
Karṇa’s Counsel on Śrī (Fortune) and the Proposed Display before the Exiled Pāṇḍavas (कर्णवचनम् / श्रीप्रदर्शन-प्रस्तावः)
Upa-parva: Dvaītavana-vihāra / Dvaītavana-saṃvāda (Episode around Dvaītavana Lake)
Vaiśaṃpāyana reports that, after hearing Dhṛtarāṣṭra’s remarks, Karṇa addresses Duryodhana at an opportune moment. Karṇa frames Duryodhana’s position as the outcome of personal prowess and successful domination: regional rulers from multiple directions are described as tribute-paying and awaiting instruction. He repeatedly invokes the motif of śrī (Lakṣmī/fortune), asserting that the radiance once associated with Yudhiṣṭhira at Indraprastha is now visibly ‘transferred’ to Duryodhana through strategic intelligence and political seizure. Karṇa then recommends an expedition toward the Dvaītavana area, not primarily for battle but for a deliberate contrast: the Kauravas, adorned and honored, versus the Pāṇḍavas in bark garments and hardship. The counsel intensifies the psychological dimension of conflict—pleasure derived from witnessing an adversary’s reduced condition is explicitly articulated as a distinct gratification beyond ordinary gains. The chapter closes with Karṇa and Śakuni falling silent after delivering this calculated rhetoric to the king, leaving the proposal poised for subsequent action.
Chapter Arc: मार्कण्डेय ऋषि जनमेजय/युधिष्ठिर के समक्ष आंगिरसोपाख्यान को आगे बढ़ाते हैं—सप्तर्षियों की पत्नियों के रूप में प्रकट हुई स्त्रियाँ कामाग्नि से दग्ध होकर स्वयं अग्नि के पास जाती हैं और उससे संगम की याचना करती हैं। → अग्नि प्रश्न करता है कि वे उसे कैसे पहचानती हैं और क्यों ऐसी कामार्त हैं; स्त्रियाँ अपनी पहचान (अंगिरा की पत्नी ‘शिवा’ आदि) बताकर आग्रह करती हैं कि यदि अग्नि ने स्वीकार न किया तो वे प्राण त्याग देंगी। काम, लज्जा, भय और देव-नियमों का द्वंद्व कथा को तीव्र करता है। → संगम के फलस्वरूप उत्पन्न तेज/शुक्र को एक शुभा स्त्री (कथा-परंपरा में गंगा/अग्नि-तेज की धारक) स्वर्ण-कुण्ड में शीघ्रता से स्थापित करती है; वहीं से कुमार/स्कन्द का प्राकट्य सुनिश्चित होता है—अग्नि-तेज का देहधारण निर्णायक क्षण बनता है। → कथा स्कन्द के पराक्रम की ओर मुड़ती है—पर्वत-प्रदेश, नदियों-झरनों और दुर्ग शैल-पृष्ठ की पृष्ठभूमि में स्कन्द के बाणों से क्रौञ्च पर्वत छिन्न-भिन्न होकर करुण आर्तनाद करता है; कुमार की अमित शक्ति और निर्भयता स्थापित होती है। → क्रौञ्च के विदीर्ण होने के बाद भी कुमार की उदीयमान शक्ति का विस्तार शेष रहता है—अगला प्रसंग यह संकेत देता है कि यह जन्म और पराक्रम देव-दानव-संघर्ष की बड़ी धुरी बनेगा।
Verse 1
हू... “5 (>9) #2<..# #25--7 पज्चविशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौँंच आदि पर्वतोंका विदारण मार्कण्डेय उवाच शिवा भार्या त्वड्धिरस: शीलरूपगुणान्विता । तस्या: सा प्रथम रूप॑ कृत्वा देवी जनाधिप,मार्कण्डेयजी कहते हैं--नरेश्वर! अंगिराकी पत्नी शिवा शील, रूप और सदगुणोंसे सम्पन्न थी। सुन्दरी स्वाहादेवी पहले उसीका रूप धारण करके अग्निदेवके निकट गयी और उनसे इस प्रकार बोली--“अग्ने! मैं कामवेदनासे संतप्त हूँ, तुम मुझे अपने हृदयमें स्थान दो। यदि ऐसा नहीं करोगे तो यह निश्चय जान लो, मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। हुताशन! मैं अंगिराकी पत्नी हूँ। मेरा नाम शिवा है। दूसरी ऋषि-पत्नियोंने सलाह करके एक निश्चयपर पहुँचकर मुझे यहाँ भेजा है”
ມາຣກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ໂອ ຈອມມະນຸດ, ນາງສິວາ ພັນລະຍາຂອງອັງກິຣະ ເປັນຜູ້ພ້ອມດ້ວຍຄວາມປະພຶດດີ ຄວາມງາມ ແລະຄຸນຄ່າອັນສູງ. ເທວີສະວາຫາ ໄດ້ສວມຮູບນາງເປັນອັນດັບທຳອິດ ແລ້ວເຂົ້າໄປໃກ້ພຣະອັກນິ.
Verse 2
जगाम पावकाभ्याशं तं॑ं चोवाच वराड़ना । मामग्ने कामसंतप्तां त्वं कामयितुमरहसि,मार्कण्डेयजी कहते हैं--नरेश्वर! अंगिराकी पत्नी शिवा शील, रूप और सदगुणोंसे सम्पन्न थी। सुन्दरी स्वाहादेवी पहले उसीका रूप धारण करके अग्निदेवके निकट गयी और उनसे इस प्रकार बोली--“अग्ने! मैं कामवेदनासे संतप्त हूँ, तुम मुझे अपने हृदयमें स्थान दो। यदि ऐसा नहीं करोगे तो यह निश्चय जान लो, मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। हुताशन! मैं अंगिराकी पत्नी हूँ। मेरा नाम शिवा है। दूसरी ऋषि-पत्नियोंने सलाह करके एक निश्चयपर पहुँचकर मुझे यहाँ भेजा है”
ມາຣກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ນາງຜູ້ງາມນັ້ນໄດ້ເຂົ້າໄປໃກ້ພຣະເທວະໄຟ ແລ້ວກ່າວວ່າ: «ໂອ ອັກນິ, ຂ້າພະເຈົ້າຖືກໄຟແຫ່ງກາມະເຜົາຜານ; ທ່ານຄວນຮັບຂ້າພະເຈົ້າ ແລະສະໜອງຄວາມປາຖະໜາຂອງຂ້າພະເຈົ້າ.»
Verse 3
करिष्यसि न चेदेवं मृतां मामुपधारय । अहमज्ञिरसो भार्या शिवा नाम हुताशन । शिशक्रि: प्रहिता प्राप्ता मन्त्रयित्वा विनिश्चयम्,मार्कण्डेयजी कहते हैं--नरेश्वर! अंगिराकी पत्नी शिवा शील, रूप और सदगुणोंसे सम्पन्न थी। सुन्दरी स्वाहादेवी पहले उसीका रूप धारण करके अग्निदेवके निकट गयी और उनसे इस प्रकार बोली--“अग्ने! मैं कामवेदनासे संतप्त हूँ, तुम मुझे अपने हृदयमें स्थान दो। यदि ऐसा नहीं करोगे तो यह निश्चय जान लो, मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। हुताशन! मैं अंगिराकी पत्नी हूँ। मेरा नाम शिवा है। दूसरी ऋषि-पत्नियोंने सलाह करके एक निश्चयपर पहुँचकर मुझे यहाँ भेजा है”
«ຖ້າທ່ານບໍ່ເຮັດຕາມນັ້ນ ຈົ່ງຮູ້ໄວ້ວ່າ ຂ້າພະເຈົ້າກໍເທົ່າກັບຕາຍແລ້ວ. ໂອ ຮຸຕາຊະນະ (ໄຟ), ຂ້າພະເຈົ້າແມ່ນພັນລະຍາຂອງອັງກິຣະ; ຊື່ຂອງຂ້າພະເຈົ້າຄື ສິວາ. ຫຼັງຈາກພັນລະຍາຂອງຣິສີທັງຫຼາຍໄດ້ປຶກສາກັນ ແລະຕົກລົງຢ່າງໝັ້ນຄົງ ພວກນາງຈຶ່ງສົ່ງຂ້າພະເຈົ້າມາທີ່ນີ້.»
Verse 4
अग्निरुवाच कथं मां त्वं विजानीषे कामारतमितरा: कथम् | यास्त्वया कीर्तिता: सर्वाः सप्तर्षीणां प्रिया: स्त्रिय:,अग्निने पूछा--देवि! तुम तथा दूसरी सप्तर्षियोंकी सभी प्यारी स्त्रियाँ, जिनके विषयमें अभी तुमने चर्चा की है, कैसे जानती हैं कि मैं तुमलोगोंके प्रति कामभावसे पीड़ित हूँ
ອັກນິກ່າວວ່າ: «ເຈົ້າຮູ້ໄດ້ແນວໃດວ່າ ຂ້າຖືກຄວາມປາຖະໜາແຫ່ງກາມທໍລະມານ? ແລ້ວຄົນອື່ນໆຮູ້ໄດ້ແນວໃດ? ບັນດາພັນລະຍາອັນເປັນທີ່ຮັກຂອງສັບຕະຣິສີທັງເຈັດ ທີ່ເຈົ້າເພິ່ງກ່າວເຖິງ—ພວກນາງຮູ້ໄດ້ແນວໃດວ່າ ຂ້າຖືກກາມຣາຄະບີບຄັ້ນຕໍ່ເຈົ້າທັງຫມົດ?»
Verse 5
शिवोवाच अस्माकं वत्वं प्रियो नित्यं बिभीमस्तु वयं तव । त्वच्चित्तमिड्डितैर्जात्वा प्रेषितास्मि तवान्तिकम्,शिवा बोली--अग्निदेव! तुम हमें सदा ही प्रिय रहे हो; परंतु हमलोग तुमसे सदा डरती आ रही हैं। इन दिनों तुम्हारी चेष्टाओंसे मनकी बात जानकर मेरी सखियोंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। मैं समागमकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ। तुम स्वतः प्राप्त हुए काम-सुखका शीघ्र उपभोग करो। हुताशन! वे भगिनीस्वरूपा सखियाँ मेरी राह देख रही हैं, अतः मैं शीघ्र चली जाऊँगी
ຊິວາກ່າວວ່າ: «ໂອ ອັກນິເທວ! ເຈົ້າເປັນທີ່ຮັກຂອງພວກເຮົາເສມອ, ແຕ່ພວກເຮົາກໍເຄີຍຢ້ານເຈົ້າມາດົນ. ບັດນີ້ ເມື່ອຮູ້ຄວາມໃນໃຈເຈົ້າຈາກທ່າທາງຂອງເຈົ້າ, ສະຫາຍຂອງຂ້າໄດ້ສົ່ງຂ້າມາຫາເຈົ້າ. ຂ້າມາດ້ວຍຄວາມປາຖະໜາຈະຮ່ວມສົມ. ຈົ່ງຮັບສຸກແຫ່ງກາມທີ່ມາຫາເຈົ້າໂດຍຕົນເອງໃຫ້ໄວ. ໂອ ຫຸຕາຊະນ! ສະຫາຍຜູ້ເປັນດັ່ງເອື້ອຍນ້ອງຂອງຂ້າກໍກຳລັງຄອຍຂ້າຢູ່, ດັ່ງນັ້ນຂ້າຈະຕ້ອງໄປໄວໆ»
Verse 6
मैथुनायेह सम्प्राप्ता काम॑ प्राप्तं द्रुतं चर । जामयो मां प्रतीक्षन्ते गमिष्यामि हुताशन,शिवा बोली--अग्निदेव! तुम हमें सदा ही प्रिय रहे हो; परंतु हमलोग तुमसे सदा डरती आ रही हैं। इन दिनों तुम्हारी चेष्टाओंसे मनकी बात जानकर मेरी सखियोंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। मैं समागमकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ। तुम स्वतः प्राप्त हुए काम-सुखका शीघ्र उपभोग करो। हुताशन! वे भगिनीस्वरूपा सखियाँ मेरी राह देख रही हैं, अतः मैं शीघ्र चली जाऊँगी
ຊິວາກ່າວວ່າ: «ໂອ ອັກນິເທວ (ຫຸຕາຊະນ)! ເຈົ້າເປັນທີ່ຮັກຂອງພວກເຮົາເສມອ ແຕ່ພວກເຮົາກໍຢ້ານເຈົ້າເສມອ. ບັດນີ້ ເມື່ອຮູ້ຄວາມປາຖະໜາໃນໃຈເຈົ້າຈາກການເຂົ້າມາໃກ້ຂອງເຈົ້າ, ສະຫາຍຂອງຂ້າໄດ້ສົ່ງຂ້າມາຫາເຈົ້າ. ຂ້າມາດ້ວຍຄວາມປາຖະໜາຈະຮ່ວມສົມ; ດັ່ງນັ້ນ ຈົ່ງຮັບສຸກທີ່ມາຫາເຈົ້າໂດຍຕົນເອງໃຫ້ໄວ. ໂອ ຫຸຕາຊະນ, ສະຫາຍຜູ້ເປັນດັ່ງເອື້ອຍນ້ອງຂອງຂ້າກຳລັງຄອຍຂ້າຢູ່ຕາມທາງ, ດັ່ງນັ້ນຂ້າຈະຕ້ອງໄປໄວໆ»
Verse 7
मार्कण्डेय उदाच ततो<ग्निरुपयेमे तां शिवां प्रीतिमुदायुतः । प्रीत्या देवी समायुक्ता शुक्र जग्राह पाणिना,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन! तब अग्निदेवने प्रेम और प्रसन्नताके साथ उस शिवाको हृदयसे लगाया। (शिवाके रूपमें) “स्वाहा” देवीने प्रेमपूर्वक अग्निदेवसे समागम करके उनके वीर्यको हाथमें ले लिया
ມາຣະກັນເດຍະກ່າວວ່າ: ແລ້ວອັກນິ ຜູ້ເຕັມໄປດ້ວຍຄວາມຮັກແລະຄວາມປິຕິ ໄດ້ຮັບນາງຜູ້ເປັນມງຄຸນນັ້ນເປັນຄູ່ ແລະກອດນາງໄວ້. ເມື່ອຮ່ວມກັນດ້ວຍຄວາມເສນ່ຫາ, ເທວີ—ໃນຮູບຂອງສະວາຫາ—ໄດ້ຮັບເຊື້ອຂອງອັກນິໄວ້ໃນຝາມືຂອງນາງ.
Verse 8
अचिन्तयन्ममेदं ये रूप॑ द्रक्ष्यन्ति कानने । ते ब्राह्मणीनामनृतं दोषं॑ वक्ष्यन्ति पावक,तत्पश्चात् उसने कुछ सोचकर कहा--'अग्निकुलनन्दन!” जो लोग वनमें मेरे इस रूपको देखेंगे वे ब्राह्मण-पत्नियोंको झूठा दोष लगायेंगे
ເມື່ອຄິດໄຕ່ຕອງແລ້ວ ນາງກ່າວວ່າ: «ໂອ ປາວະກະ (ອັກນິ)! ຜູ້ໃດທີ່ເຫັນຮູບນີ້ຂອງຂ້າໃນປ່າ ຈະກ່າວໂທດພັນລະຍາຂອງພຣາຫມັນວ່າເວົ້າບໍ່ຈິງ. ດັ່ງນັ້ນ ຄວາມຕຳນິທີ່ບໍ່ສົມຄວນຈະຕົກໃສ່ພວກນາງ ເນື່ອງຈາກສິ່ງທີ່ຖືກເຫັນ»
Verse 9
तस्मादेतद् रक्ष्यमाणा गरुडी सम्भवाम्यहम् | वनान्निर्गमनं चैव सुखं मम भविष्यति,“अतः मैं इस रहस्यको गुप्त रखनेके लिये “गरुडी' पक्षिणीका रूप धारण कर लेती हूँ। इस प्रकार मेरा इस वनसे सुखपूर्वक निकलना सम्भव हो सकेगा”
ດັ່ງນັ້ນ ເພື່ອປົກປ້ອງຄວາມລັບນີ້ໃຫ້ປອດໄພ ຂ້າພະເຈົ້າຈະຮັບຮູບເປັນ «ກະຣຸດີ» ນາງນົກໃນສາຍພັນຂອງກະຣຸດ. ດ້ວຍວິທີນີ້ ການອອກຈາກປ່ານີ້ຂອງຂ້າພະເຈົ້າຈະເປັນໄປໄດ້ ແລະຈະສຳເລັດຢ່າງປອດໄພ ແລະສະດວກສະບາຍ.
Verse 10
मार्कण्डेय उवाच सुपर्णी सा तदा भूत्वा निर्जगाम महावनात् | अपश्यत् पर्वतं श्वेतं शरस्तम्बै:ः सुसंवृतम्,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन! ऐसा कहकर वह तत्काल गरुडीका रूप धारण करके उस महान् वनसे बाहर निकल गयी। आगे जानेपर उसने सरकंडोंके समूहसे आच्छादित श्वेतपर्वतके शिखरको देखा
ມາກັນເດຍະກ່າວວ່າ: ໃນເວລານັ້ນ ນາງໄດ້ຮັບຮູບເປັນ ສຸປັນນີ (ກະຣຸດີ) ແລະອອກຈາກປ່າໃຫຍ່ນັ້ນໃນທັນທີ. ເມື່ອເດີນຕໍ່ໄປ ນາງເຫັນພູຂາວລູກໜຶ່ງ ຖືກປົກຄຸມຢ່າງດີດ້ວຍກຸ່ມກົກສາຣະ (ອໍ້ອຍປ່າ) ຫນາແນ່ນ.
Verse 11
दृष्टीविषै: सप्तशीर्षैगुप्तं भोगिभिरद्धुतै: । रक्षोभिश्व पिशाचैश्व रौद्रैर्भूतगणैस्तथा
ມາກັນເດຍະກ່າວວ່າ: ບ່ອນນັ້ນຖືກປົກປ້ອງໂດຍນາກອັນອັດສະຈັນມີເຈັດພັບ; ແມ່ນແຕ່ສາຍຕາຂອງພວກມັນກໍເປັນພິດ. ຍັງມີຣາກສະ ແລະ ປິສາຈະອັນດຸຮ້າຍ ພ້ອມທັງຝູງວິນຍານອັນນ່າຢ້ານ ຄອຍພິທັກອີກດ້ວຍ.
Verse 12
(नदीप्रस्रवणोपेत॑ं नानातरुसमाचितम् ।) सा तत्र सहसा गत्वा शैलपृष्ठं सुदुर्गमम्
ມາກັນເດຍະກ່າວວ່າ: ນາງໄດ້ໄປຮອດທີ່ນັ້ນໃນທັນທີ ແລະຂຶ້ນເຖິງສັນພູອັນເຂົ້າເຖິງຍາກຢ່າງຍິ່ງ.
Verse 13
सप्तानामपि सा देवी सप्तर्षीणां महात्मनाम्,कुरुश्रेष्ठी उस देवीने सातों महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंके समान रूप धारण करके अग्निदेवके साथ समागमकी इच्छा की थी; किंतु अरुन्धतीकी तपस्या तथा पति-शुश्रूषाके प्रभावसे वह उनका दिव्य रूप धारण न कर सकी, इसलिये छ: बार ही अग्निके वीर्यको वहाँ डालनेमें सफल हुई
ມາກັນເດຍະກ່າວວ່າ: ເທວີນັ້ນໄດ້ຮັບຮູບເປັນດັ່ງພັນລະຍາຂອງສັບຕະຣິຊີຜູ້ຍິ່ງໃຫຍ່ທັງເຈັດ ແລະປາຖະໜາຈະຮ່ວມສັມພັນກັບພຣະອັກນິ. ແຕ່ດ້ວຍອຳນາດແຫ່ງຕະປະສະຍາ ແລະການຮັບໃຊ້ສາມີຢ່າງສັດຊື່ຂອງອະຣຸນທະຕີ ເທວີຈຶ່ງບໍ່ອາດຮັບຮູບອັນເທວະພາບຂອງນາງໄດ້; ດັ່ງນັ້ນ ນາງຈຶ່ງສຳເລັດໄດ້ພຽງຫົກຄັ້ງໃນການໃຫ້ເຊື້ອພັນຂອງອັກນິຖືກຝາກໄວ້ທີ່ນັ້ນ.
Verse 14
पत्नीसरूपतां कृत्वा कामयामास पावकम् | दिव्यरूपमरुन्धत्या: कर्तु न शकितं तया,कुरुश्रेष्ठी उस देवीने सातों महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंके समान रूप धारण करके अग्निदेवके साथ समागमकी इच्छा की थी; किंतु अरुन्धतीकी तपस्या तथा पति-शुश्रूषाके प्रभावसे वह उनका दिव्य रूप धारण न कर सकी, इसलिये छ: बार ही अग्निके वीर्यको वहाँ डालनेमें सफल हुई
ມາຣກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ນາງໄດ້ແປງຮູບໃຫ້ເໝືອນພັນລະຍາຂອງລະສີທັງເຈັດ ແລະປາຖະໜາຈະຮ່ວມສະເໝີສະເໝີກັບພຣະອັກນິ. ແຕ່ນາງບໍ່ອາດຈະຮັບຮູບທິບຂອງອະຣຸນທະຕີໄດ້ ເນື່ອງຈາກອຳນາດຕະປະ ແລະການຮັບໃຊ້ສາມີດ້ວຍຄວາມສັດຊື່ຂອງນາງ ເຮັດໃຫ້ຮູບນັ້ນບໍ່ອາດລອກເລັຽນໄດ້. ດັ່ງນັ້ນ ນາງຈຶ່ງສຳເລັດໄດ້ພຽງຫົກຄັ້ງໃນການຮັບແລະວາງເມັດພັນຂອງອັກນິໄວ້ທີ່ນັ້ນ—ອະຣຸນທະຕີຜູ້ດຽວເທົ່ານັ້ນຢູ່ເຫນືອການລອກເລັຽນ ໂດຍອຳນາດແຫ່ງທຳມະຂອງນາງ.
Verse 15
तस्यास्तप:प्रभावेण भर्तृशुश्रूषणेन च । षट्कृत्वस्तत् तु निक्षिप्तमग्ने रेत: कुरूत्तम,कुरुश्रेष्ठी उस देवीने सातों महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंके समान रूप धारण करके अग्निदेवके साथ समागमकी इच्छा की थी; किंतु अरुन्धतीकी तपस्या तथा पति-शुश्रूषाके प्रभावसे वह उनका दिव्य रूप धारण न कर सकी, इसलिये छ: बार ही अग्निके वीर्यको वहाँ डालनेमें सफल हुई
ມາຣກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ໂດຍອຳນາດຕະປະຂອງນາງ ແລະໂດຍການຮັບໃຊ້ສາມີດ້ວຍຄວາມສັດຊື່—ໂອ ຜູ້ປະເສີດໃນວົງກຸຣຸ—ເມັດພັນຂອງອັກນິຈຶ່ງຖືກວາງໄວ້ທີ່ນັ້ນໄດ້ພຽງຫົກຄັ້ງເທົ່ານັ້ນ.
Verse 16
तस्मिन् कुण्डे प्रतिपदि कामिन्या स्वाहया तदा । तत् स्कन्न॑ तेजसा तत्र संवृतं जनयत् सुतम्,अग्निदेवकी कामना रखनेवाली स्वाहाने प्रतिपदाको उस कुण्डमें उनका वीर्य डाला था। स्कन्दित (स्खलित) हुए उस वीर्यने वहाँ एक तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया। ऋषियोंने उसका बड़ा सम्मान किया। वह स्कन्दित होनेके कारण स्कन्द कहलाया। उसके छ: सिर, बारह कान, बारह नेत्र और बारह भुजाएँ थीं
ມາຣກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ໃນຫຼຸມໄຟອັນສັກສິດນັ້ນ ໃນວັນປະຕິປະດາ ສະວາຫາ—ຖືກຂັບເຄື່ອນໂດຍຄວາມໃຄ່—ໄດ້ວາງເມັດພັນນັ້ນລົງ. ເມັດພັນທີ່ໄຫຼຫຼຸດນັ້ນ ຖືກຫໍ້ຫຸ້ມແລະສຸກງອມຢູ່ທີ່ນັ້ນດ້ວຍປະກາຍໄຟຂອງມັນເອງ ແລະໃຫ້ກຳເນີດບຸດຜູ້ໜຶ່ງອັນສະຫວ່າງໄສ.
Verse 17
ऋषिभि: पूजितं स्कन्नमनयत् स्कन्दतां तत: । षट्शिरा द्विगुणश्रोत्रो द्वादशाक्षिभुजक्रम:,अग्निदेवकी कामना रखनेवाली स्वाहाने प्रतिपदाको उस कुण्डमें उनका वीर्य डाला था। स्कन्दित (स्खलित) हुए उस वीर्यने वहाँ एक तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया। ऋषियोंने उसका बड़ा सम्मान किया। वह स्कन्दित होनेके कारण स्कन्द कहलाया। उसके छ: सिर, बारह कान, बारह नेत्र और बारह भुजाएँ थीं
ມາຣກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ບັນດາລະສີໄດ້ບູຊາແລະເຄົາລົບເມັດພັນທີ່ໄຫຼຫຼຸດນັ້ນ; ແລະຈາກເຫດການນັ້ນ ລາວຈຶ່ງໄດ້ນາມວ່າ “ສະກັນດະ”. ລາວເກີດມາມີຫົວຫົກ, ຫູເປັນສອງເທົ່າ, ແລະມີຕາສິບສອງກັບແຂນສິບສອງ—ເປັນໝາຍແຫ່ງອຳນາດແລະຊະຕາກຳອັນພິເສດ.
Verse 18
/02.. ८८222 / 222 222 3 ४; ४22८, ८622... #/<:2 ८ रे 4 ८2. 22 “£ >> छ. 4८ द्ू८ट 2 - 2 से 56 222: ०० श्र 3 | छः “' ्् ट ४52 2, एकग्रीवैकजठर: कुमार: समपद्यत । द्वितीयायामभिव्यक्तस्तृतीयायां शिशुर्बभी,परंतु उस कुमारका कण्ठ और पेट एक-एक ही था। वह द्वितीयाको अभिव्यक्त हुआ और तृतीयाको शिशुरूपमें सुशोभित होने लगा
ມາຣກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ເດັກນ້ອຍຜູ້ນັ້ນເກີດຂຶ້ນມາມີຄໍພຽງອັນດຽວ ແລະທ້ອງພຽງອັນດຽວ. ໃນຂັ້ນທີສອງ ລາວປາກົດຊັດເຈນ; ແລະໃນຂັ້ນທີສາມ ລາວປາກົດເປັນທາຣົກທີ່ຮູບຮ່າງສົມບູນ.
Verse 19
अड्जप्रत्यज्भसम्भूतश्नतुर्थ्यामभवद् गुह: । लोहिताभ्रेण महता संवृत: सह विद्युता
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: «ໃນວັນທີສີ່ ຖ້ຳໃຫຍ່ອັນກວ້າງຂວາງໄດ້ເກີດຂຶ້ນ ອັນເກີດຈາກມວນຮວມຂອງປະກາຍມືດນັ້ນ. ມັນຖືກຫໍ້ຫຸ້ມໂດຍເມກສີແດງອັນໃຫຍ່ ມີຟ້າຜ່າວາບວາບ»។
Verse 20
गृहीतं तु धनुस्तेन विपुलं लोमहर्षणम्,त्रिपुरनाशक भगवान् शिवने देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले जिस विशाल तथा रोमाज्चकारी श्रेष्ठ धनुषको रख छोड़ा था उसे बलवान् स्कन्दने उठा लिया और बड़े जोरसे गर्जना की
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: «ແລ້ວມາ ສະກັນດະ ຜູ້ມີກຳລັງຫາທຽບບໍ່ໄດ້ ໄດ້ຍົກຄັນທະນູອັນໃຫຍ່ຫຼວງ ທີ່ເຮັດໃຫ້ຂົນລຸກ. ນັ້ນແມ່ນຄັນທະນູດຽວກັນທີ່ພຣະສິວະ ຜູ້ທຳລາຍຕຣິປຸຣະ ເຄີຍໃຊ້ເພື່ອທຳລາຍສັດຕູຂອງເທວະ. ເມື່ອຈັບມັນໄວ້ໃນມື ສະກັນດະກໍຮ້ອງຄຳຮາມດັ່ງຟ້າຮ້ອງ ເປັນໝາຍແຫ່ງພຣະປະສົງອັນທິບທິບ ທີ່ຈະຕໍ່ຕ້ານອຳນາດອັນຄຸກຄາມລະບຽບແຫ່ງຈັກກະວານ»។
Verse 21
न्यस्तं यत् त्रिपुरघ्नेन सुरारिविनिकृन्तनम् । तद् गृहीत्वा धनु: श्रेष्ठ ननाद बलवांस्तदा,त्रिपुरनाशक भगवान् शिवने देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले जिस विशाल तथा रोमाज्चकारी श्रेष्ठ धनुषको रख छोड़ा था उसे बलवान् स्कन्दने उठा लिया और बड़े जोरसे गर्जना की
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: «ຄັນທະນູອັນປະເສີດນັ້ນ ທີ່ຜູ້ຂ້າຕຣິປຸຣະ ແລະຜູ້ຕັດຂາດສັດຕູຂອງເທວະ—ພຣະສິວະ—ໄດ້ວາງໄວ້; ສະກັນດະຜູ້ມີກຳລັງໄດ້ຈັບຖືມັນ ແລ້ວຮ້ອງຄຳຮາມກ້ອງກັງວານໃນຂະນະນັ້ນ.»
Verse 22
सम्मोहयतन्निवेमान् स त्रीललोकान् सचराचरान् । तस्य त॑ निनदं श्रुत्वा महामेघौघनि:स्वनम्,ये उस गर्जनाद्वारा चराचर प्राणियोंसहित इन तीनों लोकोंको मूर्छित-सा कर रहे थे। महान् मेघोंकी गम्भीर ध्वनिके समान उनकी उस गर्जनाको सुनकर चित्र और ऐरावत नामक दो महागज वहाँ दौड़े आये। कुमार स्कन्द सूर्यकी कान्तिके समान उद्धासित हो रहे थे। उन दोनों हाथियोंको आते देख उन अग्निकुमारने उन्हें दो हाथोंसे पकड़ लिया तथा एक हाथमें शक्ति और दूसरेमें अरुण शिखासे विभूषित और बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं विशाल शरीरवाले एक समीपवर्ती कुक्कुट (मुर्गै)-को पकड़कर उन महाबाहु कुमारने भयंकर गर्जना की और (उन हाथी-मुर्गे आदिको लिये हुए) क्रीडा करने लगे
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: «ດ້ວຍສຽງຄຳຮາມນັ້ນ ລາວເຮັດໃຫ້ສາມໂລກ—ພ້ອມທັງສິ່ງມີຊີວິດທີ່ເຄື່ອນໄຫວ ແລະບໍ່ເຄື່ອນໄຫວ—ຄ້າຍຖືກສະກົດໃຫ້ມືດມົນ. ເມື່ອໄດ້ຍິນສຽງນັ້ນອັນລຶກດັ່ງສຽງຄຳຮ້ອງຂອງມວນເມກຟ້າຮ້ອງອັນໃຫຍ່, ຊ້າງໃຫຍ່ສອງໂຕ—ຈິຕຣາ ແລະ ໄອຣາວະຕະ—ກໍພາກັນຮີບຮ້ອນມາທີ່ນັ້ນ. ສະກັນດະສ່ອງສະຫວ່າງດັ່ງດວງອາທິດ; ເມື່ອເຫັນຊ້າງທັງສອງເຂົ້າມາ ລາວກໍຈັບພວກມັນດ້ວຍມືທັງສອງ. ແລ້ວຖື “ສັກຕິ” (ຫອກ) ໃນມືໜຶ່ງ ແລະໃນອີກມືໜຶ່ງຈັບໄກ່ຜູ້ກ້າແຂງຕົວໃຫຍ່ຢູ່ໃກ້ໆ ມີຫົວຫອຍຂົນສີແດງດັ່ງໄຟ ເປັນຜູ້ເລີດໃນຫມູ່ຜູ້ແຂງແຮງ. ກຸມາຣະຜູ້ມີແຂນໃຫຍ່ກໍຮ້ອງຄຳຮາມອັນນ່າຢ້ານ ແລະເລີ່ມຫຼິ້ນຢ່າງກະຫຼິ້ນກະຫຼອດ ພ້ອມທັງຖືສັດແລະອາວຸດເຫຼົ່ານັ້ນ—ສະແດງອຳນາດທິບທິບອັນບໍ່ອາດຕ້ານທານ ທີ່ຄອບງຳສາມໂລກ.»
Verse 23
उत्पेततुर्महानागौ चित्रश्नैरावतश्न ह । तावापतन्तौ सम्प्रेक्ष्य स बालोडर्कसमद्युति:,ये उस गर्जनाद्वारा चराचर प्राणियोंसहित इन तीनों लोकोंको मूर्छित-सा कर रहे थे। महान् मेघोंकी गम्भीर ध्वनिके समान उनकी उस गर्जनाको सुनकर चित्र और ऐरावत नामक दो महागज वहाँ दौड़े आये। कुमार स्कन्द सूर्यकी कान्तिके समान उद्धासित हो रहे थे। उन दोनों हाथियोंको आते देख उन अग्निकुमारने उन्हें दो हाथोंसे पकड़ लिया तथा एक हाथमें शक्ति और दूसरेमें अरुण शिखासे विभूषित और बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं विशाल शरीरवाले एक समीपवर्ती कुक्कुट (मुर्गै)-को पकड़कर उन महाबाहु कुमारने भयंकर गर्जना की और (उन हाथी-मुर्गे आदिको लिये हुए) क्रीडा करने लगे
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: «ເມື່ອໄດ້ຍິນສຽງຄຳຮາມອັນດັ່ງຟ້າຮ້ອງ ທີ່ຄ້າຍຈະເຮັດໃຫ້ສັດທັງປວງທີ່ເຄື່ອນໄຫວແລະບໍ່ເຄື່ອນໄຫວໃນສາມໂລກມືດມົນ, ຊ້າງໃຫຍ່ສອງໂຕ—ຈິຕຣາ ແລະ ໄອຣາວະຕະ—ກໍຮີບຮ້ອນມາ. ສະກັນດະຜູ້ໜຸ່ມສ່ອງສະຫວ່າງດັ່ງດວງອາທິດ. ເມື່ອເຫັນຊ້າງທັງສອງພຸ່ງເຂົ້າມາ ເດັກນ້ອຍຜູ້ເກີດຈາກໄຟກໍຈັບພວກມັນດ້ວຍມືທັງສອງ; ແລ້ວຖື “ສັກຕິ” (ຫອກ) ໃນມືໜຶ່ງ ແລະຈັບໄກ່ຜູ້ກ້າແຂງຢູ່ໃກ້ໆໃນອີກມືໜຶ່ງ—ມີຫົວຫອຍຂົນສີແດງດັ່ງໄຟ ຮ່າງກາຍໃຫຍ່ ເປັນຜູ້ເລີດໃນຫມູ່ຜູ້ແຂງແຮງ—ລາວຮ້ອງຄຳຮາມອັນນ່າຢ້ານ ແລະເລີ່ມຫຼິ້ນ ຖືພວກມັນເຫມືອນເປັນຂອງຫຼິ້ນ.»
Verse 24
द्वाभ्यां गृहीत्वा पाणिभ्यां शक्ति चान्येन पाणिना । अपरेणाग्निदायादस्ताम्रचूडं भुजेन सः,ये उस गर्जनाद्वारा चराचर प्राणियोंसहित इन तीनों लोकोंको मूर्छित-सा कर रहे थे। महान् मेघोंकी गम्भीर ध्वनिके समान उनकी उस गर्जनाको सुनकर चित्र और ऐरावत नामक दो महागज वहाँ दौड़े आये। कुमार स्कन्द सूर्यकी कान्तिके समान उद्धासित हो रहे थे। उन दोनों हाथियोंको आते देख उन अग्निकुमारने उन्हें दो हाथोंसे पकड़ लिया तथा एक हाथमें शक्ति और दूसरेमें अरुण शिखासे विभूषित और बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं विशाल शरीरवाले एक समीपवर्ती कुक्कुट (मुर्गै)-को पकड़कर उन महाबाहु कुमारने भयंकर गर्जना की और (उन हाथी-मुर्गे आदिको लिये हुए) क्रीडा करने लगे
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ພຣະສະກັນດະ ຜູ້ເປັນທາຍາດແຫ່ງອັກນິ ໄດ້ຄວ້າຊ້າງທັງສອງທີ່ກຳລັງພຸ້ນມາ ດ້ວຍມືທັງສອງ; ມືອື່ນຖືຫອກສັກຕິ (śakti); ແລະດ້ວຍແຂນທີ່ເຫຼືອ ຈັບຜູ້ມີຫົວຫອຍສີທອງແດງ. ພາບນັ້ນຊີ້ໃຫ້ເຫັນວິລະກຳເຫນືອມະນຸດ ແລະອຳນາດແຫ່ງເທວະ: ພະລັງບໍ່ໄດ້ສະແດງເພື່ອຄວາມໂຫດຮ້າຍ ແຕ່ເປັນໝາຍແຫ່ງອຳນາດຟ້າ ທີ່ປະຫວັດຄວາມວຸ່ນວາຍ ແລະຄຸ້ມຄອງລະບຽບໂລກ (ທັມມະ)។
Verse 25
महाकायमुपश्लिष्टं कुक्कु्टं बलिनां वरम् गृहीत्वा व्यनदद् भीम॑ चिक्रीड च महाभुज:,ये उस गर्जनाद्वारा चराचर प्राणियोंसहित इन तीनों लोकोंको मूर्छित-सा कर रहे थे। महान् मेघोंकी गम्भीर ध्वनिके समान उनकी उस गर्जनाको सुनकर चित्र और ऐरावत नामक दो महागज वहाँ दौड़े आये। कुमार स्कन्द सूर्यकी कान्तिके समान उद्धासित हो रहे थे। उन दोनों हाथियोंको आते देख उन अग्निकुमारने उन्हें दो हाथोंसे पकड़ लिया तथा एक हाथमें शक्ति और दूसरेमें अरुण शिखासे विभूषित और बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं विशाल शरीरवाले एक समीपवर्ती कुक्कुट (मुर्गै)-को पकड़कर उन महाबाहु कुमारने भयंकर गर्जना की और (उन हाथी-मुर्गे आदिको लिये हुए) क्रीडा करने लगे
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ມະຫາບາຫຸ ໄດ້ຈັບໄກ່ຕົວໃຫຍ່ທີ່ແນບຊິດ—ຜູ້ເປັນເລີດໃນຫມູ່ຜູ້ແຂງແຮງ—ແລ້ວຮ້ອງຄຳຮາມອັນນ່າຢ້ານ ແລະເລີ່ມຫຼິ້ນຢ່າງສະບາຍ. ພາບນີ້ຊີ້ວ່າພະລັງເຫນືອມະນຸດອາດປາກົດເປັນການຫຼິ້ນ—ບໍ່ໃຊ້ເພື່ອຄວາມໂຫດຮ້າຍ ແຕ່ເປັນການປະກາດພະລັງເທວະ ທີ່ລົງທັບສາມໂລກ ແລະດຶງດູດສັດຜູ້ຍິ່ງໃຫຍ່ໃຫ້ເຂົ້າມາໃກ້.
Verse 26
द्वाभ्यां भुजाभ्यां बलवान् गृहीत्वा शड्खमुत्तमम् । प्राध्यापयत भूतानां त्रासनं बलिनामपि,तत्पश्चात् उन बलवान वीरने दोनों हाथोंमें उत्तम शंख लेकर बजाया, जो बलवान् प्राणियोंको भी भयभीत कर देनेवाला था
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ຕໍ່ມາ ວິລະຊົນຜູ້ແຂງແຮງນັ້ນ ຈັບສັງຂ໌ອັນດີເລີດດ້ວຍແຂນທັງສອງ ແລ້ວເປົ່າມັນດ້ວຍກຳລັງ; ສຽງຂອງມັນນ່າຢ້ານຈົນແມ່ນແຕ່ຜູ້ມີພະລັງກໍຍັງຫວາດຫວັນ. ຕອນນີ້ຊີ້ວ່າ ພະລັງອັນລ້ວນໆເມື່ອຖືກສະແດງອອກ ອາດສັ່ນຄວາມຮູ້ສຶກຂອງຜູ້ອື່ນ ແລະປ່ຽນບັນຍາກາດທາງຈິດທຳ; ຜູ້ແຂງແຮງຈຶ່ງຕ້ອງມີການຢັບຢັ້ງ ແລະເຈດຕະນາທີ່ຖືກຕ້ອງ (ທັມມະ).
Verse 27
द्वाभ्यां भुजाभ्यामाकाशं बहुशो निजघान ह । कीडन् भाति महासेनस्त्रीललोकान् वदनै: पिबन्,फिर वे दो भुजाओंसे आकाशको बार-बार पीटने लगे। इस प्रकार क्रीडा करते हुए कुमार महासेन ऐसे जान पड़ते थे मानो वे अपने मुखोंसे तीनों लोकोंको पी जायूँगे
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ດ້ວຍແຂນທັງສອງ ລາວຕີຟ້າຊ້ຳໆ. ຫຼິ້ນຢູ່ດັ່ງນັ້ນ ກຸມານມະຫາເສນາ ປາກົດດັ່ງຈະດື່ມກິນສາມໂລກດ້ວຍປາກຂອງຕົນ—ເປັນພາບຂອງພະລັງເທວະອັນລົງທັບ ແລະຍັງບໍ່ຖືກຢັບຢັ້ງ, ຊຶ່ງກ່ອນໃຫ້ເກີດຄວາມເກງຂາມ ແລະເຕືອນບໍ່ໃຫ້ຕັດສິນຄວາມຍິ່ງໃຫຍ່ດ້ວຍມາດຕະຖານທົ່ວໄປ.
Verse 28
पर्वताग्रेडप्रमेयात्मा रश्मिमानुदये यथा । स तस्य पर्वतस्याग्रे निषण्णो5द्भुतविक्रम:,अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न और अदभुत पराक्रमी स्कन्द पर्वतके शिखरपर उदयकालमें अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे। फिर वे उस पर्वतकी चोटीपर बैठ गये और अपने अनेक मुखोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगे। भाँति-भाँतिकी वस्तुओंको देखकर वे अमेयात्मा स्कन्द पुनः: बालोचित कोलाहल करने लगे। उनकी इस गर्जनाको सुनकर बहुत-से प्राणी पृथ्वीपर गिर गये। फिर भयभीत और उद्विग्नचित्त होकर उन सबने उन्हींकी शरण ली
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ຢູ່ເທິງຍອດພູ ພຣະສະກັນດະ—ຜູ້ມີສະພາບອັນຫາຂອບເຂດບໍ່ໄດ້ ແລະວິກຣະມະອັນອັດສະຈັນ—ສ່ອງສະຫວ່າງດັ່ງຕາເວັນມີລັດສະໝີໃນຍາມອຸທັຍ. ນັ່ງຢູ່ທີ່ຍອດນັ້ນ ລາວສຳຫຼວດທຸກທິດດ້ວຍໃບໜ້າຫຼາຍໜ້າ. ເມື່ອເຫັນສິ່ງຂອງຫຼາກຫຼາຍຮອບກາຍ ພຣະສະກັນດະຜູ້ຢາກຈັບບໍ່ທັນ ກໍຮ້ອງອື້ອອຶງແບບເດັກນ້ອຍອີກຄັ້ງ; ເມື່ອໄດ້ຍິນສຽງຄຳຮາມນັ້ນ ສັດຈຳນວນຫຼາຍລົ້ມລົງກັບພື້ນດິນ, ແລ້ວດ້ວຍຄວາມຢ້ານ ແລະໃຈສັ່ນ ພວກເຂົາພາກັນໄປຂໍພຶ່ງພາຢູ່ໃນພຣະອົງ. ຂໍ້ຄວາມນີ້ຊີ້ວ່າ ອຳນາດອັນລົງທັບອາດກ່ອນໃຫ້ເກີດຄວາມຢ້ານ, ແຕ່ອຳນາດດຽວກັນນັ້ນກໍກາຍເປັນທີ່ພຶ່ງ ເມື່ອເຂົ້າຫາດ້ວຍການຍອມຈຳນົນ ບໍ່ແມ່ນດ້ວຍການຕໍ່ຕ້ານ.
Verse 29
व्यलोकयदमेयात्मा मुखैर्नानाविधैर्दिश: । स पश्यन् विविधान् भावांश्वकार निनदं पुन:,अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न और अदभुत पराक्रमी स्कन्द पर्वतके शिखरपर उदयकालमें अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे। फिर वे उस पर्वतकी चोटीपर बैठ गये और अपने अनेक मुखोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगे। भाँति-भाँतिकी वस्तुओंको देखकर वे अमेयात्मा स्कन्द पुनः: बालोचित कोलाहल करने लगे। उनकी इस गर्जनाको सुनकर बहुत-से प्राणी पृथ्वीपर गिर गये। फिर भयभीत और उद्विग्नचित्त होकर उन सबने उन्हींकी शरण ली
ມາຣະກັນເດຍະ ກ່າວວ່າ: ສະກັນດະ ຜູ້ມີພະລັງໃນອັນຫາຂອບເຂດບໍ່ໄດ້ ໄດ້ເບິ່ງໄປທົ່ວທິດດ້ວຍໃບໜ້າຫຼາຍປະການ. ເມື່ອພະອົງເຫັນສະພາບແລະສັດຕະວະທັງຫຼາຍອັນຫຼາກຫຼາຍ ພະອົງກໍໄດ້ຮ້ອງຄຳຮາມອີກຄັ້ງ ດັ່ງສຽງເດັກນ້ອຍ—ເປັນສຽງອັນນ່າພິສົດທີ່ເຮັດໃຫ້ໂລກສັ່ນສະເທືອນ.
Verse 30
तस्य तं निनदं श्रुत्वा न्यपतन् बहुधा जना: । भीताश्रोद्विग्नमनसस्तमेव शरणं ययु:,अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न और अदभुत पराक्रमी स्कन्द पर्वतके शिखरपर उदयकालमें अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे। फिर वे उस पर्वतकी चोटीपर बैठ गये और अपने अनेक मुखोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगे। भाँति-भाँतिकी वस्तुओंको देखकर वे अमेयात्मा स्कन्द पुनः: बालोचित कोलाहल करने लगे। उनकी इस गर्जनाको सुनकर बहुत-से प्राणी पृथ्वीपर गिर गये। फिर भयभीत और उद्विग्नचित्त होकर उन सबने उन्हींकी शरण ली
ເມື່ອໄດ້ຍິນສຽງຮາມອັນດັງກັ່ນນັ້ນ ຜູ້ຄົນຫຼາຍກໍລົ້ມລົງໄປຫຼາຍຢ່າງ. ດ້ວຍຄວາມຢ້ານກົວ ແລະໃຈສັ່ນຫວັ່ນໄຫວ ພວກເຂົາຈຶ່ງໄປພຶ່ງພາພະອົງພຽງຜູ້ດຽວເປັນທີ່ພຶ່ງ.
Verse 31
येतुतंसंश्रिता देवं नानावर्णास्तदा जना: | तानप्याहु: पारिषदान् ब्राह्मणा: सुमहाबलान्,उस समय जिन-जिन नाना वर्णवाले जीवोंने उन स्कन्ददेवकी शरण ली, उन सबको ब्राह्मणोंने उनका महाबलवान् पार्षद बताया है
ມາຣະກັນເດຍະ ກ່າວວ່າ: ໃນເວລານັ້ນ ບັນດາສັດຕະວະຜູ້ມີຮູບພັນສັນຖານຫຼາກຫຼາຍ ໄດ້ໄປພຶ່ງພາພະເທວະອົງນັ້ນ (ສະກັນດະ). ພວກພຣາຫມັນກໍໄດ້ກ່າວວ່າ ພວກເຂົາເປັນບໍລິວານຂອງພະອົງ—ເປັນສະມາຊິກໃນຂະບວນພະອົງອັນມີພະລັງຍິ່ງ.
Verse 32
स तूत्थाय महाबाहुरुपसान्त्व्य च तान् जनान् | भधनुर्विकृष्य व्यसृजद् बाणान् श्वेते महागिरौ,उन महाबाहुने उठकर उन सब प्राणियोंको सान्त्वना दी और महापर्वत श्वेतपर खड़े खड़े धनुष खींचकर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी
ແລ້ວວິລະບຸລຸດຜູ້ມີແຂນແຂງກໍລຸກຂຶ້ນ ແລະປອບໃຈບັນດາຜູ້ນັ້ນໃຫ້ສະຫງົບ. ພະອົງຢືນຢູ່ເທິງພູຂາວອັນໃຫຍ່ (ສະເວຕະ) ດຶງຄັນທະນູໃຫ້ເຕັມແຮງ ແລະເລີ່ມປ່ອຍຝົນລູກສອນ.
Verse 33
बिभेद स शरै: शैलं क्रौज्चं हिमवत: सुतम् । तेन हंसाश्न गृध्राश्ष॒ मेरुं गच्छन्ति पर्वतम्,उन बाणोंद्वारा उन्होंने हिमालयके पुत्र क्रौज्च पर्वतको विदीर्ण कर दिया। उसी छिठ्रमें होकर हंस और गृध्र पक्षी मेरु पर्वतको जाते हैं
ມາຣະກັນເດຍະ ກ່າວວ່າ: ດ້ວຍລູກສອນຂອງພະອົງ ພະອົງໄດ້ຜ່າພູກຣໍຍຈະ ຜູ້ເປັນບຸດຂອງຮິມະວັດ. ຜ່ານຮອຍແຕກນັ້ນ ຫົງສາ ແລະນົກອີນຊີ/ນົກແຮ້ ຈຶ່ງບິນໄປສູ່ພູເມຣຸ.
Verse 34
स विशीर्णोडपतच्छैलो भृशमार्तस्वरान् रुवन् तस्मिन् निपतिते त्वन्ये नेदु: शैला भृशं तदा,स्कन्दके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो वह क्रौज्च पर्वत अत्यन्त आर्तनाद करता हुआ गिर पड़ा। उस समय उसके गिरनेपर दूसरे पर्वत भी जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे
ມາຣະກັນເດຍະ ກ່າວວ່າ: «ພູນັ້ນຖືກແຕກອອກເປັນຊິ້ນໆ ແລ້ວລົ້ມລົງ ພ້ອມສຽງຮ້ອງຄຳຄວນອັນເຈັບປວດ. ເມື່ອມັນກະແທກລົງ ພູອື່ນໆກໍຮ້ອງສຽງດັງກ້ອງຕອບຮັບ»។
Verse 35
सतं नादं भृशार्तानां श्रुत्वापि बलिनां वर: । न प्राच्यवदमेयात्मा शक्तिमुद्यम्प चानदत्,बलवानोंमें श्रेष्ठ और अमित आत्मबलसे सम्पन्न कुमार उन अत्यन्त आर्त पर्वतोंके उस चीत्कारको सुनकर भी विचलित नहीं हुए, अपितु हाथसे शक्तिको उठाकर सिंहनाद करने लगे
ມາຣະກັນເດຍະ ກ່າວວ່າ: «ເຖິງແມ່ນໄດ້ຍິນສຽງຮ້ອງອັນດັງກ້ອງຂອງຜູ້ທຸກທໍລະມານຢ່າງຫນັກ ເຈົ້າຊາຍ—ຜູ້ເປັນເລີດໃນຫມູ່ຜູ້ແຂງແກ່ງ—ກໍບໍ່ຫວັ່ນໄຫວ. ດ້ວຍພະລັງໃຈອັນຫາຂອບເຂດບໍ່ໄດ້ ລາວຍົກອາວຸດສະກຕິ(ຫອກ) ແລ້ວຮ້ອງສຽງດັ່ງສິງຫາ ຢືນຢັນຄວາມກ້າຫານຢ່າງໝັ້ນຄົງ»។
Verse 36
सा तदा विमला शक्ति: क्षिप्ता तेन महात्मना । बिभेद शिखर घोर श्वेतस्य तरसा गिरे:,उन महात्माने उस समय अपनी चमचमाती हुई शक्ति चलायी और उसके द्वारा श्वेत गिरिके भयानक शिखरको बड़े वेगसे विदीर्ण कर डाला
ມາຣະກັນເດຍະ ກ່າວວ່າ: «ໃນເວລານັ້ນ ອາວຸດຫອກສະກຕິອັນສະຫວ່າງໃສ ແລະບໍ່ມີມົນທິນ ຖືກມະຫາວິລະບຸລຸດໂຍນອອກໄປ; ດ້ວຍແຮງອັນມະຫາສານ ມັນແຍກຜ່າຍອດອັນນ່າຢ້ານຂອງພູສະເວຕະ»។
Verse 37
स तेनाभिहतो दीर्णो गिरि: श्वेतो5चलै: सह । उत्पपात महीं त्यक्त्वा भीतस्तस्मान्महात्मन:,इस प्रकार कार्तिकेयद्वारा शक्तिके आघातसे विदीर्ण होकर श्वेत पर्वत उन महात्माके भयसे डर गया और (दूसरे) पर्वतोंके साथ इस पृथ्वीको छोड़कर आकाशमें उड़ गया
ມາຣະກັນເດຍະ ກ່າວວ່າ: «ເມື່ອຖືກລາວຕີຖືກ ພູສະເວຕະກໍແຕກອອກ; ແລະເນື່ອງຈາກຢ້ານກົວມະຫາວິລະບຸລຸດນັ້ນ ມັນລະທິ້ງແຜ່ນດິນ ແລ້ວກະໂດດຂຶ້ນສູ່ຟ້າ ພ້ອມກັບພູອື່ນໆ»។
Verse 38
ततः प्रव्यथिता भूमिवव््यशीर्यत समन्तत: । आर्ता स्कन्दं समासाद्य पुनर्बलवती बभौ,इससे पृथ्वीको बड़ी पीड़ा हुई। वह सब ओरसे फट गयी और पीड़ित हो कार्तिकेयजीकी ही शरणमें जानेपर पुन: बलवती हो शोभा पाने लगी
ມາຣະກັນເດຍະ ກ່າວວ່າ: «ຕໍ່ມາ ແຜ່ນດິນຖືກສັ່ນສະເທືອນຢ່າງຮຸນແຮງ ແລະແຕກອອກທຸກທິດ. ໃນຄວາມທຸກທໍລະມານ ນາງໄດ້ໄປພຶ່ງພາສະກັນດະ; ເມື່ອເຂົ້າເຖິງພຣະອົງ ນາງກໍກັບຄືນມີພະລັງ ແລະກາຍເປັນສົມບູນຜ່ອງໃສອີກຄັ້ງ»។
Verse 39
पर्वताश्व नमस्कृत्य तमेव पृथिवीं गता: । अथैनमभजल्लोक: स्कन्दं शुक्लस्य पठचमीम्,तत्पश्चात् पर्वतोंने भी उन्हींके चरणोंमें मस्तक झुकाया और वे फिर पृथ्वीपर आ गये। तभीसे लोग प्रत्येक मासके शुक्लपक्षकी पञ्चमीको स्कन्ददेवका पूजन करने लगे
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ເມື່ອໄດ້ກົດກະຫຼົບນົບນ້ອມຕໍ່ ປະຣະວະຕາສະວະ (Parvatāśva) ແລ້ວ ພວກເຂົາກໍກັບຄືນສູ່ແຜ່ນດິນອີກຄັ້ງ. ນັບແຕ່ນັ້ນມາ ປະຊາຊົນໄດ້ເລີ່ມບູຊາ ສະກັນດະ (Skanda) ໃນວັນປັນຈະມີ (pañcamī) ຂອງຂ້າງຂຶ້ນ (śukla pakṣa) ທຸກເດືອນ ເພື່ອໃຫ້ຄວາມກະຕັນຍູແລະການລະລຶກກາຍເປັນພິທີປະຈໍາສືບໄປ.
Verse 116
राक्षसीभिश्न सम्पूर्णमनेकैश्न मृगद्धिजै: । सात सिरोंवाले अद्भुत नाग, जिनकी दृष्टिमें ही विष भरा था, उस पर्वतकी रक्षा करते थे। इनके सिवा राक्षस, पिशाच, भयानक भूतगण, राक्षसी-समुदाय तथा अनेक पशु- पक्षियोंसे भी वह पर्वत भरा हुआ था
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: ພູນັ້ນແອດແນ້ນໄປດ້ວຍ ຣາກຊະສີ (rākṣasī) ແລະສັດປ່ານານາຊະນິດກັບນົກຫຼາຍພັນຫຼາຍຊະນິດ. ມີນາກອັນອັດສະຈັນຫົວເຈັດ—ທີ່ແມ່ນແຕ່ສາຍຕາກໍເຕັມໄປດ້ວຍພິດ—ຢືນເຝົ້າປົກປ້ອງພູນັ້ນ. ນອກຈາກນັ້ນ ຍັງຄັບຄັ່ງໄປດ້ວຍ ຣາກຊະສະ (rākṣasa), ປິຊາຈະ (piśāca), ຝູງວິນຍານອັນນ່າຢ້ານ, ກຸ່ມຣາກຊະສີ, ແລະສັດກັບນົກຫຼາຍຫຼາຍ. ພາບນີ້ຊີ້ໃຫ້ເຫັນວ່າ ອັນຕະລາຍອາດຖືກຖັກທໍ່ຢູ່ໃນພູມທັດເອງ ແລະເຕືອນໃຫ້ເຂົ້າໃກ້ສິ່ງທີ່ບໍ່ຮູ້ຈັກດ້ວຍຄວາມສະຫງົບອົດທົນ ຄວາມລະມັດລະວັງ ແລະປັນຍາພິຈາລະນາ ບໍ່ໃຫ້ຫຸນຫັນ.
Verse 193
लोहिताभ्रे सुमहति भाति सूर्य इवोदित: । चतुर्थीको वे कुमार स्कन्द सभी अंग-उपांगोंसे सम्पन्न हो गये। उस समय कुमार लाल रंगके विशाल बिजलीयुक्त बादलसे आच्छादित थे। अतः: अरुण रंगके मेघोंकी विशाल घटाके भीतर उदित हुए सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे
ມາຣະກັນເດຍ ກ່າວວ່າ: «ໃນກ້ອນເມກສີແດງອັນມະຫາໃຫຍ່ ພຣະອົງສ່ອງສະຫວ່າງດັ່ງຕາເວັນທີ່ພຶ່ງຂຶ້ນ. ໃນວັນທີສີ່ ກຸມານສະກັນດະ (Skanda) ກໍກາຍເປັນຮູບກາຍສົມບູນ ຄົບຖ້ວນທຸກອະວະຍະວະ ແລະລັກສະນະປະກອບ. ໃນເວລານັ້ນ ກຸມານຖືກປົກຄຸມດ້ວຍເມກສີແດງອັນໃຫຍ່ ທີ່ເຕັມໄປດ້ວຍຟ້າຜ່າ; ດັ່ງນັ້ນ ພຣະອົງຈຶ່ງສ່ອງພົ້ນອອກມາ ເຫມືອນຕາເວັນຜຸດຂຶ້ນຈາກໃຈກາງຂອງກ້ອນເມກສີອະຣຸນອັນມະຫາໃຫຍ່.»
Verse 224
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगर्ें स्कनन््दकी उत्पत्तिविषयक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ດັ່ງນີ້ ຈົບລົງແລ້ວ ບົດທີ 224 ວ່າດ້ວຍການປະສູດຂອງ ສະກັນດະ ໃນຕອນ ອາງກິຣະສະ (Āṅgirasa) ພາຍໃນພາກ ມາຣະກັນເດຍ-ສະມາສະຍະ (Mārkaṇḍeya-samāsya) ຂອງ ວະນະປັຣວະ (Vana Parva) ໃນ «ສຣີ ມະຫາພາຣະຕະ». ຜູ້ເລົ່າຄື ມາຣະກັນເດຍ ໄດ້ກໍານົດເຄື່ອງໝາຍແຫ່ງການສໍາເລັດຂອງຫົວຂໍ້ນີ້ ໂດຍວາງເລື່ອງໄວ້ເປັນອຸທາຫອນອັນສັກສິດ ໃນຄໍາສອນດ້ານຈິດທໍາແລະຕໍານານອັນກວ້າງໃຫຍ່ຂອງພາກປ່າ.
Verse 225
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आंगिरसे कुमारोत्पत्तौ पज्चविंशत्यधिकद्धिशततमो<5ध्याय:
ດັ່ງນີ້ ໃນ «ສຣີ ມະຫາພາຣະຕະ» ພາຍໃນ ວະນະປັຣວະ (Vana Parva) ໃນພາກທີ່ເອີ້ນວ່າ ມາຣະກັນເດຍ-ສະມາສະຍະ ປັຣວະ (Mārkaṇḍeya-samāsya Parva) ໃນຕອນວ່າດ້ວຍການປະສູດຂອງກຸມານແຫ່ງສາຍອາງກິຣະສະ (Āṅgirasa) ບົດທີ 225 ກໍຈົບລົງແລ້ວ.
Verse 1236
प्राक्षिपत् काज्चने कुण्डे शुक्रं सा त्वरिता शुभा | अनेकानेक नदी और झरने वहाँ बहते थे, तथा नाना प्रकारके वृक्ष उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते थे। शुभस्वरूपा स्वाहा देवीने सहसा उस दुर्गग शैलशिखरपर जाकर एक सुवर्णमय कुण्डमें शीघ्रतापूर्वक उस शुक्र (वीर्य)-को डाल दिया
ນາງສະວາຫາ ເທວີ ຜູ້ມີຮູບງາມເປັນມົງຄຸນ ໄດ້ຮີບຮ້ອນຂຶ້ນໄປຍັງຍອດຜາອັນຍາກເຂົ້າເຖິງນັ້ນ ແລ້ວເທ “ສຸກຣະ” (ວີຣະຍະ/ນ້ຳເຊື້ອ) ລົງໃນອ່າງຄຳຢ່າງວ່ອງໄວ. ທີ່ນັ້ນມີແມ່ນ້ຳ ແລະ ນ້ຳຕົກຫຼາຍສາຍໄຫຼຜ່ານ ແລະ ຕົ້ນໄມ້ນານາພັນກໍເພີ່ມພູມງາມໃຫ້ພູນັ້ນ.
The tension lies between legitimate governance and the instrumental use of another’s suffering: Karṇa’s advice prioritizes reputational dominance and humiliation as strategy, raising questions about restraint, compassion, and righteous kingship.
The chapter illustrates how political authority is narrated as ‘radiance’ and publicly recognized fortune; it also suggests that perceived legitimacy can be constructed through spectacle, alliances, and tribute—independent of inner virtue.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is contextual—this counsel serves as a narrative hinge that explains subsequent movements and the escalation of psychological and political pressure during exile.