Adhyaya 95
Udyoga ParvaAdhyaya 9563 Verses

Adhyaya 95

कण्वोपदेशः—नश्वरबलविवेकः तथा मातलिगुणकेश्याः आख्यानारम्भः (Kaṇva’s Counsel on Impermanent Power; Opening of the Mātali–Guṇakeśī Narrative)

Upa-parva: Kāṇva-vākya (Counsel of Ṛṣi Kaṇva) — Court Discourse to Duryodhana

Vaiśaṃpāyana reports that Ṛṣi Kaṇva, after hearing Jāmadagnya’s statement, addresses Duryodhana in the Kuru court. Kaṇva first establishes a metaphysical scale: the imperishable principle is identified with Viṣṇu as the eternal among the Ādityas, and with the revered Nara-Nārāyaṇa ṛṣis; by contrast, cosmic entities (sun, moon, elements, planets, stars) are described as subject to cyclical dissolution and recreation. Human and animal lives are depicted as even more momentary. Kings, despite enjoying prosperity, meet death at life’s end and face the results of merit and demerit. From this premise Kaṇva advances applied counsel: Duryodhana should not presume invincibility, should pursue śama (conciliation) with Dharmaputra, and allow Pāṇḍavas and Kurus to protect the earth jointly. He warns that “strength” is relative—stronger agents exist, and the Pāṇḍavas are portrayed as formidable. To reinforce the counsel, Kaṇva introduces an ancient illustrative narrative: Mātali, Indra’s charioteer, seeks a suitable groom for his exceptionally renowned daughter Guṇakeśī; he reflects on the complexities of lineage and alliance, surveys gods, humans, gandharvas, and ṛṣis without satisfaction, and resolves to go to the Nāga realm, descending into the earth after ritually circling and blessing his family.

Chapter Arc: कुरुसंसद में राजाओं की सभा—धर्म और करुणा के सूक्ष्म भेदों का उपदेश सुनकर सब भूपाल मन-ही-मन उत्तर खोजते हैं, पर वाणी जैसे रुक जाती है। → सभा के मौन में जामदग्न्य परशुराम वचन उठाते हैं और एक दृष्टान्त सुनाते हैं—दम्भोद्धव नामक राजा तपस्वियों/महात्माओं को युद्ध के लिए ललकारता है; ब्राह्मण-तपस्वी बार-बार क्षमा माँगते हैं, फिर भी राजा का दर्प और आग्रह बढ़ता जाता है। → नर-स्वरूप महात्मा (भगवान् नर) मायिक सींक/तृण-बाणों से लक्ष्यवेध कर दम्भोद्धव की सेना की इन्द्रियों (आँख-कान-नासिका) को पीड़ित कर देता है; आकाश श्वेत-सा भर जाता है और राजा भयभीत होकर चरणों में गिर पड़ता है। → नर राजा को शरण देते हैं और धर्मोपदेश करते हैं—‘ब्रह्मण्य’ बनो, धर्मात्मा बनो, फिर ऐसा मत करना; दर्प-जनित युद्धेच्छा का परित्याग कर ब्राह्मण-हित और शरणागत-रक्षा का व्रत ग्रहण कराया जाता है। → परशुराम अस्त्रों के वास्तविक ‘वधक’ स्वरूप का संकेत करते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मान, मात्सर्य, अहंकार जैसे अंतःशत्रु ही मनुष्यों को मृत्यु की ओर ढकेलते हैं—अब सभा को अपने ही भीतर उत्तर ढूँढना है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-माज बछ। डे ३. दुसरोंको सुख पहुँचानेकी सहज भावनाका नाम “कृपा” है। २. दूसरोंका दुःख देखकर द्रवित होना एवं काँप उठना “अनुकम्पा” कहलाता है। 3. दूसरोंके दुःखको दूर करनेका भाव “करुणा” है। ४. क्रूरताका सर्वथा अभाव 'अनृशंसता” कहलाता है। षण्णवतितमोब< ध्याय: परशुरामजीका दम्भोद्धवकी कथाद्वारा नर-नारायणस्वरूप अर्जुन और श्रीकृष्णका महत्त्व वर्णन करना वैशम्पायन उवाच तस्मिन्नभिहिते वाक्ये केशवेन महात्मना । स्तिमिता हृष्टरोमाण आसन्‌ सर्वे सभासद:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महात्मा श्रीकृष्णके ऐसी बात कहनेपर सम्पूर्ण सभासद्‌ चकित हो गये। उनके अंगोंमें रोमांच हो आया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାତ୍ମା କେଶବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ସେହି କଥା କହିଦେବା ସହିତ ସମସ୍ତ ସଭାସଦ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟରେ ନିର୍ବାକ ହୋଇଗଲେ; ତାଙ୍କ ଦେହରେ ରୋମାଞ୍ଚ ଜାଗିଉଠିଲା।

Verse 2

वक्रिदुत्तरमेतेषां वक्तुं नोत्सहते पुमान्‌ इति सर्वे मनोभिस्ते चिन्तयन्ति सम पार्थिवा:,वे सब भूपाल मन-ही-मन यह सोचने लगे कि भगवान्‌के इन वचनोंका उत्तर कोई भी मनुष्य नहीं दे सकता है

ସମସ୍ତ ରାଜା ମନେମନେ ଚିନ୍ତା କଲେ—“ଭଗବାନଙ୍କ ଏହି ବଚନର ଯଥାଯଥ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ କୌଣସି ମନୁଷ୍ୟର ସାହସ ନାହିଁ।”

Verse 3

तथा तेषु च सर्वेषु तूष्णीम्भूतेषु राजसु । जामदग्न्य इदं वाक्यमब्रवीत्‌ कुरुसंसदि,इस प्रकार उन सब राजाओंके मौन ही रह जानेपर जमदग्निनन्दन परशुरामने कौरवसभामें इस प्रकार कहा--

ଏପରି ସମସ୍ତ ରାଜା ନିରବ ହୋଇଥିବାବେଳେ, କୁରୁସଭାରେ ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ (ପରଶୁରାମ) ଏହି କଥା କହିଲେ।

Verse 4

इमां मे सोपमां वाचं शृणु सत्यामशड्कित: । तां श्र॒ुत्वा श्रेय आदत्स्व यदि साध्विति मनन्‍्यसे,“राजन! तुम निःशंक होकर मेरी यह उदाहरणयुक्त बात सुनो। सुनकर यदि इसे कल्याणकारी और उत्तम समझो तो स्वीकार करो

“ହେ ରାଜନ! ନିଶ୍ଚିନ୍ତ ହୋଇ ଉପମାସହିତ ମୋର ଏହି ସତ୍ୟ ବାଣୀ ଶୁଣ। ଶୁଣି ଯଦି ତୁମେ ଏହାକୁ ଶ୍ରେୟସ୍କର ଓ ଉତ୍ତମ ବୋଲି ଭାବ, ତେବେ ଗ୍ରହଣ କର।”

Verse 5

2 परम्कतर राजा दम्भोद्धवो नाम सार्वभौम: पुराभवत्‌ | अखिलां बुभुजे सर्वा पृथिवीमिति न: श्रुतम्‌,'पूर्वकालकी बात है, दम्भोद्धव नामसे प्रसिद्ध एक सार्वभौम सम्राट्‌ इस सम्पूर्ण अखण्ड भूमण्डलका राज्य भोगते थे; यह हमारे सुननेमें आया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପୂର୍ବକାଳରେ ଦମ୍ଭୋଦ୍ଧବ ନାମକ ଏକ ପରମ ପ୍ରତାପୀ ସାର୍ବଭୌମ ରାଜା ଥିଲେ। ସେ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ପୂର୍ଣ୍ଣରୂପେ ଭୋଗ କରି ଶାସନ କରୁଥିଲେ ବୋଲି ଆମେ ଶୁଣିଛୁ।

Verse 6

स सम नित्यं निशापाये प्रातरुत्थाय वीर्यवान्‌ | ब्राह्मणान्‌ क्षत्रियांश्वैव पृच्छन्नास्ते महारथ:,“वे महारथी और पराक्रमी नरेश प्रतिदिन रात बीतनेपर प्रातःकाल उठकर ब्राह्मणों और क्षत्रियोंसे इस प्रकार पूछा करते थे--

ସେ ବୀର୍ୟବାନ୍ ମହାରଥୀ ରାଜା ପ୍ରତିଦିନ ରାତି ଶେଷ ହେଲେ ପ୍ରଭାତେ ଉଠି ବସି, ବ୍ରାହ୍ମଣ ଓ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ପଚାରୁଥିଲେ—

Verse 7

अस्ति कश्रिद्‌ विशिष्टो वा मद्विधो वा भवेद्‌ युधि । शूद्रो वैश्य: क्षत्रियो वा ब्राह्मणो वापि शस्त्रभृत्‌,“क्या इस जगत्‌में कोई ऐसा शस्त्रधारी शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण है, जो युद्धमें मुझसे बढ़कर अथवा मेरे समान भी हो सके?

“ଏହି ଜଗତରେ ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀ—ଶୂଦ୍ର, ବୈଶ୍ୟ, କ୍ଷତ୍ରିୟ କିମ୍ବା ବ୍ରାହ୍ମଣ—ଏମିତି କେହି ଅଛି କି, ଯେ ଯୁଦ୍ଧରେ ମୋଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, କିମ୍ବା ମୋ ସମାନ ହୋଇପାରିବ?”

Verse 8

इति ब्रुवन्नन्वचचरत्‌ स राजा पृथिवीमिमाम्‌ | दर्पेण महता मत्त: कंचिदन्‍्यमचिन्तयन्‌,“इसी प्रकार पूछते हुए वे राजा दम्भोद्धव महान्‌ गर्वसे उन्मत्त हो दूसरे किसीको कुछ भी न समझते हुए इस पृथ्वीपर विचरने लगे

ଏପରି କହି କହି ଏବଂ ସେହିପରି ପଚାରି ପଚାରି ସେ ରାଜା ଏହି ପୃଥିବୀରେ ବିଚରଣ କରୁଥିଲେ। ମହା ଦର୍ପରେ ମତ୍ତ ହୋଇ ସେ ଅନ୍ୟ କାହାକୁ ମନେ ମଧ୍ୟ କରୁନଥିଲେ।

Verse 9

तं च वैद्या अकृपणा ब्राह्मणा: सर्वतो5भया: । प्रत्यषेधन्त राजानं श्लाघमानं पुन: पुन:

ଏବଂ ସେହି ପଣ୍ଡିତ, ନିଷ୍କାମ, ସର୍ବତୋଭୟହୀନ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ପୁନଃପୁନଃ ଆତ୍ମଶ୍ଲାଘା କରୁଥିବା ରାଜାଙ୍କୁ ବାରମ୍ବାର ନିବାରଣ କଲେ।

Verse 10

“उस समय सर्वथा निर्भय, उदार एवं विद्वान ब्राह्मणोंने बारंबार आत्मप्रशंसा करनेवाले उन नरेशको मना किया ।। निषिध्यमानो5प्यसकृत्‌ पृच्छत्येव स वै द्विजान्‌ । अतिमान श्रिया मत्तं तमूचुरब्राह्मिणास्तदा,“उनके मना करनेपर भी वे ब्राह्मणोंसे बार-बार प्रश्न करते ही रहे। उनका अहंकार बहुत बढ़ गया था। वे धन-वैभवके मदसे मतवाले हो गये थे। राजाको यही (बारंबार) प्रश्न दुहराते देख वेदके सिद्धान्तका साक्षात्कार करनेवाले महामना तपस्वी ब्राह्मण क्रोधसे तमतमा उठे और उनसे इस प्रकार बोले--

ବାରମ୍ବାର ନିଷେଧ କରାଯାଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ରାଜା ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ପ୍ରଶ୍ନ କରୁଥିଲା। ଅତ୍ୟଧିକ ଅହଂକାରରେ ଫୁଲିଉଠି, ଐଶ୍ୱର୍ୟର ମଦରେ ମତ୍ତ ହୋଇ ସେ ଥମ୍ବିଲା ନାହିଁ। ସେଇ ପ୍ରଶ୍ନକୁ ଆବୃତ୍ତି କରୁଥିବାକୁ ଦେଖି ବେଦତତ୍ତ୍ୱଦର୍ଶୀ ମହାତ୍ମା ତପସ୍ୱୀ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳିଉଠି ଏଭଳି କହିଲେ—

Verse 11

तपस्विनो महात्मानो वेदप्रत्ययदर्शिन: । उदीर्यमाणं राजानं क्रोधदीप्ता द्विजातय:,“उनके मना करनेपर भी वे ब्राह्मणोंसे बार-बार प्रश्न करते ही रहे। उनका अहंकार बहुत बढ़ गया था। वे धन-वैभवके मदसे मतवाले हो गये थे। राजाको यही (बारंबार) प्रश्न दुहराते देख वेदके सिद्धान्तका साक्षात्कार करनेवाले महामना तपस्वी ब्राह्मण क्रोधसे तमतमा उठे और उनसे इस प्रकार बोले--

ତପସ୍ୱୀ, ମହାତ୍ମା ଏବଂ ବେଦପ୍ରମାଣର ସାକ୍ଷାତ୍ ଦର୍ଶୀ ସେଇ ଦ୍ୱିଜମାନେ ରାଜା ଏଭଳି ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ହୋଇ ପୁନଃପୁନଃ ଆଗ୍ରହ କରୁଥିବାକୁ ଦେଖି କ୍ରୋଧରେ ଦୀପ୍ତ ହେଲେ।

Verse 12

अनेकजयिनौ संख्ये यौ वै पुरुषसत्तमौ | तयोस्त्वं न समो राजन्‌ भवितासि कदाचन,“राजन! दो ऐसे पुरुषरत्न हैं, जिन्होंने युद्धमें अनेक योद्धाओंपर विजय पायी है। तुम कभी उनके समान न हो सकोगे”

ହେ ରାଜନ୍! ସଂଗ୍ରାମରେ ଅନେକ ବିଜୟ ଲାଭ କରିଥିବା ସେଇ ଦୁଇ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅଛନ୍ତି; ତୁମେ କେବେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ସମାନ ହେବ ନାହିଁ।

Verse 13

एवमुक्त: स राजा तु पुन: पप्रच्छ तान्‌ द्विजान्‌ | क्व तौ वीरौ क्वजन्मानौ किंकर्माणीौ च कौ च तौ,“उनके ऐसा कहनेपर राजाने पुनः उन ब्राह्मणोंसे पूछा--*वे दोनों वीर कहाँ हैं? उनका जन्म किस स्थानमें हुआ है? उनके कर्म कौन-कौन-से हैं और उनके नाम क्‍या हैं?

ଏଭଳି କୁହାଯାଇଲା ପରେ ସେ ରାଜା ପୁନଃ ସେଇ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ ପଚାରିଲା—“ସେଇ ଦୁଇ ବୀର କେଉଁଠି ଅଛନ୍ତି? ତାଙ୍କର ଜନ୍ମ କେଉଁଠି? ତାଙ୍କର କର୍ମ କ’ଣ, ଏବଂ ସେମାନେ କିଏ—ନାମ କ’ଣ?”

Verse 14

ब्राह्मणा ऊचु. नरो नारायणश्चैव तापसाविति न: श्रुतम्‌ । आयातीौ मानुषे लोके ताभ्यां युध्यस्व पार्थिव,ब्राह्मण बोले--भूपाल! हमने सुना है कि वे नर-नारायण नामवाले तपस्वी हैं और इस समय मनुष्यलोकमें आये हैं। तुम उन्हीं दोनोंके साथ युद्ध करो

ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ କହିଲେ—“ହେ ପାର୍ଥିବ! ଆମେ ଶୁଣିଛୁ ଯେ ସେମାନେ ନର ଓ ନାରାୟଣ ନାମକ ତପସ୍ୱୀ। ସେମାନେ ଏବେ ମାନବଲୋକକୁ ଆସିଛନ୍ତି; ତେଣୁ, ହେ ଭୂପାଳ, ସେଇ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ସହିତ ଯୁଦ୍ଧ କର।”

Verse 15

श्रूयेते ती महात्मानी नरनारायणावुभौ । तपो घोरमनिर्देश्यं तप्येते गन्धमादने,सुना है, वे दोनों महात्मा नर और नारायण गन्धमादन पर्वतपर ऐसी घोर तपस्या कर रहे हैं, जिसका वाणीद्वारा वर्णन नहीं हो सकता

ଶୁଣାଯାଏ—ସେଇ ଦୁଇ ମହାତ୍ମା ନର ଓ ନାରାୟଣ ଗନ୍ଧମାଦନ ପର୍ବତରେ ଏମିତି ଘୋର ଓ ଅବର୍ଣ୍ଣନୀୟ ତପସ୍ୟା କରୁଛନ୍ତି, ଯାହାକୁ ବାଣୀରେ କହିବା ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ।

Verse 16

स राजा महतीं सेनां योजयित्वा षडल्धिनीम्‌ । अमृष्यमाण: सम्प्रायाद्‌ यत्र तावपराजितौ,राजाको यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने (रथ, हाथी, घोड़े, पैदल, शकट और ऊँट--इन) छः अंगोंसे युक्त विशाल सेनाको सुसज्जित करके उस स्थानकी यात्रा की, जहाँ कभी पराजित न होनेवाले वे दोनों महात्मा विद्यमान थे

ଅପମାନ ସହିନ ପାରି ରାଜା ରଥ, ହାତୀ, ଘୋଡ଼ା, ପଦାତି, ଶକଟ ଓ ଉଠ—ଏହି ଛଅ ଅଙ୍ଗରେ ଯୁକ୍ତ ବିଶାଳ ସେନାକୁ ସଜାଇ, ଯେଉଁଠାରେ ସେଇ ଅଜେୟ ଦୁଇ ମହାତ୍ମା ଥିଲେ ସେଠାକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।

Verse 17

स गत्वा विषमं घोर पर्वतं गन्धमादनम्‌ | मार्गमाणो<न्वगच्छत्‌ तौ तापसौ वनमाश्रितौ,राजा उनकी खोज करते हुए दुर्गम एवं भयंकर गन्धमादन पर्वतपर गये और वनमें स्थित उन तपस्वी महात्माओंके पास जा पहुँचे

ସେମାନଙ୍କୁ ଖୋଜୁଥିବା ରାଜା ଦୁର୍ଗମ ଓ ଭୟଙ୍କର ଗନ୍ଧମାଦନ ପର୍ବତକୁ ଗଲେ ଏବଂ ଅରଣ୍ୟରେ ଆଶ୍ରୟ ନେଇଥିବା ସେଇ ଦୁଇ ତାପସଙ୍କ ପାଖକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 18

तौ दृष्टवा क्षुत्पिपासाभ्यां कृशी धमनिसंततौ । शीतवातातपैश्चैव कर्शितौ पुरुषोत्तमौ,वे दोनों पुरुषरत्न भूख-प्याससे दुर्बल हो गये थे। उनके सारे अंगोंमें फैली हुई नस- नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं। वे सर्दी-गरमी और हवाका कष्ट सहते-सहते अत्यन्त कृशकाय हो रहे थे

ସେଇ ଦୁଇ ପୁରୁଷୋତ୍ତମଙ୍କୁ ଦେଖି (ରାଜା ଦେଖିଲେ)—ଭୁଖ ଓ ପିଆସରେ ସେମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କୃଶ ହୋଇଯାଇଥିଲେ; ଶରୀରରେ ଧମନୀ-ନାଡ଼ୀ ସ୍ପଷ୍ଟ ଦିଶୁଥିଲା, ଏବଂ ଶୀତ, ପବନ ଓ ତପତ ଧୂପ ସହି ସହି ସେମାନେ ଆଉ ଅଧିକ କ୍ଷୀଣ ହୋଇଥିଲେ।

Verse 19

अभिगम्योपसंगृहा[ पर्यपृच्छटदनामयम्‌ । तमर्चित्वा मूलफलैरासनेनोदकेन च,निकट जाकर उनके चरणोंमें नमस्कार करके दम्भोद्धवने उन दोनोंका कुशल-समाचार पूछा। तब नर और नारायणने राजाका स्वागत-सत्कार करके आसन, जल और फल-मूल देकर उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया। तदनन्तर पूछा कि हम आपकी कया सेवा करें? यह सुनकर उन्होंने अपना सारा वृत्तान्त पुनः अक्षरश: सुना दिया

ନିକଟକୁ ଯାଇ ସେମାନଙ୍କ ପାଦରେ ପ୍ରଣାମ କରି ସେ କୁଶଳ-ସମ୍ବାଦ ପଚାରିଲେ। ତାପରେ ନର-ନାରାୟଣ ମୂଳ-ଫଳ, ଆସନ ଓ ଜଳ ଦେଇ ରାଜାଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ଆତିଥ୍ୟ କରି ଭୋଜନ ପାଇଁ ଆମନ୍ତ୍ରଣ କଲେ। ପଛରେ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ କହିଲେ—“ରାଜୋତ୍ତମ, ଆପଣଙ୍କ କ’ଣ କାର୍ଯ୍ୟ?” ଏହା ଶୁଣି ରାଜେନ୍ଦ୍ର ନିଜ ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ପୁଣିଥରେ ଯଥାତଥ୍ୟ କହିଶୁଣାଇଲେ।

Verse 20

न्यमन्त्रयेतां राजानं कि कार्य क्रियतामिति । ततस्तामानुपूर्वी स पुनरेवान्वकीर्तयत्‌,निकट जाकर उनके चरणोंमें नमस्कार करके दम्भोद्धवने उन दोनोंका कुशल-समाचार पूछा। तब नर और नारायणने राजाका स्वागत-सत्कार करके आसन, जल और फल-मूल देकर उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया। तदनन्तर पूछा कि हम आपकी कया सेवा करें? यह सुनकर उन्होंने अपना सारा वृत्तान्त पुनः अक्षरश: सुना दिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ନର ଓ ନାରାୟଣ ରାଜାଙ୍କୁ ଆହ୍ୱାନ କରି କହିଲେ—“ଆପଣଙ୍କ କେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବା? କେଉଁ ସେବା କରିବା?” ତେବେ ସେ ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ତାଙ୍କ ପାଦରେ ପ୍ରଣାମ କରି କୁଶଳ-ସମ୍ବାଦ ପଚାରିଲେ। ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ରାଜାଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାର କରି ଆସନ, ଜଳ ଓ ଫଳ-ମୂଳ ଦେଇ ଭୋଜନ ପାଇଁ ନିମନ୍ତ୍ରଣ କଲେ। ପରେ ପଚାରିଲେ—“ଆମେ ଆପଣଙ୍କ କେଉଁ ସେବା କରିବୁ?” ଏହା ଶୁଣି ସେ ନିଜ ଦୂତକାର୍ଯ୍ୟର ସମଗ୍ର ବୃତ୍ତାନ୍ତକୁ ଯଥାକ୍ରମେ, ଯଥାବତ୍, ପୁନର୍ବାର ଅକ୍ଷରଶଃ କହିଦେଲେ।

Verse 21

2242 क्र ० 4 कलर १ ७ रे 2 2 १7 बाहुभ्यां मे जिता भूमिर्निहता: सर्वशत्रव: । भवद्धयां युद्धमाकाड्क्षन्नुपपयातो5स्मि पर्वतम्‌

ମୋର ବାହୁବଳରେ ପୃଥିବୀ ଜିତାଯାଇଛି ଏବଂ ମୋର ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁ ନିହତ ହୋଇଛନ୍ତି। ତଥାପି ଆପଣମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବା ଆକାଙ୍କ୍ଷାରେ ମୁଁ ଏହି ପର୍ବତକୁ ଆସିଛି।

Verse 22

नरनारायणावूचतु: अपेतक्रोधलोभो5यमाश्रमो राजसत्तम,नर-नारायण बोले--नृपश्रेष्ठ] हमारा यह आश्रम क्रोध और लोभसे रहित है। इस आश्रममें कभी युद्ध नहीं होता, फिर अस्त्र-शस्त्र और कुटिल मनोवृत्तिका मनुष्य यहाँ कैसे रह सकता है? इस पृथ्वीपर बहुत-से क्षत्रिय हैं, अतः आप कहीं और जाकर युद्धकी अभिलाषा पूर्ण कीजिये

ନର-ନାରାୟଣ କହିଲେ—ହେ ରାଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି ଆଶ୍ରମ କ୍ରୋଧ ଓ ଲୋଭରୁ ମୁକ୍ତ। ଏଠାରେ କେବେ ଯୁଦ୍ଧ ହୁଏ ନାହିଁ। ତେବେ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଧାରଣ କରି, ଯୁଦ୍ଧାଭିଲାଷାରେ କୁଟିଳ ମନୋଭାବ ଧରିଥିବା ମଣିଷ ଏଠାରେ କିପରି ରହିପାରିବ? ପୃଥିବୀରେ ଅନେକ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଅଛନ୍ତି; ତେଣୁ ଅନ୍ୟତ୍ର ଯାଇ ନିଜ ଯୁଦ୍ଧେଚ୍ଛା ପୂରଣ କର।

Verse 23

नहास्मिन्नाश्रमे युद्ध कुत: शस्त्र कुतो5नृजुः । अन्यत्र युद्धमाकाड्क्ष बहव: क्षत्रिया: क्षितौ,नर-नारायण बोले--नृपश्रेष्ठ] हमारा यह आश्रम क्रोध और लोभसे रहित है। इस आश्रममें कभी युद्ध नहीं होता, फिर अस्त्र-शस्त्र और कुटिल मनोवृत्तिका मनुष्य यहाँ कैसे रह सकता है? इस पृथ्वीपर बहुत-से क्षत्रिय हैं, अतः आप कहीं और जाकर युद्धकी अभिलाषा पूर्ण कीजिये

ଏହି ଆଶ୍ରମରେ ଯୁଦ୍ଧ ନାହିଁ—ତେବେ ଏଠାରେ ଶସ୍ତ୍ର କେଉଁଠୁ? କୁଟିଳତା କେଉଁଠୁ? ଯଦି ଯୁଦ୍ଧ ଆକାଙ୍କ୍ଷା, ତେବେ ଅନ୍ୟତ୍ର ଯାଅ; ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଅନେକ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଅଛନ୍ତି, ସେମାନେ ତୋର ଯୁଦ୍ଧେଚ୍ଛା ପୂରଣ କରିପାରିବେ।

Verse 24

राम उवाच उच्यमानस्तथापि सम भूय एवाभ्यभाषत | पुन: पुन: क्षम्यमाण: सान्त्व्यमानश्व॒ भारत

ରାମ କହିଲେ—ଏପରି କୁହାଯାଉଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ପୁନର୍ବାର ସେହି ଭାବରେ କଥା କହିଲା। ହେ ଭାରତ! ପୁନଃପୁନଃ କ୍ଷମା କରାଯାଇ ଓ ପୁନଃପୁନଃ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦିଆଯାଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ଥମ୍କିଲା ନାହିଁ।

Verse 25

ततो नरस्त्विषीकाणां मुष्टिमादाय भारत,(संनहास्व च वर्माणि यानि चान्यानि सन्ति ते ।) अहं हि ते विनेष्यामि युद्धश्रद्धामित: परम्‌ । (यदाद्वयसि दर्पेण ब्राह्मणप्रमुखाउ्जनान्‌ ।। ) भरतनन्दन! तब महात्मा नरने हाथमें एक मुट्ठी सींक लेकर कहा--'युद्ध चाहनेवाले क्षत्रिय! आ, युद्ध कर। अपने सारे अस्त्र-शस्त्र ले ले। सारी सेनाको तैयार कर ले, कवच बाँध ले, तेरे पास और भी जितने साधन हों, उन सबसे सम्पन्न हो जा। तू बड़े घमंडमें आकर ब्राह्मण आदि सभी वर्णके लोगोंको ललकारता फिरता है; इसलिये मैं आजसे तेरे युद्धविषयक निश्चयको दूर किये देता हूँ

ତେବେ ରାମ ହାତରେ ଏକ ମୁଠି କାଠି/ନଳ ଧରି ଭାରତବଂଶଜଙ୍କୁ କହିଲେ— “ସଜ୍ଜ ହେଅ; ତୋ ପାଖରେ ଯେଉଁ କବଚ ଅଛି ସେଗୁଡ଼ିକ ପିନ୍ଧ, ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ସାଧନ ମଧ୍ୟ ସଂଗ୍ରହ କର। ସମସ୍ତ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଧର, ସେନାକୁ ଗଠନ କର। କାରଣ ଆଜିଠାରୁ ମୁଁ ତୋର ଯୁଦ୍ଧ-ଶ୍ରଦ୍ଧାକୁ ନାଶ କରିଦେବି। ଗର୍ବରେ ଫୁଲି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଆଗରେ ରଖି ସମସ୍ତଙ୍କୁ ତୁ ଚ୍ୟାଲେଞ୍ଜ କରୁଛୁ; ତେଣୁ ଆଜିଠାରୁ ତୋର ଯୁଦ୍ଧସଙ୍କଳ୍ପକୁ ମୁଁ ହରିନେଉଛି।”

Verse 26

अब्रवीदेहि युद्धयस्व युद्धकामुक क्षत्रिय | सर्वशस्त्राणि चादत्स्व योजयस्व च वाहिनीम्‌,(संनहास्व च वर्माणि यानि चान्यानि सन्ति ते ।) अहं हि ते विनेष्यामि युद्धश्रद्धामित: परम्‌ । (यदाद्वयसि दर्पेण ब्राह्मणप्रमुखाउ्जनान्‌ ।। ) भरतनन्दन! तब महात्मा नरने हाथमें एक मुट्ठी सींक लेकर कहा--'युद्ध चाहनेवाले क्षत्रिय! आ, युद्ध कर। अपने सारे अस्त्र-शस्त्र ले ले। सारी सेनाको तैयार कर ले, कवच बाँध ले, तेरे पास और भी जितने साधन हों, उन सबसे सम्पन्न हो जा। तू बड़े घमंडमें आकर ब्राह्मण आदि सभी वर्णके लोगोंको ललकारता फिरता है; इसलिये मैं आजसे तेरे युद्धविषयक निश्चयको दूर किये देता हूँ

ରାମ କହିଲେ— “ଆସ, ଯୁଦ୍ଧ କର, ହେ ଯୁଦ୍ଧକାମନାରେ ମତ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟ! ସମସ୍ତ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଧର; ସେନାକୁ ଗଠନ କର; କବଚ ପିନ୍ଧ, ତୋ ପାଖରେ ଥିବା ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ସାଧନ ନେଇ ସଜ୍ଜ ହେ। କାରଣ ଏବେ ମୁଁ ତୋର ଯୁଦ୍ଧ-ଶ୍ରଦ୍ଧାକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିଦେବି। ଗର୍ବରେ ଫୁଲି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଆଗରେ ରଖି ସମସ୍ତଙ୍କୁ ତୁ ଚ୍ୟାଲେଞ୍ଜ କରୁଛୁ; ତେଣୁ ଆଜିଠାରୁ ତୋର ଯୁଦ୍ଧସଙ୍କଳ୍ପର ଅନ୍ତ କରିଦେବି।”

Verse 27

दग्भोद्भव उवाच यद्येतदस्त्रमस्मासु युक्त तापस मन्यसे

ଦଗ୍ଭୋଦ୍ଭବ କହିଲା— “ହେ ତପସ୍ବୀ! ଯଦି ତୁମେ ଭାବୁଛ ଯେ ଏହି ଅସ୍ତ୍ର ଆମ ଉପରେ ପ୍ରୟୋଗ କରିବା ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ…”

Verse 28

राम उवाच इत्युक्त्वा शरवर्षेण सर्वतः समवाकिरत्‌

ରାମ କହିଲେ— ଏପରି କହି ସେ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ଶରବର୍ଷା କରି ସବୁଠାରେ ଛାଇଦେଲେ।

Verse 29

तस्य तानस्यतो घोरानिषून्‌ परतनुच्छिद:

ସେ ଛାଡ଼ିଥିବା ସେଇ ଭୟଙ୍କର ବାଣଗୁଡ଼ିକ ଶତ୍ରୁଙ୍କ ଦେହକୁ ଛିଦ୍ର କରିଦେବା ଶକ୍ତିର ଥିଲା।

Verse 30

ततोअस्मै प्रासूजद्‌ू घोरमैषीकमपराजित:

ତାପରେ ଅପରାଜିତ ବୀର ତାହାଙ୍କ ଉପରେ ଭୟଙ୍କର ଐଷୀକାସ୍ତ୍ର ଛାଡ଼ିଲେ।

Verse 31

अस्त्रमप्रतिसंधेयं तदद्भुतमिवा भवत्‌ । तब किसीसे पराजित न होनेवाले महर्षि नरने उनके ऊपर भयंकर ऐषीकास्त्रका प्रयोग किया; जिसका निवारण करना असम्भव था। यह एक अद्भुत-सी घटना हुई ।। ३० ह ।। तेषामक्षीणि कर्णाक्ष नासिकाश्ैव मायया

ସେ ଅସ୍ତ୍ରର ପ୍ରତିକାର ଅସମ୍ଭବ ଥିଲା; ତାହା ମାନୋ ଏକ ଅଦ୍ଭୁତ ଘଟଣା ହେଲା। ମାୟାବଳରେ ସେମାନଙ୍କ କାନ, ଆଖି ଓ ନାକ ଲୋପ ପାଇଲା।

Verse 32

स दृष्टवा श्वेतमाकाशमिषीकाभि: समाचितम्‌

ସେ ଦେଖିଲେ ଆକାଶ ଶ୍ୱେତ ହୋଇ ଐଷୀକାରେ ଘନଭାବେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଛି।

Verse 33

तमब्रवीज्नरो राजन्‌ शरण्य: शरणैषिणाम्‌

ତାପରେ, ହେ ରାଜନ୍, ଶରଣ ଚାହୁଁଥିବାମାନଙ୍କର ଆଶ୍ରୟ ସେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷ ତାଙ୍କୁ କହିଲେ।

Verse 34

नैतादूक्‌ पुरुषो राजन क्षत्रधर्ममनुस्मरन्‌

ରାମ କହିଲେ: “ହେ ରାଜନ୍, ଯେ ପୁରୁଷ କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମକୁ ସ୍ମରଣ କରେ, ସେ ଏପରି କଥା କହେ ନାହିଁ।”

Verse 35

मनसा नृपशार्दूल भवेत्‌ परपुरंजय: । “नरेश्वर! नृपश्रेष्ठ! शत्रुनगरविजयी वीर पुरुष क्षत्रियधर्मको स्मरण रखते हुए कभी मनसे भी ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता, जैसा कि तुमने किया है ।। मा च दर्पसमाविष्ट: क्षेप्सी: कांश्वचित्‌ कथंचन

ରାମ କହିଲେ—“ହେ ନୃପଶାର୍ଦୂଳ! ଶତ୍ରୁନଗର-ବିଜୟୀ ସତ୍ୟ ବିଜେତା କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମ ସ୍ମରଣ କରି ମନରେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ କରିଥିବା ପରି ଆଚରଣ କରିପାରେ ନାହିଁ। ଏବଂ ଦର୍ପରେ ଆବିଷ୍ଟ ହୋଇ କେବେ ବି କାହାକୁ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଅପମାନ କିମ୍ବା ତିରସ୍କାର କରନି।”

Verse 36

अल्पीयांसं विशिष्ट वा तत्‌ ते राजन्‌ समाहितम्‌ | “राजन! आजसे फिर कभी घमंडमें आकर अपनेसे बड़े या छोटे किन्हीं राजाओंपर किसी प्रकार भी आक्षेप न करना। इस बातके लिये मैंने तुम्हें सावधान कर दिया ।। कृतप्रज्ञो वीतलोभो निरहंकार आत्मवान्‌,'भूपाल! तुम विनीतबुद्धि, लोभशूनन्‍्य, अहंकाररहित, मनस्वी, जितेन्द्रिय, क्षमाशील, कोमलस्वभाव और सौम्य होकर प्रजाका पालन करो। फिर कभी दूसरोंके बलाबलको जाने बिना किसीपर आक्षेप न करना

ରାମ କହିଲେ—“ହେ ରାଜନ! ଏହି କଥାକୁ ହୃଦୟରେ ଧାରଣ କର—ଆଜିଠାରୁ ଆଉ କେବେ ବି ଦର୍ପରେ ପଡ଼ି ତୁମଠାରୁ ବଡ଼ କିମ୍ବା ଛୋଟ କୌଣସି ରାଜାଙ୍କ ଉପରେ କୌଣସି ପ୍ରକାର ଆକ୍ଷେପ କରନି। ତୁମ ମଙ୍ଗଳ ପାଇଁ ମୁଁ ସତର୍କ କରିଦେଲି। ସ୍ଥିରବୁଦ୍ଧି, ଲୋଭଶୂନ୍ୟ, ଅହଂକାରରହିତ ଓ ଆତ୍ମସଂଯମୀ ହୋଇ ବିନୟରେ ପ୍ରଜାପାଳନ କର; ଏବଂ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କର ବଳାବଳ ଜାଣିନଥିଲେ କାହା ଉପରେ ଦୋଷାରୋପ କରନି।”

Verse 37

दान्तः क्षान्तो मृदुः सौम्य: प्रजा: पालय पार्थिव । मा सम भूय: क्षिपे: कंचिदविदित्वा बलाबलम्‌,'भूपाल! तुम विनीतबुद्धि, लोभशूनन्‍्य, अहंकाररहित, मनस्वी, जितेन्द्रिय, क्षमाशील, कोमलस्वभाव और सौम्य होकर प्रजाका पालन करो। फिर कभी दूसरोंके बलाबलको जाने बिना किसीपर आक्षेप न करना

ରାମ କହିଲେ—“ହେ ପାର୍ଥିବ! ଇନ୍ଦ୍ରିୟଦମନ, କ୍ଷମା, ମୃଦୁତା ଓ ସୌମ୍ୟତା ସହ ପ୍ରଜାପାଳନ କର। ଏବଂ କାହାର ବଳାବଳ ଜାଣିନଥିଲେ ପୁଣି କେବେ ବି କାହା ଉପରେ ଆକ୍ଷେପ କିମ୍ବା ଆକ୍ରମଣ କରନି।”

Verse 38

अनुज्ञात: स्वस्ति गच्छ मैवं भूय: समाचरे: । कुशल ब्राह्मणान्‌ पृच्छेरावयोर्वचनाद्‌ भूशम्‌,“मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी, तुम्हारा कल्याण हो, जाओ। फिर ऐसा बर्ताव न करना। विशेषत: हम दोनोंके कहनेसे तुम ब्राह्मणोंसे उनका कुशल-समाचार पूछते रहना”

ରାମ କହିଲେ—“ତୁମକୁ ଯିବାକୁ ଅନୁମତି ଦିଆଗଲା; କୁଶଳରେ ଯାଅ। ପୁଣି ଏପରି ଆଚରଣ କରନି। ଏବଂ ବିଶେଷକରି ଆମ କଥା ଅନୁସାରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କର କୁଶଳ-ସମାଚାର ଯତ୍ନରେ ପଚାରୁଥିବା।”

Verse 39

ततो राजा तयो: पादावभिवाद्य महात्मनो: । प्रत्याजगाम स्वपुरं धर्म चैवाचरद्‌ भूशम्‌,तदनन्तर राजा दम्भोद्भधव उन दोनों महात्माओंके चरणोंमें प्रणाम करके अपनी राजधानीमें लौट आये और विशेषरूपसे धर्मका आचरण करने लगे

ତାପରେ ରାଜା ସେଇ ଦୁଇ ମହାତ୍ମାଙ୍କ ପାଦରେ ପ୍ରଣାମ କରି ନିଜ ରାଜଧାନୀକୁ ଫେରିଗଲା; ଏବଂ ତା’ପରେ ସେ ବିଶେଷ ଭାବେ ଧର୍ମାଚରଣରେ ଲାଗିରହିଲା।

Verse 40

सुमहच्चापि तत्‌ कर्म तन्नरेण कृत॑ पुरा । ततो गुणै: सुबहुभि: श्रेष्ठ नारायणो5भवत्‌,इस प्रकार पूर्वकालमें महात्मा नरने वह महान्‌ कर्म किया था। उनसे भी बहुत गुणोंके कारण भगवान्‌ नारायण श्रेष्ठ हैं

ସେ କର୍ମ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ପୂର୍ବକାଳରେ ମହାତ୍ମା ନର ତାହା କରିଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ଅନେକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗୁଣରେ ଭଗବାନ୍ ନାରାୟଣ ତାଙ୍କଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ହେଲେ।

Verse 41

तस्माद्‌ यावद्‌ धनुःश्रेष्ठे गाण्डीवे<स्त्रं न युज्यते । तावत्‌ त्वं मानमुत्सूज्य गच्छ राजन्‌ धनंजयम्‌,अतः राजन! जबतक श्रेष्ठ धनुष गाण्डीवपर (दिव्य) अस्त्रोंका संधान नहीं किया जाता, तबतक ही तुम अभिमान छोड़कर अर्जुनसे मिल जाओ

ଏହେତୁ, ହେ ରାଜନ୍! ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନୁ ଗାଣ୍ଡୀବରେ ଦିବ୍ୟ ଅସ୍ତ୍ରର ସନ୍ଧାନ ହୋଇନାହିଁ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତୁମେ ଅଭିମାନ ତ୍ୟାଗ କରି ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଅ।

Verse 42

काकुदीकं शुक॑ नाकमक्षिसंतर्जनं तथा । संतान॑ नर्तक॑ घोरमास्यमोदकमष्टमम्‌,काकुदीक (प्रस्वापन), शुक (मोहन), नाक (उन्मादन), अक्षिसंतर्जन (त्रासन), संतान (दैवत), नर्तक (पैशाच), घोर (राक्षस) और आस्यमोदक (याम्य)- --ये आठ प्रकारके अस्त्र हैं

କାକୁଦୀକ, ଶୁକ, ନାକ, ଅକ୍ଷିସନ୍ତର୍ଜନ, ସନ୍ତାନ, ନର୍ତ୍ତକ, ଘୋର ଏବଂ ଅଷ୍ଟମ ଆସ୍ୟମୋଦକ—ଏହି ଆଠ ପ୍ରକାର ଅସ୍ତ୍ର।

Verse 43

एतैरविंद्धा: सर्व एव मरणं यान्ति मानवा: । कामक्रोधौ लोभमोहौ मदमानौ तथैव च

ଏହିମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ବିଦ୍ଧ ହୋଇ ସମସ୍ତ ମାନବ ମୃତ୍ୟୁକୁ ଯାଆନ୍ତି—କାମ ଓ କ୍ରୋଧ, ଲୋଭ ଓ ମୋହ, ଏବଂ ମଦ ଓ ମାନ।

Verse 44

उन्मत्ताश्न विचेष्टन्ते नष्टसंज्ञा विचेतस:,इन अस्त्रोंके प्रयोगसे कुछ लोग उन्मत्त हो जाते हैं और वैसी ही चेष्टाएँ करने लगते हैं। कितनोंको सुध-बुध नहीं रह जाती, वे अचेत हो जाते हैं। कई मनुष्य सोने लगते हैं। कुछ उछलते-कूदते और छींकते हैं। कितने ही मल-मूत्र करने लग जाते हैं और कुछ लोग निरंतर रोते-हँसते रहते हैं

ଏହି ଅସ୍ତ୍ରମାନଙ୍କ ପ୍ରଭାବରେ କେହି ଉନ୍ମତ୍ତ ହୋଇ ପାଗଳ ପରି ଚେଷ୍ଟା କରନ୍ତି; କେତେକଙ୍କର ସୁଧ-ବୁଧ ନଷ୍ଟ ହୋଇ ସେମାନେ ଅଚେତନ ହୋଇପଡ଼ନ୍ତି।

Verse 45

स्वपन्ति च प्लवन्ते च छर्दयन्ति च मानवा: । मूत्रयन्ते च सततं रुदन्ति च हसन्ति च,इन अस्त्रोंके प्रयोगसे कुछ लोग उन्मत्त हो जाते हैं और वैसी ही चेष्टाएँ करने लगते हैं। कितनोंको सुध-बुध नहीं रह जाती, वे अचेत हो जाते हैं। कई मनुष्य सोने लगते हैं। कुछ उछलते-कूदते और छींकते हैं। कितने ही मल-मूत्र करने लग जाते हैं और कुछ लोग निरंतर रोते-हँसते रहते हैं

ଏପରି ଅସ୍ତ୍ରପ୍ରୟୋଗର ପ୍ରଭାବରେ କେତେକ ଲୋକ ଉନ୍ମତ୍ତ ହୋଇ ବିକୃତ ଚେଷ୍ଟା କରିବାକୁ ଲାଗନ୍ତି। ଅନେକଙ୍କର ସୁଧ-ବୁଧ ହରାଇଯାଏ, ସେମାନେ ଅଚେତ ହୋଇ ପଡନ୍ତି। କେହି ଶୋଇ ପଡନ୍ତି; କେହି ଛାଲି-କୁଦି କରନ୍ତି; କେହି ବାନ୍ତି କରନ୍ତି। କେହି ନିରନ୍ତର ମୁତ୍ରତ୍ୟାଗ କରନ୍ତି, ଆଉ କେହି ନିୟନ୍ତ୍ରଣ ଛାଡ଼ି କାନ୍ଦିବା-ହସିବା କରି ରହନ୍ତି।

Verse 46

निर्माता सर्वलोकानामीश्रवर: सर्वकर्मवित्‌ | यस्य नारायणो बन्धुरजुनो दुःसहो युधि,राजन! सम्पूर्ण लोकोंका निर्माण करनेवाले ईश्वर एवं सब कर्मोके ज्ञाता नारायण जिनके बन्धु (सहायक) हैं, वे नरस्वरूप अर्जुन युद्धमें दुःसह हैं (क्योंकि उन्हें उपर्युक्त सभी अस्त्रोंका अच्छा ज्ञान है)

ରାଜନ୍! ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କ ସୃଷ୍ଟିକର୍ତ୍ତା ଏବଂ ସମସ୍ତ କର୍ମଜ୍ଞ ଈଶ୍ୱର ନାରାୟଣ ଯାହାଙ୍କ ବନ୍ଧୁ ଓ ସହାୟ, ସେ ନରରୂପ ଅର୍ଜୁନ ଯୁଦ୍ଧରେ ଦୁଃସହ।

Verse 47

कस्तमुत्सहते जेतु त्रिषु लोकेषु भारत । वीरं कपिध्वजं जिष्णुं यस्य नास्ति समो युधि

ହେ ଭାରତ! ତିନି ଲୋକରେ କିଏ ସାହସ କରି ସେହି ବୀର କପିଧ୍ୱଜ, ସଦା ଜୟଶୀଳ ଯୋଦ୍ଧାକୁ ଜିତିବ, ଯାହାଙ୍କ ସମାନ ଯୁଦ୍ଧରେ କେହି ନାହିଁ?

Verse 48

भारत! युद्धभूमिमें जिनकी समानता कोई भी नहीं कर सकता, उन विजयशील वीर कपिध्वज अर्जुनको जीतनेका साहस तीनों लोकोंमें कौन कर सकता है? ।। असंख्येया गुणा: पार्थे तद्विशिष्टो जनार्दन: । त्वमेव भूयो जानासि कुन्तीपुत्र॑ धनंजयम्‌,महाराज! अर्जुनमें असंख्य गुण हैं एवं भगवान्‌ जनार्दन तो उनसे भी बढ़कर हैं। तुम भी कुन्तीपुत्र अर्जुनको अच्छी तरह जानते हो। जो दोनों महात्मा नर और नारायणके नामसे प्रसिद्ध हैं, वे ही अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं। तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि वे दोनों पुरुषरत्न सर्वश्रेष्ठ वीर हैं

ହେ ଭାରତ! ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରେ ଯାହାଙ୍କ ସମାନ କେହି ନାହିଁ, ସେହି ଜୟଶୀଳ ବୀର କପିଧ୍ୱଜ ଅର୍ଜୁନକୁ ଜିତିବାକୁ ତିନି ଲୋକରେ କିଏ ସାହସ କରିପାରିବ? ପାର୍ଥରେ ଅସଂଖ୍ୟ ଗୁଣ ଅଛି, ଏବଂ ଜନାର୍ଦନ ତାହାଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ବିଶିଷ୍ଟ। ମହାରାଜ, ତୁମେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କୁ ଭଲଭାବେ ଜାଣ।

Verse 49

नरनारायणौ यौ तौ तावेवार्जुनकेशवौ । विजानीहि महाराज प्रवीरौ पुरुषोत्तमौ,महाराज! अर्जुनमें असंख्य गुण हैं एवं भगवान्‌ जनार्दन तो उनसे भी बढ़कर हैं। तुम भी कुन्तीपुत्र अर्जुनको अच्छी तरह जानते हो। जो दोनों महात्मा नर और नारायणके नामसे प्रसिद्ध हैं, वे ही अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं। तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि वे दोनों पुरुषरत्न सर्वश्रेष्ठ वीर हैं

ମହାରାଜ! ନର ଓ ନାରାୟଣ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଯେ ଦୁଇ ମହାତ୍ମା, ସେମାନେ ହେଲେ ଅର୍ଜୁନ ଓ କେଶବ। ଜାଣି ରଖ—ସେ ଦୁଇଜଣ ପ୍ରବୀର, ପୁରୁଷୋତ୍ତମ।

Verse 50

यद्येतदेवं जानासि न च मामभिशड्कसे । आर्या मतिं समास्थाय शाम्य भारत पाण्डवै:,भारत! यदि तुम इस बातको इस रूपमें जानते हो और मुझपर तुम्हें तनिक भी संदेह नहीं है तो मेरे कहनेसे श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर पाण्डवोंके साथ संधि कर लो

ହେ ଭାରତ! ଯଦି ତୁମେ ଏହାକୁ ଏହିପରି ଜାଣ ଏବଂ ମୋ ପ୍ରତି ତୁମର ଅଳ୍ପମାତ୍ର ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ, ତେବେ ଆର୍ୟୋଚିତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୁଦ୍ଧିକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି କର।

Verse 51

अथ चेन्मन्यसे श्रेयो न मे भेदो भवेदिति । प्रशाम्य भरतश्रेष्ठ मा च युद्धे मन: कृथा:

ଯଦି ତୁମେ ଏହାକୁ ଶ୍ରେୟସ୍କର ଭାବୁଛ ଯେ ମୋ ସହ ଭେଦ ନ ହେଉ, ତେବେ ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଶାନ୍ତ ହୁଅ ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧରେ ମନ ଲଗାଅ ନାହିଁ।

Verse 52

भरतश्रेष्ठ! यदि तुम्हारी यह इच्छा हो कि हमलोगोंमे फ़ूट न हो और इसीमें तुम अपना कल्याण समझो, तब तो संधि करके शान्त हो जाओ और युद्धमें मन न लगाओ ।। भवतां च कुरुश्रेष्ठ कुलं बहुमतं भुवि । तत्‌ तथैवास्तु भद्रें ते स्वार्थमेवोपचिन्तय,कुरुश्रेष्ठ! तुम्हारा कुल इस पृथ्वीपर बहुत प्रतिष्ठित है। वह उसी प्रकार सम्मानित बना रहे और तुम्हारा कल्याण हो, इसके लिये अपने वास्तविक स्वार्थका ही चिन्तन करो

ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯଦି ତୁମ ଇଚ୍ଛା ଏହି ଯେ ଆମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଫୁଟ ନ ହେଉ ଏବଂ ଏହିଥିରେ ତୁମେ ନିଜ କଲ୍ୟାଣ ଦେଖୁଛ, ତେବେ ସନ୍ଧି କରି ଶାନ୍ତ ହୁଅ ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧରେ ମନ ଲଗାଅ ନାହିଁ। ଆଉ, ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମ କୁଳ ଏହି ପୃଥିବୀରେ ବହୁମାନ୍ୟ; ସେହିପରି ମାନ୍ୟ ରହୁ, ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ତେଣୁ ନିଜର ସତ୍ୟ ସ୍ୱାର୍ଥ—ଯାହା ପ୍ରକୃତରେ କଲ୍ୟାଣକର—ତାହାକୁ ହିଁ ଚିନ୍ତା କର।

Verse 95

इस प्रकार श्रीमह्माभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कौरवसभामें श्रीकृष्णवाक्यविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ କୌରବସଭାରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ବାକ୍ୟବିଷୟକ ପଞ୍ଚାନବେଁ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 96

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि दम्भोद्धवोपाख्याने षण्णवतितमो<ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଦମ୍ଭୋଦ୍ଧବୋପାଖ୍ୟାନର ଷଣ୍ଣବେଁ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।

Verse 216

आतिथ्यं दीयतामेतत्‌ काडक्षितं मे चिरं प्रति । और कहा--'मैंने अपने बाहुबलसे सारी पृथ्वीको जीत लिया है तथा सम्पूर्ण शत्रुओंका संहार कर डाला है। अब आप दोनोंसे युद्ध करनेकी इच्छा लेकर इस पर्वतपर आया हूँ। यही मेरा चिरकालसे अभिलषित मनोरथ है। आप अतिथि-सत्कारके रूपमें इसे ही पूर्ण कर दीजिये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ମୋତେ ଏହି ଅତିଥି-ସତ୍କାର ଦିଅ—ଯାହାକୁ ମୁଁ ଦୀର୍ଘକାଳ ଧରି ଆକାଂକ୍ଷା କରୁଥିଲି। ମୋର ବାହୁବଳରେ ମୁଁ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଜୟ କରିଛି ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ସଂହାର କରିଛି। ଏବେ ତୁମ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବା ଇଚ୍ଛା ନେଇ ଏହି ପର୍ବତକୁ ଆସିଛି। ଏହି ମୋର ଚିରକାଳର ଅଭିଲଷିତ ମନୋରଥ; ଅତିଥି-ପୂଜାରୂପେ ଏହାକୁ ହିଁ ପୂରଣ କର।”

Verse 246

दम्भोद्धवो युद्धमिच्छन्नाह्वयत्येव तापसौ । परशुरामजी कहते हैं--भारत! उन दोनों महात्माओंने बारंबार ऐसा कहकर राजासे क्षमा माँगी और उन्हें विविध प्रकारसे सान्त्वना दी। तथापि दम्भोद्धव युद्धकी इच्छासे उन दोनों तापसोंको कहते और ललकारते ही रहे

ପରଶୁରାମ କହିଲେ—ଭାରତ! ଯୁଦ୍ଧଲୋଭରେ ଚାଳିତ ଦମ୍ଭୋଦ୍ଧବ ସେଇ ଦୁଇ ତାପସଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ଆହ୍ୱାନ କରି ଲଲକାରୁଥିଲା। କିନ୍ତୁ ସେ ଦୁଇ ମହାତ୍ମା ବାରମ୍ବାର ଏମିତି କହି ରାଜାଙ୍କୁ କ୍ଷମା ମାଗୁଥିଲେ ଏବଂ ନାନା ପ୍ରକାରେ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଉଥିଲେ; ତଥାପି ଦମ୍ଭୋଦ୍ଧବର ଯୁଦ୍ଧେଚ୍ଛା ନିବୃତ୍ତ ହେଲା ନାହିଁ।

Verse 276

एतेनापि त्वया योत्स्ये युद्धार्थी हहमागत: । दम्भोद्भधवने कहा--तापस! यदि आप यही अस्त्र हमारे लिये उपयुक्त मानते हैं तो मैं इसके होनेपर भी आपके साथ युद्ध अवश्य करूँगा; क्योंकि मैं युद्धके लिये ही यहाँ आया हूँ

ଦମ୍ଭୋଦ୍ଭବ କହିଲା—“ତାପସ! ତଥାପି ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି; ମୁଁ ଯୁଦ୍ଧାର୍ଥେ ହିଁ ଏଠାକୁ ଆସିଛି। ଯଦି ଆପଣ ଏହି ଅସ୍ତ୍ରକୁ ଆମ ପାଇଁ ଉପଯୁକ୍ତ ଭାବୁଛନ୍ତି, ତେବେ ଏହା ଆପଣଙ୍କ ହସ୍ତରେ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ଆପଣଙ୍କ ସହ ସମର କରିବି; କାରଣ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ହିଁ ମୁଁ ଆସିଛି।”

Verse 286

दम्भोद्धवस्तापसं तं जिघांसु: सहसैनिक: । परशुरामजी कहते हैं--ऐसा कहकर सैनिकोंसहित दम्भोद्धवने तपस्वी नरको मार डालनेकी इच्छासे सब ओरसे उनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी

ପରଶୁରାମ କହିଲେ—ଏମିତି କହି, ସେନାସହିତ ଦମ୍ଭୋଦ୍ଧବ ସେଇ ତାପସ ନରକୁ ମାରିଦେବା ଇଚ୍ଛାରେ ସବୁଦିଗରୁ ତାଙ୍କ ଉପରେ ବାଣବର୍ଷା ଆରମ୍ଭ କଲା।

Verse 296

कदर्थीकृत्य स मुनिरिषीकाभि: समार्पयत्‌ | उनके भयंकर बाण शत्रुके शरीरको छिल्न-भिन्न कर देनेवाले थे; परंतु मुनिने उन बाणोंका प्रहार करनेवाले दम्भोद्भधवकी कोई परवा न करके सींकोंसे ही उनको बींध डाला

ପରଶୁରାମ କହିଲେ—ତାକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ କଦର୍ଥିତ କରି ସେ ମୁନି ତାକୁ ଋଷିକାମାନଙ୍କ ହସ୍ତେ ସମର୍ପଣ କଲେ। ଶତ୍ରୁର ଭୟଙ୍କର ବାଣ ଦେହକୁ ଛିନ୍ନଭିନ୍ନ କରିଦେବାକୁ ସମର୍ଥ ଥିଲା; କିନ୍ତୁ ମୁନି ପ୍ରହାରକାରୀ ଦମ୍ଭୋଦ୍ଭବର ଦର୍ପକୁ ଅଗଣ୍ୟ କରି, କେବଳ ନଳ/ସୀଙ୍କରେ ହିଁ ତାକୁ ବିଦ୍ଧ କରିଦେଲେ।

Verse 316

निमित्तवेधी स मुनिरिषीकाभि: समार्पयत्‌ | इस प्रकार लक्ष्यवेध करनेवाले नर मुनिने मायाद्वारा सींकके बाणोंसे ही दम्भोद्धवके सैनिकोंकी आँखों, कानों और नासिकाओंको बींध डाला

ଲକ୍ଷ୍ୟଭେଦରେ ଅଚ୍ୟୁତ ସେ ମୁନି ବାଣ ସଜାଇ, ମାୟାବଳରେ କେବଳ ସିଙ୍କର ବାଣଦ୍ୱାରା ଦମ୍ଭୋଦ୍ଭବଙ୍କ ସେନାଙ୍କ ଆଖି, କାନ ଓ ନାକକୁ ବିଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 326

पादयोर्न्यपतद्‌ राजा स्वस्ति मे$स्त्विति चाब्रवीत्‌ । राजा दम्भोद्धव सींकोंसे भरे हुए समूचे आकाशको श्वेतवर्ण हुआ देखकर मुनिके चरणोंमें गिर पड़े और बोले--“भगवन्‌! मेरा कल्याण हो'

ସିଙ୍କ ବାଣରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ସମଗ୍ର ଆକାଶ ଶ୍ୱେତବର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଥିବା ଦେଖି ରାଜା ଦମ୍ଭୋଦ୍ଭବ ମୁନିଙ୍କ ଚରଣରେ ପଡ଼ିଲେ ଏବଂ କହିଲେ—“ଭଗବନ୍! ମୋର କଲ୍ୟାଣ ହେଉ; ମୋତେ ସ୍ୱସ୍ତି ମିଳୁ।”

Verse 336

ब्रह्मण्यो भव धर्मात्मा मा च स्मैवं पुनः कृथा: । “राजन्‌! शरण चाहनेवालोंको शरण देनेवाले भगवान्‌ नरने उनसे कहा--“आजसे तुम ब्राह्मणहितैषी और धर्मात्मा बनो। फिर कभी ऐसा साहस न करना

ଶରଣାଗତଙ୍କୁ ଶରଣ ଦେଉଥିବା ଭଗବାନ୍ ନର କହିଲେ—“ଆଜିଠାରୁ ତୁମେ ବ୍ରାହ୍ମଣହିତେଷୀ ଓ ଧର୍ମାତ୍ମା ହେଉ; ପୁଣି କେବେ ଏପରି ସାହସ କରିବ ନାହିଁ।”

Verse 433

मात्सर्याहंकृती चैव क्रमादेव उदाह्वता: । इन अस्त्रोंसे विद्ध होनेपर सभी मनुष्य मृत्युको प्राप्त होते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मान, मात्सर्य और अहंकार--ये क्रमश: आठ दोष बताये गये हैं, जिनके प्रतीकस्वरूप उपयुक्त आठ अस्त्र हैं

ମାତ୍ସର୍ୟ ଓ ଅହଂକାର ମଧ୍ୟ କ୍ରମକ୍ରମେ ଉଦ୍ଧୃତ। ଏହି ‘ଅସ୍ତ୍ର’ ଦ୍ୱାରା ବିଦ୍ଧ ହେଲେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ମନୁଷ୍ୟ ମୃତ୍ୟୁକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ। କାମ, କ୍ରୋଧ, ଲୋଭ, ମୋହ, ମଦ, ମାନ, ମାତ୍ସର୍ୟ, ଅହଂକାର—ଏହି କ୍ରମରେ ଆଠ ଦୋଷ; ଏବଂ କଥିତ ଆଠ ଅସ୍ତ୍ର ସେମାନଙ୍କର ପ୍ରତୀକ।

Frequently Asked Questions

Whether Duryodhana should continue a policy of refusal grounded in pride and perceived strength, or adopt conciliation grounded in rājadharma, acknowledging mortality, karmic consequence, and the comparative strength of opponents.

All embodied power is transient within cyclical time; therefore governance should be guided by restraint, accountability, and negotiated order rather than overconfidence in force or status.

No formal phalaśruti is stated here; the meta-function is didactic—embedding policy counsel within cosmological impermanence and an illustrative itihāsa to shape the listener’s judgment about prudent rulership.