Adhyaya 305
Vana ParvaAdhyaya 30525 Verses

Adhyaya 305

Chapter Arc: वन-प्रवास की पृष्ठभूमि में एक दिव्य संवाद खुलता है—सूर्यदेव अपने पुत्र कर्ण को सावधान करते हैं कि इन्द्र छल से उसके जन्मजात कवच-कुण्डल हरने आएँगे, क्योंकि अर्जुन के हित की रक्षा करनी है। → कर्ण अपनी अटूट भक्ति और कृतज्ञता प्रकट करता है—स्त्री, पुत्र, मित्र, देह से भी अधिक प्रिय उसे ‘गोपते’ सूर्य हैं—पर साथ ही वह दान-धर्म की प्रतिज्ञा से बँधा है: याचक को खाली नहीं लौटाएगा, चाहे याचक स्वयं इन्द्र ही क्यों न हों। सूर्य उसे उपाय बताते हैं—दान तो करो, पर ‘नियम’ रखो: कुण्डल-कवच के बदले इन्द्र से एक अचूक शक्ति (शक्ति-अस्त्र) माँगो, जिससे वह रण में शत्रुओं का संहार कर सके। → निर्णय का शिखर तब आता है जब कर्ण स्पष्ट करता है कि अर्जुन-भय की बात सुनकर भी वह विचलित नहीं—वह अर्जुन-तुल्य वीर को भी रण में जीतने का संकल्प लेता है, और साथ ही सूर्य की आज्ञा के अनुसार इन्द्र को दान देने के लिए ‘शक्ति’ प्राप्त करने की योजना पर दृढ़ हो जाता है। → सूर्यदेव नियमपूर्वक दान की मर्यादा स्थापित कराते हैं—कर्ण इन्द्र को कुण्डल देगा, पर बदले में विजय-हेतु शक्ति लेगा। यह संतुलन कर्ण के दान-धर्म और आत्मरक्षा/रणनीति—दोनों को एक साथ साधता है। सूर्यदेव उपदेश देकर अंतर्धान हो जाते हैं। → कर्ण स्वप्न/संकेत को सत्य मानकर इन्द्र की प्रतीक्षा करने लगता है—अब प्रश्न यह है कि इन्द्र किस रूप में आएँगे, और कर्ण का दान-धर्म उसे किस मूल्य पर शक्ति दिलाएगा।

Shlokas

Verse 1

अऑड आटर (0) है ० द्र्याधेकत्रिशततमो< ध्याय: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय कर्ण उवाच भगवन्तमहं भक्तो यथा मां वेत्थ गोपते । तथा परमतिग्मांशो नास्त्यदेयं कथंचन,कर्णने कहा--सूर्यदेव! मैं आपका अनन्य भक्त हूँ, जैसा कि आप भी मुझे जानते हैं। प्रचण्डरश्मे! आपके लिये किसी प्रकार कुछ भी अदेय नहीं है

Karna berkata: “Wahai Bhagavan, sebagaimana Engkau mengenalku, wahai Gopati, aku adalah pemuja-Mu. Maka, wahai yang bersinar dengan sinar teramat tajam, demi-Mu tiada sesuatu pun yang akan kutolak untuk kuberikan.”

Verse 2

नमे दारा न मे पुत्रा न चात्मा सुहदो नच | तथेष्टा वै सदा भकत्या यथा त्वं गोपते मम,स्त्री, पुत्र, सुहृद्‌ और अपना शरीर भी मुझे वैसा प्रिय नहीं है, जैसे आप हैं। किरणोंके स्वामी सूर्यदेव! सदा आप ही मेरे भक्तिभावके आश्रय हैं

Karna berkata: “Bagiku, bukan istri-istriku, bukan putra-putraku, bukan tubuhku sendiri, bahkan bukan sahabat-sahabatku—tiada yang sebanding dengan Engkau, wahai Gopati. Wahai Penguasa sinar, Engkaulah senantiasa sandaran baktiku.”

Verse 3

इष्टानां च महात्मानो भक्तानां च न संशय: । कुर्वन्ति भक्तिमिष्टां च जानीषे त्वं च भास्कर,प्रभाकर! आप भी जानते ही हैं कि महात्मा पुरुष भी अपने प्रिय भक्तोंपर पूर्ण स्नेह रखते हैं, इसमें संदेह नहीं है

Karna berkata: “Tiada keraguan bahwa para mahatma menaruh kasih yang dalam kepada para bhakta yang mereka kasihi; cinta dibalas dengan cinta. Engkau pun mengetahui hal ini, wahai Bhāskara.”

Verse 4

इष्टो भक्तश्न मे कर्णो न चान्यद्‌ दैवतं दिवि | जानीत इति वै कृत्वा भगवानाह मद्धितम्‌,आपको यह मालूम है कि कर्ण मेरा प्रिय भक्त है और वह स्वर्गके दूसरे किसी भी देवताको (अपने इष्टरूपमें नहीं जानता है, यही समझकर आप मुझे मेरे हितका उपदेश कर रहे हैं

“Karna adalah bhaktaku yang terkasih; di surga pun ia tidak mengakui dewa lain sebagai Tuhan pilihannya.” Mengetahui hal itu, Sang Bhagavan menyampaikan nasihat demi kebaikanku.

Verse 5

भूयश्व शिरसा याचे प्रसाद्य च पुन: पुन: । इति ब्रवीमि तिग्मांशो त्वं तु मे क्षन्तुमहसि,प्रचण्ड किरणोंवाले देव! मैं पुन. आपके चरणोंमें मस्तक रखकर, आपको प्रसन्न करके बारंबार क्षमायाचना करता हूँ। इस समय मैं जो कुछ कहता हूँ, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें

Wahai dewa bercahaya tajam, berulang kali kutundukkan kepala memohon perkenan-Mu dan berkali-kali memohon ampun. Maka demikianlah aku berkata, wahai yang bersinar tajam; ampunilah aku atas apa yang hendak kuucapkan.

Verse 6

बिभेमि न तथा मृत्योर्यथा बिभ्येडनृतादहम्‌ । विशेषेण द्विजातीनां सर्वेषां सर्वदा सताम्‌

Karna berkata, “Aku tidak takut pada kematian sebagaimana aku takut pada dusta. Terutama, aku sangat gentar mengucapkan kebohongan di hadapan para dwija yang senantiasa saleh dan berpegang pada dharma.”

Verse 7

यच्च मामात्थ देव त्वं पाण्डवं फाल्गुनं प्रति,देव! आपने पाण्डुनन्दन अर्जुनसे जो मेरे लिये डरकी बात बतायी है, उसके लिये आपके मनमें कोई दुःख और संताप नहीं होना चाहिये। भास्कर! मैं कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी अर्जुनको युद्धमें अवश्य जीत लूँगा

Karna berkata, “Wahai Dewa, mengenai Pandawa Phalguna (Arjuna) yang engkau peringatkan agar kutakuti—janganlah karena diriku timbul duka atau gundah di hatimu. Wahai Bhaskara, Arjuna yang gagah itu, setara dengan Kartavīrya Arjuna dalam keperkasaan, pasti akan kutaklukkan di medan perang.”

Verse 8

व्येतु संतापजं दुःखं तव भास्कर मानसम्‌ | अर्जुनप्रतिमं चैव विजेष्यामि रणेडर्जुनम्‌,देव! आपने पाण्डुनन्दन अर्जुनसे जो मेरे लिये डरकी बात बतायी है, उसके लिये आपके मनमें कोई दुःख और संताप नहीं होना चाहिये। भास्कर! मैं कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी अर्जुनको युद्धमें अवश्य जीत लूँगा

Karna berkata, “Wahai Bhaskara, sirnalah duka di hatimu yang lahir dari kegelisahan. Arjuna yang perkasa itu—setara dengan Arjuna (Kartavīrya)—pasti akan kutaklukkan di medan perang.”

Verse 9

तवापि विदितं देव ममाप्यस्त्रबलं महत्‌ । जामदग्न्यादुपात्तं यत्र तथा द्रोणान्महात्मन:,देव! मेरे पास भी अस्त्रोंका जो महान्‌ बल है। इसे आप भी जानते हैं। मैंने जमदग्निनन्दन परशुराम तथा महात्मा द्रोणाचार्यसे अस्त्रविद्या सीखी है

Karna berkata, “Wahai Dewa, engkau pun mengetahui besarnya daya senjata yang kumiliki. Keahlian itu kupelajari dari putra Jamadagni, Paraśurāma, dan juga dari Droṇa yang berhati luhur.”

Verse 10

इदं त्वमनुजानीहि सुरश्रेष्ठ ब्रतं मम । भिक्षते वज्िणे दद्यामपि जीवितमात्मन:,सुरश्रेष्ठ! यह जो मेरा दान देनेका व्रत है, उसके लिये आप भी मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे मैं याचक बनकर आये हुए इन्द्रको अपने प्राणतक दे सकूँ

Karna berkata: “Wahai yang terbaik di antara para dewa, berilah izin atas kaulku ini. Jika Vajrin (Indra) datang sebagai pemohon, akan kuberikan bahkan nyawaku sendiri.”

Verse 11

सूर्य उवाच यदि तात ददास्येते वज्िणे कुण्डले शुभे । त्वमप्येनमथो ब्रूया विजयार्थ महाबलम्‌

Sūrya berkata: “Anakku, jika engkau memberikan anting-anting suci ini kepada Vajrin (Indra), maka katakan pula kepadanya—yang maha perkasa—bahwa pemberian itu hendaknya demi kemenangan.”

Verse 12

अवध्यो हासि भूतानां कुण्डला भ्यां समन्वित:,कर्ण! इन दोनों कुण्डलोंसे युक्त रहनेपर तुम सभी प्राणियोंके लिये अवध्य बने रहोगे। वत्स! दानवसूदन इन्द्र युद्धमें अर्जुनके द्वारा तुम्हारा विनाश चाहते हैं। इसीलिये वे तुम्हारे दोनों कुण्डलोंको हर लेनेकी इच्छा करते हैं

Wahai Karna, selama engkau mengenakan sepasang anting ini, engkau akan tak tersentuh oleh makhluk mana pun. Anakku, Dānavasūdana (Indra) menginginkan kebinasaanmu di medan perang melalui tangan Arjuna; sebab itulah ia hendak merampas kedua antingmu.

Verse 13

अर्जुनेन विनाशं हि तव दानवसूदन: । प्रार्थयानो रणे वत्स कुण्डले ते जिहीर्षति,कर्ण! इन दोनों कुण्डलोंसे युक्त रहनेपर तुम सभी प्राणियोंके लिये अवध्य बने रहोगे। वत्स! दानवसूदन इन्द्र युद्धमें अर्जुनके द्वारा तुम्हारा विनाश चाहते हैं। इसीलिये वे तुम्हारे दोनों कुण्डलोंको हर लेनेकी इच्छा करते हैं

Sūrya berkata: “Anakku, Dānavasūdana (Indra), yang menginginkan kebinasaanmu di medan perang melalui Arjuna, berniat merampas anting-antingmu.”

Verse 14

स त्वमप्येनमाराध्य सूनृताभि: पुनः पुनः । अभ्यर्थयेथा देवेशममोघार्थ पुरन्दरम्‌,अतः तुम भी उनकी आराधना करके बारंबार मीठे वचन बोलकर देवेश्वर इन्द्रसे किसी अमोघ अस्त्रके लिये प्रार्थना करना

Maka engkau pun hendaknya memujanya; dan berulang kali, dengan kata-kata yang lembut lagi benar, mohonlah kepada Penguasa para dewa—Purandara (Indra)—sebuah senjata ilahi yang tak pernah gagal daya gunanya.

Verse 15

अमोधां देहि मे शक्तिममित्रविनिबर्हिणीम्‌ । दास्यामि ते सहस्राक्ष कुण्डले वर्म चोत्तमम्‌,तुम उनसे कहना--'सहस्राक्ष! मैं आपको अपने शरीरका उत्तम कवच और दोनों कुण्डल दे दूँगा, परंतु आप भी मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति प्रदान कीजिये, जो शत्रुओंका संहार करनेवाली है'

Wahai Sahasrākṣa, anugerahkanlah kepadaku Śakti yang tak pernah meleset, daya yang membinasakan musuh. Sebagai gantinya, akan kuberikan kepadamu sepasang antingku dan zirah tubuhku yang paling utama.

Verse 16

इत्येव नियमेन त्वं दद्या: शक्राय कुण्डले । तया त्वं कर्ण संग्रामे हनिष्यसि रणे रिपून्‌,इसी शर्तके साथ तुम इन्द्रको अपने कुण्डल देना। कर्ण! उस शक्तिके द्वारा तुम युद्धमें अपने शत्रुओंको मार डालोगे

Hanya dengan syarat inilah engkau boleh memberikan antingmu kepada Śakra (Indra). Dengan Śakti itu, wahai Karṇa, engkau akan mampu menewaskan musuh-musuhmu di medan laga.

Verse 17

नाहत्वा हि महाबाहो शत्रूनेति करं पुनः । सा शक्तिर्देवराजस्य शतशो5थ सहस्रश:,महाबाहो! देवराज इन्द्रकी वह शक्ति युद्धमें सैकड़ों-हजारों शत्रुओंका वध किये बिना पुनः हाथमें लौटकर नहीं आती

Wahai yang berlengan perkasa, Śakti itu tidak kembali lagi ke tangan sebelum terlebih dahulu menewaskan musuh. Demikianlah senjata raja para dewa: ia pulang hanya setelah merobohkan musuh—ratusan, bahkan ribuan.

Verse 18

(कर्णस्तु बुबुधे राजन्‌ स्वप्रान्ते प्रवदन्निव । प्रतिबुद्धस्तु राधेय: स्वप्न॑ संचिन्त्य भारत ।। चकार निश्चयं राजन्‌ शक्‍त्यर्थ वदतां वर: । यदि मामिन्द्र आयाति कुण्डलार्थ परंतप: ।। शक्‍्त्या तस्मै प्रदास्यामि कुण्डले वर्म चैव ह । स कृत्वा प्रातरुत्थाय कार्याणि भरतर्षभ ।। ब्राह्मणान्‌ वाचयित्वाथ यथाकार्यमुपाक्रमत्‌ | विधिना राजशार्दूल मुहूर्तमजपत्‌ ततः ।।) राजन! स्वप्नके अन्तमें कुछ बोलता हुआ-सा कर्ण जाग उठा। भारत! जगनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ राधानन्दन कर्णने स्वप्नका चिन्तन करके शक्तिके लिये इस प्रकार निश्चय किया, “यदि शत्रुओंको संताप देनेवाले इन्द्र कुण्डलके लिये मेरे पास आ रहे हैं तो मैं शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच दूँगा।' भरतश्रेष्ठ! ऐसा निश्चय करके कर्ण प्रातःकाल उठा और आवश्यक कार्य करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर यथासमय संध्योपासन आदि कार्य करने लगा। नृपश्रेष्ठ] फिर उसने विधिपूर्वक दो घड़ीतक जप किया ।। ततः सूर्याय जप्यान्ते कर्ण: स्वप्न न्यवेदयत्‌,तदनन्तर जपके अनन्‍्तमें कर्णने भगवान्‌ सूर्यसे स्वप्नका वृत्तान्त निवेदन किया। उसने जो कुछ देखा था तथा रातमें उन दोनोंमें जैसी बातें हुई थीं, उन सबको कर्णने क्रमश: उनसे ठीक-ठीक कह सुनाया

Wahai Raja, Karṇa terjaga seakan masih mengucap kata-kata di ujung mimpi. Setelah benar-benar sadar, Rādheya—yang utama di antara para penutur—merenungkan mimpi itu dan menetapkan tekad tentang Śakti: “Jika Indra, penakluk musuh, datang kepadaku meminta antingku, maka hanya setelah memperoleh Śakti aku akan menyerahkan anting dan zirah itu kepadanya.” Dengan keputusan itu, wahai banteng keturunan Bharata, Karṇa bangun saat fajar, menuntaskan kewajiban-kewajiban yang perlu, meminta para brāhmaṇa melantunkan berkat-berkat suci, lalu memulai ritusnya pada waktu yang semestinya. Kemudian, wahai harimau di antara raja-raja, ia melakukan japa menurut tata-aturan selama satu muhūrta; dan pada akhir japa kepada Sūrya, Karṇa menyampaikan kepada Sang Surya perihal mimpinya.

Verse 19

यथादृष्टं यथातत्त्वं यथोक्तमुभयोर्निशि । तत्‌ सर्वमानुपूर्व्यण शशंसास्मै वृषस्तदा,तदनन्तर जपके अनन्‍्तमें कर्णने भगवान्‌ सूर्यसे स्वप्नका वृत्तान्त निवेदन किया। उसने जो कुछ देखा था तथा रातमें उन दोनोंमें जैसी बातें हुई थीं, उन सबको कर्णने क्रमश: उनसे ठीक-ठीक कह सुनाया

Maka Vṛṣa (Karṇa) pun menuturkan kepadanya, seturut urutan, segala sesuatu persis sebagaimana telah dilihat, sebagaimana adanya dalam kebenaran, dan sebagaimana telah diucapkan di antara mereka berdua pada malam itu—seluruh kisah disampaikan dengan setia.

Verse 20

तच्छुत्वा भगवान्‌ देवो भानु: स्वभनुसूदन: । उवाच त॑ तथेत्येव कर्ण सूर्य: स्मयन्निव,राहुका संहार करनेवाले भगवान्‌ सूर्यदेवने यह सब सुनकर कर्णसे मुसकराते हुए-से कहा--“तुमने जो कुछ देखा है, वह सब ठीक है”

Mendengar semuanya itu, Bhagavān Bhānu—Dewa Surya, pembunuh Svarbhānu—berkata kepada Karṇa dengan senyum tipis seakan mengetahui segalanya: “Tathāstu; apa yang kau pahami itu benar adanya.”

Verse 21

ततस्तत्त्वमिति ज्ञात्वा राधेय: परवीरहा । शक्तिमेवाभिकाड्क्षन्‌ वै वासवं प्रत्यपालयत्‌

Lalu, setelah memahami hakikatnya, Rādheya—pembunuh para pahlawan musuh—tetap menanti Vāsava (Indra), semata-mata menginginkan tombak sakti itu.

Verse 66

प्रदाने जीवितस्यापि न मे<त्रास्ति विचारणा । मैं मृत्युसे भी उतना नहीं डरता जितना झूठसे डरता हूँ। विशेषत: सदा समस्त सज्जन ब्राह्मगोंको उनके माँगनेपर अपने प्राण देनेमें भी मुझे कोई सोच-विचार नहीं हो सकता

“Bahkan bila harus memberikan nyawaku, di sini tak ada ruang bagiku untuk ragu. Aku lebih takut pada dusta daripada maut; maka bila brāhmaṇa yang mulia memohon, aku takkan menimbang-nimbang—nyawaku pun akan kuberikan.”

Verse 116

नियमेन प्रदद्यां ते कुण्डले वै शतक्रतो । सूर्य बोले--तात! यदि तुम इन्द्रको ये दोनों सुन्दर कुण्डल दे रहे हो तो तुम भी उन महाबली इन्द्रसे अपनी विजयके लिये कोई अस्त्र माँग लेना और उनसे स्पष्ट कह देना कि देवराज! मैं एक शर्तके साथ ये दोनों कुण्डल आपको दे सकता हूँ

Sūrya berkata: “Wahai anakku, jika engkau hendak menyerahkan dua anting indah ini kepada Śatakratu (Indra), raja para dewa, maka mintalah kepadanya—secara sah dan mengikat—sebuah senjata demi kemenanganmu. Katakan dengan terang: ‘Wahai Devarāja, hanya dengan syarat inilah aku dapat memberikan kedua anting ini.’”

Verse 176

वैशम्पायन उवाच एवमुक्‍्त्वा सहस्रांशु: सहसान्तरधीयत । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर सूर्यदेव सहसा वहीं अन्तर्धान हो गये

Vaiśaṃpāyana berkata: “Wahai Janamejaya, setelah berkata demikian, Sahasrāṃśu (Dewa Surya) seketika lenyap dari tempat itu.”

Verse 302

तब शत्रुओंका संहार करनेवाला राधानन्दन कर्ण उस स्वप्नकी घटनाको यथार्थ जानकर शक्ति प्राप्त करनेकी ही अभिलाषा ले इन्द्रकी प्रतीक्षा करने लगा ।। इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे दयधिकत्रिशततमो<ध्याय:

Maka Karna, putra Radha dan pembantai musuh, memahami peristiwa dalam mimpi itu sebagai pertanda yang benar. Dengan tekad tertuju semata-mata pada perolehan senjata ilahi (śakti), ia pun menanti kedatangan Indra. Demikian berakhir Bab 305 dalam Mahabharata, Vana Parva, pada bagian Pengambilan Anting, dalam dialog Surya dan Karna.