कण्वोपदेशः—नश्वरबलविवेकः तथा मातलिगुणकेश्याः आख्यानारम्भः
Kaṇva’s Counsel on Impermanent Power; Opening of the Mātali–Guṇakeśī Narrative
ऑपन-माज बछ। डे ३. दुसरोंको सुख पहुँचानेकी सहज भावनाका नाम “कृपा” है। २. दूसरोंका दुःख देखकर द्रवित होना एवं काँप उठना “अनुकम्पा” कहलाता है। 3. दूसरोंके दुःखको दूर करनेका भाव “करुणा” है। ४. क्रूरताका सर्वथा अभाव 'अनृशंसता” कहलाता है। षण्णवतितमोब< ध्याय: परशुरामजीका दम्भोद्धवकी कथाद्वारा नर-नारायणस्वरूप अर्जुन और श्रीकृष्णका महत्त्व वर्णन करना वैशम्पायन उवाच तस्मिन्नभिहिते वाक्ये केशवेन महात्मना । स्तिमिता हृष्टरोमाण आसन् सर्वे सभासद:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महात्मा श्रीकृष्णके ऐसी बात कहनेपर सम्पूर्ण सभासद् चकित हो गये। उनके अंगोंमें रोमांच हो आया
Vaiśampāyana uvāca: tasminn abhihite vākye Keśavena mahātmanā | stimitā hṛṣṭaromāṇa āsan sarve sabhāsadaḥ ||
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାତ୍ମା କେଶବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ସେହି କଥା କହିଦେବା ସହିତ ସମସ୍ତ ସଭାସଦ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟରେ ନିର୍ବାକ ହୋଇଗଲେ; ତାଙ୍କ ଦେହରେ ରୋମାଞ୍ଚ ଜାଗିଉଠିଲା।
वैशम्पायन उवाच