Adhyaya 255
Vana ParvaAdhyaya 25540 Versesकुरु-पक्ष के लिए राजनीतिक-सामरिक ज्वार चढ़ता है; प्रत्यक्ष कुरुक्षेत्र-युद्ध नहीं, पर भविष्य-युद्ध के लिए संसाधन और मनोबल का संचय।

Adhyaya 255

जयद्रथविमोचन–पलायनवृत्तान्तः (Recovery of Draupadī and Jayadratha’s flight)

Upa-parva: Draupadī-haraṇa–Jayadratha-saṃyoga (Abduction episode and pursuit)

Vaiśaṃpāyana narrates a concentrated engagement in which Jayadratha urges allied forces to press the fight. The battlefield intensifies: Bhīma advances with an iron mace; Arjuna and Yudhiṣṭhira inflict rapid losses; Nakula and Sahadeva execute targeted actions against mounted and elephant forces. The opposing formations fragment as casualties mount, and the field imagery shifts to aftermath and scavengers. Jayadratha, alarmed, releases Draupadī and attempts flight. Arjuna restrains Bhīma from indiscriminate pursuit, insisting the principal offender be sought. A triadic ethical debate follows: Bhīma vows he will not release Jayadratha; Yudhiṣṭhira counsels sparing him due to Duḥśalā and Gāndhārī; Draupadī argues that an abductor and aggressor is not fit to be spared. The chapter closes with Bhīma and Arjuna accelerating the chase as Jayadratha refuses to turn back despite being addressed.

Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि महाधनुर्धर कर्ण दुर्योधन के प्रयोजन से विशाल सेना लेकर द्रुपद के रमणीय नगर को चारों ओर से घेर लेता है—यह केवल युद्ध नहीं, एक संदेश है कि हस्तिनापुर की शक्ति अब दूर-दूर तक पहुँचेगी। → कर्ण महायुद्ध करके द्रुपद को वश में करता है, कर (tribute) दिलवाता है, और फिर एक के बाद एक राजाओं को जीतता चलता है—नेपाल-प्रदेश के नरेश, पर्वतीय क्षेत्र, पूर्व दिशा की ओर धावा, फिर दक्षिण में पाण्ड्य-देश और श्रीशैल, आगे केरल; पश्चिम में अवन्ती को साम-नीति से झुकाता है और वृष्णियों से संगम कर पश्चिम दिशा में भी विजय-यात्रा बढ़ाता है। मार्ग में कहीं स्वेच्छा से दान मिलता है (रुक्मी का ‘जितना सोना चाहो’), कहीं बल से अधीनता; और राजाओं की प्रतिक्रियाएँ बँटी रहती हैं—कोई प्रशंसा, कोई निन्दा, कोई मौन। → चारों दिशाओं में विजय का चरम तब आता है जब सूतनन्दन कर्ण शशक, यवन आदि म्लेच्छ-समूहों तक को जीतकर ‘समूची पृथ्वी’ को अपने अभियान के अधीन दिखाता है—और इस व्यापक दिग्विजय का राजनीतिक फल यह बनता है कि दुर्योधन और शकुनि कर्ण के बल पर पाण्डवों को युद्ध में पहले ही पराजित मान बैठते हैं। → कर्ण की दिग्विजय से धन-रत्न, स्वर्ण-रजत, और कर-राशि एकत्र होती है; अनेक राजाओं की अधीनता स्थापित होती है; और कौरव-पक्ष के भीतर आत्मविश्वास दृढ़ हो जाता है कि अब पाण्डवों का प्रतिरोध टिक नहीं पाएगा। → दुर्योधन-शकुनि का यह अति-आत्मविश्वास—कि ‘पाण्डव पराजित ही समझो’—आगामी टकराव की भूमि तैयार करता है: क्या यह विजय-यात्रा धर्म-नीति की कसौटी पर टिकेगी, या अहंकार भविष्य में विनाश का द्वार खोलेगा?

Shlokas

Verse 1

वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर महाथनुर्धर कर्णने अपनी विशाल सेनाके साथ जाकर राजा द्रुपदके रमणीय नगरको चारों ओरसे घेर लिया

Waiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, yang terbaik di antara keturunan Bharata! Setelah itu Karṇa, pemanah perkasa, maju bersama bala tentaranya yang besar dan mengepung kota indah milik Raja Drupada dari segala penjuru.”

Verse 2

युद्धेन महता चैनं चक्रे वीर॑ वशानुगम्‌ । सुवर्ण रजतं चापि रत्नानि विविधानि च

Dengan pertempuran besar ia menundukkan sang pahlawan itu ke dalam kekuasaannya. Ia pun memperoleh emas, perak, dan berbagai macam permata.

Verse 3

करं च दापयामास द्रुपदं नृपसत्तम । त॑ विनिर्जित्य राजेन्द्र राजानस्तस्य येडनुगा:

Sang raja terbaik memaksa Drupada membayar upeti. Dan, wahai raja, setelah menaklukkannya dengan tuntas, ia juga menundukkan para penguasa lain yang menjadi sekutu dan pengikut Drupada.

Verse 4

तानू सर्वान्‌ वशगांक्षक्रे करं चैनानदापयत्‌ । फिर महान्‌ युद्ध करके उसने वीर द्रुपदको अपने वशमें कर लिया और उन्हें सोना, चाँदी, भाँति-भाँतिके रत्न एवं कर देनेके लिये विवश किया। नृपश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! इस प्रकार द्रपदको जीतकर कर्णने उनके अनुयायी नरेशोंको भी अपने अधीन कर लिया और उन सबसे भी कर वसूल किया ।। २-३ $ || अशीोत्तरां दिशं गत्वा वशे चक्रे नराधिपान्‌,तत्पश्चात्‌ उसने उत्तर दिशामें जाकर वहाँके राजाओंको अपने वशमें कर लिया। भगदत्तको जीतकर राधानन्दन कर्ण शत्रुओंसे युद्ध करता हुआ महान्‌ पर्वत हिमालयपर आरूढ़ हुआ। वहाँसे सब दिशाओंमें जाकर उसने समस्त राजाओंको अपने अधीन किया और हिमालयप्रदेशके समस्त भूपालोंको जीतकर उनसे कर लिया

Ia menundukkan mereka semua dan memaksa mereka membayar upeti.

Verse 5

भगदत्तं च निर्जित्य राधेयो गिरिमारुहत्‌ । हिमवन्तं महाशैलं युध्यमानश्व शत्रुभि:,तत्पश्चात्‌ उसने उत्तर दिशामें जाकर वहाँके राजाओंको अपने वशमें कर लिया। भगदत्तको जीतकर राधानन्दन कर्ण शत्रुओंसे युद्ध करता हुआ महान्‌ पर्वत हिमालयपर आरूढ़ हुआ। वहाँसे सब दिशाओंमें जाकर उसने समस्त राजाओंको अपने अधीन किया और हिमालयप्रदेशके समस्त भूपालोंको जीतकर उनसे कर लिया

Setelah menaklukkan Bhagadatta, Rādheya (Karna) mendaki gunung. Sambil bertempur melawan musuh-musuhnya, ia mencapai puncak besar Himavān (Himalaya).

Verse 6

प्रययौ च दिश: सर्वान्‌ नृपतीन्‌ वशमानयत्‌ | स हैमवतिकान्‌ जित्वा करं सर्वानदापयत्‌,तत्पश्चात्‌ उसने उत्तर दिशामें जाकर वहाँके राजाओंको अपने वशमें कर लिया। भगदत्तको जीतकर राधानन्दन कर्ण शत्रुओंसे युद्ध करता हुआ महान्‌ पर्वत हिमालयपर आरूढ़ हुआ। वहाँसे सब दिशाओंमें जाकर उसने समस्त राजाओंको अपने अधीन किया और हिमालयप्रदेशके समस्त भूपालोंको जीतकर उनसे कर लिया

Waiśampāyana berkata: Ia berangkat ke segala penjuru dan menundukkan para raja ke bawah kekuasaannya. Setelah menaklukkan penguasa wilayah Himālaya, ia mewajibkan mereka semua membayar upeti (pajak kerajaan).

Verse 7

नेपालविषये ये च राजानस्तानवाजयत्‌ । अवतीर्य ततः शैलात्‌ पूर्वां दिशमभिद्रुत:,तदनन्तर नेपालदेशमें जो राजा थे, उनपर भी विजय प्राप्त की, फिर हिमालय पर्वतसे उतरकर उसने पूर्व दिशाकी ओर धावा किया

Waiśampāyana berkata: Ia pun menaklukkan para raja di wilayah Nepal. Lalu, turun dari gunung itu, ia melesat menuju arah timur.

Verse 8

अड्डान्‌ वज्ान्‌ कलिंगांश्व शुण्डिकान्‌ मिथिलानथ । मागधान्‌ कर्कखण्डांश्व निवेश्य विषये55त्मन:,अंग, वंग, कलिंग, शुण्डिक, मिथिला, मगध और कर्कखण्ड--इन सब देशोंको अपने राज्यमें मिलाकर कर्णने आवशीर, योध्य और अहिक्षत्र देशको भी जीत लिया। इस प्रकार पूर्व दिशापर विजय प्राप्त करके उसने वत्सभूमिमें पदार्पण किया

Waiśampāyana berkata: Dengan menundukkan Aṅga, Vaṅga, Kaliṅga, Śuṇḍika, Mithilā, Magadha, dan Karkakhaṇḍa, Karṇa memasukkan negeri-negeri itu ke dalam wilayah kekuasaannya.

Verse 9

आवशीरांश्व योध्यांश्व अहिक्षत्रं च निर्जयत्‌ । पूर्वा दिशं विनिर्जित्य वत्सभूमिं तथागमत्‌,अंग, वंग, कलिंग, शुण्डिक, मिथिला, मगध और कर्कखण्ड--इन सब देशोंको अपने राज्यमें मिलाकर कर्णने आवशीर, योध्य और अहिक्षत्र देशको भी जीत लिया। इस प्रकार पूर्व दिशापर विजय प्राप्त करके उसने वत्सभूमिमें पदार्पण किया

Waiśampāyana berkata: Ia juga menaklukkan Āvaśīra, Yodhyā, dan Ahikṣatra. Dengan demikian, setelah menundukkan seluruh wilayah timur, ia memasuki negeri Vatsa.

Verse 10

वत्सभूमिं विनिर्जित्य केवलां मृत्तिकावतीम्‌ | मोहन पत्तनं चैव त्रिपुरीं कोसलां तथा

Waiśampāyana berkata: Setelah menaklukkan Vatsabhūmi, ia menjadikannya seakan tinggal hamparan tanah belaka. Ia pun merebut Mohana, kota bernama Patthana, Tripurī, dan juga Kosalā.

Verse 11

दक्षिणां दिशमास्थाय कर्णो जित्वा महारथान्‌,दक्षिण दिशामें पहुँचकर कर्णने बड़े-बड़े महारथियोंको जीता। दाक्षिणात्योंमें रुक्मीके साथ कर्णने युद्ध किया। रुक्मीने पहले तो बड़ा भयंकर युद्ध किया, फिर उसने सूतपुत्र कर्णसे कहा

Waiśampāyana berkata: Menghadap ke penjuru selatan, Karṇa menaklukkan banyak maharathi, para kesatria kereta perang yang agung. Setelah tiba di wilayah selatan, ia menundukkan para pejuang termasyhur di sana. Di antara raja-raja selatan ia bertempur melawan Rukmī. Rukmī mula-mula mengobarkan pertempuran yang dahsyat dan mengerikan; kemudian ia berbicara kepada Karṇa, putra sais kereta—menyinggung ketegangan antara kemuliaan kepahlawanan dan hinaan asal-usul yang kerap menyertai persaingan di medan perang.

Verse 12

रुक्मिणं दाक्षिणात्येषु योधयामास सूतज: । स युद्ध तुमुलं कृत्वा रुक्मी प्रोवाच सूतजम्‌,दक्षिण दिशामें पहुँचकर कर्णने बड़े-बड़े महारथियोंको जीता। दाक्षिणात्योंमें रुक्मीके साथ कर्णने युद्ध किया। रुक्मीने पहले तो बड़ा भयंकर युद्ध किया, फिर उसने सूतपुत्र कर्णसे कहा

Waiśampāyana berkata: Di wilayah selatan, putra sais kereta (Karṇa) bertempur melawan Rukmī. Setelah mengobarkan pertempuran yang gaduh dan sengit, Rukmī pun berbicara kepada Karṇa.

Verse 13

प्रीतो5स्मि तव राजेन्द्र विक्रमेण बलेन च । न ते विघ्नं करिष्यामि प्रतिज्ञां समपालयम्‌,“राजेन्द्र! मैं तुम्हारे बल और पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हारे कार्यमें विघ्न नहीं डालूँगा। थोड़ी देर युद्ध करके मैंने केवल क्षत्रियधर्मका पालन किया है

“Wahai raja mulia, aku berkenan atas kekuatan dan kegagahanmu. Aku tidak akan menghalangi urusanmu; aku akan menepati janjiku.”

Verse 14

प्रीत्या चाहं प्रयच्छामि हिरण्यं यावदिच्छसि । समेत्य रुक्मिणा कर्ण: पाण्ड्यंशैलं च सोडगमत्‌

“Dengan niat baik, akan kuberikan emas sebanyak yang kau kehendaki.” Setelah bersekutu dengan Rukmī, Karṇa pun berangkat dan mencapai pegunungan negeri Pāṇḍya.

Verse 15

“तुम जितना सोना ले जाना चाहो उतना मैं प्रसन्नतापूर्वक दे रहा हूँ।” इस प्रकार रुकमीसे मिलकर कर्णने पाण्ड्यदेश तथा श्रीशैलकी ओर प्रस्थान किया ।। स केरलं रणे चैव नील॑ चापि महीपतिम्‌ । वेणुदारिसुतं चैव ये चान्ये नृपसत्तमा:

“Ambillah emas sebanyak yang kau ingin bawa; dengan senang hati kuberikan.” Setelah demikian bertemu Rukmī, Karṇa berangkat menuju negeri Pāṇḍya dan ke arah Śrīśaila. Di sana, dalam pertempuran, ia menghadapi raja Kerala, juga Raja Nīla, putra Veṇudāri, serta para penguasa terkemuka lainnya.

Verse 16

दक्षिणस्यां दिशि नृपान्‌ करान्‌ सर्वानदापयत्‌ | उसने रणभूमिमें केरल नरेश, राजा नील तथा वेणुदारिपुत्रको हराया और दक्षिण दिशामें अन्य जितने प्रमुख भूपाल थे, उन सबको जीतकर उनसे कर वसूल किया ।। १५६ || शैशुपालिं ततो गत्वा विजिग्ये सूतनन्दन:

Vaiśampāyana berkata: Di penjuru selatan ia memaksa semua raja mempersembahkan upeti. Lalu ia menuju negeri para Śaiśupāla; putra kusir itu, Karṇa, menaklukkannya pula.

Verse 17

आव्न्त्यांश्व॒ वशे कृत्वा साम्ना च भरतर्षभ । वृष्णिभि: सह संगम्य पश्चिमामपि निर्जयत्‌,भरतश्रेष्ठ] तदनन्तर उसने सामनीतिके द्वारा अवन्तीदेशके राजाओंको वशमें करके वृष्णिवंशी यादवोंसे हिल-मिलकर पश्चिम दिशापर भी विजय प्राप्त की

Vaiśampāyana berkata: “Wahai yang terbaik di antara Bharata, setelah menundukkan para penguasa Avanti dengan jalan perdamaian dan siasat, lalu bersekutu dengan para Yādava Vṛṣṇi, ia pun menaklukkan penjuru barat.”

Verse 18

वारुणीं दिशमागम्य यवनान्‌ बर्बरांस्तथा | नृपान्‌ पश्चिमभूमिस्थान्‌ दापयामास वै करान्‌,इसके बाद पश्चिम दिशामें जाकर यवन तथा बर्बर राजाओंको, जो पश्चिम देशके ही निवासी थे, पराजित करके उनसे कर लिया

Vaiśampāyana berkata: Setelah menuju ke arah Varuṇa (penjuru barat), ia menundukkan bangsa Yavana dan Barbara, juga para raja yang berdiam di tanah-tanah barat, dan membuat mereka membayar upeti.

Verse 19

विजित्य पृथिवीं सर्वा स पूर्वापरदक्षिणाम्‌ । सम्लेच्छाटविकान्‌ वीर: सपर्वतनिवासिन:,शशकान्‌ यवनांश्चैव विजिग्ये सूतनन्दन: । इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सब दिशाओंकी समूची पृथ्वीको जीतकर म्लेच्छ, वनवासी, पर्वतीय, भद्गर, रोहितक, आग्रेय तथा मालव आदि समस्त गणराज्योंको परास्त किया। इसके बाद नीतिके अनुसार काम करनेवाले सूतनन्दन कर्णने हँसते-हँसते शशक और यवन राजाओंको भी जीत लिया

Vaiśampāyana berkata: Setelah menaklukkan seluruh bumi ke segala arah—timur, barat, dan selatan—pahlawan putra Sūta itu menundukkan kaum mleccha, para penghuni rimba, dan mereka yang tinggal di pegunungan. Ia pun mengalahkan bangsa Śaśaka dan Yavana.

Verse 20

भद्रान्‌ रोहितकांश्वैव आग्रेयान्‌ मालवानपि । गणान्‌ सर्वान्‌ विनिर्जित्य नीतिकृत्‌ प्रहसन्निव

Vaiśampāyana berkata: Setelah menaklukkan semua gana itu—Bhadrā, Rohitaka, Āgreya, dan Mālava—ia, penegak tata dan siasat, tampak seakan tersenyum, seolah kemenangan baginya adalah buah disiplin kebijakan.

Verse 21

नग्नजित्प्रमुखांश्नैव गणान्‌ जित्वा महारथान्‌,इस प्रकार पुरुषसिंह महारथी कर्ण नग्नजित्‌ आदि महारथी नरेशसमुदायोंको जीतकर सारी पृथ्वीको पराजित करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात्‌ हस्तिनापुरको लौट आया

Vaiśampāyana berkata: Setelah menaklukkan para mahāratha yang dipimpin Nagnajit, Karṇa—singa di antara manusia dan utama di medan perang—mengalahkan himpunan para raja itu, menundukkan seluruh bumi ke dalam kekuasaannya, lalu kembali ke Hastināpura.

Verse 22

एवं स पृथिवीं सर्वा वशे कृत्वा महारथ: । विजित्य पुरुषव्याप्रो नागसाह्कयमागमत्‌,इस प्रकार पुरुषसिंह महारथी कर्ण नग्नजित्‌ आदि महारथी नरेशसमुदायोंको जीतकर सारी पृथ्वीको पराजित करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात्‌ हस्तिनापुरको लौट आया /

Demikianlah sang mahāratha, harimau di antara manusia, setelah menundukkan seluruh bumi dan menaklukkan himpunan raja-raja seperti Nagnajit, kembali ke Nāgasāhvya (Hastināpura).

Verse 23

तमागतं महेष्वासं धार्तराष्ट्री जनाधिप: । प्रत्युदूग्म्य महाराज सभ्रातृपितृबान्धव:

Ketika sang pemanah agung itu tiba, raja Dhārtarāṣṭra—wahai maharaja—maju menyambutnya bersama saudara-saudaranya, para sesepuh laksana ayah, dan segenap kerabat.

Verse 24

अर्चयामास विधिना कर्णमाहवशोभिनम्‌ | आश्रावयच्च तत्‌ कर्म प्रीयमाणो जनेश्वर:

Sang raja, bersukacita, menghormati Karṇa—yang memuliakan medan laga—dengan tata cara yang semestinya, dan memerintahkan agar perbuatan itu diumumkan lantang supaya semua mendengarnya.

Verse 25

4. ५ ढ़ है५ $ 2 ऐ कक प 282 श् पे | हट | गा २, | ५ + $ 7 यन्न भीष्मान्न च द्रोणान्न कृपान्न च बाह्नविकात्‌ | प्राप्तवानस्मि भद्ठं ते त्वत्त: प्राप्त मया हि तत्‌,तत्पश्चात्‌ उसने कर्णसे कहा--“वीरवर! तुम्हारा कल्याण हो। मुझे भीष्मजीसे, आचार्य द्रोणसे, कृपाचार्यसे तथा बाह्लिकसे भी जो वस्तु नहीं मिली थी, वह तुमसे प्राप्त हो गयी

Sesudah itu ia berkata kepada Karṇa: “Wahai pahlawan terbaik, semoga sejahtera bagimu. Apa yang tak pernah kuperoleh dari Bhīṣma, dari Droṇa, dari Kṛpa, maupun dari Bāhlika—itulah yang kini telah kuperoleh darimu.”

Verse 26

बहुना च किमुक्तेन शूणु कर्ण वचो मम | सनाथो<स्मि महाबाहो त्वया नाथेन सत्तम,“महाबाहु कर्ण! अधिक कहनेसे क्या लाभ? तुम मेरी बात सुनो। सत्पुरुषरत्न! तुम्हें अपना नाथ (सहायक) पाकर ही मैं सनाथ हूँ

Wahai Karṇa yang berlengan perkasa, apa guna berkata lebih panjang? Dengarkan ucapanku. Wahai yang terbaik di antara orang saleh—dengan engkau sebagai pelindungku, aku tak lagi tanpa sandaran; aku kini bertopang dan terlindungi.

Verse 27

न हि ते पाण्डवा: सर्वे कलाम्हन्ति षोडशीम्‌ । अन्ये वा पुरुषव्याप्र राजानो5भ्युदितोदिता:,'पुरुषसिंह! वे समस्त पाण्डव अथवा अन्य श्रेष्ठठटम नरेश तुम्हारी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते

Wahai harimau di antara manusia! Semua Pāṇḍava itu bersama-sama pun tak layak menyamai seperenam belas bagian dari keunggulanmu; demikian pula raja-raja lain—meski termasyhur dan dipuji—bukanlah tandinganmu.

Verse 28

स भवान्‌ धृतराष्ट्र तं गान्धारीं च यशस्विनीम्‌ । पश्य कर्ण महेष्वास अदितिं वज्रभूद्‌ यथा,“महाधनुर्धर कर्ण! अब तुम मेरे पूज्य पिता धृतराष्ट्र तथा यशस्विनी माता गान्धारीका उसी प्रकार दर्शन करो, जैसे वज्रधारी इन्द्र माता अदितिका दर्शन करते हैं!

Wahai Karṇa, pemanah agung! Kini pandanglah dengan hormat ayahku yang mulia, Dhṛtarāṣṭra, dan ibu yang termasyhur, Gāndhārī—sebagaimana Indra sang pembawa vajra menghadap ibunya, Aditi.

Verse 29

ततो हलहलाशब्द: प्रादुरासीद्‌ विशाम्पते । हाहाकाराश्न बहवो नगरे नागसाह्नये,जनमेजय! तदनन्तर हस्तिनापुर नगरमें सब ओर बड़ा भारी कोलाहल मच गया। अनेक प्रकारके हाहाकार सुनायी देने लगे

Kemudian, wahai Janamejaya, di kota Nāgasāhvaya (Hastināpura) tiba-tiba bangkit gemuruh yang dahsyat; banyak jerit ratap “Aduhai! Aduhai!” terdengar di seluruh penjuru.

Verse 30

केचिदेनं प्रशंसन्ति निन्दन्ति सम तथापरे । तूष्णीमासंस्तथा चान्ये नृपास्तत्र जनाधिप,राजन! कोई तो कर्णकी प्रशंसा करते थे और दूसरे उसकी निन्दा। अन्य कितने ही राजा निन्दा और प्रशंसा कुछ भी न करके मौन थे

Wahai raja, di sana sebagian penguasa memujinya, sebagian mencelanya; dan sebagian lainnya tetap diam—tak memuji dan tak pula menyalahkan.

Verse 31

एवं विजित्य राजेन्द्र कर्ण: शस्त्रभूतां वर: । सपर्वतवनाकाशां ससमुद्रां सनिष्कुटाम्‌,महाराज! इस प्रकार शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णने पर्वत, वन, खुले स्थान, समुद्र, उद्यान, ऊँचे-नीचे देश, पुर और नगर, द्वीप और जलयुक्त प्रदेशोंसे युक्त सारी पृथ्वीको जीतकर थोड़े ही समयमें समस्त राजाओंको वशमें कर लिया और उनसे अटूट धनराशि लेकर वह राजा धृतराष्ट्रके समीप आया

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja terbaik! Setelah menaklukkan demikian, Karṇa—yang terdepan di antara para pemanggul senjata—menundukkan seluruh bumi: beserta gunung dan rimba, hamparan terbuka dan bentang langit, lautan serta taman-taman kenikmatan.”

Verse 32

देशैरुच्चावचै: पूर्णा पत्तनैर्नगरैरपि । दीपैश्वानूपसम्पूर्ण: पृथिवीं पृथिवीपते,महाराज! इस प्रकार शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णने पर्वत, वन, खुले स्थान, समुद्र, उद्यान, ऊँचे-नीचे देश, पुर और नगर, द्वीप और जलयुक्त प्रदेशोंसे युक्त सारी पृथ्वीको जीतकर थोड़े ही समयमें समस्त राजाओंको वशमें कर लिया और उनसे अटूट धनराशि लेकर वह राजा धृतराष्ट्रके समीप आया

Waiśampāyana berkata: “Wahai penguasa bumi, wahai maharaja! Dunia seluruhnya—penuh negeri-negeri beragam, pelabuhan dan kota, pulau-pulau serta daerah rawa yang kaya air—jatuh ke dalam kekuasaan Karṇa.”

Verse 33

कालेन नातिदीर्घेण वशे कृत्वा तु पार्थिवान्‌ । अक्षयं धनमादाय सूतजो नृपमभ्ययात्‌,महाराज! इस प्रकार शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णने पर्वत, वन, खुले स्थान, समुद्र, उद्यान, ऊँचे-नीचे देश, पुर और नगर, द्वीप और जलयुक्त प्रदेशोंसे युक्त सारी पृथ्वीको जीतकर थोड़े ही समयमें समस्त राजाओंको वशमें कर लिया और उनसे अटूट धनराशि लेकर वह राजा धृतराष्ट्रके समीप आया

Waiśampāyana berkata: “Dalam waktu yang tidak lama, putra sais (Karṇa) menundukkan para raja, menghimpun kekayaan yang seakan tak berkesudahan, lalu menghadap sang raja.”

Verse 34

प्रविश्य च गृहं राजन्नभ्यन्तरमरिंदम । गान्धारीसहितं वीरो धृतराष्ट्रं ददर्श सः

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja! Sang pahlawan, penakluk musuh, memasuki kediaman itu dan menuju ruang dalam; di sana ia melihat Dhṛtarāṣṭra bersama Gāndhārī.”

Verse 35

पुत्रवच्च नरव्यात्र पादौ जग्राह धर्मवित्‌ | धृतराष्ट्रेण चाश्लिष्य प्रेमणा चापि विसर्जित:

Waiśampāyana berkata: “Sang pemaham dharma, bagaikan seorang putra, merangkul kaki sang ‘harimau di antara manusia’. Dhṛtarāṣṭra pun memeluknya dengan kasih, lalu dengan cinta melepaskannya.”

Verse 36

शत्रुसूदन_ जनमेजय! धर्मज्ञ वीर कर्णने अन्तःपुरमें प्रवेश करके गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका दर्शन किया और पुत्रकी भाँति उसने उनके दोनों चरण पकड़ लिये। धृतराष्ट्रने भी उसे प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर विदा किया ।। तदा प्रभूृति राजा च शकुनिश्चापि सौबल: । जानते निर्जितान्‌ पार्थान्‌ कर्णेन युधि भारत

Sejak saat itu, wahai Janamejaya, Karṇa yang gagah dan memahami dharma memasuki istana dalam, menghadap Dhṛtarāṣṭra bersama Gāndhārī, lalu memegang kedua kaki beliau bagaikan seorang putra. Dhṛtarāṣṭra pun memeluknya dengan kasih dan melepasnya pergi. Sejak itulah, wahai Bhārata, Raja Dhṛtarāṣṭra dan Śakuni putra Subala menganggap para Pāṇḍava telah kalah dalam perang—sebab mereka yakin Karṇa akan menundukkan mereka.

Verse 103

एतान्‌ सर्वान्‌ विनिर्जित्य करमादाय सर्वश: । वत्सभूमिको जीतकर कर्णने केवला, मृत्तिकावती, मोहन, पत्तन, त्रिपुरी तथा कोसला --इन सब देशोंको अपने अधिकारमें किया और सबसे कर लेकर (दक्षिण दिशाकी ओर) प्रस्थान किया

Vaiśampāyana berkata: Setelah menaklukkan semua negeri itu dan memungut upeti sepenuhnya, Karṇa menundukkan Vatsabhūmika, Jītakara, Karṇana, Kevalā, Mṛttikāvatī, Mohana, Pattana, Tripurī, dan Kosalā ke dalam kekuasaannya. Sesudah menghimpun pajak dari segala penjuru, ia pun berangkat menuju arah selatan.

Verse 163

पार्श्वस्थांश्वापि नृपतीन्‌ वशे चक्रे महाबल: । इसके बाद सूतपुत्र महाबली कर्णने चेदिदेशमें जाकर शिशुपालके पुत्रको हराया और उसके पार्श्ववर्ती नरेशोंको भी अपने अधीन कर लिया

Vaiśampāyana berkata: Sang putra sūta yang sangat perkasa itu juga menundukkan raja-raja tetangga. Setelah itu ia pergi ke negeri Cedi, mengalahkan putra Śiśupāla, dan membawa para penguasa di sekitarnya ke bawah kekuasaannya.

Verse 206

शशकान्‌ यवनांश्चैव विजिग्ये सूतनन्दन: । इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सब दिशाओंकी समूची पृथ्वीको जीतकर म्लेच्छ, वनवासी, पर्वतीय, भद्गर, रोहितक, आग्रेय तथा मालव आदि समस्त गणराज्योंको परास्त किया। इसके बाद नीतिके अनुसार काम करनेवाले सूतनन्दन कर्णने हँसते-हँसते शशक और यवन राजाओंको भी जीत लिया

Vaiśampāyana berkata: Putra sūta itu menaklukkan pula bangsa Śaśaka dan Yavana. Demikianlah, setelah menundukkan seluruh bumi ke empat penjuru—timur, barat, utara, dan selatan—ia mengalahkan kaum Mleccha serta berbagai kelompok perbatasan: para penghuni hutan dan pegunungan, juga konfederasi seperti Bhadragara, Rohitaka, Āgreya, dan Mālava. Sesudah itu, bertindak menurut nīti, Karṇa sang putra sūta menaklukkan bahkan raja-raja Śaśaka dan Yavana seakan-akan sambil tersenyum.

Verse 254

भारत! तबसे राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि युद्धमें कर्णद्वारा पाण्डवोंको पराजित हुआ ही समझने लगे ।। इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये चतुष्पठ्चाशदधिकद्विशततमो<ध्याय:

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Bhārata, sejak saat itu Raja Duryodhana, bersama Śakuni putra Subala, berpegang pada keyakinan bahwa dalam perang para Pāṇḍava telah dipastikan kalah oleh Karṇa.” Demikianlah dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, bagian Ghoṣayātrā Parva, dalam kisah Digvijaya Karṇa, berakhirlah adhyāya ke-254.

Frequently Asked Questions

Whether the principal offender (Jayadratha), after releasing Draupadī in fear, should be executed as deterrence and retributive justice, or spared due to kinship ties and the broader ethics of restraint.

Crisis response must balance immediate protective action with disciplined targeting and ethical review; even amid strategic engagement, the text foregrounds deliberation on proportional consequence, social bonds, and future political stability.

No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; its meta-function is narrative-ethical, using the pursuit and counsel sequence to situate punitive power within rājadharma and relational obligations.