Adhyaya 221
Vana ParvaAdhyaya 22122 Verses

Adhyaya 221

भद्रवटगमनम् — स्कन्देन महिषदानवनिग्रहः (Bhadravaṭa Procession and Skanda’s Neutralization of Mahiṣa)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-upākhyāna (Śiva–Skanda/Deva-Asura episode at Bhadravaṭa)

Mārkaṇḍeya narrates Śiva’s radiant departure toward Bhadravaṭa with Umā, mounted on a sun-like chariot drawn by lions, amid a vast and symbolically ordered celestial entourage (Kubera in Puṣpaka, Indra on Airāvata, Varuṇa with aquatic beings, Yama with Mṛtyu and personified afflictions, and many cosmic collectives). Śiva addresses Skanda (Mahāsena/Kṛttikāsuta), confirming his command role and directing him to guard a particular Marut formation; Skanda assents and is promised welfare through devotion and readiness to appear when needed. After Skanda is dismissed, a sudden portent overwhelms the devas, followed by the emergence of a formidable hostile force that routes the divine host. Indra stabilizes morale and reorganizes resistance, but the daitya Mahiṣa escalates the threat by seizing Rudra’s chariot. Śiva then recalls Skanda as the decisive countermeasure. Skanda arrives in martial radiance, releases his śakti, beheads Mahiṣa, and disperses the remaining hostile forces; the devas praise Skanda’s first famed deed, forecasting enduring renown. The chapter closes with a phalaśruti: attentive recitation of Skanda’s birth/deeds yields prosperity and proximity to Skanda’s sphere.

Chapter Arc: मार्कण्डेय ऋषि यज्ञ-विद्या के एक सूक्ष्म रहस्य का द्वार खोलते हैं—श्रुति-वाक्य के अनुसार अग्नि और सोम को ‘उपांशु’ (मन्द/गुप्त) मन्त्रोच्चारण के साथ आज्यभाग अर्पित करने का विधान, और उसके पीछे छिपा कारण। → आंगिरस-वंशी तपस्वी पुत्र-प्राप्ति हेतु दीर्घकाल तक तीव्र तप करते हैं—ऐसा पुत्र चाहिये जो ब्रह्मा के समान यशस्वी और धर्मिष्ठ हो। पर यज्ञ-मार्ग में विघ्न खड़े होते हैं: विनायक-गण हवि का अपहरण करते, अग्नियों के भाग में बाधा डालते और यज्ञ को अस्थिर कर देते हैं। → सृष्टि-रहस्य का विस्फोटक वर्णन—देव-तत्त्वों/अग्नि-स्वरूपों की उत्पत्ति और साम-स्वरों (बृहत्, रथन्तर) का प्राकट्य; साथ ही यह निर्णायक संकेत कि चिताग्नि (संस्कारित, प्रज्वलित अग्नि) और मन्त्र-शक्ति ही विघ्नकारियों को रोकने का वास्तविक अस्त्र है। → यज्ञ-निपुण विद्वान बाह्य वेदी पर विनायकों के लिये ‘तदादान’ (उचित अर्पण/प्रबन्ध) करते हैं ताकि वे मुख्य अग्नि के समीप न आयें; मन्त्रों से शान्त की गयी अग्नि यज्ञ-भाग की रक्षा करती है। अंततः हवि-विभाग का नियम स्थिर होता है और तपस्वी/यजमान परम प्रसन्नता पाते हैं। → आंगिरसोपाख्यान की धारा आगे बढ़ती है—यज्ञ-रक्षा के इस विधान के बाद पुत्र-प्राप्ति/फल-प्राप्ति का अगला चरण किस रूप में प्रकट होगा?

Shlokas

Verse 1

#::73:.8 #::3:.:7 () हि २ 7 ३. “अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय” इस श्रुतिमें अग्नि और सोमको उपांशु मन्त्रोच्चारणपूर्वक आज्यभाग अर्पण करनेका विधान है। यहाँ सोमके साथ जिस अग्निको आज्यभागका अधिकारी बताया गया है, वह “वीर” नामक अनि ही है। २. ये वाक्‌के अभिमानी देवता हैं। “तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्व' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है। विशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: पाञज्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच काश्यपो हाथ वासिष्ठ: प्राणश्न॒ प्राणपुत्रक: । अग्निराड्धिरसश्वैव च्यवनस्त्रिषु वर्चक:,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! कश्यपपुत्र काश्यप, वसिष्ठ-पुत्र वासिष्ठ, प्राणपुत्र प्राणक, अंगिराके पुत्र च्यवन तथा त्रिवर्चा-ये पाँच अग्नि हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ យុធិស្ឋិរ! នេះជាព្រះអគ្គិដ៏បរិសុទ្ធទាំងប្រាំ៖ កាស្យប (កូនកាស្យប), ហាថ-វាសិષ્ઠ (កូនវាសិષ્ઠ), ប្រាណ (និង ប្រាណបុត្រក), ព្រះអគ្គិពីវង្សអង្គិរាស, និង ច្យវនៈ—អ្នកមានពន្លឺបី។ ដូច្នេះហើយបានពណ៌នាអំពីកំណើត និងវង្សត្រកូលនៃអគ្គិ “បញ្ចជន”»។

Verse 2

अचरन्त तपस्तीव्रं पुत्रार्थ बहुवार्षिकम्‌ । पुत्रं लभेम धर्मिष्ठं यशसा ब्रह्मणा समम्‌

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «ដើម្បីទទួលបានកូនប្រុស យើងបានអនុវត្តតបស្យាដ៏តឹងរឹងអស់ជាច្រើនឆ្នាំ ដោយអធិស្ឋានថា សូមឲ្យយើងបានកូនប្រុសដែលមានធម៌ខ្ពង់ខ្ពស់បំផុត—មានកេរ្តិ៍ឈ្មោះស្មើព្រះព្រហ្មា»។

Verse 3

इन्होंने पुत्रकी प्राप्तिके लिये बहुत वर्षोतक तीव्र तपस्या की। इनकी तपस्याका उद्देश्य यह था कि हम ब्रह्माजीके समान यशस्वी और धर्मिष्ठ पुत्र प्राप्त करें ।। महाव्याह्तिभिर्ध्यात: पञ्चभिस्तैस्तदा त्वथ । जज्ञे तेजो महार्चिष्मान्‌ पज्चवर्ण: प्रभावन:,पूर्वोक्त पाँच अग्निस्वरूप ऋषियोंने महाव्याह्ृृतिसंज्ञक पाँच मन्त्रोंद्वारा- परमात्माका ध्यान किया, तब उनके समक्ष अत्यन्त तेजोमय, पाँच वर्णोंसे विभूषित एक पुरुष प्रकट हुआ, जो ज्वालाओंसे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होता था। वह सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करनेमें समर्थ था

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ បន្ទាប់ពីឥសីទាំងប្រាំ—ដែលមានសភាពជាព្រះអគ្គិ—បានធ្វើសមាធិលើព្រះអាទិទេវតាតាមរយៈ “វ្យាហ្រឹតិ” ធំទាំងប្រាំ នោះមានបុរសមួយអង្គបង្ហាញខ្លួននៅមុខពួកគេ មានពន្លឺខ្លាំងលើសលប់ ដុះឡើងដូចអគ្គិដែលឆេះដោយអណ្តាតភ្លើងធំៗ។ ទ្រង់តុបតែងដោយពណ៌ប្រាំ និងមានអานุភាពអស្ចារ្យ ដូចជាអ្នកអាចបង្កើតសកលលោកបាន—ជាចម្លើយចំពោះតបស្យាយូរអង្វែងរបស់ពួកគេ ដើម្បីស្វែងរកកូនប្រុសដ៏ធម៌ និងមានកេរ្តិ៍ឈ្មោះ។

Verse 4

समिद्धो5ग्नि: शिरस्तस्य बाहू सूर्यनिभौ तथा । त्वड्नेत्रे च सुवर्णाभे कृष्णे जड्घे च भारत,भारत! उसका मस्तक प्रज्वलित अग्निके समान जगमगा रहा था, दोनों भुजाएँ प्रभाकरकी प्रभाके समान थीं, दोनों आँखें तथा त्वचा--सुवर्णके समान देदीप्यमान हो रही थीं और उस पुरुषकी पिण्डलियाँ काले रंगकी दिखायी देती थीं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ភារត! ក្បាលរបស់ទ្រង់ភ្លឺចែងចាំងដូចអគ្គិដែលបានបញ្ឆេះ; ដៃទាំងពីររលោងដូចព្រះអាទិត្យ។ ស្បែក និងភ្នែករបស់ទ្រង់ភ្លឺដូចមាស; ប៉ុន្តែជើងក្រោម (កន្ទុយជើង) របស់ទ្រង់មើលទៅមានពណ៌ខ្មៅ»។

Verse 5

पज्चवर्ण: स तपसा कृतस्तै: पञ्चभिर्जनै: । पाज्चजन्य: श्रुतों देवः पजचवंशकरस्तु सः,उपर्युक्त पाँच मुनिजनोंने अपनी तपस्याके प्रभावसे उस पाँच वर्णवाले पुरुषको प्रकट किया था, इसलिये उस देवोपम पुरुषका नाम पाञज्चजन्य हो गया। वह उन पाँचों ऋषियोंके वंशका प्रवर्तक हुआ

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ដោយអานุភាពនៃតបស្យា មុនីទាំងប្រាំនោះបានបង្កើតបុរសម្នាក់មានពណ៌ប្រាំប្រភេទ។ ព្រោះគេបានលឺកេរ្តិ៍ឈ្មោះគាត់ថា «បាញ្ចជន្យ»—បុរសដូចទេវតា ដែលពាក់ព័ន្ធនឹងចំនួនប្រាំ—ដូច្នេះគាត់បានក្លាយជាអ្នកបង្កើត និងបន្តវង្សត្រកូលរបស់ឥសីទាំងប្រាំនោះ។

Verse 6

दशवर्षसहस््राणि तपस्तप्त्वा महातपा: । जनयत्‌ पावकं घोरं पितृणां स प्रजा: सृजन्‌,फिर महातपस्वी पाञ्चजन्यने अपने पितरोंका वंश चलानेके लिये दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करके भयंकर दक्षिणाग्निको उत्पन्न किया

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ បន្ទាប់ពីបានធ្វើតបស្យាដ៏កាចសាហាវអស់ដប់ពាន់ឆ្នាំ អ្នកតបស្យាធំមហានោះបានបង្កើតភ្លើងបរិសុទ្ធដ៏គួរភ័យខ្លាច; ហើយដោយបំណងបន្តវង្សរបស់បិតាបុព្វបុរស គាត់បានចាប់ផ្តើមបង្កើតកូនចៅ។

Verse 7

बृहद्‌ रथन्तरं मूर्थ्नों वक्‍त्राद्‌ वा तरसाहरौ । शिवं नाभ्यां बलादिन्द्रं वाय्वग्नी प्राणतोडसृजत्‌,उन्होंने मस्तकसे बृहत्‌ तथा मुखसे रथन्तर सामको प्रकट किया। ये दोनों वेगपूर्वक आयु आदिको हर लेते हैं, इसलिये “तरसाहर” कहलाते हैं। फिर उन्होंने नाभिसे रुद्रको, बलसे इन्द्रको तथा प्राणसे वायु और अग्निको उत्पन्न किया

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ពីក្បាល គាត់បានបង្កើតសាមវេទដែលហៅថា «បૃហត्» ហើយពីមាត់ បានបង្កើតសាមវេទដែលហៅថា «រថន្តរ»—ទាំងពីរមានល្បឿនខ្លាំង ដូច្នេះហៅថា «តរសាហរ» អ្នកយកអាយុជីវិតដោយល្បឿន។ បន្ទាប់មក ពីផ្ចិត គាត់បានបង្កើតសិវៈ (រុទ្រ); ពីកម្លាំង បានបង្កើតឥន្ទ្រ; ហើយពីដង្ហើមជីវិត បានបង្កើតវាយុ និងអគ្គនី។

Verse 8

बाहुभ्यामनुदात्तौ च विश्वे भूतानि चैव ह । एतान्‌ सृष्टवा ततः पठच पितृणामसृजत्‌ सुतान्‌,दोनों भुजाओंसे प्राकृत और वैकृत भेदवाले दोनों अनुदात्तोंको मन और ज्ञानेन्द्रियोंके समस्त (छहों) देवताओंको तथा पाँच महाभूतोंको उत्पन्न किया। इन सबकी सृष्टि करनेके पश्चात्‌ उन्होंने पाँचों पितरोंके लिये पाँच पुत्र और उत्पन्न किये

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ពីដៃទាំងពីរ គាត់បានបង្កើតពួក «អនុដាត្ត» ពីរប្រភេទ (ធម្មជាតិ និងកែប្រែ) ព្រមទាំងទេវតាអធិបតីលើចិត្ត និងអង្គសញ្ញាទាំងអស់ និងធាតុធំទាំងប្រាំ។ បន្ទាប់ពីបានបង្កើតទាំងនេះហើយ គាត់ក៏បានបង្កើតកូនប្រុសសម្រាប់ពិត្រទាំងឡាយផងដែរ។

Verse 9

बृहद्रथस्य प्रणिधि: काश्यपस्य महत्तर: । भानुरज्धिरसो धीर: पुत्रो वर्चस्य सौभर:,(जिनके नाम इस प्रकार हैं--) वासिष्ठ बृहद्रथके अंशसे प्रणिधि, काश्यपके अंशसे महत्तर, अंगिरस च्यवनके अंशसे भानु तथा वर्चके अंशसे सौभर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ពីភាគរបស់បૃហទ្រថ បានកើត «ប្រណិធិ»; ពីភាគរបស់កាស្យប បានកើត «មហត្តរ»; ពីភាគរបស់អង្គិរាស បានកើត «ភានុ» អ្នកមានចិត្តមាំមួន; ហើយពីភាគរបស់វರ್ಚស បានកើតកូនប្រុសឈ្មោះ «សೌភរ»។ ដូច្នេះវង្សត្រកូលត្រូវបានរៀបរាប់ដោយភ្ជាប់កូនចៅនីមួយៗទៅនឹង “ភាគ” នៃឥសីមុនៗ។

Verse 10

प्राणस्य चानुदात्तस्तु व्याख्याता: पञचविंशति: । देवान्‌ यज्ञमुषश्नान्यानू सूृजत्‌ पञ्चदशोत्तरान्‌,प्राणके अंशसे अनुदात्तकी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार पचीस पुत्रोंके नाम बताये गये। तत्पश्चात्‌ “तप” नामधारी पांचजन्यने यज्ञमें विघध्म डालनेवाले अन्य पंद्रह उत्तर देवों (विनायकों)-की सृष्टि की। उनका विवरण इस प्रकार है--सुभीम, अतिभीम, भीम, भीमबल और अबल--इन पाँच विनायकोंकी उत्पत्ति उन्होंने पहले की, जो देवताओंके यज्ञका विनाश करनेवाले हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ពី ព្រាណៈ ក៏បានកើតមាន អនុទាត្តៈ ផងដែរ ហើយបានពន្យល់ឈ្មោះកូនចៅរបស់គាត់ចំនួនម្ភៃប្រាំ។ បន្ទាប់មក អ្នកដែលមាននាមថា តបស (តបៈ—អំណាចនៃការតបស្យា) បានបង្កើតទេវសត្វបន្ថែមចំនួនដប់ប្រាំ គឺ វិនាយកៈ ដែលជាអ្នករារាំង និងបំផ្លាញពិធីយជ្ញារបស់ទេវតា។ ក្នុងចំណោមពួកនោះ មុនគេបានកើតមានប្រាំ៖ សុភីមៈ អតិភីមៈ ភីមៈ ភីមពលៈ និង អពលៈ—ជាអ្នកបង្កការរំខានដល់យជ្ញា។

Verse 11

सुभीममतिभीम॑ं च भीम॑ भीमबलाबलम्‌ | एतान्‌ यज्ञमुष: पज्च देवानां हासृजत्‌ तप:,प्राणके अंशसे अनुदात्तकी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार पचीस पुत्रोंके नाम बताये गये। तत्पश्चात्‌ “तप” नामधारी पांचजन्यने यज्ञमें विघध्म डालनेवाले अन्य पंद्रह उत्तर देवों (विनायकों)-की सृष्टि की। उनका विवरण इस प्रकार है--सुभीम, अतिभीम, भीम, भीमबल और अबल--इन पाँच विनायकोंकी उत्पत्ति उन्होंने पहले की, जो देवताओंके यज्ञका विनाश करनेवाले हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «តបៈ (Tapaḥ) បានបង្កើត “អ្នកលួចយជ្ញា” ទាំងប្រាំនេះ—សុភីមៈ អតិភីមៈ ភីមៈ ភីមពលៈ និង អពលៈ—ជាសត្វមានអំណាចដែលរំខាន និងបំផ្លាញពិធីយជ្ញារបស់ទេវតា»។ ដោយពាក្យនេះ រឿងរ៉ាវបញ្ជាក់ថា សូម្បីតែរបៀបរបបដ៏ទេវភាព (យជ្ញា ជាសសរស្តម្ភនៃធម៌) ក៏អាចត្រូវកម្លាំងរារាំងគំរាមកំហែងបាន ហើយត្រូវការការប្រុងប្រយ័ត្ន និងវិន័យពិធីសាស្ត្រដ៏ត្រឹមត្រូវ ដើម្បីការពារកិច្ចការសក្ការៈ។

Verse 12

सुमित्रं मित्रवन्तं च मित्रज्ञं मित्रवर्धनम्‌ । मित्रधर्माणमित्येतान्‌ देवानभ्यसृजत्‌ तप:,इनके बाद पाञ्चजन्यने सुमित्र, मित्रवान, मित्रज्ञ, मित्रवर्धन और मित्रधर्मा--इन पाँच देवरूपी विनायकोंको उत्पन्न किया

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «តបៈ បានបង្កើតទេវសត្វទាំងប្រាំនេះ—សុមិត្រៈ មិត្រវានៈ មិត្រជ្ញៈ មិត្រវර්ធនៈ និង មិត្រធರ್ಮា—ជារូបកាយនៃការការពារដោយមិត្តភាព៖ អ្នកជាមិត្តល្អ អ្នកមានមិត្ត អ្នកយល់ដឹងអំពីមិត្តភាព អ្នកបង្កើនមិត្តភាព និងអ្នកគោរពច្បាប់នៃមិត្តភាព»។

Verse 13

सुरप्रवीरं वीरं॑ च सुरेशं च सुवर्चसम्‌ । सुराणामपि हन्तारं पञ्चैतानसृजत्‌ तपः,तदनन्तर पाञ्चजन्यने सुरप्रवीर, वीर, सुरेश, सुवर्चा तथा सुरहन्ता--इन पाँचोंको प्रकट किया

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «បន្ទាប់មក តបៈ បានបង្កើតទាំងប្រាំនេះ—សុរប្រវីរៈ វីរៈ សុរេសៈ សុវර්ចសៈ ហើយសូម្បីតែ សុរហន្តា—អ្នកសម្លាប់ទេវតា។ ដូច្នេះ ដោយកម្លាំងតបៈ អំណាចដ៏គួរឱ្យខ្លាចបានបង្ហាញខ្លួនឡើង បង្ហាញថា ការតបស្យាដែលផ្តោតខ្លាំងអាចបង្កើតអំណាច ដែលអាចគាំទ្រ ឬគំរាមកំហែងដល់របៀបរបបលោក តាមរបៀបប្រើប្រាស់»។

Verse 14

त्रिविध॑ संस्थिता होते पडच पञठ्च पृथक्‌ पृथक्‌ । मुष्णन्त्यत्र स्थिता होते स्वर्गतो यज्ञयाजिन:,इस प्रकार ये पंद्रह देवोपम प्रभावशाली विनायक पृथक्‌-पृथक्‌ पाँच-पाँच व्यक्तियोंके तीन दलोंमें विभक्त हैं। इस पृथ्वीपर ही रहकर स्वर्गलोकसे भी यज्ञकर्ता पुरुषोंकी यज्ञ- सामग्रीका अपहरण कर लेते हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «វិនាយកៈដ៏មានឥទ្ធិពលទាំងដប់ប្រាំនេះ ត្រូវបានរៀបចំជា បីក្រុម ដាច់ដោយឡែកពីគ្នា ក្រុមនីមួយៗមានប្រាំ។ ទោះបីពួកគេស្ថិតនៅលើផែនដីនេះ ក៏អាចលួចយកគ្រឿងបរិក្ខារយជ្ញារបស់បុរសអ្នកធ្វើយជ្ញា ដូចជាលួចពីសួគ៌ផ្ទាល់—ហើយដោយហេតុនោះ បានរារាំងកិច្ចការពិធីសាស្ត្រដ៏ត្រឹមត្រូវ»។

Verse 15

तेषामिष्टं हरन्त्येते निघ्नन्ति च महद्धवि: । स्पर्थया हव्यवाहानां निध्नन्त्येते हरन्ति च,ये विनायकगण अग्नियोंके लिये अभीष्ट महान्‌ हविष्यका अपहरण तो करते ही हैं, उसे नष्ट भी कर डालते हैं। अग्निगणोंके साथ लाग-डाँट रखनेके कारण ही ये हविष्यका अपहरण और विध्वंस करते हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «សត្វទាំងនេះឆក់យកហាវិសដែលបានបូជាជាអំណោយដែលគេចង់បាន ហើយថែមទាំងបំផ្លាញបូជាធំផងដែរ។ ដោយការប្រកួតប្រជែងជាមួយអ្នកដឹកនាំហាវិស—អគ្គី—ពួកវាទាំងឆក់យកទាំងបំផ្លាញហាវិស»។

Verse 16

बहिर्वेद्यां तदादानं कुशलै: सम्प्रवर्तितम्‌ । तदेते नोपसर्पन्ति यत्र चाग्नि: स्थितो भवेत्‌,इसीलिये यज्ञनिपुण विद्वानोंने यज्ञशालाकी बाह्य वेदीपर इन विनायकोंके लिये देयभाग रख देनेका नियम चालू किया है; क्योंकि जहाँ अग्निकी स्थापना हुई हो, उस स्थानके निकट ये विनायक नहीं जाते हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «ហេតុនេះហើយ អ្នកជំនាញពិធីយញ្ញបានបង្កើតទម្លាប់ដាក់ចំណែកបូជានោះនៅខាងក្រៅវេទិយញ្ញ។ ព្រោះវិនាយកទាំងនេះមិនចូលទៅជិតកន្លែងដែលបានដំឡើងអគ្គីសក្ការៈត្រឹមត្រូវឡើយ»។

Verse 17

चितोअग्निरुद्धतन्‌ यज्ञ पक्षाभ्यां तान्‌ प्रबाधते । मन्त्रै: प्रशमिता होते नेष्टं मुष्णन्ति यज्ञियम्‌,मन्त्रद्वारा संस्कार करनेके पश्चात्‌ प्रजजलित अग्निदेव जिस समय आहुति ग्रहण करते हुए यज्ञका सम्पादन करते हैं, उस समय वे अपने दोनों पंखों (पार्श्ववर्ती शिखाओं) द्वारा उन विनायकोंको कष्ट पहुँचाते हैं (इसीलिये वे उनके पास नहीं फटकते)। मन्त्रोंद्वारा शान्त कर देनेपर वे विनायक यज्ञसम्बन्धी हविष्यका अपहरण नहीं कर पाते हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «ពេលអគ្គីយញ្ញដែលបានបំភ្លឺឡើងរលោងភ្លឺចែងចាំង ដំណើរការពិធីយញ្ញ វាបង្កទុក្ខដល់វិញ្ញាណរារាំងទាំងនោះដោយ ‘ស្លាប’ ពីរ—អណ្តាតភ្លើងនៅសងខាង។ តែពេលបានបន្ធូរឲ្យស្ងប់ដោយមន្ត្រា វិនាយកទាំងនោះមិនអាចលួចហាវិសដែលសម្រាប់យញ្ញបានឡើយ»។

Verse 18

बृहदुक्थस्तपस्यैव पुत्रो भूमिमुपाश्रित: । अन्निहाोत्रे हूयमाने पृथिव्यां सद्धिरिज्यते,इस पृथ्वीपर जब अग्निहोत्र होने लगता है, उस समय तप (पाञ्चजन्य)-के ही पुत्र बृहदुक्थ इस भूतलपर स्थित हो श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा पूजित होते हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «ព្រះបૃហទុក្ថៈ កូនប្រុសនៃ តបស (Tapas) ស្ថិតមាំលើផែនដី។ ហើយពេលអគ្និហោត្រ (Agnihotra) កំពុងត្រូវបានបូជាលើផែនដី នោះគេបូជាគាត់នៅទីនោះដោយបុរសសុចរិត និងអ្នកសម្រេចគុណធម៌»។

Verse 19

रथन्तरश्न॒ तपस: पुत्रो$ग्नि: परिपठ्यते | मित्रविन्दाय वै तस्य हविरध्वर्यवों विदु:,तपके पुत्र जो रथन्तर नामक अग्नि कहे जाते हैं, उनको दी हुई हवि मित्रविन्द देवताका भाग है, ऐसा यजुर्वेदी विद्वान्‌ मानते हैं। महायशस्वी तप (पाज्चजन्य) अपने इन सभी पुत्रोंके सहित अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दमग्न रहते हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «ក្នុងចំណោមកូនៗនៃ តបស មានអគ្គីមួយឈ្មោះ រថន្តរ (Rathantara) ដែលត្រូវបានអានរំលឹកតាមប្រពៃណីពិធី។ ព្រះអធ្វర్యុ (adhvaryu) នៃយជុរវេទដឹងថា ហាវិសដែលបូជាចូលក្នុងអគ្គីនោះ គឺជាចំណែករបស់ទេវតា មិត្រវិនដា (Mitravindā)។ ដូច្នេះ តបសដ៏មានកិត្តិយស ពេញចិត្ត និងស្ថិតក្នុងអានន្ទជាមួយកូនទាំងអស់នេះ»។

Verse 20

मुमुदे परमप्रीतः सह पुत्र्महायशा:,तपके पुत्र जो रथन्तर नामक अग्नि कहे जाते हैं, उनको दी हुई हवि मित्रविन्द देवताका भाग है, ऐसा यजुर्वेदी विद्वान्‌ मानते हैं। महायशस्वी तप (पाज्चजन्य) अपने इन सभी पुत्रोंके सहित अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दमग्न रहते हैं

ព្រះមារកណ្ឌេយៈមានព្រះវាចាថា៖ តបសៈដ៏មានកេរ្តិ៍ឈ្មោះធំ បានរីករាយយ៉ាងលើសលប់ ព្រមទាំងបុត្រទាំងឡាយរបស់ទ្រង់។ ហាវិ (អាហុតិ) ដែលបានបូជាចំពោះអគ្គីទាំងនោះ—ដែលគេហៅថា បុត្ររបស់តបសៈ និងមាននាមថា «រថន្តរ»—បណ្ឌិតយជុរវេទទទួលស្គាល់ថា ជាភាគរបស់ទេវតា មិត្រវិន្ទ។ ដូច្នេះ តបសៈ (ដែលហៅថា បាញ្ចជន្យ) នៅជុំវិញដោយបុត្រទាំងអស់ ក៏សប្បាយចិត្តយ៉ាងខ្លាំង ហើយលង់ក្នុងអំណរ។

Verse 219

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ उतन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ដូច្នេះ បានបញ្ចប់ជំពូកទីពីររយដប់ប្រាំបួន នៃ «មហាភារត» ក្នុង «វនបರ್ವ» នៅក្នុងផ្នែក «មារកណ្ឌេយ-សមាស្យ» ដែលពាក់ព័ន្ធនឹងរឿង «អង្គិរស»។ (នេះជាពាក្យបិទបញ្ចប់បែបកូឡូហ្វុន សម្គាល់ការបញ្ចប់ជំពូក មិនមែនជាការបន្តនិទានទេ។)

Verse 220

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आद्धिरसोपाख्याने विंशत्यधिकद्धिशततमो<ध्याय:

ដូច្នេះ បានបញ្ចប់ជំពូកទីពីររយម្ភៃ នៃ «មហាភារត» ក្នុង «វនបರ್ವ» នៅក្នុងផ្នែក «មារកណ្ឌេយ-សមាស្យ» ក្នុងរឿងនិទានដែលគេហៅថា «អទ្ធិរាស-ឧបាខ្យាន»។

Frequently Asked Questions

The devas face a governance dilemma under sudden destabilization: whether morale and coordination can be restored without abandoning duty. The narrative resolves it through legitimate command (Indra’s rally) and specialized intervention (Skanda’s mandated role).

Duty is situational and continuous: one must remain available for rightful tasks, and disciplined devotion combined with readiness to act is presented as a pathway to śreyas (welfare and excellence).

Yes. The chapter states that one who recites the account of Skanda’s birth/deeds with concentration attains prosperity in this world and reaches Skanda’s sphere (Skanda-sālokyatā), framing the narrative as both history and devotional text.