Adhyaya 61
Vana ParvaAdhyaya 6138 Verses

Adhyaya 61

दमयन्त्याः अरण्यविहारः — Damayantī’s Passage through the Wilderness

Upa-parva: Nalopākhyāna (The Narrative of Nala and Damayantī)

Bṛhadaśva describes Damayantī after killing a hunter: she proceeds alone through a fearsome, empty forest filled with predators, thieves, and varied flora and terrain. Overwhelmed by separation, she laments and repeatedly addresses Nala by recalling his assurances and the ethical weight of truth. She petitions an approaching ‘lord of the forest’ (a fierce beast) for knowledge of Nala and then turns to a prominent mountain, offering reverent praise and self-identification (as Bhīma’s daughter and Nala’s wife) while asking whether Nala has been seen. She reaches an ascetic hermitage populated by disciplined sages; they initially wonder if she is a deity, and she clarifies her human identity and marital crisis. The sages, through ascetic insight, predict an auspicious outcome: she will soon see Nala restored and ruling. When the hermitage and sages vanish, she questions whether it was dreamlike or extraordinary providence. Continuing, she addresses an aśoka tree as a symbolic agent of grief-removal. Finally, she encounters a large merchant caravan crossing a river; her disheveled appearance provokes fear, ridicule, and pity. The caravan questions her identity (deity/yakṣī/rākṣasī), and she asserts her human royal status, seeking news of Nala. The caravan leader, Śuci, states he has not seen Nala and identifies their destination as the land of the Cedi king Subāhu, framing the next movement of the episode.

Chapter Arc: पुष्कर राज्य-हरण के बाद हँसते हुए नल को फिर द्यूत के लिए उकसाता है—और दाँव अब धन-धान्य नहीं, स्वयं दमयन्ती तक पहुँच जाता है। → नल पर कलि-प्रभाव और पराजय का बोझ बढ़ता जाता है; वन-प्रस्थान में दम्पति भूख, थकान और अपमान झेलते हैं। मार्ग में स्वर्ण-पंखों वाले पक्षी दिखते हैं; नल उन्हें पकड़कर भोजन की आशा करता है। → पक्षी ‘अक्ष’ (जुए के पासे) रूप धारण कर नल के वस्त्र छीन लेते हैं और कहते हैं कि वे उसके वस्त्र हरने आए थे—नल नग्न, दीन और पूर्णतः असहाय खड़ा रह जाता है। → दमयन्ती नल को धैर्य देती है और विदर्भ की ओर सुरक्षित मार्गों का संकेत करती है; नल भी उसे त्यागने की इच्छा न होने की बात कहकर आश्वस्त करता है, पर परिस्थितियाँ उन्हें अलगाव की ओर धकेलती हैं। → दमयन्ती को विदर्भ-मार्ग पर भेजने की योजना बनती है—पर क्या नल साथ रह पाएगा, या कलि-ग्रस्त विवेक उन्हें अलग कर देगा?

Shlokas

Verse 1

हम () हि २ 7 एकषेष्टितमो< ध्याय: नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्वारा आपदग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण बृहृदश्च उवाच ततस्तु याते वार्ष्णेये पुण्यश्लोकस्य दीव्यत: । पुष्करेण हतं राज्यं यच्चान्यद्‌ वसु किंचन,बृहदश्व मुनि कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर वार्ष्णेयके चले जानेपर जूआ खेलनेवाले पुण्यश्लोक महाराज नलके सारे राज्य और जो कुछ धन था, उन सबका जूएमें पुष्करने अपहरण कर लिया

Bṛhadaśva berkata: “Setelah Vārṣṇeya pergi, ketika Raja Nala yang termasyhur sedang tenggelam dalam permainan dadu, Puṣkara merampas dengan kemenangan kerajaannya—beserta segala harta lain yang masih ada.”

Verse 2

ह्ृतराज्यं नलं राजन्‌ प्रहसन्‌ पुष्करो<ब्रवीत्‌ | द्यूत॑ं प्रवर्ततां भूय: प्रतिपाणो5स्ति कस्तव,राजन! राज्य हार जानेपर नलसे पुष्करने हँसते हुए कहा कि “क्या फिर जूआ आरम्भ हो? अब तुम्हारे पास दाँवपर लगानेके लिये क्‍या है?”

Bṛhadaśva berkata: Tersenyum, Puṣkara berkata kepada Nala yang telah kehilangan kerajaannya, “Apakah permainan dadu dimulai lagi? Wahai raja, kini apa yang masih kau punya untuk dijadikan taruhan?”

Verse 3

शिष्टा ते दमयन्त्येका सर्वमन्यज्जितं मया । दमयन्त्या: पण: साधु वर्ततां यदि मन्यसे,“तुम्हारे पास केवल दमयन्ती शेष रह गयी है और सब वस्तुएँ तो मैंने जीत ली हैं, यदि तुम्हारी राय हो तो दमयन्तीको दाँवपर रखकर एक बार फिर जूआ खेला जाय”

Bṛhadaśva berkata: “Yang tersisa padamu hanyalah Damayantī; selebihnya telah kumenangkan. Jika kau setuju, jadikan Damayantī sendiri sebagai taruhan, dan biarkan perjudian berlangsung sekali lagi.”

Verse 4

पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना | व्यदीर्यतेव हृदयं न चैनं किंचिदब्रवीत्‌,पुष्करके ऐसा कहनेपर पुण्यश्लोक महाराज नलका हृदय शोकसे विदीर्ण-सा हो गया, परंतु उन्होंने उससे कुछ कहा नहीं

Bṛhadaśva berkata: Ketika Puṣkara berkata demikian, hati Raja Nala yang termasyhur seakan terbelah oleh amarah dan duka; namun ia sama sekali tidak menjawabnya.

Verse 5

ततः पुष्करमालोक्य नलः परममन्युमान्‌ | उत्सृज्य सर्वगात्रे भ्यो भूषणानि महायशा:,तदनन्तर महायशस्वी नलने अत्यन्त दुःखित हो पुष्करकी ओर देखकर अपने सब अंगोंके आभूषण उतार दिये और केवल एक अधोवस्त्र धारण करके चादर ओढ़े बिना ही अपनी विशाल सम्पत्तिको त्यागकर सुहृदोंका शोक बढ़ाते हुए वे राजभवनसे निकल पड़े

Bṛhadaśva berkata: Lalu Nala yang termasyhur menatap Puṣkara; diliputi amarah yang menyala, ia menanggalkan perhiasan dari seluruh tubuhnya dan melepaskannya.

Verse 6

एकवासा हासंवीत: सुहृच्छोकविवर्धन: । निश्चक्राम ततो राजा त्यक्त्वा सुविपुलां श्रियम्‌,तदनन्तर महायशस्वी नलने अत्यन्त दुःखित हो पुष्करकी ओर देखकर अपने सब अंगोंके आभूषण उतार दिये और केवल एक अधोवस्त्र धारण करके चादर ओढ़े बिना ही अपनी विशाल सम्पत्तिको त्यागकर सुहृदोंका शोक बढ़ाते हुए वे राजभवनसे निकल पड़े

Maka sang raja Nala yang termasyhur meninggalkan seluruh kemegahan kerajaannya; ia menanggalkan perhiasan, hanya mengenakan sehelai kain, tanpa selendang—dan, seraya menambah duka para sahabatnya, ia melangkah keluar dari istana.

Verse 7

दमयन्त्येकवस्त्राथ गच्छन्तं पृष्ठतो5न्वगात्‌ । स तया बाह्ुतः सार्थ त्रिरात्रं नैघधोडवसत्‌,दमयन्तीके शरीरपर भी एक ही वस्त्र था। वह जाते हुए राजा नलके पीछे हो ली। वे उसके साथ नगरसे बाहर तीन राततक टिके रहे

Lalu Damayantī, juga hanya berselimut sehelai kain, mengikuti dari belakang ketika Raja Nala berjalan pergi. Raja Niṣadha itu membawanya serta dan tinggal di luar kota selama tiga malam.

Verse 8

पुष्करस्तु महाराज घोषयामास वै पुरे । नले य: सम्यगातिछेत्‌ स गच्छेद्‌ वध्यतां मम,महाराज! पुष्करने उस नगरमें यह घोषणा करा दी--डुग्गी पिटवा दी कि “जो नलके साथ अच्छा बर्ताव करेगा, वह मेरा वध्य होगा”

Namun Mahārāja Puṣkara membuat maklumat di seluruh kota: “Siapa pun yang memperlakukan Nala dengan baik, atas perintahku akan dihukum mati.”

Verse 9

पुष्करस्य तु वाक्येन तस्य विद्वेषणेन च | पौरा न तस्य सत्कारं कृतवन्तो युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! पुष्करके उस वचनसे और नलके प्रति पुष्करका द्वेष होनेसे पुरवासियोंने राजा नलका कोई सत्कार नहीं किया

Wahai Yudhiṣṭhira, karena titah Puṣkara itu dan karena kebenciannya kepada Nala, warga kota tidak memberikan penghormatan apa pun kepada Raja Nala.

Verse 10

स तथा नगराभ्याशे सत्काराहों न सस्कृतः । त्रिरात्रमुषितो राजा जलमात्रेण वर्तयन्‌,इस प्रकार राजा नल अपने नगरके समीप तीन राततक केवल जलमात्रका आहार करके टिके रहे। वे सर्वथा सत्कारके योग्य थे तो भी उनका सत्कार नहीं किया गया

Demikianlah Raja Nala, meski sepenuhnya layak menerima penghormatan, tinggal dekat kotanya selama tiga malam dengan bertahan hanya pada air; namun ia tidak disambut sebagaimana mestinya.

Verse 11

पीड्यमान: क्षुधा तत्र फलमूलानि कर्षयन्‌ | प्रातिष्ठत ततो राजा दमयन्ती तमन्वगात्‌,वहाँ भूखसे पीड़ित हो फल-मूल आदि जुटाते हुए राजा नल वहाँसे अन्यत्र चले गये। केवल दमयन्ती उनके पीछे-पीछे गयी

Di sana, dilanda lapar, sang raja mengumpulkan buah-buahan dan umbi-umbian untuk menyambung hidup. Lalu Raja Nala berangkat dari tempat itu, dan hanya Damayantī yang menyusul di belakangnya—teguh dalam kesetiaan meski dihimpit derita.

Verse 12

क्षुधया पीड्यमानस्तु नलो बहुतिथेडहनि । अपश्यच्छकुनान्‌ कांश्रिद्धिरण्यसदृशच्छदान्‌,इसी प्रकार नल बहुत दिनोंतक क्षुधासे पीड़ित रहे। एक दिन उन्होंने कुछ ऐसे पक्षी देखे, जिनकी पाँखें सोनेकी-सी थीं

Demikianlah Nala berhari-hari disiksa lapar dan terus mengembara. Pada suatu hari ia melihat beberapa burung yang sayapnya berkilau laksana emas.

Verse 13

स चिन्तयामास तदा निषधाधिपतिर्बली । अस्ति भक्ष्यो ममाद्यायं वसु चेदं भविष्यति,उन्हें देखकर (क्षुधातुर और आपत्तिग्रस्त होनेके कारण) बलवान्‌ निषधनरेशके मनमें यह बात आयी कि “यह पक्षियोंका समुदाय ही आज मेरा भक्ष्य हो सकता है और इनकी ये पाँखें मेरे लिये धन हो जायँगी”

Melihat mereka, penguasa Niṣadha yang perkasa itu berpikir: “Hari ini kawanan burung inilah yang dapat menjadi santapanku, dan bulu-bulunya akan menjadi harta bagiku.”

Verse 14

ततस्तान्‌ परिधानेन वाससा स समावृणोत्‌ | तस्य तद्‌ वस्त्रमादाय सर्वे जम्मुर्विहायसा,तदनन्तर उन्होंने अपने अधोवस्त्रसे उन पक्षियोंको ढँक दिया। किंतु वे सब पक्षी उनका वह वस्त्र लेकर आकाशमें उड़ गये

Lalu ia menutupi burung-burung itu dengan kain bawah yang dipakainya. Namun semuanya merebut kain itu dan terbang ke angkasa.

Verse 15

उत्पतन्तः खगा वाक्यमेतदाहुस्ततो नलम्‌ | दृष्टवा दिग्वाससं भूमौ स्थितं दीनमधोमुखम्‌

Sambil terbang, burung-burung itu lalu berkata demikian kepada Nala, setelah melihatnya di tanah—telanjang tanpa kain, amat papa, dan menundukkan wajah.

Verse 16

उड़ते हुए उन पक्षियोंने राजा नलको दीनभावसे नीचे मुँह किये धरतीपर नग्न खड़ा देख उनसे कहा-- ।। वयमक्षा: सुदुर्बुद्धे तव वासो जिहीर्षव: । आगता न हि न: प्रीति: सवाससि गते त्वयि,'“ओ खोटी बुद्धिवाले नरेश! हम (पक्षी नहीं,) पासे हैं और तुम्हारा वस्त्र अपहरण करनेकी इच्छासे ही यहाँ आये थे। तुम वस्त्र पहने हुए ही वहाँसे चले आये थे, इससे हमें प्रसन्नता नहीं हुई थी”

Bṛhadaśva berkata: “Wahai raja yang dungu! Kami bukan burung sama sekali—kami adalah dadu. Kami datang ke sini dengan maksud merampas pakaianmu. Ketika engkau pergi dari sana masih berpakaian, itu tidak menyenangkan kami.”

Verse 17

तान्‌ समीपगतानक्षानात्मानं च विवाससम्‌ | पुण्यश्लोकस्तदा राजन्‌ दमयन्तीमथाब्रवीत्‌,राजन्‌! उन पासोंको नजदीकसे जाते देख और अपने-आपको नग्नावस्थामें पाकर पुण्यश्लोक नलने उस समय दमयन्तीसे कहा--'सती साध्वी रानी! जिनके क्रोधसे मेरा ऐश्वर्य छिन गया, मैं क्षुधापीड़ित एवं दु:खित होकर जीवन-निर्वाहके लिये अन्नतक नहीं पा रहा हूँ और जिनके कारण निषधदेशकी प्रजाने मेरा सत्कार नहीं किया, भीरु! वे ही ये पासे हैं, जो पक्षी होकर मेरा वस्त्र लिये जा रहे हैं

Wahai Raja, ketika Nala—yang termasyhur—melihat dadu itu mendekat dan mendapati dirinya telah dilucuti pakaiannya, ia pun berkata kepada Damayantī: “Wahai permaisuri yang suci, wahai yang pemalu! Karena murka merekalah kemegahan kerajaanku dirampas. Kini aku tersiksa oleh lapar dan duka, bahkan makanan untuk menyambung hidup pun tak kudapat. Karena merekalah rakyat Niṣadha tak lagi memuliakanku. Lihatlah—dadu itulah yang kini menjelma burung dan membawa pergi pakaianku.”

Verse 18

येषां प्रकोपादैश्वर्यात्‌ प्रच्युतो5हमनिन्दिते । प्राणयात्रां न विन्देयं दु:खित: क्षुधयान्वित:,राजन्‌! उन पासोंको नजदीकसे जाते देख और अपने-आपको नग्नावस्थामें पाकर पुण्यश्लोक नलने उस समय दमयन्तीसे कहा--'सती साध्वी रानी! जिनके क्रोधसे मेरा ऐश्वर्य छिन गया, मैं क्षुधापीड़ित एवं दु:खित होकर जीवन-निर्वाहके लिये अन्नतक नहीं पा रहा हूँ और जिनके कारण निषधदेशकी प्रजाने मेरा सत्कार नहीं किया, भीरु! वे ही ये पासे हैं, जो पक्षी होकर मेरा वस्त्र लिये जा रहे हैं

“Wahai wanita tanpa cela! Karena murka merekalah aku terjatuh dari kemuliaan kerajaanku. Diliputi duka dan disiksa lapar, aku tak menemukan makanan sekalipun untuk menyambung hidup.”

Verse 19

येषां कृते न सत्कारमकुर्वन्‌ मयि नैषधा: । इमे ते शकुना भूत्वा वासो भीरु हरन्ति मे,राजन्‌! उन पासोंको नजदीकसे जाते देख और अपने-आपको नग्नावस्थामें पाकर पुण्यश्लोक नलने उस समय दमयन्तीसे कहा--'सती साध्वी रानी! जिनके क्रोधसे मेरा ऐश्वर्य छिन गया, मैं क्षुधापीड़ित एवं दु:खित होकर जीवन-निर्वाहके लिये अन्नतक नहीं पा रहा हूँ और जिनके कारण निषधदेशकी प्रजाने मेरा सत्कार नहीं किया, भीरु! वे ही ये पासे हैं, जो पक्षी होकर मेरा वस्त्र लिये जा रहे हैं

“Karena merekalah orang-orang Niṣadha tak lagi memuliakanku; dadu itulah yang kini menjadi burung dan, wahai yang pemalu, merampas pakaianku.”

Verse 20

वैषम्यं परम॑ प्राप्तो द:खितो गतचेतन: । भर्ता ते5हं निबोधेदं वचन हितमात्मन:,“मैं बड़ी विषम परिस्थितिमें पड़ गया हूँ। दुःखके मारे मेरी चेतना लुप्त-सी हो रही है। मैं तुम्हारा पति हूँ, अतः तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ, इसे सुनो--

“Aku telah jatuh ke dalam kesengsaraan yang paling berat; dihancurkan duka, kesadaranku seakan memudar. Namun aku adalah suamimu—maka pahamilah ini: kata-kataku demi keselamatanmu. Dengarkanlah.”

Verse 21

एते गच्छन्ति बहव: पन्थानो दक्षिणापथम्‌ | अवन्तीमृक्षवन्तं च समतिक्रम्य पर्वतम्‌,'ये बहुत-से मार्ग हैं, जो दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं। यह मार्ग ऋक्षवान्‌ पर्वतको लाँघकर अवन्ती-देशको जाता है

Bṛhadaśva berkata: “Ada banyak jalan yang menuju ke Dakṣiṇāpatha. Setelah melampaui gunung Ṛkṣavat, mereka sampai ke negeri Avanti.”

Verse 22

एष विन्ध्यो महाशैल: पयोष्णी च समुद्रगा । आश्रमाश्च महर्षीणां बहुमूलफलान्विता:,“यह महान्‌ पर्वत विन्ध्य दिखायी दे रहा है और यह समुद्रगामिनी पयोष्णी नदी है। यहाँ महर्षियोंके बहुत-से आश्रम हैं, जहाँ प्रचुर मात्रामें फल-मूल उपलब्ध हो सकते हैं। यह विदर्भदेशका मार्ग है और वह कोसलदेशको जाता है। दक्षिण दिशामें इसके बादका देश दक्षिणापथ कहलाता है”

Bṛhadaśva berkata: “Lihatlah gunung Vindhya yang agung ini, dan sungai Payoshnī yang mengalir menuju samudra. Di sini pun ada pertapaan para maharsi, kaya akan umbi dan buah-buahan.”

Verse 23

एष पन्था विदर्भाणामसौ गच्छति कोसलान्‌ | अतः परं च देशो<यं दक्षिणे दक्षिणापथ:,“यह महान्‌ पर्वत विन्ध्य दिखायी दे रहा है और यह समुद्रगामिनी पयोष्णी नदी है। यहाँ महर्षियोंके बहुत-से आश्रम हैं, जहाँ प्रचुर मात्रामें फल-मूल उपलब्ध हो सकते हैं। यह विदर्भदेशका मार्ग है और वह कोसलदेशको जाता है। दक्षिण दिशामें इसके बादका देश दक्षिणापथ कहलाता है”

Bṛhadaśva berkata: “Inilah jalan menuju Vidarbha; jalan yang itu menuju Kosala. Setelah ini, ke arah selatan, negeri itu dikenal sebagai Dakṣiṇāpatha.”

Verse 24

एतद्‌ वाक्‍्यं नलो राजा दमयन्तीं समाहित: । उवाचासकृदार्तो हि भैमीमुद्दिश्य भारत,भारत! राजा नलने एकाग्रचित्त होकर बड़ी आतुरताके साथ दमयन्तीसे उपर्युक्त बातें बार-बार कहीं

Wahai Bhārata! Lalu Raja Nala, dengan batin terhimpun dan teguh, mengucapkan kata-kata ini kepada Damayantī; namun karena hatinya gelisah, ia menujukan ucapannya kepada Bhīmī berulang-ulang.

Verse 25

ततः सा बाष्पकलया वाचा दु:खेन कर्शिता । उवाच दमयन्ती तं नैषधं करुणं वच:,तब दमयन्ती अत्यन्त दुःखसे दुर्बल हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई गद्गद वाणीमें राजा नलसे यह करुण वचन बोली--

Kemudian Damayantī—lemah karena duka, dengan suara tersendat oleh air mata—menyampaikan kata-kata yang penuh iba kepada Raja Niṣadha, Nala.

Verse 26

उद्वेजते मे हृदयं सीदन्त्यड्रानि सर्वश:ः । तव पार्थिव संकल्पं चिन्तयन्त्या: पुन: पुन:

Hatiku terguncang oleh gentar, dan seluruh anggota tubuhku melemah. Wahai Raja, ketika aku merenungkan berulang-ulang tekadmu, aku diliputi kecemasan yang mendalam.

Verse 27

ह्ृतराज्यं ह्ृतद्रव्यं विवस्त्र क्षुच्छूमान्वितम्‌ । कथमुत्सृज्य गच्छेयमहं त्वां निर्जने वने

Kerajaanmu telah dirampas, hartamu pun lenyap; engkau tanpa pakaian, dilanda lapar dan kepayahan. Bagaimana mungkin aku meninggalkanmu dan pergi, membiarkanmu sendirian di rimba yang sunyi ini?

Verse 28

“महाराज! आपका मानसिक संकल्प क्या है, इसपर जब मैं बार-बार विचार करती हूँ, तब मेरा हृदय उद्विग्न हो उठता है और सारे अंग शिथिल हो उठते हैं। आपका राज्य छिन गया। धन नष्ट हो गया। आपके शरीरपर वस्त्रतक नहीं रह गया तथा आप भूख और परिश्रमसे कष्ट पा रहे हैं। ऐसी अवस्थामें इस निर्जन वनमें आपको असहाय छोड़कर मैं कैसे जा सकती हूँ? ।। भ्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य चिन्तयानस्यथ तत्‌ सुखम्‌ । वने घोरे महाराज नाशयिष्याम्यहं क्लमम्‌,“महाराज! जब आप भयंकर वनमें थके-माँदे भूखसे पीड़ित हो अपने पूर्व सुखका चिन्तन करते हुए अत्यन्त दुःखी होने लगेंगे, उस समय मैं सान्त्वनाद्वारा आपके संतापका निवारण करूँगी

Wahai Maharaja! Setiap kali aku merenungkan tekad yang bangkit dalam benakmu, hatiku gelisah dan seluruh tubuhku seakan lemas. Kerajaanmu telah dirampas, hartamu musnah; bahkan pakaian pun tak tersisa di tubuhmu, dan engkau menderita oleh lapar serta kepayahan. Dalam keadaan demikian, bagaimana mungkin aku meninggalkanmu tak berdaya di rimba yang sunyi ini? O Maharaja, bila engkau mengembara di hutan yang mengerikan ini—letih dan tersiksa oleh lapar—lalu bersedih sambil mengenang kebahagiaanmu dahulu, maka dengan kata-kata penghiburan aku akan melenyapkan letih dan pedihmu.

Verse 29

न च भार्यासमं किंचिद्‌ विद्यते भिषजां मतम्‌ | औषध॑ सर्वदु:खेषु सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते,“चिकित्सकोंका मत है कि समस्त दु:ःखोंकी शान्तिके लिये पत्नीके समान दूसरी कोई औषध नहीं है; यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ”

Menurut pertimbangan para tabib, tiada yang sebanding dengan seorang istri. Bagi segala duka, dialah obat—ini kukatakan kepadamu dengan sebenar-benarnya.

Verse 30

नल उवाच एवमेतद्‌ यथा55त्थ त्वं दमयन्ति सुमध्यमे । नास्ति भार्यासमं मित्र नरस्यार्तस्य भेषजम्‌,नलने कहा--सुमध्यमा दमयन्ती! तुम जैसा कहती हो वह ठीक है। दुःखी मनुष्यके लिये पत्नीके समान दूसरा कोई मित्र या औषध नहीं है

Nala berkata: “Benar adanya seperti yang kaukatakan, wahai Damayantī yang berpinggang ramping. Bagi seorang lelaki yang tertimpa derita, tiada sahabat dan tiada obat yang setara dengan seorang istri.”

Verse 31

न चाहं त्यक्तकामस्त्वां किमलं भीरु शड्कसे । त्यजेयमहमात्मानं न चैव त्वामनिन्दिते,भीरु! मैं तुम्हें त्यागना नहीं चाहता, तुम इतनी अधिक शंका क्‍यों करती हो? अनिन्दिते! मैं अपने शरीरका त्याग कर सकता हूँ, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता

Wahai yang penakut, aku sama sekali tidak berkehendak meninggalkanmu—mengapa engkau menyimpan keraguan sebesar itu? Wahai wanita tanpa cela, aku sanggup menyerahkan nyawaku sendiri, tetapi aku takkan dan tak mampu meninggalkanmu.

Verse 32

दमयन्त्युवाच यदि मां त्वं महाराज न विहातुमिहेच्छसि । तत्‌ किमर्थ विदर्भाणां पन्था: समुपदिश्यते,दमयन्तीने कहा--महाराज! यदि आप मुझे त्यागना नहीं चाहते तो विदर्भदेशका मार्ग क्यों बता रहे हैं?

Damayantī berkata: “Wahai raja agung, jika engkau tidak berniat meninggalkanku di sini, mengapa engkau menunjukkan jalan menuju Vidarbha?”

Verse 33

अवैमि चाहं नृपते न तु मां त्यक्तुमहसि । चेतसा त्वपकृष्टेन मां त्यजेथा महीपते,राजन! मैं जानती हूँ कि आप स्वयं मुझे नहीं त्याग सकते, परंतु महीपते! इस घोर आपत्तिने आपके चित्तको आकर्षित कर लिया है, इस कारण आप मेरा त्याग भी कर सकते हैं

Aku tahu benar, wahai raja, engkau bukanlah orang yang patut meninggalkanku. Namun, wahai penguasa bumi, karena batinmu terseret dan dikuasai oleh malapetaka yang mengerikan ini, engkau bisa saja sampai hati melepaskanku.

Verse 34

पन्थानं हि ममाभीक्ष्णमाख्यासि च नरोत्तम । अतो निमित्तं शोकं मे वर्धयस्यमरोपम,नरश्रेष्ट! आप बार-बार जो मुझे विदर्भदेशका मार्ग बता रहे हैं। देवोपम आर्यपुत्र! इसके कारण आप मेरा शोक ही बढ़ा रहे हैं

Wahai insan terbaik, engkau berkali-kali menyebutkan kepadaku jalan menuju Vidarbha. Karena itulah, wahai yang laksana dewa, engkau justru menambah dukacitaku.

Verse 35

यदि चायमभिप्रायस्तव ज्ञातीन्‌ व्रजेदिति । सहितावेव गच्छावो विदर्भान्‌ यदि मन्यसे,यदि आपका यह अभिप्राय हो कि दमयन्ती अपने बन्धु-बान्धवोंके यहाँ चली जाय तो आपकी सम्मति हो तो हम दोनों साथ ही विदर्भदेशको चलें

Jika inilah maksudmu—agar Damayantī pergi kepada sanak keluarganya—maka bila engkau berkenan, marilah kita berdua pergi bersama ke Vidarbha.

Verse 36

विदर्भराजत्तत्र त्वां पूजयिष्यति मानद । तेन त्वं पूजितो राजन्‌ सुखं वत्स्यसि नो गृहे,मानद! वहाँ विदर्भनरेश आपका पूरा आदर-सत्कार करेंगे। राजन्‌! उनसे पूजित होकर आप हमारे घरमें सुखपूर्वक निवास कीजियेगा

Nala berkata: “Wahai pemberi kehormatan, di sana raja Widarbha akan memuliakanmu. Wahai raja, setelah dimuliakan olehnya, engkau akan tinggal dengan bahagia di rumah kami.”

Verse 61

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी वनयात्राविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-61 dalam episode Nala di dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, yang mengisahkan perjalanan Nala melalui hutan.

Verse 63

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलवनयात्रायामेकषष्टितमो< ध्याय:

Demikianlah bab ke-61 dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, dalam bagian Nala-episode, pada uraian tentang perjalanan Nala di hutan.

Frequently Asked Questions

The chapter stages a conflict between despair and dharma: whether Damayantī should relinquish life amid abandonment and danger, or persist in truthful, disciplined searching grounded in marital commitment and ethical endurance.

Ethical agency is maintained through satya and dhṛti even when social protections fail; respectful speech, self-identification, and seeking lawful aid become practical instruments for survival and meaning.

No explicit phalaśruti is stated here; the closest meta-level signal is the ascetics’ predictive assurance, functioning as narrative validation that endurance aligned with dharma leads toward restoration within the larger exemplum.