
Duryodhana-patana-anuśocana (The Fall of Duryodhana and the Contest of Restraint)
Upa-parva: Gadā-yuddha and Duryodhana-vadha Episode (Mace Duel Aftermath)
Saṃjaya reports that the Pāṇḍavas and Somakas react with exhilaration upon seeing Duryodhana felled, likened to a great tree brought down. Bhīmasena approaches the fallen Kaurava ruler and verbally frames the moment as retributive justice for earlier mockery and the sabhā humiliation connected with Draupadī; he performs a public gesture of dominance by placing his foot upon Duryodhana’s head and reiterates taunts about reversing prior derision. The narration then marks a moral dissonance: dharmically minded Somaka leaders do not approve of the humiliating act. Yudhiṣṭhira rebukes Bhīma, cautioning that crushing a fallen king’s head violates appropriate conduct, especially given kinship ties and the opponent’s already total devastation. Yudhiṣṭhira then turns to lamentation, interpreting the catastrophe as shaped by destiny while also attributing Duryodhana’s end to his own faults—greed, pride, and destructive choices that led to the deaths of friends, brothers, elders, and teachers. The chapter thus juxtaposes vengeance, public symbolism, and post-victory ethics, closing with Yudhiṣṭhira’s grief and moral accounting.
Chapter Arc: रणभूमि के कोलाहल के बीच अर्जुन जनार्दन से पूछता है—इन दो महावीरों के युद्ध में कौन श्रेष्ठ है, किसका गुण अधिक है—मानो शस्त्रों से पहले विवेक का निर्णय आवश्यक हो। → श्रीकृष्ण (वायुदेव-उपदेश की शैली में) दोनों की शिक्षा-समानता, पर भीम की प्रचण्ड बल-प्रधानता और धृतराष्ट्र-पुत्र के यत्न-कौशल का तुलनात्मक संकेत देते हैं; फिर मायावी उपायों का स्मरण कराते हैं—जैसे इन्द्र ने वृत्र का तेज माया से हर लिया था—और भीम को ‘मायामय पराक्रम’ धारण करने का संकेत मिलता है। → दोनों वृषभाक्ष, तरस्वी वीर बैलों-से भिड़ते हैं; घोर संघर्ष के साथ प्रकृति स्वयं विक्षुब्ध हो उठती है—आँधी-गर्जन, धूल-वर्षा, पृथ्वी का कम्पन, आकाश में यक्ष-राक्षस-पिशाचों का महानाद—और अंततः धृतराष्ट्र-पुत्र के धराशायी होते ही समस्त सेना काँप उठती है। → पुत्र के गिरते ही कौरव-पक्ष में भय और शोक की लहर दौड़ती है; अपशकुनों की श्रृंखला (रक्त-उफान, नदियों का उल्टा बहना) युद्ध के नैतिक-भाग्य-चक्र को और गाढ़ा करती है, जबकि पाण्डव-पाञ्चाल भी इन उत्पातों से मन-ही-मन उद्विग्न हो उठते हैं। → धृतराष्ट्र-पुत्र के पतन के बाद रण की दिशा किस ओर मुड़ेगी—और ये अपशकुन किस अगले महाविनाश का संकेत हैं—यह अनिश्चितता अगले अध्याय की देहरी पर छोड़ दी जाती है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ७२ श्लोक हैं।) अपन क्ाता छा 2 अष्टपञज्चाशत्तमो< ध्याय: श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत तथा अर्नके के संकेतके अनुसार भीमसेनका गदासे दुर्योधनकी जाँघें तोड़कर उसे धराशायी करना एवं भीषण उत्पातोंका प्रकट होना संजय उवाच समुद्रीर्ण ततो दृष्ट्वा संग्रामं कुरुमुख्ययो: । अथाब्रवीदर्जुनस्तु वासुदेवं॑ यशस्विनम्
サンジャヤは言った。「大王よ、クル族の双璧たる二人の勇士の戦いが、ますます激しく膨れ上がるのを見て、アルジュナは名高きヴァースデーヴァ(クリシュナ)に語りかけた。」
Verse 2
अनयोर्वीरियोर्युद्धे को ज्यायानू भवतो मतः । कस्य वा को गुणो भूयानेतद् वद जनार्दन,“जनार्दन! आपकी रायमें इन दोनों वीरोंमेंसे इस युद्धस्थलमें कौन बड़ा है अथवा किसमें कौन-सा गुण अधिक है? यह मुझे बताइये”
「ジャナールダナよ、この二人の勇士の戦いにおいて、あなたの御判断ではどちらが勝るのですか。あるいは、どちらにどの徳・長所がより強く備わっているのか。どうかお教えください。」
Verse 3
वायुदेव उवाच उपदेशो5नयोस्तुल्यो भीमस्तु बलवत्तर: । कृती यत्नपरस्त्वेष धार्तराष्ट्री वकोदरात्
ヴァースデーヴァは言った。「アルジュナよ、二人が受けた教えは同じである。だがビーマは純然たる力において勝る。されどこのドリタラーシュトラの子は、たゆまぬ鍛錬と意志ある努力において彼を凌ぐ。」
Verse 4
भीमसेनस्तु धर्मेण युद्धयमानो न जेष्यति । अन्यायेन तु युध्यन् वै हन्यादेव सुयोधनम्
ヴァースデーヴァは言った。「ビーマセーナがダルマの範囲を厳守して戦い続けるなら、勝利は得られぬ。だがその境を踏み越え—不義の策を用いて戦うなら—必ずやスヨーダナ(ドゥルヨーダナ)を打ち倒すであろう。」
Verse 5
मायया निर्जिता देवैरसुरा इति न: श्रुतम् । विरोचनस्तु शक्रेण मायया निर्जित: स वै,हमने सुना है कि देवताओंने पूर्वकालमें मायासे ही असुरोंपर विजय पायी थी और इन्द्रने मायासे ही विरोचनको परास्त किया था
ヴァースデーヴァは言った。「古の時、神々がマーヤー(戦略的な幻惑)によってアスラを打ち破ったと、われらは聞いている。同じくシャクラ(インドラ)も、まことにマーヤーによってヴィローチャナを屈服させたのだ。」
Verse 6
मायया चाक्षिपत् तेजो वृत्रस्य बलसूदन: । तस्मान्मायामयं भीम आतिष्ठतु पराक्रमम्,बलसूदन इन्द्रने मायासे वृत्रासुरके तेजको नष्ट कर दिया था, इसलिये भीमसेन भी यहाँ मायामय पराक्रमका ही आश्रय लें
風神ヴァーユは言った。「自らのマーヤーによって、バラを討つ者インドラは、ヴリトラの燃えさかる威力を打ち落とし、無に帰した。ゆえに、ビーマよ、ここでもまたマーヤーより生まれた勇の策に身を寄せよ――幻をもって幻に対し、力をただの蛮力ではなく、見極めの智慧に従わせるのだ。」
Verse 7
प्रतिज्ञातं च भीमेन द्यूतकाले धनंजय । ऊरू भेत्स्यामि ते संख्ये गदयेति सुयोधनम्
ヴァーユデーヴァは言った。「ダナンジャヤ(アルジュナ)よ、賽の戯れの折、ビーマはスヨーダナ(ドゥルヨーダナ)にこう誓った。『戦場にて、我が棍棒でお前の両腿を砕く』。」
Verse 8
सो<यं प्रतिज्ञां तां चापि पालयत्वरिकर्षण: । मायाविन तु राजानं माययैव निकृन्ततु
ヴァーユは言った。「この敵を屈する英雄は、まさにその誓いを果たすがよい。だが、欺きによって戦う王は、欺きによってのみ断ち滅ぼされるべきだ。」
Verse 9
अतः शत्रुसूदन भीमसेन अपनी उस प्रतिज्ञाका पालन करें और मायावी राजा दुर्योधनको मायासे ही नष्ट कर डालें ।।
ヴァーユデーヴァは言った。「ゆえに、敵を討つビーマセーナよ、汝の誓いを果たし、狡猾なる王ドゥルヨーダナを狡猾さそのもので滅ぼせ。もし彼が力に頼り、厳格な公正に従って打つならば、王ユディシュティラは再び、甚だ不利で危うい境遇へ追い込まれるであろう。」
Verse 10
पुनरेव तु वक्ष्यामि पाण्डवेय निबोध मे । धर्मराजापराधेन भयं नः पुनरागतम्,पाण्डुनन्दन! मैं पुन: यह बात कहे देता हूँ, तुम उसे ध्यान देकर सुनो। धर्मराजके अपराधसे हमलोगोंपर फिर भय आ पहुँचा है
「もう一度言おう――パーンドゥの末裔よ、我が言葉をよく聞け。ダルマラージャ(ユディシュティラ)の過ちによって、恐れが再び我らの上に戻って来たのだ、パーンドゥの子よ。」
Verse 11
कृत्वा हि सुमहत् कर्म हत्वा भीष्ममुखान् कुरून् | जय: प्राप्तो यशः प्राग्रयं वैरं च प्रतियातितम्
まことに、きわめて大いなる業を成し遂げ——ビーマを先頭とするクル族を討ち果たして——勝利は得られ、至高の名声は勝ち取られ、怨讐もまた余すところなく報いられた。
Verse 12
अबुद्धिरेषा महती धर्मराजस्य पाण्डव
ヴァーユは言った。「これは法王たるパーンダヴァ、ダルマラージャの、はなはだしい不分別である。」
Verse 13
सुयोधन: कृती वीर एकायनगतस्तथा
スヨーダナ(ドゥルヨーダナ)は戦の術を知る有能な勇士であり、ただ一つの決意に固く踏みとどまっている。このことについて、ウシャナス(シュクラーチャーリヤ)が詠んだという古のシュローカが伝わっている。政道の学(ニーティ・シャーストラ)の精髄を含むその偈を、今わたしが誦する—わたしの言葉として聞け。
Verse 14
अपि चोशनसा गीत: श्रूयते5यं पुरातन: । श्लोकस्तत्त्वार्थसहितस्तन्मे निगदत: शृणु
ヴァーユは言った。「さらに、ウシャナス(シュクラーチャーリヤ)が詠んだという古の偈が伝わっている。真の道理の要を備えたシュローカである。わたしが誦するのを聞け—わたしの言葉としてそれを聞け。」
Verse 15
पुनरावर्तमानानां भग्नानां जीवितैषिणाम् । भेतव्यमरिशेषाणामेकायनगता हिते
ヴァーユは言った。「用心すべきは、打ち破られ命惜しさに逃げ去りながら、なお再び戦へと戻って来る敵である。かかる生き残りの仇敵は、一つの道に決し、揺るがぬ決意に到っている。ひとたび一途を選べば、もはや死を前にしてさえ怯まぬのだ。」
Verse 16
साहसोत्पतितानां च निराशानां च जीविते । न शक्यमग्रतः स्थातुं शक्रेणापि धनंजय,धनंजय! जो जीवनकी आशा छोड़कर साहसपूर्वक युद्धमें कूद पड़े हों, उनके सामने इन्द्र भी नहीं ठहर सकते
ヴァーユは言った。「おお、ダナンジャヤよ。ひたすらな勇猛によって戦場へ躍り込み、もはや生への望みを捨てた者たちの前に立ちはだかることは不可能だ――インドラでさえ、彼らに対して踏みとどまれまい。」
Verse 17
सुयोधनमिमं भग्नं हतसैन्यं हृदं गतम् । पराजित वनप्रेप्सुं निराशं राज्यलम्भने
ヴァーユは言った。「このスヨーダナは砕け散った――軍は滅び、気魄は胸の奥へ沈み込んだ。敗れて森へ逃れんとし、王国を得る望みも絶たれ、内より崩れ落ちている。」
Verse 18
अपि नो निर्जितं राज्यं न हरेत सुयोधन:
ヴァーユは言った。「われらがすでに勝ち得た王国を、スヨーダナに再び奪わせてはならぬ。ドゥルヨーダナが征し得たものを取り返すことのないように。十三年のあいだ、彼は棍棒戦において絶え間ない労苦と鍛錬を積んできた。見よ――ビーマセーナを討たんとの欲に駆られ、彼はあちらこちらへ、さらには上へと身を運びつつ彷徨っている。」
Verse 19
यस्त्रयोदशवर्षाणि गदया कृतनिश्रम: । चरत्यूर्थध्व च तिर्यक्ू च भीमसेनजिघांसया
ヴァーユは言った。「十三年のあいだ、彼は棍棒をもって絶え間なく労し、鍛錬を積んだ。いまビーマセーナを討たんとの欲に駆られ、上へ、また横へと身を運びつつ彷徨い、隙を探っている。」
Verse 20
एनं चेन्न महाबाहुरन्यायेन हनिष्यति । एष व: कौरवो राजा धार्तराष्ट्रो भविष्यति,यदि महाबाहु भीमसेन इसे अन्यायपूर्वक नहीं मारेंगे तो यह धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन ही आपका तथा समस्त कुरुकुलका राजा होगा
「もしあの剛腕の者(ビーマセーナ)が、不義の手段によって彼を討たぬなら、持国の子ドゥルヨーダナこそが汝らの王となり、クル族全体の王となるであろう。」
Verse 21
धनंजयस्तु श्रुत्वैतत् केशवस्य महात्मन: । प्रेक्षतो भीमसेनस्य सव्यमूरूमताडयत्,महात्मा भगवान् केशवका यह वचन सुनकर अर्जुनने भीमसेनके देखते हुए अपनी बायीं जाँघको ठोंका
偉大なる魂をもつケーシャヴァの言葉を聞くや、ダナンジャヤ(アルジュナ)は、ビーマセーナの見守る前で自らの左腿を強く打った――決意と挑発を示す断固たる所作であった。
Verse 22
गृह संज्ञां ततो भीमो गदया व्यचरद् रणे । मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च,इससे संकेत पाकर भीमसेन रणभूमिमें गदाद्वारा यमक तथा अन्य प्रकारके विचित्र मण्डल दिखाते हुए विचरने लगे
そのときビーマは、取り決めの合図を受けて戦場を巡り、棍棒を振るって妙なる円環や二重の型(ヤマカ)など、さまざまな技を繰り出した。
Verse 23
दक्षिणं मण्डलं सव्यं गोमूत्रकम थापि च । व्यचरत् पाण्डवो राजन्नरिं सम्मोहयज्निव,राजन! पाण्डुपुत्र भीमसेन आपके पुत्रको मोहित करते हुए-से दक्षिण, वाम और गोमूत्रक मण्डलसे विचरने लगे
風神は言った。「王よ、パーンダヴァのビーマセーナは、敵を惑わすかのように、右回りの輪、左回りの輪、さらに『ゴームートラカ』と呼ばれる型をも用い、回り込みと虚実で汝の子を戦場にて翻弄した。」
Verse 24
तथैव तव पुत्रोडपि गदामार्गविशारद: । व्यचरल्लघु चित्र च भीमसेनजिघांसया,इसी प्रकार गदायुद्धकी प्रणालीका विशेषज्ञ आपका पुत्र भी भीमसेनके वधकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक विचित्र पैंतरे देता हुआ विचरने लगा
同じく汝の子も、棍棒戦の法に通じた者として、ビーマセーナを討たんとの思いに駆られ、素早く身を運びつつ多彩で巧みな手立てを示し始めた。
Verse 25
आधुन्वन्तो गदे घोरे चन्दनागरुरूषिते । वैरस्यान्तं परीप्सन्तौ रणे क्रुद्धाविवान्तकौ
白檀と沈香を塗った恐るべき棍棒を振り回し、怨讐の終わりを求める二人の勇士は戦場でそれをうならせ、怒れる死そのもののごとく見えた。
Verse 26
अन्योन्यं तौ जिघांसन्तौ प्रवीरौ पुरुषर्षभौ । युयुधाते गरुत्मन्तौ यथा नागामिषैषिणौ
その二人の勇士、まことに人中の雄は、互いに殺さんとの思いを抱き、あたかも蛇の肉を求めて争う二羽のガルダのごとく戦い合った。かくして、比類なき英雄ビーマセーナとドゥルヨーダナは、相手の命を奪わんと激しく組み合った。
Verse 27
मण्डलानि विचित्राणि चरतोर्नृपभीमयो: । गदासम्पातजास्तत्र प्रजज्ञु: पावकार्चिष:,विचित्र मण्डलों (पैंतरों)-से विचरते हुए राजा दुर्योधन और भीमसेनकी गदाओंके टकरानेसे वहाँ आगकी लपटें प्रकट होने लगीं
王ドゥルヨーダナとビーマセーナが妙なる輪の歩みで巡り合うと、そのガダーの激突から、戦場には火の舌がほとばしり出た。
Verse 28
सम॑ प्रहरतोस्तत्र शूरयोर्बलिनोर्मथे । क्षुब्धयोर्वायुना राजन् द्वयोरिव समुद्रयो:
王よ、その激しい組み討ちのただ中で、剛勇の二人は等しき力で打ち合い、ガダーの衝突は雷鳴のごとく轟いた。風にかき乱された二つの大海が互いにぶつかり合うかのようであった。
Verse 29
तयो: प्रहरतोस्तुल्यं मत्तकुड्जरयोरिव । गदानिर्घातसंह्ाद: प्रहाराणामजायत
王よ、二人が酔える象の一対のごとく等しき力で打ち合うと、打撃の応酬から生じたガダーの轟きは、金剛の雷の咆哮のように鳴り響いた。
Verse 30
तस्मिंस्तदा सम्प्रहारे दारुणे संकुले भृशम् । उभावपि परिश्रान्तौ युध्यमानावरिंदमौ,उस समय उस अत्यन्त भयंकर घमासान युद्धमें शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर परस्पर युद्ध करते हुए बहुत थक गये
その時、きわめて凄惨で入り乱れた激戦のただ中で、敵を屈する二人の勇者はなおも戦い続けたが、双方ともひどく疲れ果てていた。
Verse 31
तौ मुहूर्त समाश्वस्य पुनरेव परंतप । अभ्यहारयतां क्रुद्धौ प्रगृह्ा महती गदे
After pausing for a short while to regain their breath, the two combatants—still inflamed with anger—once again seized their massive maces and began striking at each other. The scene underscores how, in the heat of war, wrath can repeatedly override restraint, even after a momentary return to composure.
Verse 32
तयो: समभवद् युद्ध घोररूपमसंवृतम् । गदानिपातेै राजेन्द्र तक्षतोर्वै परस्परम्,राजेन्द्र! गदाकी चोटसे एक-दूसरेको घायल करते हुए उन दोनोंमें खुले तौरपर घोर युद्ध हो रहा था
Between those two there arose an openly fought, fearsome battle. O king, by the crashing blows of their maces they struck and wounded one another without restraint, displaying the grim candor of war where valor and violence stand face to face.
Verse 33
समरे प्रद्रुती तो तु वृषभाक्षौ तरस्विनौ । अन्योन्यं जष्नतुर्वीरी पड़कस्थौ महिषाविव
Vāyu said: In the thick of battle, those two mighty, bull-eyed warriors rushed at one another and struck back and forth—like two buffaloes standing in mud, locking in combat. The image underscores the raw, bodily ferocity of war, where valor expresses itself through direct confrontation and unyielding endurance.
Verse 34
जर्जरीकृतसर्वाड्री रुधिरेणाभिसम्प्लुतौ | ददृशाते हिमवति पुष्पिताविव किंशुकौ
Their bodies were shattered in every limb by the blows of the mace, and both were drenched in blood. In that condition, upon the Himālaya they appeared like two kiṃśuka (palāśa) trees in full bloom—vivid, striking, and terrible in beauty—an image that underscores how war can turn heroic prowess into a spectacle of suffering.
Verse 35
दुर्योधनस्तु पार्थेन विवरे सम्प्रदर्शिते ईषदुन्मिषमाणस्तु सहसा प्रससार ह,जब अर्जुनने छिद्रकी ओर संकेत किया, तब कनखियोंसे उसे देखकर दुर्योधन सहसा भीमसेनकी ओर बढ़ा
When Pārtha (Arjuna) pointed out the opening, Duryodhana, glancing toward it with half-opened eyes, suddenly sprang forward—driven by the urgency of battle and the will to seize advantage in the duel.
Verse 36
तमभ्याशगत प्राज्ञो रणे प्रेक्ष्य वृकोदर: । अवाक्षिपद् गदां तस्मिन् वेगेन महता बली,रणभूमिमें उसे निकट आया देख बुद्धिमान् एवं बलवान् भीमने उसपर बड़े वेगसे गदा चलायी
戦場で敵が間近に迫るのを見て、智にして剛力のヴリコーダラ(ビーマ)は、凄まじい勢いでその相手めがけて棍棒(ガダー)を投げ放った。
Verse 37
आक्षिपन्तं तु त॑ दृष्टवा पुत्रस्तव विशाम्पते । अवासर्पत्तत: स्थानात् सा मोघा न्न्यपतद् भुवि,प्रजानाथ! उन्हें गदा चलाते देख आपका पुत्र सहसा उस स्थानसे हट गया और वह गदा व्यर्थ होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी
棍棒が投げ放たれるのを見て、民の主よ、あなたの御子はたちまちその場をすり抜けて退き、棍棒はむなしく地に落ちた。
Verse 38
मोक्षयित्वा प्रहारं त॑ सुतस्तव सुसम्भ्रमात् भीमसेनं च गदया प्राहरत् कुरुसत्तम,कुरुश्रेष्ठ! उस प्रहारसे अपनेको बचाकर आपके पुत्रने भीमसेनपर बड़े वेगसे गदाद्वारा आघात किया
クル族の最勝者よ、その一撃を素早い機転でかわすや、あなたの御子は棍棒でビーマセーナを激しく打ち据えた。
Verse 39
तस्य विस्यन्दमानेन रुधिरेणामितौजस: । प्रहारगुरुपाताच्च मूच्छेंव समजायत,उसकी चोटसे अमिततेजस्वी भीमके शरीरसे रक्तकी धारा बह चली। साथ ही उस प्रहारके गहरे आघातसे उन्हें मूर्च्छा-सी आ गयी
その無比の剛勇者が打たれると、身体から血が流れ出した。さらにその一撃の重く砕く力により、彼は気を失いかけ、まるで卒倒したかのようになった。
Verse 40
दुर्योधनो न तं वेद पीडितं पाण्डवं रणे । धारयामास भीमो5पि शरीरमतिपीडितम्
その時、ドゥルヨーダナは、戦場でパーンドゥの子ビーマが深く痛手を負っていることに気づかなかった。身を裂くほどの痛みに苛まれながらも、ビーマはなお自らを支え、崩れなかった。
Verse 41
अमन्यत स्थित होन॑ प्रहरिष्यन्तमाहवे । अतो न प्राहरत् तस्मै पुनरेव तवात्मज:
風神ヴァーユは言った。「彼は『私はここに立っている。この戦いでビーマセーナが今にも私を打とうとしている』と思った。ゆえに、ただ身を守ることに心を奪われ、汝の子は彼を再び打たなかった。」
Verse 42
ततो मुहूर्तमाश्चस्य दुर्योधनमुपस्थितम् । वेगेनाभ्यपतद् राजन् भीमसेन: प्रतापवान्
それから、目の前に立つドゥルヨーダナに一瞬驚いたのち、剛勇のビーマセーナは—武威みなぎり—抗しがたい速さで彼へと突進した、王よ。
Verse 43
राजन! तदनन्तर दो घड़ी सुस्ताकर प्रतापी भीमसेनने निकट आये हुए दुर्योधनपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ।।
計り知れぬ力のビーマが、燃え立つ怒りをまとって突進してくるのを見て、ドゥルヨーダナは、バーラタ族の雄よ、その迫る一撃を空しくせんと決した。戦のただ中で、打撃が落ちる前にそれを無効にしようとし、力には計略ある防御で応じたのである。
Verse 44
अवस्थाने मतिं कृत्वा पुत्रस्तव महामना: । इयेषोत्पतितुं राजन् छलयिष्यन् वृकोदरम्
風神ヴァーユは言った。「王よ、汝の高邁なる子は、まずその場に堅く踏みとどまることを決めた。ついで、ヴリコーダラ(ビーマ)を欺かんとして、跳び上がり、身をかわして遠ざかろうとした。」
Verse 45
अबुद्धयद् भीमसेनस्तु राज्ञस्तस्य चिकीर्षितम् । अथास्य समभिद्रुत्य समुत्क्तुश्य च सिंहवत्
ビーマセーナは、王ドゥルヨーダナの企てを見抜いた。そこで真っすぐに突進し、獅子のごとく咆哮して、巨大な棍棒(ガダー)を大いなる力でその腿へと打ち下ろした。
Verse 46
सृत्या वज्चयतो राजन पुनरेवोत्पतिष्यत: । ऊरुभ्यां प्राहिणोद् राजन् गदां वेगेन पाण्डव:
風神ヴァーユは言った。「王よ、彼がフェイントで欺こうとし、再び跳び上がろうとしたその刹那、パーンダヴァは大いなる力をもって、その腿めがけて棍棒を投げ放った。」一騎討ちの苛烈な武の掟において、この瞬間は決定的な転回である。ビーマはドゥルヨーダナの回避の策を読み取り、狙い澄ました圧倒的な一撃で応じて勝負を終わらせる—しかし同時に、腰より下を狙うことの是非という問いも残す。
Verse 47
सा वज्निष्पेषसमा प्रहिता भीमकर्मणा । ऊरू दुर्योधनस्याथ बभज्ज प्रियदर्शनी
恐るべき業をなすビーマが投げ放ったその棍棒は、雷霆のごとく落ちた。そして、見目麗しいとさえ言われたドゥルヨーダナの腿を打ち砕いた。この一瞬は、戦の苛烈な理のもとでは、武人の身体において称賛されるものすら、驕りと対抗心、そして冷厳に展開する宿命の帰結にさらされることを示している。
Verse 48
स पपात नरव्याप्रो वसुधामनुनादयन् । भग्नोरुर्भीमसेनेन पुत्रस्तव महीपते,पृथ्वीनाथ! इस प्रकार जब भीमसेनने उसकी जाँघें तोड़ डालीं, तब आपका पुत्र पुरुषसिंह दुर्योधन पृथ्वीको प्रतिध्वनित करता हुआ गिर पड़ा
そのとき、人中の虎—汝の子ドゥルヨーダナ—は大地を轟かせて地に倒れた。ビーマセーナに腿を砕かれたゆえである。ゆえに、王よ、地の主よ、彼は崩れ落ちた—驕りとアダルマは、たとえ王権に支えられていようとも、戦場において定められた終末に至るという像である。
Verse 49
ववुर्वाता: सनिर्घाता: पांशुवर्ष पपात च | चचाल पृथिवी चापि सवृक्षक्षुपपर्वता
風神ヴァーユは言った。「雷鳴の轟きとともに烈風が起こり、塵の雨が降った。大地さえも、樹木・灌木・山々を伴って揺れ動いた。」戦の道徳的な空気の中で、これらの荒々しい凶兆は秩序の断裂を告げる。自然そのものが身をすくめて退くかのように、アダルマと戦場の破局的な奔流を映し出している。
Verse 50
महास्वना पुनर्दीप्ता सनिर्घाता भयंकरी
「それは再び燃え立った—大いなる轟音をあげ、雷鳴の破裂を伴い、見る者を戦慄させるほどに。」戦記の文脈において、この一句は不吉な力の再燃を描き出し、破壊の威力がいっそう強まって再来するとき、恐怖と畏怖が心を圧倒しうることを示唆する。
Verse 51
पपात चोल्का महती पतिते पृथिवीपतौ । पृथ्वीपति दुर्योधनके गिर जानेपर आकाशसे पुनः महान् शब्द और बिजलीकी कड़कके साथ प्रज्वलित, भयंकर एवं विशाल उल्का भूमिपर गिरी || ५० $ ।।
大地の主が倒れたとき、巨大な流星が烈火のごとく燃えさかり、凄まじい轟きとともに地上へ墜ちた――それは天より下った凶兆であり、力によってのみ支えられていた王権と道義の秩序の崩壊を告げるものであった。この前兆は、アダルマ(非正法)に駆られた権力がついには破滅に至ること、そして不義の戦の報いを自然そのものが証言しているかのようであることを示している。
Verse 52
यक्षाणां राक्षसानां च पिशाचानां तथैव च
「ヤクシャ(Yakṣa)たち、ラークシャサ(Rākṣasa)たち、そして同じくピシャーチャ(Piśāca)たちについても……」(ヴァーユは言葉を継ぎ、守護・暴虐・憑きまといと結び付けられがちな非人の諸類を呼び挙げて、自らの言明が人間の営みのみにとどまらず、恐るべき超自然の秩序にまで及ぶことを示している。)
Verse 53
तेन शब्देन घोरेण मृगाणामथ पक्षिणाम्
その凄惨な響きに、獣も鳥もおびえ騒いだ――自然に走った不吉な乱れは、戦のもたらす道義の動揺を映し、恐怖があらゆる命あるものへ広がってゆくことを告げていた。
Verse 54
जज्ञे घोरतर: शब्दो बहूनां सर्वतोदिशम् | उस घोर शब्दके साथ बहुत-से पशुओं और पक्षियों-कती भयानक आवाज भी सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठी ।। ५३ ह ।। ये तत्र वाजिन: शेषा गजाश्न मनुजै: सह
ヴァーユ神は言った。「群れの中から、さらにいっそう凄まじい咆哮が起こり、四方八方へと広がった。そしてそこでは、残された馬と象—人々とともに—その恐るべき騒乱のただ中に巻き込まれていた。」
Verse 55
मुमुचुस्ते महानादं तव पुत्रे निपातिते । वहाँ जो घोड़े, हाथी और मनुष्य शेष रह गये थे, वे सभी आपके पुत्रके मारे जानेपर महान् कोलाहल करने लगे ।। भेरीशड्खमृदज्ञानाम भवच्च स्वनो महान्
あなたの子が討ち倒されるや、残っていた者たち—馬も象も人も—みな一斉に大いなる喧噪をあげた。戦場は壺太鼓の轟き、法螺貝(śaṅkha)の響き、諸鼓の打ち鳴らしで満ち、残兵の驚愕と悲嘆を語った。戦の暴威は、最も卓越した者すら呑み込んでいったのである。
Verse 56
बहुपादैर्बहुभुजै: कबन्धैर्घोरदर्शनै:
風神ヴァーユは言った。「(戦場は)首なき胴体で満ち—見るも恐ろしい—多くの足と多くの腕を備えていた。」
Verse 57
ध्वजवन्तो<स्त्रवन्तश्न शस्त्रवन्तस्तथैव च
「彼らは旗印を掲げ、飛び道具を備え、さらに諸々の武器をも帯びていた。」
Verse 58
हृदा: कूपाश्व रुधिरमुद्वेमुर्नूपसत्तम,इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि दुर्योधनवधेडष्टपञ्चाशत्तमो5 ध्याय: ।।
「おお、王の中の最上よ、(戦士たちの)心も、井戸までもが血で溢れ出た。」かくして『シュリー・マハーバーラタ』の『シャリヤ・パルヴァ』—とりわけ『ガダー・パルヴァ』における、ドゥルヨーダナ討伐を語る第五十八章は終わる。
Verse 59
पुल्लिज्जा इव नार्यस्तु स्त्रीलिड्रा पुरुषाभवन्
ヴァーユは言った。「女たちは、まるで異様な狂気に取り憑かれたかのように、男のごとくなり—常の女の慎みを脱ぎ捨て、剛胆で強圧な気配を帯びた。」
Verse 60
दुर्योधने तदा राजन् पतिते तनये तव । राजन! आपके पुत्र दुर्योधनके धराशायी होनेपर स्त्रियोंमें पुरुषत्व और पुरुषोंमें स्त्रीत्वके सूचक लक्षण प्रकट होने लगे ।।
王よ、そのとき汝の子ドゥルヨーダナが倒れ伏すや、驚くべきしかも凶なる兆しが現れ始めた—女に男らしさが起こり、男に女らしさの徴が現れたかのように。これらの異様な前兆を見て、パンチャーラの人々はパーンダヴァとともに、事の成り行きが恐るべき方へ転じたのを悟った。
Verse 61
ययुर्देवा यथाकामं गन्धर्वाप्सरसस्तथा
かくして神々は望むままに去り、同じくガンダルヴァとアプサラスもそれぞれの道へと立ち去った。
Verse 62
कथयन्तो<द्धुतं युद्ध सुतयोस्तव भारत । भारत! तदनन्तर देवता, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह आपके दोनों पुत्रोंके अद्भुत युद्धकी चर्चा करते हुए अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ।।
おおバーラタよ、汝の二人の子の驚くべき戦いを語り終えると、神々とガンダルヴァ、アプサラスの群れは望む住処へと去っていった。同じく王よ、成就者シッダたちと風を駆けるチャーラナたちも、あの獅子のごとき二人の勇士を讃えつつ、来たときのままに帰っていった。
Verse 113
तदेवं विजय: प्राप्त: पुन: संशयित: कृत: । महान् प्रयास करके भीष्म आदि कौरवोंको मारकर विजय एवं श्रेष्ठ यशकी प्राप्ति की गयी और वैरका पूरा-पूरा बदला चुकाया गया था। इस प्रकार जो विजय प्राप्त हुई थी
ヴァーユは言った。「かくして勝利は確かに得られていた。だがそれが再び疑いの中へ投げ戻されたのだ。甚大な労苦の末—ビーシュマをはじめとするクル族の勇将らを討ち果たして—勝利と至高の名声を手にし、怨讐も余すところなく報いたというのに、その苦労して得た凱歌が、いままた不確かなものとされた。」
Verse 126
यदेकविजये युद्ध पणितं घोरमीदृशम् । पाण्डुनन्दन! एककी ही हार-जीतसे सबकी हार-जीतकी शर्त लगाकर जो इन्होंने इस भयंकर युद्धको जूएका दाँव बना डाला, यह धर्मराजकी बड़ी भारी नासमझी है
ヴァーユは言った。「おおパーンドゥの子よ! ただ一度の勝利に、かくも凄惨な戦を賭けるとは—万人の勝敗を一投に委ね、この恐るべき戦争を賭博の賭け金のようにしてしまうとは—これはダルマラージャの重大な愚行である。」
Verse 173
को न्वेष संयुगे प्राज्ञ: पुनर्दन्द्धे समाह्नयेत् । इस दुर्योधनकी सेना मारी गयी थी। यह परास्त हो गया था और अब राज्य पानेसे निराश हो वनमें चला जाना चाहता था; इसीलिये भागकर पोखरेमें छिपा था
ヴァーユは言った。「賢き者であれば、すでに打ち砕かれた敵を、戦場で再び決闘に呼び出すだろうか。ドゥルヨーダナの軍は討ち滅ぼされ、彼は敗れ、王国奪還の望みを失って森へ退こうとしていた。ゆえに逃げ、池に身を潜めたのだ。そのように折れ、望みなき敵を、いったい誰が戦場で一騎討ちに招くというのか。」
Verse 493
तस्मिन् निपतिते वीरे पत्यौ सर्वमहीक्षिताम् । फिर तो समस्त भूपालोंके स्वामी वीर राजा दुर्योधनके धराशायी होनेपर वहाँ बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ प्रचण्ड हवा चलने लगी
その勇猛なる王――地上の諸王の主――が地に倒れ伏したとき、自然そのものが凶兆のうねりをもって応えた。雷は稲妻の破裂のごとく轟き、烈風が吹き荒れ、塵は雨のように降り、樹木・森・山々とともに大地全体が震えた。ここに描かれるドゥルヨーダナの没落は、単なる軍事上の出来事ではなく、アダルマに駆られた野望を担った主権者の崩壊に際して宇宙が動揺する、道義的重みを帯びた戦の転機である。
Verse 513
ववर्ष मघवांस्तत्र तव पुत्रे निपातिते । भरतनन्दन! आपके पुत्रके धराशायी हो जानेपर इन्द्रने वहाँ रक्त और धूलिकी वर्षा की
バラタの子よ。汝の子が討ち倒され、そこに横たわったとき、マガヴァーン(インドラ)はその地に異様な雨を降らせた――血と塵の雨である。この凶兆は、武人の没落が私的な悲嘆にとどまらず、戦の道義的動揺のただ中で宇宙が示す徴であることを告げる。
Verse 523
अन्तरिक्षे महानाद: श्रूयते भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ उस समय आकाशमें यक्षों, राक्षमों तथा पिशाचोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा
風神は言った。「バラタ族の雄牛よ、中空に大いなる轟きが聞こえる。」そのとき天は激しい騒擾に満ち、ヤクシャ、ラークシャサ、ピシャーチャらの喧噪が鳴り渡った。これは凶兆であり、戦場をめぐる道義の秩序が揺らぎ、目に見えぬ力が展開する暴虐に応じていることを示していた。
Verse 553
अन्तर्भूमिगतश्वैव तव पुत्रे निपातिते । राजन! जब आपका पुत्र मार गिराया गया, उस समय इस भूतलपर भेरी, शंखों और मृदंगोंका गम्भीर घोष होने लगा
風神は言った。「王よ、汝の子が討たれて地に倒れたとき、地上には重々しく響き渡る喧声が起こった――ベーリーの太鼓、シャンク(法螺貝)、ムリダンガが一斉に鳴り響いたのだ。その瞬間は武人の死にとどまらず、戦の陰惨な儀礼をも刻む。楽器は勝利を告げるが、ダルマは血と命の代価によって試される。」
Verse 563
नृत्यद्धिर्भयदैर्व्याप्ता दिशस्तत्रा भवन् नृप । नरेश्वर! वहाँ सम्पूर्ण दिशाओंमें नाचते हुए अनेक पैर और अनेक बाँहवाले घोर एवं भयंकर कबन्ध व्याप्त हो रहे थे
風神は言った。「王よ、その地では四方が恐怖を呼ぶ光景に満ちた。人の主よ、あらゆる方角に、凄惨でおぞましいカバンダ――首なき胴――が広がり、踊るかのように見え、多くの足と多くの腕を備えて、そこかしこに満ちていた。」
Verse 576
प्राकम्पन्त ततो राजंस्तव पुत्रे निपातिते । राजन! आपके पुत्रके धराशायी हो जानेपर वहाँ अस्त्र-शस्त्र और ध्वजावाले सभी वीर काँपने लगे
王よ、汝の子が討ち倒されて地に伏したとき、そこにいた武器と旗印を携える勇士たちは震えはじめた。
Verse 583
नद्यश्न सुमहावेगा: प्रतिस्रोतोवहा भवन् । नृपश्रेष्ठी तालाबों और कूपोंमें रक्तका उफान आने लगा और महान् वेगशालिनी नदियाँ उलटी अपने उद्गमकी ओर बहने लगीं
王の中の王よ、かつて激しく奔流していた河は自らの流れに逆らい、源へと引き返して流れた。さらに池や井戸には血が湧き上がり、波立った。
Verse 603
आविग्नमनस: सर्वे बभूवुर्भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ) उन अद्भुत उत्पातोंको देखकर पाण्डवोंसहित समस्त पाञ्चाल मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे
バーラタ族の雄牛よ、その驚くべき凶兆を見て、パーンダヴァらとともにパンチャーラの者たちは皆、胸中ひどく乱れ、深い不安に沈んだ。
Whether a rightful victory permits public humiliation of a defeated adversary; the narrative presents Bhīma’s retaliatory impulse and Yudhiṣṭhira’s insistence that dharma constrains conduct even at the moment of triumph.
Victory does not nullify ethical limits: restraint, respect for kingship and kinship, and awareness of the opponent’s already-complete ruin are presented as stabilizing virtues that prevent moral degradation after success.
No explicit phalaśruti appears here; instead, the chapter functions as ethical meta-commentary through narrative contrast—public vengeance versus principled restraint—and through Yudhiṣṭhira’s reflective attribution of suffering to character faults and consequential action.
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