Adhyaya 2
Mahaprasthanika ParvaAdhyaya 226 Verses

Adhyaya 2

Mahāprasthānika-parva Adhyāya 2: The Northward March, Sight of Himavat and Meru, and the Sequential Falls

Upa-parva: Mahāprasthānika-parva (Northward Departure and Sequential Falls)

Vaiśaṃpāyana reports that the disciplined travelers proceed northward and behold Himavat, then pass a sandy ocean-like expanse and look upon Meru, the preeminent mountain. As they move swiftly in a yogic frame (yogadharmiṇaḥ), Draupadī (Yājñasenī/Kṛṣṇā) falls first. Bhīma queries Yudhiṣṭhira regarding the cause, and Yudhiṣṭhira attributes her fall to pronounced partiality toward Arjuna (Dhanañjaya). Continuing without turning back, Sahadeva falls; Yudhiṣṭhira explains this as arising from Sahadeva’s belief that none equaled him in wisdom. Seeing both fallen, Nakula collapses; Yudhiṣṭhira links it to a self-conception of unmatched beauty. Arjuna then falls in grief; Yudhiṣṭhira cites Arjuna’s boast about swiftly destroying enemies and his contempt toward other archers as the causal disposition. Finally, Bhīma falls and asks for the reason; Yudhiṣṭhira identifies excess in consumption and self-praise regarding strength and vitality. Yudhiṣṭhira continues onward, accompanied by a single dog that follows him.

Chapter Arc: उत्तर की ओर योगयुक्त पाण्डवों का महाप्रस्थान—मार्ग में हिमालय का प्रथम दर्शन, और उसी पवित्र पथ पर अनहोनी की छाया। → तेज़ गति से चलते हुए भी भीतर के संस्कार और सूक्ष्म दोष पीछा नहीं छोड़ते; पहले द्रौपदी गिरती हैं, फिर क्रमशः सहदेव और नकुल—हर पतन के साथ शेष यात्रियों की निःशब्द परीक्षा कठोर होती जाती है। → भीमसेन स्वयं धरती पर गिर पड़ते हैं और युधिष्ठिर से विनती करते हैं कि कारण बताइए; युधिष्ठिर निर्लिप्त होकर उनके पतन का हेतु बताते हैं—अतिभोजन और बल का गर्व। → युधिष्ठिर करुणा में डूबे बिना, धर्म-नियम के अनुसार पीछे मुड़कर न देखते हुए आगे बढ़ते रहते हैं; पतन को शोक नहीं, कर्मफल की उद्घोषणा मानकर स्वीकार करते हैं। → भीम के पतन के बाद भी यात्रा रुकी नहीं—अब कौन शेष रहेगा, और धर्मराज की अंतिम परीक्षा किस रूप में सामने आएगी?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्या भारत महाप्रस्थानिकपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ,पम्प छा अर: द्वितीयो&्ध्याय: मार्ममें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरद्वारा प्रत्येकके गिरनेका कारण बताया जाना वैशम्पायन उवाच ततस्ते नियतात्मान उदीचीं दिशमास्थिता: । ददृशुर्योगयुक्ताश्व हिमवन्तं महागिरिम्‌

毗湿摩耶那说道:于是那些自制之人取道北方,望见巍巍大山喜马梵特——如同以瑜伽之轭驾驭的骏马一般。

Verse 2

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मनको संयममें रखकर उत्तर दिशाका आश्रय लेनेवाले योगयुक्त पाण्डवोंने मार्गमें महापर्वत हिमालयका दर्शन किया ।। त॑ चाप्यतिक्रमन्तस्ते ददृशुर्वालुकार्णवम्‌ । अवैक्षन्त महाशैलं मेरुं शिखरिणां वरम्‌,उसे भी लाँधचकर जब वे आगे बढ़े तब उन्हें बालूका समुद्र दिखायी दिया। साथ ही उन्होंने पर्वतोंमें श्रेष्ठ महागिरि मेरुका दर्शन किया यह कहकर महाबाहु युधिष्ठिर उनकी ओर देखे बिना ही आगे चल दिये। एक कुत्ता भी बराबर उनका अनुसरण करता रहा जिसकी चर्चा मैंने तुमसे अनेक बार की है ।। इति श्रीमहाभारते महाप्रस्थानिके पर्वणि द्रौपद्यादिपतने द्वितीयो5ध्याय:

毗湿摩耶那说道:“噢,阇那美阇耶!般度五子心意调伏、安住瑜伽,取道北方;途中他们望见雄伟的喜马拉雅。越过其后,又见一片浩瀚的‘沙海’,并见群峰之最的须弥山。然则臂力雄伟而意志坚定的尤提士提罗不回首、不旁顾,只管前行;并有一犬紧随其后——此事我已多次对你说过。”

Verse 3

तेषां तु गच्छतां शीघ्र सर्वेषां योगधर्मिणाम्‌ । याज्ञसेनी भ्रष्टयोगा निपपात महीतले,सब पाण्डव योगधर्ममें स्थित हो बड़ी शीघ्रतासे चल रहे थे। उनमेंसे ट्रपदकुमारी कृष्णाका मन योगसे विचलित हो गया; अतः वह लड़खड़ाकर पृथ्वीपर गिर पड़ी

当众人——皆守瑜伽之法——疾行之时,雅吉那塞尼的瑜伽定力忽然失坠;于是她踉跄倒地,伏于尘土。

Verse 4

तां तु प्रपतितां दृष्टयवा भीमसेनो महाबल: । उवाच धर्मराजानं याज्ञसेनीमवेक्ष्य ह,उसे नीचे गिरी देख महाबली भीमसेनने धर्मराजसे पूछा--

见她仆倒在地,大力的毗摩塞那望着雅阇那塞尼(德罗帕蒂),对法王(郁提施提罗)开口发问。

Verse 5

नाधर्मश्चरित: कश्रिद्‌ राजपुत्र्या परंतप । कारणं कि नु तद्‌ ब्रूहि यत्‌ कृष्णा पतिता भुवि,'परंतप! राजकुमारी द्रौपदीने कभी कोई पाप नहीं किया था। फिर बताइये, कौन-सा कारण है, जिससे वह नीचे गिर गयी?”

毗湿摩耶那说道:“噬敌如火者啊,那位公主(德罗帕蒂)从未行过不义之事。那么请说——为何黑姬(德罗帕蒂)会倒在大地之上?”

Verse 6

युधिष्ठिर उवाच पक्षपातो महानस्या विशेषेण धनंजये । तस्यैतत्‌ फलमपद्यैषा भुड्क्ते पुरुषसत्तम,युधिष्ठिरने कहा--पुरुषप्रवर! उसके मनमें अर्जुनके प्रति विशेष पक्षपात था; आज यह उसीका फल भोग रही है

郁提施提罗说道:“人中至上者啊,她心怀强烈的偏爱,尤其偏向檀那阇耶(阿周那)。这便是其果报,如今她正在承受。”

Verse 7

वैशम्पायन उवाच एवमुकक्‍्त्वानवेक्ष्यैनां ययौ भरतसत्तम: । समाधाय मनो धीमान्‌ धर्मात्मा पुरुषर्षभ:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! ऐसा कहकर उसकी ओर देखे बिना ही भरतभूषण नरश्रेष्ठ बुद्धिमान्‌ धर्मात्मा युधिष्ठिर मनको एकाग्र करके आगे बढ़ गये

毗湿摩耶那说道:说罢,那位婆罗多族中的至杰便继续前行,甚至不曾回首看她一眼。那智慧而具法性的人中雄牛——郁提施提罗——摄心入定,坚定地向前走去。

Verse 8

सहदेवस्ततो विद्वान्‌ निपपात महीतले । त॑ चापि पतितं दृष्टवा भीमो राजानमब्रवीत्‌,थोड़ी देर बाद विद्वान्‌ सहदेव भी धरतीपर गिर पड़े। उन्हें भी गिरा देख भीमसेनने राजासे पूछा--

随后,智者萨诃提婆也倒在大地上。见他亦已仆倒,毗摩便对国王(郁提施提罗)开口询问。

Verse 9

यो5यमस्मासु सर्वेषु शुश्रूषुरनहंकृत: । सो<थयं माद्रवतीपुत्र: कस्मान्‌ निपतितो भुवि,“भैया! जो सदा हमलोगोंकी सेवा किया करता था और जिसमें अहंकारका नाम भी नहीं था, यह माद्रीनन्दन सहदेव किस दोषके कारण धराशायी हुआ है?”

毗湿摩波耶那说道:“此人——一向勤谨侍奉我们众人,且毫无傲慢之心——摩德丽之子萨诃提婆,究竟因何过失而倒卧于地?”

Verse 10

युधिछिर उवाच आत्मन: सदृशं प्राज्ञ नैषो5मन्यत कंचन । तेन दोषेण पतितस्तस्मादेष नृपात्मज:,युधिष्ठिरने कहा--यह राजकुमार सहदेव किसीको अपने-जैसा दविद्दान्‌ या बुद्धिमान्‌ नहीं समझता था; अतः उसी दोषसे इसका पतन हुआ है

由提施提罗说道:“这位王子萨诃提婆,在智慧上不曾把任何人视作与自己相等。正因这一过失,他才倒下;因此这位王子遭逢了败落。”

Verse 11

वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा तं समुत्सूज्य सहदेवं ययौ तदा । भ्रातृभि: सह कौन्तेय: शुना चैव युधिष्ठिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर सहदेवको भी छोड़कर शेष भाइयों और एक कुत्तेके साथ कुन्तीकुमार युधिष्ठिर आगे बढ़ गये

毗湿摩波耶那说道:说罢,他便将萨诃提婆留在身后,继续前行。昆蒂之子由提施提罗与余下的兄弟们同行,身旁还有一条狗——在最后的道路上,纵使同伴渐次离散,他仍以坚忍之志向前迈进。

Verse 12

कृष्णां निपतितां दृष्टवा सहदेवं च पाण्डवम्‌ | आर्तों बन्धुप्रिय: शूरो नकुलो निपपात ह,कृष्णा और पाण्डव सहदेवको गिरे देख शोकसे आर्त हो बन्धुप्रेमी शूरवीर नकुल भी गिर पड़े

毗湿摩波耶那说道:见到黑公主(克里希那)倒在地上,又见到般度之子萨诃提婆亦已坠地,勇武而笃爱亲族的那俱罗被悲痛所压倒,也随之倒下。

Verse 13

तस्मिन्‌ निपतिते वीरे नकुले चारुदर्शने । पुनरेव तदा भीमो राजानमिदमब्रवीत्‌,मनोहर दिखायी देनेवाले वीर नकुलके धराशायी होनेपर भीमसेनने पुनः राजा युधिष्ठिरसे यह प्रश्न किया--

毗湿摩波耶那说道:当那位英勇而仪容俊美的那俱罗倒在地上时,毗摩塞那又一次向由提施提罗王发问道。

Verse 14

योअड्यमक्षतधथर्मात्मा भ्राता वचनकारक: । रूपेणाप्रतिमो लोके नकुल: पतितो भुवि,'भैया! संसारमें जिसके रूपकी समानता करनेवाला कोई नहीं था तो भी जिसने कभी अपने धर्ममें त्रुटि नहीं आने दी तथा जो सदा हमलोगोंकी आज्ञाका पालन करता था, वह हमारा प्रियबन्धु नकुल क्यों पृथ्वीपर गिरा है?”

毗湿摩波耶那说道:“为何那俱罗倒在大地之上——那俱罗,我们的兄弟;其正法从未染上丝毫瑕疵,常常奉行我们的命令,而其容貌之美,世间无人能及?”

Verse 15

इत्युक्तो भीमसेनेन प्रत्युवाच युधिष्ठिर: । नकुलं प्रति धर्मात्मा सर्वबुद्धिमतां वर:,भीमसेनके इस प्रकार पूछनेपर समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा युधिष्ठिरने नकुलके विषयमें इस प्रकार उत्तर दिया--

毗摩塞那如此发问,郁提施提罗便作答。那位具法之魂者——诸智者之最——就那俱罗一事给出回答,并为他们最后的行旅立下伦理之准绳。

Verse 16

रूपेण मत्समो नास्ति कश्रिदित्यस्य दर्शनम्‌ अधिकश्चाहमेवैक इत्यस्य मनसि स्थितम्‌,'भीमसेन! नकुलकी दृष्टि सदा ऐसी रही है कि रूपमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। इसके मनमें यही बात बैठी रहती थी कि “एकमात्र मैं ही सबसे अधिक रूपवानू हूँ।' इसीलिये नकुल नीचे गिरा है। तुम आओ। वीर! जिसकी जैसी करनी है वह उसका फल अवश्य भोगता है

毗湿摩波耶那说道:“那俱罗的心念常是如此:‘在容貌之美上,无人能与我相比。’在他心中已牢牢定住:‘唯我一人最为俊美。’因此那俱罗才会倒下。来吧,毗摩塞那。勇士啊,一个人的行持如何,必定要受其相应之果。”

Verse 17

नकुल: पतितस्तस्मादागच्छ त्वं वृकोदर । यस्य यद्‌ विहित॑ वीर सोडवश्यं तदुपाश्षुते,'भीमसेन! नकुलकी दृष्टि सदा ऐसी रही है कि रूपमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। इसके मनमें यही बात बैठी रहती थी कि “एकमात्र मैं ही सबसे अधिक रूपवानू हूँ।' इसीलिये नकुल नीचे गिरा है। तुम आओ। वीर! जिसकी जैसी करनी है वह उसका फल अवश्य भोगता है

毗湿摩波耶那说道:“因此那俱罗倒下了。来吧,弗利阔达罗。勇士啊,凡为一人所注定者,此人必定亲受其果。”

Verse 18

तांस्तु प्रपतितान्‌ दृष्टवा पाण्डव: श्वेतवाहन: । पपात शोकसन्तप्तस्ततो नु परवीरहा,द्रौपदी तथा नकुल और सहदेव तीनों गिर गये, यह देखकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले श्वेत-वाहन पाण्डुपुत्र अर्जुन शोकसे संतप्त हो स्वयं भी गिर पड़े

见他们倒伏于地,般度之子阿周那——白马驾车者、诛灭敌方勇士之人——被悲恸所淹没,哀伤如火灼心,他也随之仆倒。

Verse 19

तस्मिंस्तु पुरुषव्याप्रे पतिते शक्रतेजसि । ग्रियमाणे दुराधर्षे भीमो राजानमब्रवीत्‌,इन्द्रके समान तेजस्वी दुर्धर्ष वीर पुरुषसिंह अर्जुन जब पृथ्वीपर गिरकर प्राणत्याग करने लगे उस समय भीमसेनने राजा युधिष्ठिरसे पूछा

当时,那位大英雄——阿周那,光辉如因陀罗之威——倒卧于地;那不可战胜的战士已逼近生命尽头。于是,毗摩开口对国王尤提士提罗说道。此刻构成一场沉重的道德危机:纵然最伟大者亦会陨落,而幸存者必须直面法(dharma)的意义、责任,以及终途之上苦难背后隐秘的因缘。

Verse 20

अनुतं न स्मराम्यस्य स्वैरेष्वपि महात्मन: । अथ कस्य विकारो<यं येनायं पतितो भुवि,'भैया! महात्मा अर्जुन कभी परिहासमें भी झूठ बोले हों--ऐसा मुझे याद नहीं आता। फिर यह किस कर्मका फल है जिससे इन्हें पृथ्वीपर गिरना पड़ा?”

毗湿摩波耶那说道:“我不记得这位大心之人阿周那曾说过一句虚妄之言——即便在戏谑或随意谈笑之时亦然。那么,这究竟是什么过失?又是谁的业果,使他倒落于大地?”

Verse 21

युधिछिर उवाच एकाह्ला निर्दहेयं वै शत्रूनित्यर्जुनो 5ब्रवीत्‌ । न च तत्‌ कृतवानेष शूरमानी ततोडपतत्‌,युधिष्ठिर बोले--अर्जुनको अपनी शूरताका अभिमान था। इन्होंने कहा था कि “मैं एक ही दिनमें शत्रुओंको भस्म कर डालूँगा'; किंतु ऐसा किया नहीं; इसीसे आज इन्हें धराशायी होना पड़ा है

尤提士提罗说道:“阿周那自负其勇,曾夸言:‘我将在一日之内把敌人焚为灰烬。’然而他并未成就自己所说之事。因此,因那未能兑现的夸口,他如今倒下了。”

Verse 22

अवमेने धरनुग्रहानेष सर्वाश्व॒ फाल्गुन: । तथा चैतन्न तु तथा कर्तव्यं भूतिमिच्छता,अर्जुनने सम्पूर्ण धनुर्धरोंका अपमान भी किया था; अत: अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको ऐसा नहीं करना चाहिये

尤提士提罗说道:“阿湿婆法尔古那(阿周那)曾对一切善使弓者流露轻蔑。然而,求真实福祉与长久兴盛之人,不应如此行事。”

Verse 23

वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा प्रस्थितो राजा भीमो5थ निपपात ह । पतितश्चाब्रवीद्‌ भीमो धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! यों कहकर राजा युधिष्ठिर आगे बढ़ गये। इतनेहीमें भीमसेन भी गिर पड़े। गिरनेके साथ ही भीमने धर्मराज युधिष्ठिरको पुकारकर पूछा

毗湿摩波耶那说道:国王尤提士提罗说罢,便继续前行。就在这时,毗摩忽然倒在地上。倒下之际,毗摩呼唤法王尤提士提罗,询问自己崩倒的缘由;而这趟旅程的道德清算,也开始显露其真相。

Verse 24

भो भो राजलन्नवेक्षस्व पतितोऊहं प्रियस्तव । कि निमित्तं च पतन ब्रूहि मे यदि वेत्थ ह,“राजन! जरा मेरी ओर तो देखिये, मैं आपका प्रिय भीमसेन यहाँ गिर पड़ा हूँ। यदि जानते हों तो बताइये, मेरे इस पतनका क्या कारण है?”

毗湿摩波耶那说道:“大王啊,请看这边!我——你所钟爱的毗摩塞那——已经倒下了。若你知晓,请告诉我:我为何会坠落于此?”

Verse 25

युधिषछ्िर उवाच अतिभुक्तं च भवता प्राणेन च विकत्थसे । अनवेक्ष्य परं पार्थ तेनासि पतित: क्षितौ

由提施提罗说道:“你纵欲无度,贪食过甚,甚至连自己的性命之息也要夸耀。噢,帕尔塔啊,你不顾更高之道——不仰望至上的善——因此才倒伏于大地。”

Verse 26

युधिष्ठिरने कहा--भीमसेन! तुम बहुत खाते थे और दूसरोंको कुछ भी न समझकर अपने बलकी डींग हाँका करते थे; इसीसे तुम्हें भी धराशायी होना पड़ा है ।। इत्युक्त्वा तं महाबाहुर्जगामानवलोकयन्‌ । शध्वाप्येको5नुययौ यस्ते बहुश: कीर्तितो मया

由提施提罗说道:“毗摩塞那啊,你贪食无度,又轻慢他人,夸耀自己的力量;因此你也倒在地上。”说罢,这位臂力无双的由提施提罗不再回顾,继续前行。然而仍有一位同伴跟随其后——那位我曾多次称颂的人。

Frequently Asked Questions

The dilemma is interpretive and ethical: how to reconcile the fall of largely righteous figures with dharma. The chapter answers by shifting from judging overt crimes to identifying subtle partialities and self-regarding claims as morally consequential.

The upadeśa is that spiritual and ethical completion requires vigilance over inner dispositions—partiality, pride, boastfulness, and excess—since these can undermine even exemplary lives; renunciatory progress demands non-attachment and self-scrutiny.

No explicit phalaśruti appears in this chapter. Its meta-significance lies in functioning as an internal commentary on karma: the narrative itself becomes the instructional device, preparing the reader for the epic’s final evaluation of merit and justice in the concluding parva.