
Karṇa–Sūrya Saṃvāda: Satya, Dāna, and the Amoghā Śakti (कर्ण–सूर्यसंवादः)
Upa-parva: Karna–Sūrya Saṃvāda (Episode on Karṇa’s vow, the Kuṇḍala-dāna, and the Śakti-boon)
Chapter 286 records Karṇa’s devotional address to Sūrya, asserting exclusive allegiance and valuing Sūrya above kinship ties, while emphasizing a fear of falsehood greater than fear of death. Karṇa recalls Sūrya’s prior concern regarding Arjuna and declares confidence in his own astric training (including instruction associated with Jāmadagnya and Droṇa). He requests permission to uphold his vow: if Indra (Vajrin) begs, Karṇa will give even his life—implicitly including the protective kuṇḍalas. Sūrya responds with conditional guidance: if Karṇa gives the kuṇḍalas to Śatakratu, he should do so by rule (niyama) and simultaneously request an unfailing śakti that can decisively neutralize enemies, noting that Arjuna’s interest in Karṇa’s destruction is linked to the removal of the kuṇḍalas. The narrator Vaiśaṃpāyana reports Sūrya’s disappearance and Karṇa’s subsequent report of the dream-communication; Sūrya confirms the counsel. Karṇa, understanding the strategic implication, resolves to await Vāsava (Indra) to secure the śakti as compensation, preserving his reputation for dāna while mitigating the loss of invulnerability.
Chapter Arc: मार्कण्डेय ऋषि रामोपाख्यान में लंका के भीतर की तैयारी का दृश्य खोलते हैं—रावण ने शास्त्रोक्त रीति से दुर्ग, परिखाएँ और युद्ध-सामग्री सजाकर नगर को अजेय-सा बना दिया है। → राम की आज्ञा से महाबली अंगद दूत बनकर लंका-द्वार पर पहुँचते हैं, राक्षसों द्वारा पहचाने जाकर निर्भयता से भीतर प्रवेश करते हैं और रावण को राम-संदेश सुनाने का संकल्प लेते हैं; उधर लंका की सात गहरी परिखाएँ, प्राकार-तोरण और विविध अस्त्र-शस्त्र युद्ध की अनिवार्यता को तीखा करते जाते हैं। → अंगद रावण के दरबार में, मंत्रियों से घिरे पौलस्त्य के सामने वाग्मी होकर राम-संदेश सुनाते हैं—दूत-धर्म की मर्यादा में रहते हुए भी रावण के अहंकार को चुनौती देने वाला सत्य-वचन। → अंगद संदेश देकर लौटते हैं और श्रीराम को रावण-सभा का वृत्तांत निवेदित करते हैं; तत्पश्चात वानर-राक्षसों का घोर संग्राम भड़क उठता है, लक्ष्मण दुर्ग-स्थानों की ओर निर्देश देकर राक्षसों को गिराते हैं, और राघव की आज्ञा से लक्ष्य-सिद्धि के बाद सेना का प्रत्यावर्तन होता है—विजय की दिशा स्पष्ट, पर युद्ध शेष। → लंका में भीषण विमर्द के बाद भी निर्णायक अंत नहीं—दुर्ग अभी खड़ा है और रावण का प्रतिरोध अगले चरण में और उग्र होने वाला है।
Verse 1
अपना स२ (0 अवज असल चतुरशीर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम मार्कण्डेय उवाच प्रभूतान्नोदके तस्मिन् बहुमूलफले वने । सेनां निवेश्य काकुत्स्थो विधिवत् पर्यरक्षत,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! लंकाके उस वनमें अन्न और जलका बहुत सुभीता था। फल और मूल प्रचुरमात्रामें उपलब्ध थे; अतः वहीं सेनाकी छावनी डालकर श्रीरामचन्द्रजी विधिपूर्वक उसकी रक्षा करते रहे
Mārkaṇḍeya berkata: Di hutan itu persediaan makanan dan air melimpah, demikian pula umbi-umbian dan buah-buahan. Maka Kakutstha (Rāma) mendirikan perkemahan bala tentara di sana dan menjaganya dengan tertib sebagaimana mestinya.
Verse 2
रावण: संविध॑ चक्रे लड़कायां शास्त्रनिर्मिताम् । प्रकृत्यैव दुराधर्षा दृढप्राकारतोरणा,इधर रावण लंकामें शास्त्रोक्त प्रकारसे बनी हुई युद्ध-सामग्री (मशीनगन आदि)-का संग्रह करने लगा। लंकाकी चहारदीवारी और नगर-द्वार अत्यन्त सुदृढ़ थे; अतः स्वभावसे ही वह दुर्धर्ष थी--किसी भी आक्रमणकारीका वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन था
Mārkaṇḍeya berkata: Rāvaṇa menata di dalam Laṅkā pertahanan serta perlengkapan perang yang dibuat menurut ketentuan śāstra. Laṅkā pada hakikatnya sukar diserbu—tembok benteng dan gerbang-gerbangnya amat kokoh.
Verse 3
अगाधतोया: परिखा मीननक्रसमाकुला: । बभूवु: सप्त दुर्धर्षा: खादिरै: शड्कुभिश्चिता:,नगरके चारों ओर सात गहरी खाइयाँ थीं, जिनमें अगाध जल भरा रहता था और उनमें मत्स्य-मगर आदि जल-जन्तु निवास करते थे। इन खाइयोंमें सब ओर खैरके खूँटे गड़े हुए थे
Mārkaṇḍeya berkata: Mengelilingi kota terdapat tujuh parit yang dalam dan sukar ditembus, berisi air yang tak terduga dalamnya serta dipenuhi ikan dan buaya. Di sekelilingnya ditancapkan pancang-pancang dari kayu khadira, sehingga makin sulit didekati.
Verse 4
कपाटलयन्त्रदुर्धर्षा बभूवु: सहुडोपला: । साशीविषघटायोधा: ससर्जरसपांसव:,“मजबूत किवाड़ लगे थे और गोला बरसानेवाले यन्त्र (मशीनें) यथास्थान लगे थे। इनके सिवा वहाँ बहुत-से शृंग और गोले जमा किये गये थे। इन सब कारणोंसे इन खाइयोंको पार करना बहुत कठिन था। विषधर सर्पोंके समूह, सैनिक, सर्जरस (लाह) और धूल--इन सबसे संयुक्त और सुरक्षित होनेके कारण भी वे खाइयाँ दुर्गम थीं
Parit-parit itu menjadi nyaris tak tertembus: gerbang-gerbangnya kokoh, mesin-mesin perang yang sukar diserang telah dipasang pada tempatnya, dan bertumpuk batu serta peluru lontar. Ia makin diperkukuh oleh gerombolan ular berbisa, detasemen para kesatria, serta simpanan sarjara (lak/resin) dan debu—sehingga menyeberangi parit-parit itu amatlah sulit.
Verse 5
मुसलालातनाराचतोमरासिपर श्वथैः । अन्विताश्न शतघ्नीभि: समधूच्छिष्टमुद्गरा:,मुसल, अलात (बनैठी), बाण, तोमर, तलवार, फरसे, मोमके मुद्गर तथा तोप आदि अस्त्र-शस्त्रोंके संग्रहके कारण भी वे खाइयाँ दुर्लघ्य थीं
Parit-parit itu makin sukar dilalui karena dipenuhi persediaan senjata: gada dan obor api, anak panah besi, lembing, pedang, dan kapak; juga śataghnī serta pemukul berat, sebagian masih berlumur jelaga dan sisa-sisa bara. Kelimpahan persenjataan itulah yang membuat jalan mendekat menjadi genting dan nyaris tak terlewati.
Verse 6
पुरद्वारेषु सर्वेषु गुल्मा: स्थावरजड़मा: । बभूवु: पत्तिबहुला: प्रभूतगजवाजिन:,नगरके सभी दरवाजोंपर छिपकर बैठनेके लिये बुर्ज बने हुए थे। ये स्थावर गुल्म कहलाते थे और घूम-फिरकर रक्षा करनेवाले जो सैनिक नियुक्त किये गये थे वे जंगम गुल्म कहे जाते थे। इनमें अधिकांश पैदल और बहुत-से हाथीसवार तथा घुड़सवार भी थे
Di setiap gerbang kota berdiri gulma—pos pertahanan laksana benteng—yang tetap dan tak bergerak. Pos-pos itu terutama dijaga oleh infanteri, dan juga oleh banyak penunggang gajah serta kavaleri.
Verse 7
अड्ढदस्त्वथ लड्काया द्वारदेशमुपागतः । विदितो राक्षसेन्द्रस्य प्रविवेश गतव्यथ:,(श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे) महाबली अंगद दूत बनकर लंकापुरीके द्वारपर आये। राक्षतराज रावणको उनके आगमनकी सूचना दी गयी। फिर अनुमति मिलनेपर उन्होंने निर्भय होकर पुरीमें प्रवेश किया। अनेक करोड़ राक्षसोंके बीचमें जाते हुए अंगद मेघोंकी घटासे घिरे हुए सूर्यदेवके समान सुशोभित हो रहे थे
Kemudian Aṅgada yang perkasa, atas titah Śrī Rāmacandra sebagai utusan, tiba di gerbang Laṅkā. Kedatangannya dilaporkan kepada raja para rākṣasa, Rāvaṇa. Setelah izin diberikan, ia memasuki kota tanpa gentar.
Verse 8
मध्ये राक्षसकोटीनां बह्दीनां सुमहाबल: । शुशुभे मेघमालाभिरादित्य इव संवृत:,(श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे) महाबली अंगद दूत बनकर लंकापुरीके द्वारपर आये। राक्षतराज रावणको उनके आगमनकी सूचना दी गयी। फिर अनुमति मिलनेपर उन्होंने निर्भय होकर पुरीमें प्रवेश किया। अनेक करोड़ राक्षसोंके बीचमें जाते हुए अंगद मेघोंकी घटासे घिरे हुए सूर्यदेवके समान सुशोभित हो रहे थे
Di tengah tak terbilang pasukan rākṣasa, ia—Aṅgada yang amat perkasa—tampak bersinar laksana Matahari yang terselubung untaian awan.
Verse 9
स समासाद्य पौलस्त्यममात्यैरभिसंवृतम् । रामसंदेशमामन्त्र्य वाग्मी वक्तुं प्रचक्रमे
Ia mendekati Paulastya (Rāvaṇa) yang dikelilingi para menterinya; setelah menyampaikan amanat Rāma dengan tata cara yang patut, sang utusan yang fasih pun mulai berbicara.
Verse 10
मन्त्रियोंसे घिरकर बैठे हुए पुलस्त्यनन्दन रावणके पास पहुँचकर कुशल वक्ता अंगदने रावणको सम्बोधित करके श्रीरामचन्द्रजीका संदेश इस प्रकार कहना आरम्भ किया -- ९ || ([[।[[[[[। एए।[एाएएएएए ४५ | गाए प्ञगगा |! 0 चर | आह वत्वां राघवो राजन् कोसलेन्द्रो महायशा: । प्राप्तकालमिदं वाक््यं तदादत्स्व कुरुष्व च,राजन्! कोसलदेशके महाराज महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजीने तुमसे कहनेके लिये जो समयोचित संदेश भेजा है, उसे सुनो और तदनुसार कार्य करो
Angada berkata, “Wahai Raja! Rāghava yang termasyhur, Rāma penguasa Kosala, menyampaikan ini kepadamu. Inilah nasihat yang tepat pada waktunya; terimalah dan bertindaklah sesuai dengannya, wahai Raja.”
Verse 11
“जो राजा अपने मनको काबूमें न रखकर अन्यायमें तत्पर रहता है, उसका आश्रय लेकर उसके अधीन रहनेवाले नगर और देश भी अनीतिपरायण होकर नष्ट हो जाते हैं!
Bila seorang raja tidak mengekang pikirannya dan condong pada ketidakadilan, maka kota-kota dan negeri-negeri yang berlindung padanya pun ikut terseret ke jalan adharma dan pada akhirnya binasa.
Verse 12
त्वयैकेनापराद्धं मे सीतामाहरता बलात् | वधायानपराद्धानामन्येषां तद् भविष्यति,'सीताका बलपूर्वक अपहरण करके मेरा अपराध तो अकेले तुमने किया है, परंतु इसके कारण अन्य निर्दोष लोग भी मारे जायँगे”
Dengan merampas Sītā secara paksa, hanya engkau seorang yang telah berbuat salah terhadapku; namun karena perbuatan itu, pembantaian akan menimpa orang-orang lain yang tak bersalah.
Verse 13
अकृतात्मानमासाद्य राजानमनये रतम् | विनश्यन्त्यनयाविष्टा देशाक्ष नगराणि च,ये त्वया बलदपभ्यामविष्टेन वनेचरा: । ऋषयो हिंसिता: पूर्व देवाश्चाप्पवमानिता: “तुमने बल और अहंकारसे उन्मत्त होकर पहले जिन वनवासी ऋषियोंकी हत्या की, देवताओंका अपमान किया, राजर्षियोंके प्राण लिये तथा रोती-बिलखती अबलाओंका भी अपहरण किया था, उन सब अत्याचारोंका फल अब तुम्हें प्राप्त होनेवाला है”
Bila seorang raja yang tak menaklukkan diri dan tenggelam dalam adharma berkuasa, negeri-negeri dan kota-kota pun ikut direngkuh ketidakadilan itu dan binasa. Engkau, mabuk oleh kekuatan dan keangkuhan, dahulu menyakiti para resi penghuni rimba dan menghina para dewa; akibat dari kekejaman itu kini akan matang menimpamu.
Verse 14
राजर्षयश्न निहता रुदत्यश्न हृता: स्त्रिय: । तदिदं समनुप्राप्तं फलं तस्यानयस्य ते,“तुमने बल और अहंकारसे उन्मत्त होकर पहले जिन वनवासी ऋषियोंकी हत्या की, देवताओंका अपमान किया, राजर्षियोंके प्राण लिये तथा रोती-बिलखती अबलाओंका भी अपहरण किया था, उन सब अत्याचारोंका फल अब तुम्हें प्राप्त होनेवाला है”
Para resi-raja telah dibunuh, dan para perempuan—menangis dalam nestapa—telah diculik. Kini buah dari adharma-mu itu menimpamu; kekerasan dan kesombongan yang dahulu kau lepaskan telah masak menjadi akibat yang tak terelakkan.
Verse 15
हन्तास्मि त्वां सहामात्यैर्युध्यस्व पुरुषो भव । पश्य मे धनुषो वीर्य मानुषस्य निशाचर,“मैं मन्त्रियोंसहित तुम्हें मार डालूँगा। साहस हो तो युद्ध करो और पौरुषका परिचय दो। निशाचर! यद्यपि मैं मनुष्य हूँ, तो भी मेरे धनुषका बल देखना
Aku akan menumbangkanmu bersama para menterimu. Jika kau punya nyali, bertarunglah—jadilah lelaki dan tunjukkan keberanianmu. Wahai pengembara malam, meski aku manusia, saksikan daya busurku.
Verse 16
मुच्यतां जानकी सीता न मे मोक्ष्यसि कर्हिचित् । अराक्षसमिमं लोकं कर्तास्मि निशितै: शरै:,“जनकनन्दिनी सीताको छोड़ दो, अन्यथा कभी मेरे हाथसे जीवित नहीं बचोगे। मैं अपने तीखे बाणोंद्वारा इस संसारको राक्षसोंसे सूना कर दूँगा'
Lepaskan Jānakī Sītā; jika tidak, kau takkan pernah lolos hidup-hidup dari tanganku. Dengan anak panahku yang setajam silet, akan kubersihkan dunia ini dari para rākṣasa.
Verse 17
इति तस्य ब्रुवाणस्य दूतस्य परुषं वच: । श्रुत्वा न ममृषे राजा रावण: क्रोधमूर्च्छित:,श्रीरामचन्द्रजीके दूतके मुखसे ऐसी कठोर बातें सुनकर राजा रावण सहन न कर सका। वह क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा
Mendengar kata-kata kasar dari utusan itu, Raja Rāvaṇa tak mampu menahannya; seakan pingsan oleh gelombang amarah, ia pun dikuasai murka.
Verse 18
इ्धितज्ञास्ततो भर्तुश्न॒त्वारो रजनीचरा: । चतुर्ष्वज्रेषु जगृहुः शार्टूलमिव पक्षिण:,तब स्वामीके संकेतको समझनेवाले चार निशाचर अपनी जगहसे उठे और जिस प्रकार पक्षी सिंहको पकड़े, उसी प्रकार वे अंगदके चार अंगोंको पकड़ने लगे
Lalu empat makhluk pengembara malam, yang paham benar isyarat tuannya, bangkit dari tempatnya dan mencengkeram keempat anggota tubuhnya—seperti burung-burung mencengkeram seekor harimau.
Verse 19
तांस्तथाड्रेषु संसक्तानड्रदो रजनीचरान् । आदायैव खमुत्पत्य प्रासादतलमाविशत्,अंगद इस प्रकार अपने अंगोंसे सटे हुए उन चारों राक्षसोंको लिये-दिये आकाशभमें उछलकर महलकी छतपर जा चढ़े
Mārkaṇḍeya berkata: Melihat empat rākṣasa pengembara malam itu melekat erat pada anggota tubuhnya, Aṅgada merengkuh mereka apa adanya; lalu melompat ke angkasa terbuka dan mendarat di teras atap istana.
Verse 20
वेगेनोत्पततस्तस्य पेतुस्ते रजनीचरा: । भुवि सम्मभिन्नह्दया: प्रहारवरपीडिता:,उछलते समय उनके वेगसे छूटकर वे चारों राक्षस पृथ्वीपर जा गिरे। उन राक्षसोंकी छाती फट गयी और अधिक चोट लगनेके कारण उन्हें बड़ी पीड़ा हुई
Mārkaṇḍeya berkata: Ketika ia melompat dengan kecepatan dahsyat, para rākṣasa pengembara malam itu terlepas dan jatuh ke bumi. Hati mereka remuk, dan dihimpit oleh kerasnya hantaman, mereka menanggung derita yang amat pedih.
Verse 21
संसक्तो हर्म्यशिखरात् तस्मात् पुनरवापतत् | लड्घयित्वा पुरीं लड़॒कां सुवेलस्य समीपत:,छतपर चढ़े हुए अंगद फिर उस महलके कँगूरेसे कूद पड़े और लंकापुरीको लाँधकर सुवेलपर्वतके समीप आ पहुँचे
Mārkaṇḍeya berkata: Setelah mencapai puncak istana, ia kembali melompat turun dari ketinggian itu; melompati kota Laṅkā, ia tiba di dekat Gunung Suvela.
Verse 22
कोसलेन्द्रमथागम्य सर्वमावेद्य वानर: । विशश्राम स तेजस्वी राघवेणाभिनन्दित:,फिर कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजीसे मिलकर तेजस्वी वानर अंगदने रावणके दरबारकी सारी बातें बतायीं। श्रीरामने अंगदकी बड़ी प्रशंसा की। फिर वे विश्राम करने लगे
Kemudian ia menghadap penguasa Kosala, Rāma, dan melaporkan semuanya. Sang utusan kera yang bercahaya itu dipuji oleh Rāghava; lalu ia beristirahat.
Verse 23
तत: सर्वाभिसारेण हरीणां वातरंहसाम् | भेदयामास लड़्काया: प्राकारं रघुनन्दन:,तदनन्तर भगवान् श्रीरामने वायुके समान वेगशाली वानरोंकी सम्पूर्ण सेनाके द्वारा एक साथ लंकापर धावा बोल दिया और उसकी चहारदीवारी तुड़वा डाली
Kemudian, dengan serbuan besar-besaran pasukan kera yang secepat angin, Rāma—kebanggaan wangsa Raghu—menerobos benteng pertahanan Laṅkā.
Verse 24
विभीषणर्क्षाधिपती पुरस्कृत्याथ लक्ष्मण: । दक्षिणं नगरद्वारमवामृद्नाद् दुरासदम्,नगरके दक्षिण द्वारमें प्रवेश करना बहुत कठिन था, परंतु लक्ष्मणने विभीषण और जाम्बवानको आगे करके उसे भी धूलमें मिला दिया
Kemudian Lakṣmaṇa, dengan menempatkan Vibhīṣaṇa dan raja para beruang (Jāmbavān) di barisan terdepan, menghancurkan gerbang selatan kota—jalan masuk yang sebelumnya amat sukar diserbu.
Verse 25
करभारुणपाण्डूनां हरीणां युद्धशालिनाम् । कोटीशतसहस््रेण लड़कामभ्यपपत् तदा,तत्पश्चात् उन्होंने हथेलीके समान श्वेत और लाल रंगके युद्धकुशल वानरोंकी दस खरब सेनाके साथ लंकामें प्रवेश किया
Sesudah itu ia maju menuju Laṅkā dengan bala kera yang amat besar dan terlatih dalam perang—sebagian pucat, sebagian merah-kecokelatan—berjumlah tak terhitung, hingga ratusan ribu krore.
Verse 26
प्रलम्बबाहूरुकरजड्घान्तरविलम्बिनाम् | ऋक्षाणां धूम्रवर्णानां तिस््र: कोट्यो व्यवस्थिता:
Di sana berdiri tiga krore pasukan beruang berwarna kelabu-asap; lengan mereka panjang, menjuntai di antara paha yang besar dan tungkai yang kokoh.
Verse 27
उनके भुजा, ऊरु, हाथ और जंघा (पिंडली)--ये सभी अड् विशाल थे तथा अंगोंकी कान्ति धुएँके समान काली थी, ऐसे तीन करोड़ रीछ सैनिक भी उनके साथ लंकामें जाकर युद्धके लिये डटे हुए थे ।। उत्पतद्भि: पतद्भिश्न निपतद्भिश्न वानरै: । नादृश्यत तदा सूर्यो रजसा नाशितप्रभ:,उस समय वानरोंके उछलने-कूदने तथा गिरने-पड़नेसे इतनी धूल उड़ी कि उससे सूर्यकी प्रभा नष्ट-ती हो गयी और उसका दीखना बंद हो गया
Ketika para kera melompat, jatuh, dan menghantam tanah dalam hiruk-pikuk, debu mengepul begitu pekat hingga sinar matahari terhapus; saat itu matahari tak tampak.
Verse 28
शालिप्रसूनसदृशै: शिरीषकुसुमप्रभै: । तरुणादित्यसदृशै: शणगौरैश्व वानरै:,राजन! धानके फूल-जैसे रंगवाले, मौलसिरीके पुष्प-सदृश कान्तिवाले, प्रातःकालके सूर्यके समान अरुण प्रभावाले तथा सनईके समान सफेद रंगवाले वानरोंसे व्याप्त होनेके कारण लंकाकी चहारदीवारी चारों ओर कपिलवर्णकी दिखायी देती थी। स्त्रियों और वृद्धोंसहित समस्त लंकावासी राक्षस चारों ओर आश्वर्यचकित होकर इस दृश्यको देख रहे थे
Wahai raja, benteng-benteng Laṅkā tampak keemasan-kecokelatan di segala sisi karena dipenuhi para kera: ada yang sewarna bunga padi, ada yang bercahaya seperti bunga śirīṣa, ada yang merah menyala seperti matahari muda, dan ada pula yang pucat-putih seperti rami. Menyaksikan pemandangan menakjubkan itu, para rākṣasa penghuni Laṅkā—termasuk perempuan dan para lanjut usia—berdiri memandang dengan takjub.
Verse 29
प्राकारं ददृशुस्ते तु समन््तात् कपिलीकृतम् | राक्षसा विस्मिता राजन् सस्त्रीवृद्धा: समनन््ततः,राजन! धानके फूल-जैसे रंगवाले, मौलसिरीके पुष्प-सदृश कान्तिवाले, प्रातःकालके सूर्यके समान अरुण प्रभावाले तथा सनईके समान सफेद रंगवाले वानरोंसे व्याप्त होनेके कारण लंकाकी चहारदीवारी चारों ओर कपिलवर्णकी दिखायी देती थी। स्त्रियों और वृद्धोंसहित समस्त लंकावासी राक्षस चारों ओर आश्वर्यचकित होकर इस दृश्यको देख रहे थे
Mārkaṇḍeya berkata: “Mereka melihat benteng di sekeliling telah berubah menjadi warna kekuningan—seakan-akan diselimuti warna para kera. Wahai Raja, para rākṣasa, termasuk perempuan dan orang-orang tua, berdiri di segala sisi, tercengang memandang pemandangan itu.”
Verse 30
बिभिदुस्ते मणिस्तम्भान् कर्णान््टशिखराणि च । भग्नोन्मथितश्ड्राणि यन्त्राणि च विचिक्षिपु:,वानर सैनिक वहाँके मणिनिर्मित खम्भों और अत्यन्त ऊँचे-ऊँचे महलोंके कंगूरोंको तोड़ने-फोड़ने लगे। गोलाबारी करनेवाले जो तोप आदि यन्त्र लगे थे, उनके शिखरोंको चूर- चूर करके उन्होंने दूर फेंक दिया
Mārkaṇḍeya berkata: “Mereka menghancurkan pilar-pilar bertatah permata serta puncak dan benteng-benteng kecil di atas istana-istana yang menjulang. Mesin-mesin pengepungan dan alat pelontar proyektil pun mereka remukkan, dicabut, lalu dilemparkan jauh.”
Verse 31
परिगृहा शतघ्नीश्व सचक्रा: सहुडोपला: । चिक्षिपुर्भुजवेगेन लड़कामध्ये महास्वना:,पहियोंवाली तोपों, शृंगों और गोलोंको ले-लेकर महान् कोलाहल करते हुए वानर अपनी भुजाओंके वेगसे उन्हें लंकामें फेंकने लगे
Mārkaṇḍeya berkata: “Mereka merenggut śataghnī, senjata-senjata laksana cakra, serta batu dan bongkah besar; sambil menggemuruhkan hiruk-pikuk dahsyat, para pejuang itu melemparkannya dengan kekuatan lengan ke tengah-tengah Laṅkā.”
Verse 32
प्राकारस्थाक्ष ये केचिन्निशाचरगणास्तथा । प्रदुद्रुव॒ुस्ते शतश: कपिभि: समभिद्रुता:,जो कोई निशाचर चहारदीवारीकी रक्षाके लिये सैकड़ोंकी संख्यामें वहाँ खड़े थे, वे सब वानरोंद्वारा खदेड़े जानेपर भाग खड़े हुए
Mārkaṇḍeya berkata: “Kelompok-kelompok rākṣasa pengembara malam yang berjaga di atas benteng—berjumlah ratusan—ketika diserbu dan didesak mundur oleh para kera, lari tunggang-langgang.”
Verse 33
ततस्तु राजवचनादू राक्षसा: कामरूपिण: । निर्ययुर्विकृताकारा: सहस्रशतसड्घश:,तदनन्तर राक्षसराज रावणकी आज्ञा पाकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस लाख-लाखकी टोली बनाकर नगरसे बाहर निकले। उन सबकी आकृति बड़ी विकराल थी
Kemudian, atas titah sang raja, para rākṣasa yang dapat berganti rupa sesuka hati pun berangkat. Dengan wujud-wujud yang ganjil dan mengerikan, mereka tumpah keluar dari kota dalam rombongan ratusan dan ribuan.
Verse 34
शस्त्रवर्षाणि वर्षन्तो द्रावयित्वा वनौकस: । प्राकारं शो भयन्तस्ते पर॑ं विक्रममास्थिता:,वे चहारदीवारीकी शोभा बढ़ाते हुए अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करके वनवासी वानरोंको खदेड़ने लगे और अपने उत्तम पराक्रमका परिचय देने लगे
Mārkaṇḍeya berkata: “Sambil menghujani dengan derasnya senjata, mereka menghalau para vānarā penghuni rimba; dan ketika mereka membuat benteng pertahanan tampak gemilang oleh peragaan keprajuritan, tampaklah puncak keberanian mereka.”
Verse 35
स माषराशिसदृशैर्ब भूव क्षणदाचरै: । कृतो निर्वानरों भूय: प्राकारो भीमदर्शनै:,उड़दके ढेर-जैसे काले-कलूटे उन भयंकर निशाचरोंने लड़कर पुनः उस चहारदीवारीको वानरोंसे सूनी कर दिया
Mārkaṇḍeya berkata: “Para rākṣasa pengembara malam itu—hitam laksana tumpukan kacang urad—bertarung dan sekali lagi menjadikan benteng itu kosong dari para vānarā; sehingga pertahanan kota tampak mengerikan.”
Verse 36
पेतु: शूलविभिन्नाज़ा बहवो वानरर्षभा: । स्तम्भतोरणभ ग्नाश्ष पेतुस्तत्र निशाचरा:,उनके शूलोंकी मारसे अंग विदीर्ण हो जानेके कारण बहुत-से श्रेष्ठ वानर धराशायी हो गये। इसी प्रकार वानरोंके हाथोंसे खम्भोंकी मार खाकर कितने ही निशाचर युद्धका मैदान छोड़कर भाग गये और कितने वहीं ढेर हो गये
Mārkaṇḍeya berkata: “Banyak pemimpin vānarā yang gagah jatuh tersungkur, anggota tubuhnya tercabik oleh tikaman tombak; dan di sana pula banyak rākṣasa roboh di medan laga, remuk oleh hantaman pilar dan gerbang.”
Verse 37
केशाकेश्यभवद् युद्ध रक्षसां वानरै: सह । न्खैर्दन्तश्न वीराणां खादतां वै परस्परम्,तत्पश्चात् वीर राक्षसोंका वानरोंके साथ सिरके बाल पकड़कर युद्ध होने लगा। वे नखों और दाँतोंसे भी एक-दूसरेको काट खाते थे
Mārkaṇḍeya berkata: “Kemudian pertempuran rākṣasa dan vānarā berubah menjadi pergumulan saling mencengkeram rambut. Para kesatria itu saling mencabik dengan kuku dan menggigit dengan gigi.”
Verse 38
निष्टनन्तो ह्युभयतस्तत्र वानरराक्षसा: । हता निपतिता भूमौ न मुज्चन्ति परस्परम्,दोनों ओरसे गर्जना करते हुए वानर तथा राक्षस इस प्रकार युद्ध करते थे कि मरकर पृथ्वीपर गिर जानेके बाद भी एक-दूसरेको छोड़ते नहीं थे
Mārkaṇḍeya berkata: “Dengan raungan dari kedua pihak, para vānarā dan rākṣasa bertempur sedemikian rupa sehingga bahkan setelah tewas dan rebah di bumi, mereka tetap tidak melepaskan satu sama lain.”
Verse 39
रामस्तु शरजालानि ववर्ष जलदो यथा । तानि लड़्कां समासाद्य जघ्नुस्तान् रजनीचरान्,उधर श्रीरामचन्द्रजी भी, जैसे बादल जल बरसाते हैं, उसी प्रकार बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे और वे बाण लंकामें घुसकर वहाँ खड़े हुए निशाचरोंके प्राण लेने लगे
Mārkaṇḍeya berkata: Rāma menurunkan hujan anak panah, laksana awan hujan mencurahkan air. Anak-anak panah itu mencapai Laṅkā dan menumbangkan para rākṣasa pengembara malam yang berdiri di sana, merenggut nyawa mereka.
Verse 40
सौमित्रिरपि नाराचैदढधन्वा जितक्लम: । आदिश्यादिश्य दुर्गस्थान् पातयामास राक्षसान्,क्लेश और थकावटपर विजय पानेवाले सुदृढ़ धनुर्धर सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी सूचना दे-देकर नाराच नामक बाणोंद्वारा दुर्गके भीतर रहनेवाले राक्षसोंको भी मार गिराने लगे
Lakṣmaṇa, putra Sumitrā, juga—pemanah bertulang baja yang menaklukkan letih dan derita—berulang kali memberi aba-aba, lalu dengan panah nārāca menjatuhkan para rākṣasa yang bertahan di dalam benteng.
Verse 41
ततः प्रत्यवहारो<भूत् सैन्यानां राघवाज्ञया । कृते विमर्दे लड़कायां लब्धलक्ष्यो जयोत्तर:,इस प्रकार लंकामें भीषण मार-काट मचानेके बाद वानरसैनिक लक्ष्यसिद्धिपूर्वक विजय पाकर श्रीरघुनाथजीकी आज्ञासे युद्ध बंद करके शिविरकी ओर लौट गये
Kemudian, atas perintah Rāghava, pasukan pun ditarik mundur. Setelah pertempuran dahsyat di Laṅkā, pasukan vānara—telah mencapai sasaran dan meraih kemenangan—menghentikan perang dan kembali menuju perkemahan.
Verse 284
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि लड्काप्रवेशे चतुरशीत्यधिकद्वधिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ा भारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें लंकामें प्रवेशविषयक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय प्रा हुआ ॥/
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, di bagian Rāmopākhyāna, berakhirlah bab ke-284 tentang masuknya ke Laṅkā.
Karṇa must reconcile an uncompromising vow of generosity and truthfulness with the strategic reality that giving away the kuṇḍalas reduces his protection and affects future combat outcomes.
The chapter frames ethical integrity (satya maintained through dāna) as a defining identity-principle, while also acknowledging prudent regulation (niyama) and negotiated reciprocity as legitimate forms of agency within dharma.
Yes: Vaiśaṃpāyana’s narration and the dream-confirmation structure function as validation, presenting Sūrya’s guidance as authoritative counsel that is subsequently reaffirmed and operationalized by Karṇa.