Adhyaya 4
Anushasana ParvaAdhyaya 465 Verses

Adhyaya 4

Viśvāmitra-janma: Ṛcīka–Satyavatī–Gādhi and the Charu Exchange (विश्वामित्र-जन्म: ऋचीक–सत्यवती–गाधि वृत्तान्तः)

Upa-parva: Viśvāmitra-janma-vṛttānta (Genealogy and Birth-Account of Viśvāmitra)

Bhīṣma begins by proposing a principled account of how Viśvāmitra attained brāhmaṇa status and brahmarṣi standing. He traces a Bharata-line genealogy culminating in Kuśika and his son Gādhi, who—while dwelling in a forest—has a daughter Satyavatī. The sage Ṛcīka (Cyavana’s son) seeks her hand; Gādhi refuses, judging him poor, and demands as bride-price a thousand swift horses of moonlike radiance with dark ears. Ṛcīka petitions Varuṇa, and the horses arise from the Gaṅgā at a site remembered as Aśvatīrtha; Gādhi, astonished and wary of curse, gives Satyavatī in marriage. Ṛcīka offers boons and prepares two mantra-purified charu portions and prescribes distinct tree-embrace rites for Satyavatī and her mother to produce a brāhmaṇa-ideal son and a kṣatriya-ideal son respectively. Due to maternal request, Satyavatī exchanges the charu and the tree-protocol, prompting Ṛcīka to explain the now-inverted outcomes: Satyavatī will bear a formidable kṣatriya son; her mother will bear a brāhmaṇa- श्रेष्ठ son. Satyavatī petitions that the kṣatriya ferocity shift to her grandson, and Ṛcīka assents; thus Satyavatī bears Jamadagni, while Gādhi’s wife bears Viśvāmitra, later attaining brahmarṣi status. The chapter closes by listing Viśvāmitra’s many descendants and reaffirming that his brahminhood is established through Ṛcīka’s brahmanic infusion and subsequent realization, with Bhīṣma inviting further questions to resolve doubts.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि वे विश्वामित्र के ब्राह्मणत्व-प्राप्ति और ब्रह्मर्षित्व के यथार्थ प्रसंग को क्रम से सुनें—एक क्षत्रिय का ऋषि-शिखर तक उठना स्वयं कथा का आकर्षण बन जाता है। → वंश-परंपरा और जन्म-कथा के साथ ऋचीक (भृगुवंशी) का प्रसंग उभरता है—वरुण से दिव्य अश्वों का वरदान, गंगा-जल से चन्द्रकान्ति वाले घोड़ों का प्रकट होना, और फिर विश्वामित्र के पुत्रों/वंशजों के नामों का विस्तार; यह सब संकेत देता है कि तप, मन्त्र-बल और दैवी अनुग्रह मिलकर ‘जन्म’ को भी अर्थ देते हैं। → ऋचीक द्वारा ‘परम ब्रह्मतेज’ का आधान—यह निर्णायक बिन्दु है जहाँ कथा स्पष्ट करती है कि विश्वामित्र का तेज केवल राजवंशीय नहीं, बल्कि सोम-सूर्य-अग्नि-सदृश आध्यात्मिक प्रभा से संयुक्त है; यहीं क्षत्रिय-देह में ब्रह्मर्षि-सम्भावना का शिखर उद्घाटित होता है। → भीष्म विश्वामित्र के जन्म-वृत्तान्त को समेटते हुए उनके पुत्रों को ‘ब्रह्मवादिन’ मुनि बताते हैं और वंश-परंपरा को स्थिर करते हैं—कथा का निष्कर्ष यह कि तप, संस्कार और ब्रह्मतेज मनुष्य की पहचान को रूपान्तरित कर सकते हैं। → विश्वामित्र-परंपरा के आगे के उपाख्यानों और उनके वंश में धर्म-आचरण/व्रत-परम्परा के विस्तृत फलितार्थ की ओर संकेत।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माजल बछ। जि चतुथों5 ध्याय: आजमीढके वंशका वर्णन तथा विश्वामित्रके जन्मकी कथा और उनके पुत्रोंके नाम भीष्म उवाच श्रूयतां पार्थ तत्त्वेन विश्वामित्रो यथा पुरा । ब्राह्मणत्वं गतस्तात ब्रद्यूर्षित्वं तथैव च

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ପାର୍ଥ, ତତ୍ତ୍ୱରୂପେ ଶୁଣ; ପୁରାତନ କାଳରେ ବିଶ୍ୱାମିତ୍ର କିପରି ବ୍ରାହ୍ମଣତ୍ୱ ପ୍ରାପ୍ତ କଲେ ଏବଂ ସେହିପରି ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି ପଦକୁ ମଧ୍ୟ ପାଇଲେ।

Verse 2

भीष्मजीने कहा--तात! कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें विश्वामित्रजीने जिस प्रकार ब्राह्मणत्व तथा ब्रह्मर्षित्व प्राप्त किया, वह प्रसंग यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनो ।। भरतस्यान्वये चैवाजमीढो नाम पार्थिव: । बभूव भरतश्रेष्ठ यज्वा धर्मभूतां वर:,भरतवंशमें अजमीढ नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। भरतश्रेष्ठ) वे राजा अजमीढ यज्ञकर्ता एवं धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ତାତ, କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ, ମୁଁ ଯଥାକ୍ରମେ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ କହୁଛି—ଶୁଣ; ପୁରାତନ କାଳରେ ବିଶ୍ୱାମିତ୍ର କିପରି ବ୍ରାହ୍ମଣତ୍ୱ ଏବଂ ପରେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି ପଦ ପ୍ରାପ୍ତ କଲେ। ଭରତବଂଶରେ ଅଜମୀଢ ନାମକ ଏକ ରାଜା ହେଲେ; ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ସେ ଯଜ୍ଞକର୍ତ୍ତା ଏବଂ ଧର୍ମାତ୍ମାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଥିଲେ।

Verse 3

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें विशज्वामित्रका उपाख्यानविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ,तस्य पुत्रो महानासीज्जह्लुर्नाम नरेश्वर: । दुहितृत्वमनुप्राप्ता गड़ा यस्य महात्मन: उनके पुत्र महाराज जह्लु हुए, जिन महात्मा नरेशके समीप जाकर गंगाजी पुत्रीभावको प्राप्त हुई थीं

ତାଙ୍କର ପୁତ୍ର ଜହ୍ନୁ ନାମକ ମହାନ୍ ନରେଶ ଥିଲେ। ସେହି ମହାତ୍ମା ରାଜାଙ୍କ ପାଖରେ ଗଙ୍ଗା ପୁତ୍ରୀଭାବ ପ୍ରାପ୍ତ କଲେ—ଅର୍ଥାତ୍ ତାଙ୍କର କନ୍ୟା ଭାବେ ଗଣ୍ୟ ହେଲେ।

Verse 4

तस्यात्मजस्तुल्यगुण: सिन्धुद्वीपो महायशा: । सिन्धुद्वीपाच्च राजर्षिबलाकाश्वो महाबल:,जह्के पुत्रका नाम सिन्धुद्वीप था, जो पिताके समान ही गुणवान्‌ और महायशस्वी थे। सिन्धुद्वीपसे महाबली राजा बलाकाश्वका जन्म हुआ था इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विश्वामित्रोपाख्याने चतुर्थोडध्याय:

ତାଙ୍କର ପୁତ୍ର ସିନ୍ଧୁଦ୍ୱୀପ—ପିତାଙ୍କ ସମାନ ଗୁଣବାନ୍ ଏବଂ ମହାଯଶସ୍ବୀ। ସିନ୍ଧୁଦ୍ୱୀପରୁ ମହାବଳୀ ରାଜର୍ଷି ବଲାକାଶ୍ୱ ଜନ୍ମ ନେଲେ।

Verse 5

वल्लभस्तस्य तनय: साक्षाद्धर्म इवापर: | कुशिकस्तस्य तनय: सहस्राक्षसमद्युति:,बलाकाश्च॒का पुत्र वललभनामसे प्रसिद्ध हुआ, जो साक्षात्‌ दूसरे धर्मके समान था। वल्लभके पुत्र कुशिक हुए, जो इन्द्रके समान तेजस्वी थे

ତାଙ୍କର ପୁତ୍ର ବଲ୍ଲଭ—ମନେ ହେଉଥିଲା ସାକ୍ଷାତ୍ ଧର୍ମଙ୍କ ଅନ୍ୟ ରୂପ। ବଲ୍ଲଭଙ୍କ ପୁତ୍ର କୁଶିକ—ସହସ୍ରାକ୍ଷ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସମ ଦ୍ୟୁତିମାନ।

Verse 6

कुशिकस्यात्मज: श्रीमान्‌ गाधिनाम जनेश्वर: । अपुत्र: प्रसवेनार्थी वनवासमुपावसत्‌,कुशिकके पुत्र महाराज गाधि हुए, जो दीर्घकालतक पुत्रहीन रह गये। तब संतानकी इच्छासे पुण्यकर्म करनेके लिये वे वनमें रहने लगे

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—କୁଶିକଙ୍କ ଶ୍ରୀମାନ୍ ପୁତ୍ର, ଜନେଶ୍ୱର ଗାଧି, ଦୀର୍ଘକାଳ ଅପୁତ୍ର ଥିଲେ। ସନ୍ତାନଲାଭ ଆକାଂକ୍ଷାରେ ସେ ବନବାସ କରି ତପ ଓ ପୁଣ୍ୟକର୍ମ ଅନୁଷ୍ଠାନ କଲେ।

Verse 7

कन्या जज्ञे सुतात्‌ तस्य वने निवसत: सतः । नाम्ना सत्यवती नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि,वहाँ रहते समय सोमयाग करनेसे राजाके एक कन्या हुई, जिसका नाम सत्यवती था। भूतलपर कहीं भी उसके रूप और सौन्दर्यकी तुलना नहीं थी

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସେ ରାଜା ବନରେ ବସୁଥିବାବେଳେ ତାଙ୍କର ଏକ କନ୍ୟା ଜନ୍ମ ନେଲା। ତାହାର ନାମ ସତ୍ୟବତୀ; ପୃଥିବୀରେ ତାହାର ରୂପର ସମାନ ନଥିଲା।

Verse 8

गीताप्रेस, गोरखपुर गा $/॥६८-0: ५4 शिव-पार्वती बालकको जिलानेकी प्रतिज्ञा भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा उत्तराके मृत ह-ल-. हा पार्ववीजी भगवान्‌ शडकरको शरीरधारिणी समस्त नदियोंका परिचय दे रही हैं | । / 8) ञ्क शा ५ गीताप्रेस, गोरखपुर युधिछ्ठिरका अपने आश्रित कुत्तेके लिये त्याग पुरुषोत्तम भगवान्‌ विष्णु तां वच्रे भार्गव: श्रीमांक्ष्यवनस्यथात्मसम्भव: । ऋचीक इति विख्यातो विपुले तपसि स्थित:,उन दिनों च्यवनके पुत्र भृगुवंशी श्रीमान्‌ ऋचीक विख्यात तपस्वी थे और बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न रहते थे। उन्होंने राजा गाधिसे उस कन्याको माँगा

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସେ ସମୟରେ ଚ୍ୟବନଙ୍କ ପୁତ୍ର, ଭାର୍ଗବବଂଶୀ ଶ୍ରୀମାନ୍ ‘ଋଚୀକ’ ନାମରେ ବିଖ୍ୟାତ ମହାତପସ୍ବୀ ବିପୁଳ ତପସ୍ୟାରେ ନିଷ୍ଠିତ ଥିଲେ। ସେ ଏହି କନ୍ୟାକୁ ବରଣ କରିବାକୁ ରାଜା ଗାଧିଙ୍କ ନିକଟେ ପ୍ରାର୍ଥନା କଲେ।

Verse 9

सतां न प्रददौ तस्मै ऋचीकाय महात्मने । दरिद्र इति मत्वा वै गाधि: शत्रुनिबर्हण:,शत्रुसूदन_ गाधिने महात्मा ऋचीकको दरिद्र समझकर उन्हें अपनी कन्या नहीं दी

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁନିବର୍ହଣ ଗାଧି ମହାତ୍ମା ଋଚୀକଙ୍କୁ ଦରିଦ୍ର ଭାବି ସେହି ସତ୍ପୁରୁଷଙ୍କୁ ନିଜ କନ୍ୟା ଦେଲେ ନାହିଁ।

Verse 10

प्रत्याख्याय पुनर्यातमब्रवीद्‌ राजसत्तम: । शुल्कं॑ प्रदीयतां महां ततो वत्स्यसि मे सुताम्‌,उनके इनकार कर देनेपर जब महर्षि लौटने लगे तब नृपश्रेष्ठ गाधिने उनसे कहा --'महर्षे! मुझे शुल्क दीजिये, तब आप मेरी पुत्रीको विवाहद्वारा प्राप्त कर सकेंगे”

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ପ୍ରତ୍ୟାଖ୍ୟାନ ପାଇ ମହର୍ଷି ଯେତେବେଳେ ପୁନର୍ବାର ଫେରିଯିବାକୁ ଲାଗିଲେ, ସେତେବେଳେ ରାଜସତ୍ତମ ଗାଧି କହିଲେ—“ମହର୍ଷେ! ମହାନ୍ ଶୁଲ୍କ ଦିଅ; ତାହାପରେ ତୁମେ ବିବାହଦ୍ୱାରା ମୋ କନ୍ୟାକୁ ପାଇବ।”

Verse 11

ऋचीक उवाच कि प्रयच्छामि राजेन्द्र तुभ्यं शुल्कमहं नूप । दुहितुर्ब्रहयासंसक्तो माभूत्‌ तत्र विचारणा,ऋचीकने पूछा--राजेन्द्र! मैं आपकी पुत्रीके लिये आपको क्या शुल्क दूँ? आप निस्संकोच होकर बताइये। नरेश्वर! इसमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

ଋଚୀକ କହିଲେ—ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଆପଣଙ୍କ କନ୍ୟା ପାଇଁ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ କେଉଁ ଶୁଳ୍କ ଦେବି? ନରେଶ୍ୱର! ନିଃସଙ୍କୋଚରେ କହନ୍ତୁ; ମୋର ବ୍ରହ୍ମନିଷ୍ଠା ଦେଖି ଏଠାରେ କୌଣସି ସନ୍ଦେହ କିମ୍ବା ଅନ୍ୟଥା ଭାବନା କରିବେ ନାହିଁ।

Verse 12

गाधिरुवाच चन्द्ररश्मिप्रकाशानां हयानां वातरंहसाम्‌ | एकतः: श्यामकर्णानां सहस्रं देहि भार्गव,गाधिने कहा--भूगुनन्दन! आप मुझे शुल्करूपमें एक हजार ऐसे घोड़े ला दीजिये जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ और वायुके समान वेगवान्‌ हों तथा जिनका एक-एक कान श्याम रंगका हो

ଗାଧି କହିଲେ—ଭାର୍ଗବ! ଶୁଳ୍କରୂପେ ମୋତେ ଏକ ହଜାର ଘୋଡ଼ା ଦିଅ; ସେମାନେ ଚନ୍ଦ୍ରକିରଣ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ, ପବନ ପରି ବେଗବାନ, ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକର ଗୋଟିଏ କାନ ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣ ହେଉ।

Verse 13

भीष्म उवाच ततः स भृगुशार्दूलक्ष्यवनस्यात्मज: प्रभु: । अब्रवीद्‌ वरुणं देवमादित्यं पतिमम्भसाम्‌,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तब भृगुश्रेष्ठ च्यवनपुत्र शक्तिशाली महर्षि ऋचीकने जलके स्वामी अदितिनन्दन वरुणदेवके पास जाकर कहा--

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ତାପରେ ଭୃଗୁଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଚ୍ୟବନପୁତ୍ର, ପ୍ରଭାବଶାଳୀ ମହର୍ଷି ଋଚୀକ ଜଳର ଅଧିପତି ଆଦିତ୍ୟ ବରୁଣଦେବଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ତାଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।

Verse 14

एकत: श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम्‌ । सहसतरं वातवेगानां भिक्षे त्वां देवसत्तम,“देवशिरोमणे! मैं आपसे चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ तथा वायुके समान वेगवान्‌ एक हजार ऐसे घोड़ोंकी भिक्षा माँगता हूँ जिनका एक ओरका कान श्याम रंगका हो”

“ଦେବଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ ଭିକ୍ଷା ମାଗୁଛି—ଚନ୍ଦ୍ର ପରି କାନ୍ତିମାନ, ପବନ ପରି ବେଗବାନ, ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକର ଗୋଟିଏ କାନ ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣ ଥିବା ଏକ ହଜାର ଘୋଡ଼ା।”

Verse 15

तथेति वरुणो देव आदित्यो भृगुसत्तमम्‌ | उवाच यत्र ते छन्दस्तत्रोत्थास्यन्ति वाजिन:,तब अदितिनन्दन वरुणदेवने उन भृगुश्रेष्ठ ऋच्चीकसे कहा--बहुत अच्छा, जहाँ आपकी इच्छा होगी, वहींसे इस तरहके घोड़े प्रकट हो जायँगे”

ତେବେ ଆଦିତିନନ୍ଦନ ବରୁଣଦେବ ଭୃଗୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ଋଚୀକଙ୍କୁ କହିଲେ—“ତଥାସ୍ତୁ। ଯେଉଁଠି ତୁମ ଇଚ୍ଛା ହେବ, ସେଠାରୁ ହିଁ ସେପରି ଘୋଡ଼ା ଉଦ୍ଭବିତ ହେବେ।”

Verse 16

ध्यातमात्रमचीकेन हयानां चन्द्रवर्चसाम्‌ | गड्ाजलात्‌ समुत्तस्थी सहस्नं विपुलौजसाम्‌,तदनन्तर ऋचीकके चिन्तन करते ही गंगाजीके जलसे चन्द्रमाके समान कान्तिवाले एक हजार तेजस्वी घोड़े प्रकट हो गये

ଋଚୀକ ମାତ୍ର ଧ୍ୟାନ କରିବା ସହିତେ, ଗଙ୍ଗାଜଳରୁ ଚନ୍ଦ୍ରସଦୃଶ କାନ୍ତିଯୁକ୍ତ, ମହାବଳୀ ଏକ ସହସ୍ର ଅଶ୍ୱ ଉଦ୍ଭବିତ ହେଲେ।

Verse 17

अदूरे कान्यकुब्जस्य गज्जायास्तीरमुत्तमम्‌ । अश्वतीर्थ तदद्यापि मानवै: परिचक्ष्यते,कन्नौजके पास ही गंगाजीका वह उत्तम तट आज भी मानवोंद्वारा अश्वतीर्थ कहलाता है

କାନ୍ୟକୁବ୍ଜର ନିକଟରେ ଗଙ୍ଗାର ଏକ ଉତ୍ତମ ତଟ ଅଛି; ଲୋକେ ଆଜି ମଧ୍ୟ ତାହାକୁ ଦେଖାଇ ‘ଅଶ୍ୱତୀର୍ଥ’ ବୋଲି କହନ୍ତି।

Verse 18

ततो वै गाधये तात सहस्र॑ं वाजिनां शुभम्‌ | ऋचीक: प्रददौ प्रीत: शुल्कार्थ तपतां वर:,तात! तब तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ ऋचीक मुनिने प्रसन्न होकर शुल्कके लिये राजा गाधिको वे एक हजार सुन्दर घोड़े दे दिये

ତତଃ, ହେ ତାତ! ତପସ୍ବୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଋଚୀକ ମୁନି ପ୍ରୀତ ହୋଇ ଶୁଲ୍କାର୍ଥେ ରାଜା ଗାଧିଙ୍କୁ ଶୁଭ ଏକ ସହସ୍ର ଅଶ୍ୱ ପ୍ରଦାନ କଲେ।

Verse 19

ततः स विस्मितो राजा गाधि: शापभयेन च । ददौ तां समलंकृत्य कन्यां भगुसुताय वै,तब आश्चर्यवचकित हुए राजा गाधिने शापके भयसे डरकर अपनी कन्याको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके भूगुनन्दन ऋचीकको दे दिया

ତେବେ ରାଜା ଗାଧି ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟଚକିତ ହେଲେ ଏବଂ ଶାପଭୟରେ ମଧ୍ୟ ଭୀତ ହେଲେ; ସେ କନ୍ୟାକୁ ବସ୍ତ୍ରାଭୂଷଣରେ ସୁଶୋଭିତ କରି ଭୃଗୁପୁତ୍ର ଋଚୀକଙ୍କୁ ଦାନ କଲେ।

Verse 20

जग्राह विधिवत्‌ पार्णिं तस्या ब्रह्मूर्षिसत्तम: | सा च त॑ं पतिमासाद्य पर हर्षमवाप ह,ब्रह्मर्षिशिरेमणि ऋचीकने उसका विधिवत्‌ पाणिग्रहण किया। वैसे तेजस्वी पतिको पाकर उस कन्याको भी बड़ा हर्ष हुआ

ବ୍ରହ୍ମର୍ଷିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଋଚୀକ ମୁନି ବିଧିପୂର୍ବକ ତାହାର ପାଣିଗ୍ରହଣ କଲେ। ସେ ମଧ୍ୟ ଏପରି ତେଜସ୍ବୀ ପତିକୁ ପାଇ ପରମ ହର୍ଷ ଲାଭ କଲା।

Verse 21

स तुतोष च ब्रद्यार्षिस्तस्या वृत्तेन भारत । छन्‍्दयामास चैवैनां वरेण वरवर्णिनीम्‌,भरतनन्दन! अपनी पत्नीके सद्व्यवहारसे ब्रह्मर्षि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने उस परम सुन्दरी पत्नीको मनोवांछित वर देनेकी इच्छा प्रकट की

ହେ ଭାରତ! ତାହାର ସଦ୍ବ୍ୟବହାରରେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ। ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ ସେଇ ପରମସୁନ୍ଦରୀକୁ କହିଲେ—“ତୁମେ ଯାହା ଇଚ୍ଛା କର, ସେଇ ବର ମାଗ; ମୁଁ ଦେବି।”

Verse 22

मात्रे तत्‌ सर्वमाचख्यौ सा कन्या राजसत्तम | अथ तामब्रवीन्माता सुतां किंचिदवाड्मुखी,नृपश्रेष्ठ तब उस राजकन्याने अपनी मातासे मुनिकी कही हुई सब बातें बतायीं। वह सुनकर उसकी माताने संकोचसे सिर नीचे करके पुत्रीसे कहा--

ହେ ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେଇ ରାଜକନ୍ୟା ମୁନି କହିଥିବା ସମସ୍ତ କଥା ମାତାଙ୍କୁ କହିଦେଲା। ତାହା ଶୁଣି ମାତା କିଛି ସଙ୍କୋଚରେ ମୁହଁ ନମାଇ କନ୍ୟାକୁ କହିଲେ।

Verse 23

ममापि पुत्रि भर्ता ते प्रसादं कर्तुमरहति । अपत्यस्य प्रदानेन समर्थश्न महातपा:,“बेटी! तुम्हारे पतिको पुत्र प्रदान करनेके लिये मुझपर भी कृपा करनी चाहिये, क्योंकि वे महान्‌ तपस्वी और समर्थ हैं!

“କନ୍ୟେ! ତୁମ ପତି ମୋ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ପ୍ରସାଦ କରିବା ଉଚିତ; କାରଣ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ସନ୍ତାନ ପ୍ରଦାନରେ ସମର୍ଥ। ମୁଁ ମହାତପସ୍ବୀ; ସେଇ ଶକ୍ତି ମୋର ଅଛି।”

Verse 24

ततः सा त्वरितं गत्वा तत्‌ सर्व प्रत्यवेदयत्‌ । मातुश्चिकीर्षितं राजन्चीकस्तामथाब्रवीत्‌,राजन! तदनन्तर सत्यवतीने तुरंत जाकर माताकी वह सारी इच्छा ऋचीकसे निवेदन की। तब ऋचीकने उससे कहा--

ହେ ରାଜନ୍! ତାପରେ ସତ୍ୟବତୀ ତୁରନ୍ତ ଯାଇ ସମସ୍ତ କଥା ଋଚୀକଙ୍କୁ ଜଣାଇଲା ଏବଂ ମାତାଙ୍କ ଇଚ୍ଛା ମଧ୍ୟ ନିବେଦନ କଲା। ତେବେ ଋଚୀକ ତାକୁ କହିଲେ।

Verse 25

गुणवन्तमपत्यं सा अचिराज्जनयिष्यति । मम प्रसादात्‌ कल्याणि माभूत्‌ ते प्रणयोडन्यूथा,“कल्याणि! मेरे प्रसादसे तुम्हारी माता शीघ्र ही गुणवान्‌ पुत्रको जन्म देगी। तुम्हारा प्रेमपूर्ण अनुरोध असफल नहीं होगा

“କଲ୍ୟାଣୀ! ମୋ ପ୍ରସାଦରେ ତୁମ ମାତା ଶୀଘ୍ର ଗୁଣବାନ୍ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେବେ। ତୁମ ପ୍ରେମପୂର୍ଣ୍ଣ ଅନୁରୋଧ ବ୍ୟର୍ଥ ହେବ ନାହିଁ।”

Verse 26

तव चैव गुणश्लाघी पुत्र उत्पत्स्यते महान्‌ अस्मद्वंशकर: श्रीमान्‌ सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते,“तुम्हारे गर्भसे भी एक अत्यन्त गुणवान्‌ और महान्‌ तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा, जो हमारी वंशपरम्पराको चलायेगा। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ

ତୁମ ଗର୍ଭରୁ ମଧ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଗୁଣବାନ, ମହାନ, ତେଜସ୍ବୀ ଓ ଶ୍ରୀସମ୍ପନ୍ନ ପୁତ୍ର ଜନ୍ମିବ, ଯେ ଆମ ବଂଶପରମ୍ପରାକୁ ଅଗ୍ରସର କରିବ। ମୁଁ ତୁମକୁ ଏହି ସତ୍ୟ କହୁଛି।

Verse 27

ऋतुस्नाता च साशथ्रत्थं त्वं च वृक्षमुदुम्बरम्‌ । परिष्वजेथा: कल्याणि तत एवमवाप्स्यथ:,“कल्याणि! तुम्हारी माता ऋतुस्नानके पश्चात्‌ पीपलके वृक्षका आलिंगन करे और तुम गूलरके वृक्षका। इससे तुम दोनोंको अभीष्ट पुत्रकी प्राप्ति होगी

କଲ୍ୟାଣି! ଋତୁସ୍ନାନ ପରେ ତୁମ ମାତା ଅଶ୍ୱତ୍ଥ (ପିପଳ) ବୃକ୍ଷକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରୁନ୍ତୁ, ଏବଂ ତୁମେ ଉଦୁମ୍ବର (ଗୁଲର) ବୃକ୍ଷକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କର। ଏହାଦ୍ୱାରା ତୁମେ ଉଭୟେ ଅଭୀଷ୍ଟ ପୁତ୍ର ପାଇବ।

Verse 28

चरुद्वयमिदं चैव मन्त्रपूतं शुचिस्मिते । त्वंच सा चोपभुज्जीतं ततः पुत्राववाप्स्थथ:,“पवित्र मुसकानवाली देवि! मैंने ये दो मन्त्रपूत चरु तैयार किये हैं। इनमेंसे एकको तुम खा लो और दूसरेको तुम्हारी माता। इससे तुम दोनोंको पुत्र प्राप्त होंगे!

ଶୁଚିସ୍ମିତେ ଦେବୀ! ମନ୍ତ୍ରପୂତ ଏହି ଦୁଇଟି ଚରୁ ମୁଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରିଛି। ଏଥିରୁ ଗୋଟିଏ ତୁମେ ଭୋଗ କର, ଅନ୍ୟଟି ତୁମ ମାତା। ତାହେଲେ ତୁମେ ଉଭୟେ ପୁତ୍ର ପାଇବ।

Verse 29

ततः सत्यवती हृष्टा मातरं प्रत्यभाषत । यदूचीकेन कथितं तच्चाचख्यौ चरुद्भधयम्‌,तब सत्यवतीने हर्षमग्न होकर ऋचीकने जो कुछ कहा था, वह सब अपनी माताको बताया और दोनोंके लिये तैयार किये हुए पृथक्‌ू-पृथक्‌ चरुओंकी भी चर्चा की

ତାପରେ ସତ୍ୟବତୀ ହର୍ଷିତ ହୋଇ ମାତାଙ୍କୁ କହିଲା। ଋଚୀକ ଯାହା କହିଥିଲେ ସେ ସବୁ ସେ ଜଣାଇଲା, ଏବଂ ଉଭୟଙ୍କ ପାଇଁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇଥିବା ଚରୁ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ କହିଲା।

Verse 30

तामुवाच ततो माता सुतां सत्यवतीं तदा । पुत्रि पूर्वोपपन्नाया: कुरुष्व वचनं मम,उस समय माताने अपनी पुत्री सत्यवतीसे कहा--“बेटी! माता होनेके कारण पहलेसे मेरा तुमपर अधिकार है; अतः तुम मेरी बात मानो”

ତେବେ ମାତା ସେହି ସମୟରେ ନିଜ କନ୍ୟା ସତ୍ୟବତୀଙ୍କୁ କହିଲେ—“କନ୍ୟେ! ମାତା ହେବାରୁ ତୁମ ଉପରେ ମୋର ପୂର୍ବାଧିକାର ଅଛି; ତେଣୁ ମୋ କଥା ମାନ।”

Verse 31

भर्त्रा य एष दत्तस्ते चरु्मन्त्रपुरस्कृत: । एनं प्रयच्छ महां त्वं मदीयं त्वं गृहाण च,“तुम्हारे पतिने जो मन्त्रपूत चरु तुम्हारे लिये दिया है, वह तुम मुझे दे दो और मेरा चरु तुम ले लो

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଦେବୀ! ତୁମ ସ୍ୱାମୀ ମନ୍ତ୍ରପୂତ କରି ଯେ ଚରୁ ତୁମକୁ ଦେଇଛନ୍ତି, ସେହିଟି ମୋତେ ଦିଅ; ଏବଂ ପ୍ରତିବଦଳରେ ମୋର ଚରୁ ତୁମେ ଗ୍ରହଣ କର।

Verse 32

व्यत्यासं वृक्षयोश्वापि करवाव शुचिस्मिते । यदि प्रमाणं वचनं मम मातुरनिन्दिते,“पवित्र हास्यवाली मेरी अच्छी बेटी! यदि तुम मेरी बात मानने योग्य समझो तो हमलोग वृक्षोंमें भी अदल-बदल कर लें"

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଶୁଚିସ୍ମିତେ, ଅନିନ୍ଦିତେ! ଆସ, ଦୁଇ ଗଛର ସ୍ଥାନ ମଧ୍ୟ ଆମେ ଅଦଳବଦଳ କରିବା। ଯଦି ତୁମେ ମୋ ମାତାଙ୍କ ବଚନକୁ ପ୍ରମାଣ ଓ ଗ୍ରହଣୀୟ ଭାବୁଛ, ତେବେ ଏମିତି ହେଉ।

Verse 33

स्वमपत्यं विशिष्ट हि सर्व इच्छत्यनाविलम्‌ । व्यक्त भगवता चात्र कृतमेवं भविष्यति,“प्रायः सभी लोग अपने लिये निर्मल एवं सर्वगुणसम्पन्न श्रेष्ठ पुत्रकी इच्छा करते हैं। अवश्य ही भगवान्‌ ऋचीकने भी चरु निर्माण करते समय ऐसा तारतम्य रखा होगा

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ନିଶ୍ଚୟ ହିଁ ସମସ୍ତେ ନିଜ ପାଇଁ ନିର୍ମଳ ଓ ବିଶିଷ୍ଟ ସନ୍ତାନକୁ ଆକାଂକ୍ଷା କରନ୍ତି। ତେଣୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଯେ ଏଠାରେ ଭଗବାନ ଋଚୀକ ମଧ୍ୟ ଫଳ ଏମିତି ହେବାକୁ ନିଶ୍ଚିତ କରି ଏହି ବ୍ୟବସ୍ଥା କରିଥିବେ।

Verse 34

ततो मे त्वच्चरी भाव: पादपे च सुमध्यमे । कथं विशिष्टो भ्राता मे भवेदित्येव चिन्तय,'सुमध्यमे! इसीलिये तुम्हारे लिये नियत किये गये चरु और वृक्षमें मेरा अनुराग हुआ है। तुम भी यही चिन्तन करो कि मेरा भाई किसी तरह श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो”

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ସୁମଧ୍ୟମେ! ଏହି କାରଣରୁ ତୁମ ପାଇଁ ନିୟତ ଚରୁ ଓ ସେହି ଗଛ ପ୍ରତି ମୋର ଅନୁରାଗ ହୋଇଛି। ତୁମେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଏକଥା ଚିନ୍ତା କର—‘ମୋର ଭ୍ରାତା କିପରି ବିଶିଷ୍ଟ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗୁଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ ହେବ?’

Verse 35

तथा च कृतवत्यौ ते माता सत्यवती च सा । अथ गर्भावनुप्राप्ते उभे ते वै युधिछ्ठिर,युधिष्ठिररे इस तरह सलाह करके सत्यवती और उसकी माताने उसी तरह उन दोनों वस्तुओंका अदल-बदलकर उपयोग किया। फिर तो वे दोनों गर्भवती हो गयीं

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତାପରେ ତୁମ ମାତା ଓ ସେହି ସତ୍ୟବତୀ—ଦୁହେଁ କୁହାଯାଇଥିବା ପରି ହିଁ କଲେ। ଏବଂ କାଳକ୍ରମେ ସେମାନେ ଦୁହେଁ ଗର୍ଭବତୀ ହେଲେ।

Verse 36

दृष्टवा गर्भगनुप्राप्तां भार्या स च महानृषि: । उवाच तां सत्यवतीं दुर्मना भृगुसत्तम:

ସତ୍ୟବତୀ ଗର୍ଭବତୀ ହୋଇଛନ୍ତି ବୋଲି ଦେଖି, ଭୃଗୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେଇ ମହର୍ଷିଙ୍କ ମନ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବ୍ୟାକୁଳ ହେଲା। ତାପରେ ସେ ଦୁଃଖିତ ହୃଦୟରେ ସତ୍ୟବତୀଙ୍କୁ କହିଲେ।

Verse 37

अपनी पत्नी सत्यवतीको गर्भवती अवस्थामें देखकर भृगुश्रेष्ठ महर्षि ऋचीकका मन खिन्न हो गया ।। व्यत्यासेनोपयुक्तस्ते चरुव्यक्त भविष्यति । व्यत्यास: पादपे चापि सुव्यक्तं ते कृत: शुभे,उन्होंने कहा--'शुभे! जान पड़ता है तुमने बदलकर चरुका उपयोग किया है। इसी तरह तुमलोगोंने वृक्षोंके आलिंगनमें भी उलट-फेर कर दिया है--ऐसा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है

ପତ୍ନୀ ସତ୍ୟବତୀ ଗର୍ଭବତୀ ହୋଇଥିବାକୁ ଦେଖି ଭୃଗୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହର୍ଷି ଋଚୀକଙ୍କ ମନ ଖିନ୍ନ ହେଲା। ସେ କହିଲେ—“ଶୁଭେ! ତୁମେ ଚରୁ (ଯଜ୍ଞପାୟସ)କୁ ଉଲଟାକ୍ରମରେ ବ୍ୟବହାର କରିଛ—ଏହା ସ୍ପଷ୍ଟ। ଏବଂ ବୃକ୍ଷାଲିଙ୍ଗନର ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ତୁମେମାନେ ଅଦଳବଦଳ କରିଛ—ଏହା ମଧ୍ୟ ପ୍ରକାଶ।”

Verse 38

मया हि विश्व यद्ब्रह्मा त्वच्चरौ संनिवेशितम्‌ । क्षत्रवीर्य च सकल॑ चरौ तस्या निवेशितम्‌,“मैंने तुम्हारे चरुमें सम्पूर्ण ब्रह्मतजका संनिवेश किया था और तुम्हारी माताके चसरुमें समस्त क्षत्रियोचित शक्तिकी स्थापना की थी”

“ମୁଁ ତୁମ ଚରୁରେ ସମଗ୍ର ବ୍ରାହ୍ମତେଜ ନିବେଶ କରିଥିଲି, ଏବଂ ତୁମ ମାତାଙ୍କ ଚରୁରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କ୍ଷତ୍ରିୟ-ବୀର୍ୟ ସ୍ଥାପନ କରିଥିଲି।”

Verse 39

त्रैलोक्यविख्यातगुएणं त्वं विप्रं जनयिष्यसि । साच क्षत्रं विशिष्ट वै तत एतत्‌ कृतं मया,“मैंने सोचा था कि तुम त्रिभुवनमें विख्यात गुणवाले ब्राह्मणको जन्म दोगी और तुम्हारी माता सर्वश्रेष्ठ क्षत्रियकी जननी होगी। इसीलिये मैंने दो तरहके चरुओंका निर्माण किया था

“ମୋର ଭାବନା ଥିଲା—ତୁମେ ତ୍ରିଲୋକରେ ବିଖ୍ୟାତ ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ଏକ ବ୍ରାହ୍ମଣକୁ ଜନ୍ମ ଦେବ, ଏବଂ ତୁମ ମାତା ଏକ ବିଶିଷ୍ଟ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କ ଜନନୀ ହେବେ; ସେହିପାଇଁ ମୁଁ ଏହି ବ୍ୟବସ୍ଥା କରିଥିଲି।”

Verse 40

व्यत्यासस्तु कृतो यस्मात्‌ त्वया मात्रा च ते शुभे । तस्मात्‌ सा ब्राह्मण श्रेष्ठ माता ते जनयिष्यति,'शुभे! तुमने और तुम्हारी माताने अदला-बदली कर ली है, इसलिये तुम्हारी माता श्रेष्ठ ब्राह्मणपुत्रको जन्म देगी और भटद्रे! तुम भयंकर कर्म करनेवाले क्षत्रियकी जननी होओगी। भाविनि! माताके स्नेहमें पड़कर तुमने यह अच्छा काम नहीं किया”

“ଶୁଭେ! ତୁମେ ଓ ତୁମ ମାତା ଅଦଳବଦଳ କରିଥିବାରୁ, ତୁମ ମାତା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେବେ; ତୁମେ କ୍ଷତ୍ରିୟ-ସ୍ୱଭାବର, ଉଗ୍ର କର୍ମ କରୁଥିବା ପୁତ୍ରର ଜନନୀ ହେବ।”

Verse 41

क्षत्रियं तूग्रकर्माणं त्वं भद्रे जनयिष्यसि । नहि ते तत्‌ कृतं साधु मातृस्नेहेन भाविनि,'शुभे! तुमने और तुम्हारी माताने अदला-बदली कर ली है, इसलिये तुम्हारी माता श्रेष्ठ ब्राह्मणपुत्रको जन्म देगी और भटद्रे! तुम भयंकर कर्म करनेवाले क्षत्रियकी जननी होओगी। भाविनि! माताके स्नेहमें पड़कर तुमने यह अच्छा काम नहीं किया”

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଶୁଭେ! ତୁମେ ଉଗ୍ରକର୍ମା ଏକ କ୍ଷତ୍ରିୟକୁ ଜନ୍ମ ଦେବ। ଭାବିନି, ମାତୃସ୍ନେହର ଆସକ୍ତିରେ ତୁମେ ଯାହା କରିଛ, ତାହା ଶ୍ରେୟସ୍କର ନୁହେଁ। ତୁମେ ଓ ତୁମ ମାଆ କରିଥିବା ଅଦଳବଦଳରେ ତୁମ ମାଆ ବ୍ରାହ୍ମଣ-ଭାଗ୍ୟରେ ନିୟତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେବେ, ଏବଂ ତୁମେ ଭୟଙ୍କର କର୍ମର ଯୋଦ୍ଧାର ଜନନୀ ହେବ।

Verse 42

सा श्रुत्वा शोकसंतप्ता पपात वरवर्णिनी । भूमौ सत्यवती राजन्‌ छिन्नेव रुचिरा लता,राजन्‌! पतिकी यह बात सुनकर सुन्दरी सत्यवती शोकसे संतप्त हो वृक्षसे कटी हुई मनोहर लताके समान मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी

ସେ କଥା ଶୁଣି ବରବର୍ଣ୍ଣିନୀ ସତ୍ୟବତୀ ଶୋକରେ ଦଗ୍ଧ ହେଲେ। ହେ ରାଜନ୍, ସେ ଭୂମିରେ ଏମିତି ପଡ଼ିଗଲେ—ଯେପରି ଆଶ୍ରୟରୁ କଟା ମନୋହର ଲତା।

Verse 43

प्रतिलभ्य च सा संज्ञां शिरसा प्रणिपत्य च | उवाच भार्या भर्तरें गाधेयी भार्गवर्षभम्‌,थोड़ी देरमें जब उसे चेत हुआ, तब वह गाधिकुमारी अपने स्वामी भृूगुभूषण ऋचीकके चरणोंमें सिर रखकर प्रणामपूर्वक बोली--'ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्ष! मैं आपकी पत्नी हूँ, अतः आपसे कृपा-प्रसादकी भीख चाहती हूँ। आप ऐसी कृपा करें जिससे मेरे गर्भसे क्षत्रिय पुत्र उत्पन्न न हो

କିଛି ସମୟ ପରେ ସେ ସଞ୍ଜ୍ଞା ପାଇ ମୁଣ୍ଡ ନମାଇ ପ୍ରଣାମ କଲା। ତାପରେ ଗାଧିଙ୍କ କନ୍ୟା ଗାଧେୟୀ ଭୃଗୁବଂଶ-ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନିଜ ପତି ଋଚୀକଙ୍କୁ କହିଲା।

Verse 44

प्रसादयन्त्यां भार्यायां मयि ब्रह्मविदां वर । प्रसादं कुरु विप्र्॒ें न मे स्यात्‌ क्षत्रिय: सुत:,थोड़ी देरमें जब उसे चेत हुआ, तब वह गाधिकुमारी अपने स्वामी भृूगुभूषण ऋचीकके चरणोंमें सिर रखकर प्रणामपूर्वक बोली--'ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्ष! मैं आपकी पत्नी हूँ, अतः आपसे कृपा-प्रसादकी भीख चाहती हूँ। आप ऐसी कृपा करें जिससे मेरे गर्भसे क्षत्रिय पुत्र उत्पन्न न हो

ହେ ବ୍ରହ୍ମବିଦ୍ୟାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଆପଣଙ୍କ ଭାର୍ଯ୍ୟା ଯେତେବେଳେ ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରସାଦ ପାଇଁ ପ୍ରାର୍ଥନା କରୁଛି, ହେ ବିପ୍ରର୍ଷେ, ମୋପରେ କୃପା କରନ୍ତୁ—ମୋ ଗର୍ଭରୁ କ୍ଷତ୍ରିୟ ପୁତ୍ର ଜନ୍ମ ନେଉ ନାହିଁ।

Verse 45

काम ममोग्रकर्मा वै पौत्रो भवितुमर्हति । नतु मे स्यात्‌ सुतो ब्रद्म॒न्नेष मे दीयतां वर:,“मेरा पौत्र चाहे उग्रकर्मा क्षत्रियस्वभावका हो जाय; परंतु मेरा पुत्र वैसा न हो। ब्रह्मन! मुझे यही वर दीजिये”

ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଯଦି ଏମିତି ହେବାକୁ ହିଁ ପଡ଼େ, ତେବେ ମୋ ପୌତ୍ର ଉଗ୍ରକର୍ମା ହେଉ; କିନ୍ତୁ ମୋ ନିଜ ପୁତ୍ର ସେପରି ନ ହେଉ। ଏହି ଏକମାତ୍ର ବର ମୋତେ ଦିଅନ୍ତୁ।

Verse 46

एवमस्त्विति होवाच स्वां भार्या सुमहातपा: । ततः सा जनयामास जगदरग्निं सुतं शुभम्‌,तब उन महातपस्वी ऋषिने अपनी पत्नीसे कहा, “अच्छा, ऐसा ही हो”। तदनन्तर सत्यवतीने जमदग्निनामक शुभगुणसम्पन्न पुत्रको जन्म दिया

“ଏବମସ୍ତୁ”—ଏହିପରି କହି ସେ ମହାତପସ୍ବୀ ଋଷି ନିଜ ଭାର୍ଯ୍ୟାଙ୍କୁ କହିଲେ। ତାପରେ ସେ ଜମଦଗ୍ନି ନାମକ ଶୁଭଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ।

Verse 47

विश्वामित्रं चाजनयद्‌ गाधिभार्या यशस्विनी । ऋषे: प्रसादाद्‌ राजेन्द्र ब्रद्मर्षेब्रह्मयवादिनम्‌

ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଗାଧିଙ୍କ ଯଶସ୍ବିନୀ ଭାର୍ଯ୍ୟା ବିଶ୍ୱାମିତ୍ରଙ୍କୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ। ଋଷିଙ୍କ କୃପା-ପ୍ରସାଦରେ ସେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି ହେଲେ ଏବଂ ବ୍ରହ୍ମବାଦୀ ହେଲେ।

Verse 48

राजेन्द्र! उन्हीं ब्रह्मर्षिकि कृपा-प्रसादसे गाधिकी यशस्विनी पत्नीने ब्रह्मवादी विश्वामित्रको उत्पन्न किया ।। ततो ब्राह्मणतां यातो विश्वामित्रो महातपा: | क्षत्रिय: सोडप्यथ तथा ब्रह्म॒ुवंशस्य कारक:,इसीलिये महातपस्वी विश्वामित्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो ब्राह्मणवंशके प्रवर्तक हुए

ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ସେହି ବ୍ରହ୍ମର୍ଷିମାନଙ୍କ କୃପା-ପ୍ରସାଦରେ ଗାଧିଙ୍କ ଯଶସ୍ବିନୀ ଭାର୍ଯ୍ୟା ବ୍ରହ୍ମବାଦୀ ବିଶ୍ୱାମିତ୍ରଙ୍କୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ। ପରେ ମହାତପସ୍ବୀ ବିଶ୍ୱାମିତ୍ର—କ୍ଷତ୍ରିୟ ହୋଇ ମଧ୍ୟ—ବ୍ରାହ୍ମଣତ୍ୱ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ବ୍ରାହ୍ମଣବଂଶର ପ୍ରବର୍ତ୍ତକ ହେଲେ।

Verse 49

तस्य पुत्रा महात्मानो ब्रह्मुवंशविवर्धना: । तपस्विनो ब्रह्म॒विदो गोत्रकर्तार एव च,उन ब्रह्मवेत्ता तपस्वीके महामनस्वी पुत्र भी ब्राह्मणवंशकी वृद्धि करनेवाले और गोत्रकर्ता हुए

ତାଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ମହାତ୍ମା—ତପସ୍ବୀ ଓ ବ୍ରହ୍ମବିଦ୍—ବ୍ରାହ୍ମଣବଂଶକୁ ବୃଦ୍ଧି କରିଥିଲେ ଏବଂ ଗୋତ୍ରପ୍ରବର୍ତ୍ତକ ମଧ୍ୟ ହେଲେ।

Verse 50

मधुच्छन्दश्व भगवान्‌ देवरातश्न वीर्यवान्‌ | अक्षीणश्न शकुन्तश्न बश्रु: कालपथस्तथा,विश्वामित्रात्मजा: सर्वे मुनयो ब्रह्म॒वादिन: । भगवान्‌ मधुच्छन्दा, शक्तिशाली देवरात, अक्षीण, शकुन्त, बभ्ु, कालपथ, विख्यात याज्ञवल्क्य, महाव्रती स्थूण, उलूक, यमदूत, सैन्धवायन ऋषि, भगवान्‌ वल्गुजंघ, महर्षि गालव, वज्रमुनि, विख्यात सालंकायन, लीलाढ्य, नारद, कूर्चामुख, वादुलि, मुसल, वक्षोग्रीव, आड्ूप्रिक, नैकदृकू, शिलायूप, शित, शुचि, चक्रक, मारुतन्तव्य, वातघ्न, आश्वलायन, श्यामायन, गार्ग्य, जाबालि, सुश्रुत, कारीषि, संश्रुत्य, पर, पौरव, तन्‍्तु, महर्षि कपिल, मुनिवर ताडकायन, उपगहन, आसुरायण ऋषि, मार्दमर्षि, हिरण्याक्ष, जंगारि, बाभ्रवायणि, भूति, विभूति, सूत, सुरकृत्‌ु, अरालि, नाचिक, चाम्पेय, उज्जयन, नवतत्तु, बकनख, सेयन, यति, अम्भोरुह, चारुमत्स्य, शिरीषी, गार्दभि, ऊर्जयोनि, उदापेक्षी और महर्षि नारदी--ये सभी विश्वामित्रके पुत्र एवं ब्रह्मयगादी ऋषि थे

ଭଗବାନ୍ ମଧୁଚ୍ଛନ୍ଦ, ବୀର୍ୟବାନ୍ ଦେବରାତ, ଅକ୍ଷୀଣ, ଶକୁନ୍ତ, ବଭ୍ରୁ ଓ କାଳପଥ—ଏ ସମସ୍ତେ ବିଶ୍ୱାମିତ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ର ମୁନି; ବ୍ରହ୍ମବାଦୀ ଥିଲେ।

Verse 51

याज्ञवल्क्यश्नल विख्यातस्तथा स्थूणो महाव्रत: । उलूको यमदूतश्न तथर्षि: सैन्धवायन:

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଯାଜ୍ଞବଲ୍କ୍ୟଶ୍ନଲ ପ୍ରସିଦ୍ଧ; ସେପରି ମହାବ୍ରତୀ ସ୍ଥୂଣ। ଯମଦୂତଭକ୍ଷକ ଉଲୂକ, ଏବଂ ଋଷି ସୈନ୍ଧବାୟନ।

Verse 52

वल्गुजड्घश्न भगवान्‌ गालवश्व महानृषि: । ऋषिर्वज़्स्तथा ख्यात: सालंकायन एव च

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଭଗବାନ୍ ବଲ୍ଗୁଜଡ୍ଘଶ୍ନ, ଏବଂ ଗାଲବଶ୍ୱ ନାମକ ମହାଋଷି ଥିଲେ। ‘ବଜ୍ର’ ନାମେ ଖ୍ୟାତ ଅନ୍ୟ ଋଷି, ଏବଂ ସାଲଙ୍କାୟନ ମଧ୍ୟ।

Verse 53

लीलाढ्यो नारदश्वैव तथा कूर्चामुख: स्मृत: । वादुलिमुसलश्नैव वक्षोग्रीवस्तथैव च

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଲୀଲାଢ୍ୟ ଓ ନାରଦ, ତଥା କୂର୍ଚ୍ଚାମୁଖ ମଧ୍ୟ ସ୍ମୃତ। ଏବଂ ବାଦୁଲି-ମୁସଲ, ତଥା ବକ୍ଷୋଗ୍ରୀବ ମଧ୍ୟ।

Verse 54

आंध्रिको नैकदृक्‌ चैव शिलायूप: शित: शुचि: । चक्रको मारुतन्तव्यो वातघ्नो5थाश्वलायन:

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଆନ୍ଧ୍ରିକ, ନୈକଦୃକ, ଶିଲାୟୂପ, ଶିତ, ଶୁଚି; ଚକ୍ରକ, ମାରୁତନ୍ତବ୍ୟ, ବାତଘ୍ନ, ଏବଂ ଅଶ୍ୱଲାୟନ।

Verse 55

श्यामायनो<थ गार्ग्यश्व॒ जाबालि: सुश्रुतस्तथा । कारीषिरथ संभश्रुत्य: परपौरवतन्तव:

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ତାପରେ ଶ୍ୟାମାୟନ, ଗାର୍ଗ୍ୟାଶ୍ୱ, ଜାବାଲି ଓ ସୁଶ୍ରୁତ; ଏବଂ କାରୀଷିରଥ, ସଂଭଶ୍ରୁତ୍ୟ, ଓ ପରପୌରବ ବଂଶସମ୍ବନ୍ଧୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ।

Verse 56

महानृषिश्व कपिलस्तथर्षिस्ताडकायन: । तथैव चोपगहनस्तथर्षिश्वासुरायण:

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ମହର୍ଷି କପିଳ ଥିଲେ; ସେହିପରି ଋଷି ତାଡକାୟନ; ଏବଂ ଉପଗହନ; ତଥା ଋଷି ଅସୁରାୟଣ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ।”

Verse 57

मार्दमर्षिररिरिण्याक्षो जड़ारिबाश्रिवायणि: | भूतिर्विभूति: सूतश्न सुरकृत्‌ तु तथैव च

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“(ସେ ଏହି ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ:) ମାର୍ଦମର୍ଷି, ଅରିରିଣ୍ୟାକ୍ଷ, ଜଡାରିବାଶ୍ରିବାୟଣି, ଭୂତି, ବିଭୂତି, ସୂତଶ୍ନ, ଏବଂ ସେହିପରି ସୁରକୃତ।”

Verse 58

अरालिननचिकश्रैव चाम्पेयोज्जयनौ तथा । नवतनन्‍्तुर्बकनख: सेयनो यतिरेव च

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ସେହିପରି ଅରାଲିନନ, ଅଚିକ୍ଶ୍ର; ଏବଂ ଚାମ୍ପେୟ ଓ ଉଜ୍ଜୟନ; ତଥା ନବତନନ୍ତୁ, ବକନଖ, ସେୟନ, ଏବଂ ତପସ୍ବୀ ଯତି।”

Verse 59

अम्भोरुहश्चारुमत्स्य: शिरीषी चाथ गार्दभि: । ऊर्जयोनिरुदापेक्षी नारदी च महानृषि:

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ଅମ୍ଭୋରୁହ, ଚାରୁମତ୍ସ୍ୟ, ଶିରୀଷୀ, ଏବଂ ଗାର୍ଦଭୀ; ତଥା ଊର୍ଜୟୋନି, ରୁଦାପେକ୍ଷୀ, ନାରଦୀ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ମହର୍ଷି।”

Verse 60

तथैव क्षत्रियो राजन्‌ विश्वामित्रो महातपा:

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ସେହିପରି, ହେ ରାଜନ୍, କ୍ଷତ୍ରିୟ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମହାତପସ୍ବୀ ବିଶ୍ୱାମିତ୍ର (ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପଦକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ)।”

Verse 61

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं तत्त्वेन भरतर्षभ

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସତ୍ୟାନୁସାରେ ମୁଁ ଏ ସମସ୍ତ କଥା ତୁମକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ କହିଦେଲି।

Verse 62

यत्र यत्र च संदेहो भूयस्ते राजसत्तम । तत्र तत्र च मां ब्रूहि च्छेत्तास्मि तव संशयम्‌,नृपश्रेष्ठट अब फिर तुम्हें जहाँ-जहाँ संदेह हो उस-उस विषयकी बात मुझसे पूछो। मैं तुम्हारे संशयका निवारण करूँगा

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ରାଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯେଉଁଠି ଯେଉଁଠି ତୁମର ପୁନଃପୁନ ସନ୍ଦେହ ହୁଏ, ସେଉଁଠି ସେଉଁଠି ସେଇ ବିଷୟରେ ମୋତେ ପଚାର; ମୁଁ ତୁମ ସନ୍ଦେହକୁ ଛେଦିଦେବି।

Verse 593

विश्वामित्रात्मजा: सर्वे मुनयो ब्रह्म॒वादिन: । भगवान्‌ मधुच्छन्दा, शक्तिशाली देवरात, अक्षीण, शकुन्त, बभ्ु, कालपथ, विख्यात याज्ञवल्क्य, महाव्रती स्थूण, उलूक, यमदूत, सैन्धवायन ऋषि, भगवान्‌ वल्गुजंघ, महर्षि गालव, वज्रमुनि, विख्यात सालंकायन, लीलाढ्य, नारद, कूर्चामुख, वादुलि, मुसल, वक्षोग्रीव, आड्ूप्रिक, नैकदृकू, शिलायूप, शित, शुचि, चक्रक, मारुतन्तव्य, वातघ्न, आश्वलायन, श्यामायन, गार्ग्य, जाबालि, सुश्रुत, कारीषि, संश्रुत्य, पर, पौरव, तन्‍्तु, महर्षि कपिल, मुनिवर ताडकायन, उपगहन, आसुरायण ऋषि, मार्दमर्षि, हिरण्याक्ष, जंगारि, बाभ्रवायणि, भूति, विभूति, सूत, सुरकृत्‌ु, अरालि, नाचिक, चाम्पेय, उज्जयन, नवतत्तु, बकनख, सेयन, यति, अम्भोरुह, चारुमत्स्य, शिरीषी, गार्दभि, ऊर्जयोनि, उदापेक्षी और महर्षि नारदी--ये सभी विश्वामित्रके पुत्र एवं ब्रह्मयगादी ऋषि थे

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଏ ସମସ୍ତେ ବିଶ୍ୱାମିତ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ର ଏବଂ ବ୍ରହ୍ମବାଦୀ ମୁନି ଥିଲେ—ଭଗବାନ୍ ମଧୁଚ୍ଛନ୍ଦା, ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଦେବରାତ, ଅକ୍ଷୀଣ, ଶକୁନ୍ତ, ବଭ୍ରୁ, କାଳପଥ, ବିଖ୍ୟାତ ଯାଜ୍ଞବଲ୍କ୍ୟ, ମହାବ୍ରତୀ ସ୍ଥୂଣ, ଉଲୂକ, ଯମଦୂତ, ସୈନ୍ଧବାୟନ ଋଷି, ପୂଜ୍ୟ ବଲ୍ଗୁଜଂଘ, ମହର୍ଷି ଗାଲବ, ବଜ୍ରମୁନି, ପ୍ରସିଦ୍ଧ ସାଲଙ୍କାୟନ, ଲୀଳାଢ୍ୟ, ନାରଦ, କୂର୍ଚ୍ଚାମୁଖ, ବାଦୁଲି, ମୁସଲ, ବକ୍ଷୋଗ୍ରୀବ, ଆଡୂପ୍ରିକ, ନୈକଦୃକୂ, ଶିଲାୟୂପ, ଶିତ, ଶୁଚି, ଚକ୍ରକ, ମାରୁତନ୍ତବ୍ୟ, ବାତଘ୍ନ, ଆଶ୍ୱଲାୟନ, ଶ୍ୟାମାୟନ, ଗାର୍ଗ୍ୟ, ଜାବାଲି, ସୁଶ୍ରୁତ, କାରୀଷି, ସଂଶ୍ରୁତ୍ୟ, ପର, ପୌରବ, ତନ୍ତୁ, ମହର୍ଷି କପିଲ, ମୁନିବର ତାଡକାୟନ, ଉପଗହନ, ଆସୁରାୟଣ ଋଷି, ମାର୍ଦମର୍ଷି, ହିରଣ୍ୟାକ୍ଷ, ଜଙ୍ଗାରି, ବାଭ୍ରବାୟଣି, ଭୂତି, ବିଭୂତି, ସୂତ, ସୁରକୃତୁ, ଅରାଲି, ନାଚିକ, ଚାମ୍ପେୟ, ଉଜ୍ଜୟନ, ନବତତ୍ତୁ, ବକନଖ, ସେୟନ, ଯତି, ଅମ୍ଭୋରୁହ, ଚାରୁମତ୍ସ୍ୟ, ଶିରୀଷୀ, ଗାର୍ଦଭି, ଊର୍ଜୟୋନି, ଉଦାପେକ୍ଷୀ ଏବଂ ମହର୍ଷି ନାରଦୀ।

Verse 603

ऋषचीकेनाहितं ब्रह्म परमेतद्‌ युधिष्ठिर । राजा युधिष्ठिर! महातपस्वी विश्वामित्र यद्यपि क्षत्रिय थे तथापि ऋचीक मुनिने उनमें परम उत्कृष्ट ब्रह्मतजका आधान किया था

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ଋଚୀକ ମୁନି ଯେ ବ୍ରହ୍ମତେଜ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରିଥିଲେ, ଏହାହିଁ ପରମ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ। ରାଜନ୍ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ମହାତପସ୍ବୀ ବିଶ୍ୱାମିତ୍ର ଯଦିଓ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଥିଲେ, ତଥାପି ଋଚୀକ ମୁନି ତାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବ୍ରହ୍ମର ସର୍ବୋଚ୍ଚ ତେଜ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରିଥିଲେ।

Verse 616

विश्वामित्रस्थ वै जन्म सोमसूर्याग्नितेजस: । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें सोम, सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी विश्वामित्रके जन्मका सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बताया है

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସୋମ, ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ଅଗ୍ନି ସମ ତେଜସ୍ବୀ ବିଶ୍ୱାମିତ୍ରଙ୍କ ଜନ୍ମର ସମଗ୍ର ବୃତ୍ତାନ୍ତ ମୁଁ ଏଭଳି ଭାବେ ତୁମକୁ ଯଥାର୍ଥରୂପେ କହିଦେଲି।

Frequently Asked Questions

The tension lies between prescribed ritual procedure (mantra-pūta charu and designated rites) and familial attachment (a mother’s request), showing how deviations—though compassionate—carry consequential reallocation of intended outcomes.

The chapter presents dharma as causally precise in matters of intention and rite, while also allowing mitigation through confession, supplication, and negotiated reallocation of consequences—without erasing that actions remain efficacious.

Yes: Bhīṣma explicitly claims a “tattvena” account of Viśvāmitra’s status and ends by inviting Yudhiṣṭhira to raise further doubts, marking the episode as an authoritative clarification within the instructional architecture.