
Vidura-nīti: Atithi-dharma, Trust, Counsel-Secrecy, and Traits of Sustainable Rule (Udyoga Parva, Adhyāya 38)
Upa-parva: Vidura-nīti (Counsels of Vidura) — Udyoga Parva
Vidura enumerates governance and household ethics in aphoristic sequence. He begins with atithi-dharma: rising to greet elders/guests restores vitality and social order; the host should offer a seat, water for washing, inquire after welfare, and then provide food with discernment. He warns against accepting certain offerings without proper ritual competence and lists categories of persons deemed unfit for specific forms of hospitality (a normative, prescriptive classification within the text). He notes commodities framed as ‘not to be sold’ (avikreyāṇi), reflecting moral economy constraints. The chapter then shifts to character typologies—renunciant and forest ascetic ideals—before returning to pragmatic court ethics: do not assume safety after harming the wise; calibrate trust (avoid both distrust of the trustworthy and over-trust of the untested). Domestic counsel follows: be non-jealous, protect household privacy, share resources, speak pleasantly, honor women as household prosperity, yet avoid being governed by impulse. Vidura emphasizes secrecy of counsel (mantra): effective rulership depends on confidential deliberation conducted in secure places, shared only with disciplined allies; he contrasts success under guarded counsel with failure under reckless action. He concludes with operational ethics: pursue praiseworthy actions, understand strategic policy (ṣāḍguṇya), restrain anger toward vulnerable groups, avoid pointless quarrels, cultivate truthful speech and gratitude, and identify traits that generate prosperity versus those that make a person socially avoidable. The closing verses apply the counsel to the Kuru political crisis, warning of instability produced by misrule and flawed advisors, and forecasting decline driven by intoxication with power.
Chapter Arc: हस्तिनापुर के राजसभा-परिसर में विदुर धृतराष्ट्र के सम्मुख नीति का दर्पण रखते हैं—यह चेतावनी देकर कि समय के विरुद्ध कही गई बात, चाहे बृहस्पति की ही क्यों न हो, अपमान और अवज्ञा को जन्म देती है। → विदुर राजधर्म की परतें खोलते हैं: प्रिय बनने के उपाय (दान, मधुर वचन, मंत्र-बल) बताते हुए वे धृतराष्ट्र को स्मरण कराते हैं कि राज्य का स्थायित्व केवल पुत्रमोह से नहीं, समता, सद्व्यवहार और शत्रुओं के प्रति अडिग तेज से टिकता है। वे ‘नष्ट’ के रूपक से समझाते हैं कि जो बात न सुनी जाए, वह समुद्र में गिरी वस्तु की तरह व्यर्थ हो जाती है—और यही धृतराष्ट्र की सबसे बड़ी त्रासदी है। → विदुर का तीखा आग्रह: ‘पुत्रों और पाण्डवों में समता’—धृतराष्ट्र से बार-बार कहा जाता है कि यदि वे पाण्डवों के प्रति सद्व्यवहार करें तो वे शत्रुओं के लिए अधर्षणीय बनेंगे; अन्यथा अधर्म से कमाए धन से किए कर्म भी निष्फल होंगे और नीच, क्रूर, अजितेन्द्रिय संग विनाश का उद्योग कराएगा। → अध्याय का निष्कर्ष नीति-सूत्रों में सघन होता है: समयोचित वचन, शुद्ध साधनों से अर्जित धन, और दुष्ट-संग का परित्याग—यही राजकुल की रक्षा है; सौहार्द का सुख और फल-निर्वृत्ति तभी संभव है जब दोषयुक्त जनों का त्याग और न्यायपूर्ण समता अपनाई जाए। → धृतराष्ट्र सुनेंगे या ‘अशृण्वति’ बने रहेंगे—विदुर की वाणी क्या समुद्र में गिरी वस्तु की तरह नष्ट होगी, या युद्ध-पूर्व संधि का द्वार खुलेगा?
Verse 1
पम्प बछ। अर: - मिट्टी और गोबरको मिलाकर कच्चे घरोंको जो लीपा-पोता जाता है, उससे बचे हुए व्यर्थ लोंदेको “लोष्ट' कहते हैं। एकोनचत्वारिशोड ध्याय: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश धृतराष्ट्र रवाच अनीश्वरो<यं पुरुषो भवाभवे सूत्रप्रोता दारुमयीव योषा । धात्रा तु दिष्टस्य वशे कृतो<यं तस्माद् वद त्वं श्रवणे धृतो5हम्,धृतराष्ट्रने कहा--विदुर! यह पुरुष ऐश्वर्यकी प्राप्ति और नाशमें स्वतन्त्र नहीं है। ब्रह्माने धागेसे बँधी हुई कठपुतलीकी भाँति इसे प्रारब्धके अधीन कर रखा है; इसलिये तुम कहते चलो, मैं सुननेके लिये धैर्य धारण किये बैठा हूँ
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ବିଦୁର! ଏହି ପୁରୁଷ ସମୃଦ୍ଧିର ପ୍ରାପ୍ତି ଓ ବିନାଶ—ଦୁହିଁଥିରେ ସ୍ୱାଧୀନ ନୁହେଁ। ସୂତାରେ ବାନ୍ଧା କାଠପୁତୁଳି ପରି ବିଧାତା ଏହାକୁ ପ୍ରାରବ୍ଧର ବଶରେ ରଖିଛନ୍ତି; ତେଣୁ ତୁମେ କହ, ମୁଁ ଧୈର୍ୟ ଧରି ଶୁଣିବାକୁ ବସିଛି।
Verse 2
विदुर उवाच अप्राप्तकालं वचन बृहस्पतिरपि ब्रुवन् । लभते बुद्धयवज्ञानमवमानं च भारत,विदुरजी बोले--भारत! समयके विपरीत यदि बृहस्पति भी कुछ बोलें तो उनका अपमान ही होगा और उनकी बुद्धिकी भी अवज्ञा ही होगी
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ଅସମୟରେ ଯଦି ବୃହସ୍ପତି ମଧ୍ୟ କଥା କହନ୍ତି, ତେବେ ତାଙ୍କ ବୁଦ୍ଧିର ଅବଜ୍ଞା ହୁଏ ଓ ଅପମାନ ମିଳେ।
Verse 3
प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापर: । मन्त्रमूलबलेनान्यो य: प्रिय: प्रिय एव सः,संसारमें कोई मनुष्य दान देनेसे प्रिय होता है, दूसरा प्रिय वचन बोलनेसे प्रिय होता है और तीसरा मन्त्र तथा औषधके बलसे प्रिय होता है; किंतु जो वास्तवमें प्रिय है, वह तो सदा प्रिय ही है
କେହି ଦାନ ଦେଇ ପ୍ରିୟ ହୁଏ, କେହି ମଧୁର ବଚନ କହି ପ୍ରିୟ ହୁଏ, ଆଉ କେହି ମନ୍ତ୍ର ଓ ଔଷଧର ବଳରେ ପ୍ରିୟ ହୁଏ; କିନ୍ତୁ ଯେ ସତ୍ୟରେ ପ୍ରିୟ, ସେ ସଦା ପ୍ରିୟ ହିଁ ରହେ।
Verse 4
द्वेष्यो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डित: । प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेष्पे पापानि चैव ह,जिससे द्वेष हो जाता है, वह न साधु, न विद्वान् और न बुद्धिमान् ही जान पड़ता है। प्रिय व्यक्ति (मित्र आदि)-के तो सभी कर्म शुभ ही प्रतीत होते हैं और शत्रुके सभी कार्य पापमय
ଯାହା ପ୍ରତି ଦ୍ୱେଷ ଜନ୍ମେ, ସେ ନ ସାଧୁ, ନ ମେଧାବୀ, ନ ପଣ୍ଡିତ ବୋଲି ପ୍ରତୀତ ହୁଏ। ପ୍ରିୟଜନ (ମିତ୍ର ଆଦି)ଙ୍କ ସବୁ କାର୍ଯ୍ୟ ଶୁଭ ଲାଗେ, ଏବଂ ଦ୍ୱେଷ୍ୟ (ଶତ୍ରୁ)ଙ୍କ ସବୁ କାର୍ଯ୍ୟ ପାପମୟ ଲାଗେ।
Verse 5
उक्त मया जातमात्रेडपि राजन् दुर्योधन त्यज पुत्र त्वमेकम् । तस्य त्यागात् पुत्रशतस्य वृद्धि- रस्यात्यागात् पुत्रशतस्यथ नाश:,राजन! दुर्योधनके जन्म लेते ही मैंने कहा था कि केवल इसी एक पुत्रको आप त्याग दें। इसके त्यागसे सौ पुत्रोंकी वृद्धि होगी और इसका त्याग न करनेसे सौ पुत्रोंका नाश होगा
ରାଜନ୍! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଜନ୍ମ ନେଇଥିବା ସମୟରେ ମୁଁ କହିଥିଲି—ଏହି ଏକମାତ୍ର ପୁତ୍ରକୁ ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତୁ। ଏହାକୁ ତ୍ୟାଗ କଲେ ଆପଣଙ୍କ ଶତ ପୁତ୍ରଙ୍କ ବୃଦ୍ଧି ହେବ; ତ୍ୟାଗ ନ କଲେ ସେଇ ଶତ ପୁତ୍ରଙ୍କ ନାଶ ହେବ।
Verse 6
न वृद्धिर्बहु मन्तव्या या वृद्धि: क्षयमावहेत् । क्षयोडपि बहु मन्तव्यो य: क्षयो वृद्धिमावहेत्
ଯେ ବୃଦ୍ଧି ଶେଷରେ କ୍ଷୟ ଆଣେ, ସେ ବୃଦ୍ଧିକୁ ବହୁତ ମାନ୍ୟ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ଏବଂ ଯେ କ୍ଷୟ ଶେଷରେ ବୃଦ୍ଧି ଆଣେ, ସେ କ୍ଷୟକୁ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ମାନ୍ୟ କରିବା ଉଚିତ୍।
Verse 7
जो वृद्धि भविष्यमें नाशका कारण बने, उसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये और उस क्षयका भी बहुत आदर करना चाहिये, जो आगे चलकर अभ्युदयका कारण हो ।। न स क्षयो महाराज य: क्षयो वृद्धिमावहेत् | क्षय: स त्विह मन्तव्यो यं लब्ध्वा बहु नाशयेत्,महाराज! वास्तवमें जो क्षय वृद्धिका कारण होता है, वह क्षय नहीं है; किंतु उस लाभको भी क्षय ही मानना चाहिये, जिसे पानेसे बहुत-से लाभोंका नाश हो जाय
ମହାରାଜ! ଯେ କ୍ଷୟ ଆଗକୁ ଚାଲି ବୃଦ୍ଧିର କାରଣ ହୁଏ, ସେ ପ୍ରକୃତରେ କ୍ଷୟ ନୁହେଁ; କିନ୍ତୁ ଯେ ଲାଭ ପାଇଲେ ଅନେକ ଲାଭ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ, ସେ ଲାଭକୁ ମଧ୍ୟ ଏଠାରେ କ୍ଷୟ ବୋଲି ମନେ କରିବା ଉଚିତ୍।
Verse 8
समृद्धा गुणतः: केचिद् भवन्ति धनतो<परे । धनवृद्धान् गुणैहीनान् धृतराष्ट्र विवर्जय,धृतराष्ट्र! कुछ लोग गुणसे समृद्ध होते हैं और कुछ लोग धनसे। जो धनके धनी होते हुए भी गुणोंसे हीन हैं, उन्हें सर्वथा त्याग दीजिये
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର! କେହି ଗୁଣରେ ସମୃଦ୍ଧ ହୁଅନ୍ତି, କେହି ଧନରେ। ଯେମାନେ ଧନରେ ସମୃଦ୍ଧ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଗୁଣହୀନ, ସେମାନଙ୍କୁ ସର୍ବଥା ପରିତ୍ୟାଗ କରନ୍ତୁ।
Verse 9
धृतराष्ट उवाच सर्व त्वमायतीयुक्तं भाषसे प्राज्ञसम्मतम् | न चोत्सहे सुतं त्यक्तुं यतो धर्मस्ततो जय:,धृतराष्ट्रने कहा--विदुर! तुम जो कुछ कह रहे हो, परिणाममें हितकर है; बुद्धिमान् लोग इसका अनुमोदन करते हैं। यह भी ठीक है कि जिस ओर धर्म होता है, उसी पक्षकी जीत होती है, तो भी मैं अपने बेटेका त्याग नहीं कर सकता
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— ବିଦୁର! ତୁମେ ଯାହା କହୁଛ, ସେ ସବୁ ଭବିଷ୍ୟତର ହିତକୁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରିଛି ଏବଂ ପଣ୍ଡିତମାନେ ତାହାକୁ ସମ୍ମତି ଦେଇଛନ୍ତି। ଧର୍ମ ଯେଉଁ ପକ୍ଷରେ ଥାଏ ସେଠି ଜୟ ହୁଏ— ଏହା ମଧ୍ୟ ସତ୍ୟ; ତଥାପି ମୁଁ ମୋ ପୁତ୍ରକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ସାହସ କରିପାରୁନି।
Verse 10
विदुर उवाच अतीवगुणसम्पन्नो न जातु विनयान्वित: । सुसूक्ष्ममपि भूतानामुपमर्दमुपेक्षते,विदुरजी बोले--राजन्! जो अधिक गुणोंसे सम्पन्न और विनयी है, वह प्राणियोंका तनिक भी संहार होते देख उसकी कभी उपेक्षा नहीं कर सकता
ବିଦୁର କହିଲେ— ରାଜନ୍! ଯେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ଓ ବିନୟୀ, ସେ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କୁ ହେଉଥିବା ଅତି ସୂକ୍ଷ୍ମ କ୍ଷତିକୁ ମଧ୍ୟ କେବେ ଅବହେଳା କରେନାହିଁ।
Verse 11
परापवादनिरता: परदु:खोदयेषु च | परस्परविरोधे च यतन्ते सततोत्थिता:,जो दूसरोंकी निन्दामें ही लगे रहते हैं, दूसरोंको दुःख देने और आपसमें फूट डालनेके लिये सदा उत्साहके साथ प्रयत्न करते हैं, जिनका दर्शन दोषसे भरा (अशुभ) है और जिनके साथ रहनेमें भी बहुत बड़ा खतरा है, ऐसे लोगोंसे धन लेनेमें महान् दोष है और उन्हें देनेमें बहुत बड़ा भय है
ବିଦୁର କହିଲେ— ଯେମାନେ ସଦା ପରନିନ୍ଦାରେ ଲିପ୍ତ, ପରଙ୍କ ଦୁଃଖରେ ଆନନ୍ଦ ପାଆନ୍ତି, ଏବଂ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପରସ୍ପର ବିରୋଧ ସୃଷ୍ଟି କରିବାକୁ ନିରନ୍ତର ଉଦ୍ୟତ— ସେମାନଙ୍କଠାରୁ ଧନ ଗ୍ରହଣ କରିବା ମହାଦୋଷ; ସେମାନଙ୍କୁ ଦେବା ମଧ୍ୟ ମହାଭୟକର।
Verse 12
सदोष॑ दर्शन येषां संवासे सुमहद् भयम् | अर्थादाने महान् दोष: प्रदाने च महद् भसम्,जो दूसरोंकी निन्दामें ही लगे रहते हैं, दूसरोंको दुःख देने और आपसमें फूट डालनेके लिये सदा उत्साहके साथ प्रयत्न करते हैं, जिनका दर्शन दोषसे भरा (अशुभ) है और जिनके साथ रहनेमें भी बहुत बड़ा खतरा है, ऐसे लोगोंसे धन लेनेमें महान् दोष है और उन्हें देनेमें बहुत बड़ा भय है
ବିଦୁର କହିଲେ— ଯେମାନଙ୍କ ଦର୍ଶନ ଦୋଷମୟ ଏବଂ ଯାହାଙ୍କ ସହବାସ ମହାଭୟକର— ପରନିନ୍ଦା, ପରପୀଡା ଓ ଫୁଟ ପକାଇବାରେ ଲିପ୍ତ ଏମାନଙ୍କଠାରୁ ଧନ ଗ୍ରହଣ ମହାଦୋଷ; ସେମାନଙ୍କୁ ଦେବା ମଧ୍ୟ ମହାଭୟ ଓ ବିପଦର କାରଣ।
Verse 13
ये वै भेदनशीलास्तु सकामा निस्त्रपा: शठा: । ये पापा इति विख्याता: संवासे परिगर्लहिता:,दूसरोंमें फ़ूट डालनेका जिनका स्वभाव है, जो कामी, निर्लज्ज, शठ और प्रसिद्ध पापी हैं, वे साथ रखनेके अयोग्य--निन्दित माने गये हैं
ବିଦୁର କହିଲେ— ଯେମାନଙ୍କ ସ୍ୱଭାବ ହେଉଛି ଫୁଟ ପକାଇବା, ଯେମାନେ କାମାସକ୍ତ, ନିର୍ଲଜ୍ଜ, ଶଠ ଏବଂ ପାପୀ ବୋଲି ପ୍ରସିଦ୍ଧ— ସେମାନେ ସହବାସର ଅଯୋଗ୍ୟ; ନିନ୍ଦିତ ମନାଯାଇଛନ୍ତି।
Verse 14
युक्ताश्चान्यैर्महादोषैयें नरास्तान् विवर्जयेत् । निवर्तमाने सौहार्दे प्रीतिर्नीचे प्रणश्यति
ଯେମାନେ ମହାଦୋଷ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଦୁର୍ବ୍ୟସନରେ ଯୁକ୍ତ, ସେମାନଙ୍କୁ ପରିହାର କରିବା ଉଚିତ। ସୌହାର୍ଦ୍ୟ ଓ ପରସ୍ପର ସ୍ନେହ ଯେତେବେଳେ ହ୍ରାସ ପାଏ, ନୀଚମନା ଲୋକରେ ପ୍ରେମ ଓ ନିଷ୍ଠା ସର୍ବପ୍ରଥମେ ନଶିଯାଏ।
Verse 15
यतते चापवादाय यत्नमारभते क्षये
ସେ ଅପବାଦ (ନିନ୍ଦା) ପାଇବାକୁ ଯତ୍ନ କରେ ଏବଂ କ୍ଷୟ ପାଇଁ ହିଁ ପ୍ରୟାସ ଆରମ୍ଭ କରେ।
Verse 16
तादृशै: संगतं नीचै्नशंसैरकृतात्मभि:
ଏପରି ନୀଚ, କ୍ରୂର, ନିର୍ଲଜ୍ଜ ଓ ଅସଂଯମୀ ଲୋକମାନଙ୍କ ସଙ୍ଗ।
Verse 17
यो ज्ञातिमनुगृह्नाति दरिद्रं दीनमातुरम्
ଯେ ଦରିଦ୍ର, ଦୀନ ଓ ଆତୁର (ରୋଗାକ୍ରାନ୍ତ) ଜ୍ଞାତିକୁ ଅନୁଗ୍ରହ କରେ।
Verse 18
स पुत्रपशुभिर्व॑द्धि श्रेयश्वानन्त्यम श्षुते । जो अपने कुट॒म्बी, दरिद्र, दीन तथा रोगीपर अनुग्रह करता है, वह पुत्र और पशुओंसे वृद्धिको प्राप्त होता और अनन्त कल्याणका अनुभव करता है ।। ज्ञातयो वर्धनीयास्तैर्य इच्छन्त्यात्मन: शुभम्
ସେ ପୁତ୍ର ଓ ପଶୁଧନରେ ବୃଦ୍ଧି ପାଏ ଏବଂ ଅନନ୍ତ ଶ୍ରେୟସ୍ ଅନୁଭବ କରେ। ତେଣୁ ଯେମାନେ ନିଜ ଶୁଭ ଚାହାନ୍ତି, ସେମାନେ ନିଜ ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କୁ ପୋଷଣ କରି ବର୍ଧିତ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 19
कुलवृद्धि च राजेन्द्र तस्मात् साधु समाचर । राजेन्द्र जो लोग अपने भलेकी इच्छा करते हैं, उन्हें अपने जाति-भाइयोंको उन्नतिशील बनाना चाहिये; इसलिये आप भलीभाँति अपने कुलकी वृद्धि करें ।। श्रेयसा योक्ष्यते राजन् कुर्वाणो ज्ञातिसत्क्रियाम्,राजन्! जो अपने कुटुम्बीजनोंका सत्कार करता है, वह कल्याणका भागी होता है
ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ତେଣୁ କୁଳବୃଦ୍ଧି କରିବା ହିଁ ସଦାଚାର। ଯେ ରାଜା ନିଜ ଜ୍ଞାତି-ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କୁ ସତ୍କାର ଓ ପୋଷଣ କରେ, ସେ କଲ୍ୟାଣ ଓ ଶ୍ରେୟର ଭାଗୀ ହୁଏ।
Verse 20
विगुणा हाूपि संरक्ष्या ज्ञासयों भरतर्षभ । कि पुनर्गुणवन्तस्ते त्वत्प्रसादाभिकाड्क्षिण:,भरतश्रेष्ठ! अपने कुट॒म्बके लोग गुणहीन हों, तो भी उनकी रक्षा करनी चाहिये। फिर जो आपके कृपाभिलाषी एवं गुणवान् हैं, उनकी तो बात ही क्या है
ଭରତର୍ଷଭ! ନିଜ ଜ୍ଞାତିମାନେ ଗୁଣହୀନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରିବା ଉଚିତ; ତେବେ ଯେମାନେ ଗୁଣବାନ ଓ ଆପଣଙ୍କ କୃପା ଆଶା କରୁଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ କହିବାକୁ କିଛି ରହିଲା କି?
Verse 21
प्रसादं कुरु वीराणां पाण्डवानां विशाम्पते । दीयन्तां ग्रामका: केचित् तेषां वृत्त्यर्थमी श्वर,राजन! आप समर्थ हैं, वीर पाण्डवोंपर कृपा कीजिये और उनकी जीविकाके लिये कुछ गाँव दे दीजिये
ବିଶାମ୍ପତେ! ବୀର ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଉପରେ କୃପା କରନ୍ତୁ; ଈଶ୍ୱର! ସେମାନଙ୍କ ଜୀବିକା ପାଇଁ କିଛି ଗ୍ରାମ ଦେଇଦିଅନ୍ତୁ।
Verse 22
एवं लोके यश: प्राप्त भविष्यति नराधिप । वृद्धेन हि त्वया कार्य पुत्राणां तात शासनम्,नरेश्वरर ऐसा करनेसे आपको इस संसारमें यश प्राप्त होगा। तात! आप वृद्ध हैं, इसलिये आपको अपने पुत्रोंपर शासन करना चाहिये
ନରାଧିପ! ଏପରି କଲେ ଏହି ଲୋକରେ ଆପଣ ଯଶ ପାଇବେ। ତାତ! ଆପଣ ବୃଦ୍ଧ, ତେଣୁ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଶାସନ-ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିବା ଆପଣଙ୍କ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ।
Verse 23
मया चापि हित वाच्यं विद्धि मां त्वद्धितैषिणम् । ज्ञातिभिविंग्रहस्तात न कर्तव्य: शुभार्थिना । सुखानि सह भोज्यानि ज्ञातिभिर्भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! मुझे भी आपके हितकी ही बात कहनी चाहिये। आप मुझे अपना हितैषी समझें। तात! शुभ चाहनेवालेको अपने जाति-भाइयोंके साथ झगड़ा नहीं करना चाहिये; बल्कि उनके साथ मिलकर सुखका उपभोग करना चाहिये
ଭରତର୍ଷଭ! ମୋତେ ମଧ୍ୟ ହିତକର କଥା ହିଁ କହିବା ଉଚିତ—ମୋତେ ଆପଣଙ୍କ ହିତେଷୀ ବୋଲି ଜାଣନ୍ତୁ। ତାତ! ଯେ ଶୁଭ ଚାହେ, ସେ ନିଜ ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କ ସହ ବିଗ୍ରହ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; ବରଂ ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କ ସହ ମିଶି ସୁଖ ଉପଭୋଗ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 24
सम्भोजनं संकथनं सम्प्रीतिश्न॒ परस्परम् | ज्ञातिभि: सह कार्याणि न विरोध: कदाचन,जाति-भाइयोंके साथ परस्पर भोजन, बातचीत एवं प्रेम करना ही कर्तव्य है; उनके साथ कभी विरोध नहीं करना चाहिये
ନିଜ ଜ୍ଞାତିଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ପରସ୍ପର ଭୋଜନ, କଥାବାର୍ତ୍ତା ଓ ସ୍ନେହ ରଖିବା ହିଁ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ। ଆତ୍ମୀୟମାନଙ୍କ ସହ ମିଶି କାର୍ଯ୍ୟ କରିବା ଉଚିତ; ସେମାନଙ୍କ ସହ କେବେ ବି ବିରୋଧ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 25
ज्ञातयस्तारयन्तीह ज्ञातयो मज्जयन्ति च | सुवृत्तास्तारयन्तीह दुर्वत्ता मज्जयन्ति च,इस जगत्में जाति-भाई ही तारते और जाति-भाई ही डुबाते भी हैं। उनमें जो सदाचारी हैं, वे तो तारते हैं और दुराचारी डुबा देते हैं
ଏହି ଜଗତରେ ଜ୍ଞାତିଭାଇମାନେ ହିଁ ତାରନ୍ତି, ଆଉ ଜ୍ଞାତିଭାଇମାନେ ହିଁ ଡୁବାନ୍ତି ମଧ୍ୟ। ସଦାଚାରୀ ଉଦ୍ଧାର କରନ୍ତି; ଦୁରାଚାରୀ ବିନାଶର କାରଣ ହୁଅନ୍ତି।
Verse 26
सुवृत्तो भव राजेन्द्र पाण्डवान् प्रति मानद | अधर्षणीय: शत्रूणां तैर्व॒तस्त्वं भविष्यसि,राजेन्द्र! आप पाण्डवोंके प्रति सद्व्यवहार करें। मानद! उनसे सुरक्षित होकर आप शत्रुओंके लिये दुर्धर्ष हो जाये
ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସଦ୍ବ୍ୟବହାର କର, ହେ ମାନଦ। ସେମାନଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ-ରକ୍ଷାରେ ରହିଲେ ତୁମେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ହେବ।
Verse 27
श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति । दिग्थहस्तं मृग इव स एनस्तस्य विन्दति,विषैले बाण हाथमें लिये हुए व्याधके पास पहुँचकर जैसे मृगको कष्ट भोगना पड़ता है, उसी प्रकार जो जातीय बन्धु अपने धनी बन्धुके पास पहुँचकर दुःख पाता है, उसके पापका भागी वह धनी होता है
ଯେ ଜ୍ଞାତି ଧନୀ ବନ୍ଧୁଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ଦୁଃଖ ଭୋଗେ, ସେ ବିଷଲେପିତ ବାଣ ହାତରେ ଧରିଥିବା ବ୍ୟାଧଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇଥିବା ମୃଗ ପରି। ସେହି ଦୁଃଖର ପାପଭାଗ ଧନୀ ବନ୍ଧୁଙ୍କୁ ହିଁ ଲାଗେ।
Verse 28
पश्चादपि नरश्रेष्ठ तव तापो भविष्यति । तान् वा हतान् सुतान् वापि श्रुत्वा तदनुचिन्तय,नरश्रेष्ठ आप पाण्डवोंको अथवा अपने पुत्रोंको मारे गये सुनकर पीछे संताप करेंगे; अतः इस बातका पहले ही विचार कर लीजिये
ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପରେ ତୁମର ନିଶ୍ଚୟ ସନ୍ତାପ ହେବ—ପାଣ୍ଡବମାନେ ହତ ହେଲେ ବୋଲି ଶୁଣିଲେ ମଧ୍ୟ, କିମ୍ବା ନିଜ ପୁଅମାନେ ହତ ହେଲେ ବୋଲି ଶୁଣିଲେ ମଧ୍ୟ। ତେଣୁ ଏହାକୁ ପୂର୍ବରୁ ଭାବି ଦେଖ।
Verse 29
येन खट्वां समारूढ: परितप्येत कर्मणा | आदावेव न तत् कुर्यादश्रुवे जीविते सति,इस जीवनका कोई ठिकाना नहीं है अतएव जिस कर्मके करनेसे (अन्तमें) खटियापर बैठकर पछताना पड़े, उसको पहलेसे ही नहीं करना चाहिये
ଯେ କର୍ମ କଲେ ଶେଷରେ ଖଟିଆରେ ପଡ଼ି ପଶ୍ଚାତ୍ତାପରେ ଦୁଃଖିତ ହେବାକୁ ପଡ଼େ, ଜୀବନ ଅନିଶ୍ଚିତ ଥିବାବେଳେ ସେ କର୍ମ ଆରମ୍ଭରୁ ହିଁ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; କାରଣ ଏହି ମାନବଜୀବନର କୌଣସି ନିଶ୍ଚିତ ଠିକଣା ନାହିଁ।
Verse 30
न कक्षिन्नापनयते पुमानन्यत्र भार्गवात् । शेषसम्प्रतिपत्तिस्तु बुद्धिमत्स्वेव तिषतति,शुक्राचार्यके सिवा दूसरा कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जो नीतिका उल्लंघन नहीं करता; अतः जो बीत गया, सो बीत गया, शेष कर्तव्यका विचार (आप-जैसे) बुद्धिमान् पुरुषोंपर ही निर्भर है
ଭାର୍ଗବ (ଶୁକ୍ରାଚାର୍ଯ୍ୟ) ବ୍ୟତୀତ ନୀତି ଉଲ୍ଲଂଘନ ନ କରୁଥିବା ମଣିଷ କେହି ନାହିଁ; ତେଣୁ ଯାହା ହୋଇଗଲା ସେ ହୋଇଗଲା—ଏବେ ଶେଷ କର୍ତ୍ତବ୍ୟର ବିଚାର ଆପଣଙ୍କ ପରି ବୁଦ୍ଧିମାନଙ୍କ ଉପରେ ହିଁ ନିର୍ଭର କରେ।
Verse 31
दुर्योधनेन यद्येतत् पापं तेषु पुराकृतम् त्वया तत् कुलवृद्धेन प्रत्यानेयं नरेश्वर,नरेश्वर! दुर्योधनने पहले यदि पाण्डवोंके प्रति यह अपराध किया है तो आप इस कुलमें बड़े-बूढ़े हैं; आपके द्वारा उसका मार्जन हो जाना चाहिये
ନରେଶ୍ୱର! ଯଦି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ପୂର୍ବେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଏହି ପାପ କରିଥାଏ, ତେବେ ଆପଣ ଏହି କୁଳର ବୃଦ୍ଧ; ଆପଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ତାହାର ପ୍ରତିକାର ଓ ସଂଶୋଧନ ହେବା ଉଚିତ୍।
Verse 32
तांस्त्वं पदे प्रतिष्ठाप्प लोके विगतकल्मष: । भविष्यसि नरश्रेष्ठ पूजनीयो मनीषिणाम्,नरश्रेष्ठ॒ यदि आप उनको राजपदपर स्थापित कर देंगे तो संसारमें आपका कलंक धुल जायगा और आप बुद्धिमान् पुरुषोंके माननीय हो जायँगे
ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯଦି ଆପଣ ସେମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ରାଜପଦରେ ପୁନଃ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରିଦେବେ, ତେବେ ଲୋକମଧ୍ୟରେ ଆପଣଙ୍କ କଳଙ୍କ ମିଟିଯିବ ଏବଂ ଆପଣ ବୁଦ୍ଧିମାନମାନଙ୍କ ପାଖରେ ପୂଜ୍ୟ ହେବେ।
Verse 33
सुव्याहृतानि धीराणां फलत: परिचिन्त्य यः । अध्यवस्यति कार्येषु चिरं यशसि तिष्ठति,जो धीर पुरुषोंके वचनोंके परिणामपर विचार करके उन्हें कार्यरूपमें परिणत करता है, वह चिरकालतक यशका भागी बना रहता है
ଯେ ଧୀର ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ସୁବଚନର ଫଳକୁ ବିଚାର କରି ତାହାକୁ କାର୍ଯ୍ୟରୂପ ଦେଇ ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟରେ କାମ କରେ, ସେ ଦୀର୍ଘକାଳ ଯଶରେ ଅବସ୍ଥିତ ରହେ।
Verse 34
असम्यगुपयुक्तं हि ज्ञानं सुकुशलैरपि । उपलभ्यं चाविदितं विदितं चाननुछितम्,अत्यन्त कुशल दिद्वानोंके द्वारा भी उपदेश किया हुआ ज्ञान व्यर्थ ही है, यदि उससे कर्तव्यका ज्ञान न हुआ अथवा ज्ञान होनेपर भी उसका अनुष्ठान न हुआ
ବିଦୁର କହିଲେ—ଅତ୍ୟନ୍ତ କୁଶଳ ଓ ପ୍ରବୀଣ ଲୋକମାନେ ଶିଖାଇଥିବା ଜ୍ଞାନ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟର୍ଥ ହୋଇଯାଏ, ଯଦି ତାହା ସମ୍ୟକ୍ ଭାବେ ପ୍ରୟୋଗ ନହୁଏ—ପାଇଲେ ମଧ୍ୟ ଠିକ୍ ଭାବେ ବୁଝା ନହୁଏ, କିମ୍ବା ବୁଝିଲେ ମଧ୍ୟ ଆଚରଣରେ ନ ଆଣାଯାଏ। ଧର୍ମବିଷୟରେ ଉପଦେଶ ତେବେ ମାତ୍ର ମୂଲ୍ୟବାନ, ଯେତେବେଳେ ତାହା କର୍ତ୍ତବ୍ୟର ସ୍ପଷ୍ଟ ବିବେକ ଦେଇ, ଜଣା ସତ୍ୟକୁ ଶିଷ୍ଟ ଭାବେ ଅନୁଷ୍ଠାନ କରାଏ।
Verse 35
पापोदयफल विद्वान् यो नारभति वर्धते । यस्तु पूर्वकृतं पापमविमृश्यानुवर्तते । अगाधपड़के दुर्मेधा विषमे विनिपात्यते,जो विद्वान् पापरूप फल देनेवाले कर्मोंका आरम्भ नहीं करता, वह बढ़ता है; किंतु जो पूर्वमें किये हुए पापोंका विचार न करके उन्हींका अनुसरण करता है, वह खोटी बुद्धिवाला मनुष्य अगाध कीचड़से भरे हुए घोर नरकमें गिराया जाता है
ବିଦୁର କହନ୍ତି—ଯେ ଜ୍ଞାନୀ ପାପଫଳଦାୟୀ କର୍ମର ଆରମ୍ଭ କରେ ନାହିଁ, ସେ ଉନ୍ନତି କରେ; କିନ୍ତୁ ଯେ ପୂର୍ବକୃତ ପାପକୁ ବିଚାର ନକରି ସେହି ପଥକୁ ଅନୁସରଣ କରେ, ସେ ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ମନୁଷ୍ୟ ଅଗାଧ କାଦୁଆ ପରି ଭୟଙ୍କର, ବିଷମ ଗର୍ତ୍ତରେ ପତିତ ହୁଏ।
Verse 36
मन्त्रभेदस्य षट् प्राज्ञो द्वाराणीमानि लक्षयेत् अर्थसंततिकामश्न रक्षेदेतानि नित्यश:,बुद्धिमान् पुरुष मन्त्रभेदके इन छः द्वारोंको जाने और धनको रक्षित रखनेकी इच्छासे इन्हें सदा बंद रखे--मादक वस्तुओंका सेवन, निद्रा, आवश्यक बातोंकी जानकारी न रखना, अपने नेत्र-मुख आदिका विकार, दुष्ट मन्त्रियोंपर विश्वास और कार्यमें अकुशल दूतपर भी भरोसा रखना
ବିଦୁର କହିଲେ—ମନ୍ତ୍ରଭେଦ ହେବାର ଏହି ଛଅଟି ‘ଦ୍ୱାର’ ପ୍ରାଜ୍ଞ ପୁରୁଷ ଜାଣିବା ଉଚିତ; ଧନ-ସମ୍ପଦର ରକ୍ଷା ଓ ବୃଦ୍ଧି ଇଚ୍ଛା କରି ସେଗୁଡ଼ିକୁ ସଦା ବନ୍ଦ ରଖିବା ଉଚିତ—ମଦ/ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟ ସେବନ, ଅତିନିଦ୍ରା/ଅଲସତା, ଜାଣିବା ଦରକାରି କଥାର ଅଜ୍ଞାନ, ଚକ୍ଷୁ-ମୁଖ ଆଦିର ସ୍ୱଭାବଜନ୍ୟ ବିକାରରେ ସଙ୍କେତ ପ୍ରକାଶ, ଦୁଷ୍ଟ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଉପରେ ଭରସା, ଏବଂ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଅକୁଶଳ ଦୂତ ଉପରେ ନିର୍ଭରତା।
Verse 37
मर्द स्वप्नमविज्ञानमाकारं चात्मसम्भवम् | दुष्टामात्येषु विश्रम्भं दूताच्चाकुशलादपि,बुद्धिमान् पुरुष मन्त्रभेदके इन छः द्वारोंको जाने और धनको रक्षित रखनेकी इच्छासे इन्हें सदा बंद रखे--मादक वस्तुओंका सेवन, निद्रा, आवश्यक बातोंकी जानकारी न रखना, अपने नेत्र-मुख आदिका विकार, दुष्ट मन्त्रियोंपर विश्वास और कार्यमें अकुशल दूतपर भी भरोसा रखना
ବିଦୁର କହିଲେ—ଧନ ରକ୍ଷା କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଥିବା ପ୍ରାଜ୍ଞ ମନୁଷ୍ୟ ନାଶର ଏହି ଛଅ ଦ୍ୱାରକୁ ଦୃଢ଼ଭାବେ ବନ୍ଦ ରଖୁ: ମାଦକ ଦ୍ରବ୍ୟ ସେବନ, ଅତିନିଦ୍ରା, ଆବଶ୍ୟକ ଜ୍ଞାନର ଅଭାବ, ନିଜ ସ୍ୱଭାବରୁ ଜନ୍ମିତ ଚକ୍ଷୁ-ମୁଖାଦିର ବିକାରରେ ସଙ୍କେତ ପ୍ରକାଶ, ଦୁଷ୍ଟ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଉପରେ ଭରସା, ଏବଂ ଅଯୋଗ୍ୟ ଦୂତ ଉପରେ ନିର୍ଭରତା।
Verse 38
द्वाराण्येतानि यो ज्ञात्वा संवणोति सदा नृप । त्रिवर्गांचरणे युक्त: स शत्रूनधितिष्ठति,राजन! जो इन द्वारोंको जानकर सदा बंद किये रहता है, वह अर्थ, धर्म और कामके सेवनमें लगा रहकर शत्रुओंको वशमें कर लेता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଯେ ଏହି ଦ୍ୱାରଗୁଡ଼ିକୁ ଜାଣି ସଦା ବନ୍ଦ ରଖେ, ଏବଂ ଧର୍ମ-ଅର୍ଥ-କାମ—ଏହି ତ୍ରିବର୍ଗର ସମ୍ୟକ୍ ଆଚରଣରେ ନିୟମିତ ରହେ, ସେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ବଶ କରେ।
Verse 39
न वै श्रुतमविज्ञाय वृद्धाननुपसेव्य वा । धर्मार्थी वेदितुं शक्यौ बृहस्पतिसमैरपि,बृहस्पतिके समान मनुष्य भी शास्त्रज्ञान अथवा वृद्धोंकी सेवा किये बिना धर्म और अर्थका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये एकोनचत्वारिंशो5ध्याय:
ବିଦୁର କହନ୍ତି—ଶାସ୍ତ୍ର ଓ ଉପଦେଶରୁ ଶୁଣିଥିବା କଥାକୁ ପ୍ରଥମେ ଭଲଭାବେ ବୁଝିନଥାଇ, ଏବଂ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ସେବା କରି ତାଙ୍କଠାରୁ ଶିକ୍ଷା ନ ନେଇ, ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ଯଥାର୍ଥ ଜ୍ଞାନ ମିଳେ ନାହିଁ; ବୃହସ୍ପତି ସମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 40
नष्ट समुद्रे पतितं नष्टं वाक्यमशृण्वति । अनात्मनि श्रुतं नष्टं नष्ट हुतमनग्निकम्,समुद्रमें गिरी हुई वस्तु विनाशको प्राप्त हो जाती है; जो सुनता नहीं, उससे कही हुई बात भी विनष्ट हो जाती है; अजितेन्द्रिय पुरुषका शास्त्रज्ञान और राखमें किया हुआ हवन भी नष्ट ही है
ସମୁଦ୍ରରେ ପଡ଼ିଥିବା ବସ୍ତୁ ନଷ୍ଟ ହୁଏ; ଯେ ଶୁଣେ ନାହିଁ, ତାହା ପାଇଁ କହିଥିବା କଥା ମଧ୍ୟ ନଷ୍ଟ; ଇନ୍ଦ୍ରିୟଜୟ ନଥିବା ଲୋକ ପାଇଁ ଶାସ୍ତ୍ରଶ୍ରବଣ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟର୍ଥ; ଏବଂ ଅଗ୍ନି ବିନା କରା ହୋମ ମଧ୍ୟ ନିଷ୍ଫଳ।
Verse 41
मत्या परीक्ष्य मेधावी बुद्धया सम्पाद्य चासकृत् । श्र॒ुत्वा दृष्टवाथ विज्ञाय प्राज्ञैमैत्रीं समाचरेत्,बुद्धिमान् पुरुष बुद्धिसे जाँचकर अपने अनुभवसे बारंबार उनकी योग्यताका निश्चय करे; फिर दूसरोंसे सुनकर और स्वयं देखकर भलीभाँति विचार करके विद्वानोंके साथ मित्रता करे
ବୁଦ୍ଧିମାନ ଲୋକ ପ୍ରଥମେ ବିବେକରେ ପରୀକ୍ଷା କରି, ବୁଦ୍ଧିରେ ପୁନଃପୁନଃ ବିଚାର କରି ନିଶ୍ଚୟ କରୁ; ତାପରେ ଭରସାଯୋଗ୍ୟ ଲୋକଙ୍କଠାରୁ ଶୁଣି, ନିଜେ ଦେଖି, ସତ୍ୟ ଜାଣି, ପ୍ରାଜ୍ଞମାନଙ୍କ ସହ ମୈତ୍ରୀ କରୁ।
Verse 42
अकीर्ति विनयो हन्ति हन्त्यनर्थ पराक्रम: । हन्ति नित्यं क्षमा क्रोधमाचारो हन्त्यलक्षणम्
ବିନୟ ଅପକୀର୍ତ୍ତିକୁ ନାଶ କରେ; ପରାକ୍ରମ ଅନର୍ଥକୁ ଦୂର କରେ; କ୍ଷମା ସଦା କ୍ରୋଧକୁ ନିବାଏ; ଏବଂ ସଦାଚାର ଅଶୁଭ ଲକ୍ଷଣକୁ ନାଶ କରେ।
Verse 43
विनयभाव अपयशका नाश करता है, पराक्रम अनर्थको दूर करता है, क्षमा सदा ही क्रोधका नाश करती है और सदाचार कुलक्षणका अन्त करता है ।। परिच्छदेन क्षेत्रेण वेश्मना परिचर्यया । परीक्षेत कुलं राजन् भोजनाच्छादनेन च,राजन! नाना प्रकारके परिच्छद-, माता, घर, सेवा-शुश्रूषा और भोजन तथा वस्त्रके द्वारा कुलकी परीक्षा करे
ରାଜନ! ପରିଚ୍ଛଦ-ସାମଗ୍ରୀ, କ୍ଷେତ୍ର-ଭୂମି, ଗୃହ, ସେବା-ଶୁଶ୍ରୂଷା, ଏବଂ ଭୋଜନ ଓ ବସ୍ତ୍ର—ଏହି ସବୁ ଦ୍ୱାରା କୁଳକୁ ପରୀକ୍ଷା କରିବା ଉଚିତ।
Verse 44
उपस्थितस्य कामस्य प्रतिवादो न विद्यते । अपि निर्मुक्तदेहस्य कामरक्तस्य कि पुन:,देहाभिमानसे रहित पुरुषके पास भी यदि न्याय-युक्त पदार्थ स्वतः उपस्थित हो तो वह उसका विरोध नहीं करता, फिर कामासक्त मनुष्यके लिये तो कहना ही क्या है?
କାମ୍ୟ ବସ୍ତୁ ନିଜେ ସମ୍ମୁଖରେ ଆସିଲେ ତାହାର ପ୍ରତିବାଦ ପ୍ରାୟ ମିଳେ ନାହିଁ। ଦେହାଭିମାନମୁକ୍ତ ପୁରୁଷ ମଧ୍ୟ ଯାହା ସ୍ୱତଃ ଆସେ ତାହାକୁ ଅଟକାଏ ନାହିଁ—ତେବେ କାମରାଗେ ଦଗ୍ଧ ମନୁଷ୍ୟ ବିଷୟରେ କ’ଣ କହିବା?
Verse 45
प्राज्ञोपसेविन वैद्यं धार्मिकं प्रियदर्शनम् । मित्रवन्तं सुवाक्यं च सुहृदं परिपालयेत्,जो दविद्वानोंकी सेवामें रहनेवाला, वैद्य, धार्मिक, देखनेमें सुन्दर, मित्रोंसे युक्त तथा मधुरभाषी हो, ऐसे सुहृदकी सर्वथा रक्षा करनी चाहिये
ଯେ ଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କ ସେବା-ସଙ୍ଗତିରେ ରହେ, ବୈଦ୍ୟ ପରି କୁଶଳ, ଧର୍ମନିଷ୍ଠ, ଦର୍ଶନେ ପ୍ରିୟ, ମିତ୍ରସମ୍ପନ୍ନ ଏବଂ ମଧୁର-ଯୁକ୍ତ ବାକ୍ୟ କହେ—ଏମିତି ସୁହୃଦଙ୍କୁ ଯତ୍ନପୂର୍ବକ ରକ୍ଷା ଓ ପାଳନ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 46
दुष्कुलीन: कुलीनो वा मर्यादां यो न लड्घयेत् । धमपिक्षी मृदुर्हीमान् स कुलीनशताद् वर:,अधम कुलनमें उत्पन्न हुआ हो या उत्तम कुलमें--जो मर्यादाका उल्लंघन नहीं करता, धर्मकी अपेक्षा रखता है, कोमल स्वभाववाला तथा सलज्ज है, वह सैकड़ों कुलीनोंसे बढ़कर है
ନୀଚ କୁଳରେ ଜନ୍ମ ହେଉ କି ଉତ୍ତମ କୁଳରେ—ଯେ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଲଙ୍ଘନ କରେ ନାହିଁ, ଧର୍ମକୁ ମାନଦଣ୍ଡ କରେ, ସ୍ୱଭାବରେ ମୃଦୁ ଏବଂ ଲଜ୍ଜାଶୀଳ—ସେ କେବଳ କୁଳୀନତାର ନାମଧାରୀ ଶତଜନଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 47
ययोश्षित्तेन वा चित्तं निभृतं निभृतेन वा । समेति प्रज्ञया प्रज्ञा तयोमैत्री न जीय॑ति,जिन दो मनुष्योंका चित्तसे चित्र, गुप्त रहस्यसे गुप्त रहस्य और बुद्धिसे बुद्धि मिल जाती है, उनकी मित्रता कभी नष्ट नहीं होती
ଯେତେବେଳେ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ଚିତ୍ତ ଚିତ୍ତ ସହ ମିଳେ, ଗୁପ୍ତ କଥା ଗୁପ୍ତ କଥାକୁ ଉତ୍ତର ଦିଏ, ଏବଂ ପ୍ରଜ୍ଞା ପ୍ରଜ୍ଞା ସହ ସମ୍ମିଳିତ ହୁଏ—ତେବେ ସେମାନଙ୍କ ମୈତ୍ରୀ କେବେ ନଷ୍ଟ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 48
दुर्बुद्धिमकृतप्रज्ञं छन्न॑ कूपं तृणैरिव । विवर्जयीत मेधावी तस्मिन् मैत्री प्रणश्यति,मेधावी पुरुषको चाहिये कि तृणसे ढँके हुए कुएँकी भाँति दुर्बुद्धि एवं विचारशक्तिसे हीन पुरुषका परित्याग कर दे; क्योंकि उसके साथ की हुई मित्रता नष्ट हो जाती है
ମେଧାବୀ ପୁରୁଷ ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ଓ ପ୍ରଜ୍ଞାହୀନ ଲୋକକୁ ତୃଣରେ ଢାକା କୂଆ ପରି ଏଡ଼ାଇବା ଉଚିତ; କାରଣ ତାଙ୍କ ସହ କରା ମୈତ୍ରୀ ଶେଷେ ନଷ୍ଟ ହୁଏ।
Verse 49
अवलिप्तेषु मूर्खेषु रौद्रसाहसिकेषु च । तथैवापेतधर्मेषु न मैत्रीमाचरेद् बुध:,विद्वान पुरुषको उचित है कि अभिमानी, मूर्ख, क्रोधी, साहसिक और धर्महीन पुरुषोंके साथ मित्रता न करे
ଅହଂକାରୀ ଓ ମୂର୍ଖ, ରୂଢ଼-କ୍ରୋଧୀ ଓ ଦୁସ୍ସାହସୀ, ଏବଂ ଧର୍ମଚ୍ୟୁତ ଲୋକମାନଙ୍କ ସହିତ ବୁଦ୍ଧିମାନ ବ୍ୟକ୍ତି ମିତ୍ରତା କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 50
कृतज्ञं धार्मिक सत्यमक्षुद्रं दृढभक्तिकम् । जितेन्द्रियं स्थितं स्थित्यां मित्रमत्यागि चेष्यते,मित्र तो ऐसा होना चाहिये, जो कृतज्ञ, धार्मिक, सत्यवादी, उदार, दृढ़ अनुराग रखनेवाला, जितेन्द्रिय, मर्यादाकं भीतर रहनेवाला और मैत्रीका त्याग न करनेवाला हो
ମିତ୍ର ଏମିତି ହେବା ଉଚିତ—ଯେ କୃତଜ୍ଞ, ଧାର୍ମିକ, ସତ୍ୟବାଦୀ, ଉଦାର, ଦୃଢ଼ ସ୍ନେହବାନ, ଇନ୍ଦ୍ରିୟଜୟୀ, ମର୍ଯ୍ୟାଦାରେ ସ୍ଥିତ ଏବଂ ମିତ୍ରତା ତ୍ୟାଗ ନ କରୁଥିବା ହେଉ।
Verse 51
इन्द्रियाणामनुत्सगों मृत्युनापि विशिष्यते । अत्यर्थ पुनरुत्सर्ग: सादयेद् दैवतान्यपि,इन्द्रियोंको सर्वधा रोक रखना तो मृत्युसे भी बढ़कर कठिन है और उन्हें बिलकुल खुली छोड़ देना देवताओंका भी नाश कर देता है
ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ସର୍ବଥା ଦମନ କରି ରଖିବା ମୃତ୍ୟୁଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ କଠିନ; କିନ୍ତୁ ସେମାନଙ୍କୁ ଅତ୍ୟଧିକ ଛାଡ଼ ଦେଲେ ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବିନାଶ କରେ।
Verse 52
मार्दवं सर्वभूतानामनसूया क्षमा धृति: । आयुष्याणि बुधा:ः प्राहुर्मित्राणां चाविमानना,सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति कोमलताका भाव, गुणोंमें दोष न देखना, क्षमा, धैर्य और मित्रोंका अपमान न करना--ये सब गुण आयुको बढ़ानेवाले हैं--ऐसा विद्वानूुलोग कहते हैं
ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ପ୍ରତି ମାର୍ଦ୍ଦବ, ଦୋଷ ଖୋଜିବାର ଅଭାବ, କ୍ଷମା, ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଏବଂ ମିତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଅପମାନ ନ କରିବା—ଏହି ଗୁଣମାନଙ୍କୁ ବୁଦ୍ଧିମାନମାନେ ଆୟୁ ବଢ଼ାଇବାଳା ବୋଲି କହିଛନ୍ତି।
Verse 53
अपनीतं सुनीतेन यो<र्थ प्रत्यानिनीषते । मतिमास्थाय सुदृढां तदकापुरुषव्रतम्,जो नष्ट हुए धनको स्थिर बुद्धिका आश्रय ले अच्छी नीतिसे पुनः लौटा लानेकी इच्छा करता है, वह वीर पुरुषोंका-सा आचरण करता है
ଯେ ବ୍ୟକ୍ତି ଦୃଢ଼ ବୁଦ୍ଧିକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ସୁନୀତି ଦ୍ୱାରା ହରାଇଥିବା ଧନକୁ ପୁନଃ ଫେରାଇ ଆଣିବାକୁ ଚାହେ, ସେ ଏକ ସତ୍ୟ ବୀର ପୁରୁଷଙ୍କ ଯୋଗ୍ୟ ବ୍ରତ-ଆଚରଣ କରେ।
Verse 54
आयत्यां प्रतिकारज्ञस्तदात्वे दृढनिश्चय: । अतीते कार्यशेषज्ञो नरो्र्थनन प्रहीयते,जो आनेवाले दुःखको रोकनेका उपाय जानता है, वर्तमानकालिक कर्तव्यके पालनमें दृढ़ निश्चय रखनेवाला है और अतीतकालमें जो कर्तव्य शेष रह गया है, उसे भी जानता है, वह मनुष्य कभी अर्थसे हीन नहीं होता
ଯେ ଆସନ୍ତା ଦୁଃଖକୁ ରୋକିବାର ଉପାୟ ଜାଣେ, ବର୍ତ୍ତମାନ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପାଳନରେ ଦୃଢ଼ନିଶ୍ଚୟୀ, ଏବଂ ଅତୀତରେ ଯେ କାର୍ଯ୍ୟ ଅବଶିଷ୍ଟ ରହିଛି ତାହା ମଧ୍ୟ ଜାଣେ—ସେ ପୁରୁଷ କେବେ ଅର୍ଥ-ସମୃଦ୍ଧିରୁ ବଞ୍ଚିତ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 55
कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते | तदेवापहरत्येनं तस्मात् कल्याणमाचरेत्,मनुष्य मन, वाणी और कर्मसे जिसका निरन्तर सेवन करता है, वह कार्य उस पुरुषको अपनी ओर खींच लेता है। इसलिये सदा कल्याणकारी कार्योंको ही करे
ମନ, ବାଣୀ ଓ କର୍ମରେ ମନୁଷ୍ୟ ଯାହାକୁ ନିରନ୍ତର ସେବନ କରେ, ସେଇ କାର୍ଯ୍ୟ ତାକୁ ନିଜ ଦିଗକୁ ଟାଣିନେଇଯାଏ; ତେଣୁ ସଦା କଲ୍ୟାଣକର କାର୍ଯ୍ୟ ହିଁ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 56
मड़लालम्भनं योग: श्रुतमुत्थानमार्जवम् | भूतिमेतानि कुर्वन्ति सतां चाभीक्षणदर्शनम्,मांगलिक पदार्थोका स्पर्श, चित्तवृत्तियोंका निरोध, शास्त्रका अभ्यास, उद्योगशीलता, सरलता और सत्पुरुषों-का बारंबार दर्शन--से सब कल्याणकारी हैं
ମଙ୍ଗଳକର ଆଶ୍ରୟ, ଯୋଗ (ସଂୟମ), ଶାସ୍ତ୍ର-ଶ୍ରବଣ/ଅଧ୍ୟୟନ, ଉଦ୍ୟମ, ସରଳତା—ଏବଂ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କର ପୁନଃପୁନଃ ଦର୍ଶନ; ଏସବୁ ଭୂତି (ସମୃଦ୍ଧି) ଦେଇଥାଏ।
Verse 57
अनिर्वेद: श्रियो मूलं लाभस्य च शुभस्य च | महान् भवत्यनिर्विण्ण: सुखं चानन्त्यमश्लुते,उद्योगमें लगे रहना--उससे विरक्त न होना धन, लाभ और कल्याणका मूल है। इसलिये उद्योग न छोड़नेवाला मनुष्य महान् हो जाता है और अनन्त सुखका उपभोग करता है
ନିରୁତ୍ସାହ ନ ହୋଇ ଉଦ୍ୟମରେ ଲାଗି ରହିବା—ଏହା ଧନ, ଲାଭ ଓ କଲ୍ୟାଣର ମୂଳ। ଯେ ହତାଶ ହୁଏ ନାହିଁ, ସେ ମହାନ୍ ହୁଏ ଏବଂ ଅନନ୍ତ ସୁଖ ପାଏ।
Verse 58
नातः श्रीमत्तरं किंचिदन््यत् पथ्यतमं मतम् । प्रभविष्णोर्यथा तात क्षमा सर्वत्र सर्वदा,तात समर्थ पुरुषके लिये सब जगह और सब समयमें क्षमाके समान हितकारक और अत्यन्त श्रीसम्पन्न बनानेवाला उपाय दूसरा नहीं माना गया है
ତାତ, ସମର୍ଥ ଓ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ ପୁରୁଷ ପାଇଁ—ମୋ ମତରେ—ସବୁଠାରେ ଓ ସବୁ ସମୟରେ କ୍ଷମା ପରି ହିତକର ଓ ଶ୍ରୀଦାୟକ ଅନ୍ୟ କିଛି ନାହିଁ।
Verse 59
क्षमेदशक्त: सर्वस्य शक्तिमान् धर्मकारणात् | अर्थानर्थों समौ यस्य तस्य नित्यं क्षमा हिता,जो शक्तिहीन है, वह तो सबपर क्षमा करे ही; जो शक्तिमान् है, वह भी धर्मके लिये क्षमा करे तथा जिसकी दृष्टिमें अर्थ और अनर्थ दोनों समान हैं, उसके लिये तो क्षमा सदा ही हितकारिणी होती है
ଯେ ଅଶକ୍ତ, ସେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ କ୍ଷମା କରୁ; ଯେ ଶକ୍ତିମାନ, ସେ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମର ନିମିତ୍ତେ କ୍ଷମା ଅବଲମ୍ବନ କରୁ। ଯାହାର ଦୃଷ୍ଟିରେ ଲାଭ-ହାନି ସମାନ, ତାହା ପାଇଁ କ୍ଷମା ସଦା ହିତକର।
Verse 60
यत् सुखं सेवमानो5पि धर्मार्थाभ्यां न हीयते । काम तदुपसेवेत न मूढव्रतमाचरेत्,जिस सुखका सेवन करते रहनेपर भी मनुष्य धर्म और अर्थसे भ्रष्ट नहीं होता, उसका यथेष्ट सेवन करे; किंतु मूढव्रत (निद्रा-प्रमादादिका सेवन) न करे
ଯେ ସୁଖ ଉପଭୋଗ କଲେ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ କ୍ଷୟ ହୁଏ ନାହିଁ, ସେହି ସୁଖକୁ ଯଥେଷ୍ଟ ଉପଭୋଗ କର; କିନ୍ତୁ ମୂଢବ୍ରତ—ଅତିନିଦ୍ରା, ପ୍ରମାଦ, ଅବଧାନହୀନତା—ଆଚରଣ କରନି।
Verse 61
दुःखार्तेषु प्रमत्तेषु नास्तिकेष्वलसेषु च । न श्रीर्वसत्यदान्तेषु ये चोत्साहविवर्जिता:,जो दुःखसे पीड़ित, प्रमादी, नास्तिक, आलसी, अजितेन्द्रिय और उत्साहरहित हैं, उनके यहाँ लक्ष्मीका वास नहीं होता
ଯେମାନେ ଦୁଃଖରେ ପୀଡିତ, ପ୍ରମାଦୀ, ନାସ୍ତିକ, ଆଳସୀ, ଇନ୍ଦ୍ରିୟଅସଂଯମୀ ଏବଂ ଉତ୍ସାହହୀନ—ସେମାନଙ୍କ ନିକଟେ ଲକ୍ଷ୍ମୀ ବାସ କରନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 62
आर्जवेन नर युक्तमार्जवात् सव्यपत्रपम् | अशक्तं मन्यमानास्तु धर्षयन्ति कुबुद्धयः,दुष्ट बुद्धिवाले लोग सरलतासे युक्त और सरलताके ही कारण लज्जाशील मनुष्यको अशक्त मानकर उसका तिरस्कार करते हैं
ସରଳତାରେ ଯୁକ୍ତ ମଣିଷ ସେହି ସରଳତାରୁ ଲଜ୍ଜାଶୀଳ ଓ ସଂଯମୀ ହୁଏ; କିନ୍ତୁ କୁବୁଦ୍ଧିମାନେ ତାହାକୁ ଦୁର୍ବଳତା ଭାବି ତାଙ୍କୁ ଅପମାନ ଓ ଦମନ କରନ୍ତି।
Verse 63
अत्यार्यमतिदातारमतिशूरमतिव्रतम् । प्रज्ञाभिमानिनं चैव श्रीर्भयान्नोपसर्पति,अत्यन्त श्रेष्ठ अतिशय दानी, अतीव शूरवीर, अधिक व्रत-नियमोंका पालन करनेवाले और बुद्धिके घमंडमें चूर रहनेवाले मनुष्यके पास लक्ष्मी भयके मारे नहीं जाती
ମଣିଷ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଅତିଦାତା, ଅତିଶୂର ଏବଂ ବ୍ରତ-ନିୟମରେ କଠୋର ହେଉଥିଲେ ମଧ୍ୟ—ଯଦି ସେ ନିଜ ପ୍ରଜ୍ଞାର ଅଭିମାନରେ ମତ୍ତ, ତେବେ ଭୟରୁ ଲକ୍ଷ୍ମୀ ତାଙ୍କୁ ନିକଟବର୍ତ୍ତୀ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 64
न चातिगुणवत्स्वेषा नात्यन्तं निर्गुणेषु च । नैषा गुणाम् कामयते नैर्गुण्यान्नानुरज्यते । उन्मत्ता गौरिवान्धा श्री: क्वचिदेवावतिष्ठते,लक्ष्मी न तो अत्यन्त गुणवानोंके पास रहती है और न बहुत निर्मुणोंक पास। यह न तो बहुत-से गुणोंको चाहती है और न गुणहीनताके प्रति ही अनुराग रखती है। उन्मत्त गौकी भाँति यह अन्धी लक्ष्मी कहीं-कहीं ही ठहरती है
ବିଦୁର କହନ୍ତି—ଲକ୍ଷ୍ମୀ ନ ଅତ୍ୟଧିକ ଗୁଣବାନଙ୍କ ପାଖରେ ମାତ୍ର ରହନ୍ତି, ନ ତ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିର୍ଗୁଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସଦାକାଳ ବସନ୍ତି। ସେ ନ ବହୁ ଗୁଣକୁ ମାତ୍ର ଚାହାନ୍ତି, ନ ଗୁଣହୀନତାକୁ ମାତ୍ର ଆସକ୍ତ ହୁଅନ୍ତି। ଉନ୍ମତ୍ତ ଅନ୍ଧ ଗାଈ ପରି ଏହି ଶ୍ରୀ କେବେ କେବେ କେଉଁଠି ମାତ୍ର ଥାଆନ୍ତି—ଅନିଶ୍ଚିତ ଭାବେ।
Verse 65
अन्निहोत्रफला वेदा: शीलवृत्तफलं श्रुवम् । रतिपुत्रफला नारी दत्तभुक्तफलं धनम्,वेदोंका फल है अग्निहोत्र करना, शास्त्राध्ययनका फल है सुशीलता और सदाचार, सत्रीका फल है रतिसुख और पुत्रकी प्राप्ति तथा धनका फल है दान और उपभोग
ବିଦୁର କହନ୍ତି—ବେଦର ଫଳ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର; ଶାସ୍ତ୍ରଶ୍ରବଣ-ଅଧ୍ୟୟନର ଫଳ ଶୀଳ ଓ ସଦାଚାର; ନାରୀର ଫଳ ଦାମ୍ପତ୍ୟସୁଖ ଓ ପୁତ୍ରଲାଭ; ଧନର ଫଳ ଦାନ ଓ ଯଥୋଚିତ ଭୋଗ।
Verse 66
अधर्मोपार्जितिरर्थर्य: करोत्यौर्ध्वदेहिकम् । न स तस्य फल प्रेत्य भुछुक्तेडर्थस्य दुरागमात्
ବିଦୁର କହନ୍ତି—ଅଧର୍ମରେ ଉପାର୍ଜିତ ଧନରେ ଔର୍ଧ୍ୱଦେହିକ (ପାରଲୌକିକ) କର୍ମ କରାଯାଇପାରେ; କିନ୍ତୁ ମୃତ୍ୟୁ ପରେ ସେ ତାହାର ସତ୍ୟ ଫଳ ଭୋଗ କରେନାହିଁ, କାରଣ ସେ ଧନ ଦୁଷ୍ଟ ପଥରୁ ଆସିଥାଏ।
Verse 67
जो अधर्मके द्वारा कमाये हुए धनसे पारलौकिक कर्म करता है, वह मरनेके पश्चात् उसके फलको नहीं पाता; क्योंकि उसका धन बुरे रास्तेसे आया होता है ।। कान्तारे वनदुर्गेषु कृच्छास्वापत्सु सम्भ्रमे । उद्यतेषु च शस्त्रेषु नास्ति सत्त्ववतां भयम्,घोर जंगलमें, दुर्गम मार्गमें, कठिन आपत्तिके समय, घबराहटमें और प्रहारके लिये शस्त्र उठे रहनेपर भी सत्त्व-सम्पन्न अर्थात् आत्मबलसे युक्त पुरुषोंको भय नहीं होता
ବିଦୁର କହନ୍ତି—ଭୟଙ୍କର ଅରଣ୍ୟରେ, ଦୁର୍ଗମ ବନପଥରେ, କଠିନ ଆପଦରେ, ହଠାତ୍ ଭ୍ରମ-ସମ୍ଭ୍ରମରେ, ଏବଂ ଆଘାତ ପାଇଁ ଶସ୍ତ୍ର ଉଠିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସତ୍ତ୍ୱବାନ (ଆତ୍ମବଳଯୁକ୍ତ) ପୁରୁଷଙ୍କୁ ଭୟ ନାହିଁ।
Verse 68
उत्थान संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृति: स्मृति: । समीक्ष्य च समारम्भो विद्धि मूलं भवस्य तु,उद्योग, संयम, दक्षता, सावधानी, धैर्य, स्मृति और सोच-विचारकर कार्यारम्भ करना-- इन्हें उन्नतिका मूल-मन्त्र समझिये
ବିଦୁର କହନ୍ତି—ଉତ୍ଥାନ (ଉଦ୍ୟମ), ସଂଯମ, ଦକ୍ଷତା, ଅପ୍ରମାଦ (ସାବଧାନତା), ଧୃତି (ଧୈର୍ଯ୍ୟ), ସ୍ମୃତି, ଏବଂ ସମୀକ୍ଷା କରି କାର୍ଯ୍ୟାରମ୍ଭ—ଏହିମାନଙ୍କୁ ହିଁ କଲ୍ୟାଣର ମୂଳ ବୋଲି ଜାଣ।
Verse 69
तपो बलं तापसानां ब्रह्म ब्रह्म॒विदां बलम् । हिंसा बलमसाधूनां क्षमा गुणवतां बलम्,तपस्वियोंका बल है तप, वेदवेत्ताओंका बल है वेद, पापियोंका बल है हिंसा और गुणवानोंका बल है क्षमा
ତପସ୍ବୀମାନଙ୍କର ବଳ ହେଉଛି ତପ; ବ୍ରହ୍ମବିଦମାନଙ୍କର ବଳ ହେଉଛି ବ୍ରହ୍ମଜ୍ଞାନ (ବେଦଜ୍ଞାନ); ଅସାଧୁମାନଙ୍କର ବଳ ହିଂସା, ଗୁଣବାନମାନଙ୍କର ବଳ କ୍ଷମା।
Verse 70
अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूल फलं पय: । हविर्त्राह्मणकाम्या च गुरोरवचनमौषधम्,जल, मूल, फल, दूध, घी, ब्राह्मणकी इच्छापूर्ति, गुरुका वचन और औषध--ये आठ व्रतके नाशक नहीं होते
ଏହି ଆଠଟି ବସ୍ତୁ ବ୍ରତକୁ ନଷ୍ଟ କରେନାହିଁ—ଜଳ, କନ୍ଦ-ମୂଳ, ଫଳ, ଦୁଧ, ହବି (ଘିଅ), ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କର ଯଥୋଚିତ କାମନା ପୂରଣ, ଗୁରୁବଚନ ପାଳନ, ଏବଂ ଔଷଧ।
Verse 71
न तत् परस्य संदध्यात् प्रतिकूल यदात्मन: । संग्रहेणैष धर्म: स्थात् कामादन्य: प्रवर्तते,जो अपने प्रतिकूल जान पड़े, उसे दूसरोंके प्रति भी न करे। थोड़ेमें धर्मका यही स्वरूप है। इसके विपरीत जिसमें कामनासे प्रवृत्ति होती है, वह तो अधर्म है
ଯାହା ନିଜ ପାଇଁ ପ୍ରତିକୂଳ, ତାହା ଅନ୍ୟ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ସଂକ୍ଷେପରେ ଏହିଁ ଧର୍ମ; ଏହାର ବିପରୀତ କାମନାପ୍ରେରିତ ଆଚରଣ ଅଧର୍ମ।
Verse 72
अक्रोधेन जयेत् क्रोधमसाधुं साधुना जयेत् । जयेत् कदर्य दानेन जयेत् सत्येन चानृतम्,अक्रोधसे क्रोधको जीते, असाधुको सद-व्यवहारसे वशमें करे, कृपणको दानसे जीते और झूठ-पर सत्यसे विजय प्राप्त करे
ଅକ୍ରୋଧରେ କ୍ରୋଧକୁ ଜିତ; ସଦାଚାରରେ ଅସାଧୁକୁ ବଶ କର; ଦାନରେ କୃପଣକୁ ଜିତ; ସତ୍ୟରେ ଅସତ୍ୟକୁ ପରାଜିତ କର।
Verse 73
स्त्रीधूर्तकेडलसे भीरौ चण्डे पुरुषमानिनि । चौरे कृतघ्ने विश्वासो न कार्यो न च नास्तिके,सत्रीलम्पट, आलसी, डरपोक, क्रोधी, पुरुषत्वके अभिमानी, चोर, कृतघ्न और नास्तिकका विश्वास नहीं करना चाहिये
ସ୍ତ୍ରୀଲମ୍ପଟ-ଧୂର୍ତ୍ତ, ଆଳସୀ, ଭୀରୁ, କ୍ରୋଧୀ, ପୁରୁଷତ୍ୱାଭିମାନୀ, ଚୋର, କୃତଘ୍ନ ଓ ନାସ୍ତିକ—ଏମାନଙ୍କ ଉପରେ ବିଶ୍ୱାସ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।
Verse 74
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन: । चत्वारि सम्प्रवर्धन्ते कीर्तिरायुर्यशो बलम्,जो नित्य गुरुजनोंको प्रणाम करता है और वृद्ध पुरुषोंकी सेवामें लगा रहता है, उसकी कीर्ति, आयु, यश और बल--ये चारों बढ़ते हैं
ଯେ ନିତ୍ୟ ଗୁରୁଜନଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରେ ଏବଂ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ସେବାରେ ଲଗ୍ନ ରହେ, ତାହାର ଚାରିଟି ଆଶୀର୍ବାଦ ବଢ଼େ—କୀର୍ତ୍ତି, ଆୟୁ, ଯଶ ଓ ବଳ।
Verse 75
अतिकक्लेशेन ये<र्था: स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण वा । अरेवा प्रणिपातेन मा सम तेषु मन: कृथा:,जो धन अत्यन्त क्लेश उठानेसे, धर्मका उल्लंघन करनेसे अथवा शत्रुके सामने सिर झुकानेसे प्राप्त होता हो, उसमें आप मन न लगाइये
ଅତ୍ୟଧିକ କ୍ଲେଶ ସହି, ଧର୍ମ ଉଲ୍ଲଂଘନ କରି, କିମ୍ବା ଶତ୍ରୁ ସମ୍ମୁଖେ ମୁଣ୍ଡ ନମାଇ ଯେ ଲାଭ ମିଳେ—ସେଥିରେ ମନ ଲଗାଅ ନାହିଁ।
Verse 76
अविद्य: पुरुष: शोच्य: शोच्यं मैथुनमप्रजम् । निराहारा: प्रजा: शोच्या: शोच्य॑ राष्ट्रमराजकम्,विद्याहीन पुरुष, संतानोत्पत्तिरहित स्त्रीप्रसंग, आहार न पानेवाली प्रजा और बिना राजाके राष्ट्रके लिये शोक करना चाहिये
ଅବିଦ୍ୟାବାନ୍ ପୁରୁଷ ଶୋଚନୀୟ; ସନ୍ତାନ ନ ଦେଇଥିବା ମୈଥୁନ ମଧ୍ୟ ଶୋଚନୀୟ। ଆହାରବଞ୍ଚିତ ପ୍ରଜା ଶୋଚନୀୟ; ଏବଂ ରାଜାବିହୀନ ରାଷ୍ଟ୍ର ମଧ୍ୟ ଶୋଚନୀୟ।
Verse 77
अध्वा जरा देहवतां पर्वतानां जलं जरा । असम्भोगो जरा स्त्रीणां वाक्शल्यं मनसो जरा,अधिक राह चलना देहधारियोंके लिये दुःखरूप बुढ़ापा है, बराबर पानी गिरना पर्वतोंका बुढ़ापा है, सम्भोगसे वंचित रहनेका दु:ख स्त्रियोंके लिये बुढ़ापा है और वचन- रूपी बाणोंका आघात मनके लिये बुढ़ापा है
ଦେହଧାରୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଦୀର୍ଘ ପଥଯାତ୍ରା ହିଁ ଜରା; ପର୍ବତମାନଙ୍କ ପାଇଁ ନିରନ୍ତର ଜଳପାତ ହିଁ ଜରା। ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସମ୍ଭୋଗବଞ୍ଚନା ଜରା; ଏବଂ ମନ ପାଇଁ କଠୋର ବାକ୍ୟବାଣର ଆଘାତ ଜରା।
Verse 78
अनाम्नायमला वेदा ब्राह्मणस्याव्रतं मलम्,अभ्यास न करना वेदोंका मल है; ब्राह्मगोचित नियमोंका पालन न करना ब्राह्मणका मल है, बाह्नलीकदेश (बलखबुखारा) पृथ्वीका मल है तथा झूठ बोलना पुरुषका मल है, क्रीड़ा एवं हास-परिहासकी उत्सुकता पतिव्रता स्त्रीका मल है और पतिके बिना परदेशमें रहना स्त्रीमात्रका मल है
ବେଦର ଅଧ୍ୟୟନ-ଅଭ୍ୟାସ ନ କରିବା ବେଦର ମଳ; ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ପାଇଁ ବ୍ରତ-ନିୟମ ନ ପାଳନ କରିବା ମଳ। ବାହ୍ଲୀକ ଦେଶ ପୃଥିବୀର ମଳ; ଏବଂ ମିଥ୍ୟା କହିବା ପୁରୁଷର ମଳ। ପତିବ୍ରତା ସ୍ତ୍ରୀ ପାଇଁ କ୍ରୀଡ଼ା ଓ ହାସ-ପରିହାସରେ ଅତ୍ୟଧିକ ଆସକ୍ତି ମଳ; ଏବଂ ପତି ବିନା ପରଦେଶରେ ବାସ କରିବା ସ୍ତ୍ରୀମାତ୍ରର ମଳ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି।
Verse 79
मलं पृथिव्या बाह्लीका: पुरुषस्यानृतं मलम् । कौतूहलमला साध्वी विप्रवासमला: स्त्रिय:,अभ्यास न करना वेदोंका मल है; ब्राह्मगोचित नियमोंका पालन न करना ब्राह्मणका मल है, बाह्नलीकदेश (बलखबुखारा) पृथ्वीका मल है तथा झूठ बोलना पुरुषका मल है, क्रीड़ा एवं हास-परिहासकी उत्सुकता पतिव्रता स्त्रीका मल है और पतिके बिना परदेशमें रहना स्त्रीमात्रका मल है
ପୃଥିବୀର ମଳ ବାହ୍ଲୀକମାନେ; ପୁରୁଷର ମଳ ଅସତ୍ୟ। ପତିବ୍ରତା ସାଧ୍ବୀ ସ୍ତ୍ରୀର ମଳ କୌତୁହଳ ଓ କ୍ରୀଡା-ପରିହାସର ଆସକ୍ତି; ଏବଂ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କର ମଳ ପତି ବିନା ପରଦେଶରେ ବସିବା ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି।
Verse 80
सुवर्णस्य मल॑ रूप्यं रूप्यस्यापि मल त्रपु । ज्ञेयं त्रपुमलं सीसं सीसस्यापि मलं मलम्,सोनेका मल है चाँदी, चाँदीका मल है राँगा, राँगेका मल है सीसा और सीसेका भी मल है मैलापन
ସୁବର୍ଣ୍ଣର ମଳ ରୂପା; ରୂପାର ମଳ ଟିନ (ତ୍ରପୁ)। ଟିନର ମଳ ସୀସା ବୋଲି ଜାଣ; ଏବଂ ସୀସାର ମଳ ମଧ୍ୟ—ମଳିନତା ହିଁ।
Verse 81
न स्वप्लेन जयेन्निद्रांन कामेन जयेत् स्त्रिय: । नेन्धनेन जयेदर्ग्निं न पानेन सुरां जयेत्,अधिक सोकर नींदको जीतनेका प्रयास न करे, कामोपभोगके द्वारा स्त्रीको जीतनेकी इच्छा न करे, लकड़ी डालकर आगको जीतनेकी आशा न रखे और अधिक पीकर मदिरा पीनेकी आदतको जीतनेका प्रयास न करे
ଅଳ୍ପ ଶୋଇ ନିଦ୍ରାକୁ ଜିତିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; କାମଭୋଗରେ ସ୍ତ୍ରୀକୁ ଜିତିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ଇନ୍ଧନ ଦେଇ ଅଗ୍ନିକୁ ଜିତିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; ଅଧିକ ପିଇ ସୁରାସକ୍ତିକୁ ଜିତିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।
Verse 82
यस्य दानजित मित्र शत्रवो युधि निर्जिता: । अन्नपानजिता दारा: सफलं तस्य जीवितम्,जिसका मित्र धन-दानके द्वारा वशमें आ चुका है, शत्रु युद्धमें जीत लिये गये हैं और स्त्रियाँ खान-पानके द्वारा वशीभूत हो चुकी हैं, उसका जीवन सफल है अर्थात् सुखमय है
ଯାହାର ମିତ୍ରମାନେ ଦାନଦ୍ୱାରା ଜିତାଯାଇଛନ୍ତି, ଶତ୍ରୁମାନେ ଯୁଦ୍ଧରେ ପରାଜିତ, ଏବଂ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ଅନ୍ନପାନରେ ବଶୀଭୂତ—ତାହାର ଜୀବନ ସଫଳ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 83
सहस्रिणो5पि जीवन्ति जीवन्ति शतिनस्तथा । धृतराष्ट्र विमुज्चेच्छां न कथज्चिन्न जीव्यते,जिनके पास हजार (रुपये) हैं, वे भी जीवित हैं तथा जिनके पास सौ (रुपये) हैं, वे भी जीवित हैं; अतः महाराज धृतराष्ट्र!् आप अधिकका लोभ छोड़ दीजिये, इससे भी किसी तरह जीवन नहीं रहेगा, यह बात नहीं है
ହଜାର ଥିବା ଲୋକ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚେ, ଶତ ଥିବା ଲୋକ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ବଞ୍ଚେ। ତେଣୁ, ହେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ଅଧିକ ଲୋଭ ଛାଡ଼; ଅଧିକ ନ ଥିଲେ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ବଞ୍ଚିହେବ ନାହିଁ—ଏହା ସତ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 84
यत् पृथिव्यां ब्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय: । नालमेकस्य तत् सर्वमिति पश्यन् न मुहृति,इस पृथ्वीपर जो भी धान, जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब-के-सब एक पुरुषके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं (अर्थात् उनसे किसीकी भी तृप्ति नहीं हो सकती)। ऐसा विचार करनेवाला मनुष्य मोहमें नहीं पड़ता
ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଯେତେ ଧାନ-ଯବ, ସୁନା, ପଶୁଧନ ଓ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ଅଛନ୍ତି—ସେସବୁ ମିଶିଲେ ମଧ୍ୟ ଗୋଟିଏ ଲୋକର ତୃଷ୍ଣାକୁ ତୃପ୍ତ କରିବାକୁ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ ନୁହେଁ। ଯେ ଏହି ସତ୍ୟକୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଦେଖେ, ସେ ମୋହରେ ପଡ଼େ ନାହିଁ; କାରଣ ଇଚ୍ଛା ସ୍ୱଭାବତଃ ଅତୃପ୍ତ ବୋଲି ଜାଣି ଧର୍ମପଥରେ ସଂଯମ ରଖେ।
Verse 85
राजन भूयो ब्रवीमि त्वां पुत्रेषु सममाचर । समता यदि ते राजनू् स्वेषु पाण्डुसुतेषु वा,राजन! मैं फिर कहता हूँ, यदि आपका अपने पुत्रों और पाण्डवोंमें समानभाव है तो उन सभी पुत्रोंके साथ एक-सा बर्ताव कीजिये
ରାଜନ! ମୁଁ ପୁଣି କହୁଛି—ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସମଭାବରେ ଆଚରଣ କର। ଯଦି ତୁମର ନିଜ ପୁତ୍ରମାନେ ଓ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସତ୍ୟସତ୍ୟ ସମତା ଅଛି, ତେବେ ସମସ୍ତଙ୍କ ସହ ଏକେ ପରି ବ୍ୟବହାର କର।
Verse 146
या चैव फलनिर्वत्ति: सौहदे चैव यत् सुखम् । उपर्युक्त दोषोंके अतिरिक्त और भी जो महान् दोष हैं, उनसे युक्त मनुष्योंका त्याग कर देना चाहिये। सौहार्दभाव निवृत्त हो जानेपर नीच पुरुषोंका प्रेम नष्ट हो जाता है, उस सौहार्दसे होनेवाले फलकी सिद्धि और सुखका भी नाश हो जाता है
ସୌହାର୍ଦ୍ଦରୁ ଯେ ଫଳସିଦ୍ଧି ହୁଏ ଓ ମିତ୍ରତାରେ ଯେ ସୁଖ ମିଳେ—ସୌହାର୍ଦ୍ଦ ନଷ୍ଟ ହେଲେ ସେସବୁ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ। ନୀଚମନସ୍କ ଲୋକଙ୍କ ପ୍ରେମ ମଧ୍ୟ ସେତେବେଳେ ଭାଙ୍ଗିପଡ଼େ; ଏବଂ ସେଥିସହ ଲାଭର ଫଳସିଦ୍ଧି ଓ ସେଇ ବନ୍ଧନଜନିତ ଆନନ୍ଦ ମଧ୍ୟ ନଶିଯାଏ। ତେଣୁ, ପୂର୍ବୋକ୍ତ ଦୋଷମାନଙ୍କ ଛଡ଼ା ଯେମାନେ ଆଉ ଗୁରୁ ଦୋଷରେ ଯୁକ୍ତ, ସେମାନଙ୍କୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 166
निशम्य निपुणं बुद्धया विद्वान् दूराद् विवर्जयेत् । वैसे नीच, क्रूर तथा अजितेन्द्रिय पुरुषोंसे होनेवाले संगपर अपनी बुद्धिसे पूर्ण विचार करके विद्वान् पुरुष उसे दूरसे ही त्याग दे
ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବୁଦ୍ଧିରେ ଭଲଭାବେ ଶୁଣି ଓ ବିଚାର କରି, ବିଦ୍ୱାନ୍ ଲୋକ ଦୂରରୁ ହିଁ ବର୍ଜନ କରିବା ଉଚିତ। ସେହିପରି ନୀଚ, କ୍ରୂର ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଅସଂଯତ ଲୋକଙ୍କ ସଙ୍ଗକୁ ନିଜ ବିବେକବୁଦ୍ଧିରେ ସମ୍ୟକ୍ ବିଚାର କରି, ଦୂରରୁ ହିଁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 1536
अल्पेअ्प्यपकृते मोहान्न शान्तिमधिगच्छति । फिर वह नीच पुरुष निन्दा करनेके लिये यत्न करता है, थोड़ा भी अपराध हो जानेपर मोहवश विनाशके लिये उद्योग आरम्भ कर देता है। उसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती
ଅଳ୍ପ ଅପକାର ହେଲେ ମଧ୍ୟ ମୋହବଶେ ସେ ଶାନ୍ତି ପାଉନାହିଁ। ସେ ନିନ୍ଦା କରିବା ପାଇଁ ହିଁ ଯତ୍ନ କରେ; ଏବଂ ଛୋଟ ଅପରାଧକୁ ନେଇ ମଧ୍ୟ ବିନାଶମୁଖୀ ଉଦ୍ୟୋଗ ଆରମ୍ଭ କରିଦିଏ। ତା’କୁ ରତିଭର ମଧ୍ୟ ଶାନ୍ତି ମିଳେ ନାହିଁ।
The tension between open social obligations (hospitality, pleasant speech, generosity) and necessary political safeguards (measured trust, guarded counsel, controlled anger) in maintaining stable governance.
Sustain prosperity through disciplined conduct: honor guests appropriately, regulate speech and anger, share resources, protect household integrity, and preserve confidentiality in strategic deliberation.
No explicit phalaśruti formula appears; instead, the text uses consequential reasoning—linking secrecy, restraint, and praiseworthy action to success, and linking vice, indiscretion, and misrule to decline.