
Droṇotpattiḥ and Dhanurveda-Prāpti (Origin of Droṇa and Acquisition of Martial Science)
Upa-parva: Sambhava Upa-Parva (Origin Narratives of Key Figures)
Vaiśaṃpāyana describes Bhīṣma’s intent to secure a superior instructor for the Kuru princes, noting that only a person of keen intellect, broad astra-knowledge, and disciplined temperament can train powerful Kurus in warfare. The narration then shifts to Droṇa’s origins: the sage Bharadvāja encounters the apsaras Ghṛtācī; due to a wind-displaced garment, his emitted seed is preserved in a vessel (droṇa), from which Droṇa is born. Droṇa masters the Vedas and Vedāṅgas, and the transmission of the Agneya weapon is traced through Bharadvāja and Agniveśya, situating martial knowledge within a sacral-ritual lineage. Bharadvāja’s friendship with King Pṛṣata establishes Droṇa’s association with Pāñcāla; Pṛṣata’s son Drupada studies and plays with Droṇa in the āśrama before later becoming king. After Bharadvāja’s ascent, Droṇa marries Kṛpī and fathers Aśvatthāmā, named for a cry likened to a celestial horse. Seeking wealth and complete weapon-lore, Droṇa approaches Paraśurāma, who has already gifted away land and riches but grants Droṇa the full dhanurveda with operational secrets, after which Droṇa proceeds toward Drupada—closing the chapter with the renewed contact that foreshadows later rupture.
Chapter Arc: पाण्डु के निषेध और शाप-जनित विवशता के सामने पृथा (कुन्ती) धर्मपत्नी-भाव से दृढ़ होकर कहती है—‘धर्मज्ञ! आप मुझसे ऐसी बात न कहें; मैं आपकी ही हूँ।’ → पाण्डु की संतान-चिन्ता और राजवंश की निरन्तरता का संकट बढ़ता है; पृथा अपने पतिव्रत और मर्यादा की सीमा रेखा खींचते हुए भी समाधान खोजने का आग्रह करती है—वह किसी अन्य पुरुष की ओर मन से भी न जाने का व्रत दोहराती है। → उपाख्यान के केन्द्र में ‘व्युषिताश्व’ का उदाहरण आता है—यज्ञ-प्रसंग, इन्द्र का सोमपान से उन्मत्त होना, और पुराणविदों द्वारा गायी जाने वाली गाथा; इसी के सहारे पृथा निर्णायक प्रस्ताव रखती है कि ‘मानसिक संकल्प/तप-योगबल’ से भी धर्मपूर्वक पुत्रोत्पत्ति सम्भव है—अर्थात् देह-समागम के बिना भी वंश-रक्षा का मार्ग। → पृथा व्युषिताश्व-उपाख्यान से यह स्थापित करती है कि असाधारण परिस्थिति में असाधारण, परन्तु धर्म-सम्मत उपाय अपनाया जा सकता है; वह पाण्डु को आश्वस्त करती है कि पुत्र-प्राप्ति का उपाय ‘धर्मतः’ होगा और पति की मर्यादा अक्षुण्ण रहेगी। → पाण्डु इस प्रस्ताव को कैसे स्वीकार करेगा और आगे किस विधि से पुत्र-प्राप्ति का विधान होगा—यह प्रश्न अगले प्रसंग के लिए खुला रह जाता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्माभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डु-पृथा-संवादाविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ११९ ॥। ऑपन-माज बक। डे $. बन्धु शब्दका अर्थ संस्कृत-शब्दार्थकौस्तुभमें आत्मबन्धु, पितृबन्धु, मातृबन्धु माना गया है, इसलिये बन्धुका अर्थ कुटुम्बी किया है। दायादका अर्थ उसी कोषमें “उत्तराधिकारी” है। इसीलिये बन्धुदायादका अर्थ “कुटुम्बी' होनेसे उत्तराधिकारी” किया है। इसके विपरीत, अबन्धुदायादका अर्थ अबन्धु यानी कुट॒म्बी न होनेपर उत्तराधिकारी किया है। २. 'पौनर्भव”का अर्थ पद्मचन्द्रकोषके अनुसार दूसरी बार ब्याही हुई स्त्रीसे उत्पन्न पुत्र लिया गया है। 3. कानीन--यह अर्थ नीलकण्ठजीने अपनी टीकामें किया है। विशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: कुन्तीका पाण्डुको व्युषिताश्वके मृत शरीरसे उसकी पतिव्रता पत्नी भद्राके द्वारा पुत्र-प्राप्तिका कथन वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता महाराज कुन्ती पाण्डुमभाषत । कुरूणामृषभं वीरं तदा भूमिपतिं पतिम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज जनमेजय! इस प्रकार कहे जानेपर कुन्ती अपने पति कुरुश्रेष्ठ वीरवर राजा पाण्डुसे इस प्रकार बोली--
ດັ່ງນັ້ນ ໃນມະຫາພາຣະຕະ ອາດິປະຣະວະ ພາຍໃນສຳພະວະປະຣະວະ, ບົດທີ 119 ວ່າດ້ວຍການສົນທະນາລະຫວ່າງ ປານຑຸ ແລະ ປຣຶຖາ (ກຸນຕີ) ກໍສິ້ນສຸດລົງ. ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ຂໍພຣະອົງ ຈະນະເມຊະຍະ, ເມື່ອນາງຖືກກ່າວເຊັ່ນນັ້ນແລ້ວ, ກຸນຕີ ໄດ້ກ່າວກັບ ປານຑຸ—ສາມີຂອງນາງ, ວິລະບຸລຸດ ເຈົ້າແຫ່ງແຜ່ນດິນ, ແລະເປັນດັ່ງງົວຜູ້ນຳໃນຫມູ່ກຸຣຸ—ວ່າ:
Verse 2
न मा्महसि धर्मज्ञ वक्तुमेवं कथंचन । धर्मपत्नीमभिरतां त्वयि राजीवलोचने,“धर्मज्ञ! आप मुझसे किसी तरह ऐसी बात न कहें; मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ और कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले आपमें ही अनुराग रखती हूँ
ນາງກ່າວວ່າ: «ໂອ ຜູ້ຮູ້ທຳ, ຢ່າໄດ້ກ່າວກັບຂ້າເຊັ່ນນີ້ເລີຍ. ຂ້າເປັນພັນລະຍາຕາມທຳຂອງທ່ານ, ແລະ ໂອ ຜູ້ມີນັຍນາດັ່ງດອກບົວ, ຄວາມຮັກແລະຄວາມສັດຊື່ຂອງຂ້າ ຝາກໄວ້ກັບທ່ານພຽງຜູ້ດຽວ»។
Verse 3
त्वमेव तु महाबाहो मय्यपत्यानि भारत । वीर वीर्योपपन्नानि धर्मतो जनयिष्यसि,“महाबाहु वीर भारत! आप ही मेरे गर्भसे धर्मपूर्वक अनेक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न करेंगे
ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ວິລະບຸລຸດແຂນໃຫຍ່ ແຫ່ງວົງສາບາຣະຕະ, ທ່ານແຕ່ຜູ້ດຽວຈະໃຫ້ກຳເນີດລູກຫຼານຫຼາຍຄົນໃນຄັນຂອງຂ້າ ຕາມທຳ—ເປັນບຸດຜູ້ກ້າຫານ ແລະພ້ອມດ້ວຍພະລັງວິລະຍະ»។
Verse 4
स्वर्ग मनुजशार्दूल गच्छेयं सहिता त्वया । अपत्याय च मां गच्छ त्वमेव कुरुनन्दन,“नरश्रेष्ठ! मैं आपके साथ ही स्वर्गलोकमें चलूँगी। कुरुनन्दन! पुत्रकी उत्पत्तिके लिये आप ही मेरे साथ समागम कीजिये
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ຜູ້ກ້າຫານດັ່ງເສືອໃນຫມູ່ມະນຸດ! ຂ້າພະເຈົ້າຈະໄປສະຫວັນກໍແຕ່ພ້ອມກັບທ່ານເທົ່ານັ້ນ. ແລະ ໂອ ຄຸຣຸນັນດະນະ, ເພື່ອໃຫ້ເກີດທາຍາດ ທ່ານເອງຈົ່ງຮ່ວມສັມພັນກັບຂ້າພະເຈົ້າ».
Verse 5
न हाहं मनसाप्यन्यं गच्छेयं त्वदृते नरम् । त्वत्त: प्रतिविशिष्टश्ष॒ कोडन्यो5स्ति भुवि मानव:,“मैं आपके सिवा किसी दूसरे पुरुषसे समागम करनेकी बात मनमें भी नहीं ला सकती। फिर इस पृथ्वीपर आपसे श्रेष्ठ दूसरा मनुष्य है भी कौन
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ບໍ່—ບໍ່ເຄີຍ. ແມ່ນແຕ່ໃນໃຈ ຂ້າພະເຈົ້າກໍບໍ່ອາດຍອມຮ່ວມສັມພັນກັບຊາຍອື່ນນອກຈາກທ່ານ. ແລະໃນໂລກນີ້ ມີມະນຸດໃດຈະເຫນືອກວ່າທ່ານອີກ?»
Verse 6
इमां च तावद् धर्मात्मन् पौराणीं शूणु मे कथाम् । परिश्रुतां विशालाक्ष कीर्तयिष्यामि यामहम्,“धर्मात्मन्! पहले आप मेरे मुँहसे यह पौराणिक कथा सुन लीजिये। विशालाक्ष! यह जो कथा मैं कहने जा रही हूँ, सर्वत्र विख्यात है
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ຜູ້ມີທຳມະ! ກ່ອນອື່ນ ຈົ່ງຟັງນິທານບູຮານ (ປຸຣານະ) ນີ້ຈາກຂ້າພະເຈົ້າ. ໂອ ຜູ້ມີດວງຕາກວ້າງ! ຂ້າພະເຈົ້າຈະເລົ່າເລື່ອງທີ່ໄດ້ຍິນມາຢ່າງຄົບຖ້ວນ—ເລື່ອງທີ່ໂດງດັງໄປທົ່ວ».
Verse 7
व्युषिताश्व इति ख्यातो बभूव किल पार्थिव: । पुरा परमधर्मिष्ठ: पूरोर्वशविवर्धन:,“कहते हैं, पूर्वकालमें एक परम धर्मात्मा राजा हो गये हैं। उनका नाम था व्युषिताश्व। वे पूरुवंशकी वृद्धि करनेवाले थे
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໃນການກ່ອນການ ມີກະສັດອົງໜຶ່ງ ມີນາມລືຊາວ່າ ວິວສິຕາສະວະ (Vyuṣitāśva). ພຣະອົງເປັນຜູ້ຍຶດຖືທຳມະຢ່າງສູງສຸດ ແລະເປັນຜູ້ເຮັດໃຫ້ວົງສາພູຣຸ (Pūru) ເຈີຣິນຮຸ່ງເຮືອງ».
Verse 8
तस्मिंश्न॒ यजमाने वै धर्मात्मनि महाभुजे । उपागमंस्ततो देवा: सेन्द्रा देवर्षिभि: सह,“एक समय वे महाबाहु धर्मात्मा नरेश जब यज्ञ करने लगे, उस समय इन्द्र आदि देवता देवर्षियोंके साथ उस यज्ञमें पधारे थे
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ເມື່ອກະສັດຜູ້ມີທຳມະ ແຂນແຂງກ້ານັ້ນ ກຳລັງປະກອບພິທີຍັດ (ຍັດຍະ) ຢູ່, ບັນດາເທວະທັງຫຼາຍ ນຳໂດຍພຣະອິນທຣະ ໄດ້ມາຮອດທີ່ນັ້ນ ພ້ອມກັບດວງິສີເທວະ.»
Verse 9
अमाद्यदिन्द्र: सोमेन दक्षिणाभिद्धिजातय: । व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मन:,“उसमें देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे थे तथा ब्राह्मणलोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्षसे फूल उठे थे। महामना राजर्षि व्युषिताश्वके यज्ञमें उस समय देवता और ब्रह्मर्षि स्वयं सब कार्य कर रहे थे। राजन! इससे व्युषिताश्व सब मनुष्योंसे ऊँची स्थितिमें पहुँचकर बड़ी शोभा पा रहे थे
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ພຣະອິນທຣະໄດ້ຄຶກຄື້ນມຶນເມົາດ້ວຍການດື່ມໂສມະ; ແລະພວກທະວິຊະ (ພຣາຫມັນ) ກໍຍິນດີປິຕິ ເພາະໄດ້ຮັບດັກຊິນາ (ຂອງຖວາຍໃນພິທີຍັດ) ຢ່າງອຸດົມ. ໃນຍັດຂອງຣາຊະຣິສີຜູ້ມີໃຈຍິ່ງ ວິຍຸສິຕາສະວະ ນັ້ນ ພຣະເທວະ ແລະ ພຣະພຣາຫມະຣິສີ ດັ່ງກັບວ່າໄດ້ລົງມືປະກອບພິທີເອງ. ດັ່ງນັ້ນ ວິຍຸສິຕາສະວະ ຈຶ່ງສູງສົ່ງເຫນືອມະນຸດທັງປວງ ແລະ ສ່ອງສະຫວ່າງດ້ວຍສະຫງ່າລາສີອັນພິເສດ.
Verse 10
देवा ब्रह्मर्षयश्चैव चक्रुः कर्म स्वयं तदा । व्युषिताश्व॒स्ततो राजन्नति मर्त्यान् व्यरोचत,“उसमें देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे थे तथा ब्राह्मणलोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्षसे फूल उठे थे। महामना राजर्षि व्युषिताश्वके यज्ञमें उस समय देवता और ब्रह्मर्षि स्वयं सब कार्य कर रहे थे। राजन! इससे व्युषिताश्व सब मनुष्योंसे ऊँची स्थितिमें पहुँचकर बड़ी शोभा पा रहे थे
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ໃນເວລານັ້ນ ພຣະເທວະ ແລະ ພຣະພຣາຫມະຣິສີ ໄດ້ປະກອບກິດພິທີດ້ວຍຕົນເອງ. ແລະ ພຣະຣາຊາ ວິຍຸສິຕາສະວະ—ໂອ ພຣະຣາຊາ—ກໍໄດ້ສ່ອງສະຫວ່າງເຫນືອມະນຸດທັງປວງ.
Verse 11
सर्वभूतान् प्रति यथा तपन: शिशिरात्यये । स विजित्य गृहीत्वा च नृपतीन् राजसत्तम:,'राजा व्युषिताश्व॒ समस्त भूतोंके प्रीतिपात्र थे। राजाओंमें श्रेष्ठ प्रतापी व्युषिताश्वने अश्वमेध नामक महान् यजञ्ञमें पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण--चारों दिशाओंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया--ठीक जिस प्रकार शिशिरकालके अन्तमें भगवान् सूर्य- देव सभी प्राणियोंपर विजय कर लेते हैं--सबको तपाने लगते हैं
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ດັ່ງພຣະອາທິດໃນທ້າຍລະດູໜາວ ຊະນະສັດທັງປວງໂດຍແຜ່ຄວາມຮ້ອນໄປທົ່ວ, ສັນໃດ ກະສັດຜູ້ປະເສີດນັ້ນ ໄດ້ຊະນະກະສັດອື່ນໆ ແລະນຳເຂົາເຈົ້າເຂົ້າສູ່ອຳນາດຂອງຕົນ ເພື່ອສະຖາປະນາອຳນາດອັນເປັນເອກະລາດ.
Verse 12
प्राच्यानुदीच्यान् पाश्चात्त्यान् दाक्षिणात्यानकालयत् । अश्वमेधे महायज्ञे व्युषिताश्वः प्रतापवान्,'राजा व्युषिताश्व॒ समस्त भूतोंके प्रीतिपात्र थे। राजाओंमें श्रेष्ठ प्रतापी व्युषिताश्वने अश्वमेध नामक महान् यजञ्ञमें पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण--चारों दिशाओंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया--ठीक जिस प्रकार शिशिरकालके अन्तमें भगवान् सूर्य- देव सभी प्राणियोंपर विजय कर लेते हैं--सबको तपाने लगते हैं
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ໃນມະຫາຍັດອັສວະເມທະ ກະສັດວິຍຸສິຕາສະວະຜູ້ກ້າຫານແລະມີອຳນາດ ໄດ້ນຳບັນດາກະສັດແຫ່ງທິດຕາເວັນອອກ, ເໜືອ, ຕາເວັນຕົກ, ແລະ ໃຕ້ ເຂົ້າສູ່ອຳນາດຂອງຕົນ.
Verse 13
बभूव स हि राजेन्द्रो दशनागबलान्वित: । अप्यत्र गाथां गायन्ति ये पुराणविदो जना:,“उन महाराजमें दस हाथियोंका बल था। कुरुश्रेष्ठ! पुराणवेत्ता विद्वान् यशमें बढ़े-चढ़े हुए नरेन्द्र व्युषिताश्वके विषयमें यह यशोगाथा गाते हैं--“राजा व्युषिताश्व समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीको जीतकर जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार सभी वर्णके लोगोंका पालन करते थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ກະສັດອົງນັ້ນມີກຳລັງເທົ່າຊ້າງສິບໂຕ. ໂອ ຜູ້ປະເສີດໃນວົງກຸຣຸ! ບັນດາຜູ້ຮູ້ພູຣານະ ໄດ້ຂັບຮ້ອງຄຳສັນລະເສີນເກົ່າແກ່ຢູ່ນີ້ ກ່ຽວກັບກະສັດ ວິຍຸສິຕາສະວະ ວ່າ: “ພຣະອົງໄດ້ຊະນະແຜ່ນດິນທັງປວງຈົນເຖິງທະເລອ້ອມຮອບ ແລະປົກປ້ອງປະຊາຊົນທຸກວັນນະ (ວັນນະ) ດັ່ງພໍ່ບຳລຸງລູກຊາຍແທ້ຂອງຕົນ. ດ້ວຍການປະກອບຍັດໃຫຍ່ໆ ພຣະອົງໄດ້ຖວາຍຊັບສິນຫຼາຍຫຼວງແກ່ພຣາຫມັນ.”
Verse 14
व्युषिताश्वे यशोवृद्धे मनुष्येन्द्रे कुरूत्तम । व्युषिताश्व: समुद्रान्तां विजित्येमां वसुंधराम्,“उन महाराजमें दस हाथियोंका बल था। कुरुश्रेष्ठ! पुराणवेत्ता विद्वान् यशमें बढ़े-चढ़े हुए नरेन्द्र व्युषिताश्वके विषयमें यह यशोगाथा गाते हैं--“राजा व्युषिताश्व समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीको जीतकर जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार सभी वर्णके लोगोंका पालन करते थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ໂອ ຜູ້ປະເສີດໃນວົງກຸຣຸ! ກ່ຽວກັບພຣະຣາຊາ ວຍຸສິຕາສະວະ (Vyuṣitāśva) ຜູ້ມີກຽດສຽງເພີ່ມພູນຢ່າງໃຫຍ່ ນັກປັນຍາຜູ້ຮັກສາປະເພນີໂບຮານຮ້ອງສັນລະເສີນວ່າ: «ເມື່ອຊະນະແຜ່ນດິນນີ້ທີ່ມີທະເລເປັນຂອບເຂດແລ້ວ ພຣະຣາຊາ ວຍຸສິຕາສະວະ ໄດ້ຄຸ້ມຄອງປົກປ້ອງປະຊາຊົນທຸກວັນນະ ເຫມືອນພໍ່ລ້ຽງດູລູກຊາຍອັນຊອບທຳຂອງຕົນ»។
Verse 15
अपालयत् सर्ववर्णान् पिता पुत्रानिवौरसान् । यजमानो महायज्जैत्रद्वाणेभ्यो धनं ददौ,“उन महाराजमें दस हाथियोंका बल था। कुरुश्रेष्ठ! पुराणवेत्ता विद्वान् यशमें बढ़े-चढ़े हुए नरेन्द्र व्युषिताश्वके विषयमें यह यशोगाथा गाते हैं--“राजा व्युषिताश्व समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीको जीतकर जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार सभी वर्णके लोगोंका पालन करते थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ພຣະອົງໄດ້ປົກປ້ອງແລະເບິ່ງແຍງປະຊາຊົນທຸກວັນນະ ເຫມືອນພໍ່ລ້ຽງດູລູກຊາຍອັນຊອບທຳຂອງຕົນ. ເມື່ອເປັນຜູ້ອຸປະຖຳພິທີບູຊາອັນໃຫຍ່ (ຍັດຍະ) ພຣະອົງໄດ້ປະທານຊັບສິນແກ່ຜູ້ດວິຊະ (twice-born) ໂດຍສະເພາະແກ່ພຣາຫມະນະ.
Verse 16
अनन्तरत्नान्यादाय स जहार महाक्रतून् । सुषाव च बहून् सोमान् सोमसंस्थास्ततान च,“अनन्त रत्नोंकी भेंट लेकर उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किये। अनेक सोमयागोंका आयोजन करके उनमें बहुत-सा सोमरस संग्रह करके अग्निष्टोम-अत्यग्निष्टोम आदि सात प्रकारकी सोमयाग-संस्थाओंका भी अनुष्ठान किया
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ເມື່ອຮັບເອົາຂອງຂວັນອັນເປັນຮັດຖະນະນັບບໍ່ຖ້ວນ ພຣະອົງໄດ້ປະກອບພິທີບູຊາອັນໃຫຍ່. ພຣະອົງໄດ້ບີບສົມະ (Soma) ຢ່າງຫຼາຍ ແລະປະຕິບັດຮູບແບບພິທີສົມະຕາມສຳສະຖາ (saṁsthā) ຢ່າງຖືກຕ້ອງ ຈົນຄົບຖ້ວນທຸກຮູບແບບ.
Verse 17
आसीत् काक्षीवती चास्य भार्या परमसम्मता | भद्रा नाम मनुष्येन्द्र रूपेणासदृशी भुवि,“नरेन्द्र! राजा कक्षीवान्की पुत्री भद्रा उनकी अत्यन्त प्यारी पत्नी थी। उन दिनों इस पृथ्वीपर उसके रूपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री न थी
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ພຣະອົງມີພຣະມະເຫສີນາມ ພັດຣາ (Bhadrā) ທິດາຂອງພຣະຣາຊາ ກັກສີວານ (Kakṣīvān) ເປັນຜູ້ທີ່ຖືກຮັກຢ່າງຍິ່ງ ແລະໄດ້ຮັບການຍອມຮັບຢ່າງສົມບູນ. ໂອ ຜູ້ປະເສີດໃນມະນຸດ! ໃນແຜ່ນດິນນີ້ ບໍ່ມີຍິງໃດຈະເທົ່າທຽມນາງໃນຄວາມງາມ.
Verse 18
कामयामासतुस्तौ च परस्परमिति श्रुतम् । स तस्यां कामसम्पन्नो यक्ष्मणा समपद्यत,“मैंने सुना है, वे दोनों पति-पत्नी एक-दूसरेको बहुत चाहते थे। पत्नीके प्रति अत्यन्त कामासक्त होनेके कारण राजा व्युषिताश्व राजयक्ष्माके शिकार हो गये
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ໄດ້ຍິນມາວ່າ ສອງຜົວເມຍນັ້ນ ປາຖະໜາຫາກັນແລະກັນຢ່າງເລິກຊຶ້ງ. ແຕ່ພຣະຣາຊາ ເມື່ອຖືກກາມະຕັນຫາຄອບງຳຕໍ່ນາງ ກໍຕົກເປັນໂລກຣາຊະຍັກສະມາ (rājayakṣmā) ໂລກທີ່ທຳໃຫ້ຮ່າງກາຍຊຸດໂຊມລົງ.
Verse 19
तेनाचिरेण कालेन जगामास्तमिवांशुमान् | तस्मिन् प्रेते मनुष्येन्द्रे भार्यास्थ भृशदु:खिता,“इस कारण वे थोड़े ही समयमें सूर्यकी भाँति अस्त हो गये। उन महाराजके परलोकवासी हो जानेपर उनकी पत्नीको बड़ा दुःख हुआ
ບໍ່ດົນປານໃດ ພຣະອົງກໍຕົກດັ່ງດວງຕາເວັນ. ເມື່ອຈອມກະສັດໃນຫມູ່ມະນຸດນັ້ນໄດ້ຈາກໂລກນີ້ໄປ ມະເຫສີຂອງພຣະອົງກໍຖືກຄວາມໂສກເສົ້າອັນແຮງກ້າກົດທັບ.
Verse 20
अपुत्रा पुरुषव्याप्र विललापेति न: श्रुतम् । भद्रा परमदु:खार्ता तन्निबोध जनाधिप,“नरव्याप्र जनेश्वर! हमने सुना है कि भद्राके तबतक कोई पुत्र नहीं हुआ था। इस कारण वह अत्यन्त दुःखसे आतुर होकर विलाप करने लगी; वह विलाप सुनिये”
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: “ໂອ ຜູ້ກ້າຫານດັ່ງເສືອໃນຫມູ່ມະນຸດ, ພວກເຮົາໄດ້ຍິນວ່າ ພັດຣາບໍ່ມີບຸດ ເພາະສະນັ້ນນາງຈຶ່ງຄ່ຳຄວນ. ຖືກຄວາມໂສກອັນລຶກລ້ຳກົດທັບ ນາງໄດ້ຮ້ອງໄຫ້ອອກມາ—ບັດນີ້ ຂໍໃຫ້ຟັງເຖີດ ໂອ ພຣະຣາຊາ.”
Verse 21
भद्रोवाच नारी परमधर्मज्ञ सर्वा भर्तृविनाकृता । पतिं विना जीवति या न सा जीवति दुःखिता,भद्रा बोली--परमधर्मज्ञ महाराज! जो कोई भी विधवा स्त्री पतिके बिना जीवन धारण करती है, वह निरन्तर दु:खमें डूबी रहनेके कारण वास्तवमें जीती नहीं, अपितु मृततुल्या है
ພັດຣາ ກ່າວວ່າ: “ໂອ ພຣະຣາຊາ ຜູ້ຮູ້ທຳອັນສູງສຸດ, ຍິງເມື່ອຖືກພາກຈາກຜົວ ກໍຖືກປອດເປົ່າໄປທັງສິ້ນ. ຜູ້ໃດຢູ່ຕໍ່ໄປໂດຍບໍ່ມີຜົວ ຜູ້ນັ້ນບໍ່ໄດ້ມີຊີວິດແທ້; ຖືກຄວາມໂສກກິນໃຈ ນາງຢູ່ດັ່ງຄົນຕາຍແລ້ວ.”
Verse 22
पतिं विना मृतं श्रेयो नार्या: क्षत्रियपुड्भव | त्वद्गतिं गन्तुमिच्छामि प्रसीदस्व नयस्व माम्,क्षत्रियशिरोमणे! पतिके न रहनेपर नारीकी मृत्यु हो जाय, इसीमें उसका कल्याण है। अतः मैं भी आपके ही मार्गपर चलना चाहती हूँ, प्रसन्न होइये और मुझे अपने साथ ले चलिये। आपके बिना एक क्षण भी जीवित रहनेका मुझमें उत्साह नहीं है। राजन्! कृपा कीजिये और यहाँसे शीघ्र मुझे ले चलिये
ພັດຣາ ກ່າວວ່າ: “ໂອ ຜູ້ເກີດໃນສາຍກະສັດກະສັດຮົບ, ສຳລັບຍິງໃນວົງກະສັດ ການຕາຍຍັງດີກວ່າການມີຊີວິດໂດຍບໍ່ມີຜົວ. ຂ້າພະເຈົ້າປາຖະໜາຈະໄປຕາມເສັ້ນທາງດຽວກັນທີ່ພຣະອົງໄດ້ໄປ. ຂໍພຣະອົງເມດຕາ—ນຳຂ້າພະເຈົ້າໄປດ້ວຍ ໂອ ເພັດພອຍໃນຫມູ່ກະສັດຮົບ.”
Verse 23
त्वया हीना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे । प्रसादं कुरु मे राजन्नितस्तूर्ण नयस्व माम्,क्षत्रियशिरोमणे! पतिके न रहनेपर नारीकी मृत्यु हो जाय, इसीमें उसका कल्याण है। अतः मैं भी आपके ही मार्गपर चलना चाहती हूँ, प्रसन्न होइये और मुझे अपने साथ ले चलिये। आपके बिना एक क्षण भी जीवित रहनेका मुझमें उत्साह नहीं है। राजन्! कृपा कीजिये और यहाँसे शीघ्र मुझे ले चलिये
ພັດຣາ ກ່າວວ່າ: “ບໍ່ມີພຣະອົງ ແມ່ນແຕ່ຊົ່ວຂະນະດຽວ ຂ້າພະເຈົ້າກໍບໍ່ມີໃຈຈະມີຊີວິດ. ຂໍພຣະຣາຊາເມດຕາຂ້າພະເຈົ້າ—ໂອ ເພັດພອຍໃນຫມູ່ກະສັດຮົບ, ນຳຂ້າພະເຈົ້າອອກຈາກນີ້ໃຫ້ໄວ.”
Verse 24
पृष्ठतो$नुगमिष्यामि समेषु विषमेषु च । त्वामहं नरशार्दूल गच्छन्तमनिवर्तितुम्,नरश्रेष्ठ आप जहाँ कभी न लौटनेके लिये गये हैं, वहाँका मार्ग समतल हो या विषम, मैं आपके पीछे-पीछे अवश्य चली चलूँगी
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ຂ້າພະເຈົ້າຈະຕາມຢູ່ຂ້າງຫຼັງທ່ານ—ບໍ່ວ່າເສັ້ນທາງຈະຮາບພຽງ ຫຼື ຂຸລຂະກໍຕາມ. ໂອ ເສືອໃນຫມູ່ມະນຸດ, ເມື່ອທ່ານເດີນໄປຂ້າງໜ້າໂດຍບໍ່ຫັນກັບອີກ ຂ້າພະເຈົ້າກໍຈະຕາມໄປດ້ວຍ».
Verse 25
छायेवानुगता राजन् सततं वशवर्तिनी | भविष्यामि नरव्याप्र नित्यं प्रियहिते रता,राजन! मैं छायाकी भाँति आपके पीछे लगी रहूँगी एवं सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहूँगी। नरव्याप्र! मैं सदा आपके प्रिय और हितमें लगी रहूँगी
ນາງກ່າວຕໍ່ພະຣາຊາວ່າ: «ດັ່ງເງົາ ຂ້າພະເຈົ້າຈະຕາມທ່ານຕະຫຼອດໄປ ແລະຈະຢູ່ໃນພຣະບັນຊາຂອງທ່ານບໍ່ຂາດ. ໂອ ເສືອໃນຫມູ່ມະນຸດ, ຂ້າພະເຈົ້າຈະອຸທິດໃຈຢູ່ເທິງສິ່ງທີ່ທ່ານຮັກ ແລະທີ່ເປັນປະໂຫຍດແກ່ທ່ານເສມອ».
Verse 26
अद्यप्रभृति मां राजन् कष्टा हृदयशोषणा: । आधयो<5भिभविष्यन्ति त्वामृते पुष्करेक्षण,कमलके समान नेत्रोंवाले महाराज! आपके बिना आजसे हृदयको सुखा देनेवाले कष्ट और मानसिक चिन्ताएँ मुझे सताती रहेंगी
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ນັບແຕ່ມື້ນີ້ໄປ ໂອ ພະຣາຊາ, ຄວາມທຸກທໍລະມານອັນຮຸນແຮງທີ່ເຮັດໃຫ້ໃຈແຫ້ງ—ຄວາມກັງວົນ ແລະ ຄວາມທຸກໃນໃຈ—ຈະຄອບງຳຂ້າພະເຈົ້າເມື່ອຂາດທ່ານ, ໂອ ຜູ້ມີດວງຕາດັ່ງດອກບົວ».
Verse 27
अभाग्यया मया नून॑ वियुक्ता: सहचारिण: । तेन मे विप्रयोगो5यमुपपन्नस्त्वया सह,मुझ अभागिनीने निश्चय ही कितने ही जीवनसंगियों (स्त्री-पुरुषों)-में विछोह कराया होगा। इसीलिये आज आपके साथ मेरा वियोग घटित हुआ है
«ແນ່ນອນ ໂດຍໂຊກຮ້າຍຂອງຂ້າພະເຈົ້າເອງ ຄົນຮ່ວມຊີວິດຫຼາຍຄົນຄົງຖືກຂ້າພະເຈົ້າເຮັດໃຫ້ພັດພາກຈາກຄູ່ຂອງເຂົາ. ດັ່ງນັ້ນ ການພັດພາກນີ້ຈຶ່ງເໝາະສົມທີ່ຈະຕົກມາຫາຂ້າພະເຈົ້າເຊັ່ນກັນ—ການຈາກລາທ່ານ».
Verse 28
विप्रयुक्ता तु या पत्या मुहूर्तमपि जीवति । दुःखं जीवति सा पापा नरकस्थेव पार्थिव,महाराज! जो स्त्री पतिसे बिछुड़ जानेपर दो घड़ी भी जीवन धारण करती है, वह पापिनी नरकमें पड़ी हुई-सी दुःखमय जीवन बिताती है
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ພະຣາຊາ, ຍິງໃດທີ່ພັດພາກຈາກຜົວ ແລ້ວຍັງມີຊີວິດຢູ່ແມ່ນແຕ່ຊົ່ວຂະນະ ນາງນັ້ນດຳລົງຊີວິດຢູ່ໃນຄວາມທຸກ—ດັ່ງຜູ້ຢູ່ໃນນະລົກ—ແບກພາລະແຫ່ງບາບ ແລະ ຄວາມໂສກ».
Verse 29
संयुक्ता विप्रयुक्ता श्च पूर्वदेहे कृता मया । तदिदं कर्मभि: पापै: पूर्वदेहेषु संचितम्,राजन! पूर्वजन्मके शरीरमें स्थित रहकर मैंने एक साथ रहनेवाले कुछ स्त्री-पुरुषोंमें अवश्य वियोग कराया है। उन्हीं पापकर्माद्वारा मेरे पूर्वशरीरोंमें जो बीजरूपसे संचित हो रहा था, वही यह आपके वियोगका दुःख आज मुझे प्राप्त हुआ है। महाराज! मैं दुःखमें डूबी हुई हूँ, अत: आजसे आपके दर्शनकी इच्छा रखकर मैं कुशके बिछौनेपर सोऊँगी
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໃນຮ່າງກາຍເກົ່າ ຂ້າໄດ້ເຮັດໃຫ້ຊາຍແລະຍິງທີ່ຢູ່ຮ່ວມກັນ ຕ້ອງແຍກຈາກກັນ. ດ້ວຍກຳບາບນັ້ນ ທີ່ສະສົມເປັນເມັດພັນລັບໆ ຕາມຊາດກ່ອນໆ ບັດນີ້ ໂອ ພະຣາຊາ, ຄວາມໂສກແຫ່ງການພັດພາກນີ້ ໄດ້ມາຖືກຂ້າແລ້ວ.»
Verse 30
दुःखं मामनुसम्प्राप्तं राजंस्त्वद्विप्रयोगजम् । अद्यप्रभृत्यहं राजन् कुशसंस्तरशायिनी । भविष्याम्यसुखाविष्टा त्वद्दर्शनपरायणा,राजन! पूर्वजन्मके शरीरमें स्थित रहकर मैंने एक साथ रहनेवाले कुछ स्त्री-पुरुषोंमें अवश्य वियोग कराया है। उन्हीं पापकर्माद्वारा मेरे पूर्वशरीरोंमें जो बीजरूपसे संचित हो रहा था, वही यह आपके वियोगका दुःख आज मुझे प्राप्त हुआ है। महाराज! मैं दुःखमें डूबी हुई हूँ, अत: आजसे आपके दर्शनकी इच्छा रखकर मैं कुशके बिछौनेपर सोऊँगी
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ພະຣາຊາ, ຄວາມໂສກທີ່ເກີດຈາກການພັດພາກຈາກພະອົງ ໄດ້ມາຮອດຂ້າແລ້ວ. ຈາກມື້ນີ້ໄປ, ໂອ ພະຣາຊາ, ຂ້າຈະນອນເທິງທີ່ປູດ້ວຍຫຍ້າຄຸຊະ, ຖືກຄວາມໂສກຄອບງຳ, ແລະມີແຕ່ຄວາມປາຖະໜາຈະໄດ້ເຫັນພະອົງອີກ. »
Verse 31
दर्शयस्व नरव्यापत्र शाधि मामसुखान्विताम् | कृपणां चाथ करुणं विलपन्न्तीं नरेश्वर,नरश्रेष्ठ नरेश्वरर करुण विलाप करती हुई मुझ दीन-दु:ःखिया अबलाको आज अपना दर्शन और कर्तव्यका आदेश दीजिये
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ຜູ້ກ້າແຫ່ງມະນຸດ, ຂໍໃຫ້ພະອົງປາກົດໃຫ້ຂ້າເຫັນ ແລະຊີ້ນຳຂ້າໃນໜ້າທີ່ແຫ່ງທຳ. ຂ້າຖືກຄວາມທຸກຄອບງຳ—ອ່ອນແອ ແລະອັບອາຍ—ພ້ອມທັງຮ້ອງໄຫ້ດ້ວຍຄວາມກະສົດກະສອນ. ໂອ ຈອມເຈົ້າແຫ່ງມະນຸດ, ຂໍປະທານການປາກົດພະອົງ ແລະອອກຄຳສັ່ງວ່າຄວນເຮັດຢ່າງໃດ.»
Verse 32
कुन्त्युवाच एवं बहुविध॑ तस्यां विलपन्त्यां पुन: पुनः । तं॑ शवं सम्परिष्वज्य वाक् किलान्तर्तहिताब्रवीत्,कुन्तीने कहा--महाराज! इस प्रकार जब राजाके शवका आलिंगन करके वह बार- बार अनेक प्रकारसे विलाप करने लगी, तब आकाशवाणी बोली---
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ກຸນຕີ ກ່າວ—ເມື່ອນາງຮ້ອງໄຫ້ຄຳຄວນຫຼາຍຢ່າງ ຊ້ຳໆ ແລະກອດຮ່າງສົບນັ້ນໄວ້ແນ່ນ, ກໍມີສຽງຈາກອາກາດ—ບໍ່ເຫັນຮູບ—ດັງຂຶ້ນກ່າວວ່າ…
Verse 33
उत्तिष्ठ भद्रे गच्छ त्वं ददानीह वरं तव । जनयिष्याम्यपत्यानि त्वय्यहं चारुहासिनि,“भद्रे! उठो और जाओ, इस समय मैं तुम्हें वर देता हूँ। चारुहासिनि! मैं तुम्हारे गर्भसे कई पुत्रोंकोी जन्म दूँगा
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ແມ່ຍິງຜູ້ເປັນມົງຄຸນ, ຈົ່ງລຸກຂຶ້ນ ແລະໄປເຖີດ. ບັດນີ້ ໃນທີ່ນີ້ ຂ້າຈະປະທານພອນໃຫ້ເຈົ້າ. ໂອ ຜູ້ຍິ້ມງາມ, ຜ່ານເຈົ້າ ຂ້າຈະໃຫ້ກຳເນີດລູກຫຼານ.»
Verse 34
आत्मकीये वरारोहे शयनीये चतुर्दशीम् । अष्टमी वा ऋतुस्नाता संविशेथा मया सह,“वरारोहे! तुम ऋतुस्नाता होनेपर चतुर्दशी या अष्टमीकी रातमें अपनी शय्यापर मेरे इस शवके साथ सो जाना”
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ນາງຜູ້ມີສະໂພກງາມ, ຫຼັງຈາກເຈົ້າອາບນ້ຳຊຳລະກາຍເມື່ອສິ້ນສຸດຮອບເລືອດປະຈຳເດືອນແລ້ວ, ໃນຄືນວັນທີ 14—ຫຼືບໍ່ກໍ່ໃນຄືນວັນທີ 8—ຈົ່ງນອນລົງໃນຕຽງຂອງເຈົ້າ ພ້ອມກັບຂ້າ».
Verse 35
एवमुक्ता तु सा देवी तथा चक्रे पतिव्रता । यथोक्तमेव तद्वाक्यं भद्रा पुत्रार्थिनी तदा,आकाशवाणीके यों कहनेपर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली पतिव्रता भद्रादेवीने पतिकी पूर्वोक्त आज्ञाका अक्षरश: पालन किया
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ເມື່ອຖືກກ່າວເຊັ່ນນັ້ນ ນາງເທວີຜູ້ສູງສົ່ງ ຜູ້ມັ່ນຄົງໃນຄວາມສັດຊື່ຕໍ່ສາມີ ກໍໄດ້ເຮັດຕາມນັ້ນຢ່າງທີ່ຖືກກ່າວ. ໃນເວລານັ້ນ ພັດຣາ ຜູ້ປາຖະໜາບຸດ ໄດ້ປະຕິບັດຄຳສັ່ງຂອງສາມີຢ່າງຖືກຕ້ອງຕາມຖ້ອຍຄຳ.
Verse 36
सा तेन सुषुवे देवी शवेन भरतर्षभ । त्रीन् शाल्वांश्षतुरो मद्रान् सुतान् भरतसत्तम,भरतमश्रेष्ठ! रानी भद्गराने उस शवके द्वारा सात पुत्र उत्पन्न किये, जिनमें तीन शाल्वदेशके और चार मद्रदेशके शासक हुए
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ໂອ ຜູ້ເປັນດັ່ງງົວຜູ້ກ້າໃນຫມູ່ພະຣະຕະ, ພຣະມະເຫສີນັ້ນໄດ້ປະສູດບຸດ 7 ອົງໂດຍ ສາວະ; ສາມອົງໄດ້ເປັນຜູ້ປົກຄອງໃນແດນຊາລະວະ ແລະ ສີ່ອົງໄດ້ເປັນຜູ້ປົກຄອງໃນແດນມັດຣະ.
Verse 37
तथा त्वमपि मय्येवं मनसा भरतर्षभ । शक्तो जनयितु पुत्रांस्तपोयोगबलान्वित:,भरतवंशशिरोमणे! इसी प्रकार आप भी मेरे गर्भसे मानसिक संकल्पद्वारा अनेक पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं; क्योंकि आप तपस्या और योगबलसे सम्पन्न हैं
«ດັ່ງນັ້ນເຊັ່ນກັນ, ໂອ ຜູ້ເປັນດັ່ງງົວຜູ້ກ້າໃນຫມູ່ພະຣະຕະ, ເຈົ້າກໍສາມາດໃຫ້ກຳເນີດບຸດຫຼາຍຄົນໃນຄັນຂ້າ ໂດຍພຽງແຕ່ການຕັ້ງໃຈໃນຈິດ; ເພາະເຈົ້າມີພະລັງທີ່ເກີດຈາກຕະປະ ແລະ ໂຍຄະ».
Verse 120
इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि व्युषिताश्वोपाख्याने विंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
ດັ່ງນີ້ແລ້ວ ໃນມະຫາພາຣະຕະອັນສັກສິດ, ໃນອາດິປະຣະວະ ພາກສຳພະວະ, ໃນຕອນເລື່ອງຂອງ ວິຍຸສິຕາສະວະ, ບົດທີ 120 ກໍສິ້ນສຸດລົງເທົ່ານີ້.
The chapter frames a governance dilemma: how to select an instructor for elite warriors when training amplifies state power—requiring not only technical mastery but also disciplined character, because knowledge transmission can later shape political outcomes.
Competence is ethically consequential: education, especially in high-impact skills, must be anchored in restraint and responsibility; personal relationships (friendship, obligation, patronage) can become causal forces in public history.
No explicit phalaśruti appears in this passage; the meta-function is etiological—explaining origins and knowledge lineages to clarify later narrative causality and the dharma-implications of instruction.