drink soma and mentally constructs the ritual: he imagines waters and fires, fashions pressing-stones from gravel, performs soma-pressing, and offers shares to the devas with correct mantra. The ritual sound reaches heaven; Bṛhaspati leads the devas to Trita, who reproaches them for his peril yet distributes their portions properly. Pleased, the devas grant boons; Trita asks to be rescued and that those who bathe at the well attain soma-merit. Sarasvatī rises in waves and lifts him out. Trita then confronts his brothers, curses them for greed, and their offspring become marked by animal-like traits; the curse manifests immediately. The chapter returns to Balarāma, who again bathes, gives donations, praises the udapāna, and proceeds toward Vinaśana.
Chapter Arc: Janamejaya, eager to know what befell while the war-clouds gathered, asks how Baladeva—refusing to aid either Kauravas or Pandavas—set forth on a tīrtha-yātrā, and why Prabhāsa is praised as supreme among holy places. → Vaiśampāyana narrates Baladeva’s firm vow of neutrality and his departure as the war nears; the journey begins from Kurukṣetra with many vehicles and attendants, and the tale widens into the sanctity of Sarasvatī’s tīrthas and the special potency of Prabhāsa—hinting that even the gods once sought relief there. → The narrative crests in the Prabhāsa-episode: the Moon (Soma), struck by Dakṣa’s curse and seized by rājayakṣmā, wanes—causing herbs and beings to wither—until the gods, alarmed by cosmic decline, seek a remedy and plead for the curse’s reversal. → The chapter closes by laying out the full account of Soma’s curse and the greatness of Prabhāsa as a ‘tīrtha of tīrthas,’ where purification and restoration become possible; Baladeva’s pilgrimage is framed as moving through these power-laden sites with lavish gifts and rites. → How Dakṣa is finally appeased, what precise observance at Prabhāsa restores Soma, and how this sacred precedent will mirror Baladeva’s own later return to the war’s aftermath.
Verse 1
अपर बक। ] अति: पजञ्चत्रिशो<ड्ध्याय: बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा जनमेजय उवाच पूर्वमेव यदा रामस्तस्मिन् युद्ध उपस्थिते । आमन्त्रय केशवं यातो वृष्णिभि: सहित: प्रभु:,जनमेजयने कहा--ब्रह्मन! जब महाभारतयुद्ध आरम्भ होनेका समय निकट आ गया, उस समय युद्ध प्रारम्भ होनेसे पहले ही भगवान् बलराम श्रीकृष्णकी सम्मति ले, अन्य वृष्णिवंशियोंके साथ तीर्थयात्राके लिये चले गये और जाते समय यह कह गये कि “केशव! मैंन तो धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनकी सहायता करूँगा और न पाण्डवोंकी ही'
阇那美阇耶说道:“婆罗门啊!当《摩诃婆罗多》大战将起之时,尚在兵戈未交之前,婆罗罗摩尊者先向凯沙瓦(奎师那)辞别,又与弗利什尼族人同行,出发作圣地巡礼;临行时他说:‘凯沙瓦!我既不助持特罗陀罗之子都罗约陀那,也不转投般度诸子……’”
Verse 2
साहाय्य॑ धार्तराष्ट्स्य न च कर्तास्मि केशव । न चैव पाण्डुपुत्राणां गमिष्यामि यथागतम्,जनमेजयने कहा--ब्रह्मन! जब महाभारतयुद्ध आरम्भ होनेका समय निकट आ गया, उस समय युद्ध प्रारम्भ होनेसे पहले ही भगवान् बलराम श्रीकृष्णकी सम्मति ले, अन्य वृष्णिवंशियोंके साथ तीर्थयात्राके लिये चले गये और जाते समय यह कह गये कि “केशव! मैंन तो धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनकी सहायता करूँगा और न पाण्डवोंकी ही'
“凯沙瓦,我既不作持特罗陀罗之子的助力;也不会在如今这般情势下转向般度诸子。”此言表明他刻意置身事外:大战将临之际,不为任何一方增援。
Verse 3
एवमुक्त्वा तदा रामो यात: क्षत्रनिबर्हण: । तस्य चागमन भूयो ब्रह्मन् शंसितुमरहसि,विप्रवर! उन दिनों ऐसी बात कहकर जब क्षत्रियसंहारक बलरामजी चले गये, तब उनका पुनः आगमन कैसे हुआ, यह बतानेकी कृपा करें
阇那美阇耶说道:“说罢此言,罗摩(婆罗罗摩)——以惩戒刹帝利而闻名者——便离去了。婆罗门啊,二次生中之最,请你为我叙说:他后来又是如何再度归来的?”
Verse 4
आखाेणयाहि मे विस्तरश: कथ॑ं राम उपस्थित: । कथं च दृष्टवान् युद्ध कुशलो हासि सत्तम,साधुशिरोमणे! आप कथा कहनेमें कुशल हैं; अतः मुझे विस्तारपूर्वक बताइये कि बलरामजी कैसे वहाँ उपस्थित हुए और किस प्रकार उन्होंने युद्ध देखा?
阇那美阇耶说道:“请为我详尽说明:罗摩(婆罗罗摩)如何到场,又以何种方式观战?你善于叙述战事,请将此事从头到尾讲给我听。”
Verse 5
वैशम्पायन उवाच उपप्लव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु । प्रेषितो धृतराष्ट्रस्य समीप॑ मधुसूदन:
毗湿摩波耶那说道:当大心的般度五子已在优波婆罗耶(Upaplavya)安营居住之时,摩度苏陀那(克里希那)被派往觐见持国王(Dhṛtarāṣṭra)——此乃为求合乎达摩的和议、以免顽固不义所招致的覆亡之外交使命。
Verse 6
शमं प्रति महाबाहो हितार्थ सर्वदेहिनाम् वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! जिन दिनों महामनस्वी पाण्डव उपप्लव्य नामक स्थानमें छावनी डालकर ठहरे हुए थे, उन्हीं दिनोंकी बात है। महाबाहो! पाण्डवोंने समस्त प्राणियोंके हितके लिये सन्धिके उद्देश्यसे भगवान् श्रीकृष्णको धृतराष्ट्रके पास भेजा || ५३ || स गत्वा हास्तिनपुरं धृतराष्ट्रं समेत्य च
毗湿摩波耶那说道:为求止息纷争、为一切有情之福祉,他(克里希那)前往象城(Hāstinapura),并会见了持国王(Dhṛtarāṣṭra)——在大战最终升级之前,继续般度五子以和为贵的努力。
Verse 7
न च तत् कृतवान् राजा यथा ख्यातं हि तत् पुरा,नरेश्वर! किंतु राजा धृतराष्ट्रने भगवानका कहना नहीं माना। यह सब बात पहले यथार्थरूपसे बतायी गयी है। महाबाहु पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ संधि करानेमें सफलता न मिलनेपर पुनः उपप्लव्यमें ही लौट आये
毗湿摩波耶那说道:然而国王并未如先前所称那般行事——那本被视为正当而真实之道。人中王啊,持国王并不接受世尊之劝谏。此事先前已如实叙述。于是,臂力无双、至上之人、圣主室利·克里希那在彼处未能促成和解,便又返回优波婆罗耶。此段以义理昭示:拒绝正法之言,便自绝和平之门,并加速坠入战争。
Verse 8
अनवाप्य शमं तत्र कृष्ण: पुरुषसत्तम: | आगच्छत महाबाहुरुपप्लव्यं जनाधिप,नरेश्वर! किंतु राजा धृतराष्ट्रने भगवानका कहना नहीं माना। यह सब बात पहले यथार्थरूपसे बतायी गयी है। महाबाहु पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ संधि करानेमें सफलता न मिलनेपर पुनः उपप्लव्यमें ही लौट आये
毗湿摩波耶那说道:在那里,克里希那——人中至杰、臂力雄强——未能求得和平,便返回优波婆罗耶。民之主、王者啊。此偈强调和解之举的伦理分量:纵使正义的使者竭力促成和合,若掌权者拒绝明智劝告,和平终不可得,而通往战争之路也愈发难以阻止。
Verse 9
ततः प्रत्यागतः कृष्णो धार्तराष्ट्रविसर्जित: । अक्रियायां नरव्यापत्र पाण्डवानिदमब्रवीत्,नरव्याप्र! कार्य न होनेपर धृतराष्ट्रसे विदा ले वहाँसे लौटे हुए श्रीकृष्णने पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा--
于是,克里希那在向持国王告辞后归来;因无任何有效之举可成,便对般度五子如此说道——人中之虎啊。此偈凸显一种伦理上的郁结:劝谏不能引出正当行动之时,调停便成徒劳,唯有回到己方,直言以告。
Verse 10
न कुर्वन्ति वचो महां कुरव: कालनोदिता: । निर्गच्छध्वं पाण्डवेया: पुष्पेण सहिता मया,“कौरव कालके अधीन हो रहे हैं, इसलिये वे मेरा कहना नहीं मानते हैं। पाण्डवो! अब तुमलोग मेरे साथ पुष्य नक्षत्रमें युद्धके लिये निकल पड़ो,
毗湿摩波耶那说道:“伟大的俱卢族,被时运所驱,不肯听从我的言语。因此,般度之子啊,你们当与我同往——并择吉宿‘补沙’(Puṣya,吉祥月宿)——以兴兵从事此战。”
Verse 11
इसके बाद जब सेनाका बँटवारा होने लगा, तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महामना बलदेवजीने अपने भाई श्रीकृष्णसे कहा--
随后,当分配诸军之事开始时,心志高洁、勇力之中最为卓绝的婆罗罗摩,向其弟室利·奎师那开口说道。
Verse 12
तेषामपि महाबाहो साहाय्यं॑ मधुसूदन । क्रियतामिति तत् कृष्णो नास्य चक्रे वचस्तदा,“महाबाहु मधुसूदन! उन कौरवोंकी भी सहायता करना। परंतु श्रीकृष्णने उस समय उनकी यह बात नहीं मानी”
毗湿摩波耶那说道:“大臂的摩度苏陀那啊,也请援助那些人(俱卢一方)。”然而当时,奎师那并未允其所请。
Verse 13
ततो मन्युपरीतात्मा जगाम यदुनन्दन: । तीर्थयात्रां हलधर: सरस्वत्यां महायशा:,इससे मन-ही-मन कुपित और खिन्न होकर महायशस्वी यदुनन्दन हलधर सरस्वतीके तटपर तीर्थयात्राके लिये चल दिये
于是,那位声名显赫的夜度后裔——持犁者哈拉陀罗(婆罗罗摩)——心为忿怒与郁结所覆,便沿萨拉斯瓦蒂河岸出发,踏上朝圣之旅。
Verse 14
मैत्रनक्षत्रयोगे सम सहित: सर्वयादवै: । आश्रयामास भोजस्तु दुर्योधनमरिंदम:,इसके बाद शत्रुओंका दमन करनेवाले कृतव्माने सम्पूर्ण यादवोंके साथ अनुराधानक्षत्रमें दुर्योधनका पक्ष ग्रहण किया
毗湿摩波耶那说道:在“弥多罗”(即阿奴罗陀,Anurādhā)月宿相合之时,那位以制敌闻名的菩阇勇士,与全体夜度族一道,选择投靠都利约陀那,从而归附俱卢一方。
Verse 15
युयुधानेन सहितो वासुदेवस्तु पाण्डवान् | रौहिणेये गते शूरे पुष्पेण मधुसूदन:
毗湿摩波耶那说道:瓦苏提婆(奎师那)与优优陀那同行,前往般度五子处。勇武的罗希尼耶(婆罗罗摩)既已离去,摩杜苏陀那(奎师那)便怀着柔和调停之意来到他们面前——为稳固其决心,并在战争的道义重压中加以引导。
Verse 16
गच्छन्नेव पथिस्थस्तु राम: प्रेष्यानुवाच ह,यात्रा करते हुए बलरामजीने स्वयं मार्गमें ही रहकर अपने सेवकोंसे कहा--“'तुमलोग शीघ्र ही द्वारका जाकर वहाँसे तीर्थयात्रामें काम आनेवाली सब सामग्री, समस्त आवश्यक उपकरण, अग्निहोत्रकी अग्नि तथा पुरोहितोंको ले आओ
毗湿摩波耶那说道:仍在途中时,婆罗罗摩对随从吩咐道:“速往堕罗迦,从那里带来朝圣所需的一切资具与器用——并带上行阿耆尼霍多罗祭的圣火,以及诸位祭司。”
Verse 17
सम्भारांस्तीर्थयात्रायां सर्वोपकरणानि च । आनयघध्वं द्वारकायामग्नीन् वै याजकांस्तथा,यात्रा करते हुए बलरामजीने स्वयं मार्गमें ही रहकर अपने सेवकोंसे कहा--“'तुमलोग शीघ्र ही द्वारका जाकर वहाँसे तीर्थयात्रामें काम आनेवाली सब सामग्री, समस्त आवश्यक उपकरण, अग्निहोत्रकी अग्नि तथा पुरोहितोंको ले आओ
毗湿摩波耶那说道:婆罗罗摩仍停在路上,命随从道:“速往堕罗迦,带回朝圣所需的一切资粮与器具——并将阿耆尼霍多罗祭的圣火与主祭祭司一并带来。”
Verse 18
सुवर्ण रजतं चैव धेनूर्वासांसि वाजिन: । कुण्जरांश्व रथांश्वैव खरोष्ट्र वाहनानि च
毗湿摩波耶那说道:“黄金与白银,牛群与衣裳,骏马;大象与战车;以及由驴与骆驼牵引的车乘。”
Verse 19
प्रतिस्रोत: सरस्वत्या गच्छध्वं शीघ्रगामिन:
毗湿摩波耶那说道:“速去,逆萨拉斯瓦蒂河之流而上。”
Verse 20
ऋच्विजश्नानय ध्वं वै शतशक्ष द्विजर्षभान् । शीघ्रगामी सेवको! तुम सरस्वतीके स्रोतकी ओर चलो और सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा ऋत्विजोंको ले आओ' ।। एवं संदिश्य तु प्रेष्यानू बलदेवो महाबल:
毗湿摩波耶那说:“让主持祭仪的祭官(ṛtvij)沐浴,也让数百位如雄牛般卓越的婆罗门——诸二次生者中的上首——一同沐浴。你这行动迅捷的侍从,立刻前往萨拉斯瓦蒂河的水流处,带回数百位最优秀的婆罗门与祭官。”如此嘱咐使者之后,大力的婆罗提婆便令诸般安排运转起来。
Verse 21
तीर्थयात्रां ययौ राजन् कुरूणां वैशसे तदा । सरस्वती प्रतिस्रोत: समन्तादभिजग्मिवान्
毗湿摩波耶那说:大王啊,当时在俱卢族惨遭屠戮之后,他启程巡礼诸圣渡(tīrtha),并自四面八方趋近萨拉斯瓦蒂河,逆流而上而至。
Verse 22
ऋषच्विग्भिश्न सुहृद्धिश्व॒ तथान्यैरद्धिजसत्तमै: । रथैर्गजैस्तथाश्रैश्ष प्रेष्यैज्ञु भरतर्षभ
毗湿摩波耶那说:“婆罗多族中的雄牛啊,他有仙人、祭官(ṛtvij)随行,有怀善意的挚友相伴,又有其他出身高贵的显达之士——并带着战车、象、马与侍从。”
Verse 23
गोखरोष्ट प्रयुक्तैश्व यानैश्व बहुभिवत: । राजन्! महाबली बलदेवजीने सेवकोंको ऐसी आज्ञा देकर उस समय कुरुक्षेत्रमें ही तीर्थयात्रा आरम्भ कर दी। भरतश्रेष्ठ! वे सरस्वतीके स्रोतती ओर चलकर उसके दोनों तटोंपर गये। उनके साथ ऋत्विज, सुहृद, अन्यान्य श्रेष्ठ ब्राह्मण, रथ, हाथी, घोड़े और सेवक भी थे। बैल, गदहा और ऊँटोंसे जुते हुए बहुसंख्यक रथोंसे बलरामजी घिरे हुए थे || २०-- २२३ || श्रान्तानां क्लान्तवपुषां शिशूनां विपुलायुषाम्
毗湿摩波耶那说:大王啊,大力的婆罗罗摩被无数由牛、驴与骆驼牵引的车辆环绕,向侍从下达命令;就在俱卢之野的库鲁克舍特罗,他开始了朝圣巡礼。婆罗多族中的至上者啊,他朝萨拉斯瓦蒂的诸水流前行,并沿着她的两岸而行。随行者有祭官(ṛtvij)、友人、其他杰出的婆罗门,以及战车、象、马与仆从。被众多牛车、驴车、骆驼车簇拥着,婆罗罗摩继续前进。
Verse 24
देशे देशे तु देयानि दानानि विविधानि च । अचयि चार्थिनां राजन् क्लृप्तानि बहुशस्तथा
毗湿摩波耶那说:“大王啊,在各地都应施与种种布施;并且为了那些前来求助之人,所需资粮也屡次按序筹备并积聚起来。”
Verse 25
राजन! उस समय उन्होंने देश-देशमें थके-माँदे रोगी, बालक और वृद्धोंका सत्कार करनेके लिये नाना प्रकारकी देनेयोग्य वस्तुएँ प्रचुर मात्रामें तैयार करा रखी थीं ।। तानि यानीह देशेषु प्रतीक्षन्ति सम भारत । बुभुक्षितानामर्थाय क्लृप्तमन्नं समन््तत:
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,当时他们在各地广为筹备,丰厚备办种种可施之物与资粮,为的是礼敬并照拂疲惫之人、病者、孩童与老者。婆罗多后裔啊,这些供给在诸国之中皆已预备停当;又为饥饿之众,四面八方皆陈设饮食。”
Verse 26
भारत! विभिन्न देशोंमें लोग जिन वस्तुओंकी इच्छा रखते थे, उन्हें वे ही दी जाती थीं। भूखोंको भोजन करानेके लिये सर्वत्र अन्नका प्रबन्ध किया गया था ।। यो यो यत्र द्विजो भोज्यं भोक्तुं कामयते तदा । तस्य तस्य तु तत्रैवमुपजहुस्तदा नूप,नरेश्वरर जिस किसी देशमें जो-जो ब्राह्मण जब कभी भोजनकी इच्छा प्रकट करता, बलरामजीके सेवक उसे वहीं तत्काल खाने-पीनेकी वस्तुएँ अर्पित करते थे
婆罗多啊,各国之中,人们所欲之物,皆随其愿而给与。为使饥者得食,处处皆设粮食之备。无论何时何地,若有婆罗门欲食,婆罗摩之侍从便即刻于彼处奉上饮食——故而,人中王者啊,待客之礼无有迟滞。
Verse 27
तत्र तत्र स्थिता राजन् रोहिणेयस्य शासनात् । भक्ष्यपेयस्य कुर्वन्ति राशींस्तत्र समन््ततः,राजन! रोहिणीकुमार बलरामजीकी आज्ञासे उनके सेवक विभिन्न तीर्थस्थानोंमें खाने- पीनेकी वस्तुओंके ढेर लगाये रखते थे
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,依罗希尼耶(婆罗摩)之命,他的侍从分驻各处;在那些地方,他们四面堆积饮食,成堆成垛。”
Verse 28
वासांसि च महाहाणि पर्यड्कास्तरणानि च । पूजार्थ तत्र क्लृप्तानि विप्राणां सुखमिच्छताम्,सुख चाहनेवाले ब्राह्मणोंके सत्कारके लिये बहुमूल्य वस्त्र, पलंग और बिछौने तैयार रखे जाते थे
毗湿摩波耶那说道:“在那里,为了礼敬他们,早已备下华贵衣服、床榻与铺褥,陈设妥当,以使求安适的婆罗门得享其乐。”
Verse 29
यत्र यः स्वपते विप्रो यो वा जागर्ति भारत । तत्र तत्र तु तस्यैव सर्व क्लृप्तमदृश्यत,भारत! जो ब्राह्मण जहाँ भी सोता या जागता था, वहाँ-वहाँ उसके लिये सारी आवश्यक वस्तुएँ सदा प्रस्तुत दिखायी देती थीं
毗湿摩波耶那说道:“婆罗多啊,那位婆罗门无论在何处安卧入睡,或在何处醒坐守候,就在那一处,他所需的一切皆可见早已陈设齐备。”
Verse 30
यथासुखं जन: सर्वो याति तिष्ठति वै तदा । यातुकामस्य यानानि पानानि तृषितस्य च,भरतश्रेष्ठ! इस यात्रामें सब लोग सुखपूर्वक चलते और विश्राम करते थे। यात्रीकी इच्छा हो तो उसे सवारियाँ दी जाती थीं, प्यासेको पानी और भूखेको स्वादिष्ट अन्न दिये जाते थे। साथ ही वहाँ बलरामजीके सेवक वस्त्र और आभूषण भी भेंट करते थे
毗舍波耶那说道:当时在那段行旅之中,众人皆安适而行,安适而止。凡欲前行者,皆得车乘;凡口渴者,皆得饮水——款待井然有序,使无人之所需被忽略。
Verse 31
बुभुक्षितस्य चान्नानि स्वादूनि भरतर्षभ । उपजहुर्नरास्तत्र वस्त्राण्याभरणानि च,भरतश्रेष्ठ! इस यात्रामें सब लोग सुखपूर्वक चलते और विश्राम करते थे। यात्रीकी इच्छा हो तो उसे सवारियाँ दी जाती थीं, प्यासेको पानी और भूखेको स्वादिष्ट अन्न दिये जाते थे। साथ ही वहाँ बलरामजीके सेवक वस्त्र और आभूषण भी भेंट करते थे
毗舍波耶那说道:“噢,婆罗多族之雄牛啊,为饥者,他们献上甘美佳肴;在那里,人们也奉上衣服与饰物。”此景彰显款待与侍奉之风:旅人各随所需而得照拂——饥则食,且以恭敬之礼相赠——纵在战争叙事的紧张阴影下,亦见合乎法(dharma)的慷慨。
Verse 32
स पन्था: प्रब॒भौ राजन् सर्वस्यैव सुखावह: । स्वर्गोपमस्तदा वीर नराणां तत्र गच्छताम् | नित्यप्रमुदितोपेत: स्वादुभक्ष्य: शुभान्वित:,वीर नरेश! वहाँ यात्रा करनेवाले सब लोगोंको वह मार्ग स्वर्गके समान सुखदायक प्रतीत होता था। उस मार्गमें सदा आनन्द रहता, स्वादिष्ट भोजन मिलता और शुभकी ही प्राप्ति होती थी
毗舍摩波耶那说道:“大王啊,那时那条道路光彩焕发,仿佛为众生带来安乐。凡行于其上的勇士与众人,都觉得它宛如天界——常有欢悦,备有甘美可口之食,并有吉祥之果相随。”
Verse 33
विपण्यापणपण्यानां नानाजनशतैर्व॑त: । नानाद्रुमलतोपेतो नानारत्नविभूषित:,उस पथपर खरीदने-बेचनेकी वस्तुओंका बाजार भी साथ-साथ चलता था, जिसमें नाना प्रकारके सैकड़ों मनुष्य भरे रहते थे। वह हाट भाँति-भाँतिके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित तथा अनेकानेक रत्नोंसे विभूषित दिखायी देता था
毗舍波耶那说道:沿途仿佛有一座不断移动的市集,贩卖诸般货物,拥挤着数百种各色人等。那如同集市的行列,似以种种树木藤蔓为饰,又以多类珠宝点缀,显出王者出行所伴随的华丽与喧阗,纵然战争的阴影沉重亦不减其盛。
Verse 34
इस प्रकार श्रीमह्या भारत शल्यपवके अन्तर्गत गदापवमें बलरामजीका आगमनविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,ततो महात्मा नियमे स्थितात्मा पुण्येषु तीर्थेषु वसूनि राजन् | ददौ द्विजेभ्य: क्रतुदक्षिणा श्र यदुप्रवीरो हलभृत् प्रतीत: राजन! यदुकुलके प्रमुख वीर हलधारी महात्मा बलराम नियमपूर्वक रहकर प्रसन्नताके साथ पुण्यतीथोमें ब्राह्मगोंको धन और यज्ञकी दक्षिणाएँ देते थे
三阇耶说道:随后,那位大心之婆罗罗摩——守誓自持,克己而行——游历诸圣地渡口(tīrtha);大王啊,他欣然将财物施与婆罗门,并奉上祭祀之酬礼(dakṣiṇā)。于是,这位执犁著称、为夜度族之冠的英雄,在战争大乱的波涛之中,仍以澄然满足之心,奉行布施与仪轨端正之义务。
Verse 35
दोग्ध्रीक्ष धेनूश्न सहस्नरशो वै सुवासस: काञ्चनबद्धशृद्धी: । हयांश्न नानाविधदेशजातान् यानानि दासांश्व शुभान द्विजेभ्य:,बलरामने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सहस्रों दूध देनेवाली गौएँ दान कीं, जिन्हें सुन्दर वस्त्रोंसे सुसज्जित करके उनके सींगोंमें सोनेके पत्र जड़े गये थे। साथ ही उन्होंने अनेक देशोंमें उत्पन्न घोड़े, रथ और सुन्दर वेश-भूषावाले दास भी ब्राह्मणोंकी सेवामें अर्पित किये। इतना ही नहीं, बलरामने भाँति-भाँतिके रत्न, मोती, मणि, मूँगा, उत्तम सुवर्ण, विशुद्ध चाँदी तथा लोहे और ताँबेके बर्तन भी बाँटे थे इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां प्रभासोत्पत्तिकथने पज्चत्रिंशोडध्याय:
毗湿摩波耶那说道:在诸贤之中最为卓绝的婆罗摩,赐予婆罗门成千上万头乳牛,披以华美衣饰,牛角又饰以黄金。又献上出自诸方之良马,并诸般车乘(战车等)与衣冠整肃的仆从,使之供奉侍事。此段彰显“檀那”(dāna,布施施与)之德为神圣义务——尊崇博学的婆罗门,以不强求、不图回报之财物,护持祭仪之道。
Verse 36
रत्नानि मुक्तामणिविद्रुमं चा- प्यग्रयं सुवर्ण रजतं सुशुद्धम् अयस्मयं ताम्रमयं च भाण्डं ददौ द्विजातिप्रवरेषु राम:,बलरामने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सहस्रों दूध देनेवाली गौएँ दान कीं, जिन्हें सुन्दर वस्त्रोंसे सुसज्जित करके उनके सींगोंमें सोनेके पत्र जड़े गये थे। साथ ही उन्होंने अनेक देशोंमें उत्पन्न घोड़े, रथ और सुन्दर वेश-भूषावाले दास भी ब्राह्मणोंकी सेवामें अर्पित किये। इतना ही नहीं, बलरामने भाँति-भाँतिके रत्न, मोती, मणि, मूँगा, उत्तम सुवर्ण, विशुद्ध चाँदी तथा लोहे और ताँबेके बर्तन भी बाँटे थे
毗湿摩波耶那说道:罗摩(婆罗摩)赐予“二生者”中最卓越的诸婆罗门以珍宝——诸般宝石、明珠与珊瑚——并上等黄金与至纯白银;又分施铁器与铜器之器皿。此颂在伦理旨趣上彰显“檀那”(dāna,布施)之理想:将丰厚施与献给堪受之人,把婆罗摩的慷慨呈现为合乎达摩之举,即便在战争叙事的动荡之中,亦以此尊崇学识与祭司之德。
Verse 37
एवं स वित्त प्रददौ महात्मा सरस्वतीतीर्थवरेषु भूरि । ययौ क्रमेणाप्रतिमप्र भाव- सतत: कुरुक्षेत्रमुदारवृत्ति:
于是,那位大心之人于萨拉斯瓦蒂河诸最胜圣渡处广施财宝。继而他循序而行,步步前进——光辉无比,行止恒常高雅——向俱卢之原(库鲁克舍特罗)而去。
Verse 38
इस प्रकार उदार वृत्तिवाले अनुपम प्रभावशाली महात्मा बलरामने सरस्वतीके श्रेष्ठ तीर्थोमें बहुत धन दान किया और क्रमशः यात्रा करते हुए वे कुरक्षेत्रमें आये ।। जनमेजय उवाच सारस्वतानां तीर्थानां गुणोत्पत्तिं वदस्व मे । फलं च द्विपदां श्रेष्ठ कर्मनिर्वत्तिमेव च,जनमेजय बोले--ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और मनुष्योंमें उत्तम ब्राह्मगदेव! अब आप मुझे सरस्वती-तटवर्ती तीर्थोंके गुण, प्रभाव और उत्पत्तिकी कथा सुनाइये। भगवन्! क्रमश: उन तीर्थोके सेवनका फल और जिस कर्मसे वहाँ सिद्धि प्राप्त होती है, उसका अनुष्ठान भी बताइये, मेरे मनमें यह सब सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हो रही है
毗湿摩波耶那说道:如是,那位行止宽弘、威光无比的大士婆罗摩,在萨拉斯瓦蒂河诸最胜圣地(tīrtha)广施财宝;继而循序行旅,来到俱卢之原。 阇那梅阇耶说道:“请为我讲述萨拉斯瓦蒂河畔诸圣渡之德——其功德如何兴起,其源流如何。又,至上之人啊,也请说明依次巡礼它们所获之果报,以及在彼处得成就所当修行的具体仪轨与戒行。”
Verse 39
यथाक्रमेण भगवंस्तीर्थानामनुपूर्वश: । ब्रह्मन ब्रह्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं हि मे,जनमेजय बोले--ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और मनुष्योंमें उत्तम ब्राह्मगदेव! अब आप मुझे सरस्वती-तटवर्ती तीर्थोंके गुण, प्रभाव और उत्पत्तिकी कथा सुनाइये। भगवन्! क्रमश: उन तीर्थोके सेवनका फल और जिस कर्मसे वहाँ सिद्धि प्राप्त होती है, उसका अनुष्ठान भी बताइये, मेरे मनमें यह सब सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हो रही है
阇那梅阇耶说道:“尊者啊,请按次第、依序列为我叙说诸圣渡(tīrtha)。婆罗门啊,汝为知梵者中之最胜——我心中好奇至深。我渴望逐一聆听萨拉斯瓦蒂河畔诸圣渡的功德、威力与起源;并愿知依正序巡礼所获之果报,以及在彼处得成就所当修持的诸般戒行。”
Verse 40
वैशम्पायन उवाच तीर्थानां च फलं राजन् गुणोत्पत्तिं च सर्वश: । मयोच्यमान वै पुण्यं शृणु राजेन्द्र कृत्सनश:,वैशम्पायनजीने कहा--राजेन्द्र! मैं तुम्हें तीर्थोके गुण, प्रभाव, उत्पत्ति तथा उनके सेवनका पुण्य-फल बता रहा हूँ। वह सब तुम ध्यानसे सुनो
毗舍波耶那说道:“大王啊,我将详尽叙述朝礼诸圣渡处(tīrtha)所得之果报,它们的德能与一切起源。诸王之主啊,请专心聆听这关于由彼处所生功德的完整记述。”
Verse 41
पूर्व महाराज यदुप्रवीर ऋषत्विक्सुह्ृद्विप्रगणैश्न सार्थम् पुण्यं प्रभासं समुपाजगाम यत्रोडुराड् यक्ष्मणा क्लिश्यमान:,महाराज! यदुकुलके प्रमुख वीर बलरामजी सबसे पहले ऋत्विजों, सुहृदों और ब्राह्मणोंके साथ पुण्यमय प्रभासक्षेत्रमें गये, जहाँ राजयक्ष्मासे कष्ट पाते हुए चन्द्रमाको शापसे छुटकारा मिला था। नरेन्द्र! वे वहीं पुन: अपना तेज प्राप्त करके सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करते हैं। इस प्रकार चन्द्रमाको प्रभासित करनेके कारण ही वह प्रधान तीर्थ इस पृथ्वीपर प्रभास नामसे विख्यात हुआ
毗舍波耶那说道:“往昔,大王啊,夜度族最卓越的英雄偕同祭官(ṛtvij)、亲善之友与婆罗门众,前往名为‘普罗婆娑’(Prabhāsa)的圣渡处——在那里,群星之主月神因痨病(yakṣmā)所苦,得以解厄并重获光辉。正因那圣地使月神再度放光,此处遂在大地上以‘普罗婆娑’——‘辉耀之地’之名而闻名。”
Verse 42
विमुक्तशाप: पुनराप्य तेज: सर्व जगद् भासयते नरेन्द्र । एवं तु तीर्थप्रवरं पृथिव्यां प्रभासनात् तस्य ततः प्रभास:,महाराज! यदुकुलके प्रमुख वीर बलरामजी सबसे पहले ऋत्विजों, सुहृदों और ब्राह्मणोंके साथ पुण्यमय प्रभासक्षेत्रमें गये, जहाँ राजयक्ष्मासे कष्ट पाते हुए चन्द्रमाको शापसे छुटकारा मिला था। नरेन्द्र! वे वहीं पुन: अपना तेज प्राप्त करके सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करते हैं। इस प्रकार चन्द्रमाको प्रभासित करनेके कारण ही वह प्रधान तीर्थ इस पृथ्वीपर प्रभास नामसे विख्यात हुआ
毗舍波耶那说道:“大王啊,月神既脱离诅咒,复得光辉,再次照耀整个世界。故此,因那地上最胜的圣渡处使他重放光明,它此后便以‘普罗婆娑’之名而著称。”
Verse 43
जनमेजय उवाच कथं तु भगवन् सोमो यक्ष्मणा समगृहा[त । कथं च तीर्थप्रवरे तरमिं श्षन्द्रोी न्यमज्जत,जनमेजयने पूछा--भगवन्! चन्द्रमा कैसे राजयक्ष्मासे ग्रस्त हो गये और उस उत्तम तीर्थमें किस प्रकार उन्होंने स्नान किया?
阇那美阇耶说道:“尊者啊,苏摩(月神)如何被王痨(rājayakṣmā)所侵?又在那最殊胜的圣渡处,月神如何沉入圣水沐浴?”
Verse 44
कथमाप्लुत्य तस्मिंस्तु पुनराप्पायित: शशी । एतनमे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामुने,महामुने! उस तीर्थमें गोता लगाकर चन्द्रमा पुनः किस प्रकार हृष्ट-पुष्ट हुए? यह सब प्रसंग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये
阇那美阇耶说道:“大圣者啊,月神在那圣渡处沐浴之后,如何再得滋养、恢复如初?请将这一切经过为我详尽叙说。”
Verse 45
वैशम्पायन उवाच दक्षस्य तनयास्तात प्रादुरासन् विशाम्पते । स सप्तविंशतिं कन्या दक्ष: सोमाय वै ददौ,वैशम्पायनजीने कहा--तात! प्रजानाथ! प्रजापति दक्षके बहुत-सी संतानें उत्पन्न हुई थीं। उनमेंसे अपनी सत्ताईस कन्याओंका विवाह उन्होंने चन्द्रमाके साथ कर दिया था
毗湿摩波耶那说道:“孩子啊!众民之主的国王啊!生主达叉生下了许多子女。其中,他将二十七位女儿嫁与苏摩——月神。”
Verse 46
नक्षत्रयोगनिरता: संख्यानार्थ च ताभवन् | पत्न््यो वै तस्य राजेन्द्र सोमस्य शुभकर्मण:,राजेन्द्र! शुभ कर्म करनेवाले सोमकी वे पत्नियाँ समयकी गणनाके लिये नक्षत्रोंसे सम्बन्ध रखनेके कारण उसी नामसे विख्यात हुईं
大王啊,吉行之主苏摩的那些妻子,因专注于与二十七宿(月宿)的相应,以便计量时日,便以那些月宿之名而闻名,并成为推算时间的依据。
Verse 47
तास्तु सर्वा विशालाक्ष्यो रूपेणाप्रतिमा भुवि | अत्यरिच्यत तासां तु रोहिणी रूपसम्पदा,वे सब-की-सब विशाल नेत्रोंसे सुशोभित होती थीं। इस भूतलपर उनके रूपकी समानता करनेवाली कोई स्त्री नहीं थी। उनमें भी रोहिणी अपने रूप-वैभवकी दृष्टिसे सबकी अपेक्षा बढ़ी-चढ़ी थी
她们个个明眸广目,姿容无双,世间无女可比;而在其中,罗希尼以容色之盛,更胜诸姊妹。
Verse 48
ततस्तस्यां स भगवान् प्रीति चक्रे निशाकरः । सास्य हृद्या बभूवाथ तस्मात् तां बुभुजे सदा,इसलिये भगवान् चन्द्रमा उससे अधिक प्रेम करने लगे, वही उनकी हृदयवल्लभा हुई; अतः वे सदा उसीका उपभोग करते थे
于是,月神尼沙迦罗对她生起了格外的爱恋。她成了他心中所悦;因此他常常只与她相伴,流连不去。
Verse 49
पुरा हि सोमो राजेन्द्र रोहिण्यामवसत् परम् | ततस्ता: कुपिता: सर्वा नक्षत्राख्या महात्मन:,राजेन्द्र! पूर्वकालमें चन्द्रमा सदा रोहिणीके ही समीप रहते थे; अतः नक्षत्रनामसे प्रसिद्ध हुईं महात्मा सोमकी वे सारी पत्नियाँ उनपर कुपित हो उठीं
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,往昔苏摩(月神)几乎只与罗希尼同住。于是,那位大魂苏摩的其余诸妻——以‘二十七宿’之名著称者——见他偏爱一人,便都对他愤怒起来。”
Verse 50
ता गत्वा पितरं प्राहु: प्रजापतिमतन्द्रिता: । सोमो वसति नास्मासु रोहिणीं भजते सदा,और आलस्य छोड़कर अपने पिताके पास जाकर बोलीं--'प्रभो! चन्द्रमा हमारे पास नहीं आते। वे सदा रोहिणीका ही सेवन करते हैं
于是那些女儿毫不懈怠,前往父亲生主(Prajāpati)面前禀告道:“主宰啊,苏摩(月神)不与我们同住;他总是只亲近罗希尼(Rohiṇī)。”
Verse 51
ता वयं सहिता: सर्वास्त्वित्सकाशे प्रजेश्वर । वत्स्यामो नियताहारास्तपश्चरणतत्परा:
毗湿摩耶那说道:“众生之主啊,我们众人同心合一,将留在你面前——节制饮食,专心奉行苦行。”
Verse 52
“अत: प्रजेश्वर! हम सब बहिनें एक साथ नियमित आहार करके तपस्यामें संलग्न हो आपके ही पास रहेंगी! ।। श्रुत्वा तासां तु वचनं दक्ष: सोममथाब्रवीत् । सम॑ वर्तस्व भार्यासु मा त्वाधर्मो महान् स्पृशेत्,उनकी यह बात सुनकर प्रजापति दक्षने चन्द्रमासे कहा--'सोम! तुम अपनी सभी पत्नियोंके साथ समानतापूर्ण बर्ताव करो, जिससे तुम्हें महान् पाप न लगे”
“因此,众生之主啊!我们诸姊妹将一同留在你面前,节制饮食,专心修苦行。”达刹(Dakṣa)生主听罢,便对苏摩(月神)说道:“苏摩啊,你当以平等之心对待诸位妻子,莫使大不义(adharma)沾染于你。”
Verse 53
तास्तु सर्वाब्रवीद् दक्षो गच्छध्वं शशिनो5न्तिकम् | सम॑ वत्स्यति सर्वासु चन्द्रमा मम शासनात्,फिर दक्षने उन सभी कन्याओंसे कहा--“अब तुमलोग चन्द्रमाके पास ही जाओ। वे मेरी आज्ञासे तुम सब लोगोंके प्रति समानभाव रखेंगे”
毗湿摩耶那说道:于是达刹对她们众人说:“你们如今去到月神面前吧。凭我的命令,旃陀罗摩(Candramā)将以平等之心与诸位同住。”
Verse 54
विसृष्टास्तास्तथा जम्मु: शीतांशुभवनं तदा । तथापि सोमो भगवान् पुनरेव महीपते
毗湿摩耶那说道:她们既蒙放行,便前往清辉之月的居所。然而即便如此,王啊,福德的主宰苏摩仍又一次归返。
Verse 55
ततस्ता: सहिता: सर्वा भूय: पितरमन्रुवन्,तब वे सब कन्याएँ पुन: एक साथ अपने पिताके पास जाकर बोलीं--'हम सब लोग आपकी सेवामें तत्पर रहकर आपके ही समीप रहेंगी। चन्द्रमा हमारे साथ नहीं रहते। उन्होंने आपकी बात नहीं मानी”
毗湿摩波耶那说:于是那些少女全都聚在一起,又来到父亲面前说道:“我们都将守在您身旁,尽心侍奉。月神并不与我们同住;他没有遵从您的话。”
Verse 56
तव शुश्रूषणे युक्ता वत्स्यामो हि तवान्तिके । सोमो वसति नास्मासु नाकरोद् वचनं तव,तब वे सब कन्याएँ पुन: एक साथ अपने पिताके पास जाकर बोलीं--'हम सब लोग आपकी सेवामें तत्पर रहकर आपके ही समीप रहेंगी। चन्द्रमा हमारे साथ नहीं रहते। उन्होंने आपकी बात नहीं मानी”
毗湿摩波耶那说:“我们既立志侍奉您,必定近侍左右。苏摩(月神)不与我们同住;他没有遵行您的命令。”
Verse 57
तासां तदू् वचन श्रुत्वा दक्ष: सोममथाब्रवीत् । सम॑ वर्तस्व भार्यासु मा त्वां शप्स्ये विरोचन,उनकी बात सुनकर दक्षने पुन: सोमसे कहा--'प्रकाशमान चन्द्रदेव! तुम अपनी सभी पत्नियोंके साथ समान बर्ताव करो, नहीं तो तुम्हें शाप दे दूँगा"
毗湿摩波耶那说:达刹听了诸位妻子的言语,便又对苏摩说道:“光辉的月神啊,当以同等之心对待你所有的妻子;否则我将诅咒你。”
Verse 58
अनादृत्य तु तद् वाक्य दक्षस्य भगवान् शशी । रोहिण्या सार्थमवसत् ततस्ता: कुपिता: पुनः
然而神圣的月神无视达刹之言,仍与罗希尼同住;因此其余诸女又再度愤怒。
Verse 59
गत्वा च पितर प्राहु: प्रणम्य शिरसा तदा । सोमो वसति नास्मासु तस्मान्न: शरणं भव
她们前往父亲那里,当时俯首致敬说道:“苏摩不再住于我们之中;因此,请您成为我们的庇护。”
Verse 60
दक्षके इतना कहनेपर भी भगवान् चन्द्रमा उनकी बातकी अवहेलना करके केवल रोहिणीके ही साथ रहने लगे। यह देख दूसरी स्त्रियाँ पुनः क्रोधसे जल उठीं और पिताके पास जा उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर प्रणाम करनेके अनन्तर बोलीं--“भगवन्! सोम हमारे पास नहीं रहते। अतः आप हमें शरण दें ।। रोहिण्यामेव भगवान् सदा वसति चन्द्रमा: । न त्वद्वाद्ो गणयति नास्मासु स्नेहमिच्छति
毗耶娑波耶那说:即便达叉如此告诫,神圣的月神仍无视其言,只与罗希尼同住。见此情形,其余诸妻再度怒火中烧,遂往父前,俯首拜伏于其足下,致敬后说道:“大人!苏摩不与我们同居,愿您赐我们庇护。福德的月神恒常只住在罗希尼处,连您的命令也不放在心上,更不愿对我们施以爱怜。”
Verse 61
तच्छुत्वा भगवान् क्रुद्धो यक्ष्माणं पृथिवीपते
听闻此言,那位可敬者勃然大怒,便对“夜叉摩”(痨病之祸)发话——噢,大地之主。
Verse 62
ससर्ज रोषात् सोमाय स चोडुपतिमाविशत् । पृथ्वीनाथ! यह सुनकर भगवान् दक्ष कुपित हो उठे। उन्होंने चन्द्रमाके लिये रोषपूर्वक राजयक्ष्माकी सृष्टि की। वह चन्द्रमाके भीतर प्रविष्ट हो गया ।। ६१ $ ।। स यक्ष्मणाभिभूतात्माक्षीयताहरह: शशी
毗耶娑波耶那说:达叉盛怒之下,为苏摩生出名为“罗阇夜叉摩”的痨病;那病侵入群星之主——月。被这消耗之疾所制,娑尸(月)便一日复一日地亏损消减。
Verse 63
उक्तवान् वचन तथ्यं हितं चैव विशेषत: । भगवानने हस्तिनापुर जाकर धुृतराष्ट्रसे भेंट की और उनसे सबके लिये विशेष हितकारक एवं यथार्थ बातें कहीं,यत्नं चाप्यकरोदू राजन मोक्षार्थ तस्य यक्ष्मण: । यक्ष्मासे शरीर ग्रस्त हो जानेके कारण चन्द्रमा प्रतिदिन क्षीण होने लगे। राजन्! उस यक्ष्मासे छूटनेके लिये उन्होंने बड़ा यत्न किया ।। ६२ $ ।। इष्टवेष्टिभिमहाराज विविधाभिनिशाकर: न चामुच्यत शापाद् वै क्षयं चैवाभ्यगच्छत । महाराज! नाना प्रकारके यज्ञ-यागोंका अनुष्ठान करके भी चन्द्रमा उस शापसे मुक्त न हो सके और धीरे-धीरे क्षीण होते चले गये
毗耶娑波耶那说:他所言皆真实而有益,尤为切要。又,噢,国王,他也竭力欲使其脱离那消耗之疾。月被痨病缠身,便日复一日地亏损。噢,国王,为求摆脱此患,他作了极大的努力。然而,噢,大王,即使举行了种种祭祀与仪轨,那“造夜者”(月)仍未能从诅咒中解脱,只得继续衰减。
Verse 64
।। क्षीयमाणे तत: सोमे ओषध्यो न प्रजज्ञिरे
毗耶娑波耶那说:当苏摩开始亏损时,诸般药草便不再萌生。
Verse 65
ओषधीनां क्षये जाते प्राणिनामपि संक्षय:
毗舍摩波耶那说道:“当药草枯竭之时,众生亦随之衰败——维系生命的良药既失,生命本身也就日渐消减。”
Verse 66
ततो देवा: समागम्य सोममूचुर्महीपते
于是诸天聚集,向苏摩说道,噢,大王。
Verse 67
किमिदं भवतो रूपमीदृशं न प्रकाशते । कारणं ब्रूहि नः सर्व येनेद॑ ते महद् भयम्
毗舍摩波耶那说道:“为何你在这般异状之中,形貌却不为我们所明见?请将缘由尽数告知——究竟因何缘故,你心中生起如此巨大的恐惧?”
Verse 68
श्रुत्वा तु वचन त्वत्तो विधास्यामस्ततो वयम् | पृथ्वीनाथ! उस समय देवताओंने चन्द्रमासे मिलकर पूछा--“आपका रूप ऐसा कैसे हो गया? यह प्रकाशित क्यों नहीं होता है? हमलोगोंसे सारा कारण बताइये, जिससे आपको महान् भय प्राप्त हुआ। आपकी बात सुनकर हमलोग इस संकटके निवारणका कोई उपाय करेंगे” ।। ६६-६७ $ || एवमुक्त: प्रत्युवाच सर्वास्तान् शशलक्षण:
“听了你的话,我们便将依言而行。噢,大地之主!当时诸天会聚于月神周围,问道:‘你的形相为何变成如此?为何你的光辉不再显耀?请将使你陷入巨大恐惧的缘由尽数告知。待我们听毕,必当设法消除此难。’月神——带有兔纹之相者——受此询问,便答复众神。”
Verse 69
देवास्तथा वच: श्रुत्वा गत्वा दक्षमथाब्रुवन्
毗舍摩波耶那说道:“诸天听罢此言,便前往达克沙处,对他陈述。”
Verse 70
असौ हि चन्द्रमा: क्षीण: किज्चिच्छेषो हि लक्ष्यते,“चन्द्रमा क्षीण हो चुके हैं और उनका कुछ ही अंश शेष दिखायी देता है। देवेश्वर! उनके क्षयसे लता, वीरुतू, ओषधियाँ भाँति-भाँतिके बीज और सम्पूर्ण प्रजा भी क्षीण हो गयी है
毗舍波耶那说道:“看哪,月亮已渐亏;所见仅余一小片残光。噢,诸天之主!由于这般减损,藤蔓、草木、药草、各类种子,乃至一切众生,都已衰弱无力。”
Verse 71
क्षयाच्चैवास्य देवेश प्रजाश्नैव गता: क्षयम् वीरुदोषधयश्नैव बीजानि विविधानि च,“चन्द्रमा क्षीण हो चुके हैं और उनका कुछ ही अंश शेष दिखायी देता है। देवेश्वर! उनके क्षयसे लता, वीरुतू, ओषधियाँ भाँति-भाँतिके बीज और सम्पूर्ण प्रजा भी क्षीण हो गयी है
毗舍波耶那说道:“噢,诸天之主!当他渐亏之时,众民亦随之衰落。藤蔓、草木、药草以及各类种子,也同样枯耗。”
Verse 72
तेषां क्षये क्षयो5स्माकं विनास्माभिर्जगच्च किम् | इति ज्ञात्वा लोकगुरो प्रसाद कर्तुमहसि,“उन सबके क्षीण होनेपर हमारा भी क्षय हो जायगा। फिर हमारे बिना संसार कैसे रह सकता है? लोकगुरो! ऐसा जानकर आपको बचन्द्रदेवपर अवश्य कृपा करनी चाहिये”
“若他们毁灭,我们也将毁灭;没有我们,这世界又将如何存立?”既知如此,噢,诸世之师,你理当施以恩泽。
Verse 73
एवमुक्तस्ततो देवान् प्राह वाक््यं प्रजापति: । नैतच्छक्यं मम वचो व्यावर्तयितुमन्यथा
既被如此陈述,生主(Prajāpati)便对诸天说道:“我所言之语,不可能以别的方式加以转改。”
Verse 74
हेतुना तु महाभागा निवर्तिष्यति केनचित् । उनके ऐसा कहनेपर प्रजापति दक्ष देवताओंसे इस प्रकार बोले--“महाभाग देवगण! मेरी बात पलटी नहीं जा सकती। किसी विशेष कारणसे वह स्वतः निवृत्त हो जायगी ।। ७३ न! सम॑ वर्ततु सर्वासु शशी भार्यासु नित्यश:,“यदि चन्द्रमा अपनी सभी पत्नियोंके प्रति सदा समान बर्ताव करें और सरस्वतीके श्रेष्ठ तीर्थमें गोता लगायें तो वे पुनः बढ़कर पुष्ट हो जायँगे। देवताओ! मेरी यह बात अवश्य सच होगी
毗舍波耶那说道:“噢,诸位有福者,因某种特殊缘由,她将自行退却。”
Verse 75
सरस्वत्या वरे तीर्थे उन्मज्जन् शशलक्षण: । पुनर्वर्थिष्यते देवास्तद् वै सत्यं वचो मम,“यदि चन्द्रमा अपनी सभी पत्नियोंके प्रति सदा समान बर्ताव करें और सरस्वतीके श्रेष्ठ तीर्थमें गोता लगायें तो वे पुनः बढ़कर पुष्ट हो जायँगे। देवताओ! मेरी यह बात अवश्य सच होगी
“在女神萨拉斯瓦蒂最殊胜的圣渡处,带有兔形印记的月神若下水沐浴,便将再度增长而充盈。诸天啊!我此言必定真实——只要月神恒常平等对待诸位妃后,并在萨拉斯瓦蒂的上妙圣地中沐浴。”
Verse 76
मासार्ध च क्षयं सोमो नित्यमेव गमिष्यति । मासार्ध तु सदा वृद्धि सत्यमेतद् वचो मम,'सोम आधे मासतक प्रतिदिन क्षीण होंगे और आधे मासतक निरन्तर बढ़ते रहेंगे। मेरी यह बात अवश्य सत्य होगी
毗湿摩波衍那说:“半月之中,月神将日复一日地渐渐亏损;另半月之中,又将不断渐渐盈满。我此言必将应验。”
Verse 77
समुद्र पश्चिमं गत्वा सरस्वत्यब्धिसड्रमम् । आराधयतु देवेशं तत: कान्तिमवाप्स्यति,'पश्चिमी समुद्रके तटपर जहाँ सरस्वती और समुद्रका संगम हुआ है, वहाँ जाकर चन्द्रमा देवेश्वर महादेवजीकी आराधना करें तो पुनः वे अपनी कान्ति प्राप्त कर लेंगे!
毗湿摩波衍那说:“让他前往西方大海,去到萨拉斯瓦蒂与海洋交汇之处。若在那里礼敬供奉诸神之主摩诃提婆(湿婆),他便能重得失落的光辉。”
Verse 78
सरस्वतीं ततः सोम: स जगामर्षिशासनात् | प्रभासं प्रथमं तीर्थ सरस्वत्या जगाम ह,ऋषि (दक्ष प्रजापति)-के इस आदेशसे सोम सरस्वतीके प्रथम तीर्थ प्रभासक्षेत्रमें गये
毗湿摩波衍那说:于是苏摩遵从诸仙之命,前往萨拉斯瓦蒂河。确然,他抵达了普罗婆娑——萨拉斯瓦蒂最尊胜的圣渡——以循既定之朝圣与净化之道。
Verse 79
अमावास्यां महातेजास्तत्रोन्मज्जन् महाद्युति: | लोकान् प्रभासयामास शीतांशुत्वमवाप च,महातेजस्वी महाकान्तिमान् चन्द्रमाने अमावास्याको उस तीर्थमें गोता लगाया। इससे उन्हें शीतल किरणें प्राप्त हुईं और वे सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करने लगे
毗湿摩波衍那说:在无月之夜(新月夜),那位大威光者便在此圣渡中沐浴沉浸。由此他获得了清凉柔和的月华之性,开始照耀诸世界——他的光彩与美丽再度显现。
Verse 80
देवास्तु सर्वे राजेन्द्र प्रभासं प्राप्प पुष्कलम् । सोमेन सहिता भूत्वा दक्षस्य प्रमुखेडभवन्,राजेन्द्र! फिर सम्पूर्ण देवता सोमके साथ महान् प्रकाश प्राप्त करके पुनः दक्षप्रजापतिके सामने उपस्थित हुए
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,诸天众神皆至圣地普罗婆娑(Prabhāsa),于彼处获得丰盛的光辉与吉祥功德。随后——与苏摩(Soma)同行——他们又再度出现在达克沙(Dakṣa)般若波提(Prajāpati)之前。”
Verse 81
ततः प्रजापति: सर्वा विससर्जाथ देवता: । सोम॑ च भगवान् प्रीतो भूयो वचनमबत्रवीत्,तब भगवान् प्रजापतिने समस्त देवताओंको विदा कर दिया और सोमसे पुनः प्रसन्नतापूर्वक कहा--
于是,般若波提(Prajāpati)遣散了聚集的诸天。尊贵的苏摩(Soma)心生欢喜,又向他继续说道。
Verse 82
मावमंस्था: स्त्रिय: पुत्र मा च विप्रान् कदाचन । गच्छ युक्त: सदा भूत्वा कुरु वै शासनं मम,“बेटा! अपनी स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंकी कभी अवहेलना न करना। जाओ, सदा सावधान रहकर मेरी आज्ञाका पालन करते रहो”
“孩子啊,切莫轻蔑妇女,也切莫在任何时候怠慢婆罗门(brāhmaṇa)。去吧;恒常自持、谨慎警觉,奉行我的命令。”
Verse 83
स विसृष्टो महाराज जगामाथ स्वमालयम् । प्रजाश्न॒ मुदिता भूत्वा पुनस्तस्थुर्यथा पुरा,महाराज! ऐसा कहकर प्रजापतिने उन्हें विदा कर दिया। चन्द्रमा अपने स्थानको चले गये और सारी प्रजा पूर्ववत् प्रसन्न रहने लगी
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,如此被遣退后,他便回到自己的居所。百姓也再度欢欣,安然如故。”
Verse 84
एवं ते सर्वमाख्यातं यथा शप्तो निशाकर: । प्रभासं च यथा तीर्थ तीर्थानां प्रवरं महत्,इस प्रकार चन्द्रमाको जैसे शाप प्राप्त हुआ था और महान् प्रभासतीर्थ जिस प्रकार सब तीर्थोमें श्रेष्ठ माना गया, वह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया
毗湿摩波耶那说道:“我已将一切尽告于你——月神(尼沙迦罗,Niśākara)如何遭受诅咒,以及伟大的圣渡普罗婆娑(Prabhāsa)如何被尊为诸朝圣圣地之最。”
Verse 85
अमावास्यां महाराज नित्यश: शशलक्षण: । स्नात्वा ह्॒ाप्यायते श्रीमान् प्रभासे तीर्थ उत्तमे
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,每逢新月之日,那位具兔形印记的光辉者——月神——便在最殊胜的圣渡处普罗婆娑(Prabhāsa)沐浴,由此得以滋养复苏,重归圆满。”
Verse 86
महाराज! चन्द्रमा उत्तम प्रभासतीर्थमें प्रत्येक अमावास्याको स्नान करके कान्तिमान् एवं पुष्ट होते हैं ।। अतसश्चैतत् प्रजानन्ति प्रभासमिति भूमिप । प्रभां हि परमां लेभे तस्मिन्नुन्मज्ज्य चन्द्रमा:,भूमिपाल! इसीलिये सब लोग इसे प्रभासतीर्थके नामसे जानते हैं; क्योंकि उसमें गोता लगाकर चन्द्रमाने उत्कृष्ट प्रभा प्राप्त की थी
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,月神每逢新月之日于殊胜的圣渡处普罗婆娑(Prabhāsa)沐浴,便光彩焕发、精力充盈。因此,地上之主啊,人们称此地为‘普罗婆娑’;因为月神正是在那里——以身沉入水中——获得了至上的辉耀。”
Verse 87
ततस्तु चमसोद्धेदमच्युतस्त्वगमद् बली । चमसोद्धेद इत्येवं यं जना: कथयन्त्युत,तदनन्तर भगवान् बलराम चमसोद्धेद नामक तीर्थमें गये। उस तीर्थको सब लोग चमसोद्धेदके नामसे ही पुकारते हैं
毗湿摩波耶那说道:其后,那位大力者前往名为“恰摩索陀诃陀”(Camasoddheda)的圣渡处。人们也确实就以“恰摩索陀诃陀”之名称呼此地。
Verse 88
तत्र दत्त्वा च दानानि विशिष्टानि हलायुध: । उषित्वा रजनीमेकां स्नात्वा च विधिवत्तदा,श्रीकृष्णके बड़े भाई हलधारी बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उत्तम दान दे एक रात रहकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँसे उदपानतीर्थको प्रस्थान किया, जो मंगलकारी आदि तीर्थ है। राजेन्द्र जममेजय! उदपान वह तीर्थ है, जहाँ उपस्थित होनेमात्रसे महान् फलकी प्राप्ति होती है। सिद्ध पुरुष वहाँ ओषधियों (वृक्षों और लताओं)-की स्निग्धता और भूमिकी आर्द्रता देखकर अदृश्य हुई सरस्वतीको भी जान लेते हैं
在那里,持犁之武器者哈拉尤陀(婆罗罗摩)施行殊胜布施。停留一夜后,他依正法仪轨沐浴,便怀着急切之心离开此处,前往乌陀波那圣渡(Udapāna-tīrtha)——一处古老而吉祥的原初圣地。阇那美阇耶王啊,乌陀波那乃是只要抵达便能获得巨大功德之处;而诸成就仙人见到药草林藤的丰润与土地的湿泽,便能觉知那本不可见的萨拉斯瓦蒂(Sarasvatī)也在其间流行。
Verse 89
उदपानमथागच्छत्त्वरावान् केशवाग्रज: । आद्य॑ स्वस्त्ययनं चैव यत्रावाप्प महत् फलम्,श्रीकृष्णके बड़े भाई हलधारी बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उत्तम दान दे एक रात रहकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँसे उदपानतीर्थको प्रस्थान किया, जो मंगलकारी आदि तीर्थ है। राजेन्द्र जममेजय! उदपान वह तीर्थ है, जहाँ उपस्थित होनेमात्रसे महान् फलकी प्राप्ति होती है। सिद्ध पुरुष वहाँ ओषधियों (वृक्षों और लताओं)-की स्निग्धता और भूमिकी आर्द्रता देखकर अदृश्य हुई सरस्वतीको भी जान लेते हैं
毗湿摩波耶那说道:随后,迅捷行走的婆罗罗摩——克舍婆(Keśava)的兄长——前往乌陀波那,那古老而吉祥的圣渡处;人只要抵达,便可得大功德。在那里,他依正法仪轨沐浴,施予上妙布施,停留一夜,便又怀着急切之心继续前行。阇那美阇耶王啊,乌陀波那乃是仅凭亲临其地便赐予巨大灵果的圣处;诸成就仙人观察药草的丰润与地面的湿泽,便能识得那隐而不见的萨拉斯瓦蒂(Sarasvatī)。
Verse 90
स्निग्धत्वादोषधीनां च भूमेश्नव जनमेजय । जानन्ति सिद्धा राजेन्द्र नष्टामपि सरस्वतीम्,श्रीकृष्णके बड़े भाई हलधारी बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उत्तम दान दे एक रात रहकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँसे उदपानतीर्थको प्रस्थान किया, जो मंगलकारी आदि तीर्थ है। राजेन्द्र जममेजय! उदपान वह तीर्थ है, जहाँ उपस्थित होनेमात्रसे महान् फलकी प्राप्ति होती है। सिद्ध पुरुष वहाँ ओषधियों (वृक्षों और लताओं)-की स्निग्धता और भूमिकी आर्द्रता देखकर अदृश्य हुई सरस्वतीको भी जान लेते हैं
毗湿摩波耶那说:阇那美阇耶啊,正因为草药与诸般植物呈现出丰润葱茏的生机,且大地含湿润泽,那些已臻成就的圣贤——大王——即使萨拉斯瓦蒂已隐没于目力之外,也能辨识她的所在。此段旨在昭示:神圣的临在并非总为凡常感官所摄;唯有清净、内证与对微细征兆的警觉,方能揭开所隐藏者,而圣地(tīrtha)亦能在仅仅抵达之时便赐予广大功德之果。
Verse 131
ततो विभज्यमानेषु बलेषु बलिनां वर: । प्रोवाच भ्रातरं कृष्णं राहिणेयो महामना:
于是,当诸军正在分拨编配之时,强者之中最为卓绝者——罗希尼之子罗希涅耶,那位大心者——开口对他的兄弟黑天(克里希纳)说道。
Verse 153
पाण्डवेयान् पुरस्कृत्य ययावभिमुख: कुरून् | सात्यकिसहित भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंका पक्ष लिया। रोहिणीनन्दन शूरवीर बलरामजीके चले जानेपर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंको आगे करके पुष्यनक्षत्रमें कुरुक्षेत्रकी ओर प्रस्थान किया
毗湿摩波耶那说:黑天克里希纳与萨提亚基同行,让般度诸子居于前列,面向俱卢而行。罗希尼之子、英勇的婆罗摩既已离去,灭魔者摩杜苏达那克里希纳便公开择定般度族一方,使他们领路,在吉祥的普沙星宿之下启程,向库茹克舍特罗进发——此举昭示他在战争重压之中仍以护持正法为己任的道义承诺。
Verse 186
क्षिप्रमानीयतां सर्व तीर्थहेतो: परिच्छदम् । 'सोना, चाँदी, दूध देनेवाली गायें, वस्त्र, घोड़े, हाथी, रथ, गदहा और ऊँट आदि वाहन एवं तीर्थोपयोगी सब सामान शीघ्र ले आओ
毗湿摩波耶那说:“速速把为赴圣地(tīrtha)所需的一切器具资具都带来——凡属朝圣与清净仪式所用者,尽皆备齐。”此令彰显准备供献与法仪物资之迫切:前往圣地并非仅是行旅,而是以相称资具支撑的、有纪律的持法之行。
Verse 543
रोहिणीं निवसत्येव प्रीयमाणो मुहुर्मुहु: । पृथ्वीनाथ! पिताके विदा करनेपर वे पुनः चन्द्रमाके घरमें लौट गयीं, तथापि भगवान् सोम फिर रोहिणीके पास ही अधिकाधिक प्रेमपूर्वक रहने लगे
毗湿摩波耶那说:纵然月神苏摩辞别之后已回到自己的宫所,他仍一再地、且以愈加深厚的爱恋,主要栖居在罗希尼身旁。此事昭示:由执著而生的偏爱,纵使外表仍循礼数,也足以扰乱均衡,引来道义上的紧张与不安。
Verse 603
तस्मान्नस्त्राहि सर्वा वै यथा न: सोम आविशेत् । “भगवान् चन्द्रमा सदा रोहिणीके ही समीप रहते हैं। वे आपकी बातको कुछ गिनते ही नहीं हैं। हमलोगोंपर स्नेह रखना नहीं चाहते हैं, अतः आप हम सब लोगोंकी रक्षा करें, जिससे चन्द्रमा हमारे साथ भी सम्बन्ध रखें”
毗湿摩耶那说道:“因此,请护佑我们众人,使苏摩(明月)也能与我们建立联系。”这番恳求映照出对偏私的道德忧惧——若恩宠独归罗希尼一人,便会使其余者疏离——故而祈求一种恢复性的护持,以重建公正的眷顾与相连之缘。
Verse 643
निरास्वादरसा: सर्वा हतवीर्याश्च सर्वश: । चन्द्रमाके क्षीण होनेसे अन्न आदि ओषधियाँ उत्पन्न नहीं होती थीं। उन सबके स्वाद, रस और प्रभाव नष्ट हो गये
毗湿摩耶那说道:万物尽失滋味与汁液,诸般效力处处消亡。随着月轮亏损,连谷物与药草也不再萌生;纵有零星生出者,亦失其香味、养分与疗效——这是凶兆,昭示世界的生机正于灾厄重压之下崩塌。
Verse 653
कृशाश्चासन् प्रजा: सर्वा: क्षीयमाणे निशाकरे । ओषधियोंके क्षीण होनेसे समस्त प्राणियोंका भी क्षय होने लगा। इस प्रकार चन्द्रमाके क्षयके साथ-साथ सारी प्रजा अत्यन्त दुर्बल हो गयी
毗湿摩耶那说道:月轮渐亏,众生皆形销骨立、羸弱不堪。药草既衰,诸有情亦随之消耗。于是,伴随明月的减损,举世黎庶极度衰惫——此乃昭示:当维系万物的秩序衰弱,苦难便普及于众。
Verse 683
शापस्य लक्षणं चैव यक्ष्माणं च तथा55त्मन: । उनके इस प्रकार पूछनेपर चन्द्रमाने उन सबको उत्तर देते हुए अपनेको प्राप्त हुए शापके कारण राजयक्ष्माकी उत्पत्ति बतलायी
毗湿摩耶那说道:他们询问诅咒的征兆,以及那侵袭于他的消耗之疾(yakṣmā)。月神旃陀罗遂答曰:正因所受之咒,名为“王消耗病”(rājayakṣmā)的病患由此而生——昭示道德过失及其果报,能化作苦痛显现;而追问其因,正是通向理解与疗治的一步。
Verse 693
प्रसीद भगवन् सोमे शापो<यं विनिवर्त्यताम् । उनका वचन सुनकर देवता दक्षके पास जाकर बोले--'भगवन्! आप चन्द्रमापर प्रसन्न होइये और यह शाप हटा लीजिये
毗湿摩耶那说道:“愿尊贵的苏摩垂怜,此咒当得撤回。”闻此言,诸天往诣达克沙而奏曰:“大主啊,请悦纳明月,解除此咒。”此段彰显和解与调停的伦理力量:纵是神祇之间的争端,也以谦卑、代求与复归平衡而得消弭,并非以对抗升级而决。
The dilemma centers on whether kinship duty and protection of a companion can be overridden by fear and greed; Ekatā and Dvitā choose self-interest, while Trita maintains dharmic resolve despite abandonment.
The chapter teaches that disciplined intention and correct knowledge can sustain dharmic action even under severe constraint, and that unethical choices—especially betrayal—generate immediate and enduring karmic effects.
Yes: Trita requests (and receives) a boon that anyone who performs ablution at this udapāna attains soma-associated merit (somapagatī), functioning as an explicit tīrtha-phala statement.