Adhyaya 51
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 5152 Verses

Adhyaya 51

Adhyāya 51: Kṛṣṇa’s Leave-Taking and Departure for Dvārakā (द्वारकागमनानुमति)

Upa-parva: Dvārikāgamanānumati (Permission for Kṛṣṇa’s departure to Dvārakā)

Vaiśaṃpāyana narrates that Kṛṣṇa instructs Dāruka to yoke the chariot; the Pāṇḍava side also orders the retinue to prepare for travel toward Hāstinapura (Gajasāhvaya / Vāraṇasāhvaya). Kṛṣṇa and Arjuna ride together, conversing; Arjuna then delivers an extended panegyric that frames Kṛṣṇa as cosmic ground and operative intelligence behind decisive wartime outcomes (including strategic guidance and the neutralization of key adversaries). Arriving at Dhṛtarāṣṭra’s residence, both offer formal respects to Dhṛtarāṣṭra, Gāndhārī, Kuntī, Yudhiṣṭhira, Bhīma, the twins, Vidura, and the assembled women of the house, then retire. At dawn they approach Yudhiṣṭhira; Arjuna requests permission for Kṛṣṇa to go to Dvārakā to see Vasudeva, Devakī, Balarāma, and the Vṛṣṇis. Yudhiṣṭhira consents, instructs Kṛṣṇa to convey honors and remembrance, and asks him to return for the horse sacrifice. Kṛṣṇa replies with deference, declining material gifts by affirming Yudhiṣṭhira’s lordship over wealth and land, then departs in a divine chariot, accompanied and ceremonially sent off by prominent allies and citizens.

Chapter Arc: ब्रह्म-वाणी में पंचमहाभूत, मन-बुद्धि और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का रहस्य खुलता है—जैसे भीतर का सारथि इन्द्रियों को साधता है। → सृष्टि-चक्र का आवर्तन (ऋषि-प्रजापति-तत्त्वों का बार-बार उद्भव और लय) और ‘दुराप’ सत्य तक पहुँचने की कठिनता सामने आती है—पर उपाय एक ही बताया जाता है: तप और संयम। → समस्त संस्कारों का शोधन कर आत्मा को आत्मा में संयमित करने वाला साधक उस ‘शुभ ब्रह्म’ को जान लेता है, जिसके आगे फिर कुछ शेष नहीं—अनुगीता का दार्शनिक शिखर यहीं है। → कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—यदि मुझमें प्रीति है तो इस अध्यात्म को सुनकर सम्यक आचरण करो; फिर वे अपने पिता (वसुदेव) के दर्शन की इच्छा प्रकट करते हैं। अर्जुन सहमत होकर नगर चलने को कहता है और युधिष्ठिर से अनुमति लेकर अपनी पुरी जाने की योजना बनती है। → कृष्ण का पिता-दर्शन और अर्जुन का प्रस्थान—आगे नगर-गमन में कौन-सा भावनात्मक/राजनीतिक प्रसंग उभरेगा?

Shlokas

Verse 1

/ अपन का छा है >> >> एकपज्चाशत्तमो< ध्याय: तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार ब्रह्मोवाच भूतानामथ पज्चानां यथैषामीश्वरं मनः । नियमे च विसर्गे च भूतात्मा मन एव च,ब्रह्माजीने कहा--महर्षियो! जिस प्रकार इन पाँचों महाभूतोंकी उत्पत्ति और नियमन करनेमें मन समर्थ है, उसी प्रकार स्थितिकालमें भी मन ही भूतोंका आत्मा है

梵天曰:“诸仙人啊,正如心识能在五大之生起与调御中施行统摄,同样在其存续之时,唯有此心被称为众生之内我。”

Verse 2

अधिष्ठाता मनो नित्यं भूतानां महतां तथा । बुद्धिरैश्वर्यमाचष्टे क्षेत्रज्ञक्ष स उच्यते,उन पज्चमहाभूतोंका नित्य आधार भी मन ही है। बुद्धि जिसके ऐश्वर्यको प्रकाशित करती है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है

风神曰:心恒为众生之统摄所依,亦为诸大之所依。智慧(buddhi)于其中显现主宰之力与自在者,名为“知田者”(kṣetrajña)。

Verse 3

इन्द्रियाणि मनो युड्धक्ते सदश्चानिव सारथि: । इन्द्रियाणि मनो बुद्धि: क्षेत्रज्ञे युज्यते सदा,जैसे सारथि अच्छे घोड़ोंको अपने काबूमें रखता है, उसी प्रकार मन सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर शासन करता है। इन्द्रिय, मन और बुद्धि--ये सदा क्षेत्रज्ञके साथ संयुक्त रहते हैं

正如善御者能制御良马,使之驯服于手,心亦统摄一切诸根。诸根、心与慧(buddhi)恒常与“知田者”(kṣetrajña)相应相连。

Verse 4

महदश्वसमायुक्तं बुद्धिसंयमनं रथम्‌ | समारुह् स भूतात्मा समन्तात्‌ परिधावति,जिसमें इन्द्रियरूपी घोड़े जुते हुए हैं, जिसका बुद्धिरूपी सारथिके द्वारा नियन्त्रण हो रहा है, उस देहरूपी रथपर सवार होकर वह भूतात्मा (क्षेत्रज्ञ) चारों ओर दौड़ लगाता रहता है

乘身为车——宏大无比,以诸根为马,以调御之慧为缰——内住的“知田者”(bhūtātman)周行驰骋,遍历四方。

Verse 5

इन्द्रियग्रामसंयुक्तो मनःसारथिरेव च | बुद्धिसंयमनो नित्यं महान्‌ ब्रह्ममयो रथ:,ब्रह्ममय रथ सदा रहनेवाला और महान है, इन्द्रियाँ उसके घोड़े, मन सारथि और बुद्धि चाबुक है

风神曰:“此大车恒具梵性。诸根之群为其马;心为御者;而慧(buddhi)常能制御导引,作其缰辔与鞭策。”

Verse 6

एवं यो वेत्ति विद्वान्‌ वै सदा ब्रह्ममयं रथम्‌ | स धीर: सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति,इस प्रकार जो विद्वान्‌ इस ब्रह्ममय रथकी सदा जानकारी रखता है, वह समस्त प्राणियोंमें धीर है और कभी मोहमें नहीं पड़ता

如是,真正有智者恒常了知此梵性之车,便于一切众生中安忍沉着,不堕迷妄。

Verse 7

अव्यक्तादि विशेषान्तं सहस्थावरजड्रमम्‌ । सूर्यचन्द्रप्रभालोकं ग्रहनक्षत्रमण्डितम्‌,यह जगत्‌ एक ब्रह्मवन है। अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है। पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन--इन सोलह विशेषोंतक इसका विस्तार है। यह चराचर प्राणियोंसे भरा हुआ है। सूर्य और चन्द्रमा आदिके प्रकाशसे प्रकाशित है। ग्रह और नक्षत्रोंसे सुशोभित है। नदियों और पर्वतोंके समूहसे सब ओर विभूषित है। नाना प्रकारके जलसे सदा ही अलंकृत है। यही सम्पूर्ण भूतोंका जीवन और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति है। इस ब्रह्मवनमें क्षेत्रज्ञ विचरण करता है

风神曰:“此宇宙乃一梵林。其始为未显之自性(avyakta·Prakṛti),其展开至诸差别原理——五大、十根与一心——合为十六。其间充满动与不动之众生。日月光辉照耀其上,行星与星宿点缀其间;群山众川环饰四方,万类水域常为庄严。此乃一切众生之生命,亦为诸有情之行程。在此梵林之中,‘知田者’(kṣetrajña)徘徊游行。”

Verse 8

नदीपर्वतजालै श्व सर्वतः परिभूषितम्‌ । विविधाभिस्तथा चाद्धिः सततं समलंकृतम्‌,यह जगत्‌ एक ब्रह्मवन है। अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है। पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन--इन सोलह विशेषोंतक इसका विस्तार है। यह चराचर प्राणियोंसे भरा हुआ है। सूर्य और चन्द्रमा आदिके प्रकाशसे प्रकाशित है। ग्रह और नक्षत्रोंसे सुशोभित है। नदियों और पर्वतोंके समूहसे सब ओर विभूषित है। नाना प्रकारके जलसे सदा ही अलंकृत है। यही सम्पूर्ण भूतोंका जीवन और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति है। इस ब्रह्मवनमें क्षेत्रज्ञ विचरण करता है

风神伐由说道:“此整个世界,乃是一座梵之林。其始为不显之自然(未显的普拉克里蒂)。其广大由十六种差别原理展开——五大、十根与一心。其间充满动与不动之众生;为日月之光所照;以诸行星与星宿为饰;四方又以江河之网与群山之脉而增其壮丽;并恒以种种水域为其庄严。此实为一切有情之生命,亦为万类众生之归趋。在这梵之林中,知田者(kṣetrajña)游行其间。”

Verse 9

आजीवं सर्वभूतानां सर्वप्राणभूतां गति: । एतद्‌ ब्रह्मवनं नित्यं तस्समिं श्वरति क्षेत्रवित्‌,यह जगत्‌ एक ब्रह्मवन है। अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है। पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन--इन सोलह विशेषोंतक इसका विस्तार है। यह चराचर प्राणियोंसे भरा हुआ है। सूर्य और चन्द्रमा आदिके प्रकाशसे प्रकाशित है। ग्रह और नक्षत्रोंसे सुशोभित है। नदियों और पर्वतोंके समूहसे सब ओर विभूषित है। नाना प्रकारके जलसे सदा ही अलंकृत है। यही सम्पूर्ण भूतोंका जीवन और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति है। इस ब्रह्मवनमें क्षेत्रज्ञ विचरण करता है

风神伐由说道:“此乃一切众生之生计,亦是一切有命者之究竟归途。此永恒宇宙名为‘梵之林’;其中,知田者(有觉之我)往来行止。故当观世间为广大而有序之整体:由不显之源所支撑,为觉知所遍满,使执著与恐惧退去,而辨明生起。”

Verse 10

लोके5स्मिन्‌ यानि सत्त्वानि त्रसानि स्थावराणि च । तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते पश्चाद्‌ भूतकृता गुणा: । गुणेभ्य: पञचभूतानि एष भूतसमुच्छूय:,इस लोकमें जो स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे ही पहले प्रकृतिमें विलीन होते हैं, उसके बाद पाँच भूतोंके कार्य लीन होते हैं और कार्यरूप गुणोंके बाद पाँच भूत लीन होते हैं। इस प्रकार यह भूतसमुदाय प्रकृतिमें लीन होता है

风神伐由说道:“在此世间,一切众生——动者与不动者——最先归融于普拉克里蒂。继而,由五大所生之诸效用亦复消融;在那些效相(显现之诸质)之后,五大本身亦复消融。如此,诸元素之总聚,尽皆归还于普拉克里蒂。”

Verse 11

देवा मनुष्या गन्धर्वा: पिशाचासुरराक्षसा: । सर्वे स्वभावत: सृष्टा न क्रियाभ्यो न कारणात्‌,देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पिशाच, असुर, राक्षस सभी स्वभावसे रचे गये हैं; किसी क्रियासे या कारणसे इनकी रचना नहीं हुई है

伐由说道:“诸天、人类、乾闼婆、毗舍遮、阿修罗与罗刹——皆依其自性而生。其存在并非由某一特定行为所造,亦非由外在之因而起。”

Verse 12

एते विश्वसृजो विप्रा जायन्तीह पुन: पुनः । तेभ्य: प्रसूतास्तेष्वेव महाभूतेषु पडचसु । प्रलीयन्ते यथाकालमूर्मय: सागरे यथा,विश्वकी सृष्टि करनेवाले ये मरीचि आदि ब्राह्मण समुद्रकी लहरोंके समान बारंबार पञ्चमहाभूतोंसे उत्पन्न होते हैं। और उत्पन्न हुए वे फिर समयानुसार उन्हींमें लीन हो जाते हैं

伐由说道:“这些婆罗门圣仙——诸世界的创造者——在此世间一次又一次地出生。由五大而生,至其时,复归融于那五大之中,正如海中波浪起于大洋,及其时节,又复没入其中。”

Verse 13

विश्वसृग्भ्यस्तु भूते भ्यो महा भूतास्तु सर्वश: । भूतेभ्यश्चापि पञ्चभ्यो मुक्तो गच्छेत्‌ परां गतिम्‌,इस विश्वकी रचना करनेवाले प्राणियोंसे पडच महाभूत सब प्रकार पर है। जो इन पठ्च महाभूतोंसे छूट जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है

风神伐由说道:由那些造作世界的众生,种种因缘之中,五大(大种)无不生起。然而,若有人亦能超脱五大之系缚,不再为其所熏习所制约,便能证得至上之境。

Verse 14

प्रजापतिरिदं सर्व मनसैवासृजत्‌ प्रभु: । तथैव देवानूषयस्तपसा प्रतिपेदिरे,शक्तिसम्पन्न प्रजापतिने अपने मनके ही द्वारा सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि की है तथा ऋषि भी तपस्यासे ही देवत्वको प्राप्त हुए हैं

风神伐由说道:“主宰生主(Prajāpati)唯以心意便生起此一切宇宙。同样地,具足灵力的诸仙(ṛṣi)亦以苦行(tapas)而得天神之位。是故,内在的自律与专注的意志,才是创造与升举之真途。”

Verse 15

तपसश्चानुपूव्येंण फलमूलाशिनस्तथा । त्रैलोक्यं तपसा सिद्धा: पश्यन्तीह समाहिता:,फल-मूलका भोजन करनेवाले सिद्ध महात्मा यहाँ तपस्याके प्रभावसे ही चित्तको एकाग्र करके तीनों लोकोंकी बातोंको क्रमश: प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं

风神伐由说道:“同样地,凭借循序渐进的苦行修持,并以果实与根茎为食,那些由苦行而圆满的成就圣者(悉地者),在此安住,心一境性,便能依次亲证三界的一切真实。由是可知,内在净化与恒常自制,方为通达高智之道。”

Verse 16

ओऔषधान्यगदादीनि नानाविद्याशक्ष सर्वश: । तपसैव प्रसिद्धयन्ति तपोमूलं हि साधनम्‌,आरोग्यकी साधनभूत ओषधियाँ और नाना प्रकारकी विद्याएँ तपसे ही सिद्ध होती हैं। सारे साधनोंकी जड़ तपस्या ही है

风神伐由说道:“药草、解毒之剂与诸般疗法,以及一切学艺知识,唯由苦行(tapas,精进而自律)方得成就其公认之效验。因为苦行乃一切成就之根本。”

Verse 17

यददुरापं दुराम्नायं दुराधर्ष दुरन्वयम्‌ | तत्‌ सर्व तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्‌,जिसको पाना, जिसका अभ्यास करना, जिसे दबाना और जिसकी संगति लगाना नितान्त कठिन है, वह तपस्याके द्वारा साध्य हो जाता है; क्‍योंकि तपका प्रभाव दुर्लड्घ्य है

风神伐由说道:凡极难得、极难依教习而精通、极难降伏、亦极难与之相应相契者——此类一切,皆可由苦行而成就。因为苦行(tapas)的威力,本就难以逾越、难以抗衡。

Verse 18

सुरापो ब्रह्महा स्तेयी भ्रूणहा गुरुतल्पग: । तपसैव सुतप्तेन मुच्यते किल्बिषात्‌ ततः,शराबी, ब्रह्महत्यारा, चोर, गर्भ नष्ट करनेवाला और गुरुपत्नीकी शय्यापर सोनेवाला महापापी भी भलीभाँति तपस्या करके ही उस महान्‌ पापसे छुटकारा पा सकता है

风神伐由说道:“即便是嗜酒者、弑婆罗门者、盗贼、毁胎者,以及玷污师长床榻者——纵负极重罪业——若能真实而猛烈地修行苦行(tapasyā),亦唯凭苦行便可从那罪咎中解脱。”

Verse 19

मनुष्या: पितरो देवा: पशवो मृगपक्षिण: । यानि चान्यानि भूतानि त्रसानि स्थावराणि च

风神伐由说道:“人类、祖灵(Pitṛ)、诸天、牛畜、走兽与飞鸟——以及一切其他众生,无论能动者或不动者。”

Verse 20

तपः:परायणा नित्यं सिद्धयन्ते तपसा सदा । तथैव तपसा देवा महामाया दिवं गता:

风神伐由说道:“恒常归依苦行者,常以苦行而得成就。亦复如是,诸天具大天威,亦由苦行而登天界。”

Verse 21

मनुष्य, पितर, देवता, पशु, मृग, पक्षी तथा अन्य जितने चराचर प्राणी हैं, वे सब नित्य तपस्यामें संलग्न होकर ही सदा सिद्धि प्राप्त करते हैं। तपस्याके बलसे ही महामायावी देवता स्वर्गमें निवास करते हैं ।। आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिता: । अहंकारसमायुक्तास्ते सकाशे प्रजापते:,जो लोग आलस्य त्यागकर अहंकारसे युक्त हो सकाम कर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे प्रजापतिके लोकमें जाते हैं

风神伐由说道:“一切众生——人类、祖灵、诸天、牛畜、野兽、飞鸟,以及其他一切动与不动之类——唯有恒常修苦行,方得成就。凭苦行之力,连伟大而奇妙的诸神亦居于天界。然而,那些抛却懒惰,却仍以欲望驱使而行祭仪,伴以祝祷,却为我慢所缚者,将往生于生主(Prajāpati)之界。”

Verse 22

ध्यानयोगेन शुद्धेन निर्ममा निरहंकृता: । आप्नुवन्ति महात्मानो महान्तं लोकमुत्तमम्‌,जो अहंता-ममतासे रहित हैं, वे महात्मा विशुद्ध ध्यानयोगके द्वारा महान्‌ उत्तम लोकको प्राप्त करते हैं

风神伐由说道:“大士之人,以清净禅修之瑜伽自净,离于执取,灭于我慢,遂得广大而至上的境界。”

Verse 23

ध्यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतय: सदा । सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमा:,जो ध्यानयोगका आश्रय लेकर सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं, वे आत्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुष सुखकी राशिभूत अव्यक्त परमात्मामें प्रवेश करते हैं

依止禅定之瑜伽(dhyāna-yoga),恒常心境澄明安泰者——诸自我知者中最胜者——得入“不显”(avyakta)之实在;彼乃安乐之大宝藏。

Verse 24

ध्यानयोगमादुपागम्य निर्ममा निरहंकृता: । अव्यक्तं प्रविशन्‍्तीह महतां लोकमुत्तमम्‌,किंतु जो ध्यानयोगसे पीछे लौटकर अर्थात्‌ ध्यानमें असफल होकर ममता और अहंकारसे रहित जीवन व्यतीत करता है, वह निष्काम पुरुष भी महापुरुषोंके उत्तम अव्यक्त लोकमें लीन होता है

然而,有人虽曾趋入禅定瑜伽而复退转——即于禅观未能成就——却能离“我所”之执(mamatā),无“我慢”之心(ahaṃkāra),则此无求果报之人,亦得融入大人之最上“不显”世界。

Verse 25

अव्यक्तादेव सम्भूत: समसंज्ञां गत: पुन: । तमोरजो भ्यां निर्मुक्त: सत्त्वमास्थाय केवलम्‌,फिर स्वयं भी उसकी समताको प्राप्त होकर अव्यक्तसे ही प्रकट होता है और केवल सत्त्वका आश्रय लेकर तमोगुण एवं रजोगुणके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है

风神(Vāyu)曰:“实由‘不显’(avyakta)而生,复归于圆满的平衡之境。既脱黑暗(tamas)与躁动(rajas)二缚,唯依清明纯净(sattva)而住。”

Verse 26

निर्मुक्त: सर्वपापेभ्य: सर्व सृजति निष्कलम्‌ | क्षेत्रज्ञ इति तं विद्याद्‌ यस्तं वेद स वेदवित्‌

风神曰:“既离一切罪垢,而能生起万有,自身却无染无缺。应知彼为‘知田者’(kṣetrajña);真知彼者,方为真正通达吠陀之人。”

Verse 27

जो सब पापोंसे मुक्त रहकर सबकी सृष्टि करता है, उस अखण्ड आत्माको क्षेत्रज्ञ समझना चाहिये। जो मनुष्य उसका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वही वेदवेत्ता है ।। चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संयत: । यच्चित्तं तन्‍्मयो वश्यं गुह्ममेतत्‌ सनातनम्‌,मुनिको उचित है कि चिन्तनके द्वारा चेतना (सम्यग्ज्ञान) पाकर मन और इन्द्रियोंको एकाग्र करके परमात्माके ध्यानमें स्थित हो जाय; क्योंकि जिसका चित्त जिसमें लगा होता है, वह निश्चय ही उसका स्वरूप हो जाता है--यह सनातन गोपनीय रहस्य है

风神曰:那离一切罪垢而能生万有、清净无染且不分不裂之自性,当知为“知田者”(kṣetrajña)。真知彼者,方为真正的吠陀知者。又当摄心归于心之本源,牟尼应住于自制。盖心所系著之处,必与彼境同化——此乃古老而秘传之理。

Verse 28

अव्यक्तादिविशेषान्तमविद्यालक्षणं स्मृतम्‌ । निबोधत तथा हीदं गुणैर्लक्षणमित्युत,अव्यक्तसे लेकर सोलह विशेषोंतक सभी अविद्याके लक्षण बताये गये हैं। ऐसा समझना चाहिये कि यह गुणोंका ही विस्तार है

风神(Vāyu)说道:“从未显(Avyakta)直到十六种‘差别相’,此皆被忆持为无明(avidyā)的界相。亦当了知:此处所说,实由三德(guṇa)所表征——乃其性质之展开与作用。”

Verse 29

द्वयक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्रयक्षरं ब्रह्म शाश्वतम्‌ । ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम्‌,दो अक्षरका पद “मम” (यह मेरा है--ऐसा भाव) मृत्युरूप है और तीन अक्षरका पद “न मम' (यह मेरा नहीं है--ऐसा भाव) सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है

风神说道:“二音之念成死,三音之语为常住梵。‘我之所有’趋向死亡;‘非我所有’趋向不朽。”

Verse 30

कर्म केचित्‌ प्रशंसन्ति मन्दबुद्धिरता नरा: । ये तु वृद्धा महात्मानो न प्रशंसन्ति कर्म ते,कुछ मन्द-बुद्धियुक्त पुरुष (स्वर्गादि फल प्रदान करनेवाले) काम्य-कर्मोंकी प्रशंसा करते हैं, किंतु वृद्ध महात्माजन उन कर्मोंको उत्तम नहीं बतलाते

风神说道:“有些人执著于浅薄之见,称赞诸般业行——尤其是以欲望为因、许以天界等果报的祭仪之业。然而年高德厚、心量宏大的圣者,并不将此等业行称为至善。”

Verse 31

कर्मणा जायते जन्तुर्मूर्तिमान्‌ू षोडशात्मक: । पुरुषं ग्रसते5विद्या तद्‌ ग्राह्मममृताशिनाम्‌,क्योंकि सकाम कर्मके अनुष्ठानसे जीवको सोलह विकारोंसे निर्मित स्थूल शरीर धारण करके जन्म लेना पड़ता है और वह सदा अविद्याका ग्रास बना रहता है। इतना ही नहीं, कर्मठ पुरुष देवताओंके भी उपभोगका विषय होता है

风神说道:“由业(尤以欲求所驱之祭仪业)故,有情复生,受取由十六分所成之有形之身。无明恒常吞噬其人;而此人亦成可被‘攫取’之物——纵使为啖甘露之不死者所制——意谓系缚于业与无明者,受制于更高之力,终不能得真实解脱。”

Verse 32

तस्मात्‌ कर्मसु निःस्नेहा ये केचित्‌ पारदर्शिन: । विद्यामयो<यं पुरुषो न तु कर्ममय: स्मृत:,इसलिये जो कोई पारदर्शी विद्वान होते हैं, वे कर्मोमें आसक्त नहीं होते; क्योंकि यह पुरुष (आत्मा) ज्ञानमय है, कर्ममय नहीं

风神说道:“是故,洞见真实的明达之士,于诸业不生贪著。因为此人我(puruṣa)被认知为知识(vidyā)之性,并非由业所成。”

Verse 33

य एवममृतं नित्यमग्राहां शश्वदक्षरम्‌ । वश्यात्मानमसंश्लटिष्टं यो वेद न मृतो भवेत्‌,जो इस प्रकार चेतन आत्माको अमृतस्वरूप, नित्य, इन्द्रियातीत, सनातन, अक्षर, जितात्मा एवं असंग समझता है, वह कभी मृत्युके बन्धनमें नहीं पड़ता

风神(Vāyu)说道:凡如是了知有觉知之我者——知其不死、常恒、超越诸根所执、永存而不坏;又能自制其心、离诸执著——此人便不堕入死亡的系缚之中。

Verse 34

अपूर्वमकृतं नित्यं य एनमविचारिणम्‌ | य एवं विन्देदात्मानमग्राह्मममृताशनम्‌ । अग्राह्मोड्मृतो भवति स एशभि: कारणैर्ध्ुव:,जिसकी दृष्टिमें आत्मा अपूर्व (अनादि), अकृत (अजन्मा), नित्य, अचल, अग्राह्म और अमृताशी है, वह इन गुणोंका चिन्तन करनेसे स्वयं भी अग्राह्म (इन्द्रियातीत), निश्चल एवं अमृतस्वरूप हो जाता है

风神说道:凡证知此我为未曾有(无始)、非造作(不生)、常恒、不动、不可执取、以不死为资粮者——由观念这些德相——其人自身亦成超越诸根、安住不动,建立于不死之实相。

Verse 35

आयोज्य सर्वसंस्कारान्‌ संयम्यात्मानमात्मनि | स तद्‌ ब्रह्म शुभं वेत्ति यस्माद्‌ भूयो न विद्यते,जो चित्तको शुद्ध करनेवाले सम्पूर्ण संस्कारोंका सम्पादन करके मनको आत्माके ध्यानमें लगा देता है, वही उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त करता है, जिससे बड़ा कोई नहीं है

调御诸行(saṃskāra),摄持其心,使自我安住于自我之中;彼人便得知那吉祥的梵(Brahman),因为再无高于此者。

Verse 36

प्रसादे चैव सत्त्वस्य प्रसादं समवाप्नुयात्‌ लक्षणं हि प्रसादस्य यथा स्यात्‌ स्वप्नदर्शनम्‌,सम्पूर्ण अन्त:करणके स्वच्छ हो जानेपर साधकको शुद्ध प्रसन्नता प्राप्त होती है। जैसे स्वप्नसे जगे हुए मनुष्यके लिये स्वप्न शान्त हो जाता है, उसी प्रकार चित्तशुद्धिका लक्षण है

风神说道:“当内在之性(sattva)澄明安静时,便得安静本身。安静之相是:如人既醒,梦境便寂然无力、不能系心;同样,净化之征,是心之清明欢悦而不为扰动。”

Verse 37

गतिरेषा तु मुक्तानां ये ज्ञानपरिनिषछिता: । प्रवृत्तयश्न या: सर्वा: पश्यन्ति परिणामजा:,ज्ञाननिष्ठ जीवन्मुक्त महात्माओंकी यही परम गति है; क्योंकि वे उन समस्त प्रवृत्तियोंको शुभाशुभ फल देनेवाली समझते हैं

风神说道:“此乃解脱者之最高行道——即安住正知者之所行。他们观一切世间冲动与作为,皆是因缘所生、成熟为果的效应,了知其能招感吉与凶之报;故虽在生中行事,内心仍得自在。”

Verse 38

एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्म: सनातन: । एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद्‌ वृत्तमनिन्दितम्‌,यही विरक्त पुरुषोंकी गति है, यही सनातन धर्म है, यही ज्ञानियोंका प्राप्तव्य स्थान है और यही अनिन्दित सदाचार है

风神伐由说道:“这便是离欲之人的既定归途;这便是永恒之法(Dharma)。这便是智者所求的成就,这便是无可指摘的行持准则。”

Verse 39

समेन सर्वभूतेषु निःस्प्हेण निराशिषा | शक्‍्या गतिरियं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना,जो सम्पूर्ण भूतोंमें समानभाव रखता है, लोभ और कामनासे रहित है तथा जिसकी सर्वत्र समान दृष्टि रहती है, वह ज्ञानी पुरुष ही इस परम गतिको प्राप्त कर सकता है

风神伐由说道:唯有智者方能证得此至上之境——他对一切众生怀平等心,离贪欲、无私利,并以同一而坚定的眼光观照诸境。

Verse 40

एतद्‌ व: सर्वमाख्यातं मया विप्रर्षिसत्तमा: । एवमाचरत क्षिप्रं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ,ब्रह्मर्षिपो! यह सब विषय मैंने विस्तारके साथ तुम लोगोंको बता दिया। इसीके अनुसार आचरण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही परम सिद्धि प्राप्त होगी

风神伐由说道:“婆罗门仙圣之最上者啊,我已将这一切向你们详尽宣说。务必依此而行,勿复迟延;如此你们将迅速获得至高的成就(悉地)。”

Verse 41

गुरुउ्वाच इत्युक्तास्ते तु मुनयो गुरुणा ब्रह्मणा तथा । कृतवन्तो महात्मानस्ततो लोकमवाप्नुवन्‌,गुरुने कहा--बेटा! ब्रह्माजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर उन महात्मा मुनियोंने इसीके अनुसार आचरण किया। इससे उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति हुई

风神伐由说道:既蒙其师——梵天自身——如是教诲,那些大心仙人便一一依教奉行。凭此信受力行,他们得至殊胜之界。

Verse 42

त्वमप्येतनन्‍्महा भाग मयोक्तं ब्रह्मणो वच: । सम्यगाचर शुद्धात्मंस्तत: सिद्धिमवाप्स्यसि,महाभाग! तुम्हारा चित्त शुद्ध है, इसलिये तुम भी मेरे बताये हुए ब्रह्माजीके उत्तम उपदेशका भलीभाँति पालन करो। इससे तुम्हें भी सिद्धि प्राप्त होगी

风神伐由说道:“大福德者啊,你心地清净,也当如理奉行我所传达的梵天妙教。善加遵行,你亦将获得成就(悉地)。”

Verse 43

वायुदेव उवाच इत्युक्त: स तदा शिष्यो गुरुणा धर्ममुत्तमम्‌ । चकार सर्व कौन्तेय ततो मोक्षमवाप्तवान्‌,श्रीकृष्णने कहा--अर्जुन! गुरुदेवके ऐसा कहनेपर उस शिष्यने समस्त उत्तम धर्मोंका पालन किया। इससे वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो गया

风神(Vāyudeva)说道:“那弟子既蒙师长如是教诲,便圆满奉行至上之法(dharma)。因此,噢,昆蒂之子啊,他得证解脱(moksha)——摆脱世间生死系缚。”

Verse 44

कृतकृत्यश्न स तदा शिष्य: कुरुकुलोदवह । तत्‌ पद समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति,कुरुकुलनन्दन! उस समय कृतार्थ होकर उस शिष्यने वह ब्रह्मपद प्राप्त किया, जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता

风神说道:“其后,那弟子功行圆满,所当作者皆已毕,遂证至上境界(梵、Brahman)。噢,库鲁族中最卓越者啊,抵达彼处之后,便不复忧悲。”

Verse 45

अर्जुन उवाच को न्वसौ ब्राह्मण: कृष्ण कश्च शिष्यो जनार्दन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद्‌ वै तत्त्वमाचक्ष्व मे विभो,अर्जुनने पूछा--जनार्दन श्रीकृष्ण! वे ब्रह्मनिष्ठ गुरु कौन थे और शिष्य कौन थे? प्रभो! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो ठीक-ठीक बतानेकी कृपा कीजिये

阿周那说道:“噢,克里希纳,噢,阎那尔达那!那位婆罗门究竟是谁?弟子又是谁?主宰啊,若此真相适合我聆听,请为我详明开示。”

Verse 46

वायुदेव उवाच अहं गुरुर्महाबाहो मन: शिष्यं च विद्धि मे । त्वत्प्रीत्या गुह्ममेतच्च कथितं ते धनंजय,श्रीकृष्णने कहा--महाबाहो! मैं ही गुरु हूँ और मेरे मनको ही शिष्य समझो। धनंजय! तुम्हारे स्नेहवश मैंने इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है

风神说道:“噢,臂力无双者,当知我即是师,而我自身之心即是弟子。噢,檀那阇耶(Dhanañjaya),因爱念于你,我才向你宣说此一秘奥之教。”

Verse 47

मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्नित्यं कुरुकुलोद्वह । अध्यात्ममेतच्छुत्वा त्वं सम्यगाचर सुव्रत,उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुकुलनन्दन! यदि मुझपर तुम्हारा प्रेम हो तो इस अध्यात्मज्ञानको सुनकर तुम नित्य इसका यथावत्‌ पालन करो

风神说道:“噢,库鲁族之最杰出者,若你对我常怀真挚的爱敬,那么——既已听闻此内我之教(adhyātma)——当以守持至上誓戒者之坚定律仪,日日如法而行,恒常修习。”

Verse 48

ततस्त्वं सम्यगाचीर्णे धर्मेडस्मिन्नरिकर्षण । सर्वपापविनिर्मुक्तो मोक्ष प्राप्स्पसि केवलम्‌,शत्रुदमन! इस धर्मका पूर्णतया आचरण करनेपर तुम समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध मोक्षको प्राप्त कर लोगे

于是,噢,降伏仇敌者!当你正当而圆满地修行此法(dharma)之时,你将脱离一切罪垢,独自证得清净的解脱(mokṣa)。这正是风神伐由(Vāyu)的宣告:以真诚与完备守持所规定的正道,终将成就德行的净化与究竟的解脱。

Verse 49

पूर्वमप्येतदेवोक्त युद्धकाल उपस्थिते । मया तव महाबाहो तस्मादत्र मन: कुरु,महाबाहो! पहले भी मैंने युद्धकाल उपस्थित होनेपर यही उपदेश तुमको सुनाया था। इसलिये तुम इसमें मन लगाओ

噢,臂力无双者!当战时来临之际,我先前已对你说过同样的劝诫。故而如今当专注此教诲——铭之于心,并以坚定不移之志付诸实行。

Verse 50

मया तु भरतश्रेष्ठ चिरदृष्ट: पिता प्रभु: । तमहं द्रष्टमेच्छामि सम्मते तव फाल्गुन,भरतश्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं पिताजीका दर्शन करना चाहता हूँ। उन्हें देखे बहुत दिन हो गये। यदि तुम्हारी राय हो तो मैं उनके दर्शनके लिये द्वारका जाऊँ

伐由说道:“噢,婆罗多族中最卓越者!我久未得见我那可敬的父亲、我之主宰。我愿前去瞻仰他。若蒙你允可,噢,法尔古那(阿周那),我将往德瓦拉卡(Dvārakā)去,求得与父亲相见之达尔沙那(darśana)。”

Verse 51

वैशम्पायन उवाच इत्युक्तवचन कृष्णं प्रत्युवाच धनंजय: । गच्छावो नगरं कृष्ण गजसाह्दयमद्य वै,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! भगवान्‌ श्रीकृष्णकी बात सुनकर अर्जुनने कहा --'श्रीकृष्ण! अब हमलोग यहाँसे हस्तिनापुरको चलें। वहाँ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरसे मिलकर और उनकी आज्ञा लेकर आप अपनी पुरीको पधारें" इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे एकपज्चाशत्तमो5ध्याय:

毗湿摩波耶那说道:听罢奎师那之言,檀那ंज耶(阿周那)答道:“奎师那啊,今日便让我们前往名为伽阇萨诃伐耶(Gajasāhvaya,即哈斯提那补罗 Hastināpura)的城。到那里,先拜见奉持正法的尤提士提罗王,得其许可之后,你再启程回到你自己的城邦。”

Verse 52

समेत्य तत्र राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम्‌ । समनुज्ञाप्य राजान स्वां पुरी यातुमहसि,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! भगवान्‌ श्रीकृष्णकी बात सुनकर अर्जुनने कहा --'श्रीकृष्ण! अब हमलोग यहाँसे हस्तिनापुरको चलें। वहाँ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरसे मिलकर और उनकी आज्ञा लेकर आप अपनी पुरीको पधारें"

毗湿摩波耶那说道:“噢,大王!到了那里,觐见具正法之心的尤提士提罗王,并求得他的许可,然后你便应启程前往自己的城邦。”

Frequently Asked Questions

The chapter balances personal devotion and gratitude toward Kṛṣṇa with institutional dharma: departures, honors, and resources are regulated through the king’s consent and court protocol, not private impulse.

Arjuna frames Kṛṣṇa as both transcendent ground and practical guide—suggesting that effective action and moral restoration require aligning human agency with a larger cosmological order and disciplined counsel.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s function is narrative and doctrinal—integrating post-war legitimacy, devotional theology, and courtly procedure within the broader Āśvamedhika arc.