कण्वोपदेशः—नश्वरबलविवेकः तथा मातलिगुणकेश्याः आख्यानारम्भः
Kaṇva’s Counsel on Impermanent Power; Opening of the Mātali–Guṇakeśī Narrative
दान्तः क्षान्तो मृदुः सौम्य: प्रजा: पालय पार्थिव । मा सम भूय: क्षिपे: कंचिदविदित्वा बलाबलम्,'भूपाल! तुम विनीतबुद्धि, लोभशूनन््य, अहंकाररहित, मनस्वी, जितेन्द्रिय, क्षमाशील, कोमलस्वभाव और सौम्य होकर प्रजाका पालन करो। फिर कभी दूसरोंके बलाबलको जाने बिना किसीपर आक्षेप न करना
dāntaḥ kṣānto mṛduḥ saumyaḥ prajāḥ pālaya pārthiva | mā sama bhūyaḥ kṣipeḥ kaṃcid aviditvā balābalam ||
ରାମ କହିଲେ—“ହେ ପାର୍ଥିବ! ଇନ୍ଦ୍ରିୟଦମନ, କ୍ଷମା, ମୃଦୁତା ଓ ସୌମ୍ୟତା ସହ ପ୍ରଜାପାଳନ କର। ଏବଂ କାହାର ବଳାବଳ ଜାଣିନଥିଲେ ପୁଣି କେବେ ବି କାହା ଉପରେ ଆକ୍ଷେପ କିମ୍ବା ଆକ୍ରମଣ କରନି।”
राम उवाच