
Adhyāya 128 — Proposal to Restrain Keśava; Sātyaki’s Warning and Vidura–Dhṛtarāṣṭra Counsel
Upa-parva: Kṛṣṇa-dūta Parva (Krishna’s Embassy Episode)
Vaiśaṃpāyana narrates a Kuru-court escalation: disregarding prior counsel, Duryodhana consults Śakuni and allies and advances a plan to seize Kṛṣṇa (Keśava/Hṛṣīkeśa), reasoning that the Pandavas will lose resolve if their principal supporter is restrained. Sātyaki, discerning their intent, coordinates precautionary readiness and informs Kṛṣṇa, then reports the plot to Dhṛtarāṣṭra and Vidura. Vidura frames the proposal as dharma-violating, strategically unsound, and reputationally ruinous; he warns that attempting to overpower Kṛṣṇa is self-destructive, using analogies (moths to fire) and recalling episodes that demonstrate Kṛṣṇa’s unassailable prowess. Kṛṣṇa states he can contain aggressors but refuses to initiate condemned action in the king’s presence, emphasizing restraint and adherence to proper conduct. Dhṛtarāṣṭra, alarmed, summons Duryodhana, rebukes him for aligning with harmful counsel, and underscores the impossibility and impropriety of forcibly restraining Keśava. The chapter thus juxtaposes conspiratorial statecraft with normative counsel, highlighting envoy-protection, prudent governance, and the moral limits of coercion.
Chapter Arc: कृष्ण के वचनों को सुनकर धृतराष्ट्र के भीतर भय और आशा साथ-साथ उठते हैं—क्या अभी भी दुर्योधन को रोका जा सकता है? → धृतराष्ट्र संजय को आदेश देते हैं कि वह ‘दीर्घदर्शिनी’ गान्धारी को बुला लाए, ताकि माता-पिता की संयुक्त वाणी से लोभ-ग्रस्त दुर्योधन को समझाया जा सके। दुर्योधन की अशिष्टता, मर्यादा-भंग और सुहृदों की बात काटकर सभा से निकल जाना संकट को और तीखा कर देता है। → धृतराष्ट्र का आत्म-आरोपण-सा स्वीकार उभरता है—राजा जानते हुए भी पुत्र-प्रेम में उसके पापमय मार्ग का अनुगमन कर रहे हैं; यही उनकी निन्दनीयता है। इसी बोध के साथ वे दुर्योधन को कृष्ण की शरण में जाने का आग्रह कराते हैं, क्योंकि केशव प्रसन्न हों तो दोनों पक्षों के लिए सुख-कारक हो सकते हैं। → अध्याय का निष्कर्ष यह है कि शान्ति का द्वार अभी खुला है, पर वह द्वार ‘काम-क्रोध’ और ‘लोभ’ के बढ़ते अन्धकार से ढँक रहा है; धृतराष्ट्र गान्धारी को बुलाकर अंतिम बार समझाने का संकल्प लेते हैं। → गान्धारी के आगमन और उसके वचनों से दुर्योधन पर क्या प्रभाव पड़ेगा—यह अगले अध्याय (गान्धारीवाक्य) पर टल जाता है।
Verse 1
भीकम (2 अमान एकोनत्रिशर्दाधिकशततमो<् ध्याय: धृतराष्ट्रका गान्धारीको बुलाना और उसका दुर्योधनको समझाना वैशम्पायन उवाच कृष्णस्य तु वच: श्रुत्वा धृतराष्ट्रो जनेश्वर: । विदुरं सर्वधर्मज्ञं त्वरमाणो5भ्यभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर राजा धुृतराष्ट्रने सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता विदुरसे शीघ्रतापूर्वक कहा--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୃଷ୍ଣଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ଜନେଶ୍ୱର ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ରାଜା ତ୍ୱରାନ୍ୱିତ ହୋଇ ସର୍ବଧର୍ମଜ୍ଞ ବିଦୁରଙ୍କୁ କହିଲେ।
Verse 2
गच्छ तात महाप्राज्ञां गान्धारीं दीर्घदर्शिनीम् । आनयेह तया सार्धमनुनेष्यामि दुर्मतिम्
ତାତ, ମହାପ୍ରାଜ୍ଞା ଦୀର୍ଘଦର୍ଶିନୀ ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କୁ ଏଠାକୁ ଆଣ। ତାଙ୍କ ସହିତ ରହି ମୁଁ ସେଇ ଦୁର୍ମତିକୁ ଉପଦେଶ ଦେଇ ସଂଯତ କରିବି।
Verse 3
“तात! जाओ, परम बुद्धिमती और दूरदर्शिनी गान्धारीदेवीको यहाँ बुला लाओ। मैं उसीके साथ इस दुर्बुद्धिको समझा-बुझाकर राहपर लानेकी चेष्टा करूँगा ।। यदि सापि दुरात्मानं शमयेद् दुष्टचेतसम् । अपि कृष्णस्य सुहृदस्तिछतेम वचने वयम्,“यदि वह भी उस दुष्टचित्त दुरात्माको शान््त कर सके तो हमलोग अपने सुहृद् श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन कर सकते हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ବତ୍ସ! ଯାଅ; ପରମ ବୁଦ୍ଧିମତୀ ଓ ଦୂରଦର୍ଶିନୀ ରାଣୀ ଗାନ୍ଧାରୀଦେବୀଙ୍କୁ ଏଠାକୁ ଡାକି ଆଣ। ତାଙ୍କ ସହିତ ମୁଁ ଏହି ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧିକୁ ବୁଝାଇ ସନ୍ମାର୍ଗରେ ଆଣିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରିବି। ଯଦି ସେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ଦୁଷ୍ଟଚିତ୍ତ ଦୁରାତ୍ମାକୁ ଶାନ୍ତ କରିପାରନ୍ତି, ତେବେ ଆମ ସୁହୃଦ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞାକୁ ଆମେ ପାଳନ କରିପାରିବୁ।”
Verse 4
अपि लोभाभि भूतस्य पन्थानमनुदर्शयेत् । दुर्बुद्धेर्दु:सहायस्य शमार्थ ब्रुवती वच:,“दुर्योधन लोभके अधीन हो रहा है। उसकी बुद्धि दूषित हो गयी है और उसके सहायक दुष्ट स्वभावके ही हैं। सम्भव है, गान्धारी शान्तिस्थापनके लिये कुछ कहकर उसे सन्मार्गका दर्शन करा सके
“ଲୋଭରେ ଆବୃତ ହୋଇଥିବା ତାକୁ ସେ ହୋଇପାରେ ପଥ ଦେଖାଇଦେବେ; ଯାହାର ବୁଦ୍ଧି ଦୂଷିତ ଓ ଯାହାର ସହାୟକମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୁଷ୍ଟସ୍ୱଭାବୀ—ଶାନ୍ତି ପାଇଁ ଯଥୋଚିତ ବଚନ କହି।”
Verse 5
अपि नो व्यसन घोर दुर्योधनकृतं महत् । शमयेच्चिररात्राय योगक्षेमवदव्ययम्,“यदि ऐसा हुआ तो दुर्योधनके द्वारा उपस्थित किया हुआ हमारा महान् एवं भयंकर संकट दीर्घकालके लिये शान्त हो जायगा और चिरस्थायी योगक्षेमकी प्राप्ति सुलभ होगी”
“ଯଦି ଏହା ଘଟେ, ତେବେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଦ୍ୱାରା ଉପସ୍ଥାପିତ ଆମର ଏହି ମହାନ୍ ଓ ଭୟଙ୍କର ବିପଦ ଦୀର୍ଘକାଳ ପାଇଁ ଶାନ୍ତ ହେବ, ଏବଂ ଅବ୍ୟୟ, ଚିରସ୍ଥାୟୀ ଯୋଗକ୍ଷେମ ସହଜରେ ଲଭ୍ୟ ହେବ।”
Verse 6
राज्ञस्तु वचन श्रुत्वा विदुरो दीर्घदर्शिनीम् । आनयामास गान्धारीं धृतराष्ट्स्य शासनात्,राजाकी यह बात सुनकर विदुर धृतराष्ट्रके आदेशसे दूरदर्शिनी गान्धारीदेवीको वहाँ बुला ले आये
ରାଜାଙ୍କ କଥା ଶୁଣି, ବିଦୁର ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଆଜ୍ଞାନୁସାରେ ଦୂରଦର୍ଶିନୀ ରାଣୀ ଗାନ୍ଧାରୀଦେବୀଙ୍କୁ ସେଠାକୁ ଆଣିଲେ।
Verse 7
धृतराष्ट उवाच एष गान्धारि पुत्रस्ते दुरात्मा शासनातिग: । ऐश्वर्यलोभादैश्वर्य जीवितं च प्रहास्यति,उस समय धृतराष्ट्रने कहा--गान्धारि! तुम्हारा वह दुरात्मा पुत्र गुरुजनोंकी आज्ञाका उल्लंघन कर रहा है। वह ऐश्वर्यके लोभमें पड़कर राज्य और प्राण दोनों गँवा देगा
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—“ଗାନ୍ଧାରୀ! ତୁମର ଏହି ପୁତ୍ର ଦୁରାତ୍ମା ଗୁରୁଜନଙ୍କ ଆଜ୍ଞାକୁ ଅତିକ୍ରମ କରୁଛି। ଐଶ୍ୱର୍ୟର ଲୋଭରେ ପଡ଼ି ସେ ରାଜ୍ୟ ଓ ପ୍ରାଣ—ଦୁହେଁ ହାରିବ।”
Verse 8
अशिष्टवदमर्याद: पापै: सह दुरात्मवान् | सभाया निर्गतो मूढो व्यतिक्रम्य सुहृद्गबच:,मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला वह मूढ़ दुरात्मा अशिष्ट पुरुषकी भाँति हितैषी सुहृदोंकी आज्ञाको ठुकराकर अपने पापी साथियोंके साथ सभासे बाहर निकल गया है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ବାକ୍ୟରେ ଅଶିଷ୍ଟ ଓ ସୀମାଲଂଘନକାରୀ ସେ ମୋହଗ୍ରସ୍ତ ଦୁଷ୍ଟ, ପାପୀ ସହଚରମାନଙ୍କ ସହିତ, ହିତେଚ୍ଛୁ ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ଉପଦେଶକୁ ଅବହେଳା କରି ସଭା ଛାଡ଼ି ବାହାରିଗଲା।
Verse 9
वैशम्पायन उवाच सा भर्तवचन श्रुत्वा राजपुत्री यशस्विनी । अन्विच्छन्ती महच्छेयो गान्धारी वाक्यमब्रवीत्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପତିଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି, ଯଶସ୍ବିନୀ ରାଜକନ୍ୟା ଗାନ୍ଧାରୀ, ମହତ୍ ଶ୍ରେୟସ୍ର ଅନ୍ୱେଷଣ କରୁଥିବାବେଳେ, ଏହି ବଚନ କହିଲେ।
Verse 10
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! पतिका यह वचन सुनकर यशस्विनी राजपुत्री गान्धारी महान् कल्याणका अनुसंधान करती हुई इस प्रकार बोली ।। गान्धायुवाच आनायय सुत॒ क्षिप्रं राज्यकामुकमातुरम् । न हि राज्यमशिष्टेन शकक््यं धर्मार्थलोपिना
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ପତିଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି, ଯଶସ୍ବିନୀ ରାଜକନ୍ୟା ଗାନ୍ଧାରୀ, ମହତ୍ ଶ୍ରେୟସ୍କୁ ଅନ୍ୱେଷଣ କରି, ଏହିପରି କହିଲେ। ଗାନ୍ଧାରୀ କହିଲେ—ରାଜ୍ୟକାମନାରେ ଆତୁର ଓ ଜ୍ୱରାକ୍ରାନ୍ତ ମୋ ପୁତ୍ରକୁ ଶୀଘ୍ର ଏଠାକୁ ଆଣ। ଅଶିଷ୍ଟ ଓ ଧର୍ମ-ଅର୍ଥ ନାଶକାରୀ ଲୋକ ରାଜ୍ୟ ଧାରଣ କରିପାରେ ନାହିଁ।
Verse 11
आप्तुमाप्तं तथापीदमविनीतेन सर्वथा । गान्धारीने कहा--महाराज! राज्यकी कामनासे आतुर हुए अपने पुत्रको शीघ्र बुलवाइये। धर्म और अर्थका लोप करनेवाला कोई भी अशिष्ट पुरुष राज्य नहीं पा सकता, तथापि सर्वथा उद्धण्डताका परिचय देनेवाले उस दुष्टने राज्यको प्राप्त कर लिया है ।। १० ६ || त्वं होवात्र भुशं गह्ों धृतराष्ट्र सुतप्रिय:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତଥାପି ଏହିପରି ଘଟିଲା ଯେ ଯାହା ପ୍ରାପ୍ତ ହେବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ, ତାହା ସର୍ବଥା ଅବିନୀତ ଲୋକ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲା। ଗାନ୍ଧାରୀ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ରାଜ୍ୟକାମନାରେ ଆତୁର ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ରକୁ ଶୀଘ୍ର ଡାକନ୍ତୁ। ଅଶିଷ୍ଟ ଓ ଧର୍ମ-ଅର୍ଥ ନାଶକାରୀ ଲୋକ ରାଜ୍ୟ ପାଇବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; ତଥାପି ସେ ଦୁଷ୍ଟ ସର୍ବଥା ଉଦ୍ଧତତା ଦେଖାଇ ରାଜ୍ୟ ପାଇଗଲା।
Verse 12
स एष काममन्युभ्यां प्रलब्धो लोभमास्थित:
ଏହି ଲୋକ କାମ ଓ କ୍ରୋଧରେ ପ୍ରଲୋଭିତ ହୋଇ ଲୋଭକୁ ଆଶ୍ରୟ କରିଛି।
Verse 13
अशक्योड्द्य त्वया राजन् विनिवर्तयितुं बलात् । राजन! इस दुर्योधनको काम और क्रोधने अपने वशमें कर लिया है, यह लोभमें फँस गया है; अतः आज आपका इसे बलपूर्वक पीछे लौटाना असम्भव है ।। राष्ट्रप्रदाने मूढस्य बालिशस्य दुरात्मन:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ଆଜି ତୁମ ପାଇଁ ତାକୁ ବଳପୂର୍ବକ ପଛକୁ ଫେରାଇବା ଅସମ୍ଭବ। ରାଜ୍ୟ ଦାନର ବିଷୟରେ ସେ ମୋହଗ୍ରସ୍ତ, ବାଳିଶ, ଦୁରାତ୍ମା ପୁରୁଷ କାମ, କ୍ରୋଧ ଓ ଲୋଭର ବଶରେ ପଡ଼ିଛି; ତାକୁ ରୋକିହେବ ନାହିଁ।
Verse 14
दुःसहायस्य लुब्धस्य धृतराष्ट्रो5श्ुते फलम् । दुष्ट सहायकोंसे युक्त, मूढ़, अज्ञानी, लोभी और दुरात्मा पुत्रको अपना राज्य सौंप देनेका फल महाराज धुृतराष्ट्र स्वयं भोग रहे हैं || १३ ह ।। कथं हि स्वजने भेदमुपेक्षेत महीपति: । भिन्न हि स्वजनेन त्वां प्रहसिष्यन्ति शत्रव:,कोई भी राजा स्वजनोंमें फैलती हुई फ़ूटकी उपेक्षा कैसे कर सकता है? राजन! स्वजनोंमें फूट डालकर उनसे विलग होनेवाले आपकी सभी शत्रु हँसी उड़ायेंगे। महाराज! जिस आपत्तिको साम अथवा भेदनीतिसे पार किया जा सकता है, उसके लिये आत्मीयजनोंपर दण्डका प्रयोग कौन करेगा?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦୁଷ୍ଟ ସହାୟକମାନଙ୍କ ସହିତ ଯୁକ୍ତ, ଲୋଭୀ, ମୋହଗ୍ରସ୍ତ, ଅଜ୍ଞାନୀ ଓ ଦୁରାତ୍ମା ପୁତ୍ରକୁ ରାଜ୍ୟ ସମର୍ପଣ କରିବାର ଫଳ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ମହାରାଜ ନିଜେ ଭୋଗୁଛନ୍ତି। କେଉଁ ମହୀପତି ନିଜ ସ୍ୱଜନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପସରୁଥିବା ଭେଦକୁ ଉପେକ୍ଷା କରିପାରିବ? ସ୍ୱଜନରୁ ଭିନ୍ନ ହେଲେ ଶତ୍ରୁମାନେ ତୁମକୁ ଉପହାସ କରିବେ।
Verse 15
या हि शक््या महाराज साम्ना भेदेन वा पुन: । निस्तर्तुमापद: स्वेषु दण्डं कस्तत्र पातयेत्,कोई भी राजा स्वजनोंमें फैलती हुई फ़ूटकी उपेक्षा कैसे कर सकता है? राजन! स्वजनोंमें फूट डालकर उनसे विलग होनेवाले आपकी सभी शत्रु हँसी उड़ायेंगे। महाराज! जिस आपत्तिको साम अथवा भेदनीतिसे पार किया जा सकता है, उसके लिये आत्मीयजनोंपर दण्डका प्रयोग कौन करेगा?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ, ନିଜ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଥିବା ଆପଦକୁ ସାମ କିମ୍ବା ଭେଦନୀତିରେ ଯଦି ଅତିକ୍ରମ କରାଯାଇପାରେ, ତେବେ ସେଠାରେ ଦଣ୍ଡ କିଏ ପାତିବ?
Verse 16
वैशम्पायन उवाच शासनाद् धृतराष्ट्रस्थ दुर्योधनममर्षणम् । मातुश्न वचनात् क्षत्ता सभां प्रावेशयत् पुनः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पिता धृतराष्ट्रके आदेश और माता गान्धारीकी आज्ञासे विदुर असहिष्णु दुर्योधनको पुन: सभामें बुला ले आये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଆଦେଶ ଏବଂ ମାତା (ଗାନ୍ଧାରୀ)ଙ୍କ ବଚନ ଅନୁସାରେ କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁର ଅମର୍ଷଣ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ପୁନଃ ସଭାରେ ପ୍ରବେଶ କରାଇଲେ।
Verse 17
स मातुर्वचनाकाडुशक्षी प्रविवेश पुन: सभाम् । अभिताम्रेक्षण: क्रोधान्नि:श्वसन्निव पन्नग:,दुर्योधनकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह फुफकारते हुए सर्पकी भाँति लंबी साँसें खींचता हुआ माताकी बात सुननेकी इच्छासे सभाभवनमें पुनः प्रविष्ट हुआ
ମାତାଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରି ସେ ପୁନଃ ସଭାରେ ପ୍ରବେଶ କଲା। କ୍ରୋଧରେ ତାହାର ଚକ୍ଷୁ ତାମ୍ରବର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଥିଲା; ସର୍ପ ପରି ଫୁସ୍ଫୁସ୍ କରି ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ୁଥିଲା।
Verse 18
त॑ प्रविष्टमभिप्रेक्ष्य पुत्रमुत्पथमास्थितम् । विगर्हमाणा गान्धारी शमार्थ वाक्यमब्रवीत्,अपने कुमार्गगामी पुत्रको पुन: सभाके भीतर आया देख गान्धारी उसकी निन्दा करती हुई शान्ति-स्थापनके लिये इस प्रकार बोली--
କୁମାର୍ଗରେ ପଡ଼ିଥିବା ପୁତ୍ରଟି ପୁଣି ସଭାଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କରୁଥିବା ଦେଖି, ଗାନ୍ଧାରୀ ତାକୁ ତିରସ୍କାର କରି ଶାନ୍ତି-ସ୍ଥାପନା ପାଇଁ ଏହିପରି କହିଲେ।
Verse 19
दुर्योधन निबोधेदं वचन मम पुत्रक । हितं ते सानुबन्धस्य तथा5<5यत्यां सुखोदयम्,“बेटा दुर्योधन! मेरी यह बात सुनो। जो सगे-सम्बन्धियोंसहित तुम्हारे लिये हितकारक और भविष्यमें सुखकी प्राप्ति करानेवाली है
ପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ! ମୋର ଏହି କଥା ଶୁଣ—ଏହା ତୁମ ସଗା-ସମ୍ବନ୍ଧୀମାନଙ୍କ ସହିତ ତୁମ ହିତକର, ଏବଂ ଭବିଷ୍ୟତରେ ସୁଖୋଦୟ ଆଣିବ।
Verse 20
दुर्योधन यदाह त्वां पिता भरतसत्तम | भीष्मो द्रोण: कृप: क्षत्ता सुहृदां कुरु तद् वच:,“भरतश्रेष्ठ दुर्योधन! तुम्हारे पिता, पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य और विदुर तुमसे जो कुछ कहते हैं, अपने इन सुहृदोंकी वह बात मान लो
ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ! ତୁମ ପିତା, ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କୃପ ଓ କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁର—ଏହି ସୁହୃଦମାନେ ଯାହା କହନ୍ତି, ସେହି କଥା ମାନ।
Verse 21
दुर्योधनको गान्धारीकी फटकार भीष्मस्य तु पितुश्चैव मम चापचिति: कृता । भवेद् द्रोणमुखानां च सुहृदां शाम्यता त्वया,“यदि तुम शान्त हो जाओगे तो तुम्हारे द्वारा भीष्मकी, पिताजीकी, मेरी तथा द्रोण आदि अन्य हितैषी सुहृदोंकी भी पूजा सम्पन्न हो जायगी
ତୁମେ ଯଦି ଶାନ୍ତ ହେବ, ତେବେ ତୁମ ଦ୍ୱାରା ଭୀଷ୍ମଙ୍କ, ପିତାଙ୍କ, ମୋର ଓ ଦ୍ରୋଣ ଆଦି ଅନ୍ୟ ହିତେଷୀ ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ-ପୂର୍ତ୍ତି ସମ୍ପନ୍ନ ହେବ।
Verse 22
न हि राज्यं महाप्राज्ञ स्वेन कामेन शक््यते । अवापुतु रक्षितुं वापि भोक्तुं भरतसत्तम
ହେ ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! କେବଳ ନିଜ ଇଚ୍ଛାମାତ୍ରରେ ରାଜ୍ୟ ନ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ, ନ ରକ୍ଷିତ ହୁଏ, ନ ଭୋଗ୍ୟ ହୁଏ।
Verse 23
'भरतश्रेष्ठ) महामते! कोई भी अपनी इच्छामात्रसे राज्यकी प्राप्ति, रक्षा अथवा उपभोग नहीं कर सकता ।। न हुवश्येन्द्रियो राज्यमश्रीयाद् दीर्घमन्तरम् । विजितात्मा तु मेधावी स राज्यमभिपालयेत्,“जिसने अपनी इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, वह दीर्घकालतक राज्यका उपभोग नहीं कर सकता। जिसने अपने मनको जीत लिया है, वह मेधावी पुरुष ही राज्यकी रक्षा कर सकता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯାହାର ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ନିୟନ୍ତ୍ରଣରେ ନାହିଁ, ସେ ଦୀର୍ଘକାଳ ରାଜ୍ୟକୁ ଧାରଣ କିମ୍ବା ଭୋଗ କରିପାରେ ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ଯେ ଆତ୍ମଜୟୀ ଓ ମେଧାବୀ, ସେଇ ରାଜ୍ୟକୁ ରକ୍ଷା ଓ ପାଳନ କରିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ।
Verse 24
कामक्रोधौ हि पुरुषमर्थेभ्यो व्यपकर्षत: । तौ तु शत्रू विनिर्जित्य राजा विजयते महीम्,“काम और क्रोध मनुष्यको धनसे दूर खींच ले जाते हैं। उन दोनों शत्रुओंको जीत लेनेपर राजा इस पृथ्वीपर विजय पाता है
କାମ ଓ କ୍ରୋଧ ମନୁଷ୍ୟକୁ ଅର୍ଥ-ଲାଭରୁ ଦୂରେ ଟାଣିନେଇଯାଏ। କିନ୍ତୁ ସେଇ ଦୁଇ ଶତ୍ରୁକୁ ଜୟ କରି ରାଜା ପୃଥିବୀରେ ବିଜୟୀ ହୁଏ।
Verse 25
लोकेश्वर प्रभुत्वं हि महदेतद् दुरात्मभि: । राज्यं नामेप्सितं स्थानं न शक््यमभिरक्षितुम्,'जनेश्वर! यह महान प्रभुत्व ही राज्य नामक अभीष्ट स्थान है। जिनकी अन्तरात्मा दूषित है, वे इसकी रक्षा नहीं कर सकते
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନେଶ୍ୱର! ଲୋକାଧିପତ୍ୟ ନିଶ୍ଚୟ ମହାଭାର। ‘ରାଜ୍ୟ’ ନାମକ ଏହି ଇପ୍ସିତ ପଦ ଦୁଷ୍ଟ ଅନ୍ତଃକରଣ ଥିବାମାନେ ରକ୍ଷା କରିପାରନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 26
इन्द्रियाणि महत्प्रेप्सुर्नियच्छेदर्थ धर्मयो: । इन्द्रियै्नियतैरबुद्धिर्वर्धतेडग्निरिवेन्धनै:,“महत्पदको प्राप्त करनेकी इच्छावाला पुरुष अपनी इन्द्रियोंको अर्थ और धर्ममें नियन्त्रित करे। इन्द्रियोंको जीत लेनेपर बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है, जैसे ईंधन डालनेसे आग प्रज्वयलित हो उठती है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହତ୍ ପଦ ପାଇବାକୁ ଇଚ୍ଛୁକ ପୁରୁଷ ଅର୍ଥ ଓ ଧର୍ମର ପଥରେ ନିଜ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଗୁଡ଼ିକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରୁ। ଇନ୍ଦ୍ରିୟନିଗ୍ରହ ହେଲେ ବୁଦ୍ଧି ଇନ୍ଧନ ପାଇଲେ ଅଗ୍ନି ଯେପରି ଜ୍ୱଳେ, ସେପରି ବୃଦ୍ଧି ପାଏ।
Verse 27
अविधेयानि हीमानि व्यापादयितुमप्यलम् । अविधेया इवादान्ता हया: पथि कुसारथिम्,'जैसे उद्दण्ड घोड़े काबूमें न होनेपर मूर्ख सारथि-को मार्गमें ही मार डालते हैं, उसी प्रकार यदि इन इन्द्रियोंको काबूमें न रखा जाय तो ये मनुष्यका नाश करनेके लिये भी पर्याप्त हैं
ଏହି ଇନ୍ଦ୍ରିୟଗୁଡ଼ିକ ଯଦି ଅବିଧେୟ ହୁଅନ୍ତି, ତେବେ ନାଶ କରିବାକୁ ମଧ୍ୟ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ—ଯେପରି ଅଦାନ୍ତ, ଅନିୟନ୍ତ୍ରିତ ଘୋଡ଼ାମାନେ ପଥରେ ହିଁ କୁସାରଥିକୁ ମାରିଦିଅନ୍ତି।
Verse 28
अविजित्य य आत्मानममात्यान् विजिगीषते । अमित्रान् वाजितामात्य: सोडवश: परिहीयते,“जो पहले अपने मनको न जीतकर मन्त्रियोंको जीतनेकी इच्छा करता है अथवा मन्त्रियोंको जीते बिना शत्रुओंको जीतना चाहता है, वह विवश होकर राज्य और जीवन दोनोंसे वंचित हो जाता है
ଯେ ପ୍ରଥମେ ନିଜ ମନକୁ ଜୟ ନକରି ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରେ, କିମ୍ବା ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ବଶ କରିନଥାଇ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରିବାକୁ ଚାହେ—ସେ ବିବଶ ହୋଇ ରାଜ୍ୟ ଓ ଜୀବନ, ଉଭୟରୁ ବଞ୍ଚିତ ହୁଏ।
Verse 29
आत्मानमेव प्रथम द्वेष्यरूपेण योजयेत् । ततोअमात्यानमित्रांश्व न मोघं विजिगीषते,“अतः पहले अपने मनको ही शत्रुके स्थानपर रखकर इसे जीते। तत्पश्चात् मन्त्रियों और शत्रुओंपर विजय पानेकी इच्छा करे। ऐसा करनेसे उसकी विजय पानेकी अभिलाषा कभी व्यर्थ नहीं होती है
ଏହେତୁ ପ୍ରଥମେ ନିଜ ମନକୁ ଶତ୍ରୁରୂପେ ଧରି ତାହାକୁ ଜୟ କର; ତାପରେ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଓ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଉପରେ ବିଜୟ ଲାଗି ଇଚ୍ଛା କର। ଏପରି କଲେ ତାହାର ବିଜୟାକାଙ୍କ୍ଷା କେବେ ବ୍ୟର୍ଥ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 30
वश्येन्द्रियं जितामात्यं धृतदण्डं विकारिषु | परीक्ष्यकारिणं धीरमत्यर्थ श्रीनिषेवते,“जिसने अपनी इन्द्रियोंको वशमें कर रखा है, मन्त्रियोंपर विजय पा ली है तथा जो अपराधियोंको दण्ड प्रदान करता है, खूब सोच-समझकर कार्य करनेवाले उस धीर पुरुषकी लक्ष्मी अत्यन्त सेवा करती है
ଯିଏ ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ବଶରେ ରଖିଛି, ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ଯଥାଯଥ ନିୟନ୍ତ୍ରଣରେ ରଖିଛି, ଅପରାଧୀମାନଙ୍କୁ ଦୃଢ଼ ଦଣ୍ଡ ଦେଉଛି ଏବଂ ପରୀକ୍ଷା କରି ମାତ୍ର କାର୍ଯ୍ୟ କରେ—ସେହି ଧୀର ପୁରୁଷଙ୍କୁ ଶ୍ରୀ (ଲକ୍ଷ୍ମୀ) ଅତ୍ୟଧିକ ଭାବେ ସେବା କରେ।
Verse 31
क्षुद्राक्षेणेव जालेन झषावपिहितावुभौ । कामक्रोधौ शरीरस्थीौ प्रज्ञानं तौ विलुम्पत:,“छोटे छिद्रवाले जालसे ढकी हुई दो मछलियोंकी भाँति ये काम और क्रोध भी शरीरके भीतर ही छिपे हुए हैं, जो मनुष्यके ज्ञानको नष्ट कर देते हैं
ଛୋଟ ଛୋଟ ଛିଦ୍ର ଥିବା ଜାଲରେ ଢାକା ଦୁଇଟି ମାଛ ପରି, କାମ ଓ କ୍ରୋଧ ମଧ୍ୟ ଶରୀର ଭିତରେ ଲୁଚି ରହେ; ସେ ଦୁଇଏ ମନୁଷ୍ୟର ପ୍ରଜ୍ଞାକୁ ଲୁଟି ନେଇଥାଏ।
Verse 32
याभ्यां हि देवा: स्वर्यातुः स्वर्गस्य पिदधुर्मुखम् । बिभ्यतो5नुपरागस्य कामक्रोधौ सम वर्धिती
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏହି ଦୁଇ, କାମ ଓ କ୍ରୋଧ ଦ୍ୱାରା ହିଁ ସ୍ୱର୍ଗରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା ଦେବମାନେ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱର୍ଗର ଦ୍ୱାରକୁ ବନ୍ଦ କରିଦେଇଥିଲେ। ଯେ ଆତ୍ମସଂଯମ ଭଙ୍ଗ ଓ ରାଗର କଳଙ୍କକୁ ଭୟ କରେ, ତାହା ପାଇଁ ଏହି ଦୁଇ—ସମଭାବେ ପୋଷିତ ହେଲେ—ପତନର କାରଣ ହୁଏ।
Verse 33
“इन्हीं दोनों (काम और क्रोध)-के द्वारा देवताओंने स्वर्गमें जानेवाले पुरुषके लिये उस लोकका दरवाजा बंद कर रखा है। वीतराग पुरुषसे डरकर ही देवताओंने स्वर्गप्राप्तिके प्रतिबन्धक काम और क्रोधकी वृद्धि की है ।। काम॑ क्रोधं च लोभं च दम्भं दर्प च भूमिप: । सम्यग्विजेतुं यो वेद स महीमभिजायते,“जो राजा काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और दर्पको अच्छी तरह जीतनेकी कला जानता है, वही इस पृथ्वीका शासन कर सकता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କାମ ଓ କ୍ରୋଧ ଏହି ଦୁଇଟି ଶକ୍ତି ଦ୍ୱାରା ଦେବତାମାନେ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଯିବାକୁ ଚାହୁଁଥିବା ପୁରୁଷ ପାଇଁ ସ୍ୱର୍ଗଦ୍ୱାରକୁ ରୁଦ୍ଧ କରି ରଖନ୍ତି। ବୀତରାଗ ପୁରୁଷକୁ ଭୟ କରି ସ୍ୱର୍ଗପ୍ରାପ୍ତିରେ ବାଧାକାରୀ କାମ ଓ କ୍ରୋଧକୁ ସେମାନେ ଅଧିକ ବଢ଼ାନ୍ତି। ତେଣୁ ଯେ ରାଜା କାମ, କ୍ରୋଧ, ଲୋଭ, ଦମ୍ଭ ଓ ଦର୍ପକୁ ଭଲଭାବେ ଜିତିବା ଜାଣେ, ସେଇ ପୃଥିବୀ ଶାସନ କରିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ।
Verse 34
सतत निग्रहे युक्त इन्द्रियाणां भवेन्नूप: । ईप्सन्नर्थ च धर्म च द्विषतां च पराभवम्,“अतः: अर्थ, धर्म तथा शत्रुओंका पराभव चाहनेवाले राजाको सदा अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखनेका प्रयत्न करना चाहिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜା ସଦା ଇନ୍ଦ୍ରିୟନିଗ୍ରହରେ ନିୟୁକ୍ତ ରହିବା ଉଚିତ। ଯେ ଅର୍ଥ ଓ ଧର୍ମକୁ ଚାହେ ଏବଂ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କର ପରାଭବ ମଧ୍ୟ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରେ, ତାହା ପାଇଁ ନିରନ୍ତର ଆତ୍ମସଂଯମ ହିଁ ଯଥୋଚିତ ଶିକ୍ଷା।
Verse 35
कामाभिभूत: क्रोधाद् वा यो मिथ्या प्रतिपद्यते । स्वेषु चान्येषु वा तस्य न सहाया भवन्त्युत,“जो राजा काम अथवा क्रोधसे अभिभूत होकर स्वजनों या दूसरोंके प्रति मिथ्या बर्ताव (कपट एवं अन्याययुक्त आचरण) करता है, उसके कोई सहायक नहीं होते हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯେ ରାଜା କାମ କିମ୍ବା କ୍ରୋଧରେ ଅଭିଭୂତ ହୋଇ ନିଜ ଲୋକମାନଙ୍କ ପ୍ରତି କିମ୍ବା ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମିଥ୍ୟା—କପଟ ଓ ଅନ୍ୟାୟପୂର୍ଣ୍ଣ—ଆଚରଣ କରେ, ତାହାର କେହି ସହାୟ ରହନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 36
एकी भूतैर्महाप्राज्जै: श्रैररिनिबर्हणै: । पाण्डवै: पृथिवीं तात भोक्ष्यसे सहित: सुखी,“तात! पाण्डव परस्पर संगठित होनेके कारण एकीभूत हो गये हैं। वे परम ज्ञानी, शूरवीर तथा शत्रुसंहारमें समर्थ हैं। तुम उनके साथ मिलकर सुखपूर्वक इस पृथ्वीका राज्य भोग सकोगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାତ! ପାଣ୍ଡବମାନେ ପରସ୍ପର ସଂଘଟିତ ହୋଇ ଏକୀଭୂତ ହୋଇଛନ୍ତି। ସେମାନେ ପରମ ପ୍ରାଜ୍ଞ, ଶୂରବୀର ଏବଂ ଶତ୍ରୁନାଶରେ ସମର୍ଥ। ସେମାନଙ୍କ ସହ ଯୋଗ ଦେଲେ ତୁମେ ସୌହାର୍ଦ୍ୟ ଓ ସୁଖ ସହିତ ଏହି ପୃଥିବୀର ରାଜ୍ୟ ଭୋଗ କରିପାରିବ।
Verse 37
यथा भीष्म: शान्तनवो द्रोणश्रापि महारथ: । आहतुस्तात तत् सत्यमजेयौ कृष्णपाण्डवी,“तात! शान्तनुनन्दन भीष्म तथा महारथी द्रोणाचार्य जैसा कह रहे हैं, वह सर्वथा सत्य है। वास्तवमें श्रीकृष्ण और अर्जुन अजेय हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାତ! ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ ଓ ମହାରଥୀ ଦ୍ରୋଣ ଯାହା କହିଛନ୍ତି, ତାହା ସର୍ବଥା ସତ୍ୟ। ପ୍ରକୃତରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ପାଣ୍ଡବ (ଅର୍ଜୁନ) ଅଜେୟ।
Verse 38
प्रपद्यस्व महाबाहुं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् । प्रसन्नो हि सुखाय स्थादुभयोरेव केशव:
ମହାବାହୁ, କ୍ଲେଶହୀନ ଓ ନିର୍ମଳ କର୍ମକର୍ତ୍ତା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ଶରଣ ନେଅ। କେଶବ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ ସେ ଉଭୟ ପକ୍ଷର ସୁଖ-କଲ୍ୟାଣର କାରଣ ହେବେ।
Verse 39
“अत: अनायास ही महान् कर्म करनेवाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लो; क्योंकि भगवान् केशव प्रसन्न होनेपर दोनों ही पक्षोंको सुखी बना सकते हैं ।। सुह्ृदामर्थकामानां यो न तिष्ठति शासने । प्राज्ञानां कृतविद्यानां स नर: शत्रुनन्दन:,“जो मनुष्य अपना भला चाहनेवाले ज्ञानी एवं विद्वान् सुहृदोंके शासनमें नहीं रहता-- उनके उपदेशके अनुसार नहीं चलता, वह शत्रुओंका आनन्द बढ़ानेवाला होता है
ଏହେତୁ ଅନାୟାସେ ମହତ୍ କର୍ମ ସାଧନକାରୀ ମହାବାହୁ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ଶରଣ ନେଅ; କାରଣ କେଶବ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ ସେ ଉଭୟ ପକ୍ଷକୁ ସୁଖୀ କରିପାରିବେ। ଯେ ମନୁଷ୍ୟ ନିଜର ସତ୍ୟ ମଙ୍ଗଳ ଚାହୁଁଥିବା ଜ୍ଞାନୀ ଓ ବିଦ୍ୱାନ ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ଶାସନରେ ରହେନାହିଁ—ତାଙ୍କ ଉପଦେଶ ଅନୁସାରେ ଚାଲେନାହିଁ—ସେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଆନନ୍ଦ ବଢ଼ାଇଥାଏ।
Verse 40
न युद्धे तात कल्याणं न धर्मार्थों कुतः सुखम् । न चापि विजयो नित्यं मा युद्धे चेत आधिथा:,'तात! युद्ध करनेमें कल्याण नहीं है। उससे धर्म और अर्थकी भी प्राप्ति नहीं हो सकती, फिर सुख तो मिल ही कैसे सकता है? युद्धमें सदा विजय ही हो, यह भी निश्चित नहीं है; अत: उसमें मन न लगाओ
ତାତ, ଯୁଦ୍ଧରେ କଲ୍ୟାଣ ନାହିଁ। ତାହାରୁ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ ମଧ୍ୟ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବେ ମିଳେନାହିଁ; ତେବେ ସୁଖ କେଉଁଠୁ ଆସିବ? ଯୁଦ୍ଧରେ ସଦା ବିଜୟ ହେବ, ଏହା ମଧ୍ୟ ନିଶ୍ଚିତ ନୁହେଁ; ତେଣୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ମନ ଲଗାଅ ନାହିଁ।
Verse 41
भीष्मेण हि महाप्राज्ञ पित्रा ते बाह्लिकेन च । दत्तों5श: पाण्डुपुत्राणां भेदाद् भीतैररिंदम,'शत्रुदमन! महाप्राज्ञ! आपसकी फूटके भयसे ही पितामह भीष्मने, तुम्हारे पिताने और महाराज बाह्लीकने भी पाण्डवोंको राज्यका भाग प्रदान किया है
ଅରିନ୍ଦମ, ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ! ଆପସରେ ଭେଦ ଓ ଫୁଟ ପଡ଼ିବ ବୋଲି ଭୟ କରି ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ, ତୁମ ପିତା ଏବଂ ରାଜା ବାହ୍ଲୀକ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ରାଜ୍ୟର ଏକ ଅଂଶ ଦେଇଥିଲେ।
Verse 42
तस्य चैतत्प्रदानस्य फलमद्यानुपश्यसि । यद् भुड्क्षे पृथिवीं कृत्स्नां श्रै्निहतकण्टकाम्,“उसीके देनेका आज तुम यह प्रत्यक्ष फल देखते हो कि उन शूरवीर पाण्डवोंद्वारा निष्कण्टक बनायी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य भोग रहे हो
ସେହି ପ୍ରଦାନର ଫଳ ଆଜି ତୁମେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖୁଛ—ବୀର ପାଣ୍ଡବମାନେ ଶତ୍ରୁରୂପ କଣ୍ଟକକୁ ନିହତ କରି ନିଷ୍କଣ୍ଟକ କରିଥିବା ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀର ରାଜ୍ୟ ତୁମେ ଭୋଗ କରୁଛ।
Verse 43
प्रयच्छ पाण्डुपुत्राणां यथोचितमरिंदम । यदीच्छसि सहामात्यो भोक्तुमर्ध प्रदीयताम्,'शत्रुओंका दमन करनेवाले पुत्र! यदि तुम अपने मन्त्रियोंसहित राज्य भोगना चाहते हो तो पाण्डवोंको उनका यथोचित भाग--आधा राज्य दे दो
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ, ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ଭାଗ ଦିଅ। ଯଦି ତୁମେ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ ରାଜ୍ୟ ଭୋଗ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, ତେବେ ସେମାନଙ୍କୁ ଅର୍ଧ ରାଜ୍ୟ ଦିଆଯାଉ।
Verse 44
अलमर्ध पृथिव्यास्ते सहामात्यस्य जीवितुम् | सुहृदां वचने तिष्ठन् यश: प्राप्स्यसि भारत,“भारत! भूमण्डलका आधा राज्य मन्त्रियोंसहित तुम्हारे जीवननिर्वाहके लिये पर्याप्त है। तुम सुहृदोंकी आज्ञाके अनुसार चलकर सुयश प्राप्त करोगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ, ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ ତୁମ ଜୀବନନିର୍ବାହ ପାଇଁ ପୃଥିବୀର ଅର୍ଧ ଭାଗ ଯଥେଷ୍ଟ। ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ଉପଦେଶରେ ଅଟୁଟ ରହିଲେ ତୁମେ ଶାଶ୍ୱତ ଯଶ ପାଇବ।
Verse 45
श्रीमद्धिरात्मवद्धिस्तैर्बुद्धिमद्धिर्जितिन्द्रियै: | पाण्डवैर्विग्रहस्तात भ्रंशयेन्महत: सुखात्,“तात! श्रीमानू, मनस्वी, बुद्धिमान् तथा जितेन्द्रिय पाण्डवोंके साथ होनेवाला कलह तुम्हें महान् सुखसे वंचित कर देगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରିୟ, ଶ୍ରୀମନ୍ତ, ଆତ୍ମସଂଯମୀ, ବୁଦ୍ଧିମାନ ଓ ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ବିଗ୍ରହ ତୁମକୁ ମହାସୁଖରୁ ବଞ୍ଚିତ କରିଦେବ।
Verse 46
निगृहा सुहृदां मन्युं शाधि राज्यं यथोचितम् । स्वमंशं पाण्डुपुत्रेभ्य: प्रदाय भरतर्षभ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସୁହୃଦମାନଙ୍କ କ୍ରୋଧକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରି ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ରାଜ୍ୟ ଶାସନ କର। ହେ ଭରତବୃଷଭ, ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ସ୍ୱଭାଗ ଦିଅ।
Verse 47
“भरतश्रेष्ठ! तुम पाण्डवोंको उनका राज्यभाग देकर सुहृदोंके बढ़ते हुए क्रोधको शान्त कर दो और अपने राज्यका यथोचित रीतिसे शासन करते रहो ।। अलमड़ निकारो<यं त्रयोदश समा: कृतः । शमयैनं महाप्राज्ञ कामक्रोधसमेधितम्,बेटा! पाण्डवोंको जो तेरह वर्षोके लिये निर्वासित कर दिया गया, यही उनका महान अपकार हुआ है। महामते! तुम्हारे काम और क्रोधसे इस अपकारकी और भी वृद्धि हुई है। अब तुम संधिके द्वारा इसे शान्त कर दो
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ରାଜ୍ୟଭାଗ ଦେଇ ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ବଢ଼ୁଥିବା କ୍ରୋଧକୁ ଶାନ୍ତ କର; ତାପରେ ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ନିଜ ରାଜ୍ୟ ଶାସନ କର। ଏହି ଅନ୍ୟାୟ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ—ତେର ବର୍ଷ ନିର୍ବାସରେ କଟିଗଲା। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଏହି ବନବାସ ହିଁ ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ମହା ଅପକାର ଥିଲା; ତୁମ କାମ ଓ କ୍ରୋଧ ତାହାକୁ ଆହୁରି ବଢ଼ାଇଛି। ଏବେ ସନ୍ଧି ଦ୍ୱାରା ଏହାକୁ ଶମନ କର।
Verse 48
न चैष शक्तः पार्थानां यस्त्वमर्थमभीप्ससि । सूतपुत्रो दृढक्रोधो भ्राता दुःशासनश्व ते,“तुम जो कुन्तीके पुत्रोंका धन हड़प लेना चाहते हो, ऐसा करनेकी तुम्हारी शक्ति नहीं है। क्रोधको दृढ़तापूर्वक धारण करनेवाला सूतपुत्र कर्ण तथा तुम्हारा भाई दुःशासन--ये दोनों भी ऐसा करनेमें समर्थ नहीं हैं
ତୁମେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନଙ୍କର ଧନ ହଡ଼ପ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ; କିନ୍ତୁ ତାହା କରିବାର ଶକ୍ତି ତୁମର ନାହିଁ। ସୂତପୁତ୍ର, ଦୃଢକ୍ରୋଧୀ କର୍ଣ୍ଣ ଓ ତୁମ ଭାଇ ଦୁଃଶାସନ—ଏ ଦୁଇଜଣ ମଧ୍ୟ ତାହା ସାଧନ କରିପାରିବେ ନାହିଁ।
Verse 49
भीष्मे द्रोणे कृपे कर्णे भीमसेने धनंजये । धृष्टयुम्ने च संक्रुद्धे न स्युः सर्वा: प्रजा ध्रुवम्,“जिस समय भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा भीमसेन, अर्जुन और धृष्टद्युम्न--ये अत्यन्त कुपित होकर परस्पर युद्ध करेंगे, उस समय सारी प्रजाका विनाश अवश्यम्भावी है
ଯେତେବେଳେ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ, କର୍ଣ୍ଣ, ଭୀମସେନ, ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଓ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ପରସ୍ପର ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ, ସେତେବେଳେ ନିଶ୍ଚୟ ଭାବେ ସମସ୍ତ ପ୍ରଜାର ବିନାଶ ହେବ।
Verse 50
अमर्षवशमापतन्नो मा कुरूंस्तात जीघन: । एषा हि पृथिवी कृत्स्ना मा गमत् त्वत्कृते वधम्,“तात! तुम क्रोधके वशीभूत होकर समस्त कौरवोंका वध न कराओ। तुम्हारे लिये इस सम्पूर्ण भूमण्डलका विनाश न हो
ତାତ! କ୍ରୋଧର ବଶୀଭୂତ ହୋଇ ସମସ୍ତ କୌରବମାନଙ୍କର ବଧ ଘଟାଅ ନାହିଁ। ତୁମ ପାଇଁ ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ବିନାଶକୁ ନ ଯାଉ।
Verse 51
यच्च त्वं मन्यसे मूढ भीष्मद्रोणकृपादय: । योत्स्यन्ते सर्वशक्त्येति नैतदद्योपपद्यते,'मूढ़! तुम जो यह समझ रहे हो कि भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदि अपनी पूरी शक्ति लगाकर मेरी ओरसे युद्ध करेंगे, यह इस समय कदापि सम्भव नहीं है
ହେ ମୂଢ! ତୁମେ ଯେ ଭାବୁଛ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ ଆଦି ମୋ ପକ୍ଷରୁ ସମସ୍ତ ଶକ୍ତି ଲଗାଇ ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ—ଏହା ଆଜିର ସମୟରେ କେବେ ମଧ୍ୟ ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ।
Verse 52
समं हि राज्यं प्रीतिश्व स्थानं हि विदितात्मनाम् । पाण्डवेष्वथ युष्मासु धर्मस्त्वभ्यधिकस्तत:,“क्योंकि इन आत्मज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें इस राज्यका पाण्डवों अथवा तुमलोगोंके पास रहना समान ही है। इनके हृदयमें दोनोंके लिये एक-सा ही प्रेम और स्थान है तथा राज्यसे भी बढ़कर ये धर्मको महत्त्व देते हैं
ଆତ୍ମଜ୍ଞ ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟିରେ ରାଜ୍ୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖରେ ରହୁ କି ତୁମମାନଙ୍କ ପାଖରେ—ଦୁହେଁ ସମାନ। ଉଭୟ ପକ୍ଷ ପ୍ରତି ତାଙ୍କ ହୃଦୟରେ ସମାନ ପ୍ରେମ ଓ ସମାନ ସ୍ଥାନ ଅଛି; କିନ୍ତୁ ରାଜ୍ୟଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମକୁ ସେମାନେ ଅଧିକ ମହତ୍ତ୍ୱ ଦିଅନ୍ତି।
Verse 53
राजपिण्डभयादेते यदि हास्यन्ति जीवितम् । नहि शक्ष्यन्ति राजानं युधिष्ठिरमुदीक्षितुम्,“इस राज्यका इन्होंने जो अन्न खाया है, उसके भयसे यद्यपि ये तुम्हारी ओरसे लड़कर अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे, तथापि राजा युधिष्ठिरकी ओर कभी वक्र दृष्टिसे नहीं देख सकेंगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜପିଣ୍ଡ (ରାଜାଙ୍କ ଅନ୍ନ) ଖାଇଥିବା ଭୟ ଓ ଋଣବନ୍ଧନରୁ ଏମାନେ ତୁମ ପକ୍ଷରେ ଯୁଦ୍ଧ କରି ପ୍ରାଣ ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରିପାରନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସେମାନେ କେବେ ମଧ୍ୟ ବାଙ୍କା, ଶତ୍ରୁଭାବପୂର୍ଣ୍ଣ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଦେଖିପାରିବେ ନାହିଁ।
Verse 54
न लोभादर्थसम्पत्तिर्नराणामिह दृश्यते । तदलं तात लोभेन प्रशाम्य भरतर्षभ,“तात भरतश्रेष्ठ) इस संसारमें केवल लोभ करनेसे किसीको धनकी प्राप्ति होती नहीं दिखायी देती; अतः लोभसे कुछ सिद्ध होनेवाला नहीं है। तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो'
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାତ! ଏହି ସଂସାରରେ କେବଳ ଲୋଭରୁ ମନୁଷ୍ୟମାନେ ସତ୍ୟ ସମୃଦ୍ଧି ପାଆନ୍ତି ବୋଲି ଦେଖାଯାଏ ନାହିଁ। ତେଣୁ, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଲୋଭ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ—ତାହାକୁ ଶମନ କର; ଶାନ୍ତ ହେଅ; ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି କର।
Verse 116
यो जानन् पापतामस्य तत्प्रज्ञामनुवर्तसे । महाराज! आपको अपना बेटा बहुत प्रिय है, अतः वर्तमान परिस्थितिके लिये आप ही अत्यन्त निन्दनीय हैं; क्योंकि आप उसके पापपूर्ण विचारोंको जानते हुए भी सदा उसीकी बुद्धिका अनुसरण करते हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ତାହାର ପାପମୟ ପ୍ରବୃତ୍ତିକୁ ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ସେହି ବୁଦ୍ଧିକୁ ଅନୁସରଣ କରୁଛ। ପୁତ୍ର ତୁମକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ; ଏହି କାରଣରୁ ବର୍ତ୍ତମାନ ପରିସ୍ଥିତିରେ ତୁମେ ହିଁ ବିଶେଷ ନିନ୍ଦନୀୟ—କାରଣ ତାହାର ଦୁଷ୍ଟ ସଙ୍କଳ୍ପ ଜାଣି ସୁଦ୍ଧା ତୁମେ ସେହିପରି ଚାଲୁଛ।
Verse 128
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक एक सौ अद्ढाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣବାକ୍ୟବିଷୟକ ଏକଶତ ଅଷ୍ଟାବିଂଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 129
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गान्धारीवाक्ये एकोनत्रिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଗାନ୍ଧାରୀବାକ୍ୟବିଷୟକ ଏକଶତ ଏକୋନତ୍ରିଂଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Whether political advantage justifies coercion against an envoy/guest: the chapter frames Duryodhana’s plan to seize Kṛṣṇa as a breach of dharma and diplomatic norms, contrasting expedient power tactics with legitimate governance.
Strategic success cannot be separated from ethical legitimacy: counsel that violates dharma (treachery, disproportionate force, contempt for norms) produces predictable political collapse and personal ruin, even if it appears tactically attractive.
No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-commentary is implicit—understanding the episode clarifies how intent and counsel (good or corrupt) function as causal drivers in the epic’s moral-political framework.