Adhyaya 80
Sabha ParvaAdhyaya 8055 Verses

Adhyaya 80

Chapter Arc: धृतराष्ट्र, जुए के परिणामों से व्याकुल, विदुर से पूछता है—वनगमन के लिए निकले धर्मपुत्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव, द्रौपदी और धौम्य कैसे जा रहे हैं; नगर और जन-मन की दशा क्या है। → विदुर का वर्णन यात्रा के दृश्य को शोक-चित्र बना देता है: पुरोहित धौम्य यम-सम्बन्धी साम-मन्त्रों के साथ आगे-आगे चलते हैं; पीछे-पीछे पाण्डव, द्रौपदी और जनसमूह। अर्जुन का संकेतात्मक आचरण (रेत बिखेरना/भूमि पर चिह्न बनाना) भविष्य के शरवर्षा-सम प्रतिशोध का पूर्वाभास देता है। नगर में अपशकुन उभरते हैं—राहु का सूर्य को ग्रसना, उल्का का विपरीत दिशा में घूमना, अशुभ संकेतों से राजधानी का मन टूटता है। → अपशकुनों और जन-शोक के बीच विदुर का निर्णायक कथन उभरता है: यह दुःख क्षणिक सुख की छाया-सा है; पाण्डवों का संयम और बाहुबल दोनों साथ चल रहे हैं—वे अपनी भुजाओं की ओर देखते हुए (भविष्यकर्म का संकल्प) वन की ओर बढ़ते हैं, और राज्य-सभा में हुए अन्याय का फल समय पर लौटाने का संकेत देते हैं। → यात्रा का क्रम स्थिर होता है—धौम्य के वैदिक अनुष्ठान, द्रौपदी का दुःख, पाण्डवों का धैर्य, और प्रजाजनों का विलाप एक साथ बहते हैं। धृतराष्ट्र को विदुर के शब्दों से यह बोध मिलता है कि जो हुआ वह केवल तत्कालीन विजय नहीं, दीर्घकालीन विनाश का बीज है। → अर्जुन के ‘असक्त शरवर्षा’ जैसे भविष्य-संकेत और राजधानी के अपशकुन यह प्रश्न छोड़ते हैं—यह अन्याय किस दिन किस रूप में लौटेगा, और किसके सिर पर उसका दण्ड गिरेगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २९ श्लोक मिलाकर कुल ६५ श्लोक हैं) अीद-आफीाद-- बछ। एफ काया अशीतितमोब<्ध्याय: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन वैशम्पायन उवाच तमागतमथो राजा विदुरं दीर्घदर्शिनम्‌ । साशडूक इव पप्रच्छ धृतराष्ट्रोडम्बिकासुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दूरदर्शी विदुरजीके आनेपर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने शंकित-सा होकर पूछा

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ បន្ទាប់មក ពេលវិទុរៈ អ្នកប្រឹក្សាដែលមានទស្សនៈឆ្ងាយ បានមកដល់ ព្រះបាទធ្រឹតរាស្ត្រ ព្រះរាជបុត្ររបស់អំបិកា បានសួរគាត់ ដូចជាមនុស្សដែលត្រូវសង្ស័យចាប់គាំង។

Verse 2

धृतराष्ट उवाच कथं गच्छति कौन्तेयो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: । भीमसेन: सव्यसाची माद्रीपुत्रोी च पाण्डवौ,धृतराष्ट्र बोले--विदुर! कुन्तीनन्दन धर्मपुत्र युधिष्ठिर किस प्रकार जा रहे हैं? भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव--ये चारों पाण्डव भी किस प्रकार यात्रा करते हैं?

ធ្រឹតរាស្ត្របានមានព្រះបន្ទូលថា៖ វិទុរៈ! យុធិષ્ઠិរ ព្រះរាជបុត្ររបស់គុន្តី អ្នកកាន់ធម៌ តើកំពុងធ្វើដំណើរយ៉ាងដូចម្តេច? ហើយភីមសេន សវ្យសាចី (អរជុន) និងកូនប្រុសរបស់មាទ្រីទាំងពីរ—នកុល និងសហទេវ—ពួកបណ្ឌវទាំងនោះ ក៏ធ្វើដំណើរយ៉ាងដូចម្តេចដែរ?

Verse 3

धौम्यश्नैव कथं क्षत्तद्रौपदी च यशस्विनी । श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्व तेषां शंस विचेष्टितम्‌,पुरोहित धौम्य तथा यशस्विनी द्रौपदी भी कैसे जा रही है? मैं उन सबकी पृथक्‌-पृथक्‌ चेष्टाओंको सुनना चाहता हूँ, तुम मुझसे कहो

ធ្រឹតរាស្ត្របានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ឱ វិទុរៈ (អ្នកថែទ្វារ)! ហើយព្រះសង្ឃបូជាចារ្យ ធោម្យ និងដ្រៅបទី អ្នកមានកិត្តិយស នាងទៅយ៉ាងដូចម្តេច? ខ្ញុំចង់ស្តាប់ទាំងអស់—ចូរប្រាប់ខ្ញុំអំពីអាកប្បកិរិយា និងចលនារបស់ពួកគេទាំងអស់ ដោយលម្អិត។

Verse 4

विदुर उवाच वस्त्रेण संवृत्य मुखं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । बाहू विशालौ सम्पश्यन्‌ भीमो गच्छति पाण्डव:,विदुर बोले--कुन्तीनन्दन युधिष्छिर वस्त्रसे मुँह ढँककर जा रहे हैं। पाण्डुकुमार भीमसेन अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए जाते हैं

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ យុធិષ્ઠិរ កូនប្រុសរបស់គុន្តី គ្របមុខដោយក្រណាត់ ហើយដើរទៅ។ ភីម បណ្ឌវ ក៏ដើរទៅ ដោយមើលទៅលើដៃធំទូលាយរបស់ខ្លួន។

Verse 5

सिकता वपन्‌ सव्यसाची राजानमनुगच्छति । माद्रीपुत्र: सहदेवो मुखमालिप्य गच्छति,सव्यसाची अर्जुन बालू बिखेरते हुए राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे जा रहे हैं। माद्रीकुमार सहदेव अपने मुँहपर मिट्टी पोतकर जाते हैं

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ អរជុន សវ្យសាចី ដើរតាមព្រះបាទយុធិષ્ઠិរ ដោយបោះខ្សាច់រាយប៉ាយ។ សហទេវ កូនប្រុសរបស់មាទ្រី ដើរទៅដោយលាបធូលីលើមុខ។

Verse 6

पांसूपलिप्तसर्वाड्रो नकुलक्षित्तविद्दल: । दर्शनीयतमो लोके राजानमनुगच्छति,लोकमें अत्यन्त दर्शनीय मनोहर रूपवाले नकुल अपने सब अंगोंमें धूल लपेटकर व्याकुलचित हो राजा युधिष्ठिरका अनुसरण कर रहे हैं

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «នកុលៈ—ទោះជាបុរសសង្ហាបំផុតក្នុងលោក—ឥឡូវនេះក៏ដើរតាមព្រះបាទយុធិષ્ઠិរៈ ដោយអវយវៈទាំងមូលប្រឡាក់ធូលី ចិត្តរងទុក្ខវឹកវរ ព្រោះគ្រោះមហន្តរាយ។ ទិដ្ឋភាពនេះបង្ហាញថា សំណាងអាចបង្វិលកិត្តិយសបានរហ័សយ៉ាងណា ហើយភាពស្មោះត្រង់នៅតែអត់ធ្មត់ ទោះក្នុងការអាម៉ាស់ក៏ដោយ»។

Verse 7

कृष्णा तु केशौ: प्रच्छाद्य मुखमायतलोचना । दर्शनीया प्ररुदती राजानमनुगच्छति,परम सुन्दरी विशाललोचना कृष्णा अपने केशोंसे ही मुँह ढँककर रोती हुई राजाके पीछे-पीछे जा रही है

ប៉ុន្តែ ក្រឹෂ್ಣា (ទ្រೌបទី) ភ្នែកវែងរបស់នាងពោរពេញដោយទុក្ខសោក បានយកសក់បាំងមុខ។ ទោះជាសមគួរឲ្យគេគយគន់ នាងក៏យំស្រែក ខណៈដើរតាមពីក្រោយព្រះមហាក្សត្រ—ជារូបភាពនៃកិត្តិយសត្រូវបំពាន និងការរលាយរលំខាងសីលធម៌នៃរាជសភាដែលគួរតែការពារនាង។

Verse 8

धौम्यौ रौद्राणि सामानि याम्यानि च विशाम्पते । गायन्‌ गच्छति मार्गेषु कुशानादाय पाणिना,महाराज! पुरोहित धौम्यजी हाथमें कुश लेकर रुद्र तथा यमदेवतासम्बन्धी साम- मन्त्रोंका गान करते हुए आगे-आगे मार्गपर चल रहे हैं

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃប្រជាជន! ព្រះបុរោហិត ធោម្យៈ កំពុងដើរនាំមុខតាមផ្លូវ ច្រៀងសាមន៍មន្តដែលពាក់ព័ន្ធនឹង រុទ្រៈ និង យមៈ ហើយកាន់ស្មៅកុសៈនៅក្នុងដៃ»។

Verse 9

धृतराष्ट्र रवाच विविधानीह रूपाणि कृत्वा गच्छन्ति पाण्डवा: | तन्ममाचक्ष्व विदुर कस्मादेवं व्रजन्ति ते

ធೃತរાષ્ટ્રបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «នៅទីនេះ បណ្ឌវៈកំពុងចាកចេញ ដោយស្លៀកពាក់/បំលែងខ្លួនជារូបរាងផ្សេងៗ។ វិទុរៈ ចូរប្រាប់ខ្ញុំ—ហេតុអ្វីបានជាពួកគេចេញដំណើរបែបនេះ?»

Verse 10

धृतराष्ट्रने पूछा--विदुर! पाण्डवलोग यहाँ जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी चेष्टाएँ करते हुए यात्रा कर रहे हैं, उसका क्या रहस्य है, यह बताओ। वे क्‍यों इस प्रकार जा रहे हैं? ।। विदुर उवाच निकृतस्यापि ते पुनत्रैहते राज्ये धनेषु च । न धर्माच्चलते बुद्धिर्धर्मराजस्य धीमत:,विदुर बोले--महाराज! यद्यपि आपके पुत्रोंने छलपूर्ण बर्ताव किया है। पाण्डवोंका राज्य और धन सब कुछ चला गया है तो भी परम बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्लिरकी बुद्धि धर्मसे विचलित नहीं हो रही है

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «ឱ មហាក្សត្រ! ទោះបីកូនប្រុសរបស់ព្រះអង្គបានប្រព្រឹត្តដោយល្បិចកល ហើយបណ្ឌវៈត្រូវបានដកហូតរាជ្យ និងទ្រព្យសម្បត្តិទាំងអស់ក៏ដោយ ក៏ព្រះធម្មរាជ យុធិષ્ઠិរៈ—អ្នកមានប្រាជ្ញាខ្ពង់ខ្ពស់—មិនឲ្យចិត្តវៀរចេញពីធម្មៈឡើយ។ ទោះរងរបួស និងការបាត់បង់ ការតាំងចិត្តរបស់ព្រះអង្គនៅតែចាក់ឫសក្នុងសេចក្តីសុចរិត»។

Verse 11

योडसौ राजा घृणी नित्य धार्तराष्ट्रबु भारत । निकृत्या भ्रंशित: क्रोधान्नोन्मीलयति लोचने

វិទូរៈបាននិយាយថា៖ «ព្រះរាជាអង្គនោះ—មានព្រះហឫទ័យមេត្តាករុណាជានិច្ច—ឱ ធ្រឹតរាស្ត្រ, ឱ ភារត, ត្រូវបានល្បិចកលបោកបញ្ឆោតធ្វើឲ្យវៀចចេញពីផ្លូវត្រឹមត្រូវ; ហើយដោយសារកំហឹង ព្រះអង្គមិនសូម្បីតែបើកព្រះនេត្រឡើយ»។

Verse 12

भारत! राजा युधिष्ठिर आपके पुत्रोंपर सदा दयाभाव बनाये रखते थे, किंतु इन्होंने छलपूर्ण जूएका आश्रय लेकर उन्हें राज्यसे वंचित किया है, इससे उनके मनमें बड़ा क्रोध है और इसीलिये वे अपनी आँखोंको नहीं खोलते हैं ।। नाहं जन निर्दहेयं दृष्टवा घोरेण चक्षुषा | स पिधाय मुखं राजा तस्माद्‌ गच्छति पाण्डव:,“मैं भयानक दृष्टिसे देखकर किसी (निरपराधी) मनुष्यको भस्म न कर डालूँ' इसी भयसे पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपना मुँह ढँककर जा रहे हैं

វិទូរៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ភារត (ធ្រឹតរាស្ត្រ), ព្រះបាទយុធិષ્ઠិរ តែងរក្សាមេត្តាករុណាចំពោះកូនប្រុសរបស់អ្នកជានិច្ច; ប៉ុន្តែពួកគេបានយកល្បែងភ្នាល់ដ៏បោកបញ្ឆោតជាជម្រក ហើយដកហូតរាជ្យពីព្រះអង្គ។ ដោយហេតុនេះ កំហឹងដ៏ខ្លាំងបានកើតឡើងក្នុងព្រះហឫទ័យ ហេតុនោះព្រះអង្គមិនសូម្បីតែបើកព្រះនេត្រឡើយ។ ‘កុំឲ្យខ្ញុំដោយការមើលដោយទស្សនៈដ៏គួរភ័យ ធ្វើឲ្យមនុស្សសុចរិតណាម្នាក់ក្លាយជាផេះ’—ដោយខ្លាចដូច្នេះ ព្រះបាទបណ្ឌវៈបានគ្របព្រះមុខ ហើយដំណើរទៅ»។

Verse 13

यथा च भीमो व्रजति तन्मे निगदत: शृणु । बाह्वोर्बले नास्ति समो ममेति भरतर्षभ,अब भीमसेन जिस प्रकार चल रहे हैं, उसका रहस्य बताता हूँ, सुनिये! भरतश्रेष्ठ! उन्हें इस बातका अभिमान है कि बाहुबलमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है

វិទូរៈបាននិយាយថា៖ «ចូរស្តាប់ខ្ញុំ ពេលខ្ញុំប្រាប់អំពីរបៀបដែលភីមកំពុងដំណើរ។ ឱ អ្នកដ៏ប្រសើរនៃពួកភារត, គាត់ដើរទៅដោយមោទនភាពថា ក្នុងកម្លាំងដៃរបស់ខ្លួន គ្មានអ្នកណាស្មើគាត់ឡើយ»។

Verse 14

बाहू विशालौ कृत्वासौ तेन भीमो5पि गच्छति । बाहू विदर्शयन्‌ राजन्‌ बाहुद्रविणदर्पित:

វិទូរៈបាននិយាយថា៖ «ដោយធ្វើឲ្យដៃរបស់ខ្លួនទូលាយធំ និងគួរឲ្យកោតខ្លាច គាត់ដំណើរទៅ—ភីមផងដែរ—បង្ហាញកម្លាំងដៃរបស់ខ្លួន ឱ ព្រះមហាក្សត្រ, ហើមមោទនភាពដោយអំណាច និងទ្រព្យសម្បត្តិ»។

Verse 15

प्रदिशज्छरसम्पातान्‌ कुन्तीपुत्रो&र्जुनस्तदा,कुन्तीपुत्र सव्यसाची अर्जुन उस समय राजाके पीछे-पीछे जो बालू बिखेरते हुए यात्रा कर रहे थे, उसके द्वारा वे शत्रुओंपर बाण बरसानेकी अभिलाषा व्यक्त करते थे। भारत! इस समय उनके गिराये हुए बालूके कण जैसे आपसमें संसक्त न होते हुए लगातार गिरते हैं, उसी प्रकार वे शत्रुओंपर परस्पर संसक्त न होनेवाले असंख्य बाणोंकी वर्षा करेंगे

វិទូរៈបាននិយាយថា៖ «នៅពេលនោះ អរជុន កូនប្រុសរបស់កុនទី—សវ្យសាចី—ដូចជាកំពុងបង្ហាញសញ្ញានៃភ្លៀងព្រួញ។ ដូចគ្រាប់ខ្សាច់ដែលត្រូវបោះរាយនៅពីក្រោយព្រះមហាក្សត្រ ធ្លាក់ចុះជាខ្សែបន្តបន្ទាប់ មិនជាប់គ្នាទេ តែឥតដាច់; ដូច្នោះដែរ គាត់នឹងបាញ់លើសត្រូវនូវភ្លៀងព្រួញរាប់មិនអស់ មួយៗដាច់ដោយឡែក តែបន្តជាប់គ្នា»។

Verse 16

सिकता वपन्‌ सव्यसाची राजानमनुगच्छति । असक्ता: सिकतास्तस्य यथा सम्प्रति भारत । असक्तं शरवर्षाणि तथा मोक्ष्यति शत्रुषु,कुन्तीपुत्र सव्यसाची अर्जुन उस समय राजाके पीछे-पीछे जो बालू बिखेरते हुए यात्रा कर रहे थे, उसके द्वारा वे शत्रुओंपर बाण बरसानेकी अभिलाषा व्यक्त करते थे। भारत! इस समय उनके गिराये हुए बालूके कण जैसे आपसमें संसक्त न होते हुए लगातार गिरते हैं, उसी प्रकार वे शत्रुओंपर परस्पर संसक्त न होनेवाले असंख्य बाणोंकी वर्षा करेंगे

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ភារតៈ! អរជុន អ្នកបាញ់ធ្នូសព្វដៃ (សវ្យសាចី) ដើរតាមក្រោយព្រះមហាក្សត្រ ហើយបោះខ្សាច់រាលពេលដើរ។ ដូចគ្រាប់ខ្សាច់ទាំងនោះធ្លាក់ជាចរន្តមិនជាប់គ្នា ដូច្នោះដែរ កូនកុន្តី សវ្យសាចី នឹងបញ្ចេញលើសត្រូវភ្លៀងព្រួញរាប់មិនអស់ លឿន ហើយមិនជាប់គ្នា—ជាសញ្ញានៃការត្រៀមខ្លួនដោយស្ងប់ស្ងាត់ តែដាច់ខាត សម្រាប់សង្គ្រាមត្រឹមធម៌»។

Verse 17

न मे कश्चिद्‌ विजानीयान्मुखमद्येति भारत । मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवो5पि गच्छति,भारत! “आज इस दुर्दिनमें कोई मेरे मुँहको पहचान न ले” यही सोचकर सहदेव अपने मुँहमें मिट्टी पोतकर जा रहे हैं

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ភារតៈ! សូមកុំឲ្យអ្នកណាម្នាក់ស្គាល់មុខខ្ញុំក្នុងថ្ងៃនេះឡើយ»។ ដោយគិតដូច្នេះ សហទេវក៏ចេញដំណើរ ដោយលាបដីលើមុខ ដើម្បីឲ្យឆ្លងកាត់ដោយមិនឲ្យគេដឹង ក្នុងថ្ងៃអាក្រក់នេះ—ជាការលាក់ខ្លួនដោយប្រាជ្ញា កណ្ដាលគ្រោះថ្នាក់ និងភាពរអាក់រអួលនៃធម៌។

Verse 18

नाहं मनांस्याददेयं मार्गे सत्रीणामिति प्रभो । पांसूलिप्तसर्वाड्रो नकुलस्तेन गच्छति,प्रभो! “मार्ममें मैं स्त्रियोंका चित्त न चुरा लूँ" इस भयसे नकुल अपने सारे अंगोंमें धूल लगाकर यात्रा करते हैं

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់! ខ្ញុំមិនចង់ឲ្យនៅលើផ្លូវ ខ្ញុំទៅលួចយកចិត្តស្ត្រីទេ»។ ដូច្នេះ នកុលបានធ្វើដំណើរ ដោយលាបធូលីលើរាងកាយទាំងមូល—ដើម្បីមិនក្លាយជាមូលហេតុនៃការល្បួង ឬការរំខានដល់អ្នកដទៃ ហើយរក្សាការប្រព្រឹត្តឲ្យសមរម្យ។

Verse 19

एकव्स्त्रा प्ररुदती मुक्तकेशी रजस्वला । शोणितेनाक्तवसना द्रौपदी वाक्यमब्रवीत्‌,द्रौपदीके शरीरपर एक ही वस्त्र था, उसके बाल खुले हुए थे, वह रजस्वला थी और उसके कपड़ोंमें रक्त (रज)-का दाग लगा हुआ था, उसने रोते हुए यह बात कही थी

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ ដ្រៅបទីពាក់តែសម្លៀកបំពាក់តែមួយ កំពុងយំ សក់រលុង ហើយស្ថិតក្នុងរដូវរបស់នាង—សម្លៀកបំពាក់មានស្នាមឈាម—នាងបាននិយាយពាក្យទាំងនេះ។ ទិដ្ឋភាពនេះបង្ហាញពីការបំពានយ៉ាងធ្ងន់លើកិត្តិយស និងធម៌ ពេលស្ត្រីម្នាក់ត្រូវបានអាម៉ាស់មុខជាសាធារណៈក្នុងសភារាជវាំង ធ្វើឲ្យរាជសភាក្លាយជាសាក្សីនៃអធម៌។

Verse 20

यत्कृते5हमिदं प्राप्ता तेषां वर्षे चतुर्दशे । हतपत्यो हतसुता हतबन्धुजनप्रिया:,“जिनके अन्यायसे आज मैं इस दशाको पहुँची हूँ, आजके चौदहवें वर्षमें उनकी स्त्रियाँ भी अपने पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेसे उनकी लाशोंके पास लोट-लोटकर रोयेंगी और अपने अंगोंमें रक्त तथा धूल लपेटे, बाल खोले हुए, अपने सगे-सम्बन्धियोंको तिलांजलि दे इसी प्रकार हस्तिनापुरमें प्रवेश करेंगी”

«ដោយអំពើអយុត្តិធម៌របស់ពួកគេ ខ្ញុំបានធ្លាក់មកដល់សភាពនេះ។ នៅឆ្នាំទីដប់បួននេះ ស្ត្រីរបស់ពួកគេក៏នឹងយំក្រហាយក្បែរសពប្តី កូន និងញាតិមិត្តដែលត្រូវសម្លាប់ ដោយរំលំខ្លួនលើសាកសព។ ពួកនាងនឹងលាបឈាមនិងធូលីលើរាងកាយ សក់រលុង ហើយធ្វើតិលញ្ជលីដល់សាច់ញាតិរបស់ខ្លួន—ហើយចូលមកហាស្តិនាបុរ ដូចខ្ញុំបានចូលមកថ្ងៃនេះ»។

Verse 21

बहुशोणितदिग्धाड़यो मुक्तकेशयो रजस्वला: । एवं कृतोदका भार्या: प्रवेक्ष्यन्ति गजाह्नयम्‌,“जिनके अन्यायसे आज मैं इस दशाको पहुँची हूँ, आजके चौदहवें वर्षमें उनकी स्त्रियाँ भी अपने पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेसे उनकी लाशोंके पास लोट-लोटकर रोयेंगी और अपने अंगोंमें रक्त तथा धूल लपेटे, बाल खोले हुए, अपने सगे-सम्बन्धियोंको तिलांजलि दे इसी प्रकार हस्तिनापुरमें प्रवेश करेंगी”

វិទុរាបានព្យាករណ៍អំពីការប្រែត្រឡប់ដ៏សាហាវថា៖ នៅឆ្នាំទីដប់បួន ស្ត្រីរបស់អ្នកដែលបានប្រព្រឹត្តអធម៌ នឹងចូលទៅកាន់ហស្តិនាបុរៈក្នុងសភាពដូចគ្នានេះ—ពួកនាងរមៀលរមួលក្បែរសពប្តី កូន និងញាតិដែលត្រូវសម្លាប់ ស្រែកយំមិនឈប់ រាងកាយប្រឡាក់ឈាមនិងធូលី សក់រលុង ហើយធ្វើពិធីបូជាទឹកចុងក្រោយ (តិលាន្ជលី) ដល់សាច់ញាតិរបស់ខ្លួន។ ការព្រមាននេះបង្ហាញថា អធម៌ជាអំពើហិង្សាដែលត្រឡប់មកលើគ្រួសារខ្លួនឯង។

Verse 22

कृत्वा तु नैतान्‌ दर्भान्‌ धीरो धौम्य: पुरोहित: । सामानि गायन्‌ याम्यानि पुरतो याति भारत

ព្រះបូជាចារ្យធោម្យៈ អ្នកមានចិត្តមាំមួន បានរៀបចំស្មៅដರ್ಭៈទាំងនេះរួចហើយ ក៏ដើរនាំមុខទៅ—ឱ ភារត—ច្រៀងសាមន៍ (Sāman) ដែលពាក់ព័ន្ធនឹងទិសខាងត្បូង ទិសរបស់យមៈ ដើម្បីដឹកនាំពិធីឲ្យដំណើរការទៅដោយសេចក្តីស្ងប់ស្ងាត់ និងរបៀបរបបតាមធម៌។

Verse 23

भारत! धीरस्वभाववाले पुरोहित धौम्यजी कुशोंका अग्रभाग नै#ऋत्यकोणकी ओर करके यमदेवतासम्बन्धी साम-मन्त्रोंका गान करते हुए पाण्डवोंके आगे-आगे जा रहे हैं ।। हतेषु भारतेष्वाजौी कुरूणां गुरवस्तदा । एवं सामानि गास्यन्तीत्युक्त्वा धौम्योडपि गच्छति

វិទុរាបាននិយាយថា៖ «ឱ ភារត! ព្រះបូជាចារ្យធោម្យៈ អ្នកមានសភាពមាំមួន បានយកចុងស្មៅកុសៈបង្វែរទៅទិសនិរតី ហើយដើរនាំមុខបណ្ឌវៈទាំងឡាយ ដោយច្រៀងសាមន៍ដែលពាក់ព័ន្ធនឹងយមៈ។ ដោយនិយាយថា ‘ពេលអ្នកចាស់ទុំរបស់កុរុត្រូវសម្លាប់ក្នុងសង្គ្រាម ខ្ញុំក៏នឹងច្រៀងសាមន៍បែបនេះដែរ’ ធោម្យៈក៏បន្តដំណើរទៅ»។

Verse 24

धौम्यजी यह कहकर गये थे कि युद्धमें कौरवोंके मारे जानेपर उनके गुरु भी इसी प्रकार कभी सामगान करेंगे ।। हा हा गच्छन्ति नो नाथा: समवेक्षध्वमीदृशम्‌ । अहो धिक्‌ कुरुवृद्धानां बालानामिव चेष्टितम्‌,महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्‍लाकर कह रहे थे कि “हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक्‍्कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है?

វិទុរាបានរាយការណ៍ថា នៅពេលបណ្ឌវៈចាកចេញ ប្រជាជនក្នុងទីក្រុងរងទុក្ខយ៉ាងខ្លាំង ហើយស្រែកហៅម្តងហើយម្តងទៀតថា៖ «អាឡាស! អាឡាស! ម្ចាស់របស់យើង បណ្ឌវៈ កំពុងចាកចេញ! សូមមើលទិដ្ឋភាពដ៏អាម៉ាស់នេះ—អ្នកចាស់ទុំក្នុងកុរុវិញប្រព្រឹត្តដូចក្មេងៗ! សូមឲ្យមានការថ្កោលទោសចំពោះអាកប្បកិរិយានោះ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ!» ការយំសោកនេះបង្ហាញពីការប្រែប្រួលនៃសីលធម៌៖ អ្នកដែលគួរតែរក្សាធម៌វិញត្រូវបានលោភលន់និងចិត្តឆាប់រំភើបជំរុញ ធ្វើឲ្យអ្នកស្នងត្រឹមត្រូវត្រូវនិរទេស ហើយប្រជាជនមានអារម្មណ៍ដូចកូនកំព្រា។

Verse 25

राष्ट्रेभ्य: पाण्डुदायादॉल्लो भान्निर्वासयन्ति ये । अनाथा: सम वयं सर्वे वियुक्ता: पाण्डुनन्दनै:,महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्‍लाकर कह रहे थे कि “हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक्‍्कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है?

វិទុរាបាននិយាយថា៖ «អ្នកណាដែលដោយសារលោភលន់ បណ្តេញអ្នកស្នងមរតករបស់បណ្ឌុចេញពីនគរ—ពេលយើងត្រូវបែកចេញពីកូនប្រុសរបស់បណ្ឌុ នោះយើងទាំងអស់គ្នាក្លាយជាមនុស្សគ្មានទីពឹង គ្មានអ្នកការពារ»។

Verse 26

दुर्विनीतेषु लुब्धेषु का प्रीति: कौरवेषु न: । इति पौरा: सुदु:खार्ता: क्रोशन्ति सम पुन: पुन:,महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्‍लाकर कह रहे थे कि “हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक्‍्कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है?

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «នៅពេលកោរវៈទាំងឡាយគ្មានវិន័យ ហើយត្រូវលោភលន់ជំរុញ តើយើងអាចមានសេចក្តីស្រឡាញ់ចំពោះពួកគេបានដូចម្តេច?» ដូច្នេះ ប្រជាជនក្នុងនគរ ដែលត្រូវទុក្ខសោកធ្ងន់ធ្ងរគ្របដណ្តប់ បានស្រែកយំឡើងម្តងហើយម្តងទៀត។ ពួកគេបន្ទោសការប្រព្រឹត្តដូចក្មេងរបស់អ្នកចាស់ទុំក្នុងកោរវៈ និងការបណ្តេញកូនប្រុសពណ្ឌុចេញពីរាជ្យដោយសារលោភលន់ ហើយនិយាយថា ដោយខ្វះបណ្ឌវៈ ពួកគេទាំងអស់ដូចជាក្លាយជាកំព្រា និងខឹងខ្លាចចំពោះអធម្មក្នុងការគ្រប់គ្រង។

Verse 27

एवमाकारलिड्रैस्ते व्यवसायं मनोगतम्‌ । कथयन्तश्न कौन्तेया वन॑ जम्मुर्मनस्विन:,महाराज! इस प्रकार मनस्वी कुन्तीपुत्र अपनी आकृति एवं चिह्लोंके द्वारा अपने आन्तरिक निश्चयको प्रकट करते हुए वनको गये हैं

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «ដូច្នេះ ដោយរូបរាង និងសញ្ញាខាងក្រៅរបស់ពួកគេ កូនប្រុសដ៏មានចិត្តខ្ពង់ខ្ពស់របស់កុន្ទីទាំងនោះ បានបង្ហាញឲ្យដឹងនូវសេចក្តីសម្រេចក្នុងចិត្ត; ហើយបន្ទាប់ពីបង្ហាញវា ពួកគេក៏ចេញដំណើរទៅព្រៃ។»

Verse 28

एवं तेषु नराग्र्येषु निर्यत्सु गजसाह्वयात्‌ । अनभ्रे विद्युतश्नासन्‌ भूमिश्व समकम्पत

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ នៅពេលបុរសដ៏ប្រសើរទាំងនោះ ចេញដំណើរពីហស្តិនាបុរៈ ពន្លឺរន្ទះបានផ្លេកឡើងក្នុងមេឃគ្មានពពក ហើយផែនដីផ្ទាល់ក៏ចាប់ផ្តើមរញ្ជួយ—ជាសញ្ញាអពមង្គល បង្ហាញពីទម្ងន់ធ្ងន់នៃធម៌ដែលកំពុងត្រូវបំពាន។

Verse 29

राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशाम्पते । उल्का चाप्यपसव्येन पुरं कृत्वा व्यशीर्यत

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃប្រជាជន! រាហូបានលេបព្រះអាទិត្យនៅពេលមិនសមគួរ; ហើយអុល្កា​ដ៏ភ្លើងឆេះមួយ ដើរតាមទិសឆ្វេង (ជាទិសអពមង្គល) បានវង់ជុំវិញនគរ—បន្ទាប់មកវាបែកបាក់។ នេះជាសញ្ញាព្រមានអំពីភាពវឹកវរ និងមហន្តរាយជិតមក ដោយសារអ្នកគ្រប់គ្រងបោះបង់ធម៌ និងការអត់ធ្មត់ដ៏ប្រាជ្ញា។»

Verse 30

हस्तिनापुरसे उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके निकलते ही बिना बादलके बिजली गिरने लगी, पृथ्वी काँप उठी। राजन्‌! बिना पर्व (अमावस्या)-के ही राहुने सूर्यको ग्रस लिया था और नगरको दायें रखकर उल्का गिरी थी ।। प्रत्याहरन्ति क्रव्यादा गृध्रगोमायुवायसा: । देवायतनचैत्येषु प्राकाराट्टालकेषु च,गीध, गीदड़ और कौवे आदि मांसाहारी जन्तु नगरके मन्दिरों, देववृक्षों, चहारदीवारी तथा अट्टालिकाओंपर मांस और हड्डी आदि लाकर गिराने लगे थे

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ ពេលបណ្ឌវៈ—បុរសដ៏ប្រសើរទាំងនោះ—ចេញពីហស្តិនាបុរៈភ្លាម រន្ទះបានធ្លាក់ក្នុងមេឃគ្មានពពក ហើយផែនដីក៏រញ្ជួយ។ ឱ ព្រះរាជា! រាហូបានលេបព្រះអាទិត្យទោះមិនមែនថ្ងៃអមាវស្ស្យា ហើយអុល្កាបានធ្លាក់ដោយទុកនគរនៅខាងស្តាំ។ បន្ទាប់មក សត្វស៊ីសាច់—អក្សរ, ចចក និងក្អែក—បានយកសាច់ និងឆ្អឹងមកទម្លាក់លើវិហារ និងទីសក្ការៈក្នុងនគរ លើដើមឈើបូជាទេវតា ហើយសូម្បីលើជញ្ជាំងការពារ និងប៉មយាម។ សញ្ញាអពមង្គលទាំងនេះបង្ហាញថា ពេលអ្នកសុចរិតត្រូវបានបណ្តេញចេញ ទីកន្លែងដែលគួរតែសម្រាប់ការការពារ និងការថ្វាយបង្គំ ក៏ត្រូវបានបំពុល ហើយវាព្យាករណ៍មហន្តរាយដែលកើតពីអធម្ម។

Verse 31

एवमेते महोत्पाता: प्रादुरासन्‌ दुरासदा: । भरतानामभावाय राजन दुर्मन्त्रिते तव,राजन्‌! इस प्रकार आपकी दुर्मनत्रणाके कारण ऐसे-ऐसे अपशकुनरूप दुर्दम्य एवं महान्‌ उत्पात प्रकट हुए हैं, जो भरतवंशियोंके विनाशकी सूचना दे रहे हैं

វិទុរៈបាននិយាយថា៖ «ដូច្នេះហើយ សញ្ញាអាក្រក់ដ៏ធំធេងទាំងនេះ—ពិបាកបំបាត់—បានលេចឡើង។ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ដោយសារការប្រឹក្សាអាក្រក់របស់ព្រះអង្គ វាប្រាប់ទុកជាមុនអំពីវិនាសនៃពួកភារតៈ»។

Verse 32

वैशम्पायन उवाच एवं प्रवदतोरेव तयोस्तत्र विशाम्पते । धृतराष्ट्रस्य राज्ञश्न विदुरस्यथ च धीमतः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र और बुद्धिमान विदुर जब दोनों वहाँ बातचीत कर रहे थे, उसी समय सभामें महर्षियोंसे घिरे हुए देवर्षि नारद कौरवोंके सामने आकर खड़े हो गये और यह भयंकर वचन बोले--

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃប្រជាជន (ជនមេជ័យ) ខណៈដែលព្រះបាទ ធ្រឹតរាស្ត្រ និងវិទុរៈអ្នកមានប្រាជ្ញា កំពុងសន្ទនានៅទីនោះ ទេវឫសី នារទៈ—មានមហាឫសីជាច្រើនព័ទ្ធជុំវិញ—បានមកឈរនៅមុខពួកកៅរវៈក្នុងសភា ហើយបានបញ្ចេញពាក្យដ៏ធ្ងន់ធ្ងរ និងជាសញ្ញាអាក្រក់។

Verse 33

नारदश्न सभामध्ये कुरूणामग्रत: स्थित: । महर्षिभि: परिवृतो रौद्रं वाक्यमुवाच ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र और बुद्धिमान विदुर जब दोनों वहाँ बातचीत कर रहे थे, उसी समय सभामें महर्षियोंसे घिरे हुए देवर्षि नारद कौरवोंके सामने आकर खड़े हो गये और यह भयंकर वचन बोले--

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ នៅកណ្ដាលសភារាជ នារទៈបានឈរនៅមុខពួកកុរុ។ ព័ទ្ធជុំវិញដោយមហាឫសីទាំងឡាយ គាត់បាននិយាយពាក្យដ៏កាចសាហាវ និងជាសញ្ញាអាក្រក់—ពាក្យសម្រាប់ព្រមាន សម្រាប់វិនិច្ឆ័យ និងសម្រាប់ដាក់សីលធម៌ជាភាគហ៊ុននៃអ្វីដែលជិតនឹងកើតឡើង។

Verse 34

इतश्नतुर्दशे वर्षे विनक्ष्यन्तीह कौरवा: । दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ចាប់ពីពេលនេះទៅ នៅឆ្នាំទីដប់បួន ពួកកៅរវៈនឹងជួបវិនាសនៅទីនេះ—ដោយសារកំហុសរបស់ទុរយោធនៈ និងដោយអំណាចរបស់ភីម និងអរជុន»។

Verse 35

“आजसे चौदहवें वर्षमें दुर्योधनके अपराधसे भीम और अर्जुनके पराक्रमद्वारा कौरवकुलका नाश हो जायगा” ।। इत्युक्त्वा दिवमाक्रम्य क्षिप्रमन्‍्तरधीयत । ब्राह्मीं श्रियं सुविपुलां बिश्रद्‌ देवर्षिसत्तम:

«ចាប់ពីថ្ងៃនេះទៅ នៅឆ្នាំទីដប់បួន ដោយសារកំហុសរបស់ទុរយោធនៈ កុលកៅរវៈនឹងត្រូវបំផ្លាញដោយវីរភាពរបស់ភីម និងអរជុន»។ និយាយដូច្នេះហើយ ទេវឫសីដ៏ប្រសើរបំផុតបានឡើងទៅស្ថានសួគ៌ ហើយបាត់ខ្លួនទៅយ៉ាងរហ័សពីចក្ខុវិស័យ ដោយពន្លឺដ៏ធំទូលាយដូចព្រះព្រហ្ម—ជាការវិនិច្ឆ័យសីលធម៌ថា អធម៌ពេលទុំ នាំមកនូវវិនាសរួម។

Verse 36

ऐसा कहकर विशाल ब्रह्मतेज धारण करनेवाले देवर्षि-प्रवर नारद आकाशमें जाकर सहसा अन्तर्धान हो गये ।। (धृतराष्ट उवाच किमनब्रुवन्‌ नागरिका: कि वै जानपदा जना: । महां तत्त्वेन चाचक्ष्व क्षत्त: सर्वमशेषत: ।। धृतराष्ट्रने पूछा--विदुर! जब पाण्डव वनको जाने लगे, उस समय नगर और देशके लोग क्या कह रहे थे, ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे ठीक-ठीक बताओ। विदुर उवाच ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्रा येडन्ये वदन्त्यथ । तच्छृणुष्व महाराज वक्ष्यते च मया तव ।। विदुर बोले--महाराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्यलोग इस घटनाके सम्बन्धमें जो कुछ कहते हैं, वह सुनिये, मैं आपसे सब बातें बता रहा हूँ। हा हा गच्छन्ति नो नाथा: समवेक्षध्वमीदृशम्‌ । इति पौरा: सुदुःखार्ता: शोचन्ति सम समन्तत: ।। पाण्डवोंके जाते समय समस्त पुरवासी दुःखसे आतुर हो सब ओर शोकमें डूबे हुए थे और इस प्रकार कह रहे थे--'हाय! हाय! हमारे स्वामी, हमारे रक्षक वनमें चले जा रहे हैं। भाइयो! देखो, धृतराष्ट्रके पुत्रोंका यह कैसा अन्याय है?! तदहृष्टमिवाकूजं गतोत्सवमिवाभवत्‌ | नगर हास्तिनपुरं सस्त्रीवृद्धकुमारकम्‌ ।। स्‍त्री, बालक और वृद्धोंसहित सारा हस्तिनापुर नगर हर्षरहित, शब्दशून्य तथा उत्सवहीन-सा हो गया। सर्वे चासन्‌ निरुत्साहा व्याधिना बाधिता यथा ।। पार्थात्‌ प्रति नरा नित्यं चिनन्‍्ताशोकपरायणा: । तत्र तत्र कथां चक्कर: समासाद्य परस्परम्‌ ।। सब लोग दुन्तीपुत्रोंके लिये निरन्तर चिन्ता एवं शोकमें निमग्न हो उत्साह खो बैठे थे। सबकी दशा रोगियोंके समान हो गयी थी। सब एक-दूसरेसे मिलकर जहाँ-तहाँ पाण्डवोंके विषयमें ही वार्तालाप करते थे। वन॑ गते धर्मराजे दुः:खशोकपरायणा: । बभूवु: कौरवा वृद्धा भृशं॑ शोकेन पीडिता: ।। धर्मराजके वनमें चले जानेपर समस्त वृद्ध कौरव भी अत्यन्त शोकसे व्यथित हो दुःख और चिन्तामें निमग्न हो गये। ततः पौरजन: सर्व: शोचन्नास्ते जनाधिपम्‌ | कुर्वाणाश्व कथास्तत्र ब्राह्मणा: पार्थिवं प्रति ।। तदनन्तर समस्त पुरवासी राजा युधिष्ठटिरके लिये शोकाकुल हो गये। उस समय वहाँ ब्राह्मणलोग राजा युधिष्ठिरके विषयमें निम्नांकित बातें करने लगे। ब्राह्मणा ऊचु कथं नु राजा धर्मात्मा वने वसति निर्जने । तस्यानुजाश्च ते नित्यं कृष्णा च द्रुपदात्मजा ।। सुखाहापि च दु:ःखारता कथं वसति सा वने ।। ब्राह्मणोंने कहा--हाय! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर और उनके भाई निर्जन वनमें कैसे रहेंगे? तथा ट्रुपदकुमारी कृष्णा तो सुख भोगनेके ही योग्य है, वह दुःखसे आतुर हो वनमें कैसे रहेगी। विदुर उवाच एवं पौराश्न विप्राश्न॒ सदारा: सहपुत्रका: | स्मरन्त: पाण्डवान्‌ सर्वे बभूवुर्भशदु:खिता: ।। विदुरजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार पुरवासी ब्राह्मण अपनी स्त्रियों और पुत्रोंके साथ पाण्डवोंका स्मरण करते हुए बहुत दुःखी हो गये। आविद्धा इव शस्त्रेण नाभ्यनन्दन्‌ कथंचन । सम्भाष्यमाणा अपि ते न कंचित्‌ प्रत्यपूजयन्‌ ।। शस्त्रोंक आघातसे घायल हुए मनुष्योंकी भाँति वे किसी प्रकार सुखी न हो सके। बात कहनेपर भी वे किसीको आदरपूर्वक उत्तर नहीं देते थे। न भुक्‍्त्वा न शयित्वा ते दिवा वा यदि वा निशि | शोकोपहततविज्ञाना नष्टसंज्ञा इवाभवन्‌ ।। उन्होंने दिन अथवा रातमें न तो भोजन किया और न नींद ही ली; शोकके कारण उनका सारा विज्ञान आच्छादित हो गया था। वे सब-के-सब अचेत-से हो रहे थे। यदवस्था बभूवार्ता हायोध्या नगरी पुरा । रामे वन॑ गते दुःखादूधृतराज्ये सलक्ष्मणे ।। तदवस्थं बभूवार्तमद्येदं गजसाह्वयम्‌ । गते पार्थे वनं दुःखादूधृतराज्ये सहानुजै: ।। जैसे त्रेतायुगमें राज्यका अपहरण हो जानेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीके वनमें चले जानेके बाद अयोध्या नगरी दुःखसे अत्यन्त आतुर हो बड़ी दुरवस्थाको पहुँच गयी थी, वही दशा राज्यके अपहरण हो जानेपर भाइयोंसहित युधिष्ठिरके वनमें चले जानेसे आज हमारे इस हस्तिनापुरकी हो गयी है। वैशम्पायन उवाच विदुरस्य वच: श्रुत्वा नागरस्य गिरं च वै । भूयो मुमोह शोकाच्च धृतराष्ट्र: सबान्धव: ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! विदुरका कथन और पुरवासियोंकी कही हुई बातें सुनकर बन्धु-बान्धवोंसहित राजा धृतराष्ट्र पुन: शोकसे मूर्च्छित हो गये। ततो दुर्योधन: कर्ण: शकुनिश्चापि सौबल: । द्रोणं द्वीपममन्यन्त राज्यं चास्मै न्‍न्यवेदयन्‌,तब दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिने द्रोणको अपना द्वीप (आश्रय) माना और सम्पूर्ण राज्य उनके चरणोंमें समर्पित कर दिया

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ពេលព្រះបាទធ្រឹតរាស្ត្រ បានស្តាប់ពាក្យរបស់វិទុរ និងសម្លេងទុក្ខសោករបស់ប្រជាជនក្នុងនគរ ព្រះអង្គ—ជាមួយសាច់ញាតិទាំងឡាយ—បានដួលសន្លប់ម្តងទៀត ដោយចិត្តវង្វេងក្រោមទុក្ខសោក។ បន្ទាប់មក ទុរយោធនៈ កರ್ಣៈ និងសកុនិ កូនសុបលៈ បានចាត់ទុកទ្រូណៈជាដូច “កោះ” (ជាជម្រកសុវត្ថិភាព) របស់ខ្លួន ហើយបានដាក់រាជ្យទាំងមូលនៅជើងគាត់ ប្រគល់ឲ្យគាត់គ្រប់គ្រង។

Verse 37

अथाब्रवीत्‌ ततो द्रोणो दुर्योधनममर्षणम्‌ । दुःशासनं च कर्ण च सवनिव च भारतान्‌,उस समय द्रोणाचार्यने अमर्षशील दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण तथा अन्य सब भरतवंशियोंसे कहा--

បន្ទាប់មក ទ្រូណៈបានមានពាក្យនិយាយ ទៅកាន់ទុរយោធនៈអ្នកមានកំហឹងខ្លាំង ព្រមទាំងទុះសាសនៈ កರ್ಣៈ និងព្រះអង្គម្ចាស់ទាំងឡាយនៃវង្សភារតៈផ្សេងទៀត។

Verse 38

अवध्यान्‌ पाण्डवान प्राहुर्देवपुत्रान्‌ द्विजातय: । अहं वै शरण प्राप्तान्‌ वर्तमानो यथाबलम्‌,'पाण्डव देवताओंके पुत्र हैं, अतः ब्राह्मणलोग उन्हें अवध्य बतलाते हैं। मैं यथाशक्ति सम्पूर्ण हृदयसे तुम्हारे अनुकूल प्रयत्न करता हुआ तुम्हारा साथ दूँगा। भक्तिपूर्वक अपनी शरणमें आये हुए इन राजाओंसहित धुृतराष्ट्रपुत्रोंका परित्याग करनेका साहस नहीं कर सकता। दैव ही सबसे प्रबल है

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ «ពួកទ្វិជៈ (អ្នកកើតពីរដង) ប្រកាសថា បណ្ឌវទាំងឡាយមិនអាចសម្លាប់បានទេ ព្រោះពួកគេជាកូនរបស់ទេវតា។ ចំណែកខ្ញុំ ខ្ញុំនឹងឈរជាមួយអ្នកដែលបានមកសុំជម្រក ដោយខិតខំតាមកម្លាំងដែលខ្ញុំមាន។ ក្នុងលំដាប់ធម៌ មិនគួរបោះបង់អ្នកដែលសុំការការពារ—ពិសេសអ្នកដែលបានចុះចូល—ព្រោះកាតព្វកិច្ចនៃការផ្តល់ជម្រក ធំជាងការចូលចិត្តខាងភាគី»។

Verse 39

गन्ता सर्वात्मना भव्त्या धारत्तराष्ट्रानू सराजकान्‌ । नोत्सहेयं परित्यक्तुं दैवं हि बलवत्तरम्‌,'पाण्डव देवताओंके पुत्र हैं, अतः ब्राह्मणलोग उन्हें अवध्य बतलाते हैं। मैं यथाशक्ति सम्पूर्ण हृदयसे तुम्हारे अनुकूल प्रयत्न करता हुआ तुम्हारा साथ दूँगा। भक्तिपूर्वक अपनी शरणमें आये हुए इन राजाओंसहित धुृतराष्ट्रपुत्रोंका परित्याग करनेका साहस नहीं कर सकता। दैव ही सबसे प्रबल है

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ «ខ្ញុំនឹងទៅជាមួយអ្នកដោយអស់ពីខ្លួនចិត្ត ដើរតាមពួកធារតរាស្ត្រ ព្រមទាំងស្តេចទាំងឡាយ។ ខ្ញុំមិនអាចក្លាហានបោះបង់ពួកគេ—អ្នកដែលបានមកសុំជម្រកដោយសេចក្តីស្រឡាញ់ស្មោះ—បានទេ ព្រោះវាសនាគឺជាអំណាចខ្លាំងជាងគេ»។

Verse 40

धर्मत: पाण्डुपुत्रा वै वनं गच्छन्ति निर्जिता: । ते च द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति पाण्डवा:,'पाण्डव जूएमें पराजित होकर धर्मके अनुसार वनमें गये हैं। वे वहाँ बारह वर्षोतक रहेंगे

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ត្រូវបានចាញ់ក្នុងល្បែងស៊ីសង កូនប្រុសរបស់បណ្ឌុ បានចូលព្រៃតាមធម៌។ នៅទីនោះ បណ្ឌវទាំងឡាយនឹងស្នាក់នៅរយៈពេលដប់ពីរឆ្នាំ—ទទួលយកផលវិបាកដែលបានកំណត់ និងរក្សាលំដាប់ធម៌ ទោះនៅក្នុងវិបត្តិក៏ដោយ។

Verse 41

चरितब्रह्याचर्याश्च क्रोधामर्षवशानुगा: । वैरं निर्यातयिष्यन्ति महद्‌ दुःखाय पाण्डवा:,“वनमें पूर्णरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करके जब वे क्रोध और अमर्षके वशीभूत हो यहाँ लौटेंगे, उस समय वैरका बदला अवश्य लेंगे। उनका वह प्रतीकार हमारे लिये महान्‌ दुःखका कारण होगा

«ពួកបណ្ឌវៈបានប្រព្រឹត្តព្រហ្មចារីយ៉ាងពេញលេញនៅក្នុងព្រៃ; ហើយពេលពួកគេត្រឡប់មកវិញដោយស្ថិតក្រោមអំណាចកំហឹង និងការខឹងខុសចិត្ត នោះពួកគេនឹងសងសឹកជាមិនខាន។ ការតបស្នងនោះនឹងក្លាយជាមូលហេតុនៃទុក្ខធំសម្រាប់យើង»។

Verse 42

मया च भ्रंशितो राजन्‌ द्रुपद: सखिवितग्रहे । पुत्रार्थभयजद्‌ राजा वधाय मम भारत,“राजन! मैंने मैत्रीके विषयको लेकर कलह प्रारम्भ होनेपर राजा ट्रुपदको उनके राज्यसे भ्रष्ट किया था; भारत! इससे दुःखी होकर उन्होंने मेरे वधके लिये पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छासे एक यज्ञका आयोजन किया

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ព្រះរាជា! ក្នុងជម្លោះដែលកើតឡើងពីរឿងមិត្តភាព ខ្ញុំផងដែរ បានធ្វើឲ្យព្រះបាទទ្រុបដៈត្រូវបណ្តេញចេញពីរាជ្យ។ ដោយសោកស្តាយ និងភ័យខ្លាចពីការអាម៉ាស់នោះ ឱ ភារតៈ! ព្រះអង្គបានរៀបចំពិធីយញ្ញ ដោយប្រាថ្នាចង់បានកូនប្រុស—ដើម្បីឲ្យកូននោះនាំមកនូវការសម្លាប់ខ្ញុំ»។

Verse 43

याजोपयाजतपसा पुत्र लेभे स पावकात्‌ । धृष्टद्रुम्न॑ द्रौोपदीं च वेदीमध्यात्‌ सुमध्यमाम्‌

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ដោយតបស្យារបស់យាជ និងឧបយាជ ព្រះរាជាបានទទួលពីអគ្គិដ៏បរិសុទ្ធ នូវកូនប្រុសមួយ—ធ្រឹស្តទ្យុម្ន—ហើយក៏បានទទួលដ្រោបទី ស្រីស្រស់ស្អាតចង្កេះស្ដើង ដែលកើតឡើងពីកណ្ដាលវេទិកាបូជាផ្ទាល់។

Verse 44

“याज और उपयाजकी तपस्यासे उन्होंने अग्निसे धृष्टद्युम्म और वेदीके मध्यभागसे सुन्दरी द्रौपदीको प्राप्त किया ।। धृष्टद्युम्नस्तु पार्थानां श्याल: सम्बन्धतो मतः । पाण्डवानां प्रियरतस्तस्मान्मां भयमाविशत्‌,'धृष्टद्युम्न तो सम्बन्धकी दृष्टिसे कुन्तीपुत्रोंका साला ही है, अतः सदा उनका प्रिय करनेमें लगा रहता है, उसीसे मुझे भय है”

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ដោយតបស្យារបស់យាជ និងឧបយាជ ពួកគេបានទទួលពីអគ្គិ នូវធ្រឹស្តទ្យុម្ន ហើយពីកណ្ដាលវេទិកាបូជាបានទទួលនាងដ្រោបទីដ៏ស្រស់ស្អាត។ ធ្រឹស្តទ្យុម្ន តាមទំនាក់ទំនងសាច់ញាតិ ត្រូវបានចាត់ទុកថាជាបងប្អូនថ្លៃរបស់ពួកបារថៈ; គាត់តែងខិតខំធ្វើអ្វីដែលពេញចិត្តបណ្ឌវៈ ហើយឈរខាងពួកគេយ៉ាងមាំមួន—ហេតុនេះហើយ ភ័យបានចូលមកក្នុងចិត្តខ្ញុំ»។

Verse 45

ज्वालावर्णो देवदत्तो धनुष्मान्‌ कवची शरी । मर्त्यधर्मतया तस्मादद्य मे साध्वसो महान्‌,“उसके शरीरकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान उद्धासित होती है। वह देवताका दिया हुआ पुत्र है और धनुष, बाण तथा कवचके साथ प्रकट हुआ है। मरणधर्मा मनुष्य होनेके कारण मुझे अब उससे महान्‌ भय लगता है

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ពណ៌កាយរបស់គាត់ភ្លឺរលោងដូចអណ្ដាតភ្លើង។ គាត់ជាកូនដែលទេវតាប្រទាន ហើយបានបង្ហាញខ្លួនមកជាមួយធ្នូ ព្រួញ និងអាវក្រោះ។ ទោះយ៉ាងណា ព្រោះគាត់ជាមនុស្សស្ថិតក្រោមច្បាប់នៃមរណភាព ថ្ងៃនេះហើយ ភ័យដ៏ធំបានកើតឡើងក្នុងខ្ញុំដោយសារគាត់»។

Verse 46

गतो हि पक्षतां तेषां पार्षत: परवीरहा । रथातिरथसंख्यायां यो5ग्रणीरजुनो युवा,शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न पाण्डवोंके पक्षका पोषक हो गया है। रथियों और अतिरथियोंकी गणनामें जिसका नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह तरुण वीर अर्जुन धृष्टद्युम्नके लिये, यदि मेरे साथ उसका युद्ध हुआ तो, लड़कर प्राणतक देनेके लिये उद्यत हो जायगा। कौरवो! (अर्जुनके साथ मुझे लड़ना पड़े) इस पृथ्वीपर इससे बढ़कर महान्‌ दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है?

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ធ្រឹṣṭadyumna កូនប្រុសរបស់ Pṛṣata (Drupada) អ្នកសម្លាប់វីរបុរសសត្រូវ បានទៅចូលខាងពួកគេហើយ ក្លាយជាសសរស្តម្ភរបស់បណ្ឌវៈ។ ហើយ អរជុន—វីរបុរសវ័យក្មេង ដែលឈ្មោះតែងត្រូវលើកឡើងមុនគេ នៅពេលរាប់ចំណាត់ថ្នាក់ ratha និង atiratha—បើត្រូវប្រយុទ្ធនឹងខ្ញុំ ដោយសារធ្រឹṣṭadyumna នោះ គាត់នឹងត្រៀមប្រយុទ្ធ ទោះបីបង់ជីវិតក៏ដោយ។ ឱ កౌរវៈ! តើមានទុក្ខធំជាងនេះសម្រាប់ខ្ញុំលើផែនដីទៀតឬ—ដែលត្រូវបង្ខំឲ្យប្រយុទ្ធនឹងអរជុន?»

Verse 47

सृष्टप्राणो भृशतरं तेन चेत्‌ संगमो मम । किमन्यद्‌ दुःखमधिकं परमं भुवि कौरवा:,शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न पाण्डवोंके पक्षका पोषक हो गया है। रथियों और अतिरथियोंकी गणनामें जिसका नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह तरुण वीर अर्जुन धृष्टद्युम्नके लिये, यदि मेरे साथ उसका युद्ध हुआ तो, लड़कर प्राणतक देनेके लिये उद्यत हो जायगा। कौरवो! (अर्जुनके साथ मुझे लड़ना पड़े) इस पृथ्वीपर इससे बढ़कर महान्‌ दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है?

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «បើខ្ញុំត្រូវជួបប្រយុទ្ធជាមួយគាត់ នោះគាត់នឹងប្រយុទ្ធដោយភាពកាចសាហាវយ៉ាងខ្លាំង ប្រៀបដូចបានដាក់ជីវិតជាភ្នាល់។ ឱ កೌរវៈ! តើមានទុក្ខណាធំជាង និងឈឺចាប់លើសនេះសម្រាប់ខ្ញុំលើផែនដីទៀតឬ—ដែលត្រូវបង្ខំឲ្យចូលសង្គ្រាមបែបនោះ?»

Verse 48

धृष्टद्युम्नो द्रोणमृत्युरिति विप्रथितं वच: । मद्वधाय श्रुतो5प्येष लोके चाप्यतिविश्रुत:,'धृष्टद्युम्न द्रोणकी मौत है, यह बात सर्वत्र फैल चुकी है। मेरे वधके लिये ही उसका जन्म हुआ है। यह भी सब लोगोंने सुन रखा है। धृष्टद्युम्न स्वयं भी संसारमें अपनी वीरताके लिये विख्यात है

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ពាក្យចចាមអារាមបានរាលដាលគ្រប់ទីកន្លែងថា ‘ធ្រឹṣṭadyumna គឺជាមរណភាពរបស់ ដ្រូណៈ’។ មនុស្សទាំងឡាយក៏ដឹងយ៉ាងទូលំទូលាយថា គាត់កើតមកសម្រាប់គោលបំណងសម្លាប់ខ្ញុំដោយផ្ទាល់; ហើយធ្រឹṣṭadyumna ខ្លួនឯងក៏ល្បីលើលោកដោយសារកម្លាំងក្លាហានរបស់គាត់ផងដែរ»

Verse 49

सो<यं नूनमनुप्राप्तस्त्वत्कृते काल उत्तम: । त्वरितं कुरुत श्रेयो नैतदेतावता कृतम्‌,“तुम्हारे लिये यह निश्चय ही बहुत उत्तम अवसर प्राप्त हुआ है। शीघ्र ही अपने कल्याण-साधनमें लग जाओ। पाण्डवोंको वनवास दे देनेमात्रसे तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध नहीं हो सकता

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «សម្រាប់អ្នក នេះពិតជាពេលវេលាដ៏ល្អឥតខ្ចោះដែលបានមកដល់។ ចូរធ្វើឲ្យរហ័ស ដើម្បីអ្វីដែលជាប្រយោជន៍ពិតប្រាកដ។ គោលបំណងរបស់អ្នក មិនអាចសម្រេចបាន ដោយគ្រាន់តែបញ្ជូនពួកបណ្ឌវៈទៅនិរទេសក្នុងព្រៃប៉ុណ្ណោះទេ»

Verse 50

मुहूर्त सुखमेवैतत्‌ तालच्छायेव हैमनी । यजध्वं च महायज्ञजैभोंगानश्रीत दत्त च

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «សេចក្តីសុខនេះមានតែបណ្តោះអាសន្ន—ដូចស្រមោលរហ័សរលាយរបស់ដើមតាលក្នុងរដូវរងា។ ដូច្នេះ ចូរធ្វើយញ្ញធំៗ; ចូររីករាយនឹងសេចក្តីសុខដែលសមនឹងអ្នក ហើយចូរធ្វើទានផងដែរ»

Verse 51

इतश्नतुर्दशे वर्षे महत्‌ प्राप्पस्पथ वैशसम्‌ | “यह राज्य तुमलोगोंके लिये शीतकालमें होनेवाली ताड़के पेड़की छायाके समान दो ही घड़ीतक सुख देनेवाला है। अब तुम बड़े-बड़े यज्ञ करो, मनमाने भोग भोगो और इच्छानुसार दान कर लो। आजसे चौदहवें वर्षमें तुम्हें बहुत बड़ी मार-काटका सामना करना पड़ेगा" || ५० ई || द्रोणस्य वचन श्रुत्वा धृतराष्ट्रोडब्रवीदिदम्‌,द्रोणाचार्यकी यह बात सुनकर धुृतराष्ट्रने कहा--

នៅឆ្នាំទីដប់បួនចាប់ពីថ្ងៃនេះ អ្នកទាំងឡាយនឹងប្រទះមហាវិបត្តិជាការសម្លាប់យ៉ាងធំ។ «រាជ្យនេះ» គាត់បាននិយាយ «សម្រាប់អ្នកទាំងឡាយ ដូចជាស្រមោលដើមតាលក្នុងរដូវរងា—ផ្តល់សុខតែពីរខណៈប៉ុណ្ណោះ។ ដូច្នេះ ខណៈដែលនៅអាចធ្វើបាន ចូរធ្វើយញ្ញធំៗ សោយសុខតាមចិត្តប្រាថ្នា ហើយចែកទានតាមចិត្ត។ ព្រោះនៅឆ្នាំទីដប់បួនចាប់ពីថ្ងៃនេះ សង្គ្រាមធំ និងសាហាវ នឹងមកប្រឈមមុខអ្នកទាំងឡាយ»។ ពេលស្តាប់ពាក្យរបស់ទ្រូណៈហើយ ធ្រិតរាស្ត្រាបានឆ្លើយតប។

Verse 52

सम्यगाह गुरु: क्षत्तरुपावर्तय पाण्डवान्‌ | यदि ते न निवर्तन्ते सत्कृता यान्तु पाण्डवा: | सशस्त्ररथपादाता भोगवन्तश्न पुत्रका:,“विदुर! गुरु द्रोणाचार्यने ठीक कहा है। तुम पाण्डवोंको लौटा लाओ। यदि वे न लौटें तो वे अस्त्र-शस्त्रोंसे युक्त रथियों और पैदल सेनाओंसे सुरक्षित और भोग-सामग्रीसे सम्पन्न हो सत्कारपूर्वक वनमें भ्रमणके लिये जाया; क्योंकि वे भी मेरे पुत्र ही हैं'

វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «គ្រូបាននិយាយត្រឹមត្រូវហើយ។ ឱ វិទុរ (ក្សត្ត្រ) ចូរនាំបណ្ឌវត្រឡប់មកវិញ។ បើពួកគេមិនត្រឡប់ទេ នោះសូមឲ្យបណ្ឌវចេញដំណើរដោយកិត្តិយស—មានរថយោធាអាវុធ និងទ័ពថ្មើរជើងការពារ ហើយមានសម្ភារៈសម្រាប់សោយសុខ—ព្រោះពួកគេក៏ជាកូនរបស់ខ្ញុំដែរ»។

Verse 79

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें द्रौपदीकुन्तीसंवादविषयक उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

ដូច្នេះ បានបញ្ចប់ជំពូកទី៧៩ នៃផ្នែក អនុទ្យូត ក្នុង សភាបរវ នៃ «ស្រីមហាភារត» ដែលពាក់ព័ន្ធនឹងសន្ទនារវាង ដ្រោបទី និង គុនទី។

Verse 80

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि विदुरधृतराष्ट्रद्रोणवाक्ये अशीतितमोड<ध्याय:

ដូច្នេះ បានបញ្ចប់ជំពូកទី៨០ នៃផ្នែក អនុទ្យូត ក្នុង សភាបរវ នៃ «ស្រីមហាភារត» ដែលគេស្គាល់ថាជាវចនាប្រសាសន៍រួមមាន វិទុរ ធ្រិតរាស្ត្រា និង ទ្រូណៈ។

Verse 146

चिकीर्षन्‌ कर्म शत्रुभ्यो बाहुद्रव्यानुरूपत: । इसीलिये वे अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए यात्रा करते हैं। राजन्‌! अपने बाहुबलरूपी वैभवपर उन्हें गर्व है। अतः वे अपनी दोनों भुजाएँ दिखाते हुए शत्रुओंसे बदला लेनेके लिये अपने बाहुबलके अनुरूप ही पराक्रम करना चाहते हैं

វិទុរបាននិយាយថា៖ «ដោយមានបំណងធ្វើការប្រឆាំងសត្រូវ ពួកគេចេញដំណើរតាមសមមាត្រនៃទ្រព្យ និងកម្លាំងដែលមាននៅក្នុងដៃទាំងពីរ។ ដូច្នេះ ពួកគេដើរទៅដោយមើលទៅកាន់ដៃធំមាំរបស់ខ្លួន។ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ពួកគេមានមោទនភាពលើសិរីរុងរឿងនៃកម្លាំងដៃ។ ហេតុនេះ ពួកគេបង្ហាញដៃទាំងពីរ ហើយចង់បង្ហាញវីរភាពឲ្យសមនឹងកម្លាំងរបស់ខ្លួន ដើម្បីសងសឹកចំពោះសត្រូវ»។